Saturday, March 9, 2024

सत्य घटना पर आधारित: मगध के सम्राट अजातशत्रु और महामात्य कुलगुरु राक्षस के बीच हुआ एक प्रेरक संवाद



सत्य घटना पर आधारित: मगध के सम्राट अजातशत्रु और महामात्य कुलगुरु राक्षस के बीच हुआ एक प्रेरक संवाद 

एक बार महामात्य राक्षस एक लंबी यात्रा के बाद जब मगध वापस लौटकर सम्राट से मिलने पहुँचे तो उन्हें जानकारी मिली कि बुद्ध के घोर दुश्मन सम्राट अजातशत्रु अब स्वयं बुद्ध के अनुयायी बन गये हैं। यह सुनकर ब्राह्मण महामात्य राक्षस बहुत परेशान हो गये। वे सीधे सम्राट अजातशत्रु से मिलने राजदरबार जा पहुँचे। वहाँ उनके और सम्राट अजातशत्रु के बीच जो संवाद हुआ उसे जानिए।
महामात्य राक्षस: सम्राट, मैं यह क्या सुन रहा हूँ कि आप अपने क्षत्रिय धर्म को कैसे त्याग कर बुद्ध के अनुयायी बन गये हैं? 

सम्राट अजातशत्रु: आप सही सुन रहे हैं, महामात्य राक्षस।
महामात्य राक्षस: यह तो घोर अनर्थ हो गया महाराज।
सम्राट अजातशत्रु: कैसे, महामात्य राक्षस?

ब्रामहामात्य राक्षस: अच्छा होता यदि में यात्रा पर ना जाता। आप ऐसा घनघोर अनर्थ कैसे कर सकते हैं? क्षत्रिय धर्म ही आपके लिये सर्वोपरि है उसे आप कैसे छोड़ सकते हैं? आपका कर्तव्य है कि मगध की सीमाएँ बढ़ायें और चक्रवर्ती सम्राट बनें।
सम्राट अजातशत्रु: मैं अपना कर्तव्य भली भांति जानता हूँ, कुलगुरु। 

महामात्य राक्षस: लगता है बुद्ध ने आपको भी आपके पिता सम्राट बिंबसार की भाँति भ्रमित कर दिया है। बुद्ध के पास कोई सम्मोहन शक्ति है जिसके उपयोग से उसने आपके पिता को भी इसी तरह भ्रमित कर दिया था।
सम्राट अजातशत्रु: महामात्य, कृपया कर बुद्ध पर झूठे लांछन ना लगाएं।

महामात्य राक्षस: महाराज? मैं सत्य कह रहा हूँ। बुद्ध ने आज तक सिर्फ़ ऐसी बातें कही हैं। जिससे राज्य में अनेकों प्रश्न उठ रहे हैं। परंतु किसी का भी उत्तर नहीं मिला।
सम्राट अजातशत्रु: जैसे की क्या? कुछ उदाहरण देकर बतलाइए। 

महामात्य राक्षस: जैसे कि, ये संसार शाश्वत है या नश्वर। यह सृष्टि सीमित है अथवा अनंत। शरीर आत्मा दो हैं या एक? मृत्यु के पश्चात, हमारा अस्तित्व रहता है या उसका विनाश हो जाता है?
सम्राट अजातशत्रु: मैं इन किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगा, कुलगुरु महामात्य। ये सब आपकी बुद्धि की उपज है। बुद्ध ने कभी भी अपने उपदेशों में इन बातों को कभी ज़रा भी तूल नहीं देते हैं। 

महामात्य राक्षस: यदि इन शाश्वत प्रश्नों का उत्तर बुद्ध के पास से तो नहीं है तो वो किस विषय पर उपदेश देते हैं? उनके प्रवचनों का हमें क्या लाभ? 
सम्राट अजातशत्रु: बुद्ध कहते हैं कि अपने शरीर और अपनी साँसों को साधो, उससे अपने अंतर्मन को तोड़ती-मरोड़ती विभिन्न भावनाओं को समझो। अपने दुख: और संताप पर विजय पाओ। जीवन की छोटी छोटी अनेक लहरों के थपेड़ों में सजग और ध्यानपूर्ण जियो। बुद्ध, जीवन से मुँह मोड़ने को नहीं कहते, चेतना से जीने को कहते हैं। कुलगुरु, जीवन इन्हीं छोटी छोटी बातों का मूल्य रत्नकोष है। ना की बड़ी सैद्धांतिक बातों का।
महामात्य राक्षस: सम्राट छोटे-छोटे लोग इन्हीं छोटी-छोटी खुशियों के साथ जीते हैं परंतु आप तो मगध सम्राट हैं! आप का स्तर, इस मगध में सबसे सबसे ऊपर है।

