Showing posts with label अजह्न ब्रह्म. Show all posts
Showing posts with label अजह्न ब्रह्म. Show all posts

Friday, June 12, 2015

पात्र और सामाग्री ( The Container and the Content )

 

AFGHANISTAN-BUDDHAS/

ब्रिसबेन  में एक स्थानीय पत्रकार ने मुझसे बडा ही अटपटा सा प्रशन पूछा . “ अजह्न्ह , आप की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर कोई इन्सान बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक जैसे त्रिपटक को शौचालय मे बहा दे । “

एक क्षण रुके बगैर मैने उससे कहा , “ अगर कोई बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक को शौचालय मे बहा देगा तो मै सबसे पहले मै रुकी हुई पाइपलाइन को खुलवाने के लिये एक योग्य प्लम्बर को बुलाऊगाँ । “

संभवत: उसको मेरे उत्तर  की अपेक्षा नही थी । वह हँसा और मुझसे बोला कि क्या आप इस बात से उद्देलित नही होगे ।

मैने उससे कहा , “  हो सकता है कि बुद्ध धम्म के विरोधी बुद्ध की कई प्रतिमाओं को उडा दें , कई मंदिरों को नष्ट कर दें या बौद्ध भिक्खुओं और भिक्खुनियों की हत्या तक कर दें लेकिन फ़िर भी मैं उनको बौद्ध धर्म को नष्ट करने की अनुमति नही दे सकता । आप एक शौचालय में एक पवित्र पुस्तक को बहा सकते हैं लेकिन क्या आप बौद्ध धम्म के मूल आधार क्षमा , करुणा , शांति और मैत्री को शौचालय मे बहा सकते हैं । “

कोई  भी पुस्तक , मूर्ति , मन्दिर , विहार या उसको संचालित करने वाले पुजारी और महंत धर्म नही हो सकते । वे केवल “ पात्र “ हैं । पात्र वह जिसमे सामाग्री रखी जाती है । वह ह्मेशा पात्र ही रहेगें ।

लेकिन दूसरी तरफ़ यह पुस्तकें हमें क्या सिखाती हैं ? बुद्ध की मूर्ति हमॆ क्या दर्शाती है ? भिक्खुओं के गुण हमें किस बात की शिक्षा देते हैं ?  यह वह  “ सामाग्री  “ हैं जिसको हमें बचाना है ।

जब हम पात्र और सामाग्री के बीच के अंतर को समझ लेगें तब हम पात्र के नष्ट हो जाने के बाद भी सामाग्री की रक्षा कर सकते हैं ।

यह भी संभव है कि हम अधिक संख्या मे धम्म की पुस्तकें छ्पवायें , यह भी हो सकता है कि हम बहुत से भिक्खुओं और भिक्खुनियों को प्रशिक्षित कर लें लेकिन जिस दिन हम दूसरों के लिये हमारे प्यार और सम्मान को खो बैठते हैं और अपने आप को हिंसा मे लिप्त कर लेते हैं तो मेरे अनुसार पूरे के पूरे धर्म को ही शौचालय मे बहा बैठते हैं ।

AjahnBrahm2013_GoodBadWhoKnows

अजह्न्ह ब्रह्म्ह की पुस्तक “ GOOD ? BAD ? WHO KNOWS ” मे से ली गई कहानी “ The Container and the Content ” का हिन्दी अनुवाद ।

******************************************************************************************************************************

The Container and the Content – Ajahn Brahm

A local journalist called and asked me “ What would you do, Ajahn Brahm, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet?”

Without hesitation I answered “Sir, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet, the first thing I would do is call a plumber!”

When the journalist finished laughing, he confided in me that that was the most sensible answer he had heard.

Then I went further. I explained that someone may blow up many statues of the Buddha, burn down Buddhist temples or kill Buddhist monks and nuns; they may destroy all of this but I will never allow them to destroy Buddhism. You may flush a Holy Book down a toilet, but you will never flush forgiveness, peace and compassion down a toilet.

The book is not the religion, nor the statue, the building or the priest. These are only “containers.”

What does the book teach us? What does the statue represent? What qualities are the priests supposed to embody? This is the “content”.

When we recognize the difference between the container and the contents, then we will preserve the contents even when the container is being destroyed.

We can print more books, build more temples and statues and even train more monks and nuns, but when we lose our love and respect for others and ourselves and replace it with violence, then the whole religion has gone down the toilet.

Saturday, April 25, 2015

दो पल शांति के ….

