Sunday, September 14, 2014

बुद्ध धम्म क्या है ?


कहते है कि चीन के सम्राट वू ने विनयपूर्वक आचार्य बोधिध्म्म से जिज्ञ्यासा कि बुद्ध धम्म क्या है ? आचार्य बोधिध्म्म  ने धम्मपद की एक गाथा का संगायन किया :

सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा [कुसलस्सूपसम्पदा (स्या॰)]।

सचित्तपरियोदपनं [सचित्तपरियोदापनं (?)], एतं बुद्धान सासनं॥

सब बुराइयों से दूर रहो ..अच्छाइयाँ पैदा करने की कोशिश करते रहो …मन मस्तिष्क की शुद्ध्ता रखॊ । यही बुद्ध का शासन है अर्थात बुद्ध धम्म है ।

सम्राट वू को बड़ी व्याख्या की उम्मीद थी । इतने संक्षेप में बुद्ध धम्म को सुन कर उसने हैरानी से कहा - बुद्ध धम्म इतना सरल है ? इसे तो पांच वर्ष का बच्चा भी समझ सकता हसी लेकिन अस्सी साल का वृद्ध भी यह दावा नही कर सकता की वह धम्म जीवन जी रहा है ।
बोधिध्म्म के कथन ने  अस्सी वर्षीय सम्राट को धम्म के प्रति अंतर्दृष्टि दी ।

Friday, September 12, 2014

भविष्यवक्ता

All is well

हममे से अधिकतर लोग अपने भविष्य को जानने की उत्सुकता रखते हैं । इसके  लिये हम से कुछ अति शंकालु लोग  भविष्यवक्ताओ और ज्योतिषयों  से समय समय पर मदद लेते रहते हैं । थाइलैंड मे  निवास के दौरान मैने देखा कि भिक्षुओं की भी गिनती भविष्यवक्ताओं के रुप मे भी  होती है । लेकिन व्यवाहारिक रुप से अधिकतर भिक्षु इनसे दूर ही रहना पसंद करते हैं ।

मेरे गुरु अजह्न्ह शाह को कई शक्तियाँ प्राप्त थी । अधिकतर उनकी कही बाते पत्थर में खींची  लकीरो की तरह ही होती । एक दिन अजह्न्ह के एक पुराने शिष्य ने उनसे अपना भविष्य बताने पर जोर दिया । अजह्न्ह ने हमेशा की य्तरह उसको मना किया । लेकिन वह जानेको तैयार नही हुआ । उसने अजहन्ह को याद दिलाया कि उसने कितनी बार उस मठ की मदद की थी और  कितनी बार अपने महत्वपूर्ण कार्यों को छोडकर वह अजन्ह को लेकर जगह –२ घूमा था ।

अजह्न्ह ने जब देखा कि वह टलने वाला नही है तो उन्होने उससे कहा , “ अपना हाथ आगे करो । मै तुम्हारी हाथॊ की लकीरों को देखना चाहता हूँ । “

वह तो बहुत ही हर्ष मे पड गया । लेकिन सबसे मजे की बात यह थी कि अजह्न्ह ने इसके पहले किसी का हाथ कभी भी देखा भी नही था । अजह्न्ह बार अपनी ऊँगलियों को उसकी हथेली पर घुमाते और अपने आप बड्बडाते हुये कहते , “ आशचर्यजनक , अद्‌भुत !! “ बेचारे उनके शिष्य की धड्कने अनुमान लगाने मे लगी रही ।

अजहन्ह ने उसका हाथ देखना समाप्त किया और उससे बोले , “ इस तरह  तुम्हारा भविष्य अब सामने आ गया है और  मैरी भवीष्यवाणी कभी भी गलत नही होती ।  “

“हाँ , हाँ मै भी अपना भविष्य जानना चाहता हूँ कि वह कैसा होगा ?  “ शिष्य ने अधीरता से कहा ।

“ तुम्हारा भविष्य  बहुत ही अनिश्चित है |  “ अजह्न्ह यह कह कर चुप हो गये और उनका प्रिय शिष्य विस्मयपूर्ण नजरों से उनको देखता रह गया  ।

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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this trucload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Predicting the future ” का हिन्दी अनुवाद ।

Tuesday, July 8, 2014

बुद्ध आज भी– ‘ प्रभाकर प्रसन्न की पोस्ट से साभार ’

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घर की छत पर से देखता हूँ तो दूर गृद्धकूट पर्वत पर चमकता राजगृह का शान्ति स्तूप नजर आता है, एक प्राचीन  पंथ की नवनिर्मित कृति. पार्श्व में विद्यमान अपने खंडित इतिहास के गीत गुनगुनाते नालन्दा विश्वविद्यालय के प्राचीन प्रस्तर हृदय को झंकृत कर देते हैं. तरंगित मन में हिलोरें उठती हैं और पूछती हैं कि क्या शान्ति स्तूप  इस खंडित महाकाव्य की एक पंक्ति भी लिख पाया है. निहारता, विचारता छत से नीचे उतर जाता हूँ.

यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि गौतम बुद्ध की शिक्षाओं की प्रासंगिकता वर्तमान में फिर से बढ गई है. आखिर अष्टांगमार्ग को जीवन में उतारा जा ही सकता है.

समतामूलक वर्ग और जाति-विहीन समाज बुद्ध की शिक्षाओं में प्रमुख स्थान रखता है. आज सारा समाज जाति, धर्म, वर्गों में विभक्त है. उस समय भी विभक्त था जब बुद्ध का जन्म हुआ था. पर धम्म ने असर डाला और बहुत हद तक विभाजन रेखा को मिटा कर रख दिया. समय की छाया से कलुषित यह धम्म पुनर्जागृत सनातन धर्म की धार न सह पाया और सदा के लिये अंधकार मे अंक में समा गया. आज पूंजीवादी व उँच-नीच के बंधनो में बंधे समाज को फिर से उसकी आवश्यकता है.

बौद्ध धम्म इस मायने में भी ऐतिहासिक था कि इसने कर्मकाण्ड को एक सिरे से नकार दिया और एक परम आत्मा के मुद्दे पर भी मौन रहा. तत्कालीन ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डी सोंच को यह एक गहरा आघात था. आज भी यह शायद सभी धर्मों को परमात्मा के मुद्दे पर चुनौती प्रस्तुत करता है. क्या फायदा उस परमात्मा की बातें करने का जब हम अष्टांगमार्ग(सम्यक.......) से दूर हों.

विश्व के लगभग सभी धर्मों के जनक/ प्रचारक ने अपने आप को ईश्वर कहा या ईश्वर के निकटतम से खुद को नवाजा और अपनी स्शिक्षा को ईश्वरवाणी. सिर्फ बुद्ध ही ऐसे थे जिन्होने स्वयं को साधारण मनुष्य कहा और संदेश दिया कि तुममे से कोई भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. "आनंद, मैं दूर जा रहा हूँ. मेरे लिए मत रो. मेरे बारे में मत सोचो. मैं चला रहा हूँ. तुम्हारा उद्धार तुम्हारे हाथ में है. मैं तुममे से एक हूँ और तुममे से हरएक बुद्ध बन सकता है. मैं. मैने स्वयं को बनाया है संघर्ष कर बुद्धत्व को प्राप्त करो." यही थे बुद्ध के अंतिम कहे शब्द.

धार्मिक कट्टरता को बुद्ध ने एक सिरे से नकार दिया. बुद्ध के ही शब्दों में-"कोई पुरानी पुस्तक प्रामाणिक मानी जाती हो, फिर भी उसपर विश्वास मत करो. सिर्फ इसलिये ही यकीन मत करो कि तुम्हारे पिता इसपर विश्वास करते है. सिर्फ इसलिये विश्वास मत करो कि दूसरे लोग चाहते हैं कि तुम ऐसा करो. हर चीज़ को को परखो और फिर अपनाओ जब लगे कि यह सबके लिये अच्छा है. " यह बात आज के असहिष्णु समाज के लिये पूरी तरह से उपयुक्त है.

बुद्ध पर लिखने में सालो बीत जायेंगे फिर भी शुरुआत ही होगी. यह कुछ बातें थी जो मुझे आज के भौतिकवादी समाज/ सभ्यता के लिये उपयुक्त लगी. स्वामी विवेकानंद ने इन्हें क्रांतिकारी कहा है और उन्हीं को उद्धृत करते हुये मैं लिखना बंद करता हूँ-" oh, if I had only one drop of that strength! The sanest philosopher the world ever saw."

( श्री प्रभाकर प्रसन्न जी की यह पोस्ट नवभारत टाइम्स के ब्लाग मे ६ नवम्बर २०१२ को छ्पी थी । आप की अनुमति से यह पोस्ट यहाँ शेऐर की जा रही है । )

Saturday, May 24, 2014

श्री स. ना. गोयन्का द्वारा दस दिवसीय विपश्थना ध्यान विधि के विडियो लिंक ( हिन्दी में )

Vipassana Meditation Discourse - Day 03 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०३
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Vipassana Meditation Discourse - Day 04 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०४
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Vipassana Meditation Discourse - Day 05 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०५
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Vipassana Meditation Discourse - Day 06 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०६
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Vipassana Meditation Discourse - Day 07 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०७
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Vipassana Meditation Discourse - Day 08 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में- दिवस ०८
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Vipassana Meditation Discourse - Day 09 (Hindi) विपश्यना प्रवचन हिन्दी में - दिवस ०९
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Vipassana Meditation Discourse - Day 10 (Hindi) [विपश्यना प्रवचन हिन्दी में- दिवस १० ]
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Vipassana Meditation Discourse - Day 11 (Hindi) [विपश्यना प्रवचन हिन्दी में- दिवस ११]
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Vipassana benefit of Dhamma Service

साभार : Avinash Chaudhari





















 

Monday, March 31, 2014

बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण ( गृह त्याग ) का सच ?

