"मन को एकाग्र कैसे करें? सुभ सुत्त में छिपे समाधि के रहस्य"
Preachings of Buddha
Saturday, February 14, 2026
"मन को एकाग्र कैसे करें? सुभ सुत्त में छिपे समाधि के रहस्य"
"मन को एकाग्र कैसे करें? सुभ सुत्त में छिपे समाधि के रहस्य"
Monday, February 9, 2026
ककचूपम सुत्त | क्रोध को कैसे नष्ट करें | आरी की उपमा से बोधि मार्ग | Buddha Teaching in Hindi | (MN-21)
ककचूपम सुत्त | क्रोध को कैसे नष्ट करें | आरी की उपमा से बोधि मार्ग | Buddha Teaching in Hindi | (MN-21)
ककचूपम सुत्त (Kakacūpama Sutta) मज्जिम निकाय का एक अत्यंत गहन और चुनौतीपूर्ण उपदेश है, जिसमें भगवान बुद्ध क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध पर विजय पाने का सर्वोच्च मार्ग बताते हैं। इस सुत्त में बुद्ध एक अत्यंत कठोर उपमा देते हैं — यदि कोई व्यक्ति आपको आरी से भी काटे, तब भी मन में क्रोध या घृणा उत्पन्न न हो।
यह उपदेश केवल नैतिक शिक्षा नहीं है, बल्कि मानसिक अनुशासन, समता (Equanimity), और मैत्री-भावना की चरम साधना है। ककचूपम सुत्त हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारी मानसिक प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण बनती है।
इस वीडियो में आप जानेंगे:
बुद्ध द्वारा क्रोध को जड़ से नष्ट करने की विधि
मैत्री (Loving-Kindness) और करुणा का वास्तविक अभ्यास
कठिन परिस्थितियों में भी मन को स्थिर कैसे रखें
ध्यान और दैनिक जीवन में इस सुत्त की व्यावहारिक उपयोगिता
यदि आप ध्यान, मानसिक शांति, आत्म-नियंत्रण, और बुद्ध की मूल शिक्षाओं में रुचि रखते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए एक गहन साधना-सूत्र सिद्ध होगा।
Wednesday, January 7, 2026
समझ की शुरुआत - अजह्ञान चा
Ajahn Chah (अजान चा) थाईलैंड के एक महान बौद्ध भिक्षु और शिक्षक थे। वे थाई फ़ॉरेस्ट परंपरा के सबसे प्रभावशाली आचार्यों में गिने जाते हैं।
संक्षेप में
जन्म: 1918, थाईलैंड
निर्वाण (देहावसान): 1992
परंपरा: थेरवाद बौद्ध धर्म (Forest Tradition)
उनकी शिक्षा का सार
अनित्यता (सब कुछ बदलता है)
दुःख का कारण आसक्ति है
समाधान: जागरूकता, ध्यान और सीधा अनुभव
Ajahn Chah की खासियत थी—सरल भाषा, रोज़मर्रा के उदाहरण और गहरी स्पष्टता। वे कहते थे:
> “शांति कहीं बाहर नहीं मिलती—वह देखने वाले मन में ही प्रकट होती है।”
उनका प्रभाव
उन्होंने थाईलैंड में कई ध्यान मठ स्थापित किए, जिनमें Wat Nong Pah Pong प्रमुख है।
उनके शिष्यों ने पश्चिम में भी बौद्ध ध्यान को फैलाया।
आज भी उनकी बातें ध्यान, चिंता (anxiety) और बेचैनी से जूझ रहे लोगों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती हैं।
Monday, January 5, 2026
बीमारी से निपटना(Dealing with Disease)
बीमारी से निपटना
(Dealing with Disease)
बीमारी कोई दंड नहीं है —
यह प्रकृति का नियम है।
जिस शरीर का जन्म हुआ है,
उसका बीमार होना स्वाभाविक है।
दर्द शरीर में होता है,
दुःख मन की प्रतिक्रिया से जन्म लेता है।
जब हम डर, घृणा और शिकायत को
सिर्फ़ देखना सीख लेते हैं,
तो दर्द बना रहता है
पर दुःख कम हो जाता है।
इलाज आवश्यक है,
पर उससे आसक्ति नहीं।
बीमारी भी
जागरूकता और बोध का
मार्ग बन सकती है।
“मैं बीमार हूँ” नहीं —
“बीमारी को जाना जा रहा है”
यही मुक्तिदायक दृष्टि है।
— अजहन सुमेधो
🕊️ © drprabhattandon
Sunday, January 4, 2026
Saturday, January 3, 2026
Thursday, October 2, 2025
ईश्वर मॆ ( अ) विश्वास और बुद्ध धम्म
इस संसार को किसने बनाया , यह एक सामान्य प्रशन है लेकिन इस दुनिया को ईश्वर ने बनाय यह वैसा ही सामन्य सा उत्तर है । इस सृष्टि रचयिता के कई नाम है , अलग –२ प्रांत और देशानुसार अलग-२ । यदि यह पूछा जाये कि तथागत ने ईश्वर को सृष्टि कर्ता के रुप में स्वीकार किया तो उत्तर है “ नही” बुद्ध ने कहा कि ईशवराश्रित धर्म कल्पनाश्रित है । इसलिये ऐसे धर्म का कोई उपयोग नही है । बुद्ध ने इस प्रशन को ऐसे ही नही छोड दिया । उन्होने इस प्रशन के नाना पहलूऒं पर विचार किया है ।
बुद्ध का तर्क था कि कि ईशवर का सिद्धान्त सत्याश्रित नही है । भगवान् बुद्ध ने वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ हुई बातचीत मे स्पष्ट किया है ।
वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ भगवान् बुद्ध के संवाद
वासेठ्ठ और भारद्धाज मे एक विवाद खडा हुआकि सच्चा मार्ग कौन सा है और झूठा कौन सा ? इस समय भगवान बुद्ध भिक्षु संघ के साथ कोशल जनपद मे विहार कर रहे थे । वह मनसाकत नामक ब्रहाम्ण गाँव मे अचिरवती नदी के तट पर एक बगीचे में ठ्हरे थे । वासेठ्ठ और भारद्धाज दोनों मनसाकत नाम की बस्ती में ही रहते थे । जब उन्होने सुना कि तथागत उनकी बस्ती में आये हैं तो वे उनके पास गये और दोनों ने भगवान् बुद्ध से अपना दृष्टिकोण रखने का निवेदन किया ।
भारद्धाज ने कहा –” तरुक्ख का दिखाया मार्ग सीधा साधा है , वह मुक्ति का सीधा पथ है और जो इसका अनुसरण कर लेता है उसे वह ब्रह्मा से मिला देता है ।”
वासेठ्ठ ने कहा – “ हे गौतम बहुत से ब्राहम्ण बहुत से मार्ग सुझाते हैं – अध्वय्य ब्राहम्ण , तैत्तिरिय ब्राहम्ण, कंछोक ब्राहम्ण , तथा भीहुवर्गीय ब्राहम्ण,। वे सभी , जो इन के बताये पथ का अनुकरण करते हैं , उसे ब्रहमा से मिला देते हैं । जिस प्रकार किसी गाँव या नगर के पास अनेक रास्ते होते हैं , किन्तु वे सभी उसी गांव मे पहुंचा देते हैं , उसी तरह से ब्राहम्णॊं द्वारा दिखाये सभी पथ ब्रहमा से जा मिलते हैं । ”
तथागत ने प्रशन किया – “ तो वासेठ्ठ तुम्हारा क्या यह कहना है कि वे सभी मार्ग सही हैं ? वासेठ्ठ बोला – “ श्रमण गौतम हाँ, मेरा यही मानना है ।”
“ लेकिन वासेठ्ठ ! क्या तीनों वेदों के जानकार ब्राहमणॊं के गुरुऒं में कोई एक भी ऐसा है जिसने ब्रहमा का आमने सामने दर्शन किया हो ?”
