भगवान बुद्ध अकसर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे । बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे ।
वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे ; तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
एक शिष्य ने उत्तर में कहा,” गुरु जी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है । दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है।”
“सत्य है !”, बुद्ध ने कहा ,” अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”
“नहीं-नहीं , ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा। “, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।
बुद्ध ने कहा, ‘ ठीक है , अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’
शिष्य बोला ,’”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा , ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था , और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं। “
“मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असम्भव है। मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं , कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ ? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया , लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ ?
प्रिय शिष्यों , जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही , और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा, आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें, निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । ” , महात्मा बुद्ध ने अपनी बात पूरी की।
जब तक हम रस्सी की गाँठो को अच्छे से देख कर समझेंगे नहीं,तब तक उसे खोल न सकेंगे।
"विपश्यना" से हम अपने मन की गाँठो को देखने,समझने और उसके बाद उन्हें खोलने का कार्य करते हैं।
Wednesday, September 14, 2016
तीन गांठें
Friday, May 15, 2015
सागर कवि
वसन्त ऋतु आते ही बुद्ध और उनका भिक्खु समूह पूर्वी छेत्र मे लौट आये । वह वैशाली और चम्पा मे रुके । नदी किनारे चलते-२ हुये बुद्ध समुद्र तट पर आ गये । मछुआरों से अनायास ही भिक्खु संघ का वार्तालाप शुरु हुआ । मान्य आनंद ने उत्सुकतावश मछुआरों से समुद्र के विषय मे अनेक विचार जानने चाहे ।
एक लम्बे और सुन्दर मछुआरे ने आनंद से कहा , “ मुझे समुद्र की कई बाते अच्छी लगती हैं । पहला , इसका बालू का किनारा पानी तक ढलान युक्त होता है जिससे नावें खींच लाने और जाल फ़ेंकने मे सुविधा होती है ।
दूसरे , समुद्र सदैव अपने स्थान पर रहता है जिससे हम जानते हैं कि वह कहाँ मिलेगा ।
तीसरे , समुद्र किसी शव को अपने मे डुवाता नही , उसे तट पर फ़ेंक देता है ।
चौथे , सभी नदियाँ – गंगा , यमुना , अचिरावती , सरयु और माही समुद्र मे आ मिलती है जिसके बाद उनका नाम नही रहता । समुद्र उनको अपने गर्भ मे समा लेता है ।
पांचवे , यधपि नदियाँ दिन रात जल ला कर समुद्र मे पहुंचाती हैं , किन्तु उसका जल स्तर अपनी मर्यादा मे रहता है ।
छ्ठे , समुद्र का जल सदैव हमेशा खारा होता है ।
सातवें , समुद्र मे सुन्दर घॊंघा , सीप , शंख , मोती और मूल्यवान पत्थर होते हैं ।
आठवें , समुद्र हजारों प्रकार के प्राणियों को अपने मे समाये रखता है जिनमे लम्बे प्राणि से लेकर सूक्ष्मतम प्राणि तक होते हैं ।
