Showing posts with label बुद्ध वाणी. Show all posts
Showing posts with label बुद्ध वाणी. Show all posts

Sunday, August 16, 2015

" गणकमोग्गल्लानसुत्तं "

6-june
हम सभी साधकों का कल्याण करने हेतु
करुणानिधान भगवान बुद्ध ने, गणकमोग्गल्लान
ब्राह्मण को केवल माध्यम बनाकर यह हितोपदेश
किया है। इसे ऐसे पढ़ो की जीवन में उतर जाय।
अपितु यह निश्चित समझ लो कि यह हमारे पूर्वजों
की वसीयत ही है। यही तो हमारा परम धन है।
मंगल कामना के साथ इसे अपना बना लो।
ऐसा मैंने सुना है कि एक समय भगवान् बुद्ध
श्रावस्ती स्थित पूर्वाराम के मृगारमातृप्रासाद में
साधना हेतु विराजमान थे।
तब एक गणितज्ञ गणकमौद्गल्यायन ब्राह्मण,
जहां भगवान विराजमान थे वहां गया।
जाकर भगवान से कुशलमंगल पूछ कर,
वंदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे
गणक मौद्गल्यायन ब्राह्मण ने भगवान से यों
निवेदन किया,
भो गौतम हम गणित शास्त्र पढ़ाते समय अपने विद्यार्थियों को क्रमशः पाठ पढ़ाते हैं।
मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि ……
" क्या, भो गौतम ! आपके इस धर्मविनय में भी
इसी तरह क्रमशः शिक्षा प्रदान की जाती हैं? "
भगवान बुद्ध ने कहा, ' हाँ, ब्राह्मण ! हमारे इस
धर्मविनय में भी ऐसी ही क्रमिक शिक्षा दी जाती हैं।
एक उदाहरण से समझाते हुए कहते हैं ……
ब्राह्मण ! जैसे चतुर अश्वारोही अच्छी नस्ल का
अश्व पाकर प्रारंभ में उसे मुँह में लगाम पकड़ने की
क्रिया सिखाता है, फिर आगे की क्रियाएं सिखाता है।
हे ब्राह्मण ! बिल्कुल इसी तरह तथागत किसी
साधक को अनुशासन के लिए योग्य पाकर, पहले
उसे यह शिक्षा देते हैं …
आओ, भिक्षु ! तुम पहले शीलवान् बनो,
' प्रातिमोक्ष संवर ' अर्थात भिक्षु नियमों का पालन
करते हुए स्वयं में संयम के बीज बोना
सिख लो।
आचारगोचर संपन्न बनना सिखों।
इंद्रियों को संयम में रखना सिखों।
और हे भिक्षु ! अपने में अत्यल्प, छोटे से छोटा भी
दोष देखकर उससे भय मानों। यों मेरे बतलाये
शिक्षापदों का पालन करते हुए साधना में निरंतर
लगे रहों।
यह पहली कक्षा समझों ➖
ब्राह्मण ! जब वह भिक्षु शीलवान् होकर
शिक्षापदों का पालन करने में सतत जागरूक
रहने लगता है, तब उसे आगे की शिक्षा देना प्रारंभ
करते हैं। वह इस प्रकार है ……
" आओ भिक्षु ! अब तुम सभी इंद्रियों में संयम रखना
सिखों ; चक्षु से किसी रूप को देखकर भी उसमें
राग या द्वेष उत्पन्न नहीं करना ।
दोनों ही साधना में भिक्षु के लिए घातक है ।
इसका कारण बताते हैं ।
क्योंकि चक्षुरिन्द्रिय को असंयत छोड़कर साधना करने
वाले को अभिध्या ( राग - लोलुपता ) ,
दौर्मनस्य ( अप्रसन्न या उदास होना ) ,
आदि अकुशल पापमय कर्मों का विघ्न उत्पन्न होगा ,
या यों कहें कि ---
ये दोष उसकी साधना में बाधा उत्पन्न करेंगे ही ।
इसलिए साधक का यह प्रथम कर्तव्य होता है कि वह
अपने इंद्रियों को संयम में रखें । यही स्थिति अन्य
इंद्रियों की होती हैं … नाक , कान , जिभ , त्वचा ।
हे ब्राह्मण ! जब भिक्षु अपने इंद्रियों में संयम करना
सिख लेता है, तब उसे साधना में आगे बढ़ने के लिए
तथागत आगे की विनय शिक्षा इस प्रकार देते हैं ।
भगवान बुद्ध आगे बताते हैं ➖
" आओ , भिक्षु ! अब तुम भोजन में मात्रा का ,
ज्ञान रखने वाले बनो । इतना ही अन्न ग्रहण करना
चाहिए कि जिससे तुम्हारी काम करने की क्षमता
बनी रहें , ना अति कम ना ज्यादा पेट भरकर
भोजन करें । इतना स्मरण रहे की तुम्हारी
शरीरयात्रा सुचारु रूप से चलती रहें । "
हे ब्राह्मण जब भिक्षु भोजन की मात्रा का
ज्ञान रखने वाला हो जाता हैँ , तब भगवान उसे आगे
की शिक्षा देना प्रारंभ करते हैं ।
आओ , भिक्षु ! तुम जागरण में तत्पर रहना सिखों ।
शरीर को थोड़ा विश्राम मिलें इतना ही सोना चाहिए ।
रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर चंक्रमण के साथ
' चलत - ध्यान ' करते हुए चित्त को विमुक्त करने का
सतत प्रयास करते रहों । "
भगवान आगे बताते हैं ----
हे ब्राह्मण जब भिक्षु , जागरण में तत्पर होकर
साधनासुख जान लेता है , तब तथागत उसे आगे की
शिक्षा देते हैं । " आओ , भिक्षु ! तुम स्मृतिसम्प्रजन्य युक्त होकर , विपस्सना साधना करते हुए इस साढ़े तीन हाथ
की काया में कायानुपश्यी होकर , तटस्थ रहते हुए ,
काया में उत्पन्न होने वाली संवेदनाओं को साक्षी भावसे देखो , ना उसे अच्छी मानकर उसमें राग जगाना , ना ही दुःखावेदना को बुरी मानकर उसे दूर धकेलनेकी कोशिश करना ।
इस प्रकार संपूर्ण लोक में अर्थात शरीर में संवेदनाओं
को साक्षी भावसे देखना , शरीर में उपर-नीचे ,
आड़े-तिरछे , सभी अङ्गों-प्रत्यङ्गो का मन के सहयोग
से निरिक्षण करना ।
भिक्षु जब यह अच्छी तरह से सिख लेता है कि
वह ' काया - वाणी और मन ' से संपूर्ण मौन साध्य
कर लेता है , तब वह साधना में अग्रसर होता है ।
और फिर हे ब्राह्मण जब भिक्षु सतत जागृत
स्मृति सम्प्रजन्य युक्त हो जाता है तब वह उठत-बैठते ,
चलते , हर समय इर्यापथस्मृति वाला होता है ।
वह अपने चिवर के प्रति सजग रहता है ।
हाथ-पैर पसारने की क्रिया में , खाते पिते समय
हर वक्त वह बहुत ही सजग रहता है ।
ऐसी परिपक्व साधना की अवस्था में जब वह भिक्खु पहुंचता है , तब तथागत उसे आगे की शिक्षा देना
उचित समझते हैं ।
आओ भिक्षु अब तुम एकांतवास के लिए
योग्य हुए हो , एवं तुम अभी वन में किसी पेड़ के
नीचे बैठकर मन को एकाग्र कर साधना करो ।
निद्रा , आलस्य , तन्द्रा , भय , इत्यादि सभी को
छोड़कर , भिक्षाटन के बाद , देह को सीधा कर ,
मन को एकाग्र कर , आसन लगाकर आस्रवोंके
क्षय के लिए चित्त को लगाने की कोशिश कर वह
आगे बढता चला जाता है ।
फिर वह भिक्षु , कामछंद , व्यापाद ,
आलस्य , औद्धत्यकौकृत्य और विचिकित्सा
इन पाँचों निवरणों का प्रहाण कर ,
चित्त के उपक्लेशों को दूर हटाकर ,
उन्हें दुर्बल बनाकर , अकुशल धर्मोंका नाश
करता हुआ वितर्क-विचार सहित विवेकजन्य
प्रीतिसुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर
विहार करता है ।
हे ब्राह्मण फिर वह भिक्षु , आठों ध्यानों को
प्राप्त कर विहार करता है । उसका लक्ष्य निश्चित
होता है कि , हर अवस्था में आस्रवोंका क्षय करना ।
हे ब्राह्मण जो भिक्षु अभी तक शैक्ष्य है , जिन्हें कुछ सिखना अभी शेष है , अतः जो निर्वाण तक नहीं पहुंचे , उनको मेरी उपर वर्णन की हुई शिक्षा होती हैं । ताकि वे अपने लक्ष्य को , नितांत निर्मल निर्वाण को
प्राप्त कर सकें ।
और हे ब्राह्मण मेरे श्रावक जिन्होंने अपनी
साधना पूर्ण कर ली है , जो परम निर्वाण प्राप्त कर
चुके हैं , उनके लिए मेरी ये बातें ( शिक्षापद ) अपने
अवशिष्ट जीवन में सुखविहार के लिए होती हैं ।
हे ब्राह्मण तथागत तो केवल मार्ग बताने
वाले हैं । आगे जिसकी जैसी साधना वैसे वह फल
पाता है । हे ब्राह्मण
निर्वाण भी वही है ,
निर्वाणगामी मार्ग भी वही है ,
निर्वाणमार्गोपदेष्टा मैं भी वही हूँ ,
कुछ भिक्षु निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं और
कुछ नहीं । ऐसा क्यों ?
उनकी साधना की कमी के कारण ।
मैं इस विषय में क्या कर सकता हूँ ?
मैं केवल मार्ग बताने मात्र का उत्तरदायी हूँ ।
गणकमोग्गल्लान ब्राह्मण संतुष्ट होकर भगवान् बुद्ध की शरण में आते हुए कहता है ------
आश्चर्य भो गौतम आप गौतम द्वारा उपदेशित
धर्म ( धर्मसाधना ) वर्तमान में सभी मतवादों में श्रेष्ठ है । आज से आगे मुझे जीवनपर्यंत अपना शरणागत
और उपासक समझें ।

मज्झिमनिकायपालि , उपरिपण्णासकमिता ,
पञ्चमो भागो , 7 , गणकमोग्गल्लानसुत्तं .
साभार :
Pingala Wanjari
Pingala Wanjari









Saturday, June 27, 2015

अरञ्‍ञसुत्तं

The-Great-Buddha-Statue-Bodh-Gaya-India-HD (1)