"”गौतम ! निशचय ही नही ! ”
“ तो ब्रहमा को किसी ने नही देखा ? किसी को ब्रह्मा का साक्षात्कार नही हुआ ? “ वासेठ्ठ बोला – “ हां ऐसा ही है ।”
“ तब तुम कैसे यह मान सकते हो कि ब्राहम्णॊं का कथन सथाश्रित है ?
“ वासेठ्ठ ! जैसे कोई अंधे की कतार हो । न आगे चलने वाला अंधा देख सकता हो , न बीच मे और न पीछे चलने वाला अंधा । इसी तरह वासेठ्ठ ! मुझे लगता है कि ब्राहम्णॊं का कथन सिर्फ़ अंधा कथन है । न आगे चलने वाला देखता है , न बीच वाला और न पीछे वाला देखता है । इन ब्राहम्णॊं की बातचीत केवल उपहासस्यपद है , शब्द मात्र जिस में कोई सार नही ।”
“ वासेठ क्या यह ऐसा नही है कि किसी आदमी का किसी स्त्री से प्रेम हो गया हो जिसे उसने देखा तक नही हो ? “ "वासेठ्ठ बोला – “हां यह ऐसा ही है ।”
“ वासेठ! तब तुम यह बताओ कि यह कैसा होगा कि जब लोग उस आदमी से पूछेगें कि जिस सुन्दरतम स्त्री से प्रेम करने की बात करते हो वह अमुक स्त्री कौन है , कहां की है आदि ।”
सृष्टि के तथाकथित रचयिता की चर्चा करते हुये तथागत ने भारद्धाज और वासेठ्ठ से कहा – “ मित्रों ! जिस प्राणी ने पहले जन्म लिया था वह अपने बारे मे सोचने लगा कि मै ब्रहमा हूँ , विजेता हूँ , निर्माता हूं , अविजित हूँ , सर्वाधिकारी हूँ , मालिक हूँ , निर्माता हूँ , रचयिता हूँ, व्यवस्थापक हूँ, आप ही अपना स्वामी हूँ , और जो हैं तथा वे जो भविष्य में पैदा होने वाले हैं , उन सब का पिता हूँ । मुझ से यह सब प्राणी उत्पन्न होते हैं ।”
“ तो इसका यह मतलब हुआ न कि जो अब है और जो भविष्य में उतपन्न होने वाले हैं , ब्रह्मा सब का पिता है ? “
“ तुम्हारा कहना है कि यह जो पूज्य , विजेता , अविजित , जो है तथा जो होगें उन सब का पिता , जिससे हमारी उत्पति हुई है – ऐसा जो यह ब्रह्मा है , वह स्थायी है , सतत रहने वाला है , नित्य है , अपरिवर्तन-शील है और वह अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा । तो हम जिन्हें ब्रह्मा ने उत्पन्न किया है , जो ब्रह्मा के यहाँ से आये हैं , सभी अनित्य क्यों है , परिवर्तनशील क्यों हैं , अस्थिर क्यों हैं , अल्प जीवी क्यों हैं और मरणाधर्मी क्यों हैं ? “
इसका वासेठ् के पास कोई उत्तर नही था ।
तथागत का तीसरा तर्क ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता से संबधित था । “ यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सृष्टि का पर्याप्त कारण है , तो फ़िर आदमी के दिल मे कुछ करने की इच्छा ही उत्पन्न नही हो सकती , उसे कुछ करने की आवशयकता भी नही रह सकती , न उसके मन में कुछ करने का संकल्प ही पैदा हो सकता है । यदि वह ऐसा ही है तो ब्रह्मा ने आदमी को पैदा ही क्यों किया ? ”
इसका भी वासेठ् के पास कोई उत्तर नही था ।
तथागत का चौथा तर्क था कि “ यदि ईश्वर कल्याण-स्वरुप है तो आदमी हत्यारे , चोर, व्यभिचारी , झूठे , चुगलखोर, लोभी , द्धेषी , बकवादी और कुमार्गी क्यों हो जाते हैं ? क्या किसी अच्छॆ , भले ईश्वर के रहते यह संभव है ? ”
तथागत का पाँचवां तर्क ईश्वर के सर्वज्ञ , न्यायी , और दयालु होने से संम्बधित था ।
“ यदि कोई ऐसा महान् सृष्टि-कर्ता है जो न्यायी भी है और दयालु भी है , तो संसार मे इतना अन्याय क्यों हो रहा है ?” भगवान् बुद्ध का प्रश्न था । उन्होनें कहा – “ जिसके पास भी आंख है वह इस दर्दनाक हालत को देख सकता है । ब्रह्मा अपनी रचना सुधारता क्यों नही है ? यदि उसकी शक्ति इतनी असीम है कि उसे कोई रोकने वाला नही तो उसके हाथ ही ऐसे क्यों हैं कि शायद वह किसी का कल्याण करते हो ?उसकी सारी की सारी सृष्टि दु:ख क्यों भोग रही है ? वह सभी को सुखी क्यों नही रखता है ? चारों ओर ठ्गी , झूठ , और अज्ञान क्यों फ़ैला हुआ है ? सत्य पर झूठ क्यों बाजी मार ले जाता है ? सत्य और नयाय क्यों पराजित हो जाते है? मै तुम्हारे ब्रह्मा को परं-अन्यायी मानता हूँ जिसने केवल अन्याय देने के लिये इस जगत की रचना की है । “
“ यदि सभी प्राणियों में कोई ऐसा सर्वशक्तिमान ईश्वर व्याप्त है जो उन्हें सुखी और दुखी बनाता है और जो उनसे पाप पुण्य कराता है तो ऐसा ईश्वर भी पाप से सनता है । या तो आदमी ईश्वर की आज्ञा में नही है या ईश्वर नेक और न्यायी नही है अथवा ईश्वर अन्धा है ।”
ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त के विरुद्ध उनक अगला तर्क यह था कि ईश्वर की चर्चा से कोई प्रयोजन सिद्ध नही होता । भग्वान् बुद्ध के अनुसार धर्म की धुरि ईश्वर और आदमी का सम्बन्ध नही है बल्कि आदमी का आदमी के साथ संम्बन्ध है । धर्म का प्रयोजन यही है कि वह आदमी को शिक्षा दे कि वह दूसरे आदमी के साथ कैसे व्यवहार करे ताकि सभी आदमी प्रसन्न रह सकें ।
तथागत की दृष्टि में ईश्वर विश्वास सम्यक् दृष्टि के मार्ग मे अवरोधक है । यही कारण था कि वह रीति रिवाजों , प्रार्थना और पूजा के आडंबरों के सख्त खिलाफ़ थे । तथागत का मानना था कि प्रार्थना कराने की जरुरत ने ही पादरी पुरोहित को जन्म दिया और पुरोहित ही वह शरारती दिमाग था जिसने इतने अन्धविशवास को जन्म दिया और सम्यक दृष्टि के मार्ग को अवरुद्ध किया ।
तथागत का ईश्वर अस्तित्व के विरुद्ध आखिरी तर्क प्रतीत्य-समुत्पाद के अन्तर्गत आता है । इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है या नही , यह मुख्य प्रश्न नही है और न ही की ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है या नही ? असल प्रश्न है कि ईश्वर ने सृष्टि किस प्रकार रची ? प्रशन महत्वपूर्ण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि भाव ( =किसी पदार्थ ) में से उत्पन्न की या अभाव ( = शून्य ) में से ?
