जेतवन में रहते समय एक दिन छ: वर्गीय भिक्षुओं ने सत्रह वर्गीह भिक्षुओं को मारा । भगवान् बुद्ध ने छ: वर्गीय भिक्षुओं को बुलाकर नाना प्रकार से समझाया – “ भिक्षुऒ ! भिक्षु को अपने समान ही सबको समझना चाहिये कि जैसे मैं दणड और मृत्यु से डरता हूँ , वैसे ही सब डरते हैं । ऐसा जान कर किसी को मारना या वध करना नही चाहिये । धमम्पद ~ गाथा १२९ ~
एक दिन भगवान् बुद्ध जेतवन विहार से श्रावस्ती मे भिक्षाटन के लिये जा रहे थे । उन्होने मार्ग में बहुत से लडकों को एक साँप को लाठी से मारते हुये देखा । यह देखकर भगवान् ने उनसे पूछा – “ साँप को क्यों मार रहे हो ? “
“ डँसने के डर से। ”
“ तुम ओग इसे मारकर जो अपना सुख चाहते हो , तो मरकर उत्पन्न होने के स्थान में सुख नही भोग पाओगे , अपने को सुख चाहने वालों को दूसरे का वध नही करना चाहिये । ” ब्न्हगवान ने ऐसा कहकर यह उपदेश देते हुये इस गाथा को कहा ।
आदर्शवादी पथ से होते हुये बुद्ध हमे उसे जागृत अवस्था मे ले जाते हैं जहाँ मन सांसारिक तत्वों से ऊपर उठ कर अलौकिक लौ से प्रकाशित होता है । धम्मपद का यही सार है ..बुद्धवग्गा मे यही कहा गया है कि हमारे जीवन की रुप रेखा हमारा मन करता है …अर्थात जैसे विचार वैसा कर्म …जैसा कर्म वैसा योग । जीवन को सुखद बनाने प्रति बुद्धवग्गा की यह नीतियाँ मन मे आशा और आस्था का बोध कराती हैं ।
वह विजेता है , उस पर कभी विजय प्राप्त नही की जा सकती ..उसके प्रभाव क्षेत्र मे कोई दखल नही दे सकता । उसके पास पहुँचने का मर्ग है …बुद्ध ..जो जागृत स्वरुप है ।
न हि पब्बजितो परूपघाती, न [अयं नकारो सी॰ स्या॰ पी॰ पात्थकेसु न दिस्सति] समणो होति परं विहेठयन्तो॥
धैर्य रखकर सहनशक्ति के साथ जीवन के मूल उद्देशय यानि निर्वाण प्राप्ति की कोशिश करते रहो …किसी के कष्ट का करण न बनो और न हीऒ किसी को कष्ट दो ।
१८५.
अनूपवादो अनूपघातो [अनुपवादो अनुपघातो (स्या॰ क॰)], पातिमोक्खे च संवरो।
मत्तञ्ञुता च भत्तस्मिं, पन्तञ्च सयनासनं।
अधिचित्ते च आयोगो, एतं बुद्धान सासनं॥
धम्मसंहिता पर आचरण करते हुये किसी के दोषों को न देखॊ ..दूसरों को तकलीफ़ न दो .. काने और सोने मे संयमित रहो और द्यान लगाने की पूरी चेष्टा करो ।
१८६.
न कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्जति।
अप्पस्सादा दुखा कामा, इति विञ्ञाय पण्डितो॥
स्वर्ण भंडार भी तृष्णा नही मिटा सकते …मन की प्यास नही बुझा सकते …वे समझदार है जो जानते हैं कि तूष्णा ..अन्त मे दु:ख का कारण है ।
१८७.
अपि दिब्बेसु कामेसु, रतिं सो नाधिगच्छति।
तण्हक्खयरतो होति, सम्मासम्बुद्धसावको॥
स्वर्ण समान बुअतिक आनन्द से तूप्ति असंभव है …बुद्ध के सच्चे अनुयायी वही हैं जो इच्छाओं को मार कर अनमोल आनंद की प्राप्ति करते हैं ।
१८८.
बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च।
आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्जिता॥
१८९. नेतं खो सरणं खेमं, नेतं सरणमुत्तमं।
नेतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति॥
भयग्रस्त होकर वनों पहाडॊं मे इपना , धार्मिक स्थलों की शरण लेना व्यर्थ है क्योकि इनमे से कोई भी मन को भय मुक्त नही कर सकता …
१९०.
यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च, सङ्घञ्च सरणं गतो।
चत्तारि अरियसच्चानि, सम्मप्पञ्ञाय पस्सति॥
आयें बुद्ध की शरण मे आयें …धर्मानुसार जीवन जियें और संघ के अनूकूल व्यवहार करें ।
१९१.
दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्कमं।
अरियं चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं॥
..आप चार अभिजात सत्यों को ऐसे जानों ..दु:ख, दु:ख का कारण , दु:ख का निवारण और आर्दश अष्टागिंक मार्ग …
१९२.
एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं।
एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति॥
अष्टांगिक मार्ग द्वारा आप दु:ख – वेदना से मुक्ति पा सकते हैं ..उसकी शरण मे जाना ही उत्तम उपाय है …क्योंकि फ़िर दु:ख वेदना मिट जाते हैं ।
१९३.
दुल्लभो पुरिसाजञ्ञो, न सो सब्बत्थ जायति।
यत्थ सो जायति धीरो, तं कुलं सुखमेधति॥
बुद्ध के जैसा दूसरा कोई नही है । ऐसे महापुरुष बार-२ जन्म नही लेते । जहाँ ऐसे विवेकी जन्म लेते हैं वह समाज उन्नति करता है ।
१९४.
सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना।
सुखा सङ्घस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो॥
बुद्ध का जन्म , धर्म की शिक्षा तथा संघ के अनूकूल आचरण आशीर्वाद के समान है ..
१९५.
पूजारहे पूजयतो, बुद्धे यदि व सावके।
पपञ्चसमतिक्कन्ते, तिण्णसोकपरिद्दवे॥
इसे तो ईशवर की अनुकंपा समझनी चाहिये ।
१९६.
ते तादिसे पूजयतो, निब्बुते अकुतोभये।
न सक्का पुञ्ञं सङ्खातुं, इमेत्तमपि केनचि॥
वे श्रेष्ठ हैं जो बुराइयों को त्याग कर , कष्टॊं को पार कर , भय को जीत कर , सम्मानीय को सम्मान देते हैं । बुद्ध एवं उनके अनुनायियों के प्रति आस्था और श्रद्धा रखते हैं ।
अच्छी लगने वाली चीजों को शुभ ही शुभ देखते विहार करने वाले , इंद्रियों मे असंयत , भोजन की मात्रा के अजानकार , आलसी और उधोगहीन को मार ऐसे सताता है जैसे दुर्बल वृक्ष को मारुत ( पवन )
Just as a storm throws down a weak tree,so does Mara overpower the person who lives for the pursuit of pleasures, who is uncontrolled in one's senses, immoderate in eating, indolent and dissipated. ……Dhammapada
The Blessed Buddha once said: The experience of loathsome disgust with all food, Bhikkhus & friends,developed and frequently repeated, brings a high reward and blessing, and has the Deathless Dimension as its basis & the very nearby goal. Whoever, Bhikkhus & friends, often trains perceiving disgust with food, his mind shrinks and turns away from voracious greed, he is neither attracted, captivated or tempted, but feels only equanimity or disgust! Just as, Bhikkhus & friends, a cock's feather or a piece of bowstring, thrown into the fire, shrinks up, twists, rolls itself up, does not stretch out again: just so in one who often entertains the experience of disgust in all food, the mind shrinks back from greediness, turns away from it, is repulsed by food, is not attracted; and equanimity or disgust arises!
The experience of Disgust in Food includes: Seeing it brings the danger and tribulation of having a fragile and sore body. Seeing what it becomes like when chewed and sunk: Like dogs vomit! Seeing that getting it daily costs one much pain of seeking, work & cleaning. Seeing that it is turned into secretions as bile, pus, blood, snot, slime & spit. Seeing that it undigested stays as vomit in the foul receptacle of the stomach. Seeing that it when digested is turned into diarrheic brown fluid in the intestines. Seeing that it causes a lifelong excretion of stinking messy excrement & urine. Seeing the side effects of obesity, diabetes, cardiac failure and hypertension.