ऐसा  सुना जाता है कि एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती मे अनाथपिणिक के जेतवन आराम मे विहार कर रहे थे । तब कोई देवता रात बीतने पर अपनी चमक से सारे जेतवन को चमकाते हुये आया और भगवान बुद्ध का अभिवादन कर के एक और खडा हो गया ।

एक ओर खडा हो कर वह देवता भगवान से बोला ,

“ जंगल मे विहार करने वाले ब्रह्म्मचारी तथा एक  बार ही भोजन करने वालों का चेहरा कैसे खिला रहता है ? ”

शास्ता ने कहा ,

बीते हुये का वे शोक नही करते ,

आने वाले पर बडे मनसूबे नही  बाँधते ,

जो मौजूद है उसी से गुजारा करते हैं ;

इसी से उनका चेहरा खिला रहता है ॥

आने वाले पर बडे मनसूबे बाँध,

बीते हुये का शोक करते रह ,

मूर्ख लोग फ़ीके पडे रहते हैं ,

हरा नरकट ( ईख )जैसे कट जाने पर ॥                         

    संयुत्तनिकायो -१०. अरञ्‍ञसुत्तं

Wednesday, November 5, 2014

निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”

bus_waiting
किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन  हम लोगों मे   बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे  हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि  मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे  चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि  हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान  के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर  नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे ।  जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और  प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल  हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी  निराश नही  करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास  है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता  है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन  हमारे विहार के  एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने  बिना दान लिये  उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से  विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी ।  उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह  कहते थे  कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
who odered this truckload of Dung[2]
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, October 17, 2014

सच्चा धर्म

IMG_9734833037709

गौतम बुद्ध जिन दिनों वाराणसी के पास प्रवास कर रहे थे और उनका जीवन उनके कुछ साथियों के साथ भिक्षा पर चल रहा था, उन दिनों उनके एक अति प्रिय शिष्य को एकबार कहीं भीख नहीं मिली। उदास भाव से वो लौट रहा था कि अचानक उसके कटोरे में मांस का एक टुकड़ा आ गिरा। शिष्य बहुत हैरान हुआ कि ये कहां से आया? उसने उपर देखा तो पाया कि एक चील अपने पंजे में इसे ले जा रही थी, और वही उसके पंजे से छूट कर कटोरे में आ गिरा है। शिष्य बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आखिर में बुद्ध के सामने गया और उसने सारी कथा उन्हें कह सुनाई कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला, बस ये मांस का एक टुकड़ा मेरे पात्र में आ गिरा।
बुद्ध ने उसे समझाया कि अब जो मिला वही तुम्हारी किस्मत। तो तुम उसका अनादर मत करो, और उसे ही पका कर खा लो। शिष्य ने ऐसा ही किया। मांस बहुत स्वादिष्ट पका।
बुद्ध के तमाम शिष्य इस पूरी घटना को देख रहे थे। पहले तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज मांस लाने की वजह से उस अति प्रिय शिष्य को डांट पड़ेगी, लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था। कहां बाकी शिष्य वही सादा भोजन ग्रहण कर रहे थे, और वो मांसाहारी भोजन कर रहा था। इस घटना को देख कर बाकी शिष्यों ने भी धीरे-धीरे कहीं से मांस उठा कर लाना शुरू कर दिया और आकर बुद्ध से कहने लगे कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला बस यही मांस का टुकड़ा मिला है। बुद्ध उसे देख मुस्कुराते और कहते जो मिला उसे ही स्वीकार करो।
एक दिन एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा कि भगवन्‌ आप जानते हैं कि ये झूठ बोल कर मांस पका कर खा रहे हैं, फिर आप इन्हें रोकते क्यों नहीं?
बुद्ध ने कहा कि रोकने से कोई नहीं रुकता। जिसे रुकना होता है वो खुद रुकता है। और वो रुकना भी क्या रुकना जिसमें मन न रुके? और अगर मन ही न रुके तो तन के रुकने का कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में जिसे जिसे जो अच्छा लगता है उसे करने दो। जब मन की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे जब हो, तभी आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ता है।

साभार : श्री संजय सिन्हा ( फ़ेसबुक की वाल  से )

Monday, October 13, 2014

ज्ञान मार्ग से उपजी वैज्ञानिकता - श्री शम्भू नाथ शुक्ल

IMG_18656680736388

साभार : दैनिक ट्रिब्यून 13 अक्टूबर 2014

बुद्ध चरित में एक कथा है—बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन‍‍् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआ अपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन‍् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन‍्? मुझे तो लगता है कि अनजाने में किया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए। पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।

शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैं तुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन‍् जो अनजाने में उस गर्म लोहे की छड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गया अपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गया अपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिए भी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझ में आया कि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने में सहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शन मनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं या आत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा भंते। मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्ध करते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।

कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता है वह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्ध मार्ग का विस्तार हुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फ साधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और काल की सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठ मिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत के अनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।

यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आज भी उसी धर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भले इस्लाम हो पर वहां पर आम जनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनों ही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद किया गया। यही कारण है कि बुद्ध वहां धर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतई नहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—भंते, अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति!


Friday, September 20, 2013

अप्रमाद ( awareness ) अमृत का पथ है और प्रमाद ( non awareness ) मृत्यु का

love_1372156027566

ओशो : ‘ अप्रमाद अमृत का पथ है और प्रमाद मृत्यु का।’
साभारडां प्रवीन गोस्वामी

बुद्ध की सारी जीवन-प्रक्रिया को एक शब्द में हम रख सकते हैं, वह है, अप्रमाद, अवेयरनेस, जागकर जीना।
जागकर जीने का क्या अर्थ होता है? अभी तुम रास्ते पर चलते हो, बुद्ध से पूछोगे तो वे कहेंगे, यह चलना बेहोश है। रास्ते पर दुकानें दिखायी पड़ती हैं, पास से गुजरते लोग दिखायी पड़ते हैं, घोड़ागाड़ी, कारें दिखायी पड़ती हैं, लेकिन एक चीज तुम्हें चलते वक्त नहीं दिखायी पड़ती, वह तुम स्वयं हो। और सब दिखायी पड़ता है। पास से कौन गुजरा, दिखायी पड़ा। राह पर भीड़ है, दिखायी पड़ी। रास्ता सुनसान है, दिखायी पड़ा। सब तुम्हें दिखायी पड़ता है, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते। यही तो सपना है।
सपने में तुमने कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ता है, एक तुम दिखायी नहीं पड़ते। सपने का स्वभाव यही है। बहुत सपने तुमने देखे हैं। कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ते हैं, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते सपने में। मित्र-शत्रु सब दिखायी पड़ते हैं, तुम भर नहीं दिखायी पड़ते।
यही तो स्थिति जीवन की है, जागने की है। जिसे तुम जागना कहते हो उसमें और नींद में कोई अंतर नहीं मालूम होता। दोनों में एक बात समान है कि तुम्हारा तुम्हें कोई पता नहीं चलता। भीतर अंधेरा है। भीतर दीया नहीं जला। इसको बुद्ध प्रमाद कहते हैं, मूर्च्छा कहते हैं।
अपना ही पता न चले, यह भी कोई जिंदगी हुई? चले, उठे, बैठे, उसका पता ही न चला जो भीतर छिपा था। अपने से ही पहचान न हुई, यह भी कोई जिंदगी है? अपने से ही मिलना न हुआ, यह भी कोई जिंदगी है? और जो अपने को ही न पहचान पाया, और क्या पहचान पाएगा? निकटतम थे तुम अपने, उसको भी न छू पाए, और परमात्मा को छूने की आकांक्षा बनाते हो? चांद-तारों पर पहुंचना चाहते हो, अपने भीतर पहुंचना नहीं हो पाता।
स्मरण रखो, निकटतम को पहले पहुंच जाओ, तभी दूरतम की यात्रा हो सकती है। और मजा यह है कि जिसने निकट को जाना, उसने दूर को भी जान लिया, क्योंकि दूर निकट का ही फैलाव है।
उपनिषद कहते हे, वह परमात्मा पास से भी पास, दूर से भी दूर है। क्या इसका यह अर्थ हुआ कि उसे जानने के दो ढंग हो सकते है-कि तुम उसे दूर की तरह जानने जाओ या पास की तरह जानने जाओ?
नहीं, दो ढंग नहीं हो सकते। जब तुम पास से ही नहीं जान पाते तो तुम दूर से कैसे जान पाओगे? जब मैं अपने को ही नहीं छू पाता, परमात्मा को कैसे छू पाऊंगा? जब आख अपने ही सत्य के प्रति नहीं खुलती, तो परमात्मा के विराट सत्य की तरफ कैसे खुल पाएगी?
इसलिए बुद्ध चुप रह गए, परमात्मा की बात ही नहीं की। वह बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से, जागकर जो दिखायी पड़ता है, उसकी बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से तो यही बात करनी उचित है, कैसे उसका सपना टूटे, कैसे उसकी नींद टूटे?



Tuesday, August 27, 2013

ध्यान और हमारा सचेतन मन

ध्यान
जिस प्रकार आप गाड़ी / वाहन / कार चलते समय आगे की खिड़की से सामने और पीछे देखने के लगे हुए शीशे ( रिअर मिरर ) से अपने पीछे और अपने दाए , बाए हमेशा ध्यान बनाये रखते है ठीक उसी प्रकार अपने जीवन में हमेशा सजग बने रहे I पल प्रति पल अपनी समस्या , अपने अगल बगल के लोगो , अपने देश काल , प्रगति के मार्ग और अपने मन में उठाने वाले विचारो के प्रति सजग रहे .. याद रखिये ध्यान साधना के माध्यम से आपका मन जितना शांत होगा यह कार्य उतना ही आसान होगा I
ट्राई साइकल बुद्ध संघ , जापान

लेख और फ़ोटॊ के लिये आभार : सस्नेही मित्र अजय सिंह मौर्या

Saturday, August 24, 2013

सनातन धर्म

sanatan dharam as described by Buddha
आदमी को चाहिये कि क्रोध को प्रेम से जीते , बुराई को भलाई से जीते . कंजूस को  उदारता से हटाये और झूठे को सत्य से । घृणा कभी भी घृणा से नही जीती जा सकती । बैर हमेशा प्रेम से जीता जा सकता है । यही सनातन धर्म है । ~धम्मपद ~