अत: आप समझ ही गये होगें कि हम समुद्र को कितना प्रेम करते हैं । ”
आनंद ने सराहानापूर्ण दृष्टि से मछुआरे को देखा जो मछुआरा होकर भी कवि की भाषा बोल रहा था । आंनद ने बुद्ध से कहा , “ यह व्यक्ति समुद्र को उसी प्रकार प्रेम करता है जैसे कि मै संबोधि के मार्ग को । क्या आप इस संबध मे कुछ शिक्षा देगे ? ”
बुद्ध मुस्कराये और चट्टान पर बैठकर सद्धर्म मार्ग की कुछ विशेतायें बताने लगे । वह मछुआरा भी उनके साथ बैठ गया ।
बुद्ध ने कहा , “ हमारे मछुआरे बधुं ने समुद्र की आठ विशेतायें बताई और अब मै अब आपको सच्चे धर्म की आठ विशॆताये बताउगां ।
पहला , धर्म समुद्र के समान नीचे की ओर ढलवां नही होता । सद्धर्म मार्ग पर व्यक्ति तभी प्रगति कर सकता है , जब वह सभी प्रकार की मानसिकताओं को समाहित कर सके । युवा या वृद्ध , शिक्षित या अशिक्षित सभी कोई धर्म मार्ग पर चल सकता है । हर व्यक्ति अपनी आवशकताओं के अनुसार साधाना – पद्तियों को अपना सकता है ।
दूसरे , समुद्र की भांति धर्म भी अपने स्थान पर रहता है । धर्म शिक्षाओं के सिद्धांत कभी नही बदलते । शीलों को स्पष्ट रुप से समझा और सम्झाया जा सकता है । कोई भी व्यक्ति कही भी धर्म के सिद्धांतों का अध्यन्न और शीलों का पालन करके कही भी साधना कर सकता है । धर्म न कही जाता है और न कभी गुम हो सकता है ।
तीसरे , समुद्र जैसे शव को अपने गर्भ में नही रखता , उसी प्रकार धर्म अज्ञान , आलस्य या शीलाचार को भंग करना सहन नही करता । साधना न करने वाला व्यक्ति अन्तत: स्वयं को समुदाय से बाहर निकाल पाता है ।
चौथे , समुद्र सभी नदियों को समान रुप से आत्मसात् कर लेता है , इसी प्रकार सद्धर्म सभी जातियों को समान रुप से अपनाता है । समुद्र में मिलने के बाद नदी का नाम समाप्त हो जाता है , इसी प्रकार सद्धर्म पर चलने वाला व्यक्ति अपनी जाति , वंश और पूर्व पद सभी त्याग कर मात्र भिक्खु रह जाता है ।
पांचवे , जैसे समुद्र का जल सदैव एक समान रहता है , समुद्र अपनी मर्यादा मे रहता है , सद्धर्म भी एक ही स्तर पर रहता है , चाहे उसके अनुयायी की संख्या कम हो अथवा अधिक । धर्म को शिष्यों की संख्या से नही नापा जा सकता ।
छ्ठे , समुद्र का जल हमेशा खारा होता है । अनगिनत मार्गों और अनगिनत साधन – पद्तियों के होने के बावजूद धर्म का एक ही स्वाद होता है और वह स्वाद है – मुक्ति का आनंद । यदि धर्म शिक्षाओं से मुक्ति न मिले तो वह सच्ची शिक्षा नही है ।
सांतवे , समुद्र में शंख , मोती और मूल्यवान रत्न होते हैं तो धर्म में भी ऊद्र्गामी और मूल्यवान शिक्षायें यथा चार आर्य सत्य , चार विशुद्ध साधनायें , पांच गुण , पांच शक्तियाँ . आत्म जागृति के सात चरण और श्रेष्ठ मार्ग होते हैं ।
आठवें , समुद्र हजारों जीवित प्राणियों को शरण देता है तो धर्म भी सभी को अपनी शरण मे ले लेता है , फ़िर वे अशिक्षित बच्चे हों या बोधिसत्व हों । धर्म के असंख्य अनुयायी हैं जिन्होनें जन्म मृत्यु की धारा मे प्रवेश , प्रथम प्रत्यागत , प्रत्यागथीन अवस्था और अर्हत पदों के पुण्य फ़ल पाये हैं ।
“ इस प्रकार समुद्र के समान सद्धर्म भी प्रेरणा का और अपरिमित संपदा प्राप्त करने का स्त्रोत है । ”
मान्य आनंद ने हाथ जोडकर बुद्ध की ओर देखा और कहा , “ प्रभु , आप महान अध्यात्मिक गुरु तो हैं ही और साथ भी एक अच्छे कवि भी हैं । ”
संकलन : जहं जहं चरन परे गौतम के ‘ तिक न्यात हन्ह ’ प्रकाशन - हिन्द पाकेट बुक्स
Saturday, April 25, 2015
दो पल शांति के ….