यह तो एक्दम विशवास नही किया जा सकता कि ‘ कुछ नही ‘ में से कुछ की रचना हो गई । यदि ईश्वर ने सृष्टि की रचना कुछ से की है तो वह कुछ – जिस में से नया कुछ उत्पन्न किया गया है – ईश्वर के किसी भी अन्य चीज के उत्पन्न करने के पहले से ही चला आया है । इसलिये ईश्वर को उस कुछ का रचयिता नही स्वीकार किया जा सकता क्योंकि वह कुछ पहले से ही अस्तित्व मे चला आ रहा है ।
यदि ईश्वर के किसी भी चीज की रचना करने से पहले ही किसी ने कुछ में से उस चीज की रचना कर दी है जिससे ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है तो ईश्वर सृष्टि का आदि-कारण नही कहला सकता ।
भगवान् बुद्ध का यह आखिरी तर्क ऐसा था कि जो ईश्वर विश्वास के लिये सर्वथा मारक था और जिसका वासेठ् और भारद्धाज के पास कोई जबाब नही था ।
( संकलन : पृष्ठ संख्या १९४-१९९ , भगवान् बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अम्बेड्कर , अनुवादक :डां भदन्त आनन्द कौसल्लायन )
अगले भाग में देखें :भगवान् बुद्ध की सृष्टि निर्माण की बैज्ञानिक सोच : प्रतीत्य-समुत्पाद
यह भी देखें :
Saturday, May 31, 2025
गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा
हार्ट सूत्र, जिसे संस्कृत में "प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र" (Prajñāpāramitāhṛdayasūtra) कहा जाता है, बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध सूत्र है। यह महायान बौद्ध परंपरा का हिस्सा है और प्रज्ञापारमिता (परिपूर्ण बुद्धि) साहित्य का एक संक्षिप्त लेकिन गहन ग्रंथ है। यह सूत्र शून्यता (शून्यवाद) की अवधारणा को समझाने के लिए जाना जाता है, जो यह सिखाता है कि सभी धार्मिक और सांसारिक चीजें स्वाभाविक रूप से खाली हैं, यानी उनकी कोई स्वतंत्र, स्थायी प्रकृति नहीं है।
### मुख्य बिंदु:
1. **लेखक और संदर्भ**:
- हार्ट सूत्र को भगवान बुद्ध के उपदेशों का सार माना जाता है। इसमें बुद्ध के शिष्य शारिपुत्र और बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के बीच संवाद है।
- अवलोकितेश्वर शारिपुत्र को शून्यता की गहन समझ के बारे में बताते हैं।
2. **प्रसिद्ध पंक्ति**:
- सूत्र की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है: **"रूपं शून्यता, शून्यतैव रूपं"** (रूप शून्यता है, और शून्यता ही रूप है)। इसका अर्थ है कि भौतिक रूप और शून्यता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; सभी चीजें परस्पर निर्भर हैं और स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रखतीं।
3. **मुख्य शिक्षाएं**:
- **शून्यता**: सभी घटनाएं (धर्म) स्वतंत्र रूप से मौजूद नहीं हैं; वे कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर हैं।
- पांच स्कंध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) भी शून्य हैं।
- यह सूत्र दुख, अज्ञानता और भ्रम से मुक्ति का मार्ग दिखाता है, जो निर्वाण की ओर ले जाता है।
4. **संस्कृत और अनुवाद**:
- यह सूत्र मूल रूप से संस्कृत में लिखा गया था, लेकिन इसे चीनी, तिब्बती, और अन्य भाषाओं में अनुवादित किया गया है।
- इसका सबसे छोटा संस्करण कुछ पंक्तियों का है, जबकि विस्तृत संस्करण में थोड़ा अधिक विवरण होता है।
5. **प्रसिद्ध मंत्र**:
- सूत्र का अंत एक शक्तिशाली मंत्र के साथ होता है: **"गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा"**। इसका अर्थ है "गया, गया, पार गया, सब पार गया, बोधि (जागृति) हो जाए, स्वाहा!" यह मंत्र प्रज्ञा (बुद्धि) के माध्यम से मुक्ति का प्रतीक है।
6. **उपयोग**:
- हार्ट सूत्र का पाठ, ध्यान और जाप बौद्ध अनुयायियों द्वारा किया जाता है, खासकर महायान परंपरा में, जैसे कि ज़ेन, तिब्बती बौद्ध धर्म, और अन्य सम्प्रदायों में।
- यह आत्म-जागरूकता, करुणा और शून्यता की समझ को गहरा करने के लिए प्रयोग होता है।
### संक्षिप्त उद्धरण (संस्कृत से हिंदी अनुवाद):
> "यहाँ, शारिपुत्र, रूप शून्यता है और शून्यता ही रूप है; रूप शून्यता से अलग नहीं है, शून्यता रूप से अलग नहीं है। जो रूप है, वही शून्यता है; जो शून्यता है, वही रूप है।"
### महत्व:
हार्ट सूत्र बौद्ध धर्म के गहन दर्शन को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करता है। यह न केवल बौद्धों के लिए, बल्कि दर्शन, ध्यान और आध्यात्मिकता में रुचि रखने वालों के लिए भी प्रेरणादायक है।
Friday, February 7, 2025
आनापानसति सुत्त भाग-२
आनापानसति सुत्त जारी भाग-२,
आनापानसति-विधि !
118. आनापानसति-सुत्त
- उपरि-पण्णासक-
(मज्झिमनिकाय)
-आनापानसति-विधि-
🌳
" भिक्खुओं !
किस प्रकार भावना=बहुलीकरण करने पर, आनापानसति महाफलप्रद=महानृशंस्य होती है?—
🔹
भिक्खुओं !