Thursday, June 20, 2013

सिद्धांत की परिभाषा

993061_565989726786991_2137014236_n

भगवान गौतम बुद्ध उस समय वैशाली में थे। उनके धर्मोपदेश जनता बड़े ध्यान से सुनती और अपने आचरण में उतारने का प्रयास करती थी। बुद्ध का विशाल शिष्य वर्ग भी उनके वचनों को यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के सत्कार्य में लगा हुआ था। एक दिन बुद्ध के शिष्यों का एक समूह घूम-घूमकर उनके उपदेशों का प्रचार कर रहा था कि मार्ग में भूख से तड़पता एक भिखारी दिखाई दिया।
उसे देखकर बुद्ध के एक शिष्य ने उसके पास जाकर कहा- अरे मूर्ख! इस तरह क्यों तड़प रहा है? तुझे पता नहीं कि तेरे नगर में भगवान बुद्ध पधारे हुए हैं। तू उनके पास चल, उनके उपदेश सुनकर तुझे शांति मिलेगी। भिखारी भूख सहन करते-करते इतना शक्तिहीन हो चुका था कि वह चलने में भी असमर्थ था।
सायंकाल उस शिष्य ने तथागत को इस प्रसंग से अवगत कराया। तब बुद्ध स्वयं भिखारी के पास पहुंचे और उसे भरपेट भोजन करवाया। जब भिखारी तृप्त हो गया तो वह सुख की नींद सो गया। शिष्य ने आश्चर्यचकित हो पूछा- भगवन्! आपने इस मूर्ख को उपदेश तो दिया ही नहीं,बल्कि भोजन करा दिया। भगवान बुद्ध मुस्कराकर बोले- वह कई दिनों से भूखा था। इस समय भरपेट भोजन कराना ही उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है। भूख से तड़पता मनुष्य भला धर्म के मर्म को क्या समझेगा?
कथा का सार यह है कि प्रत्येक सिद्धांत अथवा सर्वस्वीकृत आचरण सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। परिस्थिति के अनुसार उसका पालन, अपालन या परिवर्तन मान्य किया जाना ही श्रेष्ठ आचरण है।

साभार : I Am Proud To Be A "Buddhist"

Tuesday, June 18, 2013

आधारभूत प्रश्न

10554_384555744988072_1604599907_n

एक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.
बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.
सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”
शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”
“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”
“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.
“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”
शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता”.
“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.
“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, परिग्रह, आदि-आदि वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन वृत्तियों में कैसे पड़े?”

Sunday, June 16, 2013

चिकित्सा विज्ञान के समान है चार आर्य सत्य

सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जडों को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हैं । दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार है । इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है। ( अनित्यता )

मेडिकल सांइस भी अब मानसिक लक्षणॊं की प्रमुखता को मानने लगा है । हाँलाकि यह क्रम बहुत पहले हिपोक्रेट्स से शुरु हुआ था  । हिप्पोक्रेट्स से लेकर गैलन और आखिरकार होम्योपैथी के प्रवर्तक डां  हैनिमैन ने इन्सान के स्वाभाव का विशेलेषण करने मे बहुत अंह भूमिका निभायी । जहाँ हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) का मानना था कि शरीर चार ह्यूमर ( Humor ) अर्थात रक्त,कफ, पीला पित्त और काला पित्त से बना है. Humors का असंतुलन, सभी रोगों का कारण है . वही गैलन Galen (130-200 ई.) ने इस शब्द  का इस्तेमाल  शारीरिक स्वभाव के लिये किया , जो यह निर्धारित करता है  कि शरीर  रोग के प्रति किस हद तक संवेदन्शील है । डां हैनिमैन ; आर्गेनान आफ़ होम्योपैथी मे स्पष्ट रुप से लिखते हैं ( पूरे लेख के लिये देखें : http://drprabhattandon.wordpress.com/2011/06/17/constitutional-prescribing-body-language-and-homeopathy/ )

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

शारिरिक लक्षण दरअसल मन के लक्षण का रुपक मात्र हैं । एक होम्योपैथ के रुप मे मै यह कह सकता हूँ कि अधिकांश रोगियों में हमें मानसिक लक्षणॊं के आधार पर चुनाव करने से ही सफ़लता मिल जाती है । अगर हम २५०० वर्ष पूर्व भगवान्‌ बुद्ध के दर्शन का अवलोकन करे और उसे होम्योपैथी के प्रवर्तक डां हैनिमैन के सिद्धातों के अनुरुप देखें तो एक ही बात साफ़ दिखाई पडती है और वह है हमार मन । तभी तो  भगवान बुद्ध कहते हैं :

मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।

ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्‍कंव वहतो पदं॥

मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को मैला करके कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई कर्म करता है तो दु:ख उसके पीछे ऐसे हो लेता है , जैसे गाडी के चक्के बैल के पीछे हो लेते हैं ।

Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind-wrought. If with an impure mind one speaks or acts, suffering follows one like the wheel that follows the foot of the ox.

मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पसन्‍नेन, भासति वा करोति वा।

ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (क॰)]॥

मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को उजला रख कर कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई ऐसा कर्म करता है तब सुख उसके पीछॆ ऐसे हो लेता है जैसे कभी संग न छॊडने वाली छाया संग-२ चलने लगती है ।

Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind wrought. If with a pure mind one speaks or acts, happiness follows one like one's never-departing shadow.

 भगवान्‌ बुद्ध एक  चिकित्सक की भूमिका में :

डां प्रवीन  गोस्वामी मेरे परम  मित्रों मे से एक हैं , वह एक अच्छे होम्योपैथिक चिकित्सक भी हैं और एक अच्छे साधक भी । बोधगया मे वह अकसर   ध्यान शिविर आयोजित कराते रहते हैं । पिछ्ले दिनों उनकी एक पोस्ट ने मेरा ध्यान बरबस खीचां । एक छोटी सी कहानी में जो ओशो के एक प्रवचन से ली गई थी , बुद्ध से किसी व्यक्ति ने पूछा कि आप कौन हैं ? आप का परिचय क्या है ? क्या आप दार्शिनिक  हैं , विचारक हैं , संत हैं , योगी या ज्ञाता या ईशवर के दूत ? भगवान बुद्ध ने कहा कि मै सिर्फ़ एक चिकित्सक हूँ ।

One day somebody went to Buddha and asked, “Who are you? Are you a philosopher, or a thinker or a saint or a yogi?” Buddha replied, “I am only a healer, a physician.”

This answer of his is truly marvellous: Only a healer — I know something about the inner diseases and that is what I discuss with you.

The day we understand that we will have to do something about these mindoriented diseases — because anyway we will never be able to eradicate all the bodyoriented diseases completely — that day we will see that religion and science have come closer to each other. That day we will see that medicine and meditation have come nearer to each other. My own understanding is that no other branch of science will help as much as medicine in bridging this gap.

From Medication to Meditation – OSHO, page no 15

Osho from the blog : Mind-Oriented Diseases

जिस प्रकार एक चिकित्सक को रोगी को स्वस्थ करने के लिये चार तथ्यों की आवशयकता पडती है

  • रोग
  • रोग का कारण ( aetiology )
  • रोग का उपचार (आरोग्य )
  • भैषज्य ( रोग दूर करने की दवा )

उसी प्रकार भगवान्‌ बुद्ध दु:ख रुपी रोग का चिकित्सा पद्द्ति द्वारा इलाज करते हैं । बुद्ध ने संसार मे दुख देखा । वह जानते थे कि इस दुख को कोई भी आध्यात्मिक उपदेश ठीक नही कर सकता बल्कि उसे एक विशेष सिस्टम द्वारा ठीक किया जा सकता है ।

भगवान बुद्ध के अनुसार

  • अगर दुख है  तो
  • दुख के  कारण भी होगे ( समुदय )
  • कारण है तो उसे दूर भी किया जा सक्लता है ( निदान )
  • दूर करने के लिये उपाय यानि दवा भी होगी । ( अष्टांगिक मार्ग )

भगवान्‌ बुद्ध की भैषज्य गुरु के रुप मे उपासना चीन , जापान , तिब्बत आदि कई देशों मे है । इस उपासना का प्रतिपादक सूत्र है , भैषज्यगुरु वैदूय्रप्रभराज सूत्र “ जिसका अनुवाद चीनी और तिब्बती भाषा में उपलब्ध है ।

भैषज्यगुरु मंत्र

नमो भगवते भैषज्यगुरु वैडूर्यप्रभराजाय
तथागताय अर्हते सम्यक्संबुद्धाय तद्यथा
ॐ भैषज्ये भैषज्ये भैषज्य समुद्गते स्वाहा
तद्यथा ॐ भैषज्ये भैषज्ये भैषज्य समुद्गते स्वाहा

चार आर्य सत्य

सम्बोधि को उपल्ब्ध होकर बुद्ध ने चार आर्य सत्यों को अनुभव किया ।

  • दुख
  • दुखसमुदय
  • दुख निरोध
  • दुखनिरोधगामिनी प्रतिपद

१. दुख :  समस्त प्राणी दु:ख में है

बुद्ध ने इस आर्य सत्य में दैनिक जीवन में घटित सभी घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है ।

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खं अरियसच्‍चं।

जातिपि दुक्खा, जरापि दुक्खा, ब्याधिपि दुक्खो, मरणम्पि दुक्खं,

अप्पियेहि सम्पयोगो दुक्खो, पियेहि विप्पयोगो दुक्खो, यम्पिच्छं न लभति,

तम्पि दुक्खं; संखित्तेन पञ्‍चुपादानक्खन्धा दुक्खा। इदं खो पन, भिक्खवे ।

दु:ख सामान्यत: पीडा के रुप में अनुवादित होता है लेकिन इसमॆ तनाव , असंन्तुष्टि और शारीरिक पीडाऒ सहित नकारात्मक भावनाओं की एक विस्तृत श्रंखला समाहित है । प्राणिमात्र के जीवन में रुग्णता , प्रियजनों के वियोग , मनोवांक्गित की अप्राप्ति, वृद्धावस्था और मृत्यु के रुप मे दु:ख अस्तिव में है ।

२. दुखसमुदय – दु:ख का कारण ‘ तृष्णा ’

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खसमुदयं अरियसच्‍चं – यायं तण्हा पोनोभविका नन्दिरागसहगता

तत्रतत्राभिनन्दिनी, सेय्यथिदं – कामतण्हा, भवतण्हा, विभवतण्हा।

दु:ख का कारण , दूसरा आर्य सत्य है । दु:ख का कारण है तृष्णा जो बार-२ प्राणियों मे उत्पन्न होती रहती है । प्राणिमात्र सुखद्‌ संवेदानाओं की कामना करता है और दु:खद संवेदानाओं से बचने की कोशिश करता  है । ये संवेदानायें कायिक भी हो सकती हैं और मानसिक भी और जब इन कामनाओं की परिपूर्ति नही होती तो दु:ख उत्पन्न होता है ।