यह देखने की बात है कि कहानियों के मूल तत्व को कौन किस रुप मे लेता है। मेरी पिछ्ली कहानी , “ जो हो चुका , सो हो चुका “ को ही लें । पर्थ मे मैने यह कहानी एक सभागार में श्रोतागणॊ को सुनाई । उसके अगले ही दिन एक कम उभ्र के लडके के माता – पिता बहुत ही क्रोध मे भरे हुये मेरे पास आये और बोले कि यह आप कैसी कहानियाँ सुनाकर लोगो को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । कल शाम को जब मेरा लडका अपने मित्रों के साथ घूमने को जाने के लिये निकला तब मैने उससे पूछा कि क्या तुमने अपना होम वर्क पूरा कर लिया है । वह कहने लगा , “ डैड , कल आपने विहार में अजह्न्ह ब्रह्म को सुना होगा , उन्होने ही कहा था ‘ जो हो चुका है वह समाप्त हो गया । ’
मै एक और कहानी से पिछ्ली कहानी को समझाने की कोशिश करता हूँ ।
आस्ट्रेलिया मे अधिकतर लोग घरों में बगीचे का प्रावाधान अवशय रखते हैं । लेकिन कुछ ही लोग हैं जो उस बगीचे में अपने लिये दो पल सूकून का निकाल पाते होगें । अधिकतर लोगों के लिये बगीचा सिर्फ़ कार्य करने की जगह मात्र हैं । मै अधिकतर लोगों को सलाह देता हूँ वह अपने बगीचे की सुन्दरता के लिये उसका पालन पोषण अवशय करे लेकिन उसके साथ ही अपने दिल के पालन पोषण के लिये अपने बाग मे कुछ देर शांति से बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द अबशय लें ।
अब देखे कि चार गृहस्थ मालियों ने इस वक्तत्व को कैसे समझा ।
पहले माली ने सोचा कि पहले बचे हुये सारे कामों को निपटा लें उसके पश्चात शांति से दो पल बगीचे में बैठेगे । आखिरकार बाग की कटाई करनी थी , पौधो मे पानी देना था और पत्तियों और झाडियों की छ्टाई भी करनी थी । उसके बाद जो समय बचेगा उसमें शांति के दो पल ढूंढ लेगें । लेकिन उसका काम अन्त तक समाप्त नही हुआ इसलिये उसके शांति और सूकून के दो पल नही मिल पाये । वैसे आपने भी अपनी संस्कृति मे देखा होगा कि जो लोग शांति की तलाश करते रहते है उनकी तलाश कब्र मे ही जाकर पूरी होती है ।
दूसरा माली पहले माली से अधिक चतुर निकला । उसने कताई और छ्टाई के औजारों को किनारे किया , पानी के डिब्बों को एक तरफ़ रखा और आराम से एक कुर्सी में बौठकर अपनी मन पसंन्द पत्रिका को पढने लगा । लेकिन यह तो पत्रिका को पढने का आनंद लेना था , सूकून उससे कोसों दूर था ।
तीसरे माली ने बागवानी के सारे औजार , पत्रिकायें , समाचार पत्र को किनारे रखा और दो सेकन्ड के लिये बाग में शांन्ति से बैठ गया । कुछ ही देर बाद उसने सोचना शुरु किया , “ अब मुझे इस मैदान कि लवाई शुरु कर देनी चाहिए , झाँडियां की भी कँटाई – छ्टाई करनी है और अगर मै इन पौधॊ को पानी नही दूँगा तो यह फ़ूल तो मुर्झाने की कगार पर खडे हो जायेगें । ” उसके शांति और सूकून के पल विचारों और योजना बनाने मे ही निकल गये । लेकिन हाँ , शांन्ति नही मिली ।
चौथा माली ने विचार किया , “ चलो काफ़ी काम हो गया है , कुछ देर सूकून से बैठते हैं। हाँलाकि , झाडियों और पेडो की कटाई – छ्टाई करनी है , लेकिन यह सब तो बाद मे भी हो जायेगा लेकिन अभी यह सब काम बिल्कुल नही …। ”
मेरी नजर मे चौथा माली ही समझदार निकला , हाँलाकि वह यह जानता था कि उसका बाग अभी परिपूर्ण नही है लेकिन इसके बावजूद वह आगे की न सोचकर , जो हो चुका है उसमे संतोष कर पाया ।
