Friday, January 26, 2024

अवतारवाद का अधूरा सच


प्रमाणित लेख विपश्यना की वेबसाइट पर उपलब्ध है ... जोकि हिंदी लेख के अंत अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषा में है ... 
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भविष्य में कभी भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं कहोंगे.. गोयनका जी ने ऐसी घोषणा शंकराचार्यो से लिखित में करवाई थी.




शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वतीजी और विपश्यना आचार्य सत्यनारायण गोयन्काजी की संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति—
स्थल: महाबोधि सोसाइटी कार्यालय, सारनाथ, वाराणसी
समयः दोपहर: 3:30, दिनांक 12-11-1999.
जगद्गुरु कांची कामकोटि पीठ के श्रद्धेय शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वतीजी और विपश्यनाचार्य गुरुजी सत्यनारायण गोयन्काजी की सौहार्दपूर्ण वार्तालाप की संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित की जा रही है।
दोनों इस बात से सहमत हैं और चाहते हैं। कि दोनों प्राचीन परंपराओं में अत्यंत स्नेहपूर्वक वातावरण स्थापित रहे। इसे लेकर जिन पड़ोसी देशों के बन्धुओं में किसी कारण किसी प्रकार की गलतफहमी पैदा हुई हो, उसका जल्दी ही निराकरण हो। इस संबंध में निम्न बातों पर सहमति हुई —

1) किसी भी कारण से पहले के समय में आपसी मतभेदों को लेकर जो भी साहित्य निर्माण हुआ, जिसमें भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार बता कर जो कुछ लिखा गया, वह पड़ोसी देश के बंधुओं को अप्रिय लगा, इसे हम समझते हैं। इसलिए दोनों समुदायों के पारस्परिक संबंधों को पुनः स्नेहपूर्वक बनाने के लिए हम निर्णय करते हैं। कि भूतकाल में जो हुआ, उसे भुला कर अब हमें इस प्रकार की किसी मान्यता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।

2) पड़ोसी देशों में यह भ्रांति फैली कि भारत का हिंदू समुदाय बुद्ध के अनुयायिओं पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इन कार्यशालाओं का आयोजन कर रहा है। यह बात उनके मन से हमेशा के लिए निकल जाय, इसलिए हम यह प्रज्ञापित करते हैं। वैदिक और बुद-श्रमण की परंपरा भारत की अत्यंत प्राचीन मान्य परंपराओं में से हैं। दोनों का अपना-अपना गौरवपूर्ण स्वतंत्र अस्तित्व है। किसी एक परंपरा द्वारा अपने आपको ऊंचा और दूसरे को नीचा दिखाने का काम परस्पर द्वेष, वैमनस्य बढ़ाने का ही कारण बनता है। इसलिए भविष्य में कभी ऐसा न हो। दोनों परंपराओं को समान आदर एवं गौरव का भाव दिया जाये।

3) सत्कर्म के द्वारा कोई भी व्यक्ति समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है और दुष्कर्म के द्वारा नीचा,पतित, हीन लेता है। इसलिए हर व्यक्ति सत्कर्म करके तथा काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, मात्सर्य, अहंकार इत्यादि अशुभ दुर्गुणों को निकाल कर अपने आप को समाज में उच्च स्थान पर स्थापित करके सुख-शांति का अनुभव कर सकता है।
उपर्युक्त तीनों बातों पर हम दोनों की पूर्ण सहमति है तथा हम चाहते हैं कि भारत के सभी समुदाय के लोग पारस्परिक मैत्री भाव रखें तथा पड़ोसी देश भी भारत के साथ पूर्ण मैत्री भाव रखें
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इस घोषणा द्वारा यह स्वीकार किया गया कि व्यक्ति जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता, चाहे वह कहीं भी जन्मा हो । यदि वह सत्कर्म करता है तो समाज में पूज्य ही माना जायगा।
इसके बाद केवल एक को छोड़ कर बाकी सभी शंकराचार्यों ने और अनेक महामंडलेश्वरों ने भी इस समझौते पर अपनी स्वीकृति के हस्ताक्षर किये। यह सब विपश्यना के आधार पर हुआ। परंतु इस समझौते की सच्चाई को समाज में फैलाने का महत्त्वपूर्ण कार्य अभी होना बाकी है। समझौते की यह सच्चाई लोगों तक फैलेगी तभी उनकी भी भ्रांतियां दूर होगी।
अब समय आ गया है कि इसका अधिक से अधिक प्रकाशन करके, इस पर अमल किया जाय ताकि ग़लतफ़हमी दूर हो और देश की एक बड़ी समस्या का समाधान हो सके।
भारत के बाहर अन्य देशों में जात-पांत का भेदभाव नहीं है, परंतु कुछ एक पश्चिमी देशों में काले-गोरे का भेद अवश्य है। अब काले और गोरे दोनों ही विपश्यना में सम्मिलित हो रहे हैं। हसी जाति के कुछ लोगों को विपश्यना में पुष्ट करके आचार्य पद पर बैठाया और वे विपश्यना के शिविर लगाते हैं, जिनमें काले और गोरे सभी सम्मिलित होते हैं।
भगवान बुद्ध की शिक्षा ग्रहण करने वाला व्यक्ति जन्म के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेदभाव नहीं करता। विपश्यना धीमी गति से यही काम कर रही है। आज यह बहुत नन्हा-सा प्रारंभिक प्रयोग है जो आगे चल कर प्रबल रूप से संसार के सारे विपश्यी साधकों को प्रभावित करेगा और बाबासाहेब का सपना पूरा होगा । इसका मुझे पूर्ण विश्वास है । इसीमें सब का मंगल समाया हुआ है। भारत का ही नहीं, बल्कि सारे मानव समाज का कल्याण समाया हुआ हैं।

मंगलमित्र,
सत्यनारायण गोयन्का 

https://www.vridhamma.org/node/2428

https://www.vridhamma.org/sites/default/files/newsletters/1434022881_hi1999-13-KARUNAPURN-SANDAVANA.pdf

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