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Friday, October 17, 2014

सच्चा धर्म

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गौतम बुद्ध जिन दिनों वाराणसी के पास प्रवास कर रहे थे और उनका जीवन उनके कुछ साथियों के साथ भिक्षा पर चल रहा था, उन दिनों उनके एक अति प्रिय शिष्य को एकबार कहीं भीख नहीं मिली। उदास भाव से वो लौट रहा था कि अचानक उसके कटोरे में मांस का एक टुकड़ा आ गिरा। शिष्य बहुत हैरान हुआ कि ये कहां से आया? उसने उपर देखा तो पाया कि एक चील अपने पंजे में इसे ले जा रही थी, और वही उसके पंजे से छूट कर कटोरे में आ गिरा है। शिष्य बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आखिर में बुद्ध के सामने गया और उसने सारी कथा उन्हें कह सुनाई कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला, बस ये मांस का एक टुकड़ा मेरे पात्र में आ गिरा।
बुद्ध ने उसे समझाया कि अब जो मिला वही तुम्हारी किस्मत। तो तुम उसका अनादर मत करो, और उसे ही पका कर खा लो। शिष्य ने ऐसा ही किया। मांस बहुत स्वादिष्ट पका।
बुद्ध के तमाम शिष्य इस पूरी घटना को देख रहे थे। पहले तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज मांस लाने की वजह से उस अति प्रिय शिष्य को डांट पड़ेगी, लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था। कहां बाकी शिष्य वही सादा भोजन ग्रहण कर रहे थे, और वो मांसाहारी भोजन कर रहा था। इस घटना को देख कर बाकी शिष्यों ने भी धीरे-धीरे कहीं से मांस उठा कर लाना शुरू कर दिया और आकर बुद्ध से कहने लगे कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला बस यही मांस का टुकड़ा मिला है। बुद्ध उसे देख मुस्कुराते और कहते जो मिला उसे ही स्वीकार करो।
एक दिन एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा कि भगवन्‌ आप जानते हैं कि ये झूठ बोल कर मांस पका कर खा रहे हैं, फिर आप इन्हें रोकते क्यों नहीं?
बुद्ध ने कहा कि रोकने से कोई नहीं रुकता। जिसे रुकना होता है वो खुद रुकता है। और वो रुकना भी क्या रुकना जिसमें मन न रुके? और अगर मन ही न रुके तो तन के रुकने का कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में जिसे जिसे जो अच्छा लगता है उसे करने दो। जब मन की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे जब हो, तभी आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ता है।

साभार : श्री संजय सिन्हा ( फ़ेसबुक की वाल  से )

Thursday, March 14, 2013

मिन्ड्रोलिंग स्तूप, देहरादून- संस्मरण

 
 
 
 
 
 