meditation4
यह देखने की बात है कि कहानियों के मूल तत्व को कौन किस रुप मे लेता है। मेरी पिछ्ली कहानी , “ जो हो चुका , सो हो चुका “ को ही लें । पर्थ मे मैने यह कहानी एक सभागार में श्रोतागणॊ को सुनाई । उसके अगले ही दिन एक कम उभ्र के लडके के माता – पिता बहुत ही क्रोध मे भरे हुये मेरे पास आये और बोले कि यह आप कैसी कहानियाँ सुनाकर लोगो को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । कल शाम को जब  मेरा लडका  अपने मित्रों के साथ घूमने  को जाने के लिये निकला तब मैने उससे पूछा कि क्या तुमने अपना होम वर्क पूरा कर लिया है । वह कहने लगा , “  डैड , कल आपने विहार में अजह्न्ह ब्रह्म को सुना होगा , उन्होने ही कहा था ‘ जो हो चुका है वह समाप्त हो गया । ’
मै एक और कहानी से पिछ्ली कहानी को समझाने की कोशिश करता हूँ ।
आस्ट्रेलिया मे अधिकतर लोग घरों में बगीचे का प्रावाधान अवशय  रखते हैं । लेकिन कुछ ही लोग हैं जो उस बगीचे में अपने लिये दो पल सूकून का निकाल पाते होगें । अधिकतर लोगों के लिये बगीचा सिर्फ़ कार्य करने की जगह मात्र हैं । मै अधिकतर लोगों को सलाह देता हूँ वह अपने बगीचे की सुन्दरता  के लिये उसका पालन  पोषण अवशय  करे लेकिन उसके साथ ही अपने दिल के पालन पोषण के लिये अपने बाग मे कुछ देर शांति से बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द अबशय लें ।
अब देखे कि चार गृहस्थ  मालियों ने इस वक्तत्व को  कैसे  समझा ।
पहले माली ने सोचा कि पहले बचे हुये सारे कामों को  निपटा लें उसके पश्चात शांति से दो पल बगीचे में बैठेगे । आखिरकार बाग की कटाई करनी थी , पौधो मे पानी देना था और पत्तियों और झाडियों की छ्टाई भी करनी थी । उसके बाद जो समय बचेगा उसमें शांति के दो पल ढूंढ लेगें । लेकिन उसका काम अन्त तक समाप्त नही हुआ इसलिये उसके  शांति और सूकून के दो पल नही मिल पाये । वैसे आपने भी अपनी संस्कृति मे देखा  होगा कि जो लोग शांति की तलाश करते रहते है उनकी तलाश कब्र मे ही जाकर पूरी होती है ।
दूसरा माली पहले माली से अधिक चतुर निकला । उसने कताई और छ्टाई के औजारों को किनारे किया , पानी के  डिब्बों को एक तरफ़ रखा और आराम से एक कुर्सी में बौठकर  अपनी मन पसंन्द पत्रिका को पढने लगा । लेकिन यह तो पत्रिका को पढने का आनंद लेना था , सूकून उससे कोसों दूर था ।
तीसरे माली ने बागवानी के सारे औजार , पत्रिकायें , समाचार पत्र को किनारे रखा और  दो सेकन्ड के लिये बाग में शांन्ति से बैठ गया । कुछ ही देर बाद उसने सोचना शुरु किया , “ अब मुझे इस मैदान कि लवाई शुरु कर देनी चाहिए , झाँडियां की भी कँटाई – छ्टाई करनी है और अगर मै इन पौधॊ को पानी नही दूँगा तो यह फ़ूल तो मुर्झाने की कगार पर खडे हो जायेगें । ” उसके शांति और सूकून के पल विचारों और योजना बनाने मे ही निकल गये । लेकिन हाँ , शांन्ति नही मिली ।
चौथा माली ने विचार किया , “ चलो काफ़ी काम हो गया है , कुछ देर सूकून से बैठते हैं। हाँलाकि , झाडियों और पेडो की कटाई – छ्टाई करनी है , लेकिन यह सब तो बाद मे भी हो जायेगा लेकिन अभी यह सब काम बिल्कुल नही …। ”
मेरी नजर मे चौथा माली ही समझदार निकला , हाँलाकि वह यह जानता था कि उसका बाग अभी परिपूर्ण नही है लेकिन इसके बावजूद वह आगे की न सोचकर , जो हो चुका है उसमे संतोष कर पाया ।
जीवन के परिपेक्ष मे इसको देखें , जो काम आगे का रह गया है , इसकी व्यर्थ मे चिंता न कर के जो हो चुका है उसमे संतोष और आनन्द ले तब ही जीवन मे वास्तविक शांन्ति पा सकते हैं । अगर हम अपनी और दूसरों की कमियों को देखते रहेगे और अगर हम जीवन को हमेशा व्यवस्थित करने मे अपनी उर्जा लगायेगे तो हमे सूकून के उन पलो का हमेशा अभाव रहेगा ।
who-odered-this-truckload-of-Dung2_t
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ the idiot’s guide to peace of mind ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, April 24, 2015

सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना

orchestra
एक पहाडी गाँव के अशिक्षित वृद्ध को पहली बार शहर आने का मौका मिला । उसकी पूरी जिन्दगी दूरदराज के पहाडी गाँव मे बीती । बचपन उसका तकलीफ़ों मे बीता , अपने बच्चॊं को पाल पोस के बडा किया और जब उसके बच्चे शहर मे बस गये तो उनके अनुरोध पर वह पहली बार उनके नये घर को और उनकी रहन सहन को देखने शहर की ओर चल पडा ।
एक दिन उस नये शहर मे घूमते हुये उसने दूर से आती हुई बहुत ही कर्कश आवाज सुनी । उसने ऐसी कर्कश आवाज अपने शांत पहाडी गाँव मे पहले कभी नही सुनी थी । उसका मन   उस आवाज के स्त्रोत को जानने का हुआ । आवाज का पीछा करते-२ वह एक कमरे कॆ पीछे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक बच्चे को वाइलन बजाते देखा । “ हाँ, फ़टी सी यह बेसुरी आवाज इसी यंत्र से आ रही है । ”   उसने सोचा ।
उसके पुत्र ने उसको बताया कि यह यंत्र “ वाइलन “ है तब उस वृद्ध ने यह निर्णय किया कि वह इस भयंकर से यंत्र को कहीं भी सुनना नही चाहेगा ।
अगले ही दिन उसको शहर के दूसरे हिस्से मे जाना पडा । एक बार फ़िर से उसे एक दूर सॆ आती हुई आवाज सुनने को मिली । उसको लगा कि  उसके वृद्ध कानॊ को कोई पुचकार और दुलार रहा है । ऐसी मीठी और सुरीली आवाज उसने अपने पहाडी घाटियों मे भी नही सुनी थी । आवाज के उद्‍गम को जानने के लिये वह एक घर के आगे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक वृद्ध महिला को वही यंत्र वाइलन को बजाते देखा ।
तत्काल ही उस वृद्ध को अपनी गलती का एहसास हो गया । एक दिन पहले जो उसने कर्कश आवाज सुनी थी , उसमे न तो वाइलन और  न ही उस बच्चे  का  दोष था । दोष  सिर्फ़ इतना ही था कि उस बच्चे को अभी वाइलन बजाना सीखना था ।
वह वृद्ध सोच मे पड गया । उसको लगा कि  साधारण से दिखने वाला यही  दोष तो सभी धर्मालम्बियों  के साथ  है । जब कुछ अति धार्मिक उत्साही अपनी –२ आस्था को कलह का कारण बनाते हैं तो क्या धर्म को दोष देना उचित है ? यह सिर्फ़ इतना ही है कि यह नौसीखिये अपने धर्म को ठीक से जान और समझ ही नही  पाये ।  दूसरि तरफ़ जब हम ऐसे संत और महापुरुषों से मिलते हैं जो अपने धर्म के सही जानकार हैं तब भले ही हमारी आस्थायें अलग-२ हों लेकिन उन धर्मॊ की छाप हमारे मन: पटल पर हमेशा बनी रहती है ।
… लेकिन इस  वृद्ध मनुष्य और वाइलन की कहानी का अंत अभी नही हुआ था ।
तीसरे दिन शहर के दूसरे हिस्से मे उस वृद्ध को ऐसी आवाज सुनने को मिली जो अपने मे अनोखी थी , उसकी मिठास वाइलन से भी बढकर थी । क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वझ आवाज किसकी थी ?
इस आवाज की मधुरता  बसंत ऋतु मे पहाडॊ से बहने वाले झरने से भी बढकर थी , उसकी कोमलता का एहसास शरद ऋतु मे जंगलो मे पेडो के माध्यम से बहनॆ वाली हवा से भी अधिक था , पहाडॊ मे भारी बारिश के बाद चिडियों के चहचहाने की आवाज भी उस आवाज के आगे शून्य थी और यहाँ तक सर्द जाडॊं की रातों मे पहाडॊं की नीरवता और शांति भी उस आवाज के आगे कुछ भी नही थी । आखिर वह कौन सी आवाज थी जिसने उस इन्सान के दिल को छू लिया ?
वह एक विशाल आर्केस्ट्रा कॆ सुरों का संगम था जहाँ वाइलन भी था और अलग –२ सुर यंत्र भी । लेकिन अलग –२ सुर यंत्रॊं के होते हुये भी वह एक लय मे थे । उस आर्केस्ट्रा  का हर सदस्य अपने मे निपुण और पारखी था । लेकिन इसके बावजूद उन्होने यह सीखा था कि मिल कर कैसे सुर दे सकते हैं ।
“ क्या सारे धर्मों के मतालम्बी  साथ रहकर यह नही कर सकते ? ” उस वृद्ध ने एक बार सोचा । “ वह अपने –२ धर्मों को सही और परिपूर्ण रुप से जानें और उसके बाद मनन करें कि उनके धर्म का निचोड ‘ मैत्रीभावना और प्यार ’ से बढकर अधिक कुछ भी नही है । एक बार अपने धर्म को समझने के बाद आगे बढे और आर्केस्ट्रा के सदस्यों की तरह अलग-२ धर्मॊ के मतालम्बियों के साथ रहने की कला को सीखें । ”
शायद तभी सार्थक और सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना की जा सकती है ।
who-odered-this-truckload-of-Dung2_t
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ The most beautiful sound” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, April 10, 2015