३. दु:ख निरोध : तूष्णाओं और कामनाओं का मूलोच्छेद

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खनिरोधं अरियसच्‍चं यो तस्सायेव तण्हाय असेसविरागनिरोधो चागो पटिनिस्सग्गो मुत्ति अनालयो।

तीसरा आर्य सत्य हमॆ बताता है कि दु:ख का नाश संभव है । किसी वस्तु की प्राप्ति होने पर अन्य वस्तु की उत्पति होती है । कार्यकारण का यह सिद्धांत उनकी महत्वपूर्ण खोज है । यह चिकित्साशास्त्र के इस बात का पोषक है कि रोग दूर होगा और रोगी स्वस्थ हो सकता है । बुद्ध का भी यह कहना है कि कार्यकारण के इस चक्र को तोड्कर हम निर्वाण ( शान्ति )  को प्राप्त कर सकते हैं ।

४. दुखनिरोधगामिनी प्रतिपद : दु:ख मुक्ति का मार्ग है आर्य अष्टांगिक मार्ग

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा अरियसच्‍चं – अयमेव अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि। सम्मा संकल्पो । सम्मा वाचा । सम्मा कम्मन्तो । सम्मा आजीवो । सम्मा वायामो । सम्मा सति । सम्मा समाधि ।

यह चौथा आर्य सत्य है जो हमॆ तृष्णा से मुक्ति का मार्ग दिखाता है । यदि रोग है और उसके ठीक होने की संभावना है तब निशचित रुप से उसे ठीक करने की दवा भी होगी । चिकित्साशास्त्र के इसी सिद्धान्त को बुद्ध ने चौथे आर्य सत्य में प्रस्तुत किया है । दु:ख निरोध के लिये भगवान्‌ बुद्ध नें अष्टांगिक मार्ग बताये हैं जिससे दु:ख को कम किया जा सकता है , शिथिल भी किया जा सकता है और अन्तत: समूल नाश भी किया जा सकता है और तब निर्वाण की उपलब्धि होती है ।

आर्य अंष्टागिक मार्ग

the eight fold path[15]

१. सम्यक दृष्टि- उचित समझ

चार आर्य सत्यों को समझना और स्वीकार करना ।

२. सम्यक संकल्प-उचित उद्देशय

दान , मैत्री और करुणा के संकल्पॊ को विकसित करना ।

३. सम्यक वाचा- उचित वाणी

मिथ्या , चुगली , कठॊर और व्यर्थ भाषण से विरत रहना । सत्य , सौम्य , विनभ्र और अर्थपूर्ण वाणी विकसित करना ।

४. सम्यक कर्मान्त-उचित कर्म

हिंसा , चोरी और लैंगिक दुराअचार से विरत रहना । परोपकार , ईमानदारी और विशवास विकसित करना ।

५. सम्यक आजीविका –उचित जीविका

(मानव अथवा  पशु ) हिंसा के व्यवसाय , पशु मांस की बिक्री , मानवों की बिक्री , शस्त्र , विष और मादक पदार्थॊम की बिक्री के व्यवसाओं से विरत रहना । ऐसे व्यवसाय जो अनैतिक , शीलरहित और अवैधानिक हैं ।

६. सम्यक व्यायाम-उचित प्रयास

प्रकट हो चुकी अकुशल वृतियों से विरत रहना , जो प्रकट नही हुई हैं उन अकुशल वृतियों को प्रकट न होने देने का अभ्यास । प्रकट कुशल वृतियों को पोषित करना , अप्रकट कुशल वृतियों को विकसित करने  का प्रत्न्न करना ।

७. समयक स्मृति-उचित विचार

शरीर , शरीर की मुद्राओं और संवेदानाओं के प्रति स्मृतिपूर्ण होना । मन और उसमॆम उत्पन्न विचारों , भावनाओं व संवेदानाओं के प्रति स्मृतिपूर्ण होना ।

८. सम्यक समाधि-उचित चिंतन मनन

प्रज्ञा के विकास और उपल्ब्धि के लिये मन को एकाग्रता व अनुशान का प्रशिक्षण देने हेतु ध्यान का अभ्यास करना ।

मझिजमनिकाये अकुसल्कुसल्धम्मा

भगवान्‌ बुद्ध के अनुसार अष्टांगी मार्ग पर कुशलता के साथ चलने के लिये अकुशल तत्वों का त्याग अनिवार्य है । अकुसला संहिता धम्म में वर्जित यह तत्व हैं :

१.लोभ

२.द्धेष

३.मोह

इन प्रमुख तत्वों पर नियंत्रण अत्यावशयक है क्योंकि इन तत्वों से भी तो अन्य अकुशल तत्व उत्पन्न होते हैं । यह तत्व हैं :

प्राणातिपातो- अर्थात जीवन संहार

अदिन्नादानं- अप्राप्त को प्राप्त करने की कुचेष्ठा

कामेसु मिच्छाचारो- अर्थात अशुद्धता

मुसावादो- मिथ्यावादी आचरण

पिसुणावाचा- झूठी निन्दा

फ़रुसावाचा- अर्थात कटुवाणी

सम्फ़प्पलापो–व्यर्थ वाद विवाद

अभिज्झा- लोभ लालच

व्यापादो- अथात दूसरों के अहित की कामना

मिच्छादिट्ठि- यानि भ्रमित दृष्टिकोण

अस्तित्व के तीन लक्षण

बुद्ध ने यह भी खोजा कि सकल अस्तित्व की तीन और विशेषतायें हैं :

अनिन्यता

सब कुछ अनित्य है और प्रत्येक वस्तु कुछ और होने की प्रक्रिया में है ।

दु:खता

चूँकि सब कुछ अनित्य है , इसलिये अस्तित्व भी दु:खबद्ध है । सुख के लिये तृष्णा हमेशा रहेगी . असुखद से विकर्षण हमेशा रहेगा . जो कि अस्तित्व के परिवर्तन्कारी स्वभाव का परिणाम है ।

अनात्मता

नित्य अथवा अपरिवर्तनीय आत्मा जैसा कोई तत्व नही है । स्व जिसके अस्तित्व में हम संस्कारित हैं , यह हमारे भिन्न –२ मानसिक व शारीरिक अवययों के सिवा कुछ भी नही है , जो कि कार्यु कारण की सतत स्थायी परिवर्तन की अवस्था में है ।

संदर्भित ग्रन्थ

१. इस लेख की मुख्य थीम भिक्षु बुद्ध रत्न डां मनोज भन्ते के लेख से ली गयी है जो बोद्ध गया मन्दिर मैनेजंमैन्ट कमेटी द्वारा प्रकाशित जर्नल ‘ प्रज्ञा ’ मॆ सन्‌ २०१२ की बुद्ध जंयती को प्रकाशित हुई थी ।

२. ‘ स्वर्ग कोई भी जा सकता है ,बस अच्छे बनो ’ टी. वाई .ली. की पुस्तक का श्री राजेश चन्द्रा जी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद ।

३. आचार्य गोयन्का जी द्वारा हिन्दी मे अनुवादित “ धम्मपद

४. महास्थविर ज्ञानातिलोक द्वारा संग्रहित बुद्ध वचन का भिक्षु आनन्द कौसल्लायन द्वारा हिन्दी अनुवाद

५. अनगरिक  धर्मपाल द्वारा संग्रहित बुद्ध की शिक्षा का भिक्षु आनन्द कौसल्लायन  और त्रिपटिकाचार्य भिक्षु धर्मरक्षित द्वारा हिन्दी अनुवाद

६. डां सैमुएल हैनीमैन द्वारा रचित आरेगान आफ़ होम्योपैथी का छवाँ संस्करण ।

Tuesday, June 4, 2013

‘महात्मा’ बुद्ध या ‘भगवान्‌’ बुद्ध–क्या उचित है ?

बुद्ध धम्म की सबसे बडी विशेषता उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है , बुद्ध धम्म परलोक वाद , ईशवरवाद और आत्मा की सत्ता मे यकीन नही करता । विशव मे फ़ैले अनगिन्त धर्मों मे से बुद्ध धम्म अपनी अलग छवि रखता है और यह छवि बुद्ध के वैज्ञानिक दृष्टिकोण में है । लेकिन फ़िर भी यह एक ताज्जुब  सा लगता है कि बुद्ध धम्म के अनुयायी गौतम बुद्ध को भगवान्‌ की उपाधि देते हैं । यह उपाधि बुद्ध की उन शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है जिसमें उन्होनें कहा है :
न हेत्थ देवो ब्रह्मा वा , संसारस्सत्थिकारको ।
सुद्ध्धम्मा पवतन्ति , हेतुसम्भार्पच्चया ॥ 
(विसुद्धि २१६८९,पच्चयपरिग्गहकथा )
संसार का निर्माण करने वाला न कोई देव है न ब्रम्हा । हेतु-प्रत्यय यानि कारणॊं पर आधारित मात्र शुद्ध धर्म प्रवतरित हो रहे हैं ।
तुम्हेहि किच्चमातप्पं , अक्खातारो तथागता ॥
धम्मपद २७६, मग्गवग
मैं तो मार्ग आख्यात करता हूँ, तुम्हारी मुक्ति के लिये तपना तो तुम्हें ही पडेगा ।
ईशवरीय सत्ता के अभाव में मानव जीवन कैसे अपनी जीवन यात्रा आरम्भ करे । बुद्ध ने इस पर कहा कि तुम स्वालम्बी बनॊ । ( अत्तदीपा भवथ अत्तसरणा ) । तुम ही अपने स्वामी हो ( अत्ता हि अत्तनो नाते ) । किसी भी पर्वत , वन , आराम , वृख्श , चैत्य आदि को देवता मानकर उसकी शरण मे मत जाओ क्योंकि इनसे दु:ख मुक्ति संभव नही है ।
भगवान्‌ शब्द का शाब्दिक अर्थ
आम भाषा में भगवान शब्द का अर्थ है ईशवर या परमात्मा , सर्वशक्तिमान , सृष्टि का रचयिता , पालनहारक और इसका संहार करने वाला जिसका नाम जपने से , ध्यान लगाने से वह प्रसन्न हो जाता है और भक्तो के पापों को क्षमा करके उन्हें भवसागर से पार निकाल लेता है ।
लेकिन फ़िर बुद्ध अनुयायियों द्वारा बुद्ध को भगवान्‌ शब्द की उपाधि क्यूं । इसके लिये थोडा और गहराई में जाना पडेगा । पालि भाषा मॆ कई शब्द संस्कृत भाषा के अनुरुप ही हैं लेकिन कही-२ उनके  शाब्दिक अर्थ अलग-२  हैं ।