सम्राट अजातशत्रु: कुलगुरु, यह ऊपर और नीचे के स्तर का विचार भी मनुष्य बुद्धि की उपज ही है। 
महामात्य राक्षस: लगता है, महाराज आप विनाश की ओर जा रहे हैं। एक क्षत्रिय होकर भी ज्ञानियों जैसी बातें कर रहे हैं। आप क्षत्रिय हैं या ब्राह्मण? 

सम्राट अजातशत्रु: क्षत्रिय और ब्राह्मण का अंतर भी मनुष्य बुद्धि ने ही पैदा किया है। मुझे बुद्ध के चरणों में शांति मिली है।
महामात्य राक्षस: महाराज, यदि आपको शांति चाहिए तो मैं इसके उपाय आपको बता सकता। सम्राट अजातशत्रु: आपसे मुझे आज तक केवल अशांति ही मिली है कुलकुरु। आप क्या मुझे शांति देंगे? आपकी बातों में आकर मैं अपने धर्मपरायण पिता की हत्या का कारण बना। आँखें बंद करता हूँ तो स्वर्गीय महाराज बिंबसार की प्रेम भरी मूरत टकटकी बांधे मुझे निहारती दिखाई देती है। अब न रातों को नींद आती है, ना दिन को चैन मिलता है।

महामात्य राक्षस: क्षमा करें, महाराज। मैं एक ब्राह्मण हूँ इसलिए सत्य कहने से संकोच नहीं करूँगा। आपके विषाद का कारण पिता की हत्या का पछतावा नहीं बल्कि नगरवधू आम्रपाली का बुद्ध की भिक्षुणी बन जाना है। इस बात से आपको बहुत आघात पहुंचा है।
सम्राट अजातशत्रु: इस बात को सुनते ही सम्राट अजातशत्रु आवेश में आकर अपनी तलवार खींच लेते हैं।

महामात्य राक्षस: सम्राट को म्यान से तलवार खींचते हुआ देख, उपहास पूर्वक कटाक्ष करते हुए कहते हैं। लगता है बुश ने आपको यही (अर्थात् आवेश और उसमे किसी ब्राह्मण अथवा अपने कुलगुरु की हत्या) करना सिखाया है। मगध के लोगों को आप से बहुत सारी आशाएं थीं, परंतु आप तो हमारा ही (एक ब्राह्मण कुलगुरु का) दमन का रहे हैं? चलिए यह भी सही। हम भी इसके लिए तैयार है। यह कहकर महामात्य राक्षस दरबार से चले जाते हैं।

तब सम्राट अजातशत्रु का सेनापति जो उस समय राज दरबार में यह सारा वादविवाद देख और सुन रहा था बहुत आश्चर्य भाव से कह उठता है, महाराज, आप में यह परिवर्तन देखकर मुझे बहुत आश्चर्य है और मैं यह देखकर बहुत हैरान हूँ कि अजातशत्रु की उठी हुई तलवार आज पहली बार म्यान से बाहर निकलने के बाद, बिना वार किए वापस म्यान में कैसे चली गयी?
सम्राट अजातशत्रु: यह सुनकर शत्रु। सो। सम्राट अजातशत्रु। बहुत शांत भाव से कहते हैं। की मुझे। कुल गुरु की हत्या करने में। तनिक संकोच ना होता। मगर यदि मैं ऐसा करता। तो वह मेरे गुरु। भगवान बुद्ध का अपमान होता। बड़े ऊंचे स्वर में बोलकर या मेरी बेइज्जती कर कोई मुझे कितना भी उत्तेजित न कर लें। अब मैं, कभी हिंसा के मार्ग पर नहीं जाऊंगा और उसी मार्ग पर चलूँगा जो मेरे गुरू भगवान बुद्ध मुझे दिखाएंगे।

इस सत्य घटना से आपने क्या ग्रहण किया आप जाने और यदि आप बताना चाहें तो कमेंट बॉक्स में लिख दें जिससे कोई और भी प्रेरणा ले सके। आप सभी का मंगल हो।

साभार : Dr Nirmal Gupta, cardiologist, SGPGI

Monday, March 4, 2024

Secrets Of The Buddha Relics




सीक्रेट्स ऑफ़ द बुद्धा रेलिक्स एक डॉक्यूमेंट्री श्रृंखला है जो गौतम बुद्ध के अवशेषों के इतिहास और महत्व की पड़ताल करती है। यह शो राघव जैरथ द्वारा निर्देशित, नीरज पांडे द्वारा निर्मित और मनोज बाजपेयी द्वारा होस्ट किया गया है। 
 श्रृंखला में चार एपिसोड हैं, जो निम्नलिखित विषयों का पता लगाते हैं:
 * बुद्ध का जीवन और मृत्यु
 * बुद्ध के अवशेषों की खोज और प्रमाणीकरण
 * बुद्ध के अवशेषों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
 * बुद्ध के अवशेषों का भविष्य
श्रृंखला दुनिया भर के स्थानों पर फिल्माई गई थी, जिसमें भारत, चीन, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं। इसमें बुद्ध धर्म के विद्वानों, पुरातत्वविदों और धार्मिक नेताओं के साक्षात्कार शामिल हैं।

श्रृंखला वर्तमान में [Discovery +] पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है।

Tuesday, February 27, 2024

How to get lasting happiness? (स्थायी सुख को कैसे प्राप्त करें?)



How to get lasting happiness?
Knowledge of "Dhamma" eradicates suffering and gives happiness. It is not the Buddha but the "Dhamma, -the knowledge of anicca (impermanence) within the body", which gives this happiness. That is why one must meditate and achieve the state of continuous awareness of anicca, moment to moment. –Sayagyi U Ba Khin

Translation in Hindi:
धम्म ही दुखों को दूर करता है और सुख देता है। तथागत बुद्ध किसी को भी दुख: से मुक्त नहीं करा सकते बल्कि धम्म - जो शरीर के अंदर-बाहर हर पल घटती अनिच्चता (नश्वरता) का ज्ञान यह खुशी देता है। इसीलिए सभी को ध्यान करना चाहिए और क्षण-प्रति-क्षण घटती अनिच्चता (नश्वरता) के प्रति लगातार जागरूकता की स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। –सयाजी ऊ बा खिन
साभार : Dr Nirmal Gupta 

Saturday, February 24, 2024

माघ पूर्णिमा की अनंत मंगलकामनाएं

Photo credit: Bhikku Sakya Muni

Photo credit: Prof Nirmal Kumar 

🪷🙏🏻माघ पूर्णिमा का महत्व 🪷🙏🏻
(  माघ पूर्णिमा का महत्व )

1.. आज से २६१२ साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन गौतम बुद्ध शासन में प्रथम संघ अधिवेशन [महा संघ सन्निपात ] १२५० अर्हन्तो के साथ राजगिर वेळुवनाराम में हुआ।
 भंते सारिपुत्त एवं भंते मोग्गल्लान सहित २५० भिक्षु संघ, भंते उरुवेल काश्यप, भंते नदी कश्यप, भंते गया कश्यप और १००० भिक्षु लोग इस अधिवेशन में एकत्रित हुए थे।

2.. आज से २६१२ साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन ही हमारे शास्ता भगवान बुद्ध जी ने सारिपुत्त मुनि जी और मोग्गल्लान मुनि जी को इस गौतम बुद्ध शासन में अग्रश्रावक का पद प्रधान किए थे। ये भी राजगीर वेळुवनाराम आश्रम में ही हुआ।

ऐते देव सहायका आगच्छन्ति, कोलितो उपतिस्सो च, 
एतं मे सावक युगं, भविस्सति भद्द अग्गयुगंति ।

"भिक्षुओ ! यह दो मित्र कोलित (मोग्गल्लान) और उपतिष्य (सारिपुत्र) आ रहे हैं। 

यह मेरे प्रधान शिष्य युगल होंगे, भद्र-युगल होंगे।"....

[महाखंदक, विनय पिटक]

उन अग्रश्रावक अर्हन्त सारिपुत्त मुनि एवं मोग्गल्लान मुनि जी को कोटि कोटि नमन !

3.. आज से २६१२ साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन सभी सम्बुद्ध लोगों का उपदेश जो "ओवाद प्रातिमोक्ष " नाम का उपदेश हमारे शास्ता गौतम बुद्ध जी ने पहली बार वेळुवन आश्रम में एकत्रित भिक्षु लोगों को दिया था। इस में तथागत बुद्ध जी ने ये गाथाएँ बताई ।

सब्बपापस्स अकरणं - कुसलस्स उपसम्पदा सचित्तपरियोदपनं - एतं बुद्धान सासनं ।

... सभी पाप कर्मों को न करना, पुण्यकर्मों की संपदा संचित करना, अपने चित्त को परिशुद्ध करना यही बुद्धों की शिक्षा है ।..

खन्ती परमं तपो तितिक्खा निब्बानं परमं वदन्ति बुद्धा न हि पब्बजितो परूपघाती न समणो होति परं विहेठ्यन्तो।

... सहनशीलता और क्षमाशीलता परम तप है। बुद्ध जन निर्वाण को उत्तम बतलाते हैं। दूसरे का घात करने वाला प्रव्रजित नहीं होता और दूसरे को सताने वाला श्रमण नहीं हो सकता ।

अनूपवादो अनूपघातो - पातिमोक्खे च संवरो

मत्तनुता च भत्तस्मिं - पन्तञ्च सयनासने

अधिचित्ते च आयोगो - एतं बुद्धान सासनं ।

... निंदा न करना, घात न करना, भिक्षु नियमों द्वारा अपने को सुरक्षित रखना, आहार की मात्रा की जानकारी होना, एकांत में सोना बैठना और चित्त को एकाग्र करने के लिये प्रयत्न में जुटना, यह सभी बुद्धों की शिक्षा हैं।...

4.. आज से २५६७ साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन यानि महा परिनिर्वाण के ६ महीने के पहले माघ पूर्णिमा के दिन वैशाली में चापाल चैत्य स्थान में पापी मार के अयाचना से भगवान् ने अपने "आयु संस्कार" छोड़ दिए। इसके बाद तथागत ने तिन महिने बाद महापरीनिर्वाण को प्राप्त करने कि घोषणा कि।

"ऐसा कहनेपर भगवान ने पापी मार से यह कहा - "पापी ! बेफिक्र हो, न-चिर ही तथागत का परिनिर्वाण होगा। आज से तीन मास बाद तथागत परिनिर्वाण को प्राप्त होंगे।" तब भगवान्ने चापाल चैत्य में स्मृति-संप्रजन्यके साथ आयुसंस्कार (प्राण-शक्ति) को छोड दिया। जिस समय भगवान ने आयु-संस्कार छोडा उस समय 'भीषण रोमांचकारी महा भूचाल हुआ, देवदुन्दुभियाँ बजी। इस बात को जानकर भगवान ने उसी समय यह उदान कहा- "मुनि ने अतुल-तुल उत्पन्न भव-संस्कार (जीवन शक्ति) को छोड दिया। अपने भीतर रत और एकाग्र चित्त हो उन्होंने अपने साथ उत्पन्न कवच को तोड दिया। " [महा परिनिव्वान सुत्त]

ऐसे महत्वपूर्ण माघ पूर्णिमा के दिन आप सभी लोग उपोसथ धारण करके अप्रमाण पुण्य अर्जित करिए ! 
सबका मंगल हो

Thursday, February 22, 2024

दर्पण से सीखो

 "दर्पण से सीखो" बुद्ध और राहुल की कहानी एक ऐसी कहानी है, जिसमें बताया गया है कि कैसे बुद्ध ने अपने पुत्र राहुल को सत्य और शुद्धता का महत्व समझाया। इस कहानी में बुद्ध ने राहुल को एक दर्पण दिया और कहा कि वह उसमें अपना चेहरा देखे और अपने मन की अवस्था को जाने। बुद्ध ने राहुल को यह बताया कि जैसे दर्पण में दिखने वाला चेहरा अस्थिर और बदलने वाला होता है, वैसे ही हमारा मन भी अनित्य और परिवर्तनशील होता है। इसलिए हमें अपने मन को शांत और स्वच्छ रखना चाहिए, और झूठ बोलने से बचना चाहिए।







 




Friday, January 26, 2024

अवतारवाद का अधूरा सच


प्रमाणित लेख विपश्यना की वेबसाइट पर उपलब्ध है ... जोकि हिंदी लेख के अंत अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषा में है ... 
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भविष्य में कभी भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं कहोंगे.. गोयनका जी ने ऐसी घोषणा शंकराचार्यो से लिखित में करवाई थी.




शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वतीजी और विपश्यना आचार्य सत्यनारायण गोयन्काजी की संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति—
स्थल: महाबोधि सोसाइटी कार्यालय, सारनाथ, वाराणसी
समयः दोपहर: 3:30, दिनांक 12-11-1999.
जगद्गुरु कांची कामकोटि पीठ के श्रद्धेय शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वतीजी और विपश्यनाचार्य गुरुजी सत्यनारायण गोयन्काजी की सौहार्दपूर्ण वार्तालाप की संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित की जा रही है।
दोनों इस बात से सहमत हैं और चाहते हैं। कि दोनों प्राचीन परंपराओं में अत्यंत स्नेहपूर्वक वातावरण स्थापित रहे। इसे लेकर जिन पड़ोसी देशों के बन्धुओं में किसी कारण किसी प्रकार की गलतफहमी पैदा हुई हो, उसका जल्दी ही निराकरण हो। इस संबंध में निम्न बातों पर सहमति हुई —

1) किसी भी कारण से पहले के समय में आपसी मतभेदों को लेकर जो भी साहित्य निर्माण हुआ, जिसमें भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार बता कर जो कुछ लिखा गया, वह पड़ोसी देश के बंधुओं को अप्रिय लगा, इसे हम समझते हैं। इसलिए दोनों समुदायों के पारस्परिक संबंधों को पुनः स्नेहपूर्वक बनाने के लिए हम निर्णय करते हैं। कि भूतकाल में जो हुआ, उसे भुला कर अब हमें इस प्रकार की किसी मान्यता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।

2) पड़ोसी देशों में यह भ्रांति फैली कि भारत का हिंदू समुदाय बुद्ध के अनुयायिओं पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इन कार्यशालाओं का आयोजन कर रहा है। यह बात उनके मन से हमेशा के लिए निकल जाय, इसलिए हम यह प्रज्ञापित करते हैं। वैदिक और बुद-श्रमण की परंपरा भारत की अत्यंत प्राचीन मान्य परंपराओं में से हैं। दोनों का अपना-अपना गौरवपूर्ण स्वतंत्र अस्तित्व है। किसी एक परंपरा द्वारा अपने आपको ऊंचा और दूसरे को नीचा दिखाने का काम परस्पर द्वेष, वैमनस्य बढ़ाने का ही कारण बनता है। इसलिए भविष्य में कभी ऐसा न हो। दोनों परंपराओं को समान आदर एवं गौरव का भाव दिया जाये।

3) सत्कर्म के द्वारा कोई भी व्यक्ति समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है और दुष्कर्म के द्वारा नीचा,पतित, हीन लेता है। इसलिए हर व्यक्ति सत्कर्म करके तथा काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, मात्सर्य, अहंकार इत्यादि अशुभ दुर्गुणों को निकाल कर अपने आप को समाज में उच्च स्थान पर स्थापित करके सुख-शांति का अनुभव कर सकता है।
उपर्युक्त तीनों बातों पर हम दोनों की पूर्ण सहमति है तथा हम चाहते हैं कि भारत के सभी समुदाय के लोग पारस्परिक मैत्री भाव रखें तथा पड़ोसी देश भी भारत के साथ पूर्ण मैत्री भाव रखें
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इस घोषणा द्वारा यह स्वीकार किया गया कि व्यक्ति जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता, चाहे वह कहीं भी जन्मा हो । यदि वह सत्कर्म करता है तो समाज में पूज्य ही माना जायगा।
इसके बाद केवल एक को छोड़ कर बाकी सभी शंकराचार्यों ने और अनेक महामंडलेश्वरों ने भी इस समझौते पर अपनी स्वीकृति के हस्ताक्षर किये। यह सब विपश्यना के आधार पर हुआ। परंतु इस समझौते की सच्चाई को समाज में फैलाने का महत्त्वपूर्ण कार्य अभी होना बाकी है। समझौते की यह सच्चाई लोगों तक फैलेगी तभी उनकी भी भ्रांतियां दूर होगी।
अब समय आ गया है कि इसका अधिक से अधिक प्रकाशन करके, इस पर अमल किया जाय ताकि ग़लतफ़हमी दूर हो और देश की एक बड़ी समस्या का समाधान हो सके।
भारत के बाहर अन्य देशों में जात-पांत का भेदभाव नहीं है, परंतु कुछ एक पश्चिमी देशों में काले-गोरे का भेद अवश्य है। अब काले और गोरे दोनों ही विपश्यना में सम्मिलित हो रहे हैं। हसी जाति के कुछ लोगों को विपश्यना में पुष्ट करके आचार्य पद पर बैठाया और वे विपश्यना के शिविर लगाते हैं, जिनमें काले और गोरे सभी सम्मिलित होते हैं।
भगवान बुद्ध की शिक्षा ग्रहण करने वाला व्यक्ति जन्म के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेदभाव नहीं करता। विपश्यना धीमी गति से यही काम कर रही है। आज यह बहुत नन्हा-सा प्रारंभिक प्रयोग है जो आगे चल कर प्रबल रूप से संसार के सारे विपश्यी साधकों को प्रभावित करेगा और बाबासाहेब का सपना पूरा होगा । इसका मुझे पूर्ण विश्वास है । इसीमें सब का मंगल समाया हुआ है। भारत का ही नहीं, बल्कि सारे मानव समाज का कल्याण समाया हुआ हैं।

मंगलमित्र,
सत्यनारायण गोयन्का 

https://www.vridhamma.org/node/2428

https://www.vridhamma.org/sites/default/files/newsletters/1434022881_hi1999-13-KARUNAPURN-SANDAVANA.pdf

https://www.facebook.com/iAbhidhamma?mibextid=ZbWKwL

Saturday, October 21, 2023

बुद्ध द्वारा दिए गए वह पांच अनमोल सूत्र

साधकों ! चाहे कोई स्त्री हो, वा पुरुष हो, चाहे कोई गृहस्थ हो,  वा प्रव्रजित हो,उसे पांच बातों पर निरन्तर विचार करते रहना चाहिए।  

कौन सी पांच बातों ? 

1. मैं जरा ( बुढ़ापा )-धर्मी हूँ, जरा से वशीभूत हूँ। 
2. मैं रोग धर्मी हूँ, रोग से वशीभूत हूँ। 

3. मैं मरण धर्मी हूँ, मरण से वशीभूत हूँ। 

4. चाहे स्त्री हो या पुरुष,चाहे गृहस्थ हो या प्रव्रजित हो उसे इस बात पर निरंतर विचार करते रहना चाहिए कि जितनी भी मेरी प्रिय वस्तुयें है,अच्छी लगने  वाली वस्तुयें है, उन सबका नाश, विनाश निश्चित है। 

5.उसे इस बात पर निरन्तर विचार करते रहना चाहिए कि कर्म  मेरा है, कर्म ही उत्तराधिकार है, मैं कर्म से ही उत्पन्न हुआ हूँ। कर्म ही मेरा बन्धु है, कर्म ही शरण स्थान है, इसीलिये जो भी भला -बुरा कर्म करूंगा वह मेरा उत्तराधिकार में आयेगा। 
 
संदर्भ: अंगुत्तर निकाय 

भवतू सब्ब् मंगलम् 🙏🏻🙏🏻🪷