Chapter One -- The Pairs-verses 3-4
१. यमकवग्गो- छंद-३-४
३.
अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि [अजिनी (?)] मं अहासि मे।
ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥
’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं बाँधतें रहते हैं , उनका वैर शांत नही होता है ।
"He abused me, he struck me, he overpowered me, he robbed me"--those who harbour such thoughts do not still their hatred.
अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।
ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥
’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं नहीं बाँधतें हैं , उनका वैर शांत हो जाता है ।
"He abused me, he struck me, he overpoweredme, he robbed me"--those who do not harbour
such thoughts still their hatred.