भिक्खु अरण्य, वृक्ष-मूल या शून्यागार में बैठता है, आसन मार, काया को सीधा रख, सति (=स्मृति) को सन्मुख, उपस्थित कर,
वह स्मृतिपूर्वक श्वास लेता है,
स्मृतिपूर्वक श्वास छोड़ता है।
🔹
दीर्घ श्वास लेते समय—‘दीर्घ श्वास ले रहा हूँ’—जानता है।
दीर्घ श्वास छोडते समय—‘दीर्घ श्वास छोड़ रहा हूँ’—जानता है। -१
🔹
ह्रस्व-श्वास लेते समय—‘ह्रस्व श्वास ले रहा हूँ’—जानता है।
ह्रस्व-श्वास छोडते समय—‘ह्रस्व श्वास छोड़ रहा हूँ’—जानता है। -२
🔹
सारी काया (की स्थिति) को अनुभव करते श्वास लूँगा—सीखता है।
सारी काया (की स्थिति) को अनुभव करते श्वास छोडूँगा—सीखता (=अभ्यास करता) है। -३
🔹
कायिक संस्कारों (=हर्कतों, क्रियाओं) को रोक कर श्वास लूँगा—अभ्यास करता है।
कायिक संस्कारों (=हर्कतों, क्रियाओं) को रोक कर श्वास छोडूँगा—अभ्यास करता है। -४
🔹
प्रीति-अनुभव करते आश्वास (=श्वास लेना) लूँगा—अभ्यास करता है।
प्रीति-अनुभव करते प्रश्वास (=श्वास छोडना) छोडूँगा—अभ्यास करता है। -५
🔹
सुख-अनुभव करते आश्वास (=श्वास लेना) लूँगा—अभ्यास करता है।
सुख-अनुभव करते प्रश्वास (=श्वास छोडना) छोडूँगा—अभ्यास करता है। -६
🔹
चित्त-संस्कारों (=चित्त की क्रियाओं) को अनुभव करते आश्वास लूँगा’— अभ्यास करता है।
चित्त-संस्कारों (=चित्त की क्रियाओं) प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -७
🔹
चित्त-संस्कार को रोक कर आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
चित्त-संस्कार को रोक कर प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -८
🔹
चित्त को अनुभव करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
चित्त को अनुभव करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -९
🔹
चित्त् को प्रमुदित करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
चित्त् को प्रमुदित करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१०
🔹
चित्त को समाहित करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
चित्त को समाहित करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -११
🔹
चित्त को विमुक्त करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
चित्त को विमुक्त करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१२
🔹
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) अनित्य (होने) का ख्याल करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) अनित्य (होने) का ख्याल करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१३
🔹
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) विराग का ख्याल करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) विराग का ख्याल करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१४
🔹
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) निरोध का ख्याल करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) निरोध का ख्याल करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१५
🔹
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) प्रतिनिस्सर्ग (=त्याग) का ख्याल करते आश्वास लूँगा— अभ्यास करता है।
(सभी वस्तुओं/धर्मों के) प्रतिनिस्सर्ग (=त्याग) का ख्याल करते प्रश्वास छोडूँगा— अभ्यास करता है। -१६
🛞
भिक्खुओं !
इस प्रकार भावित=बहुलीकृत आनापानसति महाफलप्रद=महानृशंस होती है। "
- सुत्त जारी
- श्रंखला जारी
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आनापानसति-सुत्त
उपोसथ-दिवस,
पवारणा-दिवस,
कठिन-चीवर-दान-दिवस व
वस्सावास-समाप्ति-दिवस पर भगवान् बुद्ध द्वारा प्रतिपादित सबसे महत्वपूर्ण सुत्त - आनापानसति-सुत्त
(बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम इसी आनापान-सति-भावना के द्वारा अरहत्व व बुद्धत्व को प्राप्त हुए थे)।
118. आनापानसति-सुत्त
- उपरि-पण्णासक-
(मज्झिमनिकाय)
{कौमुदी (=चाँदनी; कार्तिक-पूर्णिमा) चातुर्मासी}
🙏
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् ,
आयुष्मान् सारिपुत्र,
आयुष्मान् महामौद्गल्यायन,
आयुष्मान् महाकाश्यप,
आयुष्मान् महाकात्यायन,
आयुष्मान् महाकोट्ठित (=कोष्ठिल),
आयुष्मान् महाकप्पिन,
आयुष्मान् महाचुन्द,
आयुष्मान् अनुरूद्ध,
आयुष्मान् रेवत,
आयुष्मान् आनन्द, और दूसरे अभिज्ञात (=प्रसिद्ध) अभिज्ञात स्थविर श्रावको के साथ श्रावस्ती, मृगारमाता के प्रासाद, पूर्वाराम में विहार करते थे।
🌀
उस समय स्थविर (=वृद्ध) भिक्खु नये भिक्खुओं को उपदेश=अनुशासन करत थे।
🌀
कोई कोई स्थविर भिक्खु दस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
🌀
कोई कोई स्थविर भिक्खु बीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
🌀
कोई कोई स्थविर भिक्खु तीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
🌀
कोई कोई स्थविर भिक्खु चालीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
🎯
स्थविर भिक्खुओं द्वारा उपदेशित=अनुशासित हो, वह नये भिक्खु अच्छी तरह (=उदारं) पूर्व के बाद पीछे आने वाले (विषय) को समझते थे।
🎯
उस समय, उपोसथ को पंचदशी प्रवारणा की पूर्णिमा (कार्तिक-पूर्णिमा) की रात को,
भगवान् भिक्खु संघ से घिरे खुली जगह में बैठे थे।
तब भगवान् ने चुपचाप (बैठे) भिक्खु संघ को देखकर, भिक्खुओं को संबोधित किया—
🌳
“भिक्खुओं !
मैने इस प्रतिपद् (=मार्ग) के लिये उद्योग किया है,
इस प्रतिपद के लिये मैं उद्योग-युक्त-चित्त वाला रहा हूँ।
इसलिये भिक्खुओं !
संतुष्ट (=सोमत्त) हो,
अप्राप्त की प्राप्ति=अनधिगत के अधिगत,
न-साक्षात्कार किये के साक्षात्कार के लिये और भी उद्योग (=वीर्यारम्भ) करो।
🌳
भिक्खुओं !
यहीं श्रावस्ती में मैं कौमुदी (=चाँदनी; कार्तिक-पूर्णिमा) चातुर्मासी को बिताऊँगा।”
🌀
जनपदवासी (=देहात के) भिक्खुओं ने सुना, कि ,-
भगवान् कौमुदी चातुर्मासी (=कार्तिक-पूर्णिमा) को श्रावस्ती में बितावेंगे।
तब जनपदवासी भिक्खु भगवान् के दर्शन के लिये श्रावस्ती में आने लगे।
🌀
वह स्थविर भिक्खु और भी सन्तुष्ट हो नये भिक्खुओं को उपदेश=अनुशासन करते।
कोई कोई स्थविर भिक्खु दस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
कोई कोई स्थविर भिक्खु बीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
कोई कोई स्थविर भिक्खु तीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
कोई कोई स्थविर भिक्खु चालीस भिक्खुओं को भी उपदेश=अनुशासन करते थे;
🎯
स्थविर भिक्खुओं द्वारा उपदेशित=अनुशासित हो, वह नये भिक्खु अच्छी तरह (=उदारं) पूर्व के बाद पीछे आने वाले (विषय) को समझते थे।
उस समय उपोसथ को पंचदशी पूर्णा चातुर्मासी कौमुदी पूर्णिमा की रात को भगवान् भिक्खु-संघ से घिरे खुली जगह में बैठे थे।
तब भगवान् ने चुपचाप (बैठे) भिक्खु-संघ को देख कर, भिक्खुओं को संबोधित किया —
- भिक्खु-संघ -
(२४ गुणधर्म)
🌳
“भिक्खुओं !
यह परिषद् प्रलाप (=शोर-गुल) रहित है (=निष्प्रलाप्य है,
भिक्खुओं !
यह परिषद् सार में प्रतिष्ठित है, शुद्ध है यह परिषद्;
उस प्रकार का, भिक्खुओं ! यह भिक्खु-संघ है।
उस प्रकार की, भिक्खुओं ! यह परिषद् है। (१)
🌀
भिक्खुओं !