जीवन के परिपेक्ष मे इसको देखें , जो काम आगे का रह गया है , इसकी व्यर्थ मे चिंता न कर के जो हो चुका है उसमे संतोष और आनन्द ले तब ही जीवन मे वास्तविक शांन्ति पा सकते हैं । अगर हम अपनी और दूसरों की कमियों को देखते रहेगे और अगर हम जीवन को हमेशा व्यवस्थित करने मे अपनी उर्जा लगायेगे तो हमे सूकून के उन पलो का हमेशा अभाव रहेगा ।
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ the idiot’s guide to peace of mind ” का हिन्दी अनुवाद ।
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Sunday, January 18, 2015
कार्य–कारण का सिद्धांत ( The Law Of Karma )
पशचिम मे बहुत से लोग कार्य-कारण के सिद्धांत को गलत ढंग से समझते हैं । अधिकतर लोग उसको भाग्यवाद से जोडते हैं जहाँ एक व्यक्ति या उसके परिवार को उसका दंड उसकी पिछ्ली जिन्दगी मे किये अज्ञात गलत कर्मो के कारण भोगना पडता है । जब कि ऐसा बिल्कुल भी नही है जैसे इस कहानी से स्पष्ट है ।
मैने सुना है कि दो औरतों मे केक बनाने की एक प्रतियोगिता हुयी ।
उनमे से पहली औरत के पास जो केक बनाने की सामग्री थी उसको देखकर यह बिल्कुल भी नही लग रहा था कि वह इस प्रतियोगिता के लायक है । पुराना सा दिखने वाला मैदा , कोलेस्ट्रॉल युक्त बासी मक्खन , गाँठ युक्त चीनी ( गीला चमच्च डाल देने के कारण ) , फ़लो के नाम पर थोडॆ बहुत सख्त किशिमिश। और उसकी रसोई के तो कहने ही क्या , हर चीज अस्त – व्यस्त बिल्कुल विशव युद्ध की याद दिलाती हुई ।
दूसरी औरत पहले औरत से बिलकुल विपरीत स्वभाव कीथी । सब कुछ व्यवस्थित , उच्च क्वालिटी की सामाग्री , उच्च स्तर का मैदा , कोलेस्ट्रॉल रहित मक्खन , कच्ची चीनी और यहाँ तक कि रसीले दार फ़ल जो उसने अपनी बगिया मे उगाये थे । उसकी रसोई एक मिसाल थी , सारे मार्ड्न गैजडस उसकी रसोई मे मौजूद थे ।
बता सकते हैं कि किस औरत ने सबसे अच्छी केक बनाई ?
यह आवशयक नही कि जिस व्यक्ति के पास उच्च स्तर की सामग्री हो वह ही बेहतर केक बना सकता है । केक बनाने के लिये सामग्री से अधिक कला , समर्पण और प्रयास की जरुरत पडती है । इसलिये निम्म क्वालिटी की सामग्री होने के बावजूद वह औरत अधिक बेहतर केक बना पायी जिसके पास यह तीन बहूमूल्य वस्तुयें थी ।
मेरे कुछ मित्र है जिनकी जिन्दगी मे सब कुछ अस्त व्यस्त था । वह गरीबी मे पैदा हुये , बचपन उनका बहुत ही कठिन बीता , लोगॊ से ताने सहे और यहाँ तक गालियाँ भी खाई , उनकी तालीम या तो हुई नही और कुछ तो पढने मे साधारण से रह गये , और इनमें से कुछ तो बेचारे विकलांग भी थे जिनके लिये खेल कूद बहुत दूर की चीज थी । लेकिन इसके बावजूद भी उनमे ऐसे गुण थे जिसकी वजह से वह अपनी जिन्दगी बना पाये । क्या आप ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर सकते है ?
मेरे कुछ ऐसे मित्र भी हैं जिनके पास सब कुछ था , धनाढय परिवारों मे पैदा हुये , ऐशवर्य सी जिन्दगी पाई , पढाई मे बहुत ही काबिल रहे , बढिया खिलाडी भी थे और स्मार्ट भी लेकिन उन्होने अपनी जिन्दगी नशा , शराब और जुये जैसे व्यसनो मे बरबाद कर दी । क्या आप ऐसे लोगो की पहचान कर सकते हैं ?