 
मिन्डोलिग स्तूप , देहरादून जाने का मौका मुझे दो बार मिला । सन्‌ २००८ में सपरिवार और उसके उपरांत २०१० मे अकेले ही अपने पुत्र आयुष के साथ । स्तूप या चैत्य मुझे सम्मोहित करते रहते हैं । इसका शायद एक कारण इन स्तूपों से मिलने वाली सकरात्मक उर्जा है । कहते हैं कि इन स्तूपों का  प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कभी यह बौद्ध प्रार्थना स्थल होते थे। महापरिनर्वाण सूत्र में भगवान्‌ बुद्ध अपने शिष्य आनन्द से कहते हैं- "मेरी मृत्यु के उपारांत  मेरे अवशेषों पर उसी प्रकार का स्तूप बनाया जाये जिस प्रकार चक्रवर्ती राजाओं के अवशेषों पर बनते हैं- (दीघनिकाय- १४/५/११)। ” स्तूप समाधि, अवशेषों अथवा चिता पर स्मृति स्वरूप निर्मित किया गया अर्द्धाकार टीला होता है जिसे चैत्य भी कहा जाता है ।
अगर आप देहरादून जा रहे हों तो क्लेमेंट टाउन जाना न भूलें । प्राकृतिक परिवेश के मध्य स्थित देहरादून पर्यटकों  को कई तरह से आकर्षित करता है । अन्य कई आकर्षणॊं   के अलावा देहरादून के तिब्बती समुदाय ने सन्‌ १९६५ मे एक तिब्बती मठ की प्रतिकृति के रूप में बुद्ध मंदिर का निर्माण किया था । कहते हैं कि यह स्तूप एशिया का सबसे बडा स्तूप है । इसकी ऊँचाई १८५ फ़ुट और चौडाई १०० वर्ग फ़ुट है । यह स्तूप बौद्ध कला और स्थापत्य कला का एक शानदार उदाहरण है.
स्तूप के मुख पर मैत्र बुद्ध या शक्यमुनि भगवान बुद्ध को खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है । देखें नीचे  चित्र में
लगभग २ एकड वर्ग मे फ़ैले परिसर में प्रवेश करने पर हमें वीणा धारण किये हुये एक  मूर्ति का दर्शन होता है । एक बार तो हिंदू धर्म में आराध्य  माँ सरस्वती को देखकर विस्मय मे पड जाता हूँ लेकिन स्थानीय लामा  से मालूम पडता है कि यह तिब्बती कल्चर मे पूज्य माँ मञ्जुश्री का रुप है जो माँ सरस्वती के अनुरुप ज्ञान और सहचरी की देवी मानी जाती हैं । कहते हैं कि त्रिपिटक को कंठस्थ कराने के लिये भिक्खू जन अपने सह भिक्खूओं को माँ मञ्जुश्री के माध्यम का प्रयोग करते थे ।
अब हम स्तूप के अन्दर प्रवेश कर रहे हैं । इस इमारत में कुल पांच मंजिलें है ; स्तूप का  भूतल तिब्बती गुरु पद्मसंभव को समर्पित है , भूतल की दीवारॊ पर अति सुन्दर भित्तीय चित्र निर्मित हैं जो  गुरु पद्मसंभव की जीवन कहानी को दर्शाती है.
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इस इमारत का प्रथम तल शाक्यमुनि भगवान्‌ बुद्ध को समर्पित है , यहाँ भी दीवारों पर सुन्दर भित्तीय चित्रों और जातक कथाओं के माध्यम से बुद्ध की जीवनी को चित्रित किया गया
है ।
 
 
मंजिल का दूसरा तल शाइन कक्ष के रुप मे जाना जाता है । यह तल मिन्ड्रोलिंग मे महान शासकों को समर्पित है ।
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मिन्डोंलिग मन्दिर  के परिसर का   आकर्षण बुद्ध की विशाल  मूर्ति है ।यह मूर्ति लगभग 103 फुट ऊची है और लगभग   10 साल पहले इसका निर्माण किया गया था ।यह तिब्बती समुदाय  के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को  समर्पित है । यहाँ कई मोनेस्ट्री भी हैं जहाँ लगभग  पाँच सौ लामा अध्ययन करते हैं ।
 
मन्दिर परिसर का एक और आकर्षण प्रार्थना चक्र या prayer wheel है । इसका निर्माण स्तूप के निकट किया गया है । कहते हैं कि यह प्रार्थना का पहिया सभी प्राणियों , भिक्खूओं और धर्मालंबियों के लिये सकरात्मक उर्जा का संचय करता है ।
 
 
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तिब्बती समुदाय के लिये स्वतंत्र तिब्बत एक स्वप्न की तरह ही है । देहारदून के इस मिन्डोलिग स्तूप  परिसर में यह पीडा दीवारों पर अंकित देखी जा सकती है , देखें ऊपर चित्र में ।
उपर की दो मंजिले को देख न पाने का खेद मुझे दोनों बार रहा , शायद दोनों बार वह अवकाश का दिन था , संभव है  मौका फ़िर कभी लगे  :)

Wednesday, May 23, 2012

वर्तामान और सचेतावस्था मे जीना

बच्चे सचेतावस्था मे भगवान बुद्ध के साथ

संबोधि प्राप्ति के पशचात गौतम बुद्ध ने उरुबेला गांव  के बच्चों से वन से जाने की आज्ञा माँगी । सुजाता, नंद बाला , सुभाष , स्वास्ति और रुपक उनके इस कथन से विस्मित से रह गये । सिदार्थ ने सुजाता और अन्य बच्चों से कहा कि आज वह तीसरे पहर बच्चों से वन मे मिलना चाहते हैं ताकि जो संबोधि का मार्ग उन्होने चुना है उसको वह उन्हें बाँट सकें ।