जो हो चुका सो हो चुका

unfinshed monastry
थाइलैंड मे मानसून का समयकाल जुलाई से अक्टूबर तक चलता है । मानसून के समय के दौरान अकसर भिक्खु यात्रायें करना बन्द कर देते हैं , अपने सारे कार्यों को एक तरफ़ रखकर  अपना अधिकतर समय अध्यन्न और ध्यान को समर्पित करते हैं । मानसून का  इस समयकाल को वर्षा वास  भी कहा जाता है ।
कुछ वर्ष पहले थाइलैंड के दक्षिण भाग मे एक प्रसिद्ध बौद्ध मठाधीश जंगल के एक मठ में एक सभागार ( हाल ) का निर्माण करवा रहे  थे । वर्षा वास के आते ही उन्होने सारे  कार्यों को रुकवा दिया और निर्माणकर्त्ता और श्रमिकों को अपने - २ घर जाने के लिये कहा ।  वर्षा वास का यह समय बौद्ध विहार के लिये अद्‍भुत शांति का समय था ।
कुछ दिन बाद एक आंगुतक का आगमन मठ मे हुआ । जब उस आंगुतक की नजर मठ के अधूरे निर्माण की तरफ़ पडी तो उसने  उतसुकतावश मठाधीश से पूछा कि सभागार का यह  निर्माण कार्य कब समाप्त होगा । एक क्षण रुके बगैर उस वृद्ध भिक्खु ने कहा  , “ सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है । ”
“ आप कहना क्या चाहते हैं , सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है ? ” आंगुतक ने उत्तर दिया । “ न तो इस सभागार मे छ्त है , न दरवाजे और न ही खिडकियाँ । और तो और इस सभागार मे चारों तरफ़ लकडी और सीमॆट के बोरे बिखरे पडे है । क्या आप इनको यही छोड देगें ? मुझे लगता है कि महाशय आप का मानसिक संतुलन ठीक नही है । इसके बावजूद भी आप कहते हैं कि ‘ सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है ’ ? ”
उस विहार के वृद्ध मठाधीश ने मुस्कारा कर और मृदुता से कहा , “  जो हो चुका है , वह समाप्त हो चुका है ।” और यह कहते ही  वह ध्यान कक्ष मे चले गये ।
विराम करने का मेरी नजर मे सिर्फ़ यही एक तरीका है , नही तो इस व्यस्त जिंदगी में कोई भी कार्य कभी भी समाप्त नही होता ।
who-odered-this-truckload-of-Dung2_t
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ What’s done is finished ” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, February 8, 2015

बातूनी कछुआ ( the talkative tortoise )

  tortoiseक्छुआ१

जीवन मे कम और मतलब की बात बोलना हमे अपने आंरभिक दिनो से ही  सीख लेना चाहिये ताकि आने वाले समय मे हम उससे उठने वाली तमाम विपत्तियों से बच सके । मोनेस्ट्री मे आने वाले बच्चॊ  को मै अकसर यह कहानी सुनाता हूँ । कहानी के माध्यम से मै उनको यह सीख देना चाहता हूँ कि बेमतलब और फ़िजूल का बोलना अकसर कितना अधिक अनर्थकारी हो जाता है ।

बहुत समय पहले की बात है कि एक पहाडी झील मे एक बहुत बातूनी कछुआ रहता था । वह इतना अधिक बातूनी था कि झील मे रहने वाले उसके  साथी सहचर जीव  उसको देखते ही कन्नी काट लेते । उसकी बात करने की हद इतनी अधिक थी कि सुनने वाला  थक जाता , बोर हो जाता और यहाँ तक चिढ भी जाता । सहचर जीवो को अचरज होता कि उसका यह साथी बिना रुके कैसे बात कर लेता है । कभी-२  उनको लगता कि यह कछुआ शायद अपने कान का प्रयोग सुनने की बजाय बोलने के लिये ही करता है । उसके बातूनी पन की हद इतनी अधिक थी कि खरगोश उसको देखते ही बिल मे छुप जाते , चिडयाये पेडॊं की शाखाओं से उड जाती  और यहाँ तक मछलियाँ चट्टानों के पीछे छुप जाती ।

जाहिर है यह बातूनी कछुआ अपनी आदतों के कारण अकेले ही रह्ता था ।

हर साल की तरह गर्मियों मे सफ़ेद हंसों का जोडा अपना अवकाश बिताने उस पहाडी झील पर आता था । वह दयालु प्रवृति के थे क्योंकि वह बातूनी कछुये को बोलने की पूरी अनुमति देते थे या उनको यह भी लगता कि उनका प्रवास  कुछ माह के लिये ही है ; इसलिये मेजबान को नाराज करना अच्छी बात नही है । बातूनी कछुये को तो उनका साथ बहुत ही अच्छा लगता । वह उनके साथ तब तक बाते करता जब तक तारे ओझल न हो पाते और रात बीत न जाती ।

गर्मियाँ सामाप्त होने लगी और दिन सर्द होने लगे । हंसो के जोडे ने भी तय किया कि वह अब अपने घर को लौट चलेगें । यह सुनते ही बातूनी कछुये की आँखों मे पानी भर आया । उसको सर्दियों से चिढ भी थी और अपने मित्रों का जाने का गम भी था ।

