Monday, February 9, 2026

ककचूपम सुत्त | क्रोध को कैसे नष्ट करें | आरी की उपमा से बोधि मार्ग | Buddha Teaching in Hindi | (MN-21)

ककचूपम सुत्त | क्रोध को कैसे नष्ट करें | आरी की उपमा से बोधि मार्ग | Buddha Teaching in Hindi | (MN-21)




ककचूपम सुत्त (Kakacūpama Sutta) मज्जिम निकाय का एक अत्यंत गहन और चुनौतीपूर्ण उपदेश है, जिसमें भगवान बुद्ध क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध पर विजय पाने का सर्वोच्च मार्ग बताते हैं। इस सुत्त में बुद्ध एक अत्यंत कठोर उपमा देते हैं — यदि कोई व्यक्ति आपको आरी से भी काटे, तब भी मन में क्रोध या घृणा उत्पन्न न हो।


यह उपदेश केवल नैतिक शिक्षा नहीं है, बल्कि मानसिक अनुशासन, समता (Equanimity), और मैत्री-भावना की चरम साधना है। ककचूपम सुत्त हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारी मानसिक प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण बनती है।

इस वीडियो में आप जानेंगे:

बुद्ध द्वारा क्रोध को जड़ से नष्ट करने की विधि

मैत्री (Loving-Kindness) और करुणा का वास्तविक अभ्यास

कठिन परिस्थितियों में भी मन को स्थिर कैसे रखें

ध्यान और दैनिक जीवन में इस सुत्त की व्यावहारिक उपयोगिता

यदि आप ध्यान, मानसिक शांति, आत्म-नियंत्रण, और बुद्ध की मूल शिक्षाओं में रुचि रखते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए एक गहन साधना-सूत्र सिद्ध होगा।

Wednesday, January 7, 2026

समझ की शुरुआत - अजह्ञान चा

Ajahn Chah (अजान चा) थाईलैंड के एक महान बौद्ध भिक्षु और शिक्षक थे। वे थाई फ़ॉरेस्ट परंपरा के सबसे प्रभावशाली आचार्यों में गिने जाते हैं।

संक्षेप में

जन्म: 1918, थाईलैंड

निर्वाण (देहावसान): 1992

परंपरा: थेरवाद बौद्ध धर्म (Forest Tradition)

उनकी शिक्षा का सार

अनित्यता (सब कुछ बदलता है)

दुःख का कारण आसक्ति है

समाधान: जागरूकता, ध्यान और सीधा अनुभव

Ajahn Chah की खासियत थी—सरल भाषा, रोज़मर्रा के उदाहरण और गहरी स्पष्टता। वे कहते थे:

> “शांति कहीं बाहर नहीं मिलती—वह देखने वाले मन में ही प्रकट होती है।”

उनका प्रभाव

उन्होंने थाईलैंड में कई ध्यान मठ स्थापित किए, जिनमें Wat Nong Pah Pong प्रमुख है।

उनके शिष्यों ने पश्चिम में भी बौद्ध ध्यान को फैलाया।

आज भी उनकी बातें ध्यान, चिंता (anxiety) और बेचैनी से जूझ रहे लोगों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती हैं।

Monday, January 5, 2026

बीमारी से निपटना(Dealing with Disease)

बीमारी से निपटना

(Dealing with Disease)

बीमारी कोई दंड नहीं है —
यह प्रकृति का नियम है।

जिस शरीर का जन्म हुआ है,
उसका बीमार होना स्वाभाविक है।

दर्द शरीर में होता है,
दुःख मन की प्रतिक्रिया से जन्म लेता है।

जब हम डर, घृणा और शिकायत को
सिर्फ़ देखना सीख लेते हैं,
तो दर्द बना रहता है
पर दुःख कम हो जाता है।

इलाज आवश्यक है,
पर उससे आसक्ति नहीं।

बीमारी भी
जागरूकता और बोध का
मार्ग बन सकती है।

“मैं बीमार हूँ” नहीं —
“बीमारी को जाना जा रहा है”
यही मुक्तिदायक दृष्टि है।

— अजहन सुमेधो
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