उनके बताये समय के अनुसार बहुत से बच्चे आये और सब पीपल के वृक्ष के पास घेरा बना के बैठ गये । सुजाता अपने साथ नारियल और ताडगुड की बट्टियाँ  उपहार स्वरुप लायी थी और वहीं नंद बाला और सुभाष अपने साथ टॊकरी में मिठ्ठे ( संतरे जैसा फ़ल ) लाया था । सब बच्चॊ ने आदर भाव से सिद्धार्थ को नमन किया और फ़लस्वरुप सिद्धार्थ ने उनको बैठ जाने को कहा । सिद्धार्थ ने बच्चों से कहा , “ तुम सब बच्चे समझदार हो और मुझे विशवास है कि जो मै तुम्हें बताउगाँ उन पर तुम अमल करोगे । जो मार्ग मैने सदधर्म का चुना है वह बहुत गूढ और सूक्ष्म है लेकिन जो भी उस पर अपना ह्रदय और चित्त लगायेगा वह उसे समझ सकता है और उस पर चल सकता है । ”

बच्चों जब तुम संतरे को छीलकर खाते हो तो उसे सचेतावस्था के साथ भी खा सकते हो और बगौर जागरुक रह कर भी । जब तुम मिट्ठा खाओ तो तुम को भली भाँति ज्ञान हो कि तुम मिट्ठा खा रहे हो । तुम उसकी गंध और स्वाद को आत्मसात करो । जब तुम उसका छिल्का उतारो तब भी सजग रहो और जब उसकी फ़ाँक मुँह में रखो तब भी । जब तुम इस फ़ल की गंध और मिठास को अनुभव करो तो उस अनुभूति के प्रति भी सजग रहो ।  इस मिठ्ठे को देखकर चेतनावस्था का अभ्यास करने वाला सृष्टि की अदभुतताओं को समझ सकता है कि किस प्रकार समस्त वस्तुयें  एक दूसरे  के प्रति क्या क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं । सचेतावस्था का अभ्यास करने वाला व्यक्ति इस मिठ्ठे में वे चीजें देख सकता है जिसे अन्य लोग देखने मे असमर्थ रहते हैं । सचेत व्यक्ति  मिठ्ठे का पेड देख सकता है , वसन्त ऋतु  मे मिठ्ठे को फ़लता देख सकता है , उस धूप और वर्षा को देख सकता है जिससे मिठ्ठे के पॆड का पोषण होता है और गहराई से देखने पर वह उन बातों को जान लेता है जिनके स्व्बरुप मिठ्ठा पककर तौयार होता है ।

नंद ने जो मुझे मिठ्ठा दिया है उसमें नौ फ़ाँके हैं । जिस प्रकार मिठ्ठे की नौ फ़ांके हैं उसी प्रतिदिन के चौबीस घंटॆ होते हैं । एक घंटा  मिठ्ठे की एक फ़ांक के समान  है । दिन के चौबीस घंटॊं को जीना इस मिठ्ठे की सभी फ़ांको को खा लेने के समान है । मेरा मार्ग दिन के प्रत्येक घंटे को  सचेतावस्था के साथ जीना है जिसमे चित्त और शरीर हमेशा वर्तमान पर केन्द्रित हो । यदि हम अचेतावस्था में जी रह होते हैं तो हम जानते नही कि हम जी रह रहे हैं । हम जीवन का पूर्ण अनुभव इसी कारण नही कर पाते क्योंकि हमारा चित्त और शरीर वर्तमान को पूर्णता के साथ जीता ही नही है । “ बच्चों , सचेत होकर मिट्ठा खाने का अर्थ है कि तुम वास्तव में उसके संपर्क में हो । उस समय बीते हुये कल या आगामी कल के विचारों मे खोये हुये नही बल्कि पूरी तरह से इस क्षण को जी रहे हो । चेतन  जागरुकता का अर्थ है वर्तमान के इस क्षण को पूर्णता के साथ जीना जिसमें तुम्हारा चित्त्त और शरीर इस समय यहाँ हों ।”