संस्कृत-पालि तुल्य शब्दावली

पालि भाषा के अधिकांश शब्दों की संस्कृत शब्दों में बहुत अधिक समानता पायी जाती है। दूसरे शब्दों में यों कहें कि पालि शब्द संस्कृत शब्दों से व्युत्पन्न से लगते हैं। नीचे कुछ प्रमुख शब्दों के तुल्य पालि शब्द दिये गये हैं-
संस्कृत -- पालि
अच्युत -- अच्चुत
अग्नि -- अग्ग
अहिंसा -- अहिंसा
अक्षर -- अक्खर
अमृत -- अमत
अनात्मन -- अनत्त
अप्रमाद -- अप्पमाद
आर्य -- अरिय
आत्मन -- अत्त / अत्तन
ऋषि -- इसि
ऋद्धि -- इद्धि
ऋजु -- उजु
वृद्ध - वुद्ध
कृत -- कत
स्थविर -- थेर
औषध -- ओसध
राज्य -- रज्ज
ईश्वर -- इस्सर
तीर्ण -- तिण्ण
पूर्व -- पुब्ब
शरण -- सरण
दोष -- दोस
भिक्षु -- भिक्खु
ब्रह्मचारिन् -- ब्रह्मचारिन्
ब्राह्मण -- ब्राह्मण
बुद्ध -- बुद्ध
चक्र -- चक्क
चन्द्र -- चन्द
चित्र -- चित्त
चित्त -- चित्त
दृढ -- दल्ह
दण्ड -- दण्ड
दर्शन -- दस्सन
देव -- देव
धर्म -- धम्म
धर्मस्थ -- धर्मत्थ
ध्रुव -- धुव
दुःख -- दुक्ख
गन्धर्व -- गन्धब्ब
गुप्त -- गुत्त
हंस -- हंस
ध्यान -- झान
कर्म -- कम्म
काम -- काम
स्कन्ध -- खन्ध
शान्ति -- खान्ति / खान्ती
क्षत्रिय -- खत्तिय
क्षेत्र -- खेत्त
क्रोध -- कोध
मर्त्य -- मच्च
मृत्यु -- मच्चु
मार्ग -- मग्ग
मैत्र -- मेत्र
मिथ्यादृष्टि -- मिच्छादिट्ठि
मोक्ष -- मोक्ख
मुक्त -- मुत्त
निर्वाण -- निब्बान
नित्य -- निच्च
प्रव्रजित -- पब्बजित (a homeless monk)
प्रकीर्णक -- पकिन्नक (scattered, miscellaneous)
प्राण -- पान (breath of life)
प्रज्ञा -- पन्ना (intelligence, wisdom, insight)
प्रज्ञाशिला -- पन्नासिला (higher intelligence and virtue)
परिनिर्वाण -- परिनिब्बन
प्रतिमोक्ष -- पतिमोक्ख
प्रिय -- पिय (dear, friend, amiable)
पुष्प -- पुप्फ
पुत्र -- पुत्त
सर्व -- सब्ब (all, whole)
सत्य -- सच्च
श्रद्धा -- सद्धा
स्वर्ग -- सग्ग
सहस्र -- सहस्स (a thousand)
श्रमण -- समन (religious recluse)
सम्योजन -- सन्नोजन / संयोजन
स्रोतस् -- सोत (stream)
शुक्ल -- सुक्क (light, pure, bright, white)
शून्यता -- सुन्नता (emptiness (nibbana), the Void)
तृष्णा -- तन्हा (thirst, craving)
त्रिपिटक -- तिपिटक
सूत्र -- सुत्त
स्थान - थान (condition, state, stance)
वक् / वच् -- वच (voice, word, speech)
वर्ग -- वग्ग (chapter, section; all chapter headings)
व्रण -- वन (wound, sore)
वन -- वन (forest, jungle (of desires))
विजान -- विजान (understanding, knowing)
विज्ञान -- विन्नान (cognition, consciousness, one of the five khandhas)
वीर्य -- विरिय (vigor, energy, exertion)
चार आर्य सत्य
चत्वारि आर्यसत्यानि -- चत्तारि अरियसच्चानि (four noble truths)
1) दुःख -- दुक्ख
2) समुदय -- समुदय (origin, cause of ill)
3) निरोध -- निरोध (destruction of ill, cessation of ill)
4) मार्ग -- मग्ग (road, way)
आर्याष्टांग मार्ग -- अरिय अट्ठांगिक मग्ग (THE NOBLE EIGHTFOLD PATH)
1) सम्यग्दृष्टि -- सम्मदिट्ठि (right insight, right understanding, right vision)
2) सम्यक् संकल्प -- सम्मसंकप्प (right aspiration, right thoughts [right thoughts in the Theravada terminology denote the thoughts free from ill will, hatred, and jealousy)
3) सम्यग्वाक् -- सम्मवाच (right speech)
4) सम्यक् कर्मान्त -- सम्मकम्मन्त (right action)
5) सम्यग्जीव -- सम्मजीव (right livelihood, right living)
6) सम्यग्व्यायाम -- सम्मवयाम (right effort)
7) सम्यक्स्मृति -- सम्मसति (right memory, right mindfulness)
8) सम्यक्समाधि -- सम्मसमाधि (right concentration)
स्त्रोत: विकीपीडिया
पालि भाषा मे भगवान्‌ का अर्थ
पालि का भगवान्‌ अथवा भगवतं दो शब्दों से बना है – भग + वान्‌ । पालि में भग मायने होता है – भंग करना , तोडना , भाग करना उपलब्धि को बांटना आदि और वान्‌ का अर्थ है धारण्कर्ता , तृष्णा आदि । यानि जिसने तृष्णाओं को भंग कर दिया हो वह भगवान्‌।
पालि ग्रंथों मे बुद्ध के लिये प्रयुक्त भगवान्‌ अथवा भगवा शब्द को परिभाषित करने के बहुत से उदाहरण है :
भग्गरागोति भगवा ’ : जिसने राग भग्न किया कर लिया वह भगवान्‌
‘ भग्ग्दोसोति भगवा ’ : जिसने द्धेष भग्न किया हो वह भगवान्‌
‘ भग्गमोहोति भगवा , भग्गमानोति भगवा , भग्ग किलेसोति भगवा , भवानं अंतकरोति भगवा म भग्गकण्ड्कोति भगवा ’..: जिसने मोह भंग कर लिया , अभिमान नष्ट कर लिया , क्लेष भग्न कर लिया , भव संस्कारों का अंत कर लिया , कंटक भग्न कर लिये वह भगवान्‌।
‘भग्गमोहोति भगवा’: मोह भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गमानोति भगवा’ : अभिमान नष्ट कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गदिट्‌ठीति भगवा’ : दार्शिनिक मान्याताओं को भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गकण्डकोति भगवा’: कंटक भग्न किया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भग्गकिलेसोति भगवा’: क्लेश , काषाय भग्न कर लिये , इस अर्थ में भगवान्‌ ।
‘भजि विभजि पविभजि धम्म्रतन्तिभगवा’ : भजि यानी जिसने धर्म रत्न का भजन किया , यानी सेवन , इस माने भगवान्‌ ।
ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं जिसमॆ भगवान शब्द का अर्थ संस्कृत के शाब्दिक अर्थ  से बिल्कुल  अलग दिखता है ।
पालि में एक सुत्त है :
इतिपि सो भगवा , अरहं , सम्मासम्बुद्धो,
विज्जाचरणसम्पन्नो सुगुतो लोकविदू ,
अनुत्तरो पुरिस सम्म सारथी सत्था देवमनुस्सानं , बुद्धो भगवति ॥
ऐसे जो अहर्त है , सम्यक्‌ सम्बुद्ध हैं , संपूर्ण जागृत हैं , लोभ , द्धेष और मोह से मुक्त ऐसे भगवन्‌ हैं , सर्वज्ञ हैं , ज्ञान और आचरण में परिपूर्ण हैं , सुगति प्राप्त हैं , वर्तमान और भूत भविष्य को जानने वाले हैं , यथावादी तथाकारी , जैसा कहते हैं वैसा करते हैं , ऐसे आचरण वाले हैं , आदमी कोलोभ , द्धेष और मोह से छुडाने वाले अप्रतिम सारथी हैं , देवता और मनुष्यों के सास्ता हैं , गुरु हैं , उपदेशक हैं , ऐसे मनुष्यों मे अनुपम श्रेष्ठतम्‌ भगवान्‌ बुद्ध हैं ।
संदर्भित ग्रंथ एंव वेबसाइट
१. गौतम बुद्ध और उनके उपदेश रचयिता आनन्द श्रीकृष्ण
२. बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य लेखक श्री राजेश चन्द्रा
३. भगवान बुद्ध और उनका धर्म लेखक डां भीमराव अम्बेड्कर
४ वीकीपीडिया

Monday, January 28, 2013

विचार, स्वप्न-मन की धूल हैं

एक झेन कथा है।

एक युवक अपने गुरु के पास वर्षों रहा, और गुरु कभी उसे कुछ कहा नहीं। बार-बार शिष्य पूछता कि मुझे कुछ कहें, आदेश दें, मैं क्या करूं? गुरु कहता, मुझे देखो। मैं जो करता हूं, वैसा करो। मैं जो नहीं करता हूं, वह मत करो, इससे ही समझो। लेकिन उसने कहा, इससे मेरी समझ में नहीं आता, आप मुझे कहीं और भेज दें। झेन-परंपरा में ऐसा होता है कि शिष्य मांग सकता है कि मुझे कहीं भेज दें, जहां में सीख सकूं। तो गुरु ने कहा, तू जा, पास में एक सराय है कुछ मील दूर, वहां तू रुक जा, चौबीस घंटे ठहरना और सराय का मालिक तुझे काफी बोध देगा।

वह गया। वह बड़ा हैरान हुआ। इतने बड़े गुरु के पास तो बोध नहीं हुआ और सराय के मालिक के पास बोध होगा! धर्मशाला का रखवाला! बेमन से गया। और वहां जाकर तो देखी उसकी शक्ल-सूरत रखवाले की तो और हैरान हो गया कि इससे क्या बोध होने वाला है! लेकिन अब चौबीस घंटे तो रहना था। और गुरु ने कहा था कि देखते रहना, क्योंकि वह धर्मशाला का मालिक शायद कुछ कहे न कहे, मगर देखते रहना, गौर से जांच करना।
तो उसने देखा कि दिनभर वह धूल ही झाड़ता रहा, वह धर्मशाला का मालिक; कोई यात्री गया, कोई आया, नया कमरा, पुराना, वह धूल झाड़ता रहा दिनभर। शाम को बर्तन साफ करता रहा। रात ग्यारह-बारह बजे तक यह देखता रहा, वह बर्तन ही साफ कर रहा था, फिर सो गया। सुबह जब उठा पांच बजे, तो भागा कि देखें वह क्या कर रहा है; वह फिर बर्तन साफ कर रहा था। साफ किए ही बर्तन साफ कर रहा था। रात साफ करके रखकर सो गया था।