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माना  जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध    वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।, यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता , माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे , क्या वह कभी बीमार नही पडे , यह कहानी तर्क संगत नही लगती । हाँलाकि इसको ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के  अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
फ़िर सच क्या है ? आखिर बुद्ध ने गृह त्याग क्यूँ किया ? डा. आंबेडकर ने ’ बुद्ध और उनका धम्म ’ मे इसके बारे मे चर्चा की है ।डा. अम्बेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया है जो अधिक प्रतीत लगता है ।
why buddha leaves the house
स्त्रोत : भगवान्‌ बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अंबेडकर

अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥
अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’
डा, आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे। शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।
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राहुल सांकृत्यायन ने इसी परम्परागत मान्यता के साथ लिखा है कि सिद्धार्थ गौतम ने अपनी पत्नी और बच्चे को सोता हुआ छोड़कर चुपके से गृहत्याग किया था। किन्तु, आंबेडकर इस मान्यता से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, उन्होंने पूरी तरह अपने पिता शुद्धोधन, अपनी माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से सहमति और अनुमति लेकर घर से अभिनिष्क्रमण किया था। राहुल ने सिद्धार्थ की परिवार-विमुखता को गम्भीरता से नहीं लिया, शायद इसलिये कि वे स्वयं भी परिवार-विमुख थे। पर, आंबेडकर ने इसे बहुत गम्भीर प्रश्न माना था। उनकी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति, जो परिवार-विमुख है, समाज-विमुख भी होगा, वह समाज-उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिये आंबेडकर ने इस बात को रेखांकित करना ज्यादा जरूरी समझा कि सिद्धार्थ जैसा जनवादी और जागरूक व्यक्ति परिवार-विमुख कैसे हो सकता है? वह परिवार के सदस्यों को धोखा देकर घर छोड़ ही नहीं सकते थे। इस तरह के विश्वासघात की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती थी। आंबेडकर ने लिखा है कि जब सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु छोड़ा, तो अनोमा नदी तक जनता उनके पीछे-पीछे आयी थी, जिसमें उनके पिता शुद्धोधन और उनकी माता प्रजापति गौतमी भी उपस्थित थे।
कंवल भारती की पुस्तक ’ राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर” ऐसे न जाने कितने ज्वलंत प्रशनों को उठा रही  है। अब यह ब्लाग के माध्यम से पाठकों के लिये पठनीय है । पढें और विचारें :
  1. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग १
  2. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग २
  3. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग ३

Thursday, February 20, 2014

वर्तमान क्षण– ‘तिक न्यात हन्य’

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The present moment contains past and future. The secret of transformation is in the way we handle this very moment.
~Thuch Nhat Hanh ~

वर्तमान क्षण में अतीत और भविष्य दोनों ही  है । यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस वर्तमान  क्षण को कैसे  संभालते हैं ।
~तिक न्यात हन्य~

Thursday, November 28, 2013

भारत बनाम नेपाल – ‘ लुम्बिनी ’ एक दुर्भाग्यपूर्ण विवाद

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                                             लुम्बिनी , नेपाल ( Lumbini , Nepal )
                     photo credit : Gautam Shakya ( चित्र के लिये साभार : श्री गौतम शाक्य )
बुद्ध के जन्म स्थान लुम्बिनी में खुदाई के दौरान आर्कियालॉजिस्टॊं  के हाथ लगे ताजा सबूत अब जब इस इस अनावशयक विवाद पर विराम लगा सकते हैं कि बुद्ध की जन्म स्थली निर्विवाद  रुप से लुंबिनी , नेपाल मे ही है । इससे यह भी पता चलता है कि बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व छठी सदी में हुआ था, ना कि ईसा पूर्व चौथी सदी में जैसा कि कुछ विद्वानों का मानना रहा है।
देखे नेशनल ज्यागराफ़िक  चैनल की एक रिपोर्ट :

आर्कियालॉजिस्ट ने नेपाल के लुम्बिनी में अभी तक के सबसे पुराने बौद्ध मठ की खोज की है जिससे पता चलता है कि बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व छठी सदी में ही हुआ था।
लुंबिनी में पवित्र माया देवी मंदिर में खोदाई के दौरान कई मंदिरों के ईंटों के नीचे ईसा पूर्व छठी सदी की इमारती लकड़ी के ढांचे के अवशेष मिले हैं। रिसर्च टीम की अगुआई करने वाले ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी के रॉबिन कनिंगम ने कहा कि बुद्ध के जीवन से जुड़ी यह पहली आर्कियालॉजिकल चीज है और इस तरह बौद्ध धर्म के एक खास सदी में फलने-फूलने के पहले प्रमाण मिले हैं। लकड़ी का यह ढांचा बीच में खुला हुआ है, जिसका जिक्र बुद्ध से जुड़ी प्राचीन कहानी में भी है। कहानी के मुताबिक, बुद्ध की मां माया देवी लुंबिनी बाग में बुद्ध को जन्म देते समय एक पेड़ की टहनी पकड़े हुए थीं। रिसर्चर्स को लगता है कि लकड़ी के बने मंदिर की खुली जगह में कोई पेड़ रहा होगा। रिसर्च एंटिक्विटी जर्नल में छपी है और इसमें कहा गया है कि रिसर्च से इस बात की पुष्टि हुई है कि मंदिर के बीचोंबीच की खाली जगह में प्राचीन पेड़ का जड़ रहा होगा।
लेकिन क्या यह एक अकेला ही प्रमाण है । नही , ऐसे न जाने कितने प्रमाण उपलब्ध हैं जो यह सिद्ध  करते हैं कि भगवान्‌ बुद्ध का जन्म स्थान लुबंनी , नेपाल मे ही है ।
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                          लुबंनी में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित धम्म स्तम्भ ( photo credit: wikipedia )
कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बुद्ध धम्म स्वीकार किया था । तत्पशचात उन्होने बौद्ध स्थलों की यात्रायें भी की थी । उसी सिलसिले में वे अपने राज्यारोहण के २० वें वर्ष मे भगवान्‌ बुद्ध की जन्म स्थली लुबंनी भी पहुँचे और उन्होने वहां एक धम्म स्तम्भ लगवाया था जिस पर अंकित हुआ था कि यहाँ शाक्य मुनि का जन्म हुआ था । इसके अलावा यहाँ अनेक स्तूप , संघाराम , और विहारों के खण्डहर बिखरे पडॆ हैं ।  इन्ही  खण्डहरों की खुदाई मे गुप्तकालीन प्रतिमा भी  है जिसमें माता महामाया शाल वृक्ष की शाखा पकडे खडी है । बुद्ध जन्म का यह अनूठा दस्तावेज है । लेकिन फ़िर अनजाने यह विवाद क्यूं होता रहा है जिससे दोनों देशों मे इसी मुद्दे को लेकर विशेषकर नेपाल में जन विरोध देखने को अकसर मिल जाता है । भारत मे यह बात कम ही दिखती है लेकिन शायद नेपाल के लिये यह अस्मिता का प्रशन है जिससे वहाँ जन विरोधी भावनाओं की लहर अकसर देखी जा सकती है ।

भारत-  नेपाल ’लुम्बिनी ’ विवाद की जड :

