Tuesday, June 4, 2013

‘महात्मा’ बुद्ध या ‘भगवान्‌’ बुद्ध–क्या उचित है ?

बुद्ध धम्म की सबसे बडी विशेषता उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है , बुद्ध धम्म परलोक वाद , ईशवरवाद और आत्मा की सत्ता मे यकीन नही करता । विशव मे फ़ैले अनगिन्त धर्मों मे से बुद्ध धम्म अपनी अलग छवि रखता है और यह छवि बुद्ध के वैज्ञानिक दृष्टिकोण में है । लेकिन फ़िर भी यह एक ताज्जुब  सा लगता है कि बुद्ध धम्म के अनुयायी गौतम बुद्ध को भगवान्‌ की उपाधि देते हैं । यह उपाधि बुद्ध की उन शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है जिसमें उन्होनें कहा है :
न हेत्थ देवो ब्रह्मा वा , संसारस्सत्थिकारको ।
सुद्ध्धम्मा पवतन्ति , हेतुसम्भार्पच्चया ॥ 
(विसुद्धि २१६८९,पच्चयपरिग्गहकथा )
संसार का निर्माण करने वाला न कोई देव है न ब्रम्हा । हेतु-प्रत्यय यानि कारणॊं पर आधारित मात्र शुद्ध धर्म प्रवतरित हो रहे हैं ।
तुम्हेहि किच्चमातप्पं , अक्खातारो तथागता ॥
धम्मपद २७६, मग्गवग
मैं तो मार्ग आख्यात करता हूँ, तुम्हारी मुक्ति के लिये तपना तो तुम्हें ही पडेगा ।
ईशवरीय सत्ता के अभाव में मानव जीवन कैसे अपनी जीवन यात्रा आरम्भ करे । बुद्ध ने इस पर कहा कि तुम स्वालम्बी बनॊ । ( अत्तदीपा भवथ अत्तसरणा ) । तुम ही अपने स्वामी हो ( अत्ता हि अत्तनो नाते ) । किसी भी पर्वत , वन , आराम , वृख्श , चैत्य आदि को देवता मानकर उसकी शरण मे मत जाओ क्योंकि इनसे दु:ख मुक्ति संभव नही है ।
भगवान्‌ शब्द का शाब्दिक अर्थ
आम भाषा में भगवान शब्द का अर्थ है ईशवर या परमात्मा , सर्वशक्तिमान , सृष्टि का रचयिता , पालनहारक और इसका संहार करने वाला जिसका नाम जपने से , ध्यान लगाने से वह प्रसन्न हो जाता है और भक्तो के पापों को क्षमा करके उन्हें भवसागर से पार निकाल लेता है ।
लेकिन फ़िर बुद्ध अनुयायियों द्वारा बुद्ध को भगवान्‌ शब्द की उपाधि क्यूं । इसके लिये थोडा और गहराई में जाना पडेगा । पालि भाषा मॆ कई शब्द संस्कृत भाषा के अनुरुप ही हैं लेकिन कही-२ उनके  शाब्दिक अर्थ अलग-२  हैं ।