कर्म का आधा हिस्सा वह सामाग्री है जिनके जरिये हमे कार्य करना है और आधा हिस्सा , जो जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है कि उसके जरिये हम क्या करना चाहते हैं ।
कर्म को बीज के रुप मे भी देख सकते हैं । चयन आपके हाथॊ मे है कि जीवन मे आप कौन से बीज बोयेगें ।
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ the Law of Karma ” का हिन्दी अनुवाद ।
Wednesday, November 26, 2014
पीडा का भय–“ जाने दो ” - “ Fear of pain & Letting go of pain”
भय तकलीफ़ का एक अभिग्न अंग है । और यही वजह है कि दर्द का एहसास हमे भय के कारण ही अधिक होता है । अगर भय को एक बार हटा ले तो सिर्फ़ एहसास ही बच जाता है और दर्द चला जाता है ।
१९७० के मध्य के दश्क मे मै उतर पूर्व थाइलैड के जंगल मे एक मोनेस्ट्री मे अन्य भिक्खुओं के साथ रह रहा था । उस रात मुझे जो दाँत मे दर्द हुआ उसकी कल्पना करना भी असहनीय थी । उस जंगल मे न तो कोई दाँत का डाक्टर था , न ही कोई दवा , न टेलीफ़ोन की सुविधा और न बिजली का इन्तजाम ।
रात होते-२ दर्द भंयकर रुप से बढ चुका था । वैसे मै अपने आप को काफ़ी सख्त रुप का भिक्खु समझता हूँ लेकिन उस रात लगता है कि यह दर्द मेरे मुझ जैसे भिक्खु की योग्यता की परीक्षा ले रहा था । दर्द से बचने के लिये मैने ध्यान करना शुरु किया लेकिन दर्द तो कम न हुआ और मेरा ध्यान अपनी श्वास के बजाय उन मच्छरों पर ही लगा रहा जो बार-२ मुझे काट के हलकान किये जा रहे थे ।
मै उठा , बाहर गया और चलित ध्यान करने की असफ़ल कोशिश की । लेकिन मुझे यह भी जल्द ही छोडना पडा क्योंकि मुहे यह लगने लगा था कि मै चल नही रहा था बल्कि मै दौड रहा था । दर्द की तरिवता मुझे दौडा रही थी हाँलाकि उस मठ मे दौडने की जगह बिल्कुल भी न थी ।
मै वापस अपने कुटिया मे आया और बैठ कर जप करने की भी कोशिश की । अकसर मेरे साथी भिक्खु कहते थे कि बौद्ध मंत्रों के जप करने मे अभूत पूर्व शक्तियाँ होती है , यह शक्तियाँ आपका भविष्य बदल सकती है , जंगल मे से जानवरों को भगा सकती हैं आदि आदि । मेरा परिवेश एक वैज्ञानिक तरीके से हुआ था इसलिये मुझे कभी भी इन चीजों पर विशवास न रहा । मंत्रों का जाप करना मेरी दृष्टि मे भोले भाले लोगों को धोखा देने जैसा ही है । लेकिन इसके बावजूद भी मै जाप करता गया लेकिन इससे भी पीडा कम न हुई । मुझे यह इसलिये भी छोडना पडा क्योंकि मै जाप कम बल्कि शोर अधिक मचा रहा था ।
अपने घर से लगभग १००० किमी दूर एक जंगल मे जो कुछ मुझे समझ आया मैने प्रयास किये लेकिन सभी असफ़ल सिद्ध हुये । निराशा और गहन पीडा की उस घडी मे एक रोशनी मेरे दिल और दिमाग मे कौधीं । एक दरवाजा खुला और उसके बाद सारे दरवाजे एक के बाद खुलते गये ।
मुझे अपने बचपन के दिनों मे पढे हुये दो शब्द याद आये , “ जाने दो ” न जाने इन शब्दों को मैने कितनी बार सुना था , न जाने अनगिनत बार अपने मित्रों से मैने इसकी व्याख्या की थी । लेकिन इसका वास्तविक अर्थ मुझे आज मालूम पडा ।
अगले कुछ क्षण मे जो हुआ वह मेरे लिये अकल्पनीय था । भीषण दर्द का एहसास लगभग समाप्त हो चुका था और उसके बद्ले मे मनोरम आनंद की अनूभूति हो रही थी । मेरा मन और मस्तिष्क शांति की गहन अवस्था मे स्थिर हो चुका था । एक बार पु:न मै ध्यान करने के लिये बैठा । सुबह होते-२ ध्यान करने के पशचात मैने अल्प लेकिन पूर्ण नींद ली । मठ के कर्तव्यों को पूरा करने के लिये जब मै सुबह सोकर उठा तो मुझे ध्यान आया कि मेरे दाँत मे दर्द है लेकिन यह पीडा बीती रात की तुलना मे कुछ भी नही थी ।