इसी तरह  बच्चों सचेतावस्था में जीने वाला व्यक्ति जानता है कि वह क्या सोच रहा है , क्या कह रहा है और क्या कर रहा है । ऐसा व्यक्ति उन विचारों , शब्दों या कार्यों से बच सकता है  जिनसे उसे स्वयं  तथा दूसरे को कष्ट हो और इसी समझ और  ज्ञान से सहनशीलता और प्रेम का उदय होता है । फ़लस्वरुप संसार में अधिक कष्ट नही रह जाते ।

स्त्रोत : सतिपत्थन सुत्त्त , सचेतावस्था से जुडा विचार से लिया गया है ।  तिक न्यात हन्ह ( Thich Nhat Hanh ) की पुस्तक जहं जहं चरन पडे गौतम के ( Old paths white clouds )- प्रकाशक ‘हिन्द पाकेट बुक ’

Tuesday, November 22, 2011

“इहि पस्सिको ”- आओ और देखो


इहि पस्सिको


बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो भि देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।
कहते हैं कि एक बार बुद्ध अपने कुछ अनुयायियों  के साथ यात्रा कर रहे  थे . जब वे एक झील के पास से गुजर रहे थे तब बुद्ध को प्यास की  अनूभूति हुई , तब बुद्ध ने अपने एक अनुयायी से कहा , " भिक्षुक मुझे प्यास लगी है  और  इस झील से पानी लेकर आओ’। ” जैसे ही शिष्य झील के समीप पहुँचा उसी समय    एक बैलगाड़ी झील से होती हुई गुजरी  ।  परिणाम स्वरुप झील का पानी बहुत गन्दा और मटमैला हो गया । तब  शिष्य ने सोचा, "मैं बुद्ध को  यह  गंदा पानी पीने के लिये कैसे दे सकता हूँ ?"   वह वापस आ गया और बुद्ध से कहा, " शास्ता पानी तो  वहाँ बहुत गंदा है और मुझे नहीं लगता कि यह पीने के लिए उपयुक्त  है."  लगभग आधे घंटे के बाद, बुद्ध ने दोबारा शिष्य से पानी लने के लिये कहा । वह वापस  झील के नजदीक गया और उसने पाया   कि पानी अभी भी मैला था.  वह लौट आया  और  बुद्धको सूचित किया.  कुछ समय बाद फिर से बुद्ध ने  शिष्य  को वापस जाने के लिए कहा . इस बार  शिष्य ने पाया कि पानी अपेक्षाकृत काफ़ी साफ़ है , मिट्टी नीचे बैठ चुकी है  ।  वह एक बर्तन में थोड़ा सा पानी एकत्र कर के बुद्ध के लिये ले गया । बुद्ध ने पानी में देखा, और अनुयायी को देखते हुये कहा , " आयुस तुम जानते हो कि तुमने पानी को साफ़ करने के लिये क्या किया , तुमने पानी को कुछ देर के लिये छॊड दिया और मिट्टी नीचे बैठ गयी । इसी तरह यह मन भी है , अगर वह परेशान है , व्याकुल है तो उसे थोडा समय दो , वह अपने आप शांत हो जायेगा । तुमको उसे शांत करने के लिये कोई विशेष प्रयास नही करना है , मन की शांति एक सरल प्रक्रिया है , इसके लिये विशेष प्रयास  नही करना पडता है ।”
( बुद्ध से संबधित इस गाथा के लिये साभार : रोहित पवार )

Tuesday, August 10, 2010

भिक्षुणी अम्बपाली (आम्रपाली) के अद्भुत उद्गार

 

buddhaभगवान बुद्ध के प्रभाव में आकर वैशाली की पिंगला-गणिका अम्बपाली (आम्रपाली) एक दिन भिक्षुणी हो गई. उसने समाधि की उच्चतम अवस्था का स्पर्श किया और पूर्णता प्राप्त भिक्षुणियों में वह एक हुई. अपने निरंतर जर्जरित होते हुए शरीर में बुद्ध-वचनों की सत्यता को प्रतिफलित होते देख अम्बपाली हमारे लिए कुछ उद्गार छोड़ गयी है जो अनित्यता की भावना से भरे हुए हैं. वह कहती है:-