Source: Path of Purification: Visuddhimagga XI 5th century AC.
जिसने कषायों ( चित्तमलों ) का परित्याग नहीं किया है पर कषाय वस्त्र धारण किये है वह संयम और सत्य से परे है । वह कषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी नही है ।
Whoever being depraved, devoid of self-control and truthfulness, should don the monk's yellow robe, that person surely is not worthy of the robe
१०.
यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो।
उपेतो दमसच्चेन, स वे कासावमरहति॥
जिसने कषायों को निकाल बाहर किया है , शीलों मे प्रतिष्ठित है, संयम और सत्य से युक्त है , वह नि:संदेह काषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी है ।
But whoever is purged of depravity, well established in virtues and filled with self-control and truthfulness, that person indeed is worthy of the robe
अच्छी लगने वाली चीजों को शुभ ही शुभ देखते विहार करने वाले , इंद्रियों मे असंयत , भोजन की मात्रा के अजानकार , आलसी और उधोगहीन को मार ऐसे सताता है जैसे दुर्बल वृक्ष को मारुत ( पवन )
Just as a storm throws down a weak tree,so does Mara overpower the person who lives for the pursuit of pleasures, who is uncontrolled in one's senses, immoderate in eating, indolent and dissipated.
८.
असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलंव पब्बतं॥
अशुभ को अशुभ जानकर साधना करने वाले , इंद्रियों में सुयंत, भोजन की मात्रा के जानकार , श्रद्धावान और उधोगरत को मार उसी प्रकार डिगा नही सकता जैसे वायु शैल पर्वत को ।
Just as a storm cannot throw down a rocky mountain, so Mara can never overpower the person who lives meditating on the impurities, who is controlled in one's senses, moderate in eating, and filled with faith and earnest effort.
मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को मैला करके कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई कर्म करता है तो दु:ख उसके पीछे ऐसे हो लेता है , जैसे गाडी के चक्के बैल के पीछे हो लेते हैं ।
Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind-wrought. If with an impure mind one speaks or acts, suffering follows one like the wheel that follows the foot of the ox.
२.
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (क॰)]॥
मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को उजला रख कर कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई ऐसा कर्म करता है तब सुख उसके पीछॆ ऐसे हो लेता है जैसे कभी संग न छॊडने वाली छाया संग-२ चलने लगती है ।
Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind wrought. If with a pure mind one speaks or acts, happiness follows one like one's never-departing shadow.
समूची बुद्ध वाणी को ’ तिपिटक ’ के नाम से जाना जाता है । तिपिटक के तीन बडे विभाजन हैं : १) विनयपिटक २) सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक । इनमें से सुत्तपिटक के अंतर्गत पाँच निकाय हैं १) दीघनिकाय २ ) मज्झिमनिकाय ३)संयुत्तनिकाय ४) अङ्गुत्तरनिकाय और ५) खुद्दकनिकाय ।’ खुद्दकनिकाय ’ के अंतर्गत १९ ग्रंथ हैं । इन १९ ग्रंथों मे से एक है “ धम्मपद्ध “ । “ धम्मपद्ध “ यानि धर्म का मार्ग जिसमें बुद्ध के धर्म संबधी सूक्त या कथन संग्रुहीत हैं । “ धम्मपद्ध “ बौद्ध धर्म की गीता है । इसमे कुल ४२३ गाथायें हैं जो गौतम बुद्ध ने बुद्ध्त्व प्राप्ति के समय से लेकर परिनिर्वाण काल तक उपदेश क्रम मे समय-२ पर कही गयी हैं ।यह सूक्त बुद्ध द्वारा विभिन्न-३ स्थानों मे जैसे जेतवन , वेणुवन , श्र्रावस्ती , वेसाली , गिज्झकूट इत्यादि में भिक्षुओं , थेरों और थेरियों को कहे गये हैं ।