सम्यक्‌ प्रकाशन से प्रकाशित , ' मधुकर पिपलायन की पुस्तक ‘ भगवान बुद्ध की जन्मस्थली , लुम्बिनी ’  इस विषय मे काफ़ी कुछ प्रकाश डाल सकती है ।
भगवान्‌ बुद्ध की जन्म स्थली लु्म्बनी -मधुकर पिपलायन
श्री मधुकर जी लिखते हैं :
इस अनावशयक विवाद की जड  मे उडीसा के राजकीय संग्राहलय के श्री चन्द्रभान पटेल  का एक शोध पत्र है जिसमें श्री पटेल उडीसा की राजधानी भुवनेशवर के पास भगवान बुद्ध की जन्म स्थली को मानते हैं । उनके अनुसार यहां कपिलेशवर नामक स्थान को शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु और उसके पास के एक स्थान लुम्बनी भगवान्‌ बुद्ध की जन्म स्थली है । विस्तार से देखने के लिये देखें यहाँ, यहाँ और यहाँसंभवत: नामों की समानता ही इस विवाद का मूल कारण है
पालि तिपिटक के व्याख्याता और अट्‌ठकथाकार आचार्य बुद्धघोष के अनुसार कोशल राज्य के निर्वाचित राजकुमारों ने हिमालय की तराई में कपिलमुनि के आश्रम के पास अपना निवास बनाया था । बाद मे यह नगर कपिलमुनि के नाम पर कपिलवस्तु कहलाया । इसके पास ही देवदह का गणराज्य भी था । कपिलवस्तु के लोग शाक्य कहलाते थे और देवदह के कोलिय । शाक्य महाराजा शुद्धोदन का विवाह कोलिय गणराज्य की कन्या महामाया के साथ हुआ था । लुम्बनी का मनोहारी शालोधान देवदह और कपिलवस्तु के म्ध्य स्थित था । कपिलवस्तु से देवदह की दूरी २६ मील थी । चीनी यात्री फ़ाहियान और हुएन-त्सांग ने कपिलवस्तु और लुम्बनी की यात्र की थी । इन्होने हिमालय की तराई के पास श्रावस्ती , कुशीनगर , पावा और वैशाली की यात्रा भी की थी । यह सभी बौद्ध नगर हिमालय की तराई के आस पास हैं । देखने वाली बात यह है कि इनमें से कोई भी नगर उडीसा मे नही है ।
कपिलवस्तु की खोज का अंतिम अध्याय सन्‌ १९७६ मे समाप्त हो चुका है । भारतिय पुरातत्व के अधीक्षक के.एम.श्रीवास्तव की देखरेख मे पिपरहवा ( सिद्धार्थ नगर , उतर प्रदेश ) कपिलवस्तु की खोज की जा चुकी है , जहां से स्तूप की खुदाई मे प्राप्त मिट्‌टी की मोहरों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि यह शाक्यों की राजधानी प्राचीन कपिलवस्तु ही  है ।
आज लुम्बिनी नेपाल सीमा के अन्दर है । अंगेजी राज से पहले लुम्बिनी भारत की सीमा के अन्दर थी । अंगेजों और नेपाल सरकार के बीच एक संधि के अनुसार उतर प्रदेश मे स्थित हिमालय की तराई का यह मैदानी भू-भाग नेपाल को दे दिया गया था और इसके बदले मे अंगेजों ने नेपाल का पशिचमी पहाडी भू- भाग जिसमे गढवाल और कुमाऊं का क्षेत्र आता है , अपनी ग्रीष्म कालीन निवास बनाने के लिये ले लिया था ।  वर्तमान उतरांचल प्रदेश उन दिनों नेपाल राज्य का हिस्सा था । इस प्रकार लुम्बनी भी कभी मूल रुप से भारत का ही एक भाग था ।
लेकिन अब जब यह विवाद समाप्त हो चुका है और स्वयं एक लम्बे अर्से से भारत सरकार लुबंनी को नेपाल का हिस्सा मानती है , अब इस विवाद को समाप्त करना ही दोनों देशों और बुद्ध धम्म के लिये अधिक श्रेयसकर होगा ।
लगभग ८१% हिन्दू बाहुल्य होने के बाद भी जिस तरह से नेपाल ने बौद्ध विरासत को बचा कर रखा है , यह एक मिसाल भारत के लिये भी है , अपने देश मे अधिकाशं बौद्ध स्थल उपेक्षित से पडे हैं , कपिलवस्तु को ही लें , लुम्बनी के बिल्कुल नजदीक होने के बावजूद इसका विकास न के बराबर है । बुद्ध धम्म भारत की उस मिट्टी का हिस्सा है जिससे वैदिक, जैन , सिख और चार्वाक दर्शन निकले । संभालना तो हमें ही है  , बाहर से तो कोई आयेगा नही , लेकिन क्या हम कर पायेगें ?

Sunday, November 3, 2013

अप्प द्धीप भवो " दीपावली की शुभकामनाये "

हजार मोमबत्तियों की रौशनी से भी बढ़कर है
अपने अंदर की रौशनी
उसको ही आधार बनाओ
उससे ही प्रजवल्लित हो
"अप्प द्धीप भवो "
यही तो देशना है बुद्ध की
अपने द्धीप स्वयं बनो
दीपावली की आप सबको बहुत -2 शुभकामनाये ।

Tuesday, October 22, 2013

डौंडिया खेडा का सच - क्या डौंडिया खेड़ा प्राचीन बौद्ध केंद्र है ?

Unnao gold treasure
लेख , वृतांत और चित्रों के लिये आभार :
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण एक साधू के सपने के आधार पर उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद की पुरवा तहसील के डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम में जो उत्खनन कार्य करवा रहा है उस स्थान के प्रामाणिक इतिहास का निरूपण सुप्रसिद्ध बौद्ध विद्वान प्रोफ़ेसर अँगने लाल जी ने अपनी शोधपरक पुस्तक "उत्तर प्रदेश के बौद्ध केंद्र" की पृष्ठ संख्या 209-10 में पहले ही कर दिया था। इस ग्रन्थ को 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान', लखनऊ, ने 2006 में प्रकाशित किया था। ( नीचे देखें ) यह घोर विडम्बना ही है कि जहां एक तरफ समाचारपत्रों व टीवी न्यूज चैनलों की परिचर्चाओं में इस ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक और उसमे लिखी बहुमूल्य जानकारी का जिक्र तक नहीं किया जा रहा है, वहीँ दूसरी और डौंडिया खेड़ा से सम्बद्ध अनेक कपोलकल्पित कथाओं को बढ़-चढ़कर पेश किया जा रहा है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग जब शाक्यमुनि बुद्ध के प्रबुद्ध भारत में आया था तब उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद की पुरवा तहसील के डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम गया था और इस डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम का उल्लेख अपने यात्रा इतिवृत्त में ओयमुख लिखा है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग साधू के कहने से सोना खोज रही वास्तविक डौंडिया खेड़ा प्राचीन बौद्ध केंद्र है ! और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग इस सच्चाई को जानता है ! सम्राट अशोक ने इस डौंडिया खेड़ा नगर के पास ही दक्षिण पूर्व में गंगा के किनारे 200 फिट ऊँचा स्तुपो का निर्माण किया था। यहाँ एक अशोक स्तम्भ है जिसे लोग इसे शिवलिंग कहते है वास्तविक यह शिवलिंग न होकर यह अशोक स्तम्भ है ! अलेक्जण्डर कनिंघम ने इसकी पहचान डौंडिया खेड़ा से की है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार यहाँ 5 बौद्ध संघाराम थे जिनमें 1000 भिक्षु रहते थे। ये स्थाविरवादी (थेरवादी) थे और उसकी सम्मतिय शाखा को मानते थे। यह वही स्थान था जहां तथागत गौतम बुद्ध ने 3 महीने धर्म का उपदेश दिया था। इसके अतिरिक्त यहाँ पर चार पूर्व बुद्धों के स्मारक भी यात्री ने देखे थे। इसके समीप ही एक दूसरा स्तूप भी था जिसमे भगवान बुद्ध के केश, नख धातु सन्निहित किये गए थे। इस स्तूप के पास एक बड़ा संघाराम था जिसमे यात्री ने 200 बौद्ध भिक्षु देखे थे।
डौंडिया खेड़ा जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ओयमुख लिखा है यह संघाराम वास्तविक एक बौद्ध विश्वविद्यालय के रूप में था और इस बौद्ध विश्वविद्यालय में बुद्ध की अनमोल अप्रतिम प्रतिमाये थी! बुद्ध की प्रतिमाये ऐसे थी मानो बुद्ध हमें धम्म देशना दे रहे हो, यह डौंडिया खेड़ा का प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय विश्वजगत के लिए शिक्षा और साहित्य की दृष्टि से अनमोल खजाना था। इसी बौद्ध विश्वविद्यालय में बैठकर बौद्धाचार्य बुद्धदास ने सर्वास्तिवाद निकाय के महाविभाषा शास्त्र की रचना की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग के प्रामाणिक इतिहास के प्रमाणों को लेकर प्रोफ़ेसर अँगने लाल जी ने अपनी शोधपरक पुस्तक "उत्तर प्रदेश के बौद्ध केंद्र" की पृष्ठ संख्या 209-10 इसकी जानकारी दी है और इस ग्रन्थ को 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान', लखनऊ, ने 2006 में प्रकाशित किया है।
डौंडिया खेडा का सच. तस्वीर-1 मे MS Julian का ट्रान्सलेशन(ह्वेन्सान्ग की यात्राव्रित्त) है, तस्वीर-2/3 मे कनिन्घम द्वारा लिखित पुस्तक "The Ancient Geography Of India" का विवरण है, तस्वीर -3 मे कनिन्घम की 1862-64 की रिपोर्ट है जो 1871-2 मे प्रकाशित हुइ। (ये सारी की सारी Original स्कैन कापी है)
चित्रों के  लिये आभार : Tadiyampi Shakya
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चित्र १ MS Julian का ट्रान्सलेशन(ह्वेन्सान्ग की यात्रावृति)

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डौंडिया खेड़ा...सर कनिन्घम द्वारा लिखित पुस्तक "The Ancient Geography Of India" का विवरण और 1862-63-64 की रिपोर्ट जो 1871 मे प्रकाशित हुई
 
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श्री अँगने लाल की पुस्तक , ‘ उत्तर प्रदेश के बौद्ध केन्द्र ‘  की स्कैन चित्रों के लिये आभार : राहुल राज

इतना तो तय है कि हमारे शासक अपने इतिहास को संरक्षित रखने में जितने उदासीन रहे, उससे ठीक उलट हम पर शासन करने वाले अँग्रेजों ने हमारा इतिहास जानने में खासी दिलचस्पी ली। सारनाथ का धमेख स्तूप , श्रावस्ती  और बोधगया इसका जीता जागता उदहारण है। इतिहास हमेशा अंग्रेज इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम और चीनी यात्री ह्वेनसांग का ऋणी रहेगा लेकिन जो काम हम लोगों को करना था वह हम क्यूं नही कर पाये ।प्राचीन बौद्ध स्थलों के प्रति भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका संधिगत रही है, इस विभाग ने इन स्थलों को लेकर कभी भी बौद्ध संघटनो के साथ कार्य नहीं किया, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग, प्राचीन बौद्ध स्थलों को लेकर ना ही स्वय: विकास करती है और ना ही बौद्ध संघटनो को साथ में लेकर कार्य करती है, इस दृष्टी से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका बौद्धों के प्राचीन बौद्ध स्थलों के अस्थित्व को मिटाने की भूमिका निभा रही है । लेकिन क्या अब कोई बदलाव देखने को मिलेगा , कहना मुश्किल है लेकिन शायद यह संभव भी हो ।