मेरे कई मित्रो ने दर्द मे इस तरीके को आजमाया और पाया कि यह काम नही करता । वह मेरे पास आये और उन्होने शिकायत की कि उनका दर्द मेरे दाँत के तुलना मे अधिक था । लेकिन मै जानता हूँ कि यह सच नही है । पीडा का मूल्याकंन नही किया जा सकता । मेरी पीडा इसलिये कम हुई क्योकि मैने दर्द का स्वागत किया , उसको गले लगा के उसे आने दिया । इसलिये वह ओझल भी हो गया ।
मैने अपने मित्रो को “ जाने दो ” के असफ़ल रहने के कारण को मेरे तीन अनुयायियों की कहानी के जरिये से समझाया ।
पहले अनुयायी ने अपनी वेदना के दौरान “ जाने दो “ शब्द का कुछ इस तरह से प्रयोग किया ।
उसने मन ही मन कहा “ जाने दो ” और इतंजार करने लगा ।यही तो हम अपनी वास्तविक जिन्दगी मे करते हैं । “ जाने दो ” शब्द का अर्थ है कि जहाँ कोई भी नियत्रंण करने वाला नही हो । लेकिन हम अपने नियत्रण करने वाले स्वयं ही बन जाते हैं जो मेरी समझ मे यह सनक के अलावा कुछ भी नही है ।
एक बार फ़िर उसने “ जाने दो ” शब्द को दोहराया लेकिन कोई परिवर्तन नही दिखा ।
अबकी बार कुछ शिकायत भरे तरीके से कहा , “चलो अब बहुत हो गया जाने भी दो | ”
कुछ झल्लाये और क्रोधित अंदाज मे , “ जाते हो यह नही !! ”
दूसरे अनुयायी ने यह जानते और समझते हुये कि वह नियत्रंक की भूमिका नही निभा रहा है , चुपचाप मेरी सलाह को याद रखा और शांति से बैठकर यह अनुमान लगाने लगा कि उसकी पीडा कम हो रही है । दस मिनट बीत गये लेकिन कुछ भी परिवर्तन नही दिखा । उसने मुझसे शिकायत की मेरे तरीके उसके काम नही आ रहे हैं । मैने उसको समझाया कि “ जाने दो ” शब्द किसी दर्द को छुट्कारा पाने का तरीका नही है बल्कि यह दर्द को शांति से सहने की विधि है । दूसरे अनुयायी ने अबकी बार अपनी पीडा से सौदा करने की कोशिश की , “ मै तुम्हे १० मिनट का समय देता हूँ , अब तुम यहाँ से चले जाओ । ”
लेकिन यह दर्द को जाने देने का तरीका नही है , यह तो पीडा को छुट्कारा पाने का ढंग हुआ ।
तीसरे अनुयायी ने अपनी तीव्र पीडा से कुछ ऐसे कहा , “ मेरी व्यथाओं तुम्हारा स्वागत है , मेरा दिल तुम्हारे लिये खुला है , आओ और मेरे लिये तुमसे जो बन सकता करो । ”
जाने दो का सही अर्थ यही है । मेरा तीसरा अनुयायी नियत्रंक की भूमिका को निभाये बगैर अपनी पीडाओं को यह स्वतंत्रता देता है कि वह जब तक रहना चाहे रहे । एक सच्चे साधक के लिये व्यथा का रहना या न रहना , दोनो ही एक समान है । और यही कारण है कि तीसरे अनुयायी को दर्द सहने और मुक्ति का मार्ग आसानी से मिल गया ।
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ Fear of pain और Letting go of pain ” का हिन्दी अनुवाद ।
Wednesday, November 5, 2014
निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”
किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन हम लोगों मे बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे । जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी निराश नही करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन हमारे विहार के एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने बिना दान लिये उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी । उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह कहते थे कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।
Saturday, October 25, 2014
मन की शांति