काले, भौंरे के रंग के सामान, जिनके अग्र भाग घुंघराले हैं, ऐसे एक समय मेरे बाल थे.
वही आज जरावस्था में जीर्ण सन के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पुष्पाभरणों से गुंथा हुआ मेरा केशपाश कभी हजारा चमेली के पुष्प की सी गंध वहन करता था.
उसी में से आज जरावस्था में खरहे के रोओं की सी दुर्गन्ध आती है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कंघी और चिमटियों से सजा हुआ मेरा सुविन्यस्त केशपाश कभी सुन्दर रोपे हुए सघन उपवन के सदृश शोभा पाता था.
वही आज जराग्रस्त होकर जहाँ-तहाँ से बाल टूटने के कारण विरल हो गया है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सोने के गहनों से सुसज्जित, महकती हुई सुगंधियों से सुशोभित, चोटियों से गुंथा हुआ कभी मेरा सिर रहा करता था.
वही आज जरावस्था में भग्न और नीचे लटका हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

चित्रकार के हांथों से कुशलतापूर्वक अंकित की हुई जैसे मेरी दो भौंहें थीं.
वही आज जरा के कारण झुर्रियां पड़ कर नीचे लटकी हुई हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

गहरे नीले रंग की दो उज्जवल, सुन्दर, मणियों के समान मेरे दो विस्तृत नेत्र थे.
वही आज बुढ़ापे से अभिहत हुए भद्दे और आभाहीन हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

उठते हुए यौवन की सुन्दर शिखर के समान वह मेरी कोमल, सुदीर्घ नासिका थी.
वही आज जरावस्था में दबकर पिचकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पूरी कारीगरी के साथ बनाये हुए, सुन्दर, सुगठित कंकण के समान, कभी मेरे कानों के सिरे थे.
वही आज जरावस्था में झुर्री पड़कर नीचे लटके हुए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कदली-पुष्प की कली के समान रंगवाले कभी मेरे सुन्दर दांत थे.
वही आज जरावस्था में खंडित होकर जौ के समान पीले रंगवाले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

वनचारिणी कोकिला की मधुर कूक के समान एक समय मेरी प्यारी मीठी बोली थी.
वही आज जरा के कारण स्खलित और भर्राई हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

अच्छी तरह खराद पर रखे हुए, चिकने शंख के समान, एक समय मेरी सुन्दर ग्रीवा थी.
वही आज जरावस्था में टूटकर नीचे लटकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुगोल गदा के समान एक समय मेरी दोनों सुन्दर बांहें थीं.
वही आज जरावस्था में पाडर वृक्ष की दुर्बल शाखाओं के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर मुंदरी और स्वर्णालंकारों से विभूषित कभी मेरे हाथ रहते थे.
वही आज जरा के कारण गाँठ-गठीले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

स्थूल, सुगोल, उन्नत, कभी मेरे स्तन सुशोभित होते थे.
वही आज जरावस्था में पानी से रीती लटकी हुई चमड़े की थैली के सदृश हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, विशुद्ध, स्वर्ण-फलक के समान कभी मेरा शरीर चमकता था.
वही आज जरावस्था में झुर्रियों से भरा हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

हाथी की सूंड के समान कभी मेरे सुन्दर उरु-प्रदेश थे.
वही आज पोले बांस की नली के समान हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर नूपुर और स्वर्णालंकारों से सजी हुई कभी मेरी जंघाएँ रहती थीं.
वही आज जरावस्था में तिल के सूखे डंठल के समान हो गईं हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, सुकोमल, रुई के फाहे के समान कभी मेरे दोनों पैर थे.
वही आज जरावस्था में झुर्रियां पड़कर सूखे काठ से हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

एक समय यह शरीर ऐसा था. इस समय वह जर्जर और बहुत दुखों का घर है.
जीर्ण घर जैसे बिना लिपाई-पुताई के गिर जाता है, उसी प्रकार यह जरा का घर, यह शरीर बिना थोड़ी सी रखवाली किये गिर जायेगा.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

(श्री भरतसिंह उपाध्याय की पुस्तक ‘बुद्ध और बौद्ध साधक’ से लिया गया अंश, आभार सहित)

(A Buddhist anecdote about Amrapali / Ambapali – in HIndi)