ऐस भगवतो सावक-संघो (इस प्रकार की यह परिषद् )
🔸आहुनेय्यो, (=सत्कार के योग्य)
🔸पाहुनेय्यो, (=अतिथित्य के योग्य)
🔸दक्खिणेय्यो, (=दान-देने के योग्य)
🔸अण्जलि-करणियो, (=हाथ जोडने योग्य)
🔸अनुत्तरं पुण्णक्खेत्तं लोकस्सा'ति (=लोक में पुण्य के (बोने) का अनुपम क्षेत्र (खेत) है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (२)
🌀
भिक्खुओं !
जैसी परिषद् को थोडा देने पर बहुत (फल) हाता है;
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है,
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (३)
🌀
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार की परिषद् है;
जैसी परिषद् को बहुत (दान) देने पर बहुत (फल) होता है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (४)
🌀
भिक्खुओं !
जिस प्रकार (की परिषद्) का लोगो को दर्शन भी दुर्लभ है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (५)
🌀
भिक्खुओं !
जिस प्रकार (की परिषद्) को योजनों दूर होने पर (पाथेय की) पोटली बाँधकर भी जाना योग्य है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (६)
-चत्तारि-अरिय-पूरिस-पुग्गला-संघ-
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में -
🔸आसव-खय (आश्रव-क्षय) किये,
🔸 संसार-चक्र (भव-चक्र) को तोड़ चुके (=भव-संस्करण मुक्त),
🔸कृतकृत्य,
🔸भारमुक्त,
🔸सद्-अर्थ (=निर्वाण) को प्राप्त,
🔸संयोजन (=भव-बंधन) मुक्त,
🔸सम्यग-ज्ञान द्वारा मुक्त (=अर्हत् भिक्खु) है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (७)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में ऐसे भिक्खु है, जो -
🔸पाँच अवर-भागीय-संयोजनों के क्षय से,
🔸औपपातिक (=देव) हो वहाँ (शुद्धावास-लोक में) निर्वाण प्राप्त करने वाले,
🔸उस लोक में यहाँ न आने वाले (=अनागामी) है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (८)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में ऐसे भिक्खु हैं, जो -
🔸तीन संयोजनो के क्षय से व राग-द्वेष-मोह के निर्बल (=तनु) हो जाने से सकृदागामी (=सकदागामी) हैं,
🔸(वह) एक ही बार (और) इस लोक में आकर दुख का अन्त करेंगे।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (९)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸तीन संयोजनों के क्षय से स्रोतआपन्न (=सोत-आपन्न),
🔸(निर्वाण-मार्ग से) न पतित होने वाले,
🔸नियत (=निश्चित), सम्बोधिपरायण (=परमज्ञान को प्राप्त करने वाले) है।
🔸(वह) सात ही बार (और) इस लोक में आकर दुख का अन्त करेंगे।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१०)
-37 बोधि-पक्खिय-भावित-संघ-
(4+4+4+5+5+7+8=37)
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भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸चारों स्मृति-प्रस्थान की भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (११)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸चार सम्यक्-प्रधानों की भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१२)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸चार ऋद्धिपादों भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१३)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸पाँच इन्द्रियों भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१४)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸पाँच बलों भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१५)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸सात बोध्यंगों कि भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१६)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸आर्य-अष्टांगिक मार्ग भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१७)
-ब्रह्मविहारी-संघ-
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भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸मैत्री-भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१८)
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भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸करूणा-भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (१९)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸मुदिता-भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (२०)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸उपेक्षा-भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (२१)
-असुभ-अनिच्च-भावित-संघ-
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भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸अशुभ-भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (२२)
🌀
भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸अनित्य-संज्ञा में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है। (२३)
-आनापानसति-भावित-संघ-
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भिक्खुओं !
इस भिक्खु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्खु हैं, जो -
🔸अनापान-सति भावना में तत्पर हो विहरते है।
भिक्खुओं !
(यह) उस प्रकार का भिक्खु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है।' (२४)
-आनापानसति-महाफलप्रद-
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“भिक्खुओं !
(कैसी) अनापानसति की भावना करने पर, (अनापानसति अभ्यास को) बढाने पर महाफलप्रद=महानृशंस्य होती है।
(१)
भिक्खुओं !
भिक्खु, अनापानसति की भावना=बहुलीकरण करने पर -
🔸चार स्मृति-प्रस्थानों (चत्तारो-सति-पट्ठान) को परिपूर्ण करता है।
(२)
फिर भिक्खुओं!
भिक्खु, चार स्मृति-प्रस्थान (चत्तारो-सति-पट्ठान) के बहुलीकृत होने पर -
🔸सात बोध्यंगों (सत्त-बोज्झंग) को परिपूर्ण करता है।
(३)
और फिर भिक्खुओं!
भिक्खु, सात बोध्यंगों (सत्त-बोज्झंग) को परिपूर्ण करने पर -
🔸विज्जा (विद्या) और विमुक्ति (विमुक्ति) को परिपूर्ण करता है।"
- सुत्त जारी
टिप्पणी -
1. अनापानसति से चत्तारो-सति-पट्ठान,
2. चत्तारो-सति-पट्ठान से सत्त-बोज्झंग,
3. सत्त-बोज्झंग से विज्जा-विमुत्ति।
- श्रंखला जारी
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Sunday, September 1, 2024
धम्म क्या है ?
आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान तिब्बत में प्रवास कर रहे थे। वे सिद्ध अतीशा के नाम से अधिक सुविख्यात है। विक्रमशिला विश्वविद्यालय के वे महास्थविर थे। तिब्बत के सम्राट ल्ह लामा येशे होद द्वारा सन् 1042 में उन्हें श्रद्धापूर्वक तिब्बत आमंत्रित किया गया था।
आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान एक विहार में प्रवास कर रहे थे। उन्होंने देखा, एक भिक्षु प्रतिदिन आता है और स्तूप की परिक्रमा करता है। एक दिन उन्होंने उसको बुलाया और कहा-स्तूप की परिक्रमा करना ठीक है लेकिन अच्छा होता कि तुम धम्म करते।भिक्षु ने सोचा कि शायद महास्थविर मुझे सूत्रपाठ के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अगले दिन से भिक्षु स्तूप के सामने आसन बिछा कर बैठता और धम्म सूत्रों का पाठ करता।
सिद्ध अतीशा ने उसे एक दिन फिर बुलाया और कहा-सूत्रों का पाठ करना मंगलमय है लेकिन अच्छा होता कि तुम धम्म का अभ्यास करते।
भिक्षु ने फिर मनन किया कि शायद भारत से आए यह आचार्य प्रवर मुझे ध्यान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अगले दिन से स्तूप के सामने आसन बिछा कर वह ध्यान भावना करने लगा।
ध्यान कर जब वह जाने लगा तो दीपंकर श्रीज्ञान ने उसे फिर बुलाया, कहा-ध्यान करना श्रेष्ठ है लेकिन धम्म का पालन करना सर्वश्रेष्ठ है।
भिक्षु का ज्ञान जवाब दे गया। उसने सिद्ध अतीशा के सामने सिर झुका कर समर्पण कर दिया और विनयपूर्वक पूछा हे महास्थविर। आप ही बताएँ कि धम्म करना क्या है? स्तूप की परिक्रमा करना, सूत्र पाठ करना, ध्यान करना धम्म का पालन नहीं है तो धम्म का पालन क्या है?
आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान ने कहा-मन के विकारों का परित्याग करना धम्म का अभ्यास है, आसक्तियों और तृष्णाओं से मन को मुक्त करने का यत्न करना धम्म का पालन है...।
भिक्षु को समझ में आया कि धम्म करना अर्थात मन को विकार मुक्त करने का यत्न करना है।
Sunday, April 7, 2024
एक महान भिक्षु की कथा || कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा
Saturday, April 6, 2024
पराभव सुत्त - इन्सान के पतन के कारणॊं के लिये भगवान् बुद्ध के 12 अनमोल प्रवचन
पराभव सुत्त - इन्सान के पतन के कारणॊं के लिये भगवान् बुद्ध के 12 अनमोल प्रवचन
1. धम्म की कामना करनेवाले की उन्नति होती हैं, तो धम्म से द्वेष करने वाले का पराभव होता है ।
2. जिसे अच्छे लोग अप्रिय लगते हो एवं बुरे लोग प्रिय लगते हो, अशांति वाले धर्म ही जिसे प्रिय हो उसका पराभव होता है ।
3. जो निद्रालु हो, वाचाल हो, निरुद्योगी हो, आलसी हो, क्रोधी हो उसका पराभव होता है ।
4. विपुल सामग्री होने पर भी जो अपने बूढ़े माता पिता का भरण पोषण नहीं करता उसका पराभव होता है ।
5. जो (शील, समाधी, प्रज्ञा में प्रतिष्ठित) श्रेष्ठ पुरुष, श्रमण या अन्य आरण्यक वासी को झूठ बोलकर ठगता है उसका पराभव होता है ।
6. जिसके पास बहुत सारा धन -धान्य होने के होने बावजूद भी केवल वही अकेला उसका उपभोग करता है तो उसका पराभव होता है ।
7. जिसे अपनी जाती का, धन का, गोत्र का अभिमान हैं और इसी भाव में रहकर वह अपने भाई बन्धुओं को तिरस्कृत करता है – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
8.जो व्यक्ति स्त्रियों के पीछे भागता रहता है , शराबी तथा जुआरी है , कमाये हुये धन को फ़िजूल मे खर्च कर देता है –उसकी अवनति का कारण निशचित है ।
9. जो व्यक्ति अपनी पत्नी से असन्तुष्ट रह्ता है तथा वेशयाओं और पराई स्त्रियों के साथ दिखाई देता है – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
10. यौवन समाप्त होने पर जब व्यक्ति नवयुवती को लाता है तो उसकी ईर्ष्या के कारण वह नही सो सकता – यह उसकी अवनति का मुख्य कारण है ।
11. किसी उडाऊ एवं खर्चीली स्त्री या पुरुष को जो धन का रखवाला बना देता है, उसका पराभव होता है ।
12. उत्तम कुल मे उत्पन्न तथा अति मह्त्वाकांक्षी , अल्प सम्पति साधन वाला पुरुष जब राज्य की कामना करता है तो उसका पराभव होता है ।
Thursday, March 28, 2024
जेन स्टोरी : टूटा हुआ कप
जेन स्टोरी
चीन के एक बौद्ध भिक्षु को उनके एक शिष्य ने बहुत ही सुन्दर क्रिस्टल कप उपहार दिया , वह उस शिष्य का बहुत आभारी था। वह उस क्रिस्टल कप से हमेशा चाय पीता रहता है , वह इस क्रिस्टल कप को हर आने - जाने को दिखता है और उन्हें अपने छात्र के बारे में बताया करता ,
हर सुबह, वह बौद्ध भिक्षु कुछ सेकंड के लिए कप अपने हाथ में लेकर खुद से कहता " यह कप पहले ही टूट गया है "
Monday, March 25, 2024
।।होली बनाम फाल्गुन पूर्णिमा।।
।।होली बनाम फाल्गुन पूर्णिमा।।
-राजेश चन्द्रा
भगवान बुद्ध के समय में भी आज की होली जैसा एक उत्सव होता था जिसमें सप्ताह भर तक लोग एक दूसरे पर धूल, कीचड़, गोबर, रंग फेकते और मलते थे तथा ऊंचे स्वर में अपशब्दों का प्रयोग करते थे।
प्रसंग खुद्दक निकाय के धम्मपद अट्टकथा के अप्पमाद वग्गो में है।
भगवान कोशल राज्य की राजधानी श्रावस्ती के जेतवन में वर्षावास कर रहे थे। इस उत्सव के कारण श्रद्धालु उपासक-उपासिकाओं ने भगवान से निवेदन किया कि आप जेतवन के बाहर न निकलिए, हम लोग आप सहित संघ के लिए भोजन जेतवन में ही पहुंचा देगें।श्रद्धालु उपासक-उपासिकाओं ने क्रम से आपस में धम्म सेवा लगा कर एक सप्ताह तक बुद्ध प्रमुख संघ को जेतवन के विहार में भोजनदान किया।एक सप्ताह के उपरांत भगवान संघ के साथ पिण्डपात के लिए जेतवन विहार के बाहर निकले तथा उपासकों-उपासिकाओं ने बुद्ध प्रमुख संघ को महादान कर पुण्यलाभ किया।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपनी व्यथा व्यक्त की:"भगवान, यह सात दिन हमारे लिए बड़े कष्ट में बीते।मूर्खों द्वारा प्रयुक्त असभ्य-अपशब्द सुन-सुन कर हमारे कान फटे जाते थे। उन्हें किसी की लज्जा या संकोच ही नहीं था।इसीलिए आप श्रीमान से हमलोगों ने नगर में न निकलने का अनुरोध किया था।"
भगवान ने श्रद्धालुओं का अनुमोदन करते हुए कहा:
"मूर्खों के कर्म ऐसे ही होते हैं। मेधावीजन अप्रमाद की रक्षा करते हैं।"
यह कह कर भगवान ने गाथा का संगायन किया:
"पमादमनुयुंजन्ति बाला दुम्मेधिनो जना।
अप्पमादं च मेधावी, धनं सेट्ठं व रक्खति।।
- मूर्ख-दुर्बुद्धि प्रमाद करते हैं।मेधावी पुरुष श्रेष्ठ धन की तरह अप्रमाद की रक्षा करते हैं।"
इस प्रकार वर्तमान में प्रचलित होली को बौद्ध पर्व सिद्ध करना अन्यथा चेष्टा ही कहा जाएगा लेकिन फाल्गुन पूर्णिमा का भगवान बुद्ध और बौद्धों से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। लेकिन वे इस पूर्णिमा को होली के जैसा नहीं मनाते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भगवान कपिलवस्तु पधारे थे। इसी पूर्णिमा के दिन राहुल की दीक्षा हुई थी। इसी पूर्णिमा के दिन मान्यआनन्द, महाप्रजापति गौतमी की दीक्षा हुई थी। इसी पूर्णिमा के दिन पहली बार चीनी भाषा में धम्मपद का अनुवाद हुआ था, सन् 823 में। इस प्रकार फाल्गुन पूर्णिमा के साथ बहुत-सी बौद्ध घटनाएं जुड़ी हैं। इस दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाऐं उपोसथ धारण करते हैं।