इसने पूछा कि महाराज, और सब तो ठीक है, और ज्यादा ज्ञान की मुझे आपसे अपेक्षा भी नहीं, इतना तो मुझे बता दें कि साफ किए बर्तन अब किसलिए साफ कर रहे हैं? उसने कहा, रातभर भी बर्तन रखें रहें तो धूल जम जाती है। उपयोग करने से ही धूल नहीं जमती, रखे रहने से भी धूल जम जाती है। समय के बीतने से धूल जम जाती है।

यह तो वापस चला आया। गुरु से कहा, वहां क्या सीखने में रखा है, वह आदमी तो हद्द पागल है। वह तो बर्तनों को घिसता ही रहता है, रात बारह बजे तक घिसता रहा, फिर सुबह पांच बजे से--और घिसे-घिसायों को घिसने लगा। उसके गुरु ने कहा, यही तू कर, नासमझ! इसीलिए तुझे वहां भेजा था। रात भी घिस, घिसते-घिसते ही सो जा, और सुबह उठते ही से फिर घिस। क्योंकि रात भी सपनों के कारण धूल जम जाती है। समय के बीतते ही धूल जम जाती है।

विचार और स्वप्न हमारे भीतर के मन की धूल हैं।

-ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग-8
प्रवचन नं. 79 से संकलित