साभार : HINDIZEN-निशांत का ब्लाग

Sunday, August 8, 2010

लोक-अपवाद को जीतना

image कुरु देश में मागंदिय नाम का अग्निपूजक ब्राह्मण रहता था। मागंदिया उसकी एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। मागंदिय ने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, परन्तु योग्य वर न मिला। बड़े-बड़े कुलों से कन्या की मँगनी आयी, लेकिन मागंदिया को वर पसन्द न आया।
एक दिन बुद्ध भगवान् प्रातःकाल अपना पात्र और चीवर लेकर नगर के बाहर ब्राह्मण के अग्नि-स्थान के पास खड़े हुए।
बुद्ध को देख ब्राह्मण ने सोचा- इसके समान किसी अन्य पुरुष का मिलना दुर्लभ है। मैं क्यों न इसके साथ अपनी कन्या की शादी कर दूँ ?
ब्राह्मण ने भगवान् से निवेदन किया-‘‘हे श्रमण ! मैंने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, मगर कोई वर न मिला। बड़े भाग्य से आप मिले हैं। मागंदिया बहुत रूपवती है। वह सचमुच आपके चरणों की दासी बनने योग्य है।’’
इतना कह ब्राह्मण अपनी कन्या को लाने के लिए चल दिया। बुद्ध को वह वहीं ठहरने के लिए कहता गया।
जल्दी-जल्दी घर पहुँच ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-‘‘भद्रे ! कन्या के लिए वर मिल गया है। जल्दी करो, वस्त्राभूषणों से सज्जित कर मागंदिया को ले चलो।’’
नगर के लोगों को जब मालूम हुआ कि मागंदिया को अपनी कन्या के लिए वर मिल गया है तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भी ब्राह्मण के साथ-साथ वर देखने चले।
बुद्ध उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र गमन कर गये थे। अतः ब्राह्मणी को जब वहाँ कोई न दिखायी दिया तो उसने ब्राह्मण से जिज्ञासा व्यक्त की। ब्राह्मण बोला-‘‘मैं तो उससे यहीं रुकने को कह गया था, किन्तु वह न जाने कहाँ चला गया !’’
इधर-उधर ढूँढ़ने के बाद ब्राह्मण को बुद्ध के पद-चिह्न दिखाई दिये। ब्राह्मणी लक्षणशास्त्र की पण्डित और तीनों वेदों में पारंगत थी। उसने लक्षण विचारकर कहा कि ये पद-चिह्न किसी विषयभोगी के नहीं, किसी तपस्वी के जान पड़ते हैं।
ब्राह्मण को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने अपनी पत्नी से कहा-‘‘ब्राह्मणी ! तुम्हें हमेशा पानी में मगर और घर में चोर दिखाई देते हैं। तुम्हें कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत नहीं।’’
ब्राह्मणी ने उत्तर दिया-‘‘आप चाहे जो कहें, ये पैर किसी विषयभोगी के नहीं हो सकते।’’
ब्राह्मण ने बुद्ध को दूर से देख ब्राह्मणी से कहा-‘‘देखो, देखो, वह है मागंदिया का वर !’’ और तीर की तरह बुद्ध के पास जाकर बोला-‘‘हे भिक्षु ! मैं आपकी सेवा में अपनी कन्या समर्पित करता हूँ।’’
बुद्ध ने कोई उत्तर न देकर ब्राह्मण से कहा-‘‘देखो ब्राह्मण ! अपने महाभिनिष्क्रमण के समय से लगाकर अजापालनिग्रोध वृक्ष के नीचे बोधि प्राप्त करने तक कामदेव ने मुझे कितने कष्ट दिये ! कितना सताया ! जब वह मेरा कुछ न बिगाड़ सका तो एक दिन वह उदास होकर बैठा था कि इतने में उसकी कन्याएँ वहाँ आयीं और उसे सान्त्वना देकर कहने लगीं-‘‘पिताजी, आप क्यों चिन्ता करते हैं। आज्ञा हो तो हम बुद्ध का ध्यान भंग करें।’ लेकिन हे ब्राह्मण ! विषय-भोगों के प्रति मेरी तनिक भी कामना नहीं। यह शरीर मल-मूत्र का भण्डार है। मैं इसका स्पर्श तक करना नहीं चाहता।’’