संक्षेप में, उपोसथ के दिन उपासक-उपासिकाएं भिक्खु-भिक्खुनियों जैसी दिनचर्या जीते हैं।
• सुबह बुद्ध पूजा, तिरतन वन्दना, ध्यान करते हैं।
• भिक्खु अथवा भिक्खुनी या संघ के दर्शन करते हैं, उन्हें यथासामर्थ्य भोजनदान व अन्य दान करते हैं
• दोपहर के पहले भोजन करते हैं
• सायंकाल भोजन नहीं करते। यदि बीमार, वृद्ध या गर्भवती है तो सायंकाल न चबाने वाला भोजन जैसे फलों का रस, गीली खिचड़ी(यवागू) ले सकते हैं।
• शाम को भी ध्यान, बुद्ध पूजा, धम्म ग्रन्थ का पाठ, परित्त पाठ करते हैं
• रात में ऊँचे आसन पर नहीं सोते
• ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं
• ऐसे उपोसथ को भगवान ने महान फल वाला बताया है।
बौद्धगण फाल्गुन पूर्णिमा ऐसे मनाते हैं।
Sunday, March 24, 2024
🌹फागुन पूर्णिमा का महत्त्व🌹
🌹फागुन पूर्णिमा का महत्त्व🌹
🌷
1.सम्यक संबोधी के बाद प्रथम राजग्रह आगमन पर धम्मसेनापति सारिपुत्त उपतिस्स
व कोलित मोग्गलान का संघ में प्रवेश ।
🌷
2.अपने पिता शुद्धोधन के आग्रह पर 20000 अर्हत मित्रों के साथ तथागत ने प्रथम बार कपिलवस्तु में प्रवेश किया।
🌷
3.तथागत ने आनंद को धम्मदीक्षा दी।
🌷
4.प्रथम बौद्ध संगीति समाप्त हुई।
🌷
5.पहली बार चीनी भाषा में धम्मपद का अनुवाद हुआ, 823 में।
Sunday, March 10, 2024
🌹करणीयमेत्त सुत्त🌹 'मेत्ता सुत्त'
🌹करणीयमेत्त सुत्त🌹
करणीयमेत्त सुत्त, जिसे 'मेत्ता सुत्त' भी कहा जाता है, बौद्ध धर्म के पालि कैनन में एक प्रसिद्ध सुत्त है। इसमें मेत्ता या मैत्री भावना (प्रेमपूर्ण करुणा) के अभ्यास का वर्णन है, जो सभी प्राणियों के प्रति अच्छी इच्छाओं का भाव है। इस सुत्त में उन गुणों और क्रियाओं का वर्णन है जो एक व्यक्ति को अपनाना चाहिए ताकि वह मेत्ता का अभ्यास कर सके और अंततः शांति और सुख प्राप्त कर सके¹। यह सुत्त बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है और इसका अभ्यास विश्व भर के बौद्ध अनुयायियों द्वारा किया जाता है।
🌹जिसके प्रभाव से यक्ष अपना भीषण भयरूप नहीं दिखा सकते और जिसका बिना थके दिन-रात अभ्यास करने से सोया हुआ सुख की नींद सोता है, तथा सोया हुआ व्यक्ति कोई दुःस्वप्न (पाप) नहीं देखता है इत्यादि, इस प्रकार के गुणों से युक्त उस परित्राण को कह रहे हैं :----
🌹[जिसे अपना कुशल करना है, स्वार्थ साधना है और परम-पद निर्वाण उपलब्ध करना है, उसे चाहिए कि वह सुयोग्य बने, सरल बने, अति सरल बने, सुभाषी बने, मृदु-स्वभाव वाला बने और निरभिमानी बने॥1॥]🌹
🌹[वह सदा संतुष्ट रहे। थोड़े में अपना पोषण करे। अल्पकृत्य रहे - यानी दीर्घ-सूत्री योजनाओं में न उलझा रहे। सादगी का जीवन अपनाए। शांत इंद्रिय बने। परिपक्व प्रज्ञावान बने। अप्रगल्भ बने, यानी दुस्साहसी न हो और न ही जाति-कुल के मिथ्याभिमान में अनुरक्त हो॥2॥]🌹
🌹[वह यत्किंचित भी दुराचरण न करे, जिसके कारण अन्य विज्ञजन उसे बुरा कहें। वह अपने मन में सदैव यही भावना करे- “सारे प्राणी सुखी हों! निर्भय सक्षम हों! आत्म-सुख-लाभी हों!॥3॥"]🌹
🌹[“वे प्राणी चाहे स्थावर हों या जंगम, दीर्घ देहधारी हों या महान देहधारी, मध्यम देहधारी हों या ह्रस्व देहधारी, सूक्ष्म देहधारी हों या स्थूल देहधारी॥4॥]🌹
🌹[दृश्य हों या अदृश्य, सुदूरवासी हों या अदूरवासी, जन्में हों या अजन्में, बिना भेद के सभी प्राणी आत्म-सुख-लाभी हों!"॥5॥]🌹
🌹[“वे परस्पर प्रवंचना न करें, परस्पर अवमान-अपमान न करें, क्रोध या वैमनस्य के वशीभूत होकर एक-दूसरे के दुःख की कामना न करें"॥6॥]🌹
🌹[जिस प्रकार जीवन की भी बाजी लगाकर मां अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है, उसी प्रकार वह भी समस्त प्राणियों के प्रति अपने मन में अपरिमित मैत्रीभाव बढ़ाए॥7॥]🌹
🌹[वह अपने अंतर की अपरिमित मैत्री-भावना ऊपर-नीचे और आड़े-तिरछे समस्त लोकों में व्याप्त कर ले- बिना किसी बाधा के, बिना किसी बैर के, बिना किसी द्रोह के॥8॥]🌹
🌹[जब तक निद्रा के अधीन नहीं हैं तब तक खड़े, बैठे या लेटे हर अवस्था में इस अपरिमित मैत्री-भावना की जागरूकता को अधिष्ठित रखे, कायम रखे। इसे ही तो भगवान ने ब्रह्म-विहार कहा है॥9॥]🌹
🌹[इस प्रकार मैत्री ब्रह्म-विहार करने वाला साधक कभी दार्शनिक उलझनों में नहीं पड़ता। वह शील सम्पन्न और सम्यक-दर्शन सम्पन्न हो जाता है। काम-तृष्णा का सम्पूर्ण उच्छेद कर लेता है और पुनः गर्भ-शयन [पुनर्जन्म] के दुःख से नितांत विमुक्ति पा लेता है॥10॥]🌹
🌹पुस्तक: धम्म-वंदना।
विपश्यना विशोधन विन्यास॥🌹
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
Saturday, March 9, 2024
सत्य घटना पर आधारित: मगध के सम्राट अजातशत्रु और महामात्य कुलगुरु राक्षस के बीच हुआ एक प्रेरक संवाद
सत्य घटना पर आधारित: मगध के सम्राट अजातशत्रु और महामात्य कुलगुरु राक्षस के बीच हुआ एक प्रेरक संवाद
एक बार महामात्य राक्षस एक लंबी यात्रा के बाद जब मगध वापस लौटकर सम्राट से मिलने पहुँचे तो उन्हें जानकारी मिली कि बुद्ध के घोर दुश्मन सम्राट अजातशत्रु अब स्वयं बुद्ध के अनुयायी बन गये हैं। यह सुनकर ब्राह्मण महामात्य राक्षस बहुत परेशान हो गये। वे सीधे सम्राट अजातशत्रु से मिलने राजदरबार जा पहुँचे। वहाँ उनके और सम्राट अजातशत्रु के बीच जो संवाद हुआ उसे जानिए।
महामात्य राक्षस: सम्राट, मैं यह क्या सुन रहा हूँ कि आप अपने क्षत्रिय धर्म को कैसे त्याग कर बुद्ध के अनुयायी बन गये हैं?