“ काश मै भी तुम्हारे साथ जा पाता “ बातूनी कछुये ने गहरी साँसे भरते हुये कहा । “ कभी-२ जब ढलानॊ और पानी पर बर्फ़ जम जाती है तब मुझे बहुत ही ठंड लगती है और मै अपने आप को बहूत ही अकेला महसूस करता हूँ । हम कछुये उड नही सकते और धीमा चलने के कारण इधर उधर दूर नही जा सकते । “

दयालु हंस कछुये की दुख भरी बातों को सुनकर द्रवित हो गये और उन्होने कछुये से कहा “ हम तुहारे लिये एक प्रस्ताव रखते हैं । हम तुमको अपने साथ ले जाने के लिये तैयार हैं लेकिन तुमको भी एक वचन देना होगा । “

“ हाँ ! हाँ !  मै वचन देता हूँ ! “ कछुये ने उत्साह मे कहा , हाँलाकि वह यह नही जानता था कि प्रस्ताव क्या है । “ हम कछुये वचनॊ के बहुत पक्के होते हैं । मुझे याद है कि कुछ दिन पहले मैने खरगोश को वचन दिया था कि मै कछुओं कॆ अलग –२ प्रकार के खोलों के बारे मे जानकारी दूँगा और जब उन खरगोशॊ ने  ………..”

एक घंटा बीत गया , जब बातूनी कछुये ने बोलना बंद किया और हंसों को बोलने का मौका मिला , तब उन्होने कछुये से कहा , “ तुमको यह वचन देना होगा कि तुम अपना मुँह बन्द रखोगे । “

“ बहुत आसान है !!” बातूनी कछुये ने कहा । “ वास्तव मे कछुये ही अपना मुँह बन्द रखने के लिये जाने जाते हैं । हम बहुत कम ही बोलते हैं । यही बात कुछ दिन पहले मै एक मछ्ली को समझा रहा था ………”

एक घंटा और बीत गया , जब कछुआ साँसे लेने के लिये रुका , तब हंस ने कछुये से कहा कि अगर वह अपने दांतो से  लकड़ी की डंडॆ को बीच से पकड़ ले, तो डंडॆ के दोनों किनारों को हंस अपने मुंह में दबा कर उड़ जाएंगे। लेकिन शर्त यह है कि कछुआ अपना मुँह बन्द रखेगा ।

तब एक हंस ने लकडी  के डंडॆ को  एक किनारे औए दूसरे ने दूसरे किनारे से पकडा । लेकिन अपने पंखों को जोर से फ़डफ़डाने का परिणाम कुछ भी न निकला। बातूनी कछुआ बहुत ही वजनी जो था । अकसर जो लोग अधिक बोलते हैं वह खाते भी खूब हैं । और यह कछुआ तो इतना वजनी था कि वह अपने खोल को भी बहुत कठिनाई से संकुचित कर पाता था ।

अब की बार हंसो ने हल्के वजन की डंडी ली । एक बार फ़िर से उसी प्रक्रिया को दोहराया । लकडी के डंडॆ के दोनों सिरों को अपनी चोंच से  और डंडॆ के बीच के हिस्से को कछुये ने अपने दांतों से दबाया । इस बार हंसों का अपने परों को जोर से फ़डफ़डाना काम आ गया ।

इतिहास मे पहली बार कोई कछुआ आसमान मे उड रहा था ।

और इस तरह उनकी यात्रा शुरु  हुई। वे बहुत ऊँचा  उड़ते हुए पहाड़, खेत, मैदान के ऊपर से जा रहे थे।  बातूनी कछुये की पहाडी झील , ऊँचे पर्वतों की श्रंखलाये अब बहुत छॊटी सी नजर आ रही थी । बातूनी कछुआ आसमान मे वह नजारे देख रहा था जिसकी कल्पना आज तक किसी भी अन्य कछुये ने नही की थी । वह यह सब अपनी यादों मे सुरुक्षित रखना चाहता था ताकि वह घर पहूँचने पर अपने साथियों को भी बता सके ।

पर्वतों की श्रंखलाये अब दिखना बन्द हो चुकी थी । मैदानी इलाके नजर आने लगे थे । सब कुछ सही चल रहा था , दोपहर के तीन बज रहे थे और उनकी यह यात्रा का दौर अब एक स्कूल के ऊपर से गुजर रहा था । स्कूली बच्चॊ के झुंड मे से एक बच्चे की नजर आसमान मे उडने वाले जीवों पर पडी । वह चिल्लाया , “ देखो देखो !!..जल्दी  आओ !  ऊपर देखो इस बेवकूफ़ कछुये को …ऊडने वाला बेवकूफ़ कछुआ “

यह सुनते ही  कछुये को तो बहुत गुस्सा आने लगा । वह अपने आप को रोक न पाया और चिल्लाया “ किसने मुझे कहा … बे… वकू..फ़..! “

धडाम की आवाज आई और बेचारा कछुआ अपनी मूर्खता और बेसब्री से जमीन पर गिरते ही मर गया ।

बातूनी कछुआ का अंत इसलिये हुआ क्योंकि वह अपना मुँह उस समय बन्द नही कर पाया जब उस की वाकई मे जरुरत थी । जीवन के परिपेक्ष मे इसको इसी प्रकार देखे । उतना ही बोलें जितनी समयनुसार जरुरत हो , बिलावजह  बोलना आपको वैसे ही मुसीबत मे डाल सकता है जैसे उस बेचारे कछुये को डाल गया ।

who-odered-this-truckload-of-Dung2_t
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the talkative tortoise ” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, January 18, 2015

कार्य–कारण का सिद्धांत ( The Law Of Karma )

cropped-brahmstalks

karma

पशचिम मे बहुत से लोग कार्य-कारण के सिद्धांत को गलत ढंग से समझते हैं । अधिकतर लोग उसको भाग्यवाद से जोडते हैं जहाँ एक व्यक्ति या उसके  परिवार को उसका दंड उसकी पिछ्ली जिन्दगी मे किये अज्ञात गलत कर्मो के कारण  भोगना पडता है । जब कि ऐसा बिल्कुल भी नही है जैसे इस कहानी से स्पष्ट है ।