झारखंड का अनूठा बौद्ध मंदिर

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झारखंड के प्राचीन स्मारक हमेशा से यहां के निवासियों के आकर्षण का केन्द्र रहे हैं । चाहे वो धार्मिक प्रकार के स्मारक हों या नागरिक भवन हों, सभी यहां के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। रामगढ-बोकारो मार्ग पर गोला के समीप सड़क की दक्षिण दिशा में एक विशालकाय शिखरयुक्त मंदिर सदियों से खड़ा झारखंड का इतिहास कहने को आतुर-सा दिखता है। स्थानीय लोगों में खीरी मठ के नाम से प्रसिद्ध यह भव्य संरचना वस्तुत: एक बौद्ध मंदिर है। लगभग अस्सी फीट ऊंचा यह मंदिर सप्तरत योजना के अनुरूप बनाया गया है तथा इसे देखने पर एकदम से अहसास होता है कि यह बोध गया के विश्व प्रसिद्ध मंदिर की प्रतिकृति है। इस मंदिर का निर्माण सीधे सीधे समतल जमीन पर किया गया है तथा भूमि पर इसका आकार लगभग चालीस फीट वर्गाकार है । इसमें पूरब और पश्चिम दिशा में श्रद्धालुओं के मंदिर में सहज प्रवेश के लिये लगभग पांच फीट उंचाई के दो द्वार बने हुये हैं। शिखर के समीप दा खिडकियों जैसी संरचनायें भी बनाई गई हैं जिससे सूरज की रौशनी मंदिर के अंदर लगातार आती रहती है और अंधेरा नहीं होता । अंदर गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं दिखती और अब यह मंदिर अत्यंत उपेक्षित अवस्था में जीवन के संभवत: अंतिम दिन गिन रहा है। पूर्वी प्रवेश द्वार के ठीक उपर लगभग चालीस फीट की उंचाई पर पत्थर के एक पैनल में बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में बैठी मूर्ति लगाई ग‌र्इ्र है और पास में ही दो मछलियों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। पश्चिम द्वार के उपर सिर्फ मछलियों की आकृतियां ही दिखती हैं। इसका निर्माण ईंट और पत्थर से मिश्रित रूप में किया गया है। शिखर के अंतिम छोर पर बौद्ध स्थापत्य के अनुरूप तीन स्तर की छत्रवली भी बनाई गई है। यह मंदिर तथा पास ही में बौद्ध धर्म की छिन्न मस्तिका परम्परा के मंदिर की उपस्थिति यह आभास देती है कि यह पूरा क्षेत्र एक समय बौद्ध धर्म के प्रभाव में अवश्य था। हजारीबाग क्षेत्र में भी गांव गांव में बौद्ध धर्म से संबंधित असंख्य प्राचीन मूर्तिया देखने को मिल जाती हैं। स्थापत्य शैली के आधार पर इसे लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी का माना जा सकता है। आप जब भी इधर से गुजरें, रूक कर इसके दर्शन अवश्य कर लें ,क्योंकि सरकार की अनवरत उपेक्षा डोलता हुआ स्थापत्य का यह अद्भुत नमूना ज्यादा दिन चल सके, ऐसा नहीं प्रतीत होता। झारखंड के प्राचीन स्मारक हमेशा से यहां के निवासियों के आकर्षण का केन्द्र रहे हैं । चाहे वो धार्मिक प्रकार के स्मारक हों या नागरिक भवन हों, सभी यहां के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। रामगढ-बोकारो मार्ग पर गोला के समीप सड़क की दक्षिण दिशा में एक विशालकाय शिखरयुक्त मंदिर सदियों से खड़ा झारखंड का इतिहास कहने को आतुर-सा दिखता है। स्थानीय लोगों में खीरी मठ के नाम से प्रसिद्ध यह भव्य संरचना वस्तुत: एक बौद्ध मंदिर है। लगभग अस्सी फीट ऊंचा यह मंदिर सप्तरत योजना के अनुरूप बनाया गया है तथा इसे देखने पर एकदम से अहसास होता है कि यह बोध गया के विश्व प्रसिद्ध मंदिर की प्रतिकृति है। इस मंदिर का निर्माण सीधे सीधे समतल जमीन पर किया गया है तथा भूमि पर इसका आकार लगभग चालीस फीट वर्गाकार है । इसमें पूरब और पश्चिम दिशा में श्रद्धालुओं के मंदिर में सहज प्रवेश के लिये लगभग पांच फीट उंचाई के दो द्वार बने हुये हैं। शिखर के समीप दा खिड़कियों जैसी संरचनायें भी बनाई गई हैं जिससे सूरज की रौशनी मंदिर के अंदर लगातार आती रहती है और अंधेरा नहीं होता । अंदर गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं दिखती और अब यह मंदिर अत्यंत उपेक्षित अवस्था में जीवन के संभवत: अंतिम दिन गिन रहा है। पूर्वी प्रवेश द्वार के ठीक उपर लगभग चालीस फीट की उंचाई पर पत्थर के एक पैनल में बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में बैठी मूर्ति लगाई ग‌र्इ्र है और पास में ही दो मछलियों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। पश्चिम द्वार के उपर सिर्फ मछलियों की आकृतियां ही दिखती हैं। इसका निर्माण ईंट और पत्थर से मिश्रित रूप में किया गया है। शिखर के अंतिम छोर पर बौद्ध स्थापत्य के अनुरूप तीन स्तर की छत्रवली भी बनाई गई है। यह मेंिदर तथा पास ही में बौद्ध धर्म की छिन्न मस्तिका परम्परा के मंदिर की उपस्थिति यह आभास देती है कि यह पूरा क्षेत्र एक समय बौद्ध धर्म के प्रभाव में अवश्य था। हजारीबाग क्षेत्र में भी गांव गांव में बौद्ध धर्म से संबंधित असंख्य प्राचीन मूर्तिया देखने को मिल जाती हैं। स्थापत्य शैली के आधार पर इसे लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी का माना जा सकता है। आप जब भी इधर से गुजरें, रूक कर इसके दर्शन अवश्य कर लें ,क्योंकि सरकार की अनवरत उपेक्षा डोलता हुआ स्थापत्य का यह अद्भुत नमूना ज्यादा दिन चल सके, ऐसा नहीं प्रतीत होता।

स्त्रोत : दैनिक जागरण

अनित्यता

अनित्य

सब्बे संङ्खारा अनिच्चाति, यदा पञ्ञाय पस्सति।
अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया।। (धम्मपद २७७)

सारे संस्कार अनित्य हैं यानी जो हो रहा है वह नष्ट होता ही है । इस सच्चाई को जब कोई विपशयना से देख लेता है , तब उसको दुखों से निर्वेद प्राप्त होता है अथात दु:ख भाव से भोक्ताभाव टूट जाता है । यह ही है शुद्ध विमुक्ति का मार्ग !!     धम्मपद २७७

Monday, September 30, 2013

विपस्सना आचार्य दिंवगत सत्यनारायण गोयनकाजी को शत्‌-शत्‌ नमन

गोयन्का

                           आचार्य सत्य नारायण गोयन्का
                          जन्म : ३० जनवरी , १९२४
                          निर्वाण  : २९ सितम्बर, २०१३     

बाबा साहब के बाद अगर भारत मे बुद्ध धम्म की ज्योति को जलाये रखने मे किसी व्यक्ति का बहुत योगदान था तो वह थे आचार्य गोयन्का जी । उनका निधन बुद्ध धम्म के लिये एक बहुत बडी क्षति है । लेकिन जाना तो एक न एक दिन सब को है , हमारे चाहे या अनचाहे प्रकृति के इस नियम को कोई नही बदल सकता ।
चाहता हूँ , पुष्प यह
गुलदान का मेरे
न मुर्झाये कभी ,
देता रहे
सौरभ सदा
अक्षुण्ण इसका
रुप हो!
पर यह कहाँ संभव ,
कि जो है आज,
वह कल को कहाँ ?
उत्पत्ति यदि,
अवसान निशिचत!
आदि है
तो अंत भी है !
यह विवशता !
जो हमारा हो ,
उसे हम रख न पायें !
सामने अवसान हो
प्रिय वस्तु का,
हम विवश दर्शक
रहे आयें!
नियम शाशवत
आदि के,
अवसान के ,
अपवाद निशचय ही
असंभव-
शूल सा यह ज्ञान
चुभता मर्म में,
मन विकल होता!
प्राप्तियां, उपलबिधयां क्या
दीन मानव की,
कि जो
अवसान क्रम से,
आदि -क्रम से
हार जाता
काल के
रथ को
न पल भर
रोक पाता !
क्या अहं मेरा
कि जिसकी तृष्टि
मैं ही न कर पाता !

विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी ने बुद्धत्तर भारत के लुप्त हुई बुद्ध की अनमोल 'ध्यान' विधि और बुद्ध वाणी को अपनी एक-एक बूंद से प्रबल-प्रवाह से प्रवाहित किया। गहन अध्ययन और पद पद पर ठोकरे खाते हुए और उद्देश्य विचलित न होते हुए विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी ने सदा बुद्ध के सबल बाहु का अवलम्बन किया। जिनके गहन मैत्री का पूण्य प्रकाश है की भगवान बुद्ध के पुण्यसलिला भागीरथी ने देश और विदेश के करोड़ो लोगो को बुद्ध के सांस्कृतिक प्रवाह में बहाने के लिए साहस बंधाया। जिसे पाकर प्राचीन बुद्ध की ध्यान विधि और बौध्‍द इतिहास के निधि ने स्वयं अपूर्व वैभवशाली गौरव अपने खोये हुए भारत के धरती पर फिर से हासिल करके लोककल्याण किया और लोककल्याण की धारा प्रवाहीत हो रही है। विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी ने पदपद पर कष्ट भरे महासागर के तूफानी लहरों को चीरकर अपने ओजस्वी भाषा शैली में बुद्ध के धम्म को प्रस्तुत किया। आदरणीय विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी के निधन से विश्वजगत को क्षति  होने का आभास हुवा है। लेकिन आदरणीय विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनकाजी के स्नेहमयी ममतामयी गोद को विश्वजगत भूल नहीं सकता क्योंकि उनके सहस्त्र्भुजा प्रबल प्रवाह की पियुषपायिनी और बुद्ध के धम्म की जगकल्याणी तरंगे सदा साथ है!