सम्राट अजातशत्रु: आप सही सुन रहे हैं, महामात्य राक्षस।
महामात्य राक्षस: यह तो घोर अनर्थ हो गया महाराज।
सम्राट अजातशत्रु: कैसे, महामात्य राक्षस?
ब्रामहामात्य राक्षस: अच्छा होता यदि में यात्रा पर ना जाता। आप ऐसा घनघोर अनर्थ कैसे कर सकते हैं? क्षत्रिय धर्म ही आपके लिये सर्वोपरि है उसे आप कैसे छोड़ सकते हैं? आपका कर्तव्य है कि मगध की सीमाएँ बढ़ायें और चक्रवर्ती सम्राट बनें।
सम्राट अजातशत्रु: मैं अपना कर्तव्य भली भांति जानता हूँ, कुलगुरु।
महामात्य राक्षस: लगता है बुद्ध ने आपको भी आपके पिता सम्राट बिंबसार की भाँति भ्रमित कर दिया है। बुद्ध के पास कोई सम्मोहन शक्ति है जिसके उपयोग से उसने आपके पिता को भी इसी तरह भ्रमित कर दिया था।
सम्राट अजातशत्रु: महामात्य, कृपया कर बुद्ध पर झूठे लांछन ना लगाएं।
महामात्य राक्षस: महाराज? मैं सत्य कह रहा हूँ। बुद्ध ने आज तक सिर्फ़ ऐसी बातें कही हैं। जिससे राज्य में अनेकों प्रश्न उठ रहे हैं। परंतु किसी का भी उत्तर नहीं मिला।
सम्राट अजातशत्रु: जैसे की क्या? कुछ उदाहरण देकर बतलाइए।
महामात्य राक्षस: जैसे कि, ये संसार शाश्वत है या नश्वर। यह सृष्टि सीमित है अथवा अनंत। शरीर आत्मा दो हैं या एक? मृत्यु के पश्चात, हमारा अस्तित्व रहता है या उसका विनाश हो जाता है?
सम्राट अजातशत्रु: मैं इन किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगा, कुलगुरु महामात्य। ये सब आपकी बुद्धि की उपज है। बुद्ध ने कभी भी अपने उपदेशों में इन बातों को कभी ज़रा भी तूल नहीं देते हैं।
महामात्य राक्षस: यदि इन शाश्वत प्रश्नों का उत्तर बुद्ध के पास से तो नहीं है तो वो किस विषय पर उपदेश देते हैं? उनके प्रवचनों का हमें क्या लाभ?
सम्राट अजातशत्रु: बुद्ध कहते हैं कि अपने शरीर और अपनी साँसों को साधो, उससे अपने अंतर्मन को तोड़ती-मरोड़ती विभिन्न भावनाओं को समझो। अपने दुख: और संताप पर विजय पाओ। जीवन की छोटी छोटी अनेक लहरों के थपेड़ों में सजग और ध्यानपूर्ण जियो। बुद्ध, जीवन से मुँह मोड़ने को नहीं कहते, चेतना से जीने को कहते हैं। कुलगुरु, जीवन इन्हीं छोटी छोटी बातों का मूल्य रत्नकोष है। ना की बड़ी सैद्धांतिक बातों का।
महामात्य राक्षस: सम्राट छोटे-छोटे लोग इन्हीं छोटी-छोटी खुशियों के साथ जीते हैं परंतु आप तो मगध सम्राट हैं! आप का स्तर, इस मगध में सबसे सबसे ऊपर है।
सम्राट अजातशत्रु: कुलगुरु, यह ऊपर और नीचे के स्तर का विचार भी मनुष्य बुद्धि की उपज ही है।
महामात्य राक्षस: लगता है, महाराज आप विनाश की ओर जा रहे हैं। एक क्षत्रिय होकर भी ज्ञानियों जैसी बातें कर रहे हैं। आप क्षत्रिय हैं या ब्राह्मण?
सम्राट अजातशत्रु: क्षत्रिय और ब्राह्मण का अंतर भी मनुष्य बुद्धि ने ही पैदा किया है। मुझे बुद्ध के चरणों में शांति मिली है।
महामात्य राक्षस: महाराज, यदि आपको शांति चाहिए तो मैं इसके उपाय आपको बता सकता। सम्राट अजातशत्रु: आपसे मुझे आज तक केवल अशांति ही मिली है कुलकुरु। आप क्या मुझे शांति देंगे? आपकी बातों में आकर मैं अपने धर्मपरायण पिता की हत्या का कारण बना। आँखें बंद करता हूँ तो स्वर्गीय महाराज बिंबसार की प्रेम भरी मूरत टकटकी बांधे मुझे निहारती दिखाई देती है। अब न रातों को नींद आती है, ना दिन को चैन मिलता है।
महामात्य राक्षस: क्षमा करें, महाराज। मैं एक ब्राह्मण हूँ इसलिए सत्य कहने से संकोच नहीं करूँगा। आपके विषाद का कारण पिता की हत्या का पछतावा नहीं बल्कि नगरवधू आम्रपाली का बुद्ध की भिक्षुणी बन जाना है। इस बात से आपको बहुत आघात पहुंचा है।
सम्राट अजातशत्रु: इस बात को सुनते ही सम्राट अजातशत्रु आवेश में आकर अपनी तलवार खींच लेते हैं।
महामात्य राक्षस: सम्राट को म्यान से तलवार खींचते हुआ देख, उपहास पूर्वक कटाक्ष करते हुए कहते हैं। लगता है बुश ने आपको यही (अर्थात् आवेश और उसमे किसी ब्राह्मण अथवा अपने कुलगुरु की हत्या) करना सिखाया है। मगध के लोगों को आप से बहुत सारी आशाएं थीं, परंतु आप तो हमारा ही (एक ब्राह्मण कुलगुरु का) दमन का रहे हैं? चलिए यह भी सही। हम भी इसके लिए तैयार है। यह कहकर महामात्य राक्षस दरबार से चले जाते हैं।
तब सम्राट अजातशत्रु का सेनापति जो उस समय राज दरबार में यह सारा वादविवाद देख और सुन रहा था बहुत आश्चर्य भाव से कह उठता है, महाराज, आप में यह परिवर्तन देखकर मुझे बहुत आश्चर्य है और मैं यह देखकर बहुत हैरान हूँ कि अजातशत्रु की उठी हुई तलवार आज पहली बार म्यान से बाहर निकलने के बाद, बिना वार किए वापस म्यान में कैसे चली गयी?
सम्राट अजातशत्रु: यह सुनकर शत्रु। सो। सम्राट अजातशत्रु। बहुत शांत भाव से कहते हैं। की मुझे। कुल गुरु की हत्या करने में। तनिक संकोच ना होता। मगर यदि मैं ऐसा करता। तो वह मेरे गुरु। भगवान बुद्ध का अपमान होता। बड़े ऊंचे स्वर में बोलकर या मेरी बेइज्जती कर कोई मुझे कितना भी उत्तेजित न कर लें। अब मैं, कभी हिंसा के मार्ग पर नहीं जाऊंगा और उसी मार्ग पर चलूँगा जो मेरे गुरू भगवान बुद्ध मुझे दिखाएंगे।
इस सत्य घटना से आपने क्या ग्रहण किया आप जाने और यदि आप बताना चाहें तो कमेंट बॉक्स में लिख दें जिससे कोई और भी प्रेरणा ले सके। आप सभी का मंगल हो।
साभार : Dr Nirmal Gupta, cardiologist, SGPGI
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