मैने सुना है कि दो औरतों मे केक बनाने की एक प्रतियोगिता हुयी ।

उनमे से पहली औरत के पास जो केक बनाने की सामग्री थी उसको देखकर यह बिल्कुल भी नही लग रहा था कि वह इस प्रतियोगिता के लायक है । पुराना सा दिखने वाला मैदा , कोलेस्ट्रॉल युक्त बासी मक्खन ,  गाँठ युक्त चीनी (   गीला चमच्च डाल देने के कारण ) , फ़लो के नाम पर थोडॆ बहुत सख्त किशिमिश। और   उसकी रसोई के तो कहने ही क्या , हर चीज अस्त – व्यस्त बिल्कुल विशव युद्ध की याद दिलाती हुई ।

दूसरी औरत  पहले औरत से बिलकुल विपरीत स्वभाव कीथी ।  सब कुछ व्यवस्थित , उच्च क्वालिटी की  सामाग्री ,  उच्च स्तर का मैदा , कोलेस्ट्रॉल रहित मक्खन , कच्ची चीनी और यहाँ तक कि रसीले दार फ़ल जो उसने अपनी बगिया मे उगाये थे । उसकी रसोई एक मिसाल थी , सारे मार्ड्न गैजडस उसकी रसोई मे मौजूद थे ।

बता सकते हैं कि किस औरत ने सबसे अच्छी केक बनाई ?

यह आवशयक नही कि जिस व्यक्ति के पास  उच्च स्तर की सामग्री हो वह ही बेहतर केक बना सकता है । केक बनाने के लिये सामग्री से अधिक कला , समर्पण और प्रयास की जरुरत पडती है । इसलिये  निम्म क्वालिटी की सामग्री होने के बावजूद वह औरत अधिक बेहतर केक बना पायी जिसके पास यह तीन बहूमूल्य वस्तुयें  थी ।

मेरे कुछ मित्र है जिनकी जिन्दगी मे सब कुछ अस्त व्यस्त था । वह गरीबी मे पैदा हुये , बचपन उनका बहुत ही कठिन बीता , लोगॊ से ताने सहे और यहाँ तक गालियाँ भी खाई , उनकी तालीम या तो हुई नही और कुछ तो पढने मे साधारण से रह गये , और इनमें  से कुछ तो बेचारे विकलांग भी थे जिनके लिये खेल कूद बहुत दूर की चीज थी । लेकिन इसके बावजूद भी उनमे ऐसे गुण थे जिसकी वजह से वह अपनी जिन्दगी बना पाये । क्या आप ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर सकते है ?

मेरे कुछ   ऐसे मित्र भी हैं जिनके पास सब कुछ था , धनाढय परिवारों मे पैदा हुये , ऐशवर्य सी जिन्दगी पाई , पढाई मे बहुत ही काबिल रहे , बढिया खिलाडी भी  थे और स्मार्ट भी  लेकिन उन्होने अपनी जिन्दगी नशा ,  शराब और जुये जैसे व्यसनो मे बरबाद कर दी । क्या आप ऐसे लोगो की पहचान कर सकते हैं ?

कर्म का आधा हिस्सा वह सामाग्री है जिनके जरिये हमे कार्य करना है और आधा हिस्सा , जो जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है कि  उसके जरिये हम क्या करना चाहते हैं ।

कर्म को बीज के रुप मे भी देख सकते हैं । चयन आपके हाथॊ मे है  कि जीवन मे आप कौन से बीज बोयेगें ।

who-odered-this-truckload-of-Dung2_t
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the Law of Karma ” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 26, 2014

पीडा का भय–“ जाने दो ” - “ Fear of pain & Letting go of pain”

fear-of-the-unknown
भय तकलीफ़ का एक अभिग्न अंग है । और यही वजह है कि दर्द का एहसास हमे भय के कारण ही अधिक होता है । अगर भय को एक बार हटा ले तो सिर्फ़ एहसास ही बच जाता है और दर्द चला जाता है ।
१९७० के मध्य के दश्क मे मै उतर पूर्व थाइलैड के जंगल मे एक मोनेस्ट्री मे अन्य भिक्खुओं के साथ रह  रहा था । उस रात मुझे जो दाँत मे दर्द हुआ उसकी कल्पना करना भी असहनीय थी । उस जंगल मे न तो कोई दाँत का डाक्टर था , न ही कोई दवा , न टेलीफ़ोन की सुविधा और न बिजली का इन्तजाम ।
रात होते-२ दर्द भंयकर रुप से बढ चुका था । वैसे मै अपने आप को काफ़ी सख्त रुप का भिक्खु समझता हूँ लेकिन उस रात लगता है कि यह दर्द मेरे मुझ जैसे भिक्खु की योग्यता की परीक्षा ले रहा था । दर्द से बचने के लिये मैने ध्यान करना शुरु किया लेकिन दर्द तो कम न हुआ और मेरा ध्यान अपनी श्वास के बजाय उन मच्छरों पर ही लगा रहा जो बार-२ मुझे काट के हलकान किये जा रहे थे ।
मै उठा , बाहर गया और चलित ध्यान करने की असफ़ल कोशिश की । लेकिन मुझे यह भी जल्द ही छोडना पडा क्योंकि मुहे यह लगने लगा था कि मै चल नही रहा था बल्कि मै दौड रहा था । दर्द की तरिवता मुझे दौडा रही थी हाँलाकि उस मठ मे दौडने की जगह बिल्कुल भी न थी ।
मै वापस अपने कुटिया मे आया और बैठ कर  जप करने की भी कोशिश की । अकसर मेरे साथी भिक्खु कहते थे कि बौद्ध मंत्रों के जप करने  मे अभूत पूर्व शक्तियाँ होती है , यह  शक्तियाँ आपका भविष्य बदल सकती है , जंगल मे से जानवरों को भगा सकती हैं आदि आदि । मेरा परिवेश एक वैज्ञानिक तरीके से हुआ था इसलिये मुझे कभी भी इन चीजों पर विशवास न रहा । मंत्रों का जाप करना मेरी दृष्टि मे भोले भाले लोगों को धोखा देने जैसा ही है । लेकिन इसके बावजूद भी मै जाप करता गया लेकिन इससे भी पीडा कम न हुई । मुझे यह इसलिये भी छोडना पडा क्योंकि मै  जाप कम बल्कि शोर अधिक मचा रहा था ।
अपने घर से लगभग १००० किमी दूर एक जंगल मे जो कुछ मुझे समझ आया मैने  प्रयास किये लेकिन सभी असफ़ल सिद्ध हुये । निराशा और गहन पीडा की उस घडी मे एक रोशनी मेरे दिल और दिमाग मे कौधीं । एक दरवाजा खुला और उसके बाद सारे दरवाजे एक के बाद खुलते गये ।
मुझे अपने बचपन के दिनों मे पढे हुये दो शब्द याद आये , “ जाने दो ” न जाने इन शब्दों को मैने कितनी बार सुना था , न जाने अनगिनत बार अपने मित्रों से मैने इसकी व्याख्या की थी । लेकिन इसका वास्तविक अर्थ मुझे आज मालूम पडा ।
अगले कुछ क्षण मे जो हुआ वह मेरे लिये  अकल्पनीय था । भीषण दर्द का एहसास लगभग समाप्त हो चुका था और उसके बद्ले मे मनोरम आनंद की अनूभूति हो रही थी । मेरा मन  और मस्तिष्क शांति की गहन अवस्था मे स्थिर हो चुका था । एक बार पु:न मै ध्यान करने के लिये बैठा । सुबह होते-२ ध्यान करने के पशचात मैने अल्प लेकिन  पूर्ण नींद ली । मठ के कर्तव्यों को पूरा करने के लिये जब मै सुबह सोकर  उठा तो मुझे ध्यान आया कि मेरे दाँत मे दर्द है लेकिन यह पीडा बीती रात की तुलना मे कुछ भी नही थी ।
मेरे कई मित्रो ने दर्द मे इस तरीके को आजमाया और पाया कि यह काम नही करता । वह मेरे पास आये और उन्होने शिकायत की कि उनका दर्द मेरे दाँत के तुलना मे अधिक था । लेकिन मै जानता हूँ कि यह सच नही है । पीडा का मूल्याकंन नही किया जा सकता । मेरी पीडा इसलिये कम हुई क्योकि मैने दर्द का स्वागत किया , उसको गले लगा के उसे आने दिया । इसलिये वह ओझल भी हो गया ।
मैने अपने मित्रो को “ जाने दो ” के असफ़ल रहने के कारण को मेरे तीन अनुयायियों  की  कहानी के जरिये से समझाया ।
पहले अनुयायी ने अपनी  वेदना के दौरान  “ जाने दो “ शब्द  का कुछ इस तरह से प्रयोग किया ।
उसने मन ही मन कहा “ जाने दो ” और इतंजार करने लगा ।
एक बार फ़िर उसने “ जाने दो ” शब्द को दोहराया लेकिन कोई परिवर्तन नही दिखा ।
अबकी बार कुछ शिकायत भरे तरीके से कहा ,  “चलो अब बहुत हो गया जाने भी दो | ”
कुछ झल्लाये और क्रोधित अंदाज मे , “ जाते हो यह नही !! ”
यही तो हम अपनी वास्तविक जिन्दगी मे करते हैं । “ जाने दो ” शब्द  का अर्थ है कि जहाँ कोई भी  नियत्रंण करने वाला नही हो । लेकिन हम अपने नियत्रण करने वाले स्वयं ही बन जाते हैं जो मेरी समझ मे यह  सनक के अलावा कुछ भी नही है ।
दूसरे अनुयायी ने यह जानते और समझते हुये कि वह नियत्रंक की भूमिका नही निभा रहा है , चुपचाप मेरी सलाह को याद रखा और शांति से  बैठकर यह अनुमान लगाने लगा कि उसकी पीडा कम हो रही है । दस मिनट बीत गये लेकिन कुछ भी परिवर्तन नही दिखा । उसने मुझसे शिकायत की मेरे तरीके उसके काम नही आ रहे हैं । मैने  उसको समझाया कि “ जाने दो ” शब्द  किसी दर्द को छुट्कारा पाने का तरीका नही है बल्कि यह दर्द को शांति  से सहने की विधि है । दूसरे अनुयायी ने अबकी  बार  अपनी पीडा से सौदा करने की कोशिश की , “ मै तुम्हे १० मिनट का समय देता हूँ , अब तुम यहाँ से चले जाओ । ”
लेकिन यह दर्द को जाने देने का तरीका नही है , यह तो पीडा को छुट्कारा पाने का ढंग हुआ ।
तीसरे अनुयायी ने अपनी तीव्र पीडा से कुछ ऐसे कहा , “ मेरी व्यथाओं तुम्हारा स्वागत है , मेरा दिल तुम्हारे लिये खुला है , आओ और मेरे लिये   तुमसे जो बन सकता करो ।  ”
जाने दो का सही अर्थ यही है । मेरा तीसरा अनुयायी नियत्रंक की भूमिका को निभाये बगैर अपनी पीडाओं को यह स्वतंत्रता देता है कि वह जब तक रहना चाहे रहे । एक सच्चे साधक के लिये व्यथा का रहना या न रहना , दोनो ही एक समान है । और यही कारण है कि तीसरे अनुयायी को  दर्द सहने और मुक्ति का मार्ग आसानी से मिल गया   ।
who odered this truckload of Dung[2]
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Fear of pain और Letting go of pain ” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 5, 2014

निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”

bus_waiting
किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन  हम लोगों मे   बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे  हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि  मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे  चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि  हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान  के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर  नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे ।  जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और  प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल  हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी  निराश नही  करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास  है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता  है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन  हमारे विहार के  एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने  बिना दान लिये  उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से  विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी ।  उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह  कहते थे  कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
who odered this truckload of Dung[2]
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।

Thursday, October 16, 2014

“ यह भी बीत जायेगा ”- This too shall pass

shallpass

मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों को समझाना  एक दुरुह कार्य है । अकसर साधारण दिखने वाली सीखे भी इन रोगियों को समझाने मे उलटी ही पड जाती हैं । लेकिन एक बार जब वह उन अवसाद से निकलते हैं तब ही इस कहानी का मर्म समझ सकते हैं ।

मैने सुना  है कि कि एक जेल मे एक कैदी  अपनी सजा को काट रहा था । घोर निराशा और अवसाद के बीच वह उस बद कोठरी  के एक एक क्षण को गिनता  । जैसे –२ उसकी सजा का समय  आगे खिसक रहा था  वैसे वैसे उसके दिल की धड्कन मध्यम होती जा रही थी  । लेकिन एक दिन उसकी नजर उस जेल के कोठरी  की छ्त पर जा पडी जहाँ शायद किसी और कैदी ने लिख छोडा था , “ यह भी बीत जायेगा “ यह वाक्य उस कैदी के लिये सहारा बने । जिस दिन उसको जेल से रिहा किया गया उस दिन उसको इस की महत्ता मालूम पडी ।

जेल से रिहा होने के बाद उसने अपनी सामन्य जिदंगी मे भी इस वाक्य को अपने साथ संजो कर रखा । यहाँ तक कि जब उसका समय खराब आया तब भी वह कभी अवसाद मे नही गया  । उसको याद रहा कि यह समय भी अधिक दिन नही टिकेगा । उसके जीवन मे खुशियों के भी क्षण आये लेकिन उसमे भी वह सामान्य रहा ।