एक राजा हमेशा उदास रहता था। लाख कोशिश करने के बावजूद उसे शांति नहीं मिलती थी। एक बार उसके नगर में एक बौद्ध भिक्षु आया। बौद्ध भिक्षु के ज्ञानपूर्ण उपदेश से राजा बहुत प्रभावित हुआ। उसने बौद्ध भिक्षु से पूछा - ‘मैं राजा हूं, मेरे पास सब कुछ है, किंतु फिर भी मेरे मन में शांति नहीं है।
मुझे क्या करना चाहिए?’ बौद्ध भिक्षु बोला - ‘आप अकेले में बैठकर चिंतन करें।’ राजा अगले दिन सुबह अपने कक्ष में आसन जमाकर बैठ गया। तभी उसके महल का एक कर्मचारी सफाई के लिए उधर आया। राजा उससे बात करने लगा। कर्मचारी से राजा ने उसकी परेशानियां पूछीं, जिन्हें सुनकर उसका दिल भर आया। इसके बाद राजा ने हर कर्मचारी के कष्ट व दुख जाने।
सबकी व्यथा सुनने के बाद राजा ने निष्कर्ष निकाला कि वेतन कम होने से सभी आर्थिक रूप से त्रस्त थे। राजा ने तत्काल उनके वेतन में वृद्धि की, जिससे वे सभी खुश हो गए और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। अगले दिन जब राजा की बौद्ध भिक्षु से भेंट हुई, तो उसने पूछा - ‘राजन! आपको कुछ शांति प्राप्त हुई?’ राजा बोला - ‘मुझे पूर्ण रूप से तो शांति नहीं मिली, किंतु जबसे मैंने मनुष्य के दुखों के स्वरूप को जाना है, अशांति थोड़ी-थोड़ी जाती रही।’ तब भिक्षु ने समझाया - ‘राजन! आपने शांति के मार्ग को खोज लिया है। बस, उस पर आगे बढ़ते जाएं। एक राजा तभी प्रसन्न रह सकता है, जब उसकी प्रजा सुखी हो।’ सार यह है कि मन की शांति स्वयं के सुख से अधिक दूसरों के दुख हरकर उन्हें सुखी बनाने से मिलती है, इसलिए यथाशक्ति दूसरों की सहायता करें।
साभार : भीम राव ( फेस बुक स्टेट्स से )
Friday, October 17, 2014
सच्चा धर्म
गौतम बुद्ध जिन दिनों वाराणसी के पास प्रवास कर रहे थे और उनका जीवन उनके कुछ साथियों के साथ भिक्षा पर चल रहा था, उन दिनों उनके एक अति प्रिय शिष्य को एकबार कहीं भीख नहीं मिली। उदास भाव से वो लौट रहा था कि अचानक उसके कटोरे में मांस का एक टुकड़ा आ गिरा। शिष्य बहुत हैरान हुआ कि ये कहां से आया? उसने उपर देखा तो पाया कि एक चील अपने पंजे में इसे ले जा रही थी, और वही उसके पंजे से छूट कर कटोरे में आ गिरा है। शिष्य बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आखिर में बुद्ध के सामने गया और उसने सारी कथा उन्हें कह सुनाई कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला, बस ये मांस का एक टुकड़ा मेरे पात्र में आ गिरा।
बुद्ध ने उसे समझाया कि अब जो मिला वही तुम्हारी किस्मत। तो तुम उसका अनादर मत करो, और उसे ही पका कर खा लो। शिष्य ने ऐसा ही किया। मांस बहुत स्वादिष्ट पका।
बुद्ध के तमाम शिष्य इस पूरी घटना को देख रहे थे। पहले तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज मांस लाने की वजह से उस अति प्रिय शिष्य को डांट पड़ेगी, लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था। कहां बाकी शिष्य वही सादा भोजन ग्रहण कर रहे थे, और वो मांसाहारी भोजन कर रहा था। इस घटना को देख कर बाकी शिष्यों ने भी धीरे-धीरे कहीं से मांस उठा कर लाना शुरू कर दिया और आकर बुद्ध से कहने लगे कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला बस यही मांस का टुकड़ा मिला है। बुद्ध उसे देख मुस्कुराते और कहते जो मिला उसे ही स्वीकार करो।
एक दिन एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा कि भगवन् आप जानते हैं कि ये झूठ बोल कर मांस पका कर खा रहे हैं, फिर आप इन्हें रोकते क्यों नहीं?