Sunday, January 27, 2013

रहस्यदर्शियों पर ओशो

draft_lens15301861module132673501photo_1289489203buddha_quote_6

बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है।


गौतम बुद्ध के संबंध में सात बातें।


पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।
दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।
तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।
बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं। वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।
विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।
इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।
दूसरी बात, गौतम बुद्ध पारंपरिक नही, मौलिक हैं।
गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत। उधार श्रद्धा दो कौड़ी की है। विश्वास मत करना, खोजना। अपने जीवन को खोज में लगाना, मानने में जरा भी शक्ति व्यय मत करना। अन्यथा मानने में ही फांसी लग जाएगी। मान-मानकार ही लोग भटक गए हैं।
तो बुद्ध न तो परंपरा की दुहाई देते, न वेद की। न वे कहते हैं कि हम जो कहते हैं, वह ठीक होना ही चाहिए। वे इतना ही कहते हैं, ऐसा मैंने देखा। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इसको अगर परिकल्पना की तरह ही स्वीकार कर लो, तो काफी है।
परिकल्पना का अर्थ होता है, हाइपोथीसिस। जैसे कि मैंने कहा कि भीतर आओ, भवन में दीया जल रहा है। तो मैं तुमसे कहता हूं कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि भवन में दीया जल रहा है। इसको विश्वास करने की जरूरत नहीं। इस पर किसी तरह की श्रद्धा लाने की जरूरत नहीं है। तुम मेरे साथ आओ और दीए को जलता देख लो। दीया जल रहा है तो तुम मानो या न मानो, दीया जल रहा है। और दीया जल रहा है तो तुम मानते हुए आओ कि न मानते हुए आओ, दीया जलता ही रहेगा। तुम्हारे न मानने से दीया बुझेगा नहीं, तुम्हारे मानने से जलेगा नहीं।
इसलिए बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यही तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है। तुम भीतर आओ और दीए को जलता देख लो। देख लो, फिर मानना।
और खयाल रहे जब देख ही लिया तो मानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। हम जो देख लेते हैं, उसे थोड़े ही मानते हैं। हम तो जो नहीं देखते, उसी को मानते हैं। तुम पत्थर-पहाड़ को तो नहीं मानते, परमात्मा को मानते हो। तुम सूरज-चांद-तारों को तो नहीं मानते, वे तो हैं। तुम स्वर्गलोक, मोक्ष, नर्क को मानते हो। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसको हम मानते हैं। जो दिखायी पड़ता है, उसको तो मानने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, उसका यथार्थ तो प्रगट है।
तो बुद्ध कहते हैं, मेरी बात पर भरोसा लाने की जरूरत नहीं, इतना ही काफी है कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लो। इतना पर्याप्त है। इसको वैज्ञानिक कहते हैं, हाइपोथीसिस, परिकल्पना। एक वैज्ञानिक कहता है, सौ डिग्री तक पानी गर्म करने से पानी भाप बन जाता है। मानने की कोई जरूरत नहीं, चूल्हा तुम्हारे घर में है, जल उपलब्ध है, आग उपलब्ध है, चढ़ा दो चूल्हे पर जल को, परीक्षण कर लो। परीक्षण करने के लिए जो बात मानी गयी है, वह परिकल्पना। अभी स्वीकार नहीं कर ली है कि यह सत्य है, लेकिन एक आदमी कहता है, शायद सत्य हो, शायद असत्य हो, प्रयोग करके देख लें, प्रयोग ही सिद्ध करेगा-सत्य है या नहीं?
तो बुद्ध पारंपरिक नहीं हैं, मौलिक हैं। विचार की परंपरा होती है, दृष्टि की मौलिकता होती है। विचार अतीत के होते हैं, दृष्टि वर्तमान में होती है। विचार दूसरों के होते हैं, दृष्टि अपनी होती है।
तीसरी बात, गौतम बुद्ध शास्त्रीय नहीं हैं। पंडित नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं।
बुद्ध ने धर्म को पहली दफे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दी। बुद्ध ने धर्म को पहली दफे विज्ञान के सिंहासन पर विराजमान किया। इसके पहले तक धर्म अंधविश्वास था। बुद्ध ने उसे बड़ी गरिमा दी। बुद्ध ने कहा, अंधविश्वास की जरूरत ही नहीं है। धर्म तो जीवन का परम सत्य है। एस धम्मो सनंतनो। यह धर्म तो शाश्वत और सनातन है। तुम जब आंख खोलोगे तब इसे देख लोगे।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा कि नरक के भय के कारण मानो, और यह भी नहीं कहा कि स्वर्ग के लोभ के कारण मानो। और इसलिए यह भी नहीं कहा कि परमात्मा सताएगा अगर न माना, और परमात्मा पुरस्कार देगा अगर माना। नही, ये सब व्यर्थ की बातें बुद्ध ने नहीं कहीं।
बुद्ध ने तो सारसूत्र कहा। बुद्ध ने तो कहा, यह धर्म तुम्हारा स्वभाव है। यह तुम्हारे भीतर बह रहा है, अहर्निश बह रहा है। इसे खोजने के लिए आकाश में आंखें उठाने की जरूरत नहीं है, इसे खोजने के लिए भीतर जरा सी तलाश करने की जरूरत है। यह तुम हो, तुम्हारी नियति है, यह तुम्हारा स्वभाव है। एक क्षण को भी तुमने इसे खोया नहीं, सिर्फ विस्मरण हुआ है।
तो बुद्ध ने चैतन्य की सीढ़ियां कैसे पार की जाएं, मूर्छा से कैसे आदमी अमूर्छा में जाए, बेहोशी कैसे टूटे और होश कैसे जगे, इसका विज्ञान थिर किया। और जो उनके साथ भीतर गए, उन्हें निरपवाद रूप से मान लेना पड़ा कि बुद्ध जो कहते हैं, ठीक कहते हैं।
यह अपूर्व क्रांति थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध मील के पत्थर हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में। संत तो बहुत हुए, मील के पत्थर बहुत थोड़े लोग होते हैं। महावीर भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि महावीर ने जो कहा, वह तेईस तीर्थंकर पहले कह चुके थे। कृष्ण भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि कृष्ण ने जो कहा, वह उपनिषद और वेद सदा से कहते रहे थे। बुद्ध मील के पत्थर हैं, जैसे लाओत्सू मील का पत्थर है। कभी-कभार, करोड़ों लोगों में एकाध संत होता है, करोड़ों संतों में एकाध मील का पत्थर होता है। मील के पत्थर का अर्थ होता है, उसके बाद फिर मनुष्य-जाति वही नहीं रह जाती। सब बदल जाता है, सब रूपांतरित हो जाता है। एक नयी दृष्टि और एक नया आयाम और एक नया आकाश बुद्ध ने खोल दिया।
बुद्ध के साथ धर्म अंधविश्वास न रहा, अंतर्खोज बना। बुद्ध के साथ धर्म ने बड़ी छलांग लगा ली। आस्तिक को ही धर्म में जाने की सुविधा न रही, नास्तिक को भी सुविधा हो गयी। ईश्वर को नहीं मानते, कोई हर्ज नहीं, बुद्ध कहते ही नहीं कि मानना जरूरी है। कुछ भी नहीं मानते, बुद्ध कहते हैं, तो भी कोई चिंता की बात नहीं। कुछ मानने की जरूरत ही नहीं है। बिना कुछ माने अपने भीतर तो जा सकते हो। भीतर जाने के लिए मानने की आवश्यकता क्या है! न तो ईश्वर को मानना है, न आत्मा को मानना है, न स्वर्ग-नर्क को मानना है। इसे तो नास्तिक भी इनकार न कर सकेगा कि मेरा भीतर है। इसे तो नास्तिकों ने भी नहीं कहा है कि भीतर नहीं है। भीतर तो है ही। नास्तिक कहते हैं, यह भीतर शाश्वत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, फिकर छोड़ो, पहले यह जितना है उसे जान लो, उसी जानने से अगर शाश्वत का दर्शन हो जाए तो फिर मानने की जरूरत न होगी; तुम मान ही लोगे।
बुद्ध ने नास्तिकों को धार्मिक बनाने का महत कार्य पूरा किया। इसलिए बुद्ध के पास जो लोग आकर्षित हुए, बड़े बुद्धिमान लोग थे। आमतौर से धार्मिक साधु-संतों के पास बुद्धिहीन लोग इकट्ठे होते हैं। जड़, मूर्छित, मुर्दा। बुद्ध ने मनुष्य-जाति की जो श्रेष्ठतम संभावनाएं हैं, उनको आकर्षित किया। बुद्ध के पास नवनीत इकट्ठा हुआ चैतन्य का। ऐसे लोग इकट्ठे हुए जो और किसी तरह तो धर्म को मान ही नहीं सकते थे, उनके पास प्रज्वलित तर्क था। इसलिए बुद्ध दार्शनिक हैं, लेकिन बुद्ध के पास इस देश के सबसे बड़े से बड़े दार्शनिक इकट्ठे हो गए। बुद्ध अकेले एक व्यक्ति के पीछे इतना दर्शनशास्त्र पैदा हुआ, जितना मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी दूसरे व्यक्ति के पीछे नहीं हुआ। और बुद्ध के पीछे इतने महत्वपूर्ण विचारक हुए कि जिनकी तुलना सारी पृथ्वी पर कहीं भी खोजनी मुश्किल है।
कैसे यह घटित हुआ? बुद्ध ने महानास्तिकों को आकर्षित किया। आस्तिक को बुला लेना मंदिर में तो कोई खास बात नहीं, नास्तिक को बुला लेने में कुछ खास बात है। बुद्ध वैज्ञानिक हैं, इसलिए नास्तिक भी उत्सुक हुआ। विज्ञान को तो नास्तिक ठुकरा न सकेगा। बुद्ध ने कहा, संदेह है, चलो, संदेह की ही सीढ़ी बनाएंगे। संदेह से और शुभ क्या हो सकता है! संदेह के पत्थर को लेंगेी बना लेंगेे। संदेह से ही तो खोज होती है। इसलिए संदेह को फेंको मत।
इस बात को समझना। जिसके पास जितनी विराट दृष्टि होती है, उतना ही वह हर चीज का उपयोग कर लेना चाहता है। सिर्फ क्षुद्र दृष्टि के लोग काटते हैं। क्षुद्र दृष्टि का आदमी कहेगा, संदेह नहीं चाहिए, श्रद्धा चाहिए। काटो संदेह को। लेकिन संदेह तुम्हारा जीवंत अंग है, काटोगे तो तुम अपंग हो जाओगे। संदेह का रूपांतरण होना चाहिए, खंडन नहीं। संदेह ही श्रद्धा बन जाए, ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए।
कोई कहता है, काटो कामवासना को। लेकिन काटने से तो तुम अपंग हो जाओगे। कुछ ऐसा होना चाहिए कि कामवासना राम की वासना बन जाए। ऊर्जा का अधोगमन ऊर्ध्वगमन बन जाए। तुम ऊर्ध्वरेतस बन जाओ। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे कंकड़-पत्थर भी हीरों में रूपांतरित हो जाएं। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे जीवन की कीचड़ कमल बन सके।
बुद्ध ने वह कीमिया दी।
चौथी बात, गौतम बुद्ध वायवी, एब्सट्रेक्ट नहीं, अत्यंत व्यावहारिक हैं। ऊंचे से ऊंची छलांग ली है उन्होंने, लेकिन पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ा। जड़ें जमीन में जमाए रखीं। वह सिर्फ हवा में ही पंख नहीं मारते रहे।
एक बहुत प्राचीन कथा है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि बनायी और सब चीजें बनायीं, तभी उसने यथार्थ और स्वप्न भी बनाया। बनते ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ और स्वप्न का झगड़ा तो प्राचीन है। पहले दिन ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं; स्वप्न ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं, तुझमे रखा क्या है! झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि कौन महत्वपूर्ण है दोनों में कि दोनों झगड़ते हुए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा हंसे और उन्होंने कहा, ऐसा करो, सिद्ध हो जाएगा प्रयोग से। तुममें से जो भी जमीन पर पैर गड़ाए रहे और आकाश को छूने में समर्थ हो जाए, वही श्रेष्ठ है।
दोनों लग गये। स्वप्न ने तो तत्क्षण आकाश छू लिया, देर न लगी, लेकिन पैर उसके जमीन तक न पहुंच सके। टंग गया आकाश में। हाथ तो लग गए आकाश से, लेकिन पैर जमीन से न लगे-स्वप्न के पैर होते ही नहीं। यथार्थ जमीन में पैर गड़ाकर खड़ा हो गया, जैसे कि कोई वृक्ष हो, लेकिन ठूंठ की तरह, आकाश तक उसके हाथ न पहुंचे।
ब्रह्मा ने कहा, समझे कुछ? स्वप्न अकेला आकाश में अटक जाता है, यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है। कुछ ऐसा चाहिए कि स्वप्न और यथार्थ का मेल हो जाए।
तो बुद्ध वायवी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंनें आकाश नहीं छुआ। उन्होंने आकाश छुआ, लेकिन यथार्थ के आधार पर छुआ।
इस फर्क को समझना।
बुद्ध ने अपने पैर तो जमीन पर रोके, बुद्ध ने यथार्थ को तो जरा भी नहीं भुलाया, यथार्थ में बुनियाद रखी; भवन उठा, मंदिर ऊंचा उठा, मंदिर पर स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन मंदिर के स्वर्णकलश टिकते तो जमीन में छिपे हुए पत्थरों पर हैं, भूमि के भीतर छिपे हुए बुनियाद के पत्थरों पर टिकते हैं। बुद्ध ने एक मंदिर बनाया, जिसमें बुनियाद भी है और शिखर भी।
बहुत लोग हैं, जिनको हम नास्तिक कहते हैं, वे जमीन पर अटके रह जाते हैं। वे ठूंठ की तरह हैं। यथार्थ का ठूंठ। मार्क्सवादी हैं या चार्वाकवादी हैं, वे यथार्थ का ठूंठ। वे जमीन में तो पैर गड़ा लेते हैं, लेकिन उनके भीतर आकाश तक उठने की कोई अभीप्सा नहीं है, आकाश तक उठने की कोई क्षमता नहीं है। और चूंकि वे सपने को काट डालते हैं बिलकुल और कह देते हैं, आदर्श है ही नहीं जगत में। बस यही सब कुछ है, मिट्टी ही सब कुछ है। उनके जीवन में कमल नहीं फूलता, कमल नहीं उठता। कमल का उपाय ही नहीं रह जाता। जिसको इनकार कर दिया आग्रहपूर्वक, उसका जन्म नहीं होता।
और फिर दूसरी तरफ सिद्धांतवादी हैं: एब्सट्रेक्ट, वायवी विचारक है; वे आकाश में ही पर मारते रहते हैं, वे कभी जमीन पर पैर नहीं रोकते हैं। वे आदर्श में जीते हैं, यथार्थ से उनका कभी कोई मिलन ही नहीं होता। उनकी आंखों में आकाश-कुसुम खिलते हैं, असली कुसुम नहीं।
बुद्ध स्वप्नवादी नहीं हैं, परम व्यावहारिक हैं। लेकिन चार्वाक जैसे व्यवहारवादी भी नहीं हैं। उनका व्यवहारवाद अपने भीतर आदर्श की संभावना छिपाए हुए है। लेकिन वे कहते हैं, शुरू तो करना होगा जमीन पर पैर टेकने से। जिसके पैर जमीन में जितनी मजबूती से टिके हैं, वह उतनी ही आसानी से आकाश को छूने में समर्थ हो पाएगा। मगर यात्रा तो शुरू करनी पड़ेगी जमीन में पैर टेकने से।