जीवन के अंतिम दिनो मे वह कैसंर से पीडित रहा । लेकिन  सिर्फ़ एक वाक्य , “ यह भी बीत जायेगा “ ने उसको उम्मीद और हौसला दिया ।

मृत्यु शैया पर उसने अपने चाहने वालों को बुलाया और धीरे से  फ़ुसफ़ुसा के कहा ,“ यह भी बीत जायेगा “ और मृत्यु को समा गया । उसके शब्द उसके परिवार वालों और उसके मित्रों के लिये भेट से कम नही थे । उन्होने उससे सीखा कि दु:ख और परेशानी के क्षण भी चले जाते है ।

मानसिक अवसाद के क्षण ऐसे कैदखाने का रुप हैं जिससे हम मे से कोई भी भी बचा नही है । कभी न कभी , चाहे या न चाहे हम को उन क्षणॊ से गुजरना ही पडता है । लेकिन अगर हम सिर्फ़ एक वाक्य , यह भी बीत जायेगा  को याद रखे तो विशवास रखिये हमारा जीवन तनाव और अवसाद से मुक्त रह सकता है ।

अजह्न ब्रहम की कहानी “ This too will pass “ का हिन्दी अनुवाद

Tuesday, April 30, 2013

जीवन की त्रासदियाँ क्या उर्वरक का कार्य कर सकती हैं ? - “ Who Ordered This Truckload of Dung ”

ajahn-brahm-hi-res 
एक बौद्ध भिक्षु के रुप में अजह्न ब्रह्म की शिक्षाओं का तरीका अन्यों से बिल्कुल अलग है । गंभीर से गंभीर विषयों को वह सरालता और सहजता के साथ समझाते हैं । अपने भाषणॊं में वह मुख्य विषय पर  केन्द्रित रहते हुये वह हास्य व्यंग्य को भी सम्मिलित  करते हैं ।
जीवन की त्रासदियाँ क्या उर्वरक का कार्य कर सकती हैं ’ ?  ’ "Who Ordered This Truckload of Dung ?’ का हिन्दी अनुवाद है । अजन्ह ब्रहम् की कहानियों का मेरा यह दूसरा अनुवाद है , इसके पहले ‘ दो खराब  ईटॊं की दीवार – अजन्ह ब्रहम्ह के जीवन से एक  वृतांत – Two Bad Bricks , a story by Ajahn Brahmn ’ कुछ दिन पहले इसी ब्लाग पर प्रकाशित कर चुका हूँ ।
जीवन एक रुप से कभी समान नही चलता और न ही वह हमारी मर्जी के हिसाब से भी चलता है । कल का हमे पता नही , वर्तमान मे हम जीते नही औए भूत को पकडे बैठे रहते हैं । लेकिन कल कुछ भी घट सकता है । ऐसी अप्रिय घट्नायें भी जो पल भर में जीवन को उदासी में  बदल सकती है । यह सभी के साथ हो सकता है । फ़र्क सिर्फ़ इतना  है कि एक व्यक्ति उस हालात मे भी खुश रहता है और दूसरा दुखी । क्या करें इन क्षण  का , कैसे इन आपदाओं का जबाब दें ?
चलिये कलपना करें कि आप की दोपहर आपके दोस्त के साथ  समुद्र तट पर   बहुत ही अद्भुत बीती । जब आप घर लौट कर आये तो आपने देखा कि आपके घर के गेट  के सामने किसी ने एक ट्र्क भर कर गोबर डाल दिया है । स्वभाविक है आप का पारा बहुत ही गर्म हो गया ।  अब आपके सामने तीन बातें रह गयी :
१. यह तो तय है कि गोबर फ़ेंकने की जिम्मेदारॊ से आप परे थे और न ही आप की कोई गलती थी ।
२.  यह भी  तय है कि आपने किसी को गोबर फ़ेंकते नही देखा  तो जाहिर है कि आप किसी पर इलजाम भी नही लगा सकते ।
३. हाँ , यह अवशय है कि उसकी दुर्गधं असहनीय थी और पूरे घर को उसने प्रदूषित कर दिया था ।
जीवन के संदर्भ  मे इस घट्ना को देखें । गोबर के रुप में जीवन में  आने वाली त्रासदियाँ अनुभव के लिये खडी हैं ।  इन त्रासदियों   के बारे मॆ   पता करने के लिये तीन चीजे हैं :
१. हमने इन त्र्सादियों को बुलाने का न्योता नही दिया । फ़िर हम ही क्यूं इस त्र्सादी मे आ फ़ँसे ?
२. हम लाख चाहें लेकिन हमारे अच्छे दोस्त या हमारे परिवार के लोग भी इसको दूर नही कर सकते , हालाकि वह कोशिश अवशय कर सकते हैं ।
३. यह त्रासदी हमारी जीवन की सारी खुशियों को ले गई । इसका दर्द इतना तीर्व  है कि इसको सहन करना  लगभग असंभव है ।
घर के सामने पडॆ गोबर को उठाने के दो रास्ते  हैं . पहला इस गोबर को अपनी शर्ट , पैन्ट , अपनी  जेबों और  बैग मे अच्छी तरह  से भर लें । लेकिन हम यह पाते है कि  कि इस गोबर को जेबों मे भरते समय इसकी  दुर्गंध से  हम अपने अच्छॆ से अच्छे दोस्तॊ को खो बौठते हैं  । ‘ गोबर का भार उठाना ’  अवसाद , नकारात्मता या क्रोध में डूबने का एक रुपक मात्र है । यह विपरीत परिस्थितियों के लिए एक प्राकृतिक और समझने वाली प्रतिक्रिया है.  लेकिन यह भी प्राकृतिक है कि हमारे दोस्त इन परिस्थितियों  मे लगभग छूट जाते है क्योंकि कोई भी इन अवसाद्ग्रस्त क्षण का साथ नही होना चाहता । लेकिन इन सब  को करने के बावजूद गोबर का ढेर कम के बजाय बढता ही जाता है और उसकी दुर्गंध पुरे घर को दूषित करती रहती है ।
सौभाग्य से एक दूसरा रास्ता भी है । इस गोबर को हटाने के लिये हम कुदाल , ठेला और कांटा लाते है औए लम्बी सांस भरते हुये इसको हटाने के लिये जुट जाते हैं । कांटा और कुदाल से ठेले में भरते हैं और फ़िर घर के पीछे छोटी सी बगिया  मे एक गढ्ढा खोद कर उसमे डालते जाते है । हांलाकि यह एक उबाऊ और थकाने वाला काम है लेकिन हमारे पास  इसके अलावा  कोई दूसरा विकल्प नही है ।
हम इस समस्या के हल की तलाश मे हैं न कि अवसाद मे डूबने  के । दिन बीतते गये यहाँ तक की कि साल भी बीत गये और  गोबर का ढेर छोटा होता गया  और फ़िर एक दिन वह सुबह आयी जब गोबर पूरी तरह से हट चुका था । इसके अलावा एक  चमत्कार  घर के दूसरे हिस्से  मे भी हुआ , वह जगह जहाँ हमने गोबर जो गढ्ढॆ मे डाला था , उस से बनी खाद   ने उर्वरक का काम किया , बगीचे मे इस बार फ़ूल और फ़ल अधिक मात्रा मे आये , फ़ूलों की महक से पूरे घर का वातावरण तो शुद्ध हुआ ही , इसके साथ इसकी खूशूबू ने आस पास भी अपना प्रभाव छोड दिया । फ़लों की मिठास का तो कहना ही क्या , इस बार सब कुछ इतनी अधिक मात्रा मे था कि उसे आस पास और पडोसियों मे भी बाँटना पडा।
"गोबर में खुदाईजीवन के लिए उर्वरक के रूप में त्रासदियों के स्वागत के लिए एक रूपक है. यह हमें अकेले ही करना है और यहाँ हमारी मदद करने वाला भी कोई नही है । लेकिन  अगर हम दिल के बाग  मे यह खुदाई जारी रखेगें तो हम पायेगे कि एक दिन जीवन मे दु:ख प्रतिक्षण कम होते जायेगें और उनकी जगह लेगी प्रेम की मिठास , उसकी खुशूबू और मेत्ता भावना ।
जिस दिन हम इस दुख दर्द को जानेगें , अपने दिल मे उस प्रेम रुपी बगीचे को विकिसित करेगें , उस दिन आने वाली त्रासदियों के गले मे बाँह डालकर कह सकते हैं , “ हाँ , अब मै अब तुझे समझ सकता   हूँ
शायद इस कहानी का नैतिक अर्थ है कि अगर   आप करुणा के मार्ग का अनुसरण करना चाहते हैं और  दुनिया की सेवा के लिए तैयार हैं  तो अगली बार अगर कोई    त्रासदी गलती से भी आपके जीवन में घटित हो , तो आप बेझिझक अपने आप से कह सकते हैं कि मेरे बगीचे के लिये और अधिक उर्वरक का प्रबंध हुआ है , और ऐसा उर्वरक जो मेरे दर्द को प्रतिक्षण कम करता रहता है !!
who odered this truckload of Dung[2]
अजन्ह ब्रह्म की कहानी  "Who Ordered This Truckload of Dung ? : Inspiring Wisdom for Welcoming Life's Difficulties"  का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, January 11, 2013