बुद्ध ने कहा कि रोकने से कोई नहीं रुकता। जिसे रुकना होता है वो खुद रुकता है। और वो रुकना भी क्या रुकना जिसमें मन न रुके? और अगर मन ही न रुके तो तन के रुकने का कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में जिसे जिसे जो अच्छा लगता है उसे करने दो। जब मन की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे जब हो, तभी आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ता है।
साभार : श्री संजय सिन्हा ( फ़ेसबुक की वाल से )
Thursday, October 16, 2014
“ यह भी बीत जायेगा ”- This too shall pass
मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों को समझाना एक दुरुह कार्य है । अकसर साधारण दिखने वाली सीखे भी इन रोगियों को समझाने मे उलटी ही पड जाती हैं । लेकिन एक बार जब वह उन अवसाद से निकलते हैं तब ही इस कहानी का मर्म समझ सकते हैं ।
मैने सुना है कि कि एक जेल मे एक कैदी अपनी सजा को काट रहा था । घोर निराशा और अवसाद के बीच वह उस बद कोठरी के एक एक क्षण को गिनता । जैसे –२ उसकी सजा का समय आगे खिसक रहा था वैसे वैसे उसके दिल की धड्कन मध्यम होती जा रही थी । लेकिन एक दिन उसकी नजर उस जेल के कोठरी की छ्त पर जा पडी जहाँ शायद किसी और कैदी ने लिख छोडा था , “ यह भी बीत जायेगा “ यह वाक्य उस कैदी के लिये सहारा बने । जिस दिन उसको जेल से रिहा किया गया उस दिन उसको इस की महत्ता मालूम पडी ।
जेल से रिहा होने के बाद उसने अपनी सामन्य जिदंगी मे भी इस वाक्य को अपने साथ संजो कर रखा । यहाँ तक कि जब उसका समय खराब आया तब भी वह कभी अवसाद मे नही गया । उसको याद रहा कि यह समय भी अधिक दिन नही टिकेगा । उसके जीवन मे खुशियों के भी क्षण आये लेकिन उसमे भी वह सामान्य रहा ।
जीवन के अंतिम दिनो मे वह कैसंर से पीडित रहा । लेकिन सिर्फ़ एक वाक्य , “ यह भी बीत जायेगा “ ने उसको उम्मीद और हौसला दिया ।
मृत्यु शैया पर उसने अपने चाहने वालों को बुलाया और धीरे से फ़ुसफ़ुसा के कहा ,“ यह भी बीत जायेगा “ और मृत्यु को समा गया । उसके शब्द उसके परिवार वालों और उसके मित्रों के लिये भेट से कम नही थे । उन्होने उससे सीखा कि दु:ख और परेशानी के क्षण भी चले जाते है ।
मानसिक अवसाद के क्षण ऐसे कैदखाने का रुप हैं जिससे हम मे से कोई भी भी बचा नही है । कभी न कभी , चाहे या न चाहे हम को उन क्षणॊ से गुजरना ही पडता है । लेकिन अगर हम सिर्फ़ एक वाक्य , यह भी बीत जायेगा को याद रखे तो विशवास रखिये हमारा जीवन तनाव और अवसाद से मुक्त रह सकता है ।
अजह्न ब्रहम की कहानी “ This too will pass “ का हिन्दी अनुवाद
Monday, October 13, 2014
ज्ञान मार्ग से उपजी वैज्ञानिकता - श्री शम्भू नाथ शुक्ल
साभार : दैनिक ट्रिब्यून 13 अक्टूबर 2014
बुद्ध चरित में एक कथा है—बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआ अपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन्? मुझे तो लगता है कि अनजाने में किया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए। पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।
शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैं तुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन् जो अनजाने में उस गर्म लोहे की छड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गया अपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गया अपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिए भी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझ में आया कि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।
भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने में सहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शन मनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं या आत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा भंते। मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्ध करते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।
कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता है वह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्ध मार्ग का विस्तार हुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फ साधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और काल की सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठ मिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत के अनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।
यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आज भी उसी धर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भले इस्लाम हो पर वहां पर आम जनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनों ही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद किया गया। यही कारण है कि बुद्ध वहां धर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतई नहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—भंते, अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति!