Friday, August 10, 2018

।।ओकास।।- श्री राजेश चन्द्रा-

।।ओकास।।
-राजेश चन्द्रा-
बौद्धों में एक बड़ी प्यारी परिपाटी है कि जब श्रद्धालु उपासक-उपासिकाएं धम्म कार्य के लिए एकत्रित होते हैं तो पूजा-वन्दना-परित्त की शुरूआत 'ओकास' से करते हैं। 
यह विनय का पारम्परिक अंग है कि यदि ऐसे अवसर पर कोई पूज्य भिक्खु या भिक्खुगण अथवा कोई बौद्ध आचार्य उपस्थित हैं तो उपासकगण सर्वप्रथम हाथ जोड़कर, भिक्खु अथवा आचार्य के सामने हो कर कहते हैं:

'ओकास!'

पारम्परिक रूप से पूरी गाथा कुछ इस तरह होती है:

ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

दुतियम्पि ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

ततियम्पि ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

इन गाथाओं में पहला शब्द है 'ओकास!', इसके बाद की पंक्ति में याचना है:

त्रिशरण और पंचशील सहित धम्म की याचना करता हूँ, अनुगृह कीजिए, भन्ते जी, शील प्रदान कीजिये।

दूसरी बार भी 'ओकास!',

फिर वही याचना और अनुगृह प्रार्थना।

और तीसरी बार भी 'ओकास!',

फिर उपरोक्तानुसार वही याचना और अनुगृह प्रार्थना।

यह याचना-प्रार्थना अनिवार्य रूप से सिर्फ भन्ते के लिए ही नहीं है बल्कि यदि कोई आचार्य हैं तब 'भन्ते' के स्थान पर 'आचरियो' शब्द का प्रयोग करेंगे, भिक्खुनी है तो 'अय्या' सम्बोधन प्रयोग करेंगे । यदि कोई भी नहीं है तब भगवान की प्रतिमा के सम्मुख यही याचना की जाती है। भारत के पारम्परिक बौद्ध समाजों में ये परम्पराएं जीवित हैं जैसे असम, अरुणाचल, मणिपुर, बंगाल, लद्दाख इत्यादि के बौद्ध समाजों में।अस्तु।
याचना की प्रक्रिया में सबसे प्यारा शब्द है- ओकास।
यह पालि भाषा का शब्द है जिसका सहज-सा अर्थ है- अवकाश।
पालि शब्दकोश में इसके और भी समानार्थी अर्थ दिये हैं- अनुज्ञा, अनुमति, स्थान, इजाज़त इत्यादि लेकिन मौलिक रूप से यह 'अवकाश' शब्द का पालि संस्करण है।
धम्म के जानकार से अवकाश मांगना अर्थात उससे समय मांगना। यदि इसे अंग्रेजी में कहें तो यह लगभग ऐसा होगा- Venerable Bhanteji, please give me time- पूज्य भन्ते जी, कृपया मुझे समय दीजिए।
समय ले कर बात करना, मुलाकात करना, इस परिपाटी की शुरूआत भगवान बुद्ध के द्वारा की गयी जो कि बौद्धों के समस्त धार्मिक विधानों का एक विनय है, अनिवार्य अंग है।
जैसे राह चलते किसी व्यक्ति से हमें कोई पता पूछना हो तो हम बड़ी विनम्रतापूर्वक पूछते हैं। सर्वप्रथम तो हम उस व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं- भाई साहब या बहन जी, सर या मैडम कह कर उन्हें उन्हें अपनी ओर मुखातिब करते हैं...
यह जो अपनी ओर मुखातिब करना है, विनम्रतापूर्वक ध्यानाकर्षित करना है यही अवकाश मांगना है, यही ओकास है...
ओकास अथवा अवकाश का ठीक-ठीक अर्थ मात्र समय मांगना भी नहीं है क्योंकि 'समय' शब्द भी पहले से ही पालि भाषा में मौजूद है। यदि आशय मात्र समय मांगना भर होता तो 'समय! अहं भन्ते' ऐसा उद्बोधन होता न कि 'ओकास! अहं भन्ते'।
ओकास अथवा अवकाश की याचना का अर्थ मात्र समय मांगना भर भी नहीं है बल्कि सम्पूर्ण चेतना में अवकाश मांगना है, अपनी जिज्ञासा समाधान, अपनी स्वीकृति के लिए अवकाश मांगना है, अंग्रेजी में कहें तो स्पेस मांगना है। स्पेस में टाइम अन्तर्निहित है।
कोई व्यक्ति अपने विचारों में मग्न है, जाने क्या चिन्तनधारा चल रही है, हम उसे टोकते हैं, रोकते हैं- भाई साहब, कृपया मुझे...
इतना बोलते ही हम उसकी चिन्तनधारा में अवरोध पैदा करते हैं, लेकिन ऐसा हमारा इरादा नहीं होता, अवरोध पैदा करना मकसद नहीं होता, बल्कि अपना लक्ष्य पाना हमारी जरूरत और व्याकुलता होती है क्योंकि हम किसी पते के लिए भटक रहे हैं। इसीलिए हमारे सम्बोधन में विनम्रता होती है और हमारी देह भाषा- बाडी लैंग्वेज- में भी याचना होती है, क्योंकि हम पता भर नहीं पूछ रहे हैं बल्कि उसकी चिन्तनधारा में, उसकी चेतना में भी थोड़ा-सा अवकाश मांग रहे हैं। दरअसल पता पूछने से पहले अप्रत्यक्ष रूप से बिना कहे ही हम एक निवेदन और कर रहे हैं- भाई साहब, आप जिन विचारों या भावनाओं में संलग्न हैं कृपया उसे थोड़ी देर के लिए विराम दे कर मेरी तरफ ध्यान दीजिए। वास्तव में हम ऐसा कहते नहीं हैं लेकिन हमारा अप्रत्यक्ष आशय यह भी होता है। बस में, ट्रेन में सफर करते समय हमें बैठने की जगह चाहिए होती  है तब वह भी ओकास है, अवकाश मांगना है, जगह मांगना, बैठने का स्थान मांगना। तब भी हमारी भाषा, देह भाषा विनम्रतापूर्ण होती है।
यह तो एक लौकिक उदाहरण मात्र हैं। जब हम धम्म के मार्ग पर चलने को प्रतिबद्ध होते हैं, धम्म मार्ग का पता जानना चाहते हैं, धम्म के क्षेत्र में मार्गदर्शन चाहते हैं तब तो हमारी विनम्रता व याचना पराकाष्ठा की होनी चाहिए।
मात्र इतना ही नहीं बल्कि आगे की पंक्तियाँ और भी गहरा विनय प्रदर्शन करती हैं- अनुग्गहं कत्वा- मुझ पर अनुगृह कीजिए। मात्र एक बार नहीं, दो बार नहीं बल्कि ऐसी विनम्र याचना तीन बार करने की परिपाटी है। तीन बार इसलिए कि हम शरीर से, वाणी से और मन से 'तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि' अर्थात त्रिशरण सहित पंचशील और धम्म की याचना करता हूँ या करती हूँ...
आगे हम पुनः कहते हैं- अनुग्गहं कत्वा- अनुगृह कीजिए- सीलं देथ मे भन्ते- भन्ते जी, मुझे शील प्रदान कीजिये।
बुद्ध का धम्म दुनिया का अनूठा धर्म है जो धम्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रथम स्थान शील को देता है, इस लिए बौद्ध पूजा पद्धति में कोई मंत्र नहीं मांगता, कोई आरती-भजन नहीं मांगता, कोई पंचामृत-चरणामृत नहीं मांगता, बल्कि पहला कदम है- पंचसीलं धम्मं याचामि- पंचशील व धम्म की याचना करता हूँ...
याचना करने से भी पहले हम अवकाश मांगते हैं, स्पेस चाहते हैं, ओकास...
किसी की जिन्दगी में स्पेस मिले बिना, अवकाश मिले बिना उससे हमारा कोई रिश्ता क़ायम नहीं हो सकता। धम्म के लिए अवकाश मांगना एक आध्यात्मिक रिश्ता क़ायम करता है।
हम जिससे याचना कर रहे हैं, और याचना भी पैसे-कौड़ी, धन-सम्पदा जैसी लौकिक चीज़ों के लिए नहीं है, बल्कि सर्वोत्तम रत्न धम्म की याचना कर रहे हैं, तो प्रदाता की चेतना में हमारे लिए अवकाश भी होना चाहिए, उनके दिल में हमारे लिए जगह भी होनी चाहिए, इसलिए सर्वप्रथम हम 'ओकास' कहते हैं, कि हमें अवकाश दीजिए, अपनी चेतना में, अपने मन में, अपने ह्रदय में जगह दीजिए... एकबार ह्रदय में जगह मिल जाए तो फिर सबकुछ मिल जाता है...
अंजलीबद्ध मेरे हाथ जब भगवान की प्रतिमा के सामने उठते हैं तो विकल स्वर में कह उठता हूँ- ओकास... भगवान, इस अकिंचन को अपने दिल में जगह दे दीजिए... आंखों में आंसू छलक आते हैं, तो जैसे प्रतिमा बोल पड़ती है- अप्पमादेन सम्पादेथ- अप्रमादपूर्वक धम्म का सम्पादन करो...
भगवान! ओकास...

शास्ता! ओकास
बिना आपके और
न कोई आस

रहे विश्वास
आपके चरणों का
मैं हूँ दास

करिये नाश
संसार बन्धनों के
काटिये पाश

जन्मों की प्यास
रूखा है कण्ठ मेरा
मन उदास

सारे प्रयास
आ जाऊँ भगवान
तुम्हारे पास

शास्ता! ओकास...

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

।।104 साल बाद।।-राजेश चन्द्रा-

।।104 साल बाद।।
-राजेश चन्द्रा-



भगवान बुद्ध द्वारा प्रदत्त कम्मट्ठान अर्थात ध्यान-साधना के आलम्बन का निष्ठापूर्वक अभ्यास करते हुए लकुण्टक भद्दिय अरहत हो गये। वह भगवान का दर्शन करने आए। भगवान की वन्दना की। जब वह धम्मसभा से उठ कर जा रहे थे, बड़े मद्धम पगों से चलते हुए, तब भगवान ने उन्हें संकेतित करते हुए भिक्खुओं को सम्बोधित कर कहा: "पस्सथ भिक्खवे, अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", वह देखो भिक्खुओं, यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।"

"माता-पिता की हत्या करके यह भिक्खु दुःख मुक्त हो गया है", भगवान का यह कथन सुनकर सारे भिक्खु एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।
वे इस गूढ़ कथन का अर्थ समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि भगवान ने गाथाओं का संगायन करके और हैरान कर दिया:

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये।
रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो।।

- माता-पिता और दो क्षत्रिय राजाओं की हत्या कर तथा राष्ट्र को विनष्ट कर एवं अनुचर की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये।
वेय्यग्घपञ्चमं हन्त्वा अनीघो याति ब्रामणो।।

-माता-पिता और दो श्रोत्रिय राजाओं की हत्या कर तथा पांच बाघों की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

इन गाथाओं को ठीक-ठीक शाब्दिक अर्थों में लिया जाय तो ये बड़ी भ्रमित करने वाली हैं। न केवल भ्रमित करने वाली बल्कि अर्थ का अनर्थ करने वाली भी। लेकिन भगवान का कथन प्रतीकात्मक है।
सम्पूर्ण त्रिपिटक में अनेकानेक प्रसंग ऐसे हैं जब भगवान प्रतीकों की भाषा में उपदेश करते हैं। दीघनिकाय का सीगाल सुत्त प्रतीकवाद का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक लोकप्रिय उदाहरण है जिसमें भगवान युवक सीगाल को छः दिशाओं के अर्थ समझाते हैं- पूर्व दिशा अर्थात माता-पिता, पश्चिम दिशा भार्या व बच्चे, उत्तर दिशा यानी मित्र एवं परिजन, दक्षिण दिशा अर्थात गुरू व आचार्य, नीचे की दिशा यानी अनुचर-परिचर-आश्रित तथा ऊपर की दिशा अर्थात अरहत-श्रमण। यह वह युवक है जो अपने दिवंगत पिता के कथनानुसार भोर में छः दिशाओं की वन्दना कर रहा था। भगवान ने उसे छः दिशाओं के प्रतीक अर्थ बताए और उनके सेवन की विस्तृत विधि बतायी। दीघनिकाय अर्थात दीर्घ यानी लम्बे प्रवचनों का संग्रह। यह सीगाल सुत्त दीघनिकाय में है। प्रतीकवाद की पराकाष्ठा देखना हो तो मज्झिम निकाय का वम्मीक सुत्त देखिये। उन प्रतीकों के अर्थ जान कर कुमार काश्यप अरहत हो गये।

यहाँ लकुण्टक भद्दिय के सन्दर्भ में इन गाथाओं को सुन कर भी धम्मसभा में बैठे भिक्खुओं में कोई स्रोतापन्न हो गया, कोई सकृतगामी, कोई अनागामी तो कोई अरहत। खुद्दकनिकाय के धम्मपद अट्ठकथा पकिण्णकवग्गो में की इन गाथाओं के सन्दर्भ में ऐसा ही उल्लेख है।

आचार्य अश्वघोष ने अट्ठकथाओं की टीकाओं में इन गाथाओं की बड़ी प्यारी और सटीक प्रतीक व्याख्या की है।
लकुण्टक भद्दिय को संकेतित करते हुए भिक्खुओं को सम्बोधित कर भगवान कहते हैं: "पस्सथ भिक्खवे, अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", वह देखो भिक्खुओं, यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।"

शब्दावली ध्यान देने योग्य है-"निद्दुक्खो हुत्वा" कि वह दुःख मुक्त हो गया है। और हुआ कैसे? माता-पिता की हत्या करके। माता-पिता कौन होते हैं? वे जन्मदाता होते हैं। आध्यात्मिक अर्थों में दुःख की जननी कौन है? दुःख की जननी तृष्णा है। दुःख का जनक कौन है? अस्मिमान अर्थात 'मैंपन' अथवा अस्मिता यानी अहंकार। तो दुःख के माता-पिता कौन हुए? माँ तृष्णा और पिता अहंकार।
अब इन प्रतीक अर्थों को सामने रख कर भगवान के कथन को देखिये:"अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।" अर्थात तृष्णा और अहंकार की हत्या करके यह भिक्खु दुःख मुक्त हो गया है।
भगवान के द्वारा संगायित गाथाओं में माता-पिता, क्षत्रिय राजा, श्रोत्रिय राजा, राष्ट्र, अनुचर, बाघ, ब्राह्मण इन शब्दों का लौकिक अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सारे आध्यात्मिक प्रतीक हैं।

माता= तृष्णा
पिता=अहंकार
दो क्षत्रिय राजा अथवा दो श्रोत्रिय राजा = शाश्वतवादी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि
राष्ट्र= पांच उपादान स्कन्ध
अनुचर=राग
पांच व्याघ्र= ज्ञान के पांच आवरण
ब्राह्मण= मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्खा इन चार ब्रम्ह विहारों में सुप्रतिष्ठित व्यक्ति

संसार का सारा प्रपंच, जन्म-जरा-मरण, रोग-शोक-दुःख के ये सारे कारक हैं। इन प्रतीकों को मन के सामने रख कर भगवान के द्वारा उपदेशित गाथाओं का अर्थ कीजिए:

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये।
रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो।।

- माता-पिता अर्थात तृष्णा व अहंकार और दो क्षत्रिय राजाओं यानी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि की हत्या कर तथा राष्ट्र अर्थात पांच उपादान स्कन्ध को विनष्ट कर एवं अनुचर अर्थात राग की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये।
वेय्यग्घपञ्चमं हन्त्वा अनीघो याति ब्रामणो।।

-माता-पिता अर्थात तृष्णा व अहंकार और दो क्षत्रिय राजाओं यानी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि की हत्या कर तथा पांच बाघों यानी ज्ञान के पांच आवरणों की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

बौद्धिक रूप से अभी और विस्तृत व्याख्या की गुंजाइश है लेकिन भगवान के वचनों-कथनों के सटीक अर्थ ध्यानाभ्यास से समझ में आते हैं। यदि उस तल पर जा कर नहीं समझा तो अर्थ का अनर्थ कर देने या कर लेने का खतरा हमेशा विद्यमान रहता है। और तो और, बुद्ध वचनों की निन्दा-आलोचना का पापदोष का खतरा भी मंडराता है। यद्यपि भगवान बड़ी विनम्रता से कहते हैं- जैसे सोनार सोने को आग में तपा कर जांचता-परखता है ऐसे तुम मेरे वचनों यूँ ही मत मान लो, जांचों-परखो तब मानों। भगवान तो न्योता देते हैं- एहि पस्सिको- आओ और देखो।
भगवान के इस कथन का भी बौद्धिक लोग कभी-कभी अर्थ का अनर्थ लगाते हुए तर्क या विवेचना के बजाय कुतर्क करने लगते हैं। भगवान के इस कथन को भी गौर से देखिये- जैसे सोनार सोने को आग में तपाता है...
आग में तपाना यानी ध्यान की आग में तपाना, विपस्सना में तपना। 
ज्यादातर बौद्धिक लोग, इंटेलेक्चुअल लोग, ध्यान तो कभी करते नहीं और बुद्ध वचनों की विवेचना-विश्लेषण करने लगते हैं। नतीजा क्या होता है? अर्थ का अनर्थ होता है और बुद्ध वचनों के साथ खिलवाड़ का पापदोष लगता है, वह अलग। भगवान ने जांचने-परखने की खुली छूट दी है लेकिन सोनार की तरह, आग में तपा कर यानी ध्यान-साधना की आग में तपा कर परखिये। तब यदि दोष दिखे तो त्याज्य को त्याग दीजिए और ग्राह्य को गृहण कर लीजिये।
संयुक्त निकाय में दो बड़े प्यारे सुत्त हैं जो इस बार की अमावस्या और पूर्णिमा पर बड़े सामयिक हो गये हैं। सामयिक इन अर्थों में कि अभी 13 जुलाई'2018 को, अमावस्या के दिन, सूर्य ग्रहण पड़ा है तथा 27 जुलाई'2018 को, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन, जिसे प्रचलित परम्परा में गुरू पूर्णिमा कहा जाने लगा है, 104 साल के बाद सदी का सबसे लम्बा चन्द्र ग्रहण पड़ेगा। एक पखवारे के अन्दर सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की यह दुर्लभ खगोलीय घटना है जो सदियों में कभी-कभी होती है। इस अवसर पर बौद्ध देशों के श्रद्धालु उपोसथ धारण करने के साथ सूर्य ग्रहण पर सुरिय परित्त तथा चन्द्र ग्रहण पर चन्द परित्त का पाठ करते हैं। ये दोनों सुत्त सदियों से महापरित्राण पाठ का अनिवार्य अंग हैं।
अब यदि इन सुत्तों को भी ठीक-ठीक इनके शाब्दिक अर्थों में लिया जाए तो बौद्धिक लोगों के विवेचना-आलोचना का अच्छा विषय है। लेकिन यदि इनके प्रतीक अर्थों को देखा जाय तो सच में परित्त है अर्थात रक्षा है।
पहले इन सुत्तों को बिना प्रतीक अर्थों के यथारूप में देखते हैं। पहले चन्दपरित्तं( पालि):

एवं मे सुतं, एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन, चन्दिमा देवपुत्तो राहुना असुरिन्देन गहितो होति। अथ खो चन्दिमा देवपुत्तो भगवन्तं अनुस्सरमानो, तायं वेलायं इमं गाथं अभासि:

1. नमो मे बुद्धवीरत्थु विप्पमुत्तोसि सब्बधि। 
सम्बाधपटिपन्नोस्मिं तस्स मे सरणं भवाति।।

अथ खो भगव चन्दिमं देवपुत्तं आरब्भ राहुं असुरिन्दं गाथाय अज्झभासि:

2. तथागतं अरहन्तं चन्दिमा सरणं गतो।
राहुं चन्दं पमुञ्चस्सु बुद्धा लोकानुकम्पकाति।।

अथ खो राहु असुरिन्दो चन्दिमं देवपुत्तं मुञ्चित्वा तरमानरूपो येन वेपचित्ति असुरिन्दो तेनुपसंकमि, उपसंकमित्वा संविग्गो लोमहट्टजातो एकमन्तं अट्ठासि; एकमन्तं ठितं खो राहुं असुरिन्दं वेपचित्ति असुरिन्दो गाथाय अज्झभासि:

3. किन्नुसन्तरमानोव राहु चन्दं पमुञ्चसि।
संविग्गरूपो आगम्म किन्नुभीतोव तिट्ठति'ति।।

4. सत्तधा मे फले मुद्धा जीवन्तो न सुखं लभे। 
बुद्धगाथाभिगीतोम्हि नो चे मुञ्चेय चन्दिमन्ति।।

चन्द्र परित्राण(हिन्दी अनुवाद):

ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन आराम में विहार करते थे। उस समय देवपुत्र चन्द्रमा को असुरेन्द्र राहु ने पकड़ लिया था। तब देवपुत्र चन्द्रमा ने भगवान को स्मरण करते हुए यह गाथा कहा:

1. हे बुद्धवीर! आपको मेरा नमस्कार है, आप सर्वप्रकार से विमुक्त हैं, मैं भारी विपत्ति में पड़ा हूँ, अतः आप मुझे अपनी शरण दीजिये। 

तब भगवान ने देवपुत्र चन्द्रमा के लिए असुरेन्द्र राहु को गाथा में यह कहा:

2. हे असुरेन्द्र राहु! देवपुत्र चन्द्रमा अरहत तथागत के शरणागत हुए हैं। बुद्ध लोकानुकम्पी हैं। आप देवपुत्र चन्द्रमा को मुक्त कर दीजिये।

तब असुरेन्द्र राहु ने देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़कर घबराए हुए मन से जहाँ असुरेन्द्र वेपचित्री थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर संविग्न और रोमांचित हो कर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए असुरेन्द्र राहु को असुरेन्द्र वेपचित्री ने गाथाओं में कहा:

3. हे असुरेन्द्र राहु! घबराए हुए मन से तुमने देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़ क्यों दिया? संविग्न और भयभीत होकर यहाँ आकर क्यों खड़े हुए हो?

4. देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़ देने का आदेश बुद्ध ने गाथाओं में दिया है। यदि देवपुत्र चन्द्रमा को न छोड़ते तो मेरे सिर के सात टुकड़े हो जाते और सुख से जीना मुश्किल हो जाता।

और अब सुरियपरित्तं(पालि):

एवं मे सुतं, एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन, सुरियो देवपुत्तो राहुना असुरिन्देन गहितो होति। अथ खो सुरियो देवपुत्तो भगवन्तं अनुस्सरमानो, तायं वेलायं इमं गाथं अभासि:

1. नमो मे बुद्धवीरत्थु विप्पमुत्तोसि सब्बधि। 
सम्बाधपटिपन्नोस्मिं तस्स मे सरणं भवाति।।

अथ खो भगव सुरियं देवपुत्तं आरब्भ राहुं असुरिन्दं गाथाय अज्झभासि:

2. तथागतं अरहन्तं सुरियो सरणं गतो।
राहुं सुरियं पमुञ्चस्सु बुद्धा लोकानुकम्पकाति।।

3. यो अन्धकारे तमसी पभंकरो 
वेरोचनो मण्डली उग्गतेजो ।
मा राहु गिली चरं अन्तलिक्खे
पजं मम राहु पमुञ्च सूरियन्ति।।

अथ खो राहु असुरिन्दो सुरियं देवपुत्तं मुञ्चित्वा तरमानरूपो येन वेपचित्ति असुरिन्दो तेनुपसंकमि, उपसंकमित्वा संविग्गो लोमहट्टजातो एकमन्तं अट्ठासि; एकमन्तं ठितं खो राहुं असुरिन्दं वेपचित्ति असुरिन्दो गाथाय अज्झभासि:

3. किन्नुसन्तरमानोव राहु सुरियं पमुञ्चसि।
संविग्गरूपो आगम्म किन्नुभीतोव तिट्ठति'ति।।

4. सत्तधा मे फले मुद्धा जीवन्तो न सुखं लभे। 
बुद्धगाथाभिगीतोम्हि नो चे मुञ्चेय सूरितन्ति।।

सूर्य परित्राण(हिन्दी अनुवाद) :

ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन आराम में विहार करते थे। उस समय देवपुत्र सूर्य को असुरेन्द्र राहु ने पकड़ लिया था। तब देवपुत्र सूर्य ने भगवान को स्मरण करते हुए यह गाथा कहा:

1. हे बुद्धवीर! आपको मेरा नमस्कार है, आप सर्वप्रकार से विमुक्त हैं, मैं भारी विपत्ति में पड़ा हूँ, अतः आप मुझे अपनी शरण दीजिये। 

तब भगवान ने देवपुत्र सूर्य के लिए असुरेन्द्र राहु को गाथा में यह कहा:

2. हे असुरेन्द्र राहु! देवपुत्र सूर्य अरहत तथागत के शरणागत हुए हैं। बुद्ध लोकानुकम्पी हैं। आप देवपुत्र सूर्य को मुक्त कर दीजिये।

3. जो काले अन्धकार में प्रकाशित होता है, वैरोचन आभा वलय के साथ उग्रतेज हो अन्तरिक्ष में विचरण करता है। हे राहु! ऐसे सूर्य को ग्रसित न करो। राहु! मेरे शरणागत हुए मेरे पुत्र सूर्य को छोड़ दो।

तब असुरेन्द्र राहु ने देवपुत्र सूर्य को छोड़कर घबराए हुए मन से जहाँ असुरेन्द्र वेपचित्री थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर संविग्न और रोमांचित हो कर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए असुरेन्द्र राहु को असुरेन्द्र वेपचित्री ने गाथाओं में कहा:

3. हे असुरेन्द्र राहु! घबराए हुए मन से तुमने देवपुत्र सूर्य को छोड़ क्यों दिया? संविग्न और भयभीत होकर यहाँ आकर क्यों खड़े हुए हो?

4. देवपुत्र सूर्य को छोड़ देने का आदेश बुद्ध ने गाथाओं में दिया है। यदि देवपुत्र सूर्य को न छोड़ते तो मेरे सिर के सात टुकड़े हो जाते और सुख से जीना मुश्किल हो जाता।

प्रथमदृष्ट्या लगता है कि हम कोई पौराणिक मिथकीय आख्यान पढ़ या सुन रहे हैं। असुरेन्द्र राहु से ग्रसित चन्द्रमा और सूर्य भगवान बुद्ध की शरण में आए हैं, हाथ जोड़ कर मुक्त किये जाने की प्रार्थना कर रहे हैं और भगवान असुरेन्द्र राहु को चन्द्र एवं सूर्य को मुक्त कर देने के लिए आदेशित करते हैं, फिर असुरेन्द्र राहु घबरा कर उन्हें मुक्त भी कर देते हैं। पूरा प्रसंग मिथकीय कथानक जैसा लग रहा है।
दरअसल ये दो खगोलीय घटनाएं हैं- चन्द्र ग्रहण की और सूर्य ग्रहण की जिनको पृष्ठभूमि में रख कर इन दो प्रतीक सुत्तों की रचना हुई है। काव्य शास्त्र के अनुसार इसमें मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है जिसे अंग्रेजी में परसोनीफिकेशन(personification) कहते हैं। यहाँ सूर्य-चन्द्र, राहु, वेपिचित्र का मानवीकरण कर दिया गया है और इसके बहाने बड़ा गहरा संदेश दिया गया है। वह संदेश पकड़ पाये तो समझिये इन सुत्तों का पाठ अथवा श्रवण सार्थक हुआ अन्यथा यह भी अंधश्रद्धा का कारक है।

प्रसंग श्रावस्ती का है। भगवान ने श्रावस्ती में अपने जीवन के सर्वाधिक वर्षावास श्रावस्ती में किये- पच्चीस वर्षावास। वर्षावास जिसे अब चौमासा कहा जाता है, चार महीने का प्रवास होता है। चार महीने में कम से कम चार पूर्णिमा पड़ती हैं, चार अमावस्या पड़ती हैं, कृष्णपक्ष की चार अष्टमियां और शुक्लपक्ष की चार अष्टमियां। चार को पच्चीस से गुणा करें तो सौ होता है। सिर्फ श्रावस्ती के वर्षावासों की गणना करें तो भगवान के वर्षावास काल में सौ पूर्णिमाएं और सौ अमावस्याएं पड़ीं श्रावस्ती प्रवास के दौरान पड़ीं। सूर्य ग्रहण अथवा चन्द्र ग्रहण जब भी पड़ता है तो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को ही पड़ता है। इन सौ पूर्णिमाओं एवं सौ अमावस्याओं की अवधि में कई-कई बार चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण पड़े होंगे। खगोलविज्ञानियों के लिए यह शोथ का रोचक विषय भी है कि भगवान के पूरे जीवनकाल में कितनी बार सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण पड़ा।
निश्चित ही ये ऐसे ही किसी अवसर का है जब सूर्य ग्रहण पड़ा और चन्द्र ग्रहण पड़ा।
भगवान अरहत हैं, सम्यक सम्बुद्ध हैं। वह बड़े उपायकौशल से सांसारिक संवाद को भी आध्यात्मिक अर्थ दे देते हैं। एकबार भिक्खुगण आपस में एक उबड़-खाबड़ भूमि की चर्चा कर रहे थे कि अमुक भूमि रमणीय है अथवा नहीं है तो भगवान ने सारी वार्ता सुनकर कहा- जहाँ श्रमण रमण करते हैं वही भूमि रमणीय है। एकबार भिक्खुगण एक झोपड़ी की चर्चा कर रहे थे कि वहाँ बारिश में पानी टपकता है जहाँ वे साधनारत थे तब उस अवसर पर भी भगवान ने कहा:

यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति।
एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति।।

-यदि घर की छत में छेद हों, तो जैसे उसमें बारिश का पानी आ जाता है, ऐसे ही संयमरहित चित्त में राग प्रविष्ट हो जाता है।

यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविज्झति।
एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति।।

-यदि घर की छत में छेदरहित हो, तो जैसे उसमें बारिश का पानी नहीं आ पाता, उसी प्रकार संयमित चित्त में राग प्रविष्ट नहीं होता।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान हर अवसर को अन्तर्मुखी अर्थ दे देते हैं। पच्चीस वर्षावासों की लम्बी अवधि में किसी अवसर पर घटित चन्द्र ग्रहण एवं सूर्य ग्रहण पर प्रस्तुत भगवान ने चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के बहाने एक गहरा आध्यात्मिक संदेश दिया है।
एक बात और ध्यान देने की है कि जब भगवान उपासकों से सांकेतिक, प्रतीकात्मक संवाद करते हैं तो संकेतों का अर्थ भी विस्तार से बताते हैं जैसे युवक सीगाल के प्रसंग में, लेकिन जब वे साधना में परिपक्व भिक्खुओं से वार्ता करते हैं तब संकेतों व प्रतीकों को प्रायः अव्याख्यायित ही छोड़ देते हैं। वे साधना में परिपक्व लोग थे जो संक्षेप व संकेत में कही बात का भी अर्थ जान लेते थे। ये चंदपरित्त एवं सुरियंपरित्त का संवाद भिक्खुओं के सम्मुख है इस लिए इसका अर्थविस्तार नहीं है।
आध्यात्मिक अर्थों में चन्द्र हमारे मन का प्रतीक है और सूर्य हमारी चेतना का तथा राहु समस्त अकुशल वृत्तियों का प्रतीक है। आज खगोलविज्ञानी भी इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि चन्द्रमा की कलाओं के साथ हमारे मन की हलचलों का गहरा सम्बन्ध है। पूर्णिमा के दिन पागलपन के दौरे ज्यादा पड़ते हैं। उस दिन तनाव-अवसाद-उन्माद, आत्महत्या-हत्या की घटनाएं अधिक होती हैं। पूर्णिमा के दिन समन्दर में ज्वारभाटा ज्यादा आता है। इसी प्रकार सूर्य के साथ हमारी चेतना के उतार-चढ़ाव का गहन सम्बन्ध है। सूर्य के धब्बों की संख्या बढ़ने पर धरती पर उथल-पुथल बढ़ जाती है, युद्ध, आँधी-तूफ़ान, बाढ़ इत्यादि की घटनाएं अधिक होती हैं। दोनो महायुद्धों के समय सूर्य धब्बों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हुई थी।
हमारे आध्यात्मिक जीवन में भी ऐसा होता है कि कभी-कभी हमारा चन्द्रमा रूपी मन मोह ग्रसित हो जाता है, समस्त नकारात्मक तरंगें घेर लेती हैं अर्थात हमारे मन को चन्द्र ग्रहण लग जाता है। कभी-कभी हमारी चेतना समस्त अंधकार से भर जाती है, अपना ही हित-अहित नहीं सूझता है। यानी कि हमारी चेतना को सूर्य ग्रहण लग गया, हमें अकुशल वृत्तियों के राहु ने ग्रसित कर लिया। हमारी चेतना मोह ग्रसित, लोभ ग्रसित, काम ग्रसित हो जाती है। ऐसे अवसर पर अपने अंतर के बुद्धत्व की शरण में जाना ही अंतिम उपाय है। यही है बुद्धं सरणं गच्छामि। बुद्ध के शरणागत होने पर ही हमारी चेतना, हमारा मन नकारात्मक वृत्तियों के राहु से मुक्त होता है। यही है ग्रहण से मुक्ति।
इस सुत्त में करुमामय भगवान कहते हैं"पजं मम राहु पमुञ्च सूरियन्ति- राहु! सूर्य मेरा पुत्र है, उसे छोड़ दो।"

जैसे रोते हुए बच्चे को जब मां अपने सीने से लगा लेती है तो वह चुप हो जाता है, अपने को सुरक्षित पाता है, राहत महसूस करता है ऐसे ही सूर्य को यानी हमारी चेतना, हमारे मन को भगवान अपना पुत्र कह रहे हैं। जब हम बच्चे की तरह उनके शरणागत होते हैं यानी अपने अंतर के बुद्धत्व की शरण जाते हैं तो हमारा परित्राण होता है। परित्राण अर्थात रक्षा, इसी को पालि भाषा में परित्त कहते हैं। क्योंकि हमारी चेतना, हमारा मन परमचैतन्य हमारे बुद्धत्व का ही अंश है इन अर्थों में वे बुद्धपुत्त हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन भगवान ने पंच भिक्खुओं को दीक्षा दी थी- कौण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, अस्सजी, महानाम को। भारत के आध्यात्मिक इतिहास में उस दिन पहली बार गुरु-शिष्य परम्परा का शुभारम्भ हुआ। भगवान बुद्ध को लोकगुरू कहा गया है इस कारण आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं। इस पूर्णिमा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज हर धार्मिक पंथ में यह पूर्णिमा 'गुरू पूर्णिमा' के रूप में स्थापित हो गयी है।
104 साल के बाद यह अद्भुत संयोग बना है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन पूर्ण चन्द्र ग्रहण पड़ रहा है- 235 मिनट का अर्थात लगभग 3 घण्टा 54 मिनट का यानी लगभग चार घण्टा। बौद्ध उपासक-उपासिकाएं इस दिन उपोसथ धारण करें, ध्यान-साधना करें, दान-पुण्य करें और आध्यात्मिक अर्थों को धारण करते हुए चंदपरित्त का पाठ करें। बौद्ध जगत में ऐसी आस्था है कि ऐसे दुर्लभ अवसर पर इस परित्त का पाठ करने से लम्बित कार्य अविलम्ब हो जाते हैं, कारागार से मुक्ति मिलती है, लम्बी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। आस्थाएं अपनी जगह हैं लेकिन सही अर्थों को धारण करने से अज्ञान से मुक्ति तो मिलती ही है। यही तो वास्तविक परित्राण है। 

आलवक यक्ष ने भगवान से प्रश्न किया:"किसूधं वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं- मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धन क्या है?"
भगवान ने उत्तर दिया:"सद्धीध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं- श्रद्धा ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धन है।"
अर्थ को समझ कर धम्म धारण किया जाए तो ही श्रद्धा फलीभूत होती है अन्यथा यही श्रद्धा अंधश्रद्धा बन जाती है। श्रद्धा से धम्म को धारण करें इसी में परित्राण है।

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Sunday, August 5, 2018

।।दर्पण।। - श्री राजेश चन्द्रा-

।।दर्पण।।
-राजेश चन्द्रा-
बौद्ध विनय के मुताबिक सौन्दर्य प्रसाधन के सामान साथ में रखना भिक्खुओं के लिए निषिद्ध है लेकिन एक युवा भिक्खु अपने झोले में हमेशा एक दर्पण रखता था। उसके साथी गुरुभाई ने गुरूजी से शिकायत कर दी कि अमुक भिक्खु अपने झोले में दर्पण रखता है। गुरूजी ने युवक को बुलाया, पूछा- सुना है तुम अपने पास दर्पण रखते हो?
युवक ने पूरे आत्मविश्वास से झट से दर्पण झोले से निकाल कर दिखाते हुए कहा- जी गुरूजी, रखता हूँ।
गुरूजी ने कहा- क्या तुम्हें नहीं मालूम कि सौन्दर्य प्रसाधन के सामान भिक्खुओं के लिए निषिद्ध हैं?
भिक्खु ने कहा- जी, मालूम है।
गुरूजी ने पूछा- फिर क्यों रखते हो?
युवक ने बड़ी मासूमियत से कहा- गुरूजी, इसका प्रयोग मैं मुसीबत के समय करता हूँ।
गुरूजी ने हैरानी से पूछा- मुसीबत के समय? वह कैसे?
युवक ने उत्तर दिया- जब मैं किसी मुसीबत, परेशानी में होता हूँ, तब इस इस दर्पण में देखता हूँ। इसमें मुझे अपनी मुसीबत-परेशानी का कारण दिखायी दे जाता है।
गुरूजी आशीष की मुद्रा में मुस्करा रहे थे कि युवक ने अपनी बात पूरी की- और गुरूजी, अपनी मुसीबत-परेशानी के निवारण का उपाय भी दिख जाता है...

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय

शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Monday, July 30, 2018

सातवीं संगीति भारत में!-श्री राजेश चन्द्रा-

सातवीं संगीति भारत में!
-श्री राजेश चन्द्रा-











एक छोटी-सी घटना महान संगीति का कारण बनी। 
भगवान का धम्म हेतुवादी है, अहेतुक कुछ नहीं है। संगीति का भी हेतु बना, एक छोटी-सी घटना। घटना भी नकारात्मक है लेकिन परिणाम सकारात्मक है।
भगवान के महापरिनिर्वाण का समाचार दुःख की एक महालहर की तरह चारो तरफ फैला था। जो कोई भी यह समाचार सुनता अपार दुःख से भर जाता, लेकिन सुभद्र नाम का एक व्यक्ति यह समाचार सुनते ही मारे खुशी के झूमने-सा लगा और बड़े प्रफुल्लित स्वर में कहने लगा- अच्छा हुआ कि बुड्ढा मर कर गया, हर समय 'यह करो-यह न करो' किया करता था, अब हमारा अनुशासन करने वाला कोई न रहा, अब हम स्वतंत्र हैं, अब जो मन में आए वह करो...
यह स्वर महाकाश्यप के कान में पड़े। यह घटना ई.पू.563 की है जब कुशीनगर में भगवान महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हुए।
सुभद्र के शब्द सुनकर महाकाश्यप का मन हाहाकार कर उठा- अरे, अभी भगवान का महापरिनिर्वाण हुए एक सप्ताह भी नहीं हुआ और ऐसी लोकप्रतिक्रिया! कुछ काल के बाद तो लोग भूल ही जाएंगे कि भगवान इस धरती पर थे भी, भगवान का धम्म क्षीण हो जाएगा। धम्म के चिरस्थायित्व के लिए कुछ करना होगा...
बस इस संकल्प से प्रेरित हो कर महाकाश्यप ने संगीति का आह्वान किया ताकि भगवान के वचनों को संरक्षित किया जा सके क्योंकि परिनिर्वाण के समय भगवान के ही वचन थे- धम्म ही धम्म का उत्तराधिकारी होगा...
सुभद्र को पता भी नहीं होगा कि उसके अपवचनों ने भगवान के सद्वचनों को संरक्षित करने का हेतु बना दिया है। सकारात्मक व्यक्ति नकारात्मक से भी सकारात्मकता को जन्म दे लेता है।

प्रथम संगीति

महाकाश्यप के आह्वान पर भगवान के परिनिर्वाण के तीन माह उपरांत पहली संगीति का आयोजन राजगृह(राजगीर) की सप्तपर्णी गुफ़ा में हुआ जिसमें पांच सौ अरहत एकत्रित हुए। संगीति में पहला ही प्रश्न खड़ा हो गया कि भगवान के वचनों को संरक्षित करने की शुरुआत कहाँ से की जाए क्योंकि उस संगीति में सम्मिलित हर व्यक्ति भगवान को व्यक्तिगत रूप से जानता था, हर किसी के पास भगवान से जुड़ा अपना प्रसंग, अपना संस्मरण था। हर व्यक्ति अपना अनुभव बताने को तत्पर था। तब महाकाश्यप को भगवान के वचनों ने ही मार्ग सुझाया- विनयानामबुद्धसासनस्सआयु- विनय ही बुद्ध शासन की आयु है अर्थात जब तक विनय रहेगा तब तक बुद्ध शासन रहेगा।
तय हुआ कि सर्वप्रथम विनय का संगायन होगा। इस प्रकार सर्वप्रथम विनयपिटक का संगायन हुआ। अरहत उपालि ने विनय का संगायन एवं सत्यापन किया। फिर सुत्त पिटक का संगायन व सत्यापन अरहत आनन्द के द्वारा हुआ।
प्रथम संगीति में अभिधम्म का प्रथक अस्तित्व नहीं आया था। अभिधम्म सुत्त में ही अन्तर्निहित था।
यह संगीति सात माह चली। सम्राट अजातशत्रु ने इस संगीति का पोषण किया।