दो खराब ईंटॊं की दीवार – " Two bad bricks "

2 bad bricks
जिस मठ मे अजह्न ब्रह्म की शिक्षा आरम्भ हुयी वहीं  एक भिक्षु के रूप में पहली बार  उनको ईंटॊं  की दीवार बनाने  का कार्य सौंपा गया । जब निर्माण कार्य  समाप्त हो गया तब  उन्होंने देखा है कि दो ईंटॊं को छोडकर अन्य सभी ईंटें अच्छी तरह से व्यवस्थित रुप से लाइन में थीं " वह दो ईंटॆ एक कोण पर झुकी थी और बेतुकी  लग रही थी  " अजह्न ने अपने आप से कहा ।
अजह्न मठ की इस दीवार को गिरा कर दोबारा बनाना चाहते थे लेकिन मठ के मठाधीश ने इसके लिये मना कर दिया ।
bad-bricks
नव निर्मित मठ  मे आने वाले आगुतंको को अजह्न मठ के चारों ओर दिखाते सिवाय उस ईंट की दीवार के जिसका उन्होने  निर्माण किया था । लेकिन एक दिन एक आंगुतक की नजर इस दीवार पर पड गयी और उसने टिप्पणी मे दीवार की प्रंशसा कर दी ।
अजह्न आशचर्य मे पड गये और उस आंगुतक से बोले ,  " महोदय ,लगता है कि आप अपना चशमा गाडी  मे भूल आये हैं या शायद आप नेत्रहीन हैं ?  क्या आप उन दो ईटॊं को नहीं  देख पा रहे हैं जिनकी वजह से पूरी की पूरी दीवार खराब और बेतुकी  दिख रही है । आगंतुक के जवाब ने अजह्न ने दीवार के परिपेक्ष  खुद स्वयं  और अपने जीवन के कई अन्य पहलुओं के बारे मे सोचने की प्रक्रिया को  बदल दिया । उसने  कहा, " हाँ,  मैं उन दो खराब  ईंटों को भी देख रहा हूँ और साथ ही में उन ९९८ अच्छी और व्यवस्थित ढंग से लगी  ईटॊ को भी देख रहा हूँ जो बहुत सुरुचिपूर्ण लग रही है ।  ”
अजह्न आगुतंक की  बात सुनकर  दंग रह गये । पहली बार के लिए उन्होने दो खराब ईटॊं के अलावा अन्य ईटॊं को गौर से देखा । इन दो ईटॊ  के ऊपर, नीचे, बायें  और दायें  ओर अच्छी और व्यवस्थित ढंग से लगी ईंटॆं थी । और सबसे मुख्य बात कि सुरुचिपूर्ण ईटॊं  की संख्या खराब ईटॊं से कही अधिक थी । अब अजह्न को यह दीवार बुरी नही दिख रही थी ।
अजह्न ने अपने आप से कहा , “ न जाने कितने लोग बिलावजह रिशतों को समाप्त कर देते हैं या पति पत्नी संबध विच्छेद के मोड पर खडॆ हो जाते हैं क्योंकि वह अपने साथी में उन ‘ दो खराब ईटॊ ’  को देखने की चेष्टा करते हैं ?  हम में से कितने   अभागे ऐसे भी हैं जो छॊटी-२ बातों पर शोकागुल हो जाते हैं या कुछ ऐसे भी जो जीवन से तंग आ कर  मृत्यु को गले लगा लेते हैं ।  ”                         सच तो यह है कि हम सब में वह खराब और बुरी ईंटॆं हैं लेकिन यह भी सच है कि उन खराब ईटॊं की संख्या तमाम अच्छाईयो की तुलना में बहुत कम हैं ।
चुनाव आपके हाथों में है कि किस तरह की  दीवार का चुनाव आप इस जीवन में करेगें दो खराब दिखने वाली ईटॊं का या उन ९९८ अच्छी तरह से व्यवस्थित ईटॊं का ?
who odered this truckload of Dung
अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this trucload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Two bad bricks” का हिन्दी अनुवाद ।