इसलिए जब कोई बुद्ध के पास आता है और ईश्वर की बात पूछता है, वे कहते हैं, व्यर्थ की बातें मत पूछो। अनेकों को तो लगा कि बुद्ध अनीश्वरवादी हैं, इसलिए ईश्वर के बाबत जवाब नहीं देते। यह बात सच नहीं है। बुद्ध कहते हैं, पहले जमीन में तो पैर गड़ा लो, पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अंतस चेतना में तो जड़ें फैला लो, पहले तुम जो हो उसको तो पहचान लो, फिर यह पीछे हो लेगा। यह अपने से हो लेगा। यह एक दिन अचानक हो जाता है। जब जमीन में वृक्ष की जड़े खूब मजबूती से रुक जाती हैं, तो वृक्ष अपने आप आकाश की तरफ उठने लगता है। एक दिन आकाश में उठे वृक्ष में फूल भी खिलते हैं, वसंत भी आता है। मगर वह अपने से होता है। असली बात जड़ की है।
तो बुद्ध बहुत गहरे में यथार्थवादी हैं, लेकिन उनका यथार्थ आदर्श को समाहित किए हुए है। वह आदर्श समन्वित है यथार्थ में।
पांचवी बात, गौतम बुद्ध विधिवादी नहीं, मानवीय हैं।
एक तो विधिवादी होता है, जैसे मनु। सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, मनुष्य महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा लगता है मनु में, जैसे मनुष्य सिद्धांत के लिए बना है। मनुष्य की आहुति चढ़ायी जा सकती है सिद्धांत के लिए, लेकिन सिद्धांत में फेर-बदल नहीं की जा सकती।
बुद्ध अति मानवीय हैं, ह्ययूमनिस्ट। मानववादी हैं। वे कहते हैं, सिद्धांत का उपयोग है मनुष्य की सेवा में तत्पर हो जाना। सिद्धांत मनुष्य के लिए है, मनुष्य सिद्धांत के लिए नहीं। इसलिए बुद्ध के वक्तव्यों में बड़े विरोधाभास हैं। क्योंकि बुद्ध एक-एक व्यक्ति की मनुष्यता को इतना मूल्य देते, इतना चरम मूल्य देते हैं कि अगर उन्हें लगता है इस आदमी को इस सिद्धांत से ठीक नहीं पड़ेगा, तो वे सिद्धांत बदल देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि थोड़े से सिद्धांत में फर्क करने से इस आदमी को लाभ होगा, तो उन्हें फर्क करने में जरा भी झिझक नहीं होती। लेकिन मौलिक रूप से ध्यान उनका व्यक्ति पर है, मनुष्य पर है। मनुष्य परम है। मनुष्य मापदंड है। सब चीजें मनुष्य पर कसी जानीं चाहिए।
इसलिए बुद्ध वर्ण-व्यवस्था को न मान सके। इसलिए बुद्ध आश्रम-व्यवस्था को भी न मान सके। क्योंकि ये जड़ सिद्धांत हैं। बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने। ब्राह्मण-घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। और शूद्र वही जो ब्रह्म न जाने। शूद्र-घर में पैदा होने से कोई शूद्र नहीं होता। तो अनेक ब्राह्मण शूद्र हो गए, बुद्ध के हिसाब से, और अनेक शूद्र बाह्मण हो गए। सब अस्तव्यस्त हो गया। मनु के पूरे शास्त्र को बुद्ध ने उखाड़ फेंका।
हिंदू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नहीं हैं। वर्ण-व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा। यह कुछ आकस्मिक बात नहीं थी कि डाक्टर अंबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शूद्रों को बौद्ध होने को निमंत्रण दिया। इसके पीछे कारण है। अंबेडकर ने बहुत बातें सोची थीं। पहले उसने सोचा कि ईसाई हो जाएं, क्योंकि हिंदुओ ने तो सता डाला है, तो ईसाई हो जाएं। फिर सोचा कि मुसलमान हो जाएं। लेकिन यह कोई बात जमीं नही, क्योंकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव है। वर्ण के नाम से न होगा तो शिया-सुन्नी का है।
अंततः अंबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जंच गयी अंबेडकर को कि शूद्र को सिवाय बुद्ध के साथ और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि शूद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध हैं-और कोई राजी नहीं हो सकता-जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नहीं, मनुष्य का चरम मूल्य है।
यह आकस्मिक नहीं है कि अंबेडकर बौद्ध हुए। पच्चीस सौ साल के बाद शूद्रों का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना, या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ जाना, बौद्ध होने की आकांक्षा, बड़ी सूचक है। इससे बुद्ध के संबंध में खबर मिलती है।
बुद्ध ने वर्ण की व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी। जवान, युवकों को संन्यास दे दिया। हिंदू नाराज हुए। संन्यस्त तो आदमी होता है आखिरी अवस्था में, मरने के करीब। अगर बचा रहा, पचहत्तर साल के बाद उसे संन्यस्त होना चाहिए। तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नहीं। अगर बच गए, तो पचहत्तर साल के बाद ऊर्जा नहीं बचती जीवन में। तो हिंदुओं का संन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है, जो आखिरी घड़ी में कर लेना है। मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है।
बुद्ध ने युवकों को संन्यास दे दिया, बच्चों को संन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नहीं है, लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा। अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भी परमात्मा को खोजने की, सत्य को खोजने की, जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकांक्षा जगी है, तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनी आकांक्षा को सुने, वह अपनी आकांक्षा से जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंकाक्षा को सुने। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकांक्षा से जीए। उन्होंनें सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए, मनुष्य प्रमुख हो गया।
तो वे सैद्धांतिक नहीं हैं, विधिवादी नहीं हैं। लीगल नहीं है उनकी पकड़, उनकी पकड़ मानवीय है। कानून इतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य मूल्यवान है। और हम कानून बनाते ही इसीलिए हैं कि मनुष्य के काम आए। मनुष्य कानून के काम आने के लिए नहीं है। इसलिए जब जरूरत हो, कानून बदला जा सकता है। जब मनुष्य के हित में हो, ठीक है, जब अहित में हो जाए तोड़ा जा सकता है। जो-जो मनुष्य के अहित में हो जाए, तोड़ देना है। कोई कानून शाश्वत नहीं है, सब कानून उपयोग के लिए हैं।
और छठवीं बात, गौतम बुद्ध नियमवादी नहीं है, बोधवादी हैं।
अगर बुद्ध से पूछो, क्या अच्छा है, क्या बुरा है, तो बुद्ध उत्तर नहीं देते। बुद्ध यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा; जो बोधहीनता से किया जाए, बुरा।
इस फर्क को खयाल में लेना। बुद्ध यह नहीं कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, और कभी कोई बात पाप हो सकती है-वही बात पाप हो सकती है, भिन्न परिस्थति में वही बात पाप हो सकती है। इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के ऊपर लगे हुए लेबिल नहीं हैं। अभी जो तुमने किया, पुण्य है; और सांझ को दोहराओ तो शायद पाप हो जाए। भिन्न परिस्थिति।
तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? बुद्ध ने एक नया आधार दिया। बुद्ध ने आधार दिया-बोध, जागरूकता। इसे खयाल में लेना। जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक कर पाए, जो भी जागरूकता में ही किया जा सके, वही पुण्य है। और जो बात केवल मूर्छा में ही की जा सके, वही पाप है। जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, तो पुण्य है। अगर क्रोध तुम मूर्छित होकर ही कर सको, तो पाप है।
अब फर्क समझना। इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो, पुण्य हो सकता है। शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है, होशपूर्वक किया जाए।
मैंने एक झेन कहानी सुनी है। एक समुराई, एक क्षत्रिय के गुरु को किसी ने मार दिया। और जापान में ऐसी व्यवस्था है, अगर किसी का गुरु मार डाला जाए, तो शिष्य का कर्तव्य है कि बदला ले। और जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले। ये समुराई तो बड़े भयानक योद्धा होते हैं। गुरु को किसी ने मार डाला, तो उसका जो शिष्य था, वह तो सब कुछ छोड़कर बस इसी में लग गया।
दो साल बाद उसका पीछा करते-करते एक जंगल में, एक गुफा में उसको पकड़ लिया। बस उसकी छाती में छुरा भोंकने को था ही कि उस आदमी ने उस समुराई के ऊपर थूक दिया। जैसे ही उसने थूका, उसने छुरा वापस रख लिया अपनी म्यान में और वापस गुफा के बाहर निकल आया।
उस आदमी ने कहा, क्यों भाई, क्या हो गया? दो साल से मेरे पीछे पड़े हो, बमुश्किल तुम मुझे खोज पाए, मैं जंगल-जंगल भागता रहा, आज तुम्हें मिल गया, आज क्या बात हो गयी कि छुरा निकाला हुआ वापस रख लिया?
उसने कहा कि मुझे क्रोध आ गया। तुमने थूक दिया, मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था, मारो भी अगर किसी को, तो मूर्छा में मत मारना। तो मारने में भी कोई पाप नहीं है। लेकिन तुमने जो थूक दिया, दो साल तक मैंने होश रखा-यह तो सिर्फ एक व्यवस्था की बात थी कि गुरु को मेरे तुमने मारा तो मैं तुम्हें मार रहा था, मेरा इसमें कुछ वैयक्तिक लेना-देना नहीं था-लेकिन तुमने थूक क्या दिया मुझ पर, मैं भूल ही गया गुरु को और मेरे मन में भाव उठा कि मार डालूं इस आदमी को, इसने मेरे ऊपर थूका! मैं बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। अहंकार बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। इसलिए अब जाता हूं। अब फिर जब यह मूर्छा हट जाएगी तब सोचूंगा। लेकिन मूर्छा में कुछ किया नहीं जा सकता।
बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूर्छा में करो, वही पाप; जो जागरूकता में करों, वही पुण्य है। यह पाप और पुण्य की बड़ी नयी व्यवस्था थी। और इसमें व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। कोई दूसरा तय नहीं कर सकता कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। तुमको ही तय करना है। बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।
और सातवीं बात, गौतम बुद्ध असहज के पक्षपाती नहीं, सहज के उपदेष्टा हैं।
गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन के ही कारण आकर्षित मत होओ। क्योंकि कठिन में अहंकार का लगाव है।
इसे तुमने देखा कभी? जितनी कठिन बात हो, लोग करने को उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, मजा आता है-करके दिखा दूं। अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, तो इसमें कुछ मजा नहीं है, एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा, तुम वहां लगाए रहो झंडा, खड़े रहो चढ़कर! न अखबार खबर छापेंगे, न कोई वहां तुम्हारा चित्र लेने आएगा। तुम बड़े हैरान होओगे कि फिर यह हिलेरी पर और तेनसिंग पर इतना शोरगुल क्यों मचाया गया! आखिर इन ने भी कौन सी बड़ी बात की थी, जाकर हिमालय पर झंडा गाड़ दिया था, मैंने भी झंडा गाड़ दिया! लेकिन तुम्हारी पहाड़ी छोटी है। इस पर कोई भी चढ़ सकता है। जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। इसलिए कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो सहज और सुगम है, जो हाथ के पास है, वह चूक जाता है और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं।
देखते हैं, आदमी चांद पर पहुंच गया। अभी अपने पर नहीं पहुंचा! तुमने कभी देखा, सोचा इस पर? चांद पर पहुंचना तकनीक की अदभुत विजय है। गणित की अदभुत विजय है। विज्ञान की अदभुत विजय है। जो आदमी चांद पर पहुँच गया, यह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है। अभी एक ऐसा फाउंटेनपेन भी नहीं बना पाया जो लीकता न हो। और चांद पर पहुँच गए! छोटी-सी बात भी, अभी सर्दी-जुखाम का इलाज नहीं खोज पाए, चांद पर पहुंच गए! अब ऐसे फाउंटेनपेन को बनाने में उत्सुक भी कौन है जो लीके न! छोटी-मोटी बात है, इसमें रखा क्या है!
फाउंटेनपेन सदा लीकेंगे। कोई आशा नहीं दिखती कि कभी ऐसे फाउंटेनपेन बनेंगे जो लीकें न। और सर्दी-जुखाम सदा रहेगी, इससे छुटकारे का उपाय नहीं है। क्योंकि चिकित्सक कैंसर में उत्सुक हैं, सर्दी-जुखाम में नहीं। बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। मंगल पर भी पहुंचेगा, किसी दिन और तारों पर भी पहुंचेगा, बस, अपने को छोड़कर और सब जगह पहुंचेगा।
तो बुद्ध असहजवादी नहीं हैं। बुद्ध कहते है, सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसको जीओ। जो सुगम है, वही साधना है। इसको खयाल में लेना। तो बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीओ। साधु होने का अर्थ बहुत कठिन और जटिल हो जाना नहीं, कि सिर के बल खड़े हैं, कि खड़े हैं तो खड़े ही हैं, बैठते नहीं, कि भूखों मर रहे हैं, कि लंबे उपवास कर रहे हैं, कि कांटों की शय्या बिछाकर उस पर लेट गए हैं, कि धूप में खड़े हैं, कि शीत में खड़े हैं, कि नग्न खड़े हैं। बुद्ध ने इन सारी बातों पर कहा कि ये सब अहंकार की ही दौड़ हैं। जीवन तो सुगम है, सरल है। सत्य सुगम और सरल ही होगा। तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।

-ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग 9
(प्रवचन नं. 82 से संकलित)

Thursday, May 24, 2012

बुद्ध वाणी – “दूसरों के दोषॊं को मत देखो”

दूसरों के दोषॊं को मत देखो -भगवान बुद्ध

सुदस्सं वज्जमञ्जेसं उत्तनो पन दुइसं।
परेसं हि सो वज्जानि ओपुनाति यथा भुसं।
अत्तनो पन छादेति कलि व कितवा सठी॥
भगवान बुद्ध कहते हैं कि दूसरे का दोष देखना आसान है, अपना दोष देखना कठिन। मनुष्य दूसरों के दोषों को भूस की तरह फैलाता है। और अपने दोषों को ऐसे छिपाता है जैसे जुआरी पासों को।
परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो।
आसवा तस्य वड्ढन्ति आरा सो असावक्खया॥
जो आदमी दूसरों के दोष देखता रहता है और नित्य दूसरों से खीजता रहता है, उसके चित्त के मल बढ़ जाते हैं। उसके मन का मैल मिटाना कठिन है।