दूसरी संगीति

पहली संगीति के सौ साल के बाद दूसरी संगीति का आयोजन हुआ, ई. पू.463 में, वैशाली में, सम्राट कालाशोक के शासनकाल में, बालुकाराम विहार में। इसकी अध्यक्षता अरहत सब्बकामी ने की जिनकी आयु उस समय 120 साल थी और उपाध्यक्ष आचार्य रेवत थे। अरहत सब्बकामी ने पहली संगीति में भी सम्मिलित थे। अरहत आचार्य रेवत भी इस संगीति के वरिष्ठ प्रतिनिधि थे। यह संगीति एक तरह से सिर्फ विनय संगीति थी क्योंकि वैशाली के वज्जिपुत्तक संघ द्वारा विनय की मनमानी व्याख्या करके धन-सम्पत्ति इकट्ठा की जाने लगी थी, उपासकों की श्रद्धा का शोषण किया जाने लगा था। तब काकण्डपुत्त यश के प्रयत्नों से वरिष्ठ धम्मज्ञ अरहतों की परिषद आमंत्रित की गयी और विनय को पुनर्स्थापित किया गया। इस संगीति में सात सौ भिक्खु सम्मिलित हुए इसलिए इसे सप्तशतिका संगीति भी कहते हैं।
संंगीति में होता क्या है? भगवान के वचनों की एक-एक पंक्ति को पूरी परिषद के द्वारा संगायन किया जाता है। काल की लम्बी अवधि में यदि अर्थ, व्यंजन, उच्चारण में कोई दोष आ गया है तो उसे संशोधित किया जाता है। संशोधन को वरिष्ठ अरहत के द्वारा सत्यापित किया जाता है, संघ का अनुमोदन प्राप्त किया जाता है। 
पहली संगीति में हिस्सा लेने वाले सारे के सारे भिक्खु अरहत थे। दूसरी संगीति के वरिष्ठ भिक्खु भी अरहत थे। यह भी एक मानक है कि संगीति संगायन हमेशा किसी अरहत की अध्यक्षता में होता है। अरहत की अध्यक्षता में भगवान बुद्ध के वचनों का महीनों तक संगायन एक महान आध्यात्मिक घटना भी है। पुण्य पारमिता से परिपक्व श्रद्धालु उपासक-उपासिकाओं को धम्म सेवा, भोजन दान, चीवर दान, औषधि दान, अष्टपरिष्कार दान का पुण्य अवसर मिलता है। इस घटना की आध्यात्मिक आभा सैकड़ों वर्षों तक परिवेश में व्याप्त रहती है। भगवान के वचन हैं- जहाँ श्रमण रमण करते हैं वही भूमि रमणीय है। 

तीसरी संगीति

संगीति के इतिहास में तीसरी संगीति स्वर्णिम घटना है।
ई. पू.326 में पाटलिपुत्र में आयोजित इस संगीति का पोषण महान सम्राट अशोक के द्वारा किया गया। इसकी अध्यक्षता सम्राट अशोक के गुरू अरहत मोगलिपुत्त तिस्स के द्वारा की गयी। यह संगीति नौ माह तक चली। इसमें एक हजार भिक्खुओं ने प्रतिभाग किया। भगवान के महापरिनिर्वाण को लगभग सवा दो सौ साल बीत चुके थे। बुद्ध धम्म के नाम पर अनेक मिथ्या मतों का उदय हो गया था। यश-कीर्ति-धन के लोभ में अनेक दुःशील लोग संघ में प्रविष्ट हो गये थे, वे संघ को अन्दर से दूषित कर रहे थे।
संगीति अध्यक्ष मोगलिपुत्त तिस्स ने मिथ्या मतों का खण्डन करते हुए 'कथावत्थु' नामक ग्रन्थ का संकलन किया और इसी संगीति में अभिधम्म पिटक स्वतंत्र अस्तित्व में आया।
संगीति के समापन पर सम्राट अशोक के द्वारा अरहत भिक्खुओं के नेतृत्व में नौ परिषदें पूरी दुनिया में बुद्धवाणी के प्रचार के लिए रवाना की गयीं तथा श्रीलंका को स्वयं अपने पुत्र-पुत्री अरहत महेन्द्र और थेरि संघमित्रा को भेजा। इस संगीति के बाद बुद्ध धम्म सम्पूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया में फैल गया। एक तरह से विश्व पर भारत की यह धम्म विजय थी।

चौथी संगीति

इतिहास में चौथी संगीति के रूप में दो संगीतियां दर्ज़ हैं। एक ई. पू. 29 में सम्राट वट्टगामिनी के काल में श्रीलंका में और दूसरी सम्राट कनिष्क के काल में ईस्वी 80 में कश्मीर के कुण्डलवन में। यद्यपि कि श्रीलंका की संगीति की अधिक मान्यता है क्योंकि इसमें थेरवादी भिक्खुओं ने हिस्सा लिया था। थेरवादी परम्परा श्रीलंका की संगीति को ही चौथी संगीति मानती है। श्रीलंका की इस संगीति में पांच सौ थेरो ने प्रतिभाग किया था तथा इसकी अध्यक्षता महाथेर रक्खित ने की थी।
ईस्वी 80 में भारत में सम्राट कनिष्क के काल में कश्मीर के कुण्डलवन आयोजित संगीति की अध्यक्षता आचार्य वसुमित्र ने की थी तथा उपाध्यक्ष आचार्य अश्वघोष थे जिन्हें बुद्ध का प्रथम जीवनीकार माना जाता है- बुद्धचरित। एक तरह से संगीति की परम्परा को जीवित रखने का भारत में यह अंतिम प्रयास था।
तीसरी संगीति तक बुद्ध वचन श्रुत परम्परा से संरक्षित रहे। श्रुत परम्परा अर्थात मौखिक परम्परा। सुत्तधर वरिष्ठ भिक्खु अपने शिष्यों को सुत्तों का सस्वर पाठ कराते हैं। समस्त संघ उसकी समवेत स्वर में पुनरावृत्ति करता है। पूर्णिमा-अमावस्या-कृष्णपक्ष अष्टमी- शुक्लपक्ष अष्टमी महीने के इन चार दिनों में विशेष परिषदों में भिक्खु संघ सुत्त संगायन का विशेष अनुष्ठान करता था जिसे पातिमोक्ख परिषद भी कहा जाता था। बौद्ध देशों में यह परम्परा आज भी जीवित है।
इस श्रुत परम्परा के द्वारा बौद्ध आचार्यों ने सिर्फ शब्दों को ही संरक्षित और हस्तान्तरित नहीं किया बल्कि वह मौलिक ध्वनि, स्वर, उच्चारण का उतार-चढ़ाव-ठहराव भी संरक्षित व हस्तान्तरित किया जिस स्वर में पहली संगीति में पांच सौ अरहतों ने भगवान की वाणी का संगायन किया था। यह संगायन वातावरण में आध्यात्मिक तरंगों को जन्म देता है जिससे नकारात्मक तरंगें एवं ऊर्जा निष्प्रभावी होती है । इन तरंगों के बड़े चमत्कारिक विवरण भी इतिहास में दर्ज हैं जिन का उल्लेख करने से विषयान्तर हो जाएगा। अस्तु।
तीसरी संगीति तक बुद्ध वचन श्रुत परम्परा से संरक्षित थे और वही ध्वनि-स्वर-उच्चारण-स्वर का आरोह-अवरोह परम्परागत रूप से सदियों से आज तक कायम है, भारत में नहीं दिखता लेकिन बौद्ध देशों में इसे आज तक संजोया गया है।
सम्राट अशोक ने बुद्ध वाणी का सारी दुनिया में प्रसार कर बड़ा दूरदर्शी कदम उठाया कि यदि कभी भारत में यह परम्परा बाधित भी हो तो शेष दुनिया में बुद्ध वाणी बची रहे। और सच में कालान्तर में ऐसा ही हुआ भी। भारत से यह परम्परा लुप्त जैसी हो गयी लेकिन बौद्ध देशों में बुद्ध वचन अपने मौलिक रूप में आज भी यथावत जीवन्त हैं।
श्रीलंका की चौथी संगीति में त्रिपिटक के मौखिक संगायन के साथ एक अनूठा काम और हुआ कि त्रिपिटक को भोजपत्रों पर लिपिबद्ध किया गया ताकि बुद्ध वाणी हमेशा के लिए अपने विशुद्ध रूप में संरक्षित रह सके। धम्म के शुद्ध स्वरूप को संरक्षित रखने के लिए जितनी सजगता बौद्धों ने बरती शायद ही दुनिया के किसी अन्य सम्प्रदाय ने ऐसा किया होगा। लगभग सभी सम्प्रदायों के धर्मग्रंथों में क्षेपकों के आरोप हैं लेकिन त्रिपिटक इन आरोपों से लगभग मुक्त हैं। त्रिपिटक को शुद्ध व त्रुटिरहित रखने में बौद्धों ने बड़ा तप किया। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि दुनिया की किसी भी धार्मिक परम्परा के पास इतना विशाल शास्त्रीय धर्म साहित्य, क्लासिकल रिलीजियस लिटरेचर, नहीं है जो बौद्धों के पास है। सम्पूर्ण त्रिपिटक इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के समस्त खण्डों से भी अधिक विशाल है।
सम्राट वट्टगामिनी के काल में ई. पू. 29 में श्रीलंका में आयोजित चौथी संगीति में पांच सौ विद्वान थेरों ने प्रतिभाग किया जिसकी अध्यक्षता महाथेर रक्खित ने की। संगायन के उपरान्त सम्पूर्ण त्रिपिटक को लिपिबद्ध करके बुद्ध वचनों को हमेशा के लिए शुद्ध स्वरूप प्रदान किया गया।

पांचवी संगीति

सम्राट अशोक की दूरदर्शिता काम आयी। बारहवीं शताब्दी के बाद से भारत से बुद्ध धम्म लुप्त-सा होने लगा लेकिन शेष बौद्ध देशों में यह अपनी सम्पूर्ण प्रभा के साथ दमकता-चमकता रहा।
सम्पूर्ण बौद्ध इतिहास का अवलोकन करें तो पाते हैं कि बुद्ध का धम्म नष्ट कभी नहीं हुआ। यदि आलंकारिक रूप से कहें तो बुद्ध धम्म सूर्य है। जब वह एक स्थान पर अस्त होता दिखता है तब ठीक उसी समय धरती के किसी दूसरे भूभाग में उसका उदय हो रहा होता है। जब भारत से बुद्ध सूर्य अस्त होता दिख रहा था ठीक उसी समय श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, कम्बोडिया, लाओस आदि देशों में यह अपनी पूरी प्रभा के साथ चमक रहा था। इन देशों में भारत के प्रति आभार और आदर का भाव है। बौद्ध देशों के श्रद्धालुजन भारत की ओर पैर करके सोते नहीं हैं, सुबह उठ कर भारत की ओर मुख करके हाथ जोड़कर वन्दना करते हैं।
संगीति की परम्परा भारत से लुप्त-सी हो गयी लेकिन अपने गुरू देश के प्रति आभार भावना से भरे बौद्ध देशों ने इस परम्परा को पूरी शुद्धता के साथ यथावत जीवित रखा।
19वीं शताब्दी तक भारत सहित लगभग पूरा एशिया ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो चुका था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कारण भी एशिया के देशों की सांस्कृतिक धाराओं में अवरोध उत्पन्न हुए। ऐसे समय में बर्मा ने अपना आध्यात्मिक दायित्व निभाया और पांचवी संगीति आयोजित करने का संकल्प लिया। इस संकल्प की पूर्ति में संरक्षण का पुण्य लाभ बर्मा के सम्राट मिं डों मिं को मिला। भगवान की वाणी को अक्षुण्ण रखने में जिन शासकों ने संरक्षण प्रदान किया वे इतिहास में अमर हो गये।
सन् 1871 में ब्रम्हदेश अर्थात बर्मा में सम्राट मिं डों मिं के काल में पांचवी संगीति का आयोजन हुआ, मांडले शहर में। इस संगीति में दो हजार चार सौ भिक्खुओं ने प्रतिभाग किया जिसकी अध्यक्षता क्रम से पूज्य महाथेर जागराभिवंस, पूज्य महाथेर नरिंदभिधज तथा पूज्य महाथेर सुमंगल सामी द्वारा की गयी। संगीति के विवरणों को सदियों से बाकायदा लिपिबद्ध करके संरक्षित किया गया है ताकि प्रमाण व प्रेरणा अगली पीढ़ियों को सौंपा जा सके। 
पांचवी संगीति में सम्राट मिं डों मिं ने सबसे बड़ा पुण्यार्जन यह किया कि उन्होंने समस्त बुद्ध सुत्तों को, सम्पूर्ण त्रिपिटक को, संगमरमर की पट्टिकाओं पर उकेरवा दिया और पूज्य संघ के द्वारा संगायन करते हुए उन पावन शिलाओं का लोकार्पण किया गया। वह स्थान आज एक पावन तीर्थ है। शिला पट्टिकाओं पर अंकित हो जाने से बुद्ध वचनों को परिशुद्ध अवस्था में संरक्षित रखने का महान कार्य हुआ। आज त्रिपिटक का सर्वाधिक प्रमाणिक संस्करण श्रीलंका एवं बर्मा का ही माना जाता है।

छठी संगीति

एक बात रेखांकित किये जाने लायक है कि संगीति जब भी होती है तो अध्यक्षता किसी मान्य अरहत के द्वारा ही होती है। पुण्यशाली है वह काल जब संगीति होती है और पुण्यवान हैं वो लोग जो इस महान घटना के साक्षी व सहभागी बनते हैं, अरहत के दर्शन करते हैं। श्रोतापन्न, सकृतगामी, अनागामी, अरहत अवस्था प्राप्त एवं मार्गगामियों की सेवा करने व उन्हें दान का पावन अवसर मिलता है। संगीति आयोजन एक आध्यात्मिक घटना है।
इतिहास में छठी संगीति के आयोजन का श्रेय भी ब्रम्हदेश अर्थात बर्मा को जाता है। छठी संगीति कई मायनों में अनूठी है।
पूर्व की पांच संगीतियां राजकीय संरक्षण में हुईं अर्थात उनका पोषण राजाओं द्वारा किया गया। छठी संगीति पहली बार एक लोकतांत्रिक सरकार के संरक्षण में हुई जिसके प्रधानमंत्री ऊ नू थे।
सन् 1954 में शुरू हुई संगीति दो साल के उपरान्त सन् 1956 में मई माह में बुद्ध पूर्णिमा के दिन सम्पन्न हुई। उस समय तक भी बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन ही था इस कारण पहली बार पश्चिमी देशों के लोग भी इस महान घटना के साक्षी बने। इसमें बर्मा के अतिरिक्त श्रीलंका, थाईलैंड, कंपूचिया, भारत के भिक्खुगण मिलाकर दो हजार पांच सौ मान्य भिक्खु सम्मिलित हुए जिसकी अध्यक्षता श्रद्धेय अभिधज महारट्ठगुरू भदन्त रेवत ने की। इस संगीति में सम्पूर्ण त्रिपिटक, इसकी अट्ठकथाओं, टीकाओं आदि को मान्य आचार्यों द्वारा पुनः जांचा-परखा गया।
कदाचित बुद्ध धम्म दुनिया की अकेली धार्मिक परम्परा है जो स्वयं को आधुनिकता के साथ अद्यतन, अपडेट, करती है, इसी कारण यह कभी कालवाहि अर्थात आउटडेट नहीं होती। संगीति में मात्र बुद्ध वचनों की शुद्धता भर ही जांची-परखी नहीं जाती बल्कि बुद्ध धम्म के नाम पर नवसृजित साहित्य की भी विवेचना होती है। बुद्ध वचनों से उनका मिलान किया जाता है, जहाँ साम्य होता उस पर मुहर लगाते हैं, उसका अनुमोदन करते हैं और जहाँ विसंगति होती है उसे निरस्त करते हैं। यह सारा साहित्य अभिधम्म का अंग बनता है। विनय और सुत्त यथावत रहते हैं।

छठी संगीति में, जो कि दो साल तक चली, बर्मा की मूल लिपि म्रंम लिपि में सम्पूर्ण त्रिपिटक को मुद्रित कराया गया। यह संगीति बर्मा की धरोहर हो गयी।
छठी संगीति इस मायने में भी अनूठी थी कि इसके उद्घाटन और समापन दोनों सत्रों में भारत के संविधान शिल्पी डा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर सम्मिलित हुए। यहीं पर पूज्य संघ द्वारा बाबा साहेब को दूसरी बार 'बोधिसत्व' कह कर सम्बोधित किया गया। इसके पूर्व श्रीलंका में 'विश्व बौद्ध भ्रातृत्व सम्मेलन' में भी पूज्य संघ द्वारा बाबा साहेब को 'लिविंग बोधिसत्व' कह कर सम्बोधित किया गया था। तीसरी बार 2 दिसम्बर'1956 को अशोका मिशन बुद्ध विहार, दिल्ली में परम पावन दलाई लामा के द्वारा बाबा साहेब को 'बोधिसत्व' सम्बोधित किया गया था। छठी संगीति में बोधिसत्व बाबा साहेब की उपस्थिति ने बुद्ध के देश भारत का सशक्त प्रतिनिधित्व किया।
बोधिसत्व बाबा साहेब ने बर्मा में प्रचलित एक लोकश्रुति सुनी कि भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के 2500 वर्षों के उपरान्त एक उपासक के द्वारा भारत से धम्म का पुनरोदय होगा। इस लोकश्रुति से प्रेरित व उत्साहित हो कर 12 दिसम्बर'1954 को वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ बुद्धिस्ट कल्चर के डायरेक्टर डा. आर एल सोनी के कार्यालय में आल्हादित कण्ठ से उन्होंने घोषणा की- भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती सन् 1956 में पड़ रही है। मैंने धम्म दीक्षा का पक्का निश्चय किया है!
दो वर्षों के बाद वही संकल्प 14 अक्टूबर'1956 को नागपुर की महान धम्म दीक्षा के द्वारा फलीभूत हुआ।
नागपुर की महान धम्म दीक्षा के उपरान्त पुनः नवम्बर'1956 को श्रीलंका में बोधिसत्व बाबा साहेब ने घोषणा की- यदि दस साल और जीवित रह गया तो भारत को बुद्धमय बना दूँगा! लेकिन समय की विडंबना कि धम्म दीक्षा के दो माह भी बीतने नहीं पाए और बाबा साहेब 6 दिसम्बर'1956 को शान्त हो गये। जिस संकल्प के लिये वे दस साल का समय चाहते थे उसके लिये जिन्दगी ने उन्हें 2 महीने का भी समय नहीं दिया।
बोधिसत्व का संकल्प साधारण संकल्प नहीं होता। स्थूल काया छूट जाए लेकिन धम्मकाया सक्रिय रहती है। यह महज़ संयोग भर नहीं कहा जा सकता कि बोधिसत्व बाबा साहेब के परिनिर्वाण के ठीक पचास साल के बाद एक अनूठी घटना हुई। वर्ष 2006 में अमेरिका की महोपासिका श्रीमती वांगमो डिक्सी एवं महोपासक श्री रिचर्ड डिक्सी की पहल पर लाओस, थाईलैंड, कम्बोडिया, भारत, म्यांमार, बंगलादेश, वियतनाम, श्रीलंका, नेपाल आदि बौद्ध देशों ने मिल कर एक परिषद का गठन किया- अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन परिषद- इन्टरनेशनल ट्रिपिटक चैन्टिंग काउंसिल-जिसके द्वारा बोधगया में ठीक बोधिवृक्ष की छाँव में प्रत्येक वर्ष 2 दिसम्बर से 12 दिसम्बर तक त्रिपिटक का संगायन की शुरूआत हुई । दो वर्ष के उपरान्त 10 मई'2008 में ठीक बुद्ध पूर्णिमा के दिन बर्मा के वरिष्ठ भिक्खु पूज्य यू. न्यनिन्द की अध्यक्षता में इस परिषद ने एक पंजीकृत स्वरूप धारण किया जिसका लक्ष्य बना- बुद्ध की भूमि में धम्म नाद गुंजित करना। वर्ष प्रतिवर्ष इस त्रिपिटक संगायन का निरन्तर विस्तार होता जा रहा है तथा प्रतिभागी देशों की संख्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि त्रिपिटक संगायन में सभी निकाय एक मंच पर इकट्ठा होते जा रहे हैं- थेरवाद, महायान, वज्रयान इत्यादि सभी यान। पहले यह आयोजन दस दिन के लिए सिर्फ बोधगया में होता था लेकिन अब भारत के अन्य स्थलों पर भी इसका विस्तार होता जा रहा है यथा सारनाथ, श्रावस्ती, संकिसा, दिल्ली, कुशीनगर, राजगीर इत्यादि। पूरा भारत इस अभियान से जुड़ता जा रहा है। समन्वय सेवा संस्थान के सतत प्रयत्नों से वर्ष 2018 से लखनऊ भी इसी श्रंखला में सम्मिलित हो गया है। शेष शहरों को सम्मिलित करते हुए बोधगया का दस दिवसीय आयोजन यथावत रहता है तथा निरन्तर विशाल होता जा रहा है। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि त्रिपिटक संगायन का यह प्रतीकात्मक आयोजन सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि समानान्तर रूप से पश्चिमी देशों में भी हो रहा है, विशेषकर अमेरिका के कई शहरों में।
आख़िर संगीति होती क्यों है? त्रिपिटक संगायन का आयोजन क्यों होना आवश्यक है? क्योंकि भगवान बुद्ध का ही आदेश है (दीघनिकाय पासादिक सुत्त):

"... ये वो मया धम्मा अभिञ्ञा देसिता, तत्थ सब्बेहेव समागम्म अत्थं ब्यञ्जनेन ब्यञ्जनं संगायितब्बं न विवदितब्बं, यथयिदं ब्रम्हचरियं अद्धनियं अस्सी चिरट्ठितिकं...

-जिस धम्म को स्वयं अभिज्ञात करके मैंने तुम्हारे लिए उपदेशित किया है, सब एकत्रित हो कर उसे, अर्थ और व्यंजन सहित, संगायन करो, विवाद न करो, जिससे यह धम्माचरण चिरस्थायी हो..."

धम्म के चिरस्थायित्व के लिए भगवान के वचनों का संगायन करने का स्वयं भगवान ने ही आदेश किया है।

वर्ष 2018 में भारत में त्रिपिटक संगायन की सारणी निम्नवत है:

(1) 28-30 अक्टूबर'2018 सारनाथ में 
(2) 31अक्टूबर' से 3 नवम्बर'2018 नयी दिल्ली में
(3) 4-6 नवम्बर'2018 संकिसा में 
(4) 7-8श नवम्बर'2018 लखनऊ में
(5) 9-11 नवम्बर'2018 श्रावस्ती में
(6) 12-14 नवम्बर'2018 लुम्बिनी में
(7) 15-17 नवम्बर'2018 कुशीनगर में
(8) 18-21 नवम्बर'2018 वैशाली में
(9) 2-12 दिसम्बर'2018 बोधगया में 
(10) 13 दिसम्बर'2018 जेठियन घाटी धम्म यात्रा
(11) 14-17 दिसम्बर'2018 राजगीर/नालन्दा में
(12) 18-22दिसम्बर'2018 उड़ीसा में 

निष्कर्षतः, सातवीं संगीति भारत में आयोजित होने की भूमिका बन रही है। यह संगीति जब भी होगी इस बार बुद्ध वचनों का डिजिटलीकरण होगा। भोजपत्रों पर बुद्ध वचन संरक्षित किये जा चुके हैं, संगमरमर शिलाओं पर उकेरे जा चुके हैं, ताम्रपत्रों पर मुद्रित किया जा चुका है। अब आधुनिकतम आधार कम्प्यूटर बनेगा। इस एक घटना के होते ही न केवल भारत में बल्कि भारत को केन्द्र बना कर सम्पूर्ण विश्व में बुद्ध धम्म फैल जाएगा। भारत का जनमानस जिस विश्व गुरू के गौरव का बार-बार स्मरण करता है वह इस एक घटना के साथ पुनः प्राप्त कर लेगा।
संगीति कोई एक-दो दिन की संगोष्ठी अथवा सेमीनार नहीं होता बल्कि महीनों अथवा वर्षों का आयोजन होता है। इस बार जब भी यह महान घटना होगी तो महीनों तक पूरे विश्व की भारत पर निगाह होगी। विश्व भर में इस घटना का सीधा प्रसारण होगा, देश-विदेश के लोग इस पावन आयोजन में योगदान देने, इसमें प्रतिभाग करने श्रद्धामय मन से लोग भारत की यात्रा करेंगे। हजारों की संख्या में साफ्टवेयर इंजीनियर त्रिपिटक का समानान्तर डिजिटल रूपान्तरण कर रहे होंगे। इस बार पश्चिमी जगत के बौद्ध विद्वान भी बड़ी संख्या में इसमें शामिल होंगे और भारत विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बन जाएगा। भारत विश्व का केंद्र बन जाएगा। इस एक आध्यात्मिक घटना का अप्रत्यक्ष राजनैतिक, आर्थिक, बौद्धिक लाभ अपने आप भारत को मिल जाएगा।
प्रश्न है कि इस बार भारत में सम्भावित संगीति के आयोजन में भारत के बौद्धों की क्या भूमिका होगी? सातवीं संगीति के भावी आयोजन में पश्चिमी जगत की सक्रिय भागीदारी होगी ही। इक्कीसवीं सदी के बौद्ध जगत की यह निर्णायक घटना होगी। भारत के नवबौद्धों की विशेष भागीदारी व भूमिका होगी। यदि भारत के नवबौद्ध आगे बढ़ कर इस आयोजन की जिम्मेदारी उठाने को तत्पर होते हैं तो उम्मीद है कि आने वाले अधिकतम दस वर्षों में यह घटना साकार रूप ले सकती है और भारत ही नहीं बल्कि विश्व बुद्धमय हो जाएगा तथा भारत में धम्म चिरस्थायी हो जाएगा जो कि भारत के बौद्धों की इच्छा भी है व प्रयास भी।
क्या आप इस अभियान से जुड़ना चाहते हैं? अपना सम्पर्क नम्बर व ईमेल तत्काल उपलब्ध कराएं। इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायी जाएगी।

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Wednesday, October 11, 2017

बुद्ध, बौद्ध धर्म और विपश्यना : भारतीय समाज की संजीवनी : श्री संजय जोठे

बुद्ध, बौद्ध धर्म और विपश्यना : भारतीय समाज की संजीवनी
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बुद्ध से लेकर कृष्णमूर्ति जैसे गंभीर दार्शनिकों और ओशो जैसे मदारी बाबाओं तक में धर्म और मानवीय चेतना के बारे में एक वैज्ञानिक प्रस्तावना उभरती रही है. अलग अलग प्रस्थान बिन्दुओं से यात्रा करते हुए बुद्ध कबीर अंबेडकर कृष्णमूर्ति और ओशो एक जैसी निष्पत्तियों पर आ रहे हैं और गौतम बुद्ध की क्रान्तिद्रिष्टि को समकालीन  समाज के अनुकूल बनाते जा रहे हैं. जैसे जैसे सभ्यता आगे बढ़ रही है, सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक बदलावों और क्रांतियों के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी विकास होता जा रहा है वैसे वैसे मनुष्य समाज अधिकाधिक बौद्धिक रुझान का होता जा रहा है. कोरे विश्वासों और मूर्खतापूर्ण कर्मकांडों से परे विशुद्ध ध्यान मूलक अनुशासनों का आकर्षण बढ़ रहा है. अब जब ध्यान की बात आती है तो इसका अर्थ बुद्ध और बौद्ध धर्म होता है. पूरी दुनिया में बुद्ध और बौद्ध धर्म ध्यान और चेतना के विकास के विज्ञान के पर्याय बन चुके हैं.

इस कड़ी में हम ये जानने का प्रयास करेंगे कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आयामों के अतिरिक्त वह कौनसा आयाम है जिसकी किसी कौम को या किसी समाज को जरूरत होती है.

वह कौनसी भूमि है जिसपर खड़े होकर कोई समाज या कौम अपने होने की घोषणा करता है और जिसके आधार पर वह अपने अतीत सहित भविष्य का चेहरा दुनिया के सामने रखता है. वह आयाम है उस समाज का “धर्म और रहस्यवाद”. और यह आयाम व्यावहारिक रूप में उस समाज की ध्यान करने की या चेतना के विकास को सिद्ध करने और समझाने की पद्धति से अनुमान में आता है. सीधी सी बात है किसी समाज में या धर्म में चेतना के विकास का या चेतना के अंतिम लक्ष्य के संधान की जैसी धारणा होती है, उसी के अनुरूप उसका सदाचार, शिष्टाचार, सामाजिक ताना बाना, जीवन व जगत के प्रति दृष्टिकोण और न्याय बोध आकार लेता है. ध्यान और आत्मिक विकास के अन्य अनुशासनों का स्वरुप देखकर ही उसकी मान्यताओं का वास्तविक अर्थ समझा जाता है.

इस अर्थ में हमें यह समझना बहुत जरुरी है कि एक वैज्ञानिक और समतामूलक समाज की  स्थापना की दिशा में सामाजिक राजनीति और आर्थिक उपायों से कहीं आगे जाते हुये एक वैज्ञानिक आध्यात्म की भी आवश्यकता है. यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है. धर्म और रहस्यवाद की जिस तरह की धारणाएं प्रचलित हैं और जिस तरह से दलित और गरीब समाज उसमे फसा हुआ है उसे देखकर इस विषय की महत्ता और भी बढ़ जाती है. जिन्होंने इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया है और आसपास के जीवन को आँखें खोलकर देखा है वे जानते हैं कि गरीबों, दलितों और महिलाओं की असली गुलामी सामाजिक राजनीतिक या आर्थिक गुलामी नहीं है.

असली गुलामी मनोवैज्ञानिक गुलामी है और उसका एकमात्र स्त्रोत धर्म और इश्वर या आत्मा की धारणा में होता है. जो लोग नास्तिकवाद का प्रचार करते हैं वे इस बात को समझते हैं लेकिन इस सच्चाई को अमल में लाने का जो माडल देते हैं वह व्यक्तिगत विद्रोह का माडल है. नास्तिक और इश्वर विरोधी सामूहिक क्रान्ति अगर किसी तरह हो सकती है या हुई है तो वो गौतम बुद्ध के साथ ही संभव है. बुद्ध आत्मा, परमात्मा स्वर्ग नरक और पुनर्जन्म की मूर्खतापूर्ण धारणाओं को एकदम निकाल बाहर करते हैं और एक वैज्ञानिक आध्यात्म की नीव रखते हैं. बुद्ध असल में चेतना के जगत में सबसे महान वैज्ञानिक हैं. और कई अर्थों में बौद्ध धर्म वैज्ञानिक आध्यात्म का पर्याय बन गया है. बुद्ध और बौद्ध ध्यान अनुशासन को समझना इस सन्दर्भ में उपयोगी होगा. आइये इस विषय में प्रवेश करें.

बुद्ध भारत के लिए क्यों जरुरी हैं और उनकी बतलाई पद्धतियाँ किस तरह हमारे लिए उपयोगी हैं ये हमें जानना चाहिए. जो लोग भारतीय समाज में विभाजन अंधविश्वास, ऐतिहासिक, पराजय, गुलामी और अवैज्ञानिकता को देखकर दुखी होते हैं उन्हें बुद्ध को गहराई से समझना चाहिए. अक्सर ही भारतीय समाज की समस्याओं का पहाड़ देखकर निराशा होती है और इस पहाड़ के सामने नतमस्तक हो चुके बुद्धिजीवी, क्रांतिकारी, प्रगतिशील, नास्तिक नए धर्मों के प्रवर्तकों और गुरुओं से भी निराशा होती है. कुछ विद्रोहियों को छोड़ दें तो बाकी सब के सब पुरानी समाज व्यवस्था के सामने हार चुके हैं. न केवल हार चुके हैं बल्कि वे बहुत अपमानजनक समझौते करके ज़िंदा हैं.

इस अर्थ में मध्यकाल के कबीर और आधुनिक युग के कृष्णमूर्ति अकेले हैं जो कोई समझौता नहीं कर रहे हैं. इन दोनों में बुद्ध की तरह ही गैर समझौतावादी क्रान्तिद्रिष्टि है. कबीर का साहित्य चूंकि प्रक्षिप्तों से पाट दिया गया है और उनके लेखन में बहुत सारा लेखन उनके विरोधियों ने उनके नाम से ठूंस दिया है इसलिए कभी कभी कबीर भी परम्परागत लगते हैं. खासकर तब जब उनकी भक्ति और उनका रहस्यवाद वैष्णव भक्ति या नवधा भक्ति जैसा नजर आता है. कबीर न तो रामानंद के शिष्य हैं न वैष्णव हैं. वे खालिस गैर सांप्रदायिक व्यक्ति हैं जो जाति वर्ण सहित स्त्री पुरुष के विभाजन को भी नहीं मानते हैं. इस अर्थ में वे बुद्ध के बहुत निकट हैं. ब्राह्मणवादियों और पोंगा पंडितों ने षड्यंत्र पूर्वक  बुद्ध को विष्णु और कबीर को वैष्णव बनाया है. लेकिन बुद्ध और कबीर इतने विराट हैं कि इन आरोपणों और षड्यंत्रों का सीना चीर कर बार बार निकल आते हैं और अंधविश्वास पर खड़े धर्मों की प्रस्तावनाओं पर कहर बनकर टूटते हैं. ये उनकी अपनी विशेष शैली और पहचान है.

उधर कृष्णमूर्ति तो खालिस बौद्ध दर्शन पर ही टिके हैं और उनकी शिक्षाओं का सार बौद्ध धर्म की विपश्यनामूलक अंतर्दृष्टि पर आधारित है. उनका सबसे गहरा और प्रचलित वक्तव्य है – “दृष्टा ही दृश्य है” (observer is the observed). यह बहुत ही सुन्दर और क्रांतिकारी वक्तव्य है. इस एक वक्तव्य की गहराई में जाते ही हम देख सकेंगे कि कृष्णमूर्ति की “चोइसलेस अवेयरनेस” और बुद्ध की “विपश्यना” कैसे एक समान हैं और कैसे मनुष्य की चेतना पर काम करती है. बुद्ध के असली चमत्कार को समझना है तो इस भूमिका से गुजरकर देखिये. आप न सिर्फ धर्म और रहस्यवाद के एक उजले पक्ष को देख सकेंगे बल्कि यह भी जान पायेंगे कि भारत की सनातन समस्याओं के लिए सबसे कारगर इलाज क्या है.

विपश्यना को गहराई से समझते हैं. विपश्यना का अर्थ है देखना या पीछे मुड़कर देखना. इसी से स्पष्ट होता है कि दृष्टा या साक्षी पर आधारित यह कोई विधि है. दर्शन शास्त्र का “दर्शन” शब्द इसी अनुभूति का परिणाम है. जिन लोगों ने मनुष्य के मन और जीवन सहित मनुष्य के समाज की समस्याओं का गहरा अध्ययन किया है उन्होंने रहस्यवाद या अध्यात्म को एक नकद और प्रेक्टिकल विद्या के रूप में प्रचारित किया है. दर्शन और देखना सहित विपश्यना और दर्शन शास्त्र एक ही प्रवाह में हैं. ताज्जुब नहीं कि इसीलिये बौद्धों ने दुनिया का सबसे विस्तृत और बहुआयामी दर्शनशास्त्र रचा है.

विपश्यना जिन मौलिक अनुभवों और अनुभवजन्य मान्यताओं पर खड़ी है वे बहुत महत्वपूर्ण हैं. सबसे महत्वपूर्ण मान्यता है कि मन शरीर और जीवन सहित प्रकृति में जो कुछ है उसे बगैर किसी धारणा या कल्पना के देखना. यह वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ निरीक्षण का ही मानसिक रूप है. विज्ञान इसी ढंग से बाहर निरीक्षण करता है विपश्यना इस ढंग से मन में निरीक्षण सिखाती है. दूसरी बात ये कि सब पदार्थ और रचनाएं असल में किसी अन्य पदार्थों और रचनाओं के सम्मिलन या संघात का परिणाम हैं. उनका स्वयं में कोई अस्तित्वगत मूल्य नहीं है. जैसे कि जिसे हम शरीर कहते हैं वह बहुत सारे जीव द्रव्यों और रसायनों से मिलकर बना है. ये द्रव्य अंतिम रूप से चार महाभूतों में सिमट जाते हैं जिन्हें प्रथ्वी जल अग्नि और वायु  गया है (यहाँ आकाश को शामिल नहीं किया जाता है).  इन द्रव्यों या महाभूतों से शरीर की रचना हुई है इसलिए अगर शरीर को ठीक से देखा जाए तो वह भी अंततः इन चार महाभूतों में विघटित होता हुआ नजर आता है. अंत में जो बचता है वह चेतना है जो इस संघटन या विघटन को दूर से देखती है.

वह एक अर्थ में आकाश स्वरुप है लेकिन चूंकि वह इस सबमे शामिल नहीं होती इसलिए चेतना और आकाश को चार महाभूतों से अलग ही रखा गया है. हिन्दुओं की तरह उसे पंचभूतों की श्रेणी में शामिल नही किया गया है. इसका क्या लाभ है इसपर आगे बात करेंगे. तो विपश्यना शरीर को अन्य द्रव्यों का समुच्चय मानती है और शरीर ही नहीं मन और व्यक्तित्व सहित “स्व” को भी अन्य छोटी छोटी स्वतंत्र रचनाओं का समुच्चय मानती है. यह बौद्ध दर्शन की धुरी है. “मन” “व्यक्तित्व” “स्व” या “आत्म” असल में स्मृतियों, इच्छाओं, कल्पनाओं और विचारों का ढेर मात्र है. इसीलिये मन में ठीक से झाँकने पर अखंड मन जैसा कुछ पकड में नहीं आता सिर्फ विचार कल्पना स्मृति आदि ही नजर आते हैं. यही सबसे बड़ा दान है बौद्ध धर्म का और इसी से बुद्ध मानव मन की संरचना के सबसे महान अन्वेषक सिद्ध होते हैं.

इसीलिये वे अनत्ता या शून्य की प्रस्तावना कर सके थे. अगर मन अपने कारण स्वरूप विचारों स्मृतियों इत्यादि का ढेर है तो इस ढेर के बिखर जाने पर मन से मुक्ति मिल सकती है और मन से मुक्ति ही दुखों से मुक्ति है. इस तरह विपश्यना एक क्रांतिकारी मान्यता पर खड़ी है. वो ये कि मन या स्व को जिन रचनाओं ने मिलकर बनाया है उन रचनाओं को आपस में अन्तः क्रिया करते हुए आपस में टकराते हुए और अलग अलग रूप आकार लेते हुए देख लो. इस देखने से पता चलेगा कि मन और विचार अपने आप ही एक स्वतंत्र मशीन की तरह किन्ही कार्यकारण नियमों से चलते हैं वहां बहुत कुछ है जो यांत्रिक ढंग से होता है. वहां कोई दिव्य प्रेरणा या ईश्वरीय हस्तक्षेप जैसा कुछ नहीं है. अधिक से अधिक मनुष्य के स्वयं के विवेक को किसी परिवर्तन या निर्णय का श्रेय दिया जा सकता है अन्यथा तो मन स्वयं भी दूसरों से उधार ली गयी रचना है.

ये मान्यताएं बौद्ध धर्म की बहुत आधारभूत विशेषताएं हैं जो उसे हिन्दू व जैन धर्म से अलग करती हैं. इनका मतलब ये हुआ कि जैसे शरीर स्वयं में भोजन, जल, खनिज, मांस, मज्जा आदि से बनता है और इसी में विघटित हो जाता है उसी तरह मन या स्व भी विचार, भाव, इच्छा स्मृति कल्पना आदि से बनता है और उन्ही में विघटित हो जाता है. तब सवाल उठता है कि इस संघटन और विघटन को देखने और जानने वाला क्या है और कौन है? हिन्दू और जैन इसे आत्मा कहते हैं. और बौद्ध इस प्रश्न का उत्तर ही नहीं देते. स्वयं बुद्ध के समय से यह निर्देश दिया गया है कि इस प्रश्न का उत्तर न दिया जाए. उत्तर न देने के दो बड़े कारण हैं. पहला यह कि यह अनुभव से जानने योग्य बात है, इसे व्यर्थ की चर्चा का विषय बनाकर जिज्ञासा और अन्वेषण की चुनौती की ह्त्या नहीं करनी चाहिए.

  दूसरा और सबसे बड़ा कारण है कि इसी प्रश्न के उत्तर पर सनातन आत्मा, परमात्मा, भूत प्रेत और पुनर्जन्म जैसे पाखण्ड खड़े होते हैं. फिर इन पाखंडों पर शोषण, कर्मकांड और विभाजन जन्म लेता है. इसीलिये बुद्ध ने इस प्रश्न का उत्तर छुपाकर एक बहुत ही क्रांतिकारी नजरिया दिया है जो उनके पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. उनके बहुत बाद बीसवीं सदी के महान दार्शनिक लुडविन विटगिस्तीन ने भी यह लिखा है कि जो चीजें समझाई नहीं जा सकती उनकी बात भी नहीं की जानी चाहिये, इससे समझ नहीं बल्कि अंधविश्वास पैदा होता है. बुद्ध इस बात को न सिर्फ समझ रहे हैं बल्कि अमल में भी ला रहे हैं. बहुत बाद में इस प्रश्न के उत्तर पर जब विवाद बढ़ता है तो उस सत्ता को शून्य कहा दिया गया है. असल में यह गहरा मजाक है, अनाम को शून्य का नाम दिया है यह भी बौद्ध दार्शनिकों की समझ का ही चमत्कार है. वे शून्य नाम देकर भी अनाम या अनुत्तर को उत्तर बता रहे हैं और विरोधियों का मुंह बंद कर रहे हैं. आज भी लोग यह समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं कि अगर वे जानते हैं तो उत्तर क्यों नहीं देते. ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि बुद्ध के लिए अध्यात्म या रहस्यवाद अनुभव का विषय है वे कथावाचक या प्रवचनकारों की तरह ध्यान धर्म और अध्यात्म को मनोरंजन का विषय नहीं बना रहे हैं. वे अनुभव करने के लिए ललकारते हैं. और विपश्यना उनके अनुभव का मार्ग है.

इस तरह विपश्यना मूलतः अपने ही मन और व्यक्तित्व में झाँकने की प्रणाली है. यह अपने आप में इतनी वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक है कि इसकी तुलना में अन्य कोई भी ध्यान या निरीक्षण की विधि किसी अन्य धर्म में नहीं है. और इसके जो परिणाम हैं वे भी अन्य विधियों में नहीं हैं. विपश्यना को अन्य प्रणालियों से अलग समझने के लिए अन्य विधियों का उदाहरण समझना चाहिए. भारत के अन्य धर्मों में प्रचलित विधियां कल्पना और सम्मोहन पर आधारित हैं. इस कल्पना को धारणा कहा गया है. धारणा ऐसी कल्पना को कहा गया है जो अभी व्यक्ति के लिए साकार नहीं हुई है लेकिन गुरु के लिए वह साकार हो गयी है. जैसे कि तृतीय नेत्र का अभी शिष्य को कोई अनुभव नहीं है लकिन गुरु को हो चुका है. इसलिए गुरु शिष्य को तीसरे नेत्र पर किसी ज्योति की कल्पना करने को कहता है. या किसी देवी देवता के स्वरुप पर या मन्त्र या पवित्र शब्द को दोहराने को कहता है. इस तरह अन्य भारतीय धर्मों की सारी विधियाँ कल्पना और एकाग्रता पर आधारित हैं. इसका सीधा अर्थ हुआ कि यह कल्पना किसी अन्य के द्वारा दी जायेगी और इस कल्पना पर आपको एकाग्र होना है. आइये इसका पोस्टमार्टम करते हैं.

इस तरह की विधियों में यह मानकर चला जा रहा है कि गुरु अनिवार्य रूप से शिष्य से अधिक जानता है, सही जानता है और उसकी सत्ता को शिष्य को अनिवार्य रूप से मानना ही होगा. इसीलिये अन्य धर्मों में गुरु की अनिवार्यता एक भयानक समस्या बन जाती है. इसी से स्वतंत्र वैज्ञानिक सोच, नवाचार और विद्रोह सहित वैज्ञानिक जिज्ञासा की संभावना पर रुकावट लग जाती है. गुरु शिष्य के बीच में बहुत फासला पैदा हो जाता है जो अमानवीय है. इसी फासले का फायदा उठाकर शिष्यों का शोषण होता आया है. इसीकारण शिष्य गुरुओं से इमानदारी से प्रश्न करना भूल गये हैं और जब चुनौतीपूर्ण प्रश्न नहीं पूछे जाते तो गुरुओं में भी एक झूठी आत्ममुग्धता पैदा हो गयी है. भारत में विश्वगुरु होने की बीमारी यहीं से निकली है.

कल्पना के बाद इन विधियों का दूसरा पहलू है एकाग्रता का. शरीर के किसी हिस्से या मन्त्र इत्यादि पर एकाग्रता करनी होती है. इसका अर्थ यह हुआ कि अध्यात्म या ध्यान की सबसे आधारभूत प्रक्रिया की शुरुआत से ही अपने मन और शरीर में विभाजन करने की आदत डाली जा रही है. ये आध्यात्मिक स्क्रीजोफेनिया है. इसमें असल में ये सिखाया जा रहा है कि आपके शरीर में या आपके मन में कोई एक हिस्सा कोई एक विचार पवित्र है और बाकी अपवित्र है. इसी से शरीर मन और व्यक्तित्व में विभाजन पैदा होता है और एक ही व्यक्ति बहुत सारे खण्डों में टूट जाता है. तब उसे शिष्य या गुलाम बनाना और अधिक आसान हो जाता है. इससे शिष्य का रहा सहा व्यक्तित्व भी ख़त्म हो जाता है. अन्य धर्मों में इसी इस मुर्दगी को गुरु या ईश्वर के प्रति समर्पण कहा गया है. इसे बहुत ऊँची अवस्था माना गया है. असल में यह व्यक्ति के स्वतंत्र व्यक्तित्व की हत्या है. इसीलिये ऐसे धर्म नए प्रयोग या नवाचार नहीं कर पाते. सनातन शब्द का अर्थ ही है नए की संभावना का निषेध. पुराने का ही एक अनंत से दुसरे अनंत तक सातत्य.

इस प्रकार कल्पना और एकाग्रता दोनों ही आत्मघाती हैं, गुलाम बनाने वाली हैं और वैज्ञानिक जिज्ञासा की विरोधी हैं. इन्ही से लोगों को मानसिक बीमारिया होती है जिन्हें धार्मिक भाषा में उच्चाटन कहा जाता है. असल में यह कुछ और नहीं है बल्कि विभाजित व्यक्तित्व की बीमारी है जिसे मनोविज्ञान में स्क्रीजोफेनिया कहा जाता है. कल्पनाओं के गहरे दबाव और एकाग्रता से इंसान का अपने खुद के व्यक्तिव से नाता ही टूट जाता है और जिस देवता या भगवान की कल्पना की जाते है वह चलता फिरता या बात करता नजर आने लगता है. यह मानसिक विक्षिप्तता है जिसे अन्य भारतीय परम्पराओं ने बहुत सम्मान दिया है. लेकिन मनोविज्ञान में यह “हेलिसुनेशन” कहलाता है. इसे परम्परा में दिव्य दर्शन कहा गया है, इसकी मूर्खता निस्सारता को इसी बात से समझा जा सकता है ये दिव्या दर्शन उन्ही महापुरुषों या भगवान् का होता है जिसे आप पूजते आये हैं.

किसी हिन्दू को जीसस या किसी इसाई को महाकाली नजर नहीं आती.
इस तरह अन्य धर्मों की प्रार्थना या कल्पना या एकाग्रता आधारित विधियाँ असल में उन्हें पंगु और कमजोर बनाती हैं. न केवल व्यक्ति के स्तर पर वे भयानक रूप से परनिर्भर और गुलाम बन जाते हैं बल्कि समाज और राष्ट्र के स्तर पर भी वे नयेपन और नवाचार से डरने लगते हैं. इसीलिये ऐसे समुदायों में न विज्ञान जन्म लेता है न साहस. यही भारत की हजारों साल लंबी गुलामी का कारण भी रहा है. 
इस तरह की प्रणाली के विपरीत विपश्यना में सब कल्पनाएँ मन्त्र तंत्र और धारणाओं को फेंकने के लिए कहा जाता है. शरीर पर और मन पर ध्यान गहराने के लिए प्राकृतिक रूप से चलने वाली श्वांस को “देखने” के लिए कहा जाता है. ये श्वांस पर एकाग्रता नहीं है न ही श्वांस को खींचतान करने का प्राणायाम है. यह शुद्ध रूप से दृष्टा की तरह श्वांस को आते जाते देखने का काम है. इसे करते हुए धीरे धीरे पता लगता है कि शरीर में बहुत सारी चीजें चल रही हैं जिन्हें हमने कभी देखा या जाना ही नहीं. बहुत सारी यांत्रिक चीजें मन में चल रही हैं जो हम समझते रहते हैं कि हमारे निर्णय से होती हैं. इस तरह विपश्यना में प्रवेश करते ही यह साफ़ होने लगता है कि शरीर का अनुभव असल में बहुत सारे अंगों की संवेदनाओं के समुच्चय का अनुभव है और मन का अनुभव विचारों भावनाओं भयों स्मृतियों अत्यादी का अनुभव है.

इतना पता चलते ही मन से एक दूरी बन जाती है. तब मन को एक कंप्यूटर की तरह बंद चालू करने की कुशलता आने लगती है. तब वह अनावश्यक रात दिन चलता नही रहता. जब उसका उपयोग करना है कीजिये और जब विश्राम करना है तब उसे ऑफ़ करके सो जाइए – ये विपश्यना की अंतिम सफलता है. इसमें मन को भी एक यंत्र की तरह इस्तेमाल करने का हुनर आने लगता है और मन की गुलामी मिटते ही स्मृतियों, भयों, लालच, क्रोध इत्यादि की गुलामी भी मिट जाती है. इसी को निर्वाण कहा गया है. कृष्णमूर्ति और ओशो इस निर्विचार की अवस्था को अस्तित्व का सबसे सुन्दर और समाधानकारी अनुभव बताते हैं. अन्य धर्म इस चीज को बहुत दिव्य भाषा में बहुत अलंकारों के साथ पेश करते हैं इस तरह पेश करते हुए वे इसे लगभग असंभव और अप्राप्य ही बना डालते हैं. इसीलिये सामान्य भारतीय लोग ध्यान या समाधि की प्रशंसा तो खूब करते हैं लेकिन उनसे पूछिए कि कोई अनुभव हुआ है? तो वे कहेंगे कि अरे भाई ये तो जन्म जन्म की साधना से होता या गुरु के प्रताप से होता. ये सब बहाने असल में इसलिए बनाने होते हैं कि अध्यात्म पर एकाधिकार रखने वाले वर्ग ने ध्यान और समाधी को चमत्कारिक और अलभ्य बनाया है ताकि उस वर्ग की सत्ता बनी रह सके. उनके लिए धर्म चेतना के विकास का विज्ञान नहीं है बल्कि समाज को गुलाम बनाने की चालबाजी है.

बुद्ध और अन्य बौद्ध आचार्य इस सत्ता और इसकी चालबाजी को उखाड़ फेंकते हैं और ध्यान और समाधी को रोजमर्रा की चीज बना देते हैं. इसीलिये बौद्धों में ध्यान या समाधि की “कृत्रिम दिव्यता” से मतवाला होकर कोई पागल नही होता. हिन्दू भक्त और सूफी फकीरों में कल्पना आधारित उच्चाटन से पीड़ित बहुत लोग मिल जायेंगे. ये असल में धार्मिक श्रेणी के मानसिक बीमार हैं जिन्हें हिन्दू “परमहंस” और सूफी लोग “मस्त फकीर” कहते हैं. लेकिन सबसे मजेदार बात ये है कि बौद्धों में ऐसे मानसिक विक्षिप्त या मस्त नहीं पाए जाते.

विपश्यना इस अर्थ में न सिर्फ कल्पनाओं और गुरुओं की गुलामी पर विराम लगाती है बल्कि व्यक्ति को मानसिक रूप से बहुत स्वस्थ बना देती है.

लेखक:


                              श्री संजय जोठे
                             

                       

Friday, August 11, 2017

पराभव सुत्त - इन्सान के पतन के कारणॊं के लिये भगवान्‌ बुद्ध के 12 अनमोल प्रवचन

पराभव सुत्त - इन्सान के पतन के कारणॊं के लिये भगवान्‌ बुद्ध के 12 अनमोल प्रवचन


1. धम्म की कामना करनेवाले की उन्नति होती हैं, तो धम्म से द्वेष करने वाले का पराभव होता है ।
2. जिसे अच्छे लोग अप्रिय लगते हो एवं बुरे लोग प्रिय लगते हो, अशांति वाले धर्म ही जिसे प्रिय हो उसका पराभव होता है ।
3. जो निद्रालु हो, वाचाल हो, निरुद्योगी हो, आलसी हो, क्रोधी हो उसका पराभव होता है ।
4. विपुल सामग्री होने पर भी जो अपने बूढ़े माता पिता का भरण पोषण नहीं करता उसका पराभव होता है ।
5. जो (शील, समाधी, प्रज्ञा में प्रतिष्ठित) श्रेष्ठ पुरुष, श्रमण या अन्य आरण्यक वासी को झूठ बोलकर ठगता है उसका पराभव होता है ।
6. जिसके पास बहुत सारा धन -धान्य होने के होने बावजूद भी केवल वही अकेला उसका उपभोग करता है तो उसका पराभव होता है ।
7. जिसे अपनी जाती का, धन का, गोत्र का अभिमान हैं और इसी भाव में रहकर वह अपने भाई बन्धुओं को तिरस्कृत करता है – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
8.जो व्यक्ति स्त्रियों के पीछे भागता रहता है , शराबी तथा जुआरी है , कमाये हुये धन को फ़िजूल मे खर्च कर देता है –उसकी अवनति का कारण निशचित है ।
9. जो व्यक्ति अपनी पत्नी से असन्तुष्ट रह्ता है तथा वेशयाओं और पराई स्त्रियों के साथ दिखाई देता है – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
10. यौवन समाप्त होने पर जब व्यक्ति नवयुवती को लाता है तो उसकी ईर्ष्या के कारण वह नही सो सकता – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
11. किसी उडाऊ एवं खर्चीली स्त्री या पुरुष को जो धन का रखवाला बना देता है, उसका पराभव होता है ।
12. उत्तम कुल मे उत्पन्न तथा अति मह्त्वाकांक्षी , अल्प सम्पति साधन वाला पुरुष जब राज्य की कामना करता है तो उसका पराभव होता है ।

Sunday, March 19, 2017

कुशीनगर संस्मरण

कुशीनगर की यह न भूलने वाली यात्रा का मन लगभग तीन वर्ष पूर्व दशहरे के दिन हुआ । एक अलसायी सी  सुबह यह निर्णय लिया गया कि आज का दिन भगवान्‌ बुद्ध के सानिध्य मे ही बितायेगें । इसके पहले इस ब्लाग मे  श्रावस्ती और  मिन्डोलिग स्तूप , देहरादून की चर्चा की गई है । सरनाथ , साँची ,  बोधगया और नालन्दा  का संस्मरण अभी लिखना बाकी है । जिनका जिक्र बाद की पोस्टॊ में होगा ।
लखनऊ से कुशीनगर को जोडने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग अपनी साधन  से जाने वालॊ के लिये सुखद एहसास दिलाता है । इसके विपरीत श्रावस्ती  का ऐहासास बहुत ही दुख्द था । यहां  रोड बहुत ही उत्कृट क्वालिटी की है , हाँ , अलबत्ता कई जगहॊ पर टौल टैक्स की वसूली जरुर खलती है ।
कुशीनगर का बुद्ध्युगीन नाम कुसिनारा था और यह मल्लों का एक अधिष्ठान नगर था । 'महापरिनिर्वाणसुत्त' से ज्ञात होता है कि कुशीनगर बहुत समय तक समस्त जंबुद्वीप की राजधानी भी रही थी। गोरखपुर से महज 53 किमी. की दूरी पर स्थित यह नगर एक जमाने में मल्ल वंश की राजधानी थी। साथ ही कुशीनगर प्राचीनकाल के 16 महाजनपदों में एक था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान के यात्रा वृत्तातों में भी इस प्राचीन नगर का उल्लेख मिलता है। इस प्राचीन स्थान को प्रकाश में लाने के श्रेय जनरल ए कनिंघम और ए. सी. एल. कार्लाइल को जाता है जिन्होंनें 1861 में इस स्थान की खुदाई करवाई। 1904 से 1912 के बीच इस स्थान के प्राचीन महत्व को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने अनेक स्थानों पर खुदाई करवाई।
कुशीनगर मे भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था । इसी कारण से यह नगर आज भी समस्त संसार मे बहुत पवित्र और आस्था का प्रतीत माना जाता है । कहते हैं कि तथागत ने अपने महापरिबिर्वाण की घॊषणा वैशाली मे तीन माह पूर्व कर दी थी ।
लखनऊ से सुबह ५ बजे के चले हम कुशीनगर १० बजे सुबह पहुँचे। महापरिनिर्वाण विहार के मुख्य द्वार मे प्रवेश करते ही प्रचीन भग्नावशेषों के आधार दिखने आरम्भ हो जाते हैं । इस पथ पर न जाने कितने संघारामों और विहारों का निर्माण हुआ होगा और न जाने कितने अनित्यता के कालचक्र मे समा गये । आज यहाँ मौन की गहन नीरवता है लेकिन शायद कल यह सम्यक बुद्ध के सतत्‌ चारिका का फ़ल था जिसने यह क्षेत्र को  बुद्ध्मय बना दिया था ।
१. महापरिनिर्वाण विहार और स्तूप
परिनिर्वाण स्तूप के विशाल फ़ैले प्रागंण मे चल कर हम वर्तमान परिनिर्वाण विहार के द्वार मे प्रविष्ट हुये । सामने एक चबूतरे पर भगवान्‌ बुद्ध की अधलेटी  विशाल प्रतिमा के दर्शन होते हैं । इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 6.1 मीटर ऊंची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है।  जिन बुद्ध के वचनो ने जन जन के कल्याण हेतु धम्मपदेश दिये थे वे आज मानो प्रतिमा बनकर अनन्त निद्रा मे मौन पडॆ थे । ऐसा लगा मानो भगवान्‌ कह रहे हो

अनिच्चा वत संखारा उप्पादवय धम्मिनो ,
उप्पज्जितवा निरुज्झन्ति तेसं वुपसमो सुखो ॥

अर्थात : सभी संस्कार ( सभी पदार्थ , सभी प्राणी ) अनित्य ( सदा न रहने वाले हैं ) । उनका उत्पन्न होना  , निरोध होना ( मृत्यु को प्राप्त होना ) उनका धर्म ( स्वभाव ) है । वे उत्पन्न होकर निरोध को प्राप्त होते हैं । उन्का अपशमन (समाप्त हो जाना ) सुख है ।
यह  स्थान उस काल को दर्शाता है जब भगवा बुद्ध ने अपना पार्थिव शरीर छॊड दिया था और निर्वाण को प्राप्त हुये । जैसा नीचे चित्र मे दिख रहा है कि यह विहार भग्नावशॆषॊं के ऊंचे विशाल चबूतरे पर खडा है । प्राचीनकाल मे यह मल्लॊं के शालवन पावतन का भाग था । इन फ़ैले  भग्नावशॆषॊं की मॊटाई को देखकर लगता है कि प्राचीन काल में इस विहार की कई मंजिलें थी । इनमें  कई शून्यगार भी थे जहाँ भिक्खु ध्यान किया करते थे ।
महापरिनिर्वाण स्तूप मे मल्लॊं द्वारा उनके धातू अवशॆषॊं को सुरूक्षित रखा गया था । कालान्तर  मे  सम्राट अशोक ने सभी स्थानॊ से धातु अवशॆषॊं को निकालकर उन्हे ८४०००० भागों मे बाँट कर प्रत्येक भाग पर स्तूपॊ का निर्माण करवाया था । यह स्टूप भी उसी भाग का हिस्सा था ।
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महापरिनिर्वाण विहार के पीछे का भाग
महापरिनिर्वाण विहार के पृष्ठ के  भाग में एक चौकोर स्तूप भी दिखता है जो भिक्खु अनुरुद्ध का है । इसी के पास एक ४० फ़ीट ऊंचा एक और स्तूप भी खडा है जिसका निर्माण कुशीनगर के मल्लों द्वारा करवाया गया था ।
विहार मे प्रवेश करते समय हमारी नजर स्तूप  के पिछ्ले अहाते के प्रागंण मे दो मूर्तियों पर पडी जो सजीव सी लग रही थी लेकिन यह निर्णय करना थॊडा मुश्किल लगा कि यह मूर्ति है या सजीव ।  लगभग ४५ मिनट बाद जब हमने पुन: उस प्रागंण मे प्रवेश किया तो दिल माना नही कैमरे का फ़ोकस सही किया और पाया  यह दो थाई  ध्यान मुद्रा ( विपशयना ) मे तल्लीन थे । दोनो को विपशयना मे बैठे देखकर  धम्मप्द की गाथा याद आ गयी :
सब्बे संङ्खारा अनिच्चाति, यदा पञ्ञाय पस्सति।
अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया।। (धम्मपद २७७)
सारे संस्कार अनित्य हैं यानी जो हो रहा है वह नष्ट होता ही है । इस सच्चाई को जब कोई विपशयना से देख लेता है , तब उसको दुखों से निर्वेद प्राप्त होता है अथात दु:ख भाव से भोक्ताभाव टूट जाता है । यह ही है शुद्ध विमुक्ति का मार्ग !!     धम्मपद २७७
 
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स्तूप  के पिछ्ले अहाते के प्रागंण मे विपशयना मे डूबे दो थाई

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२. बर्मी बुद्ध विहार
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लगभग सभी मन्दिर और विहार बुद्ध मार्ग पर हैं । बर्मी बुद्ध विहार महापरिनिर्वाण विहार के बायी ओर यह स्थित है । द्वार से प्रवेश करने पर एक भव्य बर्मी पगोडा के दर्शन होते हैं जिस पर चमकर्ता हुआ सुनहरा रंग किया गया है । पगोडा की ऊचाई १०८ फ़ीट है । पगोडा के अन्दर भगवन बुद्ध की अधलेटी प्रतिमा हिअ और दीवारॊ पर बुद्ध के जीवन का चित्रण ।
इसी विहार मे एक सरोवर भी है जिसके ऊपर एक सुन्दर विहार बनाया गया है ।
३. चीनी बुद्ध विहार :

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चीनी बुद्ध विहार में पुनरुद्धार की वजह से मे हमें अन्दर प्रवेश करने को नही मिला । कुछ फ़ोटॊ जो हमने ली वह बाहर से ही थी ।
३.इंडॊ- जापान-श्रीलंका बौद्ध केन्द्र
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बुद्ध मार्ग पर आगे चलने पर दायीं तरफ़ यह स्थित है ।
इंडो - जापान - श्रीलंका मंदिर, तीन देशों के बौद्ध अनुयायियों के सहयोग को इंगित करता है।  इस मंदिर में भगवान बुद्ध की अष्‍ट धातु की मूर्ति स्‍थापित है जिसे जापान से लाया गया था और इसके निर्माण के लिए जापानी राजशाही के द्वारा वित्‍त पोषिण दिया गया था।
जब इस मूर्ति को जापान से आयात किया गया था, तब यह दो टुकड़ों में थी, जिसे बाद में स्‍थापना के दौरान जोड़ दिया गया।  इस मंदिर की डिजायन और निर्माण, अटेगो ईस्‍सहीन विश्‍व बौद्ध सांस्‍कृतिक एसोसिएशन द्वारा बनाई गई थी। मंदिर में भगवान बौद्ध की अष्‍टधातु की मूर्ति एक अनूठे, चमकदार, भव्‍य और कांच के भव्‍य परिपत्र में रखी गई है । इस विहार की व्यवस्था सुचारु रुप से चलाने के लिये भदंत अस्स्जी महाथेरा का बहुत योगदान है जो श्रीलंका मूल के हैं ।
इंडॊं -जापान-श्रीलंका मन्दिर तक पहुंचते २ बारिश तेज हो चुकी थी । इस बीच पडने वाले कई विहार छूट गये जिसमे  माथाकुंवर बुद्ध विहार , तिब्बती बुद्ध विहार और राजकीय संग्राहलय मुख्य थे । राककीय संग्रहालय तो अवकाश की वजह से बंद था । कोरिया बुद्ध विहार और वाट थाई बुद्द विहार के खुलने का समय नही हुआ था । इसलिये इस अल्प समय की यात्रा मे लग रहा था कि यह भी छूट जायेगें , और यही हुआ भी ।
४. हिरण्यवती नदी
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यह एक एतिहासिक नदी है । बुद्ध मार्ग पर रामाभार स्तूप की ओर बढते हुये बायी ओर इसका रास्ता जाता है । प्राचीन मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनगर के पूर्वी छोर पर प्रवाहित होने वाली हिरण्यवती नदी बुद्ध के महापरिनिर्वाण की साक्षी तो है ही, मल्ल गणराज्य की समृद्धि और सम्पन्नता का आधार भी रही है। प्राचीन काल में तराई के घने जंगलों के बीच बहती हुई यह नदी मल्ल राज्य की सीमा भी निर्धारित करती थी। कहा जाता है कि इस नदी के बालू के कणों के साथ सोने के कण भी मिलते थे, जिसके कारण इसे हिरण्यवती कहा जाने लगा।

इसी हिरण्यवती नदी का जल पीकर बुद्ध ने  भिक्षुओं को अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। उनका दाह संस्कार मल्लों ने चक्रवर्ती सम्राट की भांति इसी नदी के तट पर रामाभार में किया था। जिसका वर्णन हम आगे करेगें । कहते हैं कि उस समय नदी विशाल थी, यही कारण था कि भिक्षु महाकश्यप जब बिहार से यहां पहुंचे तो शाम होने के कारण नदी पार नहीं कर सके और प्रात: काल नदी पार करके रामाभार पहुंचे। तब जाकर बुद्ध का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
वर्तमान समय मे यह नदी उपेक्षित सी पडी है , नदी का पाट छॊटा होकर  ‘बखया नाला ’ हो गया है ।
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हिरण्यवती नदी से आगे बढने पर बांये ओर प्राचीन रामाभर ताल के किनारे एक विशाल स्तूप खडा है जिसे मुकुटबंधन - चैत्‍य या मुक्‍त - बंधन विहार भी कहा जाता है । ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध की 483 ईसा पूर्व में हुई मृत्‍यु के बाद उनका इसी स्‍थान पर अंतिम संस्‍कार कर दिया गया था। स्न्‌ १८६१ मे यह स्तूप ४९ फ़ीट ऊँचा था । चीनी यात्री इत्सिगं नेयहाँ लगभग १०० भिक्खुओ को निवास करते देखा था ।
भारी बारिश की वजह से कुशीनगर मे बहुत कुछ देखने को रह गया । इंडॊं -जापान-श्रीलंका मन्दिर तक पहुंचते २ बारिश तेज हो चुकी थी । इस बीच पडने वाले कई विहार छूट गये जिसमे  माथाकुंवर बुद्ध विहार , तिब्बती बुद्ध विहार , वाट थाई बुद्ध विहार और राजकीय संग्राहलय मुख्य थे । राककीय संग्रहालय तो अवकाश की वजह से बंद था । कोरिया बुद्ध विहार और वाट थाई बुद्द विहार के खुलने का समय नही हुआ था । इसलिये इस अल्प समय की यात्रा मे लग रहा था कि यह भी छूट जायेगें , और यही हुआ भी । लेकिन एक आस फ़िर भी बनी रही कि एक बार दोबारा इस पुण्य भूमि के दर्शन करने अवशय आना होगा ।






Wednesday, March 8, 2017

उर्गेलिंग मठ ( Urgelling Monastery ), तवांग

Urgelling Monastery

तवांग के प्रचीन मठों में से एक उर्गेलिंग मठ तवांग शहर से 3 किमी दूर स्थित है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसका अस्तित्व 14वीं शताब्दी से है। इस मठ का निर्माण उर्गेन संगपो द्वारा किया गया था और यह भी माना जाता है कि यह मठ उनके द्वारा बनवाए गए पहले तीन मठों में एक है। एक मान्यता यह भी है कि 1683 में जन्मे छठे दलाई लामा त्सांगग्यांग ग्यामत्सो का जन्म स्थल भी है। वह लामा ताशी तेंजिन के बेटे और तेर्टन परमालिंगपा के वंश के थे।

Tuesday, March 7, 2017

गोरसम चोरटेन, तवांग

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यह एक स्तूप है, जो तवांग कस्बे से 90 किमी दूर है। खास बात यह है कि यह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा स्तूप है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तूप का निर्माण 12वीं शताब्दी के आरंभ में एक मोनपा संत लामा प्राधार द्वारा किया गया था। यह एक अर्ध-वृत्ताकार गुंबदनुमा संरचना है, जिसका ऊपरी हिस्सा नुकीला है। यह तीन चबूतरे वाले स्तंभ पर टिका हुआ है। इस स्तूप के चार लघु रूप को तल के सबसे निचले चबूतरे के चारों कोणो पर स्थापित किया गया है। स्तूप तक एक फुटपाथ भी बनाया गया है, जिससे तीर्थ यात्री प्रार्थना करने के लिए पहुंचते हैं।