Sunday, September 1, 2019

53-सेख-सुत्त (2.1.3)🍃

53
🍁मज्झिम निकाय🍁
🔱मज्झिम-पण्णासक🔱
🛐गहपतिवग्ग🛐
🍃53-सेख-सुत्त (2.1.3)🍃



👂ऐसा मैंने सुना--

🚶एक समय भगवान् शाक्य (जनपद) में कपिलवत्थु के निग्गोधाराम (न्यग्रोधाराम) में विहार करते थे।

🌷उस समय कपिलवत्थु (कपिलवत्थु) के शाक्यों ने अभी ही अभी एक संथागार (संस्थागार) (-गण-संस्था का आगार) बनवाया था; श्रमण-ब्राह्मण या किसी मनुष्य द्वारा जिसका अभी उपभोग नहीं हुआ था। तब कपिलवत्थु के शाक्य जहां भगवान् थे, वहां गए, जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठ कपिलवत्थु के शाक्यों ने भगवा से यह कहा--

🙏"भन्ते! यह (हम) कपिलवत्थु के शाक्यों ने अभी ही अभी एक नया संथागार बनवाया है। उसका भन्ते! भगवान् पहले उपभोग करें। भगवान् के पहले परिभोग करने के बाद कपिलवत्थु के शाक्य उसका परिभोग करेंगे। यह कपिलवत्थु के शाक्यों को चिरकाल तक के हित-सुख के लिए होगा।”

🌷भगवान् ने मौन से स्वीकार किया। तब कपिलवत्थु के शाक्य भगवान की स्वीकृति को जानकर आसन से उठ भगवान को अभिवादन कर प्रदक्षिणाकर, जहां संथागार था, वहां गये। जाकर संथागार में सब ओर फर्श बिछा, आसनों को स्थापित कर, पानी के मटके रख, तेल के प्रदीप आरोपित कर; जहां भगवान् थे, वहां गए; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो बोले--

👄🙏"भन्ते! संथागार सब ओर से बिछा हुआ है; आसन स्थापित किए हुए हैं, पानी के मटके रखे हुए हैं, तेल-प्रदीप आरोपित किए हैं। भन्ते! अब भगवान जिसका काल समझें (वैसा) करें।"

🌷तब भगवान् पहन कर पात्र-चीवर ले, भिक्खुसंघ के साथ जहां संथागार था, वहां गए। जाकर पैर पखार, संथागार में प्रवेश कर, पूर्व की ओर मुंह कर बैठे; भिक्खुसंघ भी पैर पखार... पश्चिम भीत के सहारे भगवान को आगे कर बैठा। कपिलवत्थुवाले शाक्य भी पैर पखार, संथागार में प्रवेश कर पश्चिम की ओर मुंह कर पूर्व की भीत के सहारे भगवान को सम्मुख रखकर बैठे। तब भगवान ने कपिलवत्थु के शाक्यों को बहुत रात तब धार्मिक कथा से संदर्शित समादपित, समुत्तेजित, संप्रहर्षितकर आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया--

👄“आनन्द! अब कपिलवत्थु के शाक्यों को बाकी उपदेश तू कर; मेरी पीठ अगिया रही है; सो मैं लेटूंगा।"

🙏“अच्छा, भन्ते!”–(कह) आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को उत्तर दिया।

🌷तब भगवान् ने चौपेती संघाट ( भिक्खु की ऊपरी दोहरी चद्दर) बिछवा, दाहिनी करवट के बल, पैर पर पैर रख, स्मृति-सम्प्रजन्य के साथ, उत्थान की संज्ञा (ख्याल) मन में कर सिंहशय्या लगाई। 

🔱तब आयुष्मान् आनन्द ने महानाम शाक्य को संबोधित किया-

☝"महानाम! आर्य श्रावक शील (=सदाचार)से युक्त, इन्द्रिय में संयत (=गुप्तद्वार), भोजन में मात्रा को जाननेवाला, जागरण में तत्पर, सात सद्धर्मों के सहित, इसी जन्म में सुख से विहार के उपयोगी चारों चैतसिक ध्यानों का पूर्णतया लाभी (पानेवाला), बिना कठिनाई के लाभी=(=अ-कृच्छ्-लाभी) होता है।

☝"महानाम! कैसे आर्यश्रावक शील से युक्त होता है?-जब महानाम! आर्यश्रावक शीलवान् (=सदाचारी) होता है। पातिमोक्ख (=भिक्खु नियम)-संवर (=रक्षा)से संवृत (=रक्षित) हो विहरता है। आचार-गोचर-संपन्न (हो) अणुमात्र दोषों में भी भय देखने वाला (होता है)। शिक्षापदों (=सदाचार-नियमों)को ग्रहणकर (उनका) अभ्यास करता है। इस प्रकार महानाम! आर्यश्रावक शील-सम्पन्न होता है।

☝“महानाम! कैसे आर्यश्रावक इन्द्रियों में गुप्तद्वार होता है?-जब महानाम! 
🌷आर्यश्रावक चक्षु (=आंख)से रूप को देखकर न निमित्त (=आकार, लिंग) का ग्रहण करनेवाला होता है, न अनुव्यंजन (=लक्षण) का ग्रहण करनेवाला होता है। जिस विषय में चक्षु-इन्द्रिय के अ-संवृत (=अ-रक्षित) हो विहरने पर अभिध्या (=लोभ), दौर्मनस्य (रूपी) पाप-बुराइयां आ घुसती हैं; उसके संवर (=रक्षा)में तत्पर होता है, चक्षु-इन्द्रिय की रक्षा करता है चक्षु-इन्द्रिय में संवरयुक्त होता है। 
🌷श्रोत्र से शब्द सुनकर... । 
🌷घ्राण से गंध सूंघकर...। 
🌷जिह्वा से रस चखकर... । 
🌷काया से स्पष्टव्य (विषय) को स्पर्शकर...। 
🌷मन से धर्म को जानकर... मन-इन्द्रिय में संवरयुक्त होता है। इस प्रकार महानाम! आर्यश्रावक इन्द्रियों में गुप्तद्वार होता है।

🤔"कैसे महानाम! आर्यश्रावक भोजन में मात्रा को जाननेवाला होता है?-
☝महानाम! भिक्खु ठीक से जानकर आहार ग्रहण करता है, क्रीड़ा, मद, मंडन-विभूषण के लिए न करके (उतना ही आहार सेवन करता है) जितना कि शरीर की स्थिति के लिए (आवश्यक) है, (भूख के) प्रकोप के शमन करने तथा वीतकाम में सहायता के लिए (आवश्यक है)। (यह सोचते हुए, कि) पुरानी भूख की वेदनाओं (=पीड़ाओं) को नाश करूंगा, नई वेदनाओं के उत्पन्न होने की (नौबत) न आने दूंगा; मेरी शरीर यात्रा निर्दोष होगी, और विहार निर्द्वन्द्व होगा। इस प्रकार महानाम! आर्यश्रावक भोजन में मात्रा जाननेवाला होता है।

🤔"कैसे महानाम! आर्यश्रावक जागरण में तत्पर होता है?-
☝महानाम! भिक्खु दिन में टहलने, बैठने या (अन्य) आचारणीय धर्मों से चित्त को शुद्ध करता है।

🤔“कैसे महानाम! आर्यश्रावक सात सद्धर्मों से युक्त होता है?- 
☝महानाम! भिक्खु
🌷 (1) श्रद्धालु होता है-तथागत की बोधि (=परमज्ञान) में श्रद्धा करता है- “भगवा अर्हत् देव-मनुष्यों के शास्ता बुद्ध भगवान हैं। 
🌷(2) ह्रीमान् (=लज्जाशील) होता है-कायिक, वाचिक, मानसिक दुराचारों से लज्जित होता है, पापों-बुराइयों के आचरण से संकोच करता है। 
🌷(3) अपत्रपी (=संकोची) होता है पापों बुराइयों के आचरण से संकोच करता है। 
🌷(4) बहुश्रुत श्रुत-धर=श्रुत-संचयी होता है-जो वे धर्म आदि-कल्याण, मध्य-कल्याण, पर्यवसान-कल्याण, सार्थक-स-व्यंजन हैं, (जो) केवल, परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को बखानते हैं, वैसे धर्म (=उपदेश) उसके बहुत सुने, वचनसे धारित, परिचित, मन से चिन्तित, दृष्टि (=दर्शन, ज्ञान)से अवगाहित (=प्रतिबिद्ध) होते हैं। 
🌷(5) आरब्धवीर्य (=उद्योगी) होता है-बुराइयों (=अकुशल-धर्मों) के छोड़ने में, और भलाइयों के ग्रहण करने में, स्थिर दृढ़-पराक्रमी होता है। भलाइयों में स्थिर, अ-निक्षिप्त-धुर (=जुआ न उतार फेंकने वाला) होता है।
🌷 (6) स्मृतिमान होता है-परमं परिपक्क स्मृति (=याद)से युक्त होता है। चिरकाल के किए और कहे का स्मरण करने वाला, अनुस्मरण करने वाला होता है।
🌷 (7) प्रज्ञावान होता है-उत्पत्ति-विनाश को प्राप्त होने वाली, अच्छी तरह दुख के क्षय की ओर ले जाने वाली आर्य निधिक (=वस्तु के तह तक पहुंचनेवाली) प्रज्ञा से युक्त होता है।

🤔"कैसे महानाम! आर्यश्रावक इसी जन्म में सुख-विहार के उपयोगी चारों चैतसिक ध्यानों को पूर्णतया लाभी, बिना कठिनाई के लाभी, अकृच्छ्-लाभी होता है?-
☝महानाम! आर्यश्रावक कामों से विरहित... प्रथम-ध्यान को...। द्वितीय-ध्यान को...। ...तृतीय-ध्यान को...। ...चतृर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है।

☝“जब महानाम! आर्यश्रावक इस प्रकार शील-सम्पन्न होता है, इस प्रकार इन्द्रियों में गुप्तद्वार होता है, इस प्रकार भोजन में मात्राज्ञ होता है, इस प्रकार जागरण से तत्पर (=अनुयुक्त) होता है, इस प्रकार सात सद्धर्मों से समन्वित होता है, इस प्रकार चारों चैतसिक ध्यानों का पूर्णतया लाभी होता है। महानाम! यह आर्यश्रावक शैक्ष्य (=निर्वाण प्राप्ति के लिए जिसे अभी कुछ करना है) प्रातिपद (=मार्गारूढ़) कहा जाता है। (वह) न-सड़े-अंड़े (की भांति) (पुरुष) निर्भेद (=तह तक पहुंचने के योग्य है, संबोध (=परमज्ञान) के योग्य है, अनुपम योग-क्षेम (=निर्वाण)की प्राप्ति के योग्य है।

☝"जैसे महानाम! आठ, दस या बारह मुर्गी के अंडे हों तो भी वे चूजे पाद-नख से या मुख-तुण्ड से अंडे को फोड़कर स्वस्तिपूर्वक निकल आने के योग्य हैं; ऐसे ही महानाम! जब आर्यश्रावक इस प्रकार शील-सम्पन्न होता है तो महानाम! यह आर्यश्रावक शैक्ष्य कहा जाता है, (वह) अनुपम योग-क्षेम की प्राप्ति के योग्य है।

☝"महानाम! वह आर्यश्रावक इसी अनुपम स्मृति की पारिशुद्धि (करनेवाली) उपेक्षा द्वारा अनेक प्रकार के पूर्वनिवासों (=पूर्वजन्मों)को स्मरण करने लगता है...। इस प्रकार आकार और उद्देश्य सहित अनेक प्रकार के पूर्वनिवासों को स्मरण करने लगता है। यह महानाम! मुर्गी के चूजे का अण्डे के कोश से पहला फूटना होता है।

☝“महानाम! फिर वह आर्यश्रावक इसी... उपेक्षा द्वारा अ-मानुष विशुद्ध दिव्य, चक्षु से... कर्मानुसार गति को प्राप्त होते प्राणियों को पहचानता है। यह महानाम! ...दूसरा फूटना है।

☝"महानाम! फिर वह आर्यश्रावक इसी उपेक्षा द्वारा आस्रवों के क्षय से आसव-रहित चित्त-विमुक्ति (=मुक्ति) प्रज्ञा-विमुक्ति को इसी जन्म में जानकर साक्षात्कारकर, प्राप्तकर विहरता है। यह महानाम! ...तीसरा फूटना है।

☝"महानाम! जो कि आर्यश्रावक शील-सम्पन्न होता है, यह भी उसके चरण (=पद या आचरण)में है। जो कि महानाम! आर्यश्रावक इन्द्रियों में गुप्तद्वार होता है, यह भी उसके चरण में है। ...भोजन में मात्राज्ञ...। ...जागरण में अनुयुक्त...। ...सात सद्धर्मों से संयुक्त...। चार आभिचेतसिक (=शुद्ध चित्तवाले) ध्यानों का पूर्णतया लाभी ...।

☝"महानाम! जो कि आर्यश्रावक अनेक प्रकार के पूर्व-निवासों को जानता है... । यह भी उसकी विद्या में है। ...विशुद्ध दिव्य-चक्षु... । ...आम्रवों के क्षय...।

☝"महानाम! ऐसा आर्यश्रावक विद्या-सम्पन्न कहा जाता है; इस प्रकार चरण-सम्पन्न (कहा जाता है)। इस प्रकार विद्या-चरण-सम्पन्न (होता है)।

☝"महानाम! सनत्कुमार ब्रह्मा ने भी यह गाथा कही है--
🌷' *गोत्र का ख्याल करनेवाले लोगों में जन्म में क्षत्रिय श्रेष्ठ है* । 
🌷*जो विद्या-चरण-सम्पन्न है, वह देव-मनुष्यों में (सबसे) श्रेष्ठ है* ।

☝“महानाम! सनत्कुमार ब्रह्मा की गाई यह गाथा सु-गीता (=उचित कथन) है, दुर्गीता नहीं; सुभाषिता है, दुर्भाषिता नहीं; अर्थ-युक्त है, अन्-अर्थ-युक्त नहीं; भगवा द्वारा भी (यह) अनुमत है।"

🍃तब भगवान ने उठकर आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया--

🙌“साधु, साधु (=शाबाश), आनन्द! तुमने कपिलवत्थु के शाक्यों के लिए शैक्ष्य मार्ग का अच्छी तरह व्याख्यान किया।”

🔱आयुष्मान् आनन्द ने यह कहा, शास्ता (=भगवान बुद्ध) उससे सहमत हुए। 
🙏कपिलवत्थु के शाक्यों ने आयुष्मान् आनन्द के भाषण का अभिनन्दन किया।🙏

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