संस्कृत-पालि तुल्य शब्दावली

पालि भाषा के अधिकांश शब्दों की संस्कृत शब्दों में बहुत अधिक समानता पायी जाती है। दूसरे शब्दों में यों कहें कि पालि शब्द संस्कृत शब्दों से व्युत्पन्न से लगते हैं। नीचे कुछ प्रमुख शब्दों के तुल्य पालि शब्द दिये गये हैं-
संस्कृत -- पालि
अच्युत -- अच्चुत
अग्नि -- अग्ग
अहिंसा -- अहिंसा
अक्षर -- अक्खर
अमृत -- अमत
अनात्मन -- अनत्त
अप्रमाद -- अप्पमाद
आर्य -- अरिय
आत्मन -- अत्त / अत्तन
ऋषि -- इसि
ऋद्धि -- इद्धि
ऋजु -- उजु
वृद्ध - वुद्ध
कृत -- कत
स्थविर -- थेर
औषध -- ओसध
राज्य -- रज्ज
ईश्वर -- इस्सर
तीर्ण -- तिण्ण
पूर्व -- पुब्ब
शरण -- सरण
दोष -- दोस
भिक्षु -- भिक्खु
ब्रह्मचारिन् -- ब्रह्मचारिन्
ब्राह्मण -- ब्राह्मण
बुद्ध -- बुद्ध
चक्र -- चक्क
चन्द्र -- चन्द
चित्र -- चित्त
चित्त -- चित्त
दृढ -- दल्ह
दण्ड -- दण्ड
दर्शन -- दस्सन
देव -- देव
धर्म -- धम्म
धर्मस्थ -- धर्मत्थ
ध्रुव -- धुव
दुःख -- दुक्ख
गन्धर्व -- गन्धब्ब
गुप्त -- गुत्त
हंस -- हंस
ध्यान -- झान
कर्म -- कम्म
काम -- काम
स्कन्ध -- खन्ध
शान्ति -- खान्ति / खान्ती
क्षत्रिय -- खत्तिय
क्षेत्र -- खेत्त
क्रोध -- कोध
मर्त्य -- मच्च
मृत्यु -- मच्चु
मार्ग -- मग्ग
मैत्र -- मेत्र
मिथ्यादृष्टि -- मिच्छादिट्ठि
मोक्ष -- मोक्ख
मुक्त -- मुत्त
निर्वाण -- निब्बान
नित्य -- निच्च
प्रव्रजित -- पब्बजित (a homeless monk)
प्रकीर्णक -- पकिन्नक (scattered, miscellaneous)
प्राण -- पान (breath of life)
प्रज्ञा -- पन्ना (intelligence, wisdom, insight)
प्रज्ञाशिला -- पन्नासिला (higher intelligence and virtue)
परिनिर्वाण -- परिनिब्बन
प्रतिमोक्ष -- पतिमोक्ख
प्रिय -- पिय (dear, friend, amiable)
पुष्प -- पुप्फ
पुत्र -- पुत्त
सर्व -- सब्ब (all, whole)
सत्य -- सच्च
श्रद्धा -- सद्धा
स्वर्ग -- सग्ग
सहस्र -- सहस्स (a thousand)
श्रमण -- समन (religious recluse)
सम्योजन -- सन्नोजन / संयोजन
स्रोतस् -- सोत (stream)
शुक्ल -- सुक्क (light, pure, bright, white)
शून्यता -- सुन्नता (emptiness (nibbana), the Void)
तृष्णा -- तन्हा (thirst, craving)
त्रिपिटक -- तिपिटक
सूत्र -- सुत्त
स्थान - थान (condition, state, stance)
वक् / वच् -- वच (voice, word, speech)
वर्ग -- वग्ग (chapter, section; all chapter headings)
व्रण -- वन (wound, sore)
वन -- वन (forest, jungle (of desires))
विजान -- विजान (understanding, knowing)
विज्ञान -- विन्नान (cognition, consciousness, one of the five khandhas)
वीर्य -- विरिय (vigor, energy, exertion)
चार आर्य सत्य
चत्वारि आर्यसत्यानि -- चत्तारि अरियसच्चानि (four noble truths)
1) दुःख -- दुक्ख
2) समुदय -- समुदय (origin, cause of ill)
3) निरोध -- निरोध (destruction of ill, cessation of ill)
4) मार्ग -- मग्ग (road, way)
आर्याष्टांग मार्ग -- अरिय अट्ठांगिक मग्ग (THE NOBLE EIGHTFOLD PATH)
1) सम्यग्दृष्टि -- सम्मदिट्ठि (right insight, right understanding, right vision)
2) सम्यक् संकल्प -- सम्मसंकप्प (right aspiration, right thoughts [right thoughts in the Theravada terminology denote the thoughts free from ill will, hatred, and jealousy)