बुद्ध की बातें सुनकर ब्राह्मण-कन्या मागंदिया को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा-यदि इस भिक्षु को मेरी आवश्यकता नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन यह मेरा अपमान क्यों करता है ? मैं अच्छे कुल में पैदा हुई हूँ, भोग-विलास की मुझे कमी नहीं, सौन्दर्य मेरे चरणों में लोटता है, निस्सन्देह मैं योग्य पति पाऊँगी। फिर यह भिक्षु मुझे इस तरह के वचन क्यों कहता है ? मैं बदला लिये बिना न रहूँगी।
दिन जाते देर नहीं लगती। कुछ समय के बाद मागंदिया के माता-पिता ने अपने भाई चुल्ल मागंदिय को अपनी कन्या सौंपकर प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
चुल्ल मागंदिय ने सोचा मागंदिया को किसी राजा की रानी बनना चाहिए। वस्त्राभूषणों से सजाकर वह उसे कौशाम्बी ले गया और राजा उदयन के साथ विवाह कर दिया।
राजा उदयन मागंदिया को बहुत चाहता था। उसने उसे पटरानी के पद पर अभिषिक्त कर दिया। पाँच सौ दासियाँ उसकी सेवा में रहने लगीं।
एक बार रानी मागंदिया अपने महल से उतरकर घूम रही थीं। पता लगा कि श्रमण गौतम कौशाम्बी आ रहा है। उसने नगर वासियों को प्रलोभन देकर आदेश दिया कि जब श्रमण गौतम नगरी में प्रवेश करें तो वे अपने नौकर-चाकर के साथ मिलकर उसे अपशब्द कह नगर से निकाल दें।
बुद्ध ने नगर में प्रवेश किया तो लोग उन्हें चोर, मूर्ख, ऊँट, बैल, गधा, नारकी, पशु आदि शब्दों से सम्बोधित कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहने लगे-‘‘याद रख श्रमण, तुझे अच्छी गति मिलनेवाली नहीं। तू मरकर दुर्गति को प्राप्त होगा !’’
नगरवासियों के ये वचन सुनकर भगवान् के प्रिय शिष्य आनन्द ने बुद्ध से कहा-‘‘भन्ते ! ये नागरिक हमें अपशब्द कहते हैं। चलिए कहीं अन्यत्र चलकर रहें।’’
बुद्ध-आनन्द, कहाँ जाना चाहते हो ?
आनन्द-किसी दूसरे नगर में ! बुद्ध-यदि वहाँ भी लोगों ने अपशब्द कहे तो कहाँ जाओगे ? आनन्द-अन्यत्र कहीं ! बुद्ध-अगर वहाँ के लोगों ने भी ऐसा बर्ताव किया ? आनन्द-भन्ते, वहाँ से अन्यत्र चले जाएँगे ! बुद्ध-आनन्द, यह ठीक नहीं ! देखो, जहाँ लोकापवाद होता हो, वह जब तक शान्त न हो जाये, तब तक, उस नगर को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहिए। तथा आनन्द, जानते हो अपवाद करने वाले लोग कौन हैं ? आनन्द-भन्ते, नौकर-चाकर तक हमें अपशब्द कहते हैं ! बुद्ध-देखो आनन्द, मैं संग्राम में आगे बढ़े हुए हाथी के समान निश्चल हूँ ! यदि चारों दिशाओं से हाथी को तीर आकर लगें तो वीरतापूर्वक डटे खड़े रहना चाहिए। इसी प्रकार अनेक दुष्ट पुरुषों के अपवाद को सहन करना मेरा कर्तव्य है। याद रखो आनन्द, वश में किये हुए खच्चर, सिन्धु देश के घो़ड़े तथा जंगली हाथी उत्तम समझे जाते हैं, लेकिन इन सबसे उत्तम वह है जो अपने आपको वश में रखता है !

Wednesday, June 23, 2010

Illustrated Venerating Lord Buddha Charitha

Gemunu Rohana has added some of the beautiful illustrations of important events of Venerating Lord Buddha Charitha to his site . Click HERE to download the set of these illustrations .

भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को सुन्दर चित्रों के माध्यम से जेमू रोहाना ने अपने ब्लाग मे जोडा है । डाउनलोड करने के लिये यहाँ  जायें ।