भवतु सब मंगलं !
सबका मंगल हो !

साभार : सत्यजीत मौर्या 

यह भी देखे :

श्री स. ना. गोयन्का द्वारा दस दिवसीय विपश्थना ध्यान विधि के आडियो एवं पी.डी.एफ़. लिंक











































Friday, September 20, 2013

अप्रमाद ( awareness ) अमृत का पथ है और प्रमाद ( non awareness ) मृत्यु का

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ओशो : ‘ अप्रमाद अमृत का पथ है और प्रमाद मृत्यु का।’
साभारडां प्रवीन गोस्वामी

बुद्ध की सारी जीवन-प्रक्रिया को एक शब्द में हम रख सकते हैं, वह है, अप्रमाद, अवेयरनेस, जागकर जीना।
जागकर जीने का क्या अर्थ होता है? अभी तुम रास्ते पर चलते हो, बुद्ध से पूछोगे तो वे कहेंगे, यह चलना बेहोश है। रास्ते पर दुकानें दिखायी पड़ती हैं, पास से गुजरते लोग दिखायी पड़ते हैं, घोड़ागाड़ी, कारें दिखायी पड़ती हैं, लेकिन एक चीज तुम्हें चलते वक्त नहीं दिखायी पड़ती, वह तुम स्वयं हो। और सब दिखायी पड़ता है। पास से कौन गुजरा, दिखायी पड़ा। राह पर भीड़ है, दिखायी पड़ी। रास्ता सुनसान है, दिखायी पड़ा। सब तुम्हें दिखायी पड़ता है, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते। यही तो सपना है।
सपने में तुमने कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ता है, एक तुम दिखायी नहीं पड़ते। सपने का स्वभाव यही है। बहुत सपने तुमने देखे हैं। कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ते हैं, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते सपने में। मित्र-शत्रु सब दिखायी पड़ते हैं, तुम भर नहीं दिखायी पड़ते।
यही तो स्थिति जीवन की है, जागने की है। जिसे तुम जागना कहते हो उसमें और नींद में कोई अंतर नहीं मालूम होता। दोनों में एक बात समान है कि तुम्हारा तुम्हें कोई पता नहीं चलता। भीतर अंधेरा है। भीतर दीया नहीं जला। इसको बुद्ध प्रमाद कहते हैं, मूर्च्छा कहते हैं।
अपना ही पता न चले, यह भी कोई जिंदगी हुई? चले, उठे, बैठे, उसका पता ही न चला जो भीतर छिपा था। अपने से ही पहचान न हुई, यह भी कोई जिंदगी है? अपने से ही मिलना न हुआ, यह भी कोई जिंदगी है? और जो अपने को ही न पहचान पाया, और क्या पहचान पाएगा? निकटतम थे तुम अपने, उसको भी न छू पाए, और परमात्मा को छूने की आकांक्षा बनाते हो? चांद-तारों पर पहुंचना चाहते हो, अपने भीतर पहुंचना नहीं हो पाता।
स्मरण रखो, निकटतम को पहले पहुंच जाओ, तभी दूरतम की यात्रा हो सकती है। और मजा यह है कि जिसने निकट को जाना, उसने दूर को भी जान लिया, क्योंकि दूर निकट का ही फैलाव है।
उपनिषद कहते हे, वह परमात्मा पास से भी पास, दूर से भी दूर है। क्या इसका यह अर्थ हुआ कि उसे जानने के दो ढंग हो सकते है-कि तुम उसे दूर की तरह जानने जाओ या पास की तरह जानने जाओ?
नहीं, दो ढंग नहीं हो सकते। जब तुम पास से ही नहीं जान पाते तो तुम दूर से कैसे जान पाओगे? जब मैं अपने को ही नहीं छू पाता, परमात्मा को कैसे छू पाऊंगा? जब आख अपने ही सत्य के प्रति नहीं खुलती, तो परमात्मा के विराट सत्य की तरफ कैसे खुल पाएगी?
इसलिए बुद्ध चुप रह गए, परमात्मा की बात ही नहीं की। वह बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से, जागकर जो दिखायी पड़ता है, उसकी बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से तो यही बात करनी उचित है, कैसे उसका सपना टूटे, कैसे उसकी नींद टूटे?



Sunday, September 15, 2013

वर्तमान , अतीत और भविष्य - सचेतावस्था मे जीना ही एकमात्र विकल्प


वर्तमान मे रहने का अर्थ यह नही है कि आप अतीत को भूल जायें या भविष्य की जिम्मेदारी से दूर चले जायें । बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अतीत को लेकर पछतावा न करें और भविष्य को लेकर चिंता न करें । अगर आप सचेतावस्था के साथ अतीत को देखेगें तो आप पायेगें कि अतीत आप की यात्रा में एक जांच का उद्देशय हो सकता है कि ऐसी परिस्थतियाँ क्यों और कैसे उत्पन्न हुयी । अतीत मे देख कर आप कई अंतर्दृष्टियों को प्राप्त भी कर सकते हैं लेकिन साथ ही में यह आवशयक है कि आप की दृष्टि वर्तमान समय पर सचेतावस्था के साथ रहे । ~ तिक न्यात हन्ह, The Art of Power~

 “To dwell in the here and now does not mean you never think about the past or responsibly plan for the future. The idea is simply not to allow yourself to get lost in regrets about the past or worries about the future. If you are firmly grounded in the present moment, the past can be an object of inquiry, the object of your mindfulness and concentration. You can attain many insights by looking into the past. But you are still grounded in the present moment.”
Thich Nhat Hanh, The Art of Power

Thursday, September 12, 2013

दण्ड से सभी डरते हैं … किसी भी प्राणी की हिंसा न करे .. “भगवान्‌ बुद्ध ”

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जेतवन में रहते समय एक दिन छ: वर्गीय भिक्षुओं ने सत्रह वर्गीह भिक्षुओं को मारा । भगवान्‌ बुद्ध ने छ: वर्गीय भिक्षुओं को बुलाकर नाना प्रकार से समझाया – “ भिक्षुऒ ! भिक्षु को अपने समान ही सबको समझना चाहिये कि जैसे मैं दणड और मृत्यु से डरता हूँ , वैसे ही सब डरते हैं । ऐसा जान कर किसी को मारना या वध करना नही चाहिये ।  धमम्पद ~ गाथा १२९ ~
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एक दिन भगवान्‌ बुद्ध जेतवन विहार से श्रावस्ती मे भिक्षाटन के लिये जा रहे थे । उन्होने मार्ग में बहुत से लडकों को एक साँप को लाठी से मारते हुये देखा । यह देखकर भगवान्‌ ने उनसे पूछा – “ साँप को क्यों मार रहे हो ? “
“ डँसने के डर से। ”
“ तुम ओग इसे मारकर जो अपना सुख चाहते हो , तो मरकर उत्पन्न होने के स्थान में सुख नही भोग पाओगे , अपने को सुख चाहने वालों को दूसरे का वध नही करना चाहिये । ” ब्न्हगवान ने ऐसा कहकर यह उपदेश देते हुये इस गाथा को कहा ।

Tuesday, September 10, 2013

ईश्वर मॆ ( अ) विश्वास और बुद्ध धम्म

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इस संसार को किसने बनाया , यह एक सामान्य प्रशन है लेकिन इस दुनिया को ईश्वर ने बनाय यह वैसा ही सामन्य सा उत्तर है । इस सृष्टि रचयिता के कई नाम है , अलग –२ प्रांत और देशानुसार अलग-२ । यदि यह पूछा जाये कि तथागत ने ईश्वर को सृष्टि कर्ता के रुप में स्वीकार किया तो उत्तर है “ नही” बुद्ध ने कहा कि ईशवराश्रित धर्म कल्पनाश्रित है । इसलिये ऐसे धर्म का कोई उपयोग नही है । बुद्ध ने इस प्रशन को ऐसे ही नही छोड दिया । उन्होने इस प्रशन के नाना पहलूऒं पर विचार किया है ।
बुद्ध का तर्क था कि कि ईशवर का सिद्धान्त सत्याश्रित नही है । भगवान्‌ बुद्ध ने वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ हुई बातचीत मे स्पष्ट किया है ।

वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ भगवान्‌ बुद्ध के संवाद

वासेठ्ठ और भारद्धाज मे एक विवाद खडा हुआकि सच्चा मार्ग कौन सा है और झूठा कौन सा ? इस समय भगवान बुद्ध भिक्षु संघ के साथ कोशल जनपद मे विहार कर रहे थे । वह मनसाकत नामक ब्रहाम्ण गाँव मे अचिरवती नदी के तट पर एक बगीचे में ठ्हरे थे । वासेठ्ठ और भारद्धाज दोनों मनसाकत नाम की बस्ती में ही रहते थे । जब उन्होने सुना कि तथागत उनकी बस्ती में आये हैं तो वे उनके पास गये और दोनों ने भगवान्‌ बुद्ध से अपना दृष्टिकोण रखने का निवेदन किया ।
भारद्धाज ने कहा –” तरुक्ख का दिखाया मार्ग सीधा साधा है , वह मुक्ति का सीधा पथ है और जो इसका अनुसरण कर लेता है उसे वह ब्रह्मा से मिला देता है ।”
वासेठ्ठ ने कहा – “ हे गौतम बहुत से ब्राहम्ण बहुत से मार्ग सुझाते हैं – अध्वय्य ब्राहम्ण , तैत्तिरिय ब्राहम्ण, कंछोक ब्राहम्ण , तथा भीहुवर्गीय ब्राहम्ण,। वे सभी , जो इन के बताये पथ का अनुकरण करते हैं , उसे ब्रहमा से मिला देते हैं । जिस प्रकार किसी गाँव या नगर के पास अनेक रास्ते होते हैं , किन्तु वे सभी उसी गांव मे पहुंचा देते हैं , उसी तरह से ब्राहम्णॊं द्वारा दिखाये सभी पथ ब्रहमा से जा मिलते हैं । ”
तथागत ने प्रशन किया – “ तो वासेठ्ठ तुम्हारा क्या यह कहना है कि वे सभी मार्ग सही हैं ? वासेठ्ठ बोला – “ श्रमण गौतम हाँ, मेरा यही मानना है ।”
“ लेकिन वासेठ्ठ ! क्या तीनों वेदों के जानकार ब्राहमणॊं के गुरुऒं में कोई एक भी ऐसा है जिसने ब्रहमा का आमने सामने दर्शन किया हो ?”
"”गौतम ! निशचय ही नही ! ”
“ तो ब्रहमा को किसी ने नही देखा ? किसी को ब्रह्मा का साक्षात्कार नही हुआ ? “ वासेठ्ठ बोला – “ हां ऐसा ही है ।”
“ तब तुम कैसे यह मान सकते हो कि ब्राहम्णॊं का कथन सथाश्रित है ?
“ वासेठ्ठ ! जैसे कोई अंधे की कतार हो । न आगे चलने वाला अंधा देख सकता हो , न बीच मे और न पीछे चलने वाला अंधा । इसी तरह वासेठ्ठ ! मुझे लगता है कि ब्राहम्णॊं का कथन सिर्फ़ अंधा कथन है । न आगे चलने वाला देखता है , न बीच वाला और न पीछे वाला देखता है । इन ब्राहम्णॊं की बातचीत केवल उपहासस्यपद है , शब्द मात्र जिस में कोई सार नही ।”
“ वासेठ क्या यह ऐसा नही है कि किसी आदमी का किसी स्त्री से प्रेम हो गया हो जिसे उसने देखा तक नही हो ? “ "वासेठ्ठ बोला – “हां यह ऐसा ही है ।”
“ वासेठ! तब तुम यह बताओ कि यह कैसा होगा कि जब लोग उस आदमी से पूछेगें कि जिस सुन्दरतम स्त्री से प्रेम करने की बात करते हो वह अमुक स्त्री कौन है , कहां की है आदि ।”
सृष्टि के तथाकथित रचयिता की चर्चा करते हुये तथागत ने भारद्धाज और वासेठ्ठ से कहा – “ मित्रों ! जिस प्राणी ने पहले जन्म लिया था वह अपने बारे मे सोचने लगा कि मै ब्रहमा हूँ , विजेता हूँ , निर्माता हूं , अविजित हूँ , सर्वाधिकारी हूँ , मालिक हूँ , निर्माता हूँ , रचयिता हूँ, व्यवस्थापक हूँ, आप ही अपना स्वामी हूँ , और जो हैं तथा वे जो भविष्य में पैदा होने वाले हैं , उन सब का पिता हूँ । मुझ से यह सब प्राणी उत्पन्न होते हैं ।”
“ तो इसका यह मतलब हुआ न कि जो अब है और जो भविष्य में उतपन्न होने वाले हैं , ब्रह्मा सब का पिता है ? “
“ तुम्हारा कहना है कि यह जो पूज्य , विजेता , अविजित , जो है तथा जो होगें उन सब का पिता , जिससे हमारी उत्पति हुई है – ऐसा जो यह ब्रह्मा है , वह स्थायी है , सतत रहने वाला है , नित्य है , अपरिवर्तन-शील है और वह अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा । तो हम जिन्हें ब्रह्मा ने उत्पन्न किया है , जो ब्रह्मा के यहाँ से आये हैं , सभी अनित्य क्यों है , परिवर्तनशील क्यों हैं , अस्थिर क्यों हैं , अल्प जीवी क्यों हैं और मरणाधर्मी क्यों हैं ? “
इसका वासेठ्‌ के पास कोई उत्तर नही था ।
तथागत का तीसरा तर्क ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता से संबधित था । “ यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सृष्टि का पर्याप्त कारण है , तो फ़िर आदमी के दिल मे कुछ करने की इच्छा ही उत्पन्न नही हो सकती , उसे कुछ करने की आवशयकता भी नही रह सकती , न उसके मन में कुछ करने का संकल्प ही पैदा हो सकता है । यदि वह ऐसा ही है तो ब्रह्मा ने आदमी को पैदा ही क्यों किया ? ”
इसका भी वासेठ्‌ के पास कोई उत्तर नही था ।
तथागत का चौथा तर्क था कि “ यदि ईश्वर कल्याण-स्वरुप है तो आदमी हत्यारे , चोर, व्यभिचारी , झूठे , चुगलखोर, लोभी , द्धेषी , बकवादी और कुमार्गी क्यों हो जाते हैं ? क्या किसी अच्छॆ , भले ईश्वर के रहते यह संभव है ? ”
तथागत का पाँचवां तर्क ईश्वर के सर्वज्ञ , न्यायी , और दयालु होने से संम्बधित था ।
“ यदि कोई ऐसा महान्‌ सृष्टि-कर्ता है जो न्यायी भी है और दयालु भी है , तो संसार मे इतना अन्याय क्यों हो रहा है ?” भगवान्‌ बुद्ध का प्रश्न था । उन्होनें कहा – “ जिसके पास भी आंख है वह इस दर्दनाक हालत को देख सकता है । ब्रह्मा अपनी रचना सुधारता क्यों नही है ? यदि उसकी शक्ति इतनी असीम है कि उसे कोई रोकने वाला नही तो उसके हाथ ही ऐसे क्यों हैं कि शायद वह किसी का कल्याण करते हो ?उसकी सारी की सारी सृष्टि दु:ख क्यों भोग रही है ? वह सभी को सुखी क्यों नही रखता है ? चारों ओर ठ्गी , झूठ , और अज्ञान क्यों फ़ैला हुआ है ? सत्य पर झूठ क्यों बाजी मार ले जाता है ? सत्य और नयाय क्यों पराजित हो जाते है? मै तुम्हारे ब्रह्मा को परं-अन्यायी मानता हूँ जिसने केवल अन्याय देने के लिये इस जगत की रचना की है । “
“ यदि सभी प्राणियों में कोई ऐसा सर्वशक्तिमान ईश्वर व्याप्त है जो उन्हें सुखी और दुखी बनाता है और जो उनसे पाप पुण्य कराता है तो ऐसा ईश्वर भी पाप से सनता है । या तो आदमी ईश्वर की आज्ञा में नही है या ईश्वर नेक और न्यायी नही है अथवा ईश्वर अन्धा है ।”
ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त के विरुद्ध उनक अगला तर्क यह था कि ईश्वर की चर्चा से कोई प्रयोजन सिद्ध नही होता । भग्वान्‌ बुद्ध के अनुसार धर्म की धुरि ईश्वर और आदमी का सम्बन्ध नही है बल्कि आदमी का आदमी के साथ संम्बन्ध है । धर्म का प्रयोजन यही है कि वह आदमी को शिक्षा दे कि वह दूसरे आदमी के साथ कैसे व्यवहार करे ताकि सभी आदमी प्रसन्न रह सकें ।
तथागत की दृष्टि में ईश्वर विश्वास सम्यक्‌ दृष्टि के मार्ग मे अवरोधक है । यही कारण था कि वह रीति रिवाजों , प्रार्थना और पूजा के आडंबरों के सख्त खिलाफ़ थे । तथागत का मानना था कि प्रार्थना कराने की जरुरत ने ही पादरी पुरोहित को जन्म दिया और पुरोहित ही वह शरारती दिमाग था जिसने इतने अन्धविशवास को जन्म दिया और सम्यक दृष्टि के मार्ग को अवरुद्ध किया ।
तथागत का ईश्वर अस्तित्व के विरुद्ध आखिरी तर्क प्रतीत्य-समुत्पाद के अन्तर्गत आता है । इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है या नही , यह मुख्य प्रश्न नही है और न ही की ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है या नही ? असल प्रश्न है कि ईश्वर ने सृष्टि किस प्रकार रची ? प्रशन महत्वपूर्ण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि भाव ( =किसी पदार्थ ) में से उत्पन्न की या अभाव ( = शून्य ) में से ?
यह तो एक्दम विशवास नही किया जा सकता कि ‘ कुछ नही ‘ में से कुछ की रचना हो गई । यदि ईश्वर ने सृष्टि की रचना कुछ से की है तो वह कुछ – जिस में से नया कुछ उत्पन्न किया गया है – ईश्वर के किसी भी अन्य चीज के उत्पन्न करने के पहले से ही चला आया है । इसलिये ईश्वर को उस कुछ का रचयिता नही स्वीकार किया जा सकता क्योंकि वह कुछ पहले से ही अस्तित्व मे चला आ रहा है ।
यदि ईश्वर के किसी भी चीज की रचना करने से पहले ही किसी ने कुछ में से उस चीज की रचना कर दी है जिससे ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है तो ईश्वर सृष्टि का आदि-कारण नही कहला सकता ।
भगवान्‌ बुद्ध का यह आखिरी तर्क ऐसा था कि जो ईश्वर विश्वास के लिये सर्वथा मारक था और जिसका वासेठ्‌ और भारद्धाज के पास कोई जबाब नही था ।
( संकलन : पृष्ठ संख्या १९४-१९९ , भगवान्‌ बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अम्बेड्कर , अनुवादक :डां भदन्त आनन्द कौसल्लायन )

अगले भाग में देखें :भगवान्‌ बुद्ध की  सृष्टि निर्माण की बैज्ञानिक सोच : प्रतीत्य-समुत्पाद 

 

यह भी देखें :

बुद्ध का धम्म , मजहब और रीलीजन

Saturday, September 7, 2013

स्पाइस स्टुडियोज द्वारा निर्मित धारावाहिक ‘बुद्धा’ जी टीवी पर आठ सितंबर से….



बुद्ध के विचारों के बारे में तो सभी को पता है, लेकिन व्यक्ति के रूप में उनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। इन्हीं बातों को आधार बनाकर स्पाइस स्टुडियोज द्वारा निर्मित धारावाहिक ‘बुद्धा’ जी टीवी पर आठ सितंबर से शुरू हो रहा है।
बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर अभिनेता कबीर बेदी और समीर धर्माधिकारी ने शो के प्रोड्यूसर डॉ. बीके मोदी की मौजूदगी में पहला सीन शूट किया। यह मेगा टेलीसीरिज राजकुमार सिद्धार्थ के जीवन और उनके बुद्ध बनने के सफर को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करेगी।
हाँलाकि बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि टीवी कार्यक्रम 'बुद्ध' पर पहले धारावाहिक नहीं बल्कि फिल्म बनाने की योजना थी । फिल्मकार शेखर कपूर और आशुतोष गोवारिकर ने पटकथा लिखनी भी शुरू कर दी थी ।इस बीच निर्माता बी.के. मोदी को लगा कि इस तरह परियोजना के लिए टीवी में ज्यादा संभावनाएं हैं।
  • देखें टीवी शो 'बुद्ध' के लांच की एक झलक
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Thursday, September 5, 2013

बुद्ध का धम्म , मजहब और रीलीजन

बुद्ध का धम्म , मजहब और रीलीजन
 
बुद्ध के धर्म  की परिभाषा हिदू धर्म , इस्लाम धर्म और ईसाई और यहूदी आदि धर्मों से बिलकुल अलग है । धर्मों को बुद्ध धर्म नही कहते । मजहब से बुद्ध का कोई लेना देना नही ।धर्म से बुद्ध का अर्थ है – जीवन का शाशवत नियम , जीवन का सनातन नियम । इससे हिंदू , मुसलमान , ईसाई का कुछ लेना देना नही । इसमें मजहबों के झगडे का कोई संबध नही । यह तो जीवन की बुनियाद में जो नियम काम कर रहा है , एस धम्मो सनंतनो, वह जो शशवत नियम है , बुद्ध उसकी बात करते हैं । और जब बुद्ध कहते हैं : धर्म की शरण मे जाओ , तो वे यह नही कहते कि किस धर्म की शरण मे । बुद्ध कहते हैं कि  धर्म को खोजो कि शशवत नियम क्या है ? उस नियम की शरण मे जाओ । उस नियम से विपरीत मत जाओ नही तो दुख पाओगे । ऐसा नही कि कोई परमात्मा कही बैठा है कि जो तुमको दंड देगा । कही कोई परमात्मा नही है । बुद्ध के लिये संसार एक नियम है । अस्तित्व एक नियम है । ज्ब तुम उसके विपरीत जाते हो तो विपरीत जाने के कारण ही  दुख  पाते हो ।
एक आदमी नशे में डांवाडोल चलता है और अपना  घुंटना फ़ोड लेता है  । तो ऐसा नही है कि परमात्मा ने शराब पीने का उसे दंड दिया । बुद्ध को यह  बातें बचकानी लगती  हैं । वह आदमी स्वयं ही गिरा क्योंकि वह गुरुतवाकर्षण के नियम के विरुद्ध जा रहा था । उसकी शराब उसके लिये दंड बन गई । गुरुतवाकर्षण का नियम है कि तुम अगर डांवाडोल हुये , उलटे सीधे चले तो गिरोगे ही । जो नियम के साथ चलते हैं उन्हें नियम संभाल लेता है और जो नियम के विपरीत चलते हैं वे अपने हाथ स्वयं ही गिर पडते हैं ।

 

 ‘ मजहब या रीलीजन  क्या है ? ’

मजहब का अर्थ है ईशवर में विशवास , आत्मा मे विशवास , ईशवर की पूजा और प्रार्थना आदि कर के ईश्वर को प्रसन्न रखना । हाँलाकि मजहब की कल्पना कभी भी स्थिर न्रही । एक समय था बिजली , वर्षा , और बाढ की घटनायें आदमी की समझ से परे थी । इन सब पर जो भी टोना टोटका किया जाता थ वह जादू कहलाता था । उस समय मजहब और जादू दोनों एक ही चीज के दो नाम थे ।
मजहब के विकास में दूसरा समय आया तब मजहब का अर्थ आदमी के विशवास , रीति रिवाज , प्राथनायें और बलियों वाले यज्ञ थे । तब तक जादू का प्रभाव जाता रहा । मजहब का केन्द्र बिन्दु इस विशवास पर निर्भर करता है कि कोई शक्ति विशेष है जिस के कारण सभी घटनायें घटती रहती हैं और जो आदमी की समझ से परे की बात है  ।

 

धर्म मजहब से भिन्न कैसे है ?

भगवान्‌ बुद्ध जिसे धर्म कहते हैं वह मजहब या रीलीजिन से सर्वाथा अलग है । जहाँ मजहब या रीलीजन व्यक्तिगत चीज है वही दूसरी ओर धर्म एक समाजिक वस्तु है । वह प्रधान रुप से और आवशयक रुप से सामाजिक है । धर्म का मतलब है सदाचरण , जिस का  अर्थ है जीवन के सभी क्षेत्रों में एक आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार । इससे स्पष्ट है कि यदि कही परस्पर दो आदमी भी साथ रहते हों तो चाहे न चाहे उन्हें धर्म के लिये जगह बनानी पडेगी । दोनॊ में से एक भी बचकर नही जा सकता । जब कि यदि कही एक आदमी अकेला हो तो उसे किसी धर्म की आवशकता नही ।
धर्म क्या है ? धर्म की  आवशयकता क्यूं है ? भगवान्‌ बुद्ध के अनुसार धर्म के दो प्रधान तत्व हैं – प्रज्ञा और करुणा । प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि ( निर्मल बुद्धि ) । भगवान्‌ बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धर्म के दो स्तम्भों में से एक माना है , क्योंकि वह नही चाहते थे कि ‘ मिथ्या विशवासों ’ के लिये कोई जगह बचे ।
करुणा कया है ? और किसके लिये ? करुंणा का अर्थ है दया , प्रेम और मैत्री । इसके बगैर न तो समाज जीवित रह सकता है और न तो समाज की उन्नति हो सकती है । ‘प्रज्ञा और करुणा ’ का अलौकिक मिश्रण ही तथागत का धर्म है ।

 

धर्म और नैतिकता

मजहब या रीलीजन में नैतिकता बाहर से आने  हवा के एक झोंके की तरह है ताकि व्यवस्था और शान्ति मे उपयोगी सिद्ध हो । मजहब या रीलीजन मे एक त्रिकोण है । ‘अपने पडोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो ’ क्योंकि तुम दोनों ही एक ही परमात्मा के पुत्र् हो । यही मजहब का तर्क है । हाँलाकि प्रत्येक  मजहब नैतिकता का उपदेश अवशय देता है लेकिन नैतिकता मजहब का मूलाधार नही है । यह्  एक रेल के डिब्बे की तरह है जिसे मौका अनुसार जोड भी लिया जाता है और पृथक भी किया जाता है ।
जहाँ मजहब या रीलिजन में जो स्थान  ईश्वर का है वही धर्म में नैतिकता का है । दूसरे शब्दों में कहे नैतिकता ही धर्म है और धर्म ही नैतिकता है । धर्म मे प्रार्थनाओं , तीर्थ यात्राओं , कर्मकाडॊं कॆ लिए , रीति रिवाजों के लिये तथा पशु हत्या ( बलि कर्मों ) के लिये कोई जगह नही है । धर्म में नैतिकता का अर्थ आदमी को आदमी के साथ मैत्री का है । इसमॆ ईशवर की मंजूरी की आवशकता नही । ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये आदमी को नैतिक बनने की आवशयकता नही । अपने भले के लिये यह आवशक है कि वह आदमी से मैत्री करे ।
 

मजहब का उद्देशय और धर्म का उद्देशय

मजहब या रीलीजन का उद्देशय और धर्म के उद्देशय में क्या समान है और क्या असमानता है । इन प्रशनों का उत्तर दो सूक्तो में है , एक जिसमे भगवान्‌ बुद्ध और सुनक्खत की बातचीत का उल्लेख है और दूसरा जिसमॆ भगवान्‌ बुद्ध और पोट्‌ठपाद ब्राहमण की बातचीत का वर्णन  है।

भगवान्‌ बुद्ध और सुनक्खत के बीच का संवाद

एक बार भगवान्‌ बुद्ध जब मल्लों के नगर अनुपिय में विहार कर रहे थे – एक दिन चीवर पहन , पात्र हाथ मे लिये अनुपिय नगर मे भिक्षाटन के लिये निकले ।
मार्ग मे उन्हें लगा कि अभी सवेरा है अत: भिक्षाटन के लिये थॊडि देर रुकना चाहिये । ऐसा सोच , तथागत भग्गव परिव्राजक के आश्रम में चले गये ।
भगवान्‌ बुद्ध को आता देख कर परिव्राजक उनके स्वागत के लिये खडा हुआ । उनका अभिवादन किया और उन्हें सुसज्जित उच्च आसन पर बैठाकर स्वयं उनके पास एक ओर नीचा आसन कर के बैठ गया । इस प्रकार बैठकर भग्गव परिव्राजक ने कुशल प्रेम पूछ , भगवान्‌ बुद्ध से कहा –” हे श्रमण गौतम ! कुछ दिन हुये सुनक्खत लिच्छवी मेर्ते पास आया था । कहता था कि मैने श्रमण गौतम का शिष्यत्व त्याग दिया है । क्या जैसा उसने कहा ठीक है ?”
”हाँ , भग्गव ! ऐसा ही है , जैसा सुनक्खत लिच्छवी ने कहा ।“ तथागत ने आगे कहा – “कुछ दिन हुये सुनक्खत लिच्छवी  मेरे पास आया था और कहने लगा कि मै तथागत के शिष्य़्तत्व का त्याग करता हूँ क्योंकि तथागत सामान्य व्यक्तियों से परे कोई चमत्कार नही दिखाते ।”
इस पर मैने कहा – “सुनक्खत ! क्या मैने तुमसे कभी कहा था कि आ तू मेरा शिष्य बन जा , मै तुम्हें सामान्य व्यक्तियों की शक्ति से परे चमत्कार दिखाऊंगा ? ”
”नहीं भगवान्‌ आपने तो ऐसा नही कहा था ।” सुनक्खत ने उत्तर दिया ।
मैने उससे कहा – “सुनक्खत ! मेरे धर्म का उद्देशय चमत्कार दिखाना नही है । मेरे धर्म का उद्देशय यही है कि जो मेरे धर्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दुखों का नाश करेगा ।”
सुनक्खत ने फ़िर कहा – “भगवान्‌! आप सृष्टि के आरम्भ का पता भी नही देते ।” इस पर मैने कहा – “सुनक्खत ! क्या मैने तुमसे  कभी कहा था कि आ तू मेरा शिष्य बन जा , मै तुम्हें सृष्टि के आरम्भ का पता बताऊंगा ?”
सुनक्खत ने कहा –” नही भगवान्‌ आपने ऐसा तो कभी नही कहा था ।”
”मैने उससे कहा कि सुनक्खत मेरे धर्म का उद्देशय सृष्टि के आरम्भ का पता बताना नही है । मेरे धर्म का उद्देशय है कि जो मेरे धर्म के अनुसार आचरण करेगा , जो मेरे धर्म को क्रियात्मक रुप से अपने ऊपर ढाल लेगा , वह अपने दुखों का नाश कर सकेगा ।”
मैने कहा – “सुनक्खत ! मेरे धर्म का उद्देशय की दृष्टि मे इसका कोई महत्व नही है कि चमत्कार दिखाया जाये या नही । सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाये या नही ।”

भगवान्‌ बुद्ध और पोट्‌ठपाद ब्राहमण के बीच का संवाद

एक समय भगवान्‌ बुद्ध अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में ठहरे हुये थे । उस समय पोट्‌ठपाद परिव्राजक मल्लिका के महाप्रसाद में ठहरा हुआ था । उसका उद्देशय भगवान्‌ बुद्ध से दार्शनिक चर्चा करना था । उसके साथ करीब तीन सौ अनुयायी थे ।
पोट्‌ठपाद ने  भगवान बुद्ध से कहा – “  भगवान्‌ कृपया मुझे यह बता दें कि यह मत ठीक है कि संसार अनंत है और शेष मत मृषा है ? ”
तथागत बोले , “ पोट्‌ठपाद ! मैने यह कब कहा कि यह मत ठीक है कि संसार अनंत है और सब मत मृषा हैं ? मैनें इस विषय में कभी भी कोई मत नही दिया ।”

तब , पोट्‌ठपाद ने इसी तरह से इन सभी प्रशनों का उत्तर पूछा -
  • क्या संसार अनंत नही है ?
  • क्या संसार ससीम है ?
  • क्या संसार  असीम है ?
  • क्या आत्मा और शरीर एक ही है ?
  • क्या आत्मा और शरीर भिन्न –२ हैं ?
  • क्या तथागत मरणान्तर रहते हैं ?
  • क्या तथागत मरणान्तर नही रहते हैं ?
  • क्या वे रहते भी हैं और नही भी रहते हैं ?
और हर प्रशन के उत्तर में भगवान्‌ बुद्ध ने एक ही उत्तर दिया कि “ पोट्‌ठपाद ! मैनें इन  विषयों  में कभी भी कोई मत नही दिया है ।”
“ लेकिन तथागत ने इन विषयों में कोई भी मत क्यूं नही दिया है ? ” – पोट्‌ठपाद ने कहा ।
“ क्यूंकि इन प्रशनों का उत्तर देने से किसी को कुछ भी लाभ नही , इनका धर्म से कुछ भी संम्बन्ध नही , इनसे आदमी को आचरण सुधारने मॆ कोई भी सहायता नही मिलती , इनसे विराग नही बढता , इनसे राग- द्धेष से मुक्ति नही मिलती , इनसे शान्ति नही मिलती , इनसे शमथ लाभ नही होता और न तो यह निर्वाण की ओर अग्रसर करते हैं । इसी लिये मैने कभी भी इन विषयों पर कोई भी मत व्यक्त नही किया । ”
“ तो तथागत ने किन विषयों का व्याख्यान किया है ?  ” – पोट्‌ठपाद ने कहा ।
“ मैने बताया है कि दुख क्या है ? मैनें बताया है कि दु:ख का समुदय ( मूल कारण ) क्या है ? मैने बताया है कि दु:ख का निरोध क्या है ? मैनें बताया है कि दु:ख के निरोध ( अन्त ) का मार्ग क्या है ? ”
“ और तथागत ने इन विषयों पर व्याख्यान क्यूं दिया है ? ”
“ क्यूं की पोट्‌ठपाद ! इनसे लोगोंको लाभ है , इनका धर्म से संम्बन्ध है , इनसे आदमी को अपना आचरण सुधारने में सहायता मिलती है , इनसे विराग बढता है , इनसे राग द्धेष से मुक्ति मिलती है , इनसे शान्ति मिलती है , इनसे प्रज्ञा बढती है , और यह निर्वाण की ओर अग्रसर करते हैं । इसलिये पोट्‌ठपाद ! मैने इन विषयों का व्याख्यान दिया है । ”

सकंलन :

  • “एस धम्मो सनंतनो”- ओशो प्रवचन “ भगवान्‌ बुद्ध की देशना –धम्मपद
  • भगवान्‌ बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अम्बेड्कर , अनुवादक :डां भदन्त आनन्द कौसल्लायन

अगले भाग में : ईश्वर मॆ ( अ) विश्वास और बुद्ध धम्म

 

Wednesday, August 28, 2013

कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाये …

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बुद्ध, जैन और कृष्ण श्रमण सभ्यता के तीन अंग है I कृष्ण में श्रद्धा रखने वाले सभी बन्धुओ को कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाये I उम्मीद है आप के ह्रदय में भी कृष्ण पैदा होंगे I दरअसल कृष्ण मथुरा में पैदा होते है .... मथुरा के आप पास की गयी खुदाई में कृष्ण का अस्तित्व बारहवी सताब्दी से पहले नहीं मिलता है मथुरा का पुरातत्व संग्रहालय इसका गवाह है I फिर वो कृष्ण की मथुरा कौन सी जगह है I दरअसल जब आप अपने मन को थुरते है तो उसमे कृष्ण पैदा होते है ... इस लिए इसे मथुरा कहते है I जब आप मन को नियंत्रित करने की साधना करते है तो उसमे कृष्ण पैदा होते है I बुद्ध भी कहते है जिसने अपने मन को जीत लिया वही सबसे बड़ा शूरवीर है, जिसने अपने इन्द्रियों को जीत लिया वही जिन्न और जैन है I
कृष्ण कहते है मुझे प्राप्त करने का रास्ता गुरु से हो कर जाता है I गुरु की सूरत में में ध्यान लगाओ और किसी भी दो सब्द के अक्षर का हर आने जाने वाली श्वास में जाप करो ... मै तुम्हे दर्शन दूंगा ... मै तुम्हारे मन में पैदा हो जाऊंगा I रामानंद ने भी कबीर को बनारस के घाटो की सीढियों पर यही दीक्षा दी थी I
बुद्ध कहते है जो पैदा होगा वह मृत्यु को प्राप्त होगा , संसार में सब कुछ नशवर है इस लिए किसी की सूरत और सीरत में ध्यान मत लगाओ, कही भी धोखा हो सकता है I लेकिन तुम स्वयं मात्र एक ऐसे व्यक्ति हो जो अपने आप को धोखे से बचा सकता है और तुम जब तक जिन्दा हो तुम्हारी शवास जिन्दा है ... इस लिए तुम ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी शवास में लगाओ, साथ साथ अपने मन के कोने में एक ऐसा दीपक जलाओ जो तुम्हारा मार्गदर्शन कर सके .... अप्प दीपो भव I
फैसला आप का होगा ... गुरु आप को चुनना है ... कही गुरु घंटाल चुन लिया तो आपकी बीबी बहु बेटी सुरक्षित नहीं बचेगी I रोज बलात्कार होगा और आप जिम्मेदार होंगे इसके लिए I राजस्थान में बहुत सारी महिलाये आज भी बहुत से गुरुघंटाल बाबाओ की शिकार होती है ... मजा तो इस बात में है की वे कहती है की गुरु तो पूरी जिंदगी में एक ही बनाना होता है चाहे वो जो करे .... मानसिक गुलामी की हद है यह I
अप्प दीपो भव I  गोविंदा .. गोविंदा I

साभार : श्री अजय सिंह मौर्या