टिकापट्ठान (पट्ठान) का संक्षिप्त सार
https://youtu.be/f-FpIGGPAr4?si=X4zO-ZLoTrijMCUD
पट्ठान अभिधम्म का वह भाग है जो बताता है कि संसार की प्रत्येक घटना किसी न किसी प्रत्यय (कारण, शर्त या स्थिति) पर निर्भर होकर उत्पन्न होती है।
बुद्ध ने कारण-परिणाम की इसी सूक्ष्म श्रृंखला को पूर्ण रूप से देखकर बुद्धत्व प्राप्त किया।
मूल सिद्धांत:
> "इमस्मिं सति इदं होति, इमस्स उप्पादा इदं उप्पज्जति"
(यह होने पर वह होता है; यह उत्पन्न होने पर वह उत्पन्न होता है।)
पट्ठान में 24 प्रकार के प्रत्ययों (Paccaya) का वर्णन है, जो बताते हैं कि घटनाएँ किस प्रकार एक-दूसरे को उत्पन्न, सहारा, प्रेरणा या समर्थन देती हैं।
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24 प्रत्ययों का संक्षिप्त परिचय
1. हेतु-पच्चय (मूल कारण)
लोभ, दोष, मोह तथा अलोभ, अदोष, अमोह जैसे मूल कारणों से चित्त और मानसिक अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं।
2. आरम्मण-पच्चय (आलम्बन कारण)
कोई वस्तु या विषय मन का आधार बनकर चेतना को उत्पन्न करता है।
3. अधिपति-पच्चय (प्रधान कारण)
छन्द (इच्छा), वीर्य, चित्त और विमंसा किसी कार्य को विशेष शक्ति देते हैं।
4-5. अनन्तर एवं समानन्तर-पच्चय
एक चित्त के समाप्त होते ही दूसरा चित्त बिना अंतराल के उत्पन्न होता है।
6. सहजात-पच्चय
जो तत्व एक साथ उत्पन्न होते हैं, वे एक-दूसरे के कारण बनते हैं।
7. अञ्ञमञ्ञ-पच्चय (पारस्परिक कारण)
एक-दूसरे को सहारा देकर साथ-साथ कार्य करना।
8. निस्सय-पच्चय (आश्रय कारण)
एक वस्तु दूसरी के लिए आधार या सहारा बनती है।
9. उपनिस्सय-पच्चय (निर्णायक समर्थन)
कोई परिस्थिति, विचार या वस्तु शक्तिशाली प्रेरक कारण बनती है।
10. पुरेजात-पच्चय
पहले उत्पन्न हुई वस्तु बाद में उत्पन्न होने वाली वस्तु का कारण बनती है।
11. पच्छाजात-पच्चय
बाद में उत्पन्न होने वाली वस्तु पहले उत्पन्न वस्तु का समर्थन करती है।
12. आसेवन-पच्चय
बार-बार दोहराया गया कर्म या अभ्यास अधिक शक्तिशाली बन जाता है।
13. कम्म-पच्चय
कर्म भविष्य के परिणामों का कारण बनते हैं।
14. विपाक-पच्चय
कर्मों के फल (विपाक) आगे की मानसिक अवस्थाओं को प्रभावित करते हैं।
15. आहार-पच्चय
शारीरिक और मानसिक जीवन के लिए पोषण कारण बनता है।
16. इन्द्रिय-पच्चय
इन्द्रियाँ और उनकी शक्ति अनुभवों को जन्म देती हैं।
17. झान-पच्चय
ध्यान के अंग उच्चतर मानसिक अवस्थाओं को उत्पन्न करते हैं।
18. मग्ग-पच्चय
आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा उससे जुड़े तत्व मुक्ति की दिशा में कारण बनते हैं।
19. सम्पयुत्त-पच्चय
जो मानसिक तत्व साथ उत्पन्न होते हैं, वे एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।
20. विप्पयुत्त-पच्चय
अलग होते हुए भी एक-दूसरे को प्रभावित और सहारा देते हैं।
21. अट्ठि-पच्चय (उपस्थिति कारण)
किसी वस्तु की उपस्थिति अन्य घटनाओं के लिए आवश्यक शर्त होती है।
22. नट्ठि-पच्चय (अनुपस्थिति कारण)
किसी वस्तु का अभाव भी दूसरी घटना का कारण बन सकता है।
23. विगत-पच्चय
जो घटना समाप्त हो चुकी है, उसका हटना अगली घटना के लिए अवसर बनता है।
24. अविगत-पच्चय
जो अभी विद्यमान है, वह अन्य घटनाओं को समर्थन देता है।
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निष्कर्ष
पट्ठान का सार यह है कि संसार में कुछ भी स्वतंत्र या बिना कारण के नहीं होता।
हर चित्त, विचार, भावना, कर्म, शरीर और अनुभव अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होकर उत्पन्न होते हैं।
> "सब्बे धम्मा पच्चयसमुत्थिता"
सभी धर्म (घटनाएँ) कारणों और शर्तों से उत्पन्न होते हैं।
यही कारण-कार्य (Cause & Effect) का महान विज्ञान है, जो बौद्ध अभिधम्म का शिखर माना जाता है।
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