3) सम्यग्वाक् -- सम्मवाच (right speech)
4) सम्यक् कर्मान्त -- सम्मकम्मन्त (right action)
5) सम्यग्जीव -- सम्मजीव (right livelihood, right living)
6) सम्यग्व्यायाम -- सम्मवयाम (right effort)
7) सम्यक्स्मृति -- सम्मसति (right memory, right mindfulness)
8) सम्यक्समाधि -- सम्मसमाधि (right concentration)
स्त्रोत: विकीपीडिया
पालि भाषा मे भगवान्‌ का अर्थ
पालि का भगवान्‌ अथवा भगवतं दो शब्दों से बना है – भग + वान्‌ । पालि में भग मायने होता है – भंग करना , तोडना , भाग करना उपलब्धि को बांटना आदि और वान्‌ का अर्थ है धारण्कर्ता , तृष्णा आदि । यानि जिसने तृष्णाओं को भंग कर दिया हो वह भगवान्‌।
पालि ग्रंथों मे बुद्ध के लिये प्रयुक्त भगवान्‌ अथवा भगवा शब्द को परिभाषित करने के बहुत से उदाहरण है :
भग्गरागोति भगवा ’ : जिसने राग भग्न किया कर लिया वह भगवान्‌
‘ भग्ग्दोसोति भगवा ’ : जिसने द्धेष भग्न किया हो वह भगवान्‌
‘ भग्गमोहोति भगवा , भग्गमानोति भगवा , भग्ग किलेसोति भगवा , भवानं अंतकरोति भगवा म भग्गकण्ड्कोति भगवा ’..: जिसने मोह भंग कर लिया , अभिमान नष्ट कर लिया , क्लेष भग्न कर लिया , भव संस्कारों का अंत कर लिया , कंटक भग्न कर लिये वह भगवान्‌।
‘भग्गमोहोति भगवा’: मोह भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गमानोति भगवा’ : अभिमान नष्ट कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गदिट्‌ठीति भगवा’ : दार्शिनिक मान्याताओं को भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गकण्डकोति भगवा’: कंटक भग्न किया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गकिलेसोति भगवा’: क्लेश , काषाय भग्न कर लिये , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भजि विभजि पविभजि धम्म्रतन्तिभगवा’ : भजि यानी जिसने धर्म रत्न का भजन किया , यानी सेवन , इस माने भगवान्‌ ।
ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं जिसमॆ भगवान शब्द का अर्थ संस्कृत के शाब्दिक अर्थ  से बिल्कुल  अलग दिखता है ।
पालि में एक सुत्त है :
इतिपि सो भगवा , अरहं , सम्मासम्बुद्धो,
विज्जाचरणसम्पन्नो सुगुतो लोकविदू ,
अनुत्तरो पुरिस सम्म सारथी सत्था देवमनुस्सानं , बुद्धो भगवति ॥
ऐसे जो अहर्त है , सम्यक्‌ सम्बुद्ध हैं , संपूर्ण जागृत हैं , लोभ , द्धेष और मोह से मुक्त ऐसे भगवन्‌ हैं , सर्वज्ञ हैं , ज्ञान और आचरण में परिपूर्ण हैं , सुगति प्राप्त हैं , वर्तमान और भूत भविष्य को जानने वाले हैं , यथावादी तथाकारी , जैसा कहते हैं वैसा करते हैं , ऐसे आचरण वाले हैं , आदमी कोलोभ , द्धेष और मोह से छुडाने वाले अप्रतिम सारथी हैं , देवता और मनुष्यों के सास्ता हैं , गुरु हैं , उपदेशक हैं , ऐसे मनुष्यों मे अनुपम श्रेष्ठतम्‌ भगवान्‌ बुद्ध हैं ।
संदर्भित ग्रंथ एंव वेबसाइट
१. गौतम बुद्ध और उनके उपदेश रचयिता आनन्द श्रीकृष्ण
२. बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य लेखक श्री राजेश चन्द्रा
३. भगवान बुद्ध और उनका धर्म लेखक डां भीमराव अम्बेड्कर
४ वीकीपीडिया

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