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Friday, April 24, 2015

सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना

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एक पहाडी गाँव के अशिक्षित वृद्ध को पहली बार शहर आने का मौका मिला । उसकी पूरी जिन्दगी दूरदराज के पहाडी गाँव मे बीती । बचपन उसका तकलीफ़ों मे बीता , अपने बच्चॊं को पाल पोस के बडा किया और जब उसके बच्चे शहर मे बस गये तो उनके अनुरोध पर वह पहली बार उनके नये घर को और उनकी रहन सहन को देखने शहर की ओर चल पडा ।
एक दिन उस नये शहर मे घूमते हुये उसने दूर से आती हुई बहुत ही कर्कश आवाज सुनी । उसने ऐसी कर्कश आवाज अपने शांत पहाडी गाँव मे पहले कभी नही सुनी थी । उसका मन   उस आवाज के स्त्रोत को जानने का हुआ । आवाज का पीछा करते-२ वह एक कमरे कॆ पीछे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक बच्चे को वाइलन बजाते देखा । “ हाँ, फ़टी सी यह बेसुरी आवाज इसी यंत्र से आ रही है । ”   उसने सोचा ।
उसके पुत्र ने उसको बताया कि यह यंत्र “ वाइलन “ है तब उस वृद्ध ने यह निर्णय किया कि वह इस भयंकर से यंत्र को कहीं भी सुनना नही चाहेगा ।
अगले ही दिन उसको शहर के दूसरे हिस्से मे जाना पडा । एक बार फ़िर से उसे एक दूर सॆ आती हुई आवाज सुनने को मिली । उसको लगा कि  उसके वृद्ध कानॊ को कोई पुचकार और दुलार रहा है । ऐसी मीठी और सुरीली आवाज उसने अपने पहाडी घाटियों मे भी नही सुनी थी । आवाज के उद्‍गम को जानने के लिये वह एक घर के आगे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक वृद्ध महिला को वही यंत्र वाइलन को बजाते देखा ।
तत्काल ही उस वृद्ध को अपनी गलती का एहसास हो गया । एक दिन पहले जो उसने कर्कश आवाज सुनी थी , उसमे न तो वाइलन और  न ही उस बच्चे  का  दोष था । दोष  सिर्फ़ इतना ही था कि उस बच्चे को अभी वाइलन बजाना सीखना था ।
वह वृद्ध सोच मे पड गया । उसको लगा कि  साधारण से दिखने वाला यही  दोष तो सभी धर्मालम्बियों  के साथ  है । जब कुछ अति धार्मिक उत्साही अपनी –२ आस्था को कलह का कारण बनाते हैं तो क्या धर्म को दोष देना उचित है ? यह सिर्फ़ इतना ही है कि यह नौसीखिये अपने धर्म को ठीक से जान और समझ ही नही  पाये ।  दूसरि तरफ़ जब हम ऐसे संत और महापुरुषों से मिलते हैं जो अपने धर्म के सही जानकार हैं तब भले ही हमारी आस्थायें अलग-२ हों लेकिन उन धर्मॊ की छाप हमारे मन: पटल पर हमेशा बनी रहती है ।
… लेकिन इस  वृद्ध मनुष्य और वाइलन की कहानी का अंत अभी नही हुआ था ।
तीसरे दिन शहर के दूसरे हिस्से मे उस वृद्ध को ऐसी आवाज सुनने को मिली जो अपने मे अनोखी थी , उसकी मिठास वाइलन से भी बढकर थी । क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वझ आवाज किसकी थी ?
इस आवाज की मधुरता  बसंत ऋतु मे पहाडॊ से बहने वाले झरने से भी बढकर थी , उसकी कोमलता का एहसास शरद ऋतु मे जंगलो मे पेडो के माध्यम से बहनॆ वाली हवा से भी अधिक था , पहाडॊ मे भारी बारिश के बाद चिडियों के चहचहाने की आवाज भी उस आवाज के आगे शून्य थी और यहाँ तक सर्द जाडॊं की रातों मे पहाडॊं की नीरवता और शांति भी उस आवाज के आगे कुछ भी नही थी । आखिर वह कौन सी आवाज थी जिसने उस इन्सान के दिल को छू लिया ?
वह एक विशाल आर्केस्ट्रा कॆ सुरों का संगम था जहाँ वाइलन भी था और अलग –२ सुर यंत्र भी । लेकिन अलग –२ सुर यंत्रॊं के होते हुये भी वह एक लय मे थे । उस आर्केस्ट्रा  का हर सदस्य अपने मे निपुण और पारखी था । लेकिन इसके बावजूद उन्होने यह सीखा था कि मिल कर कैसे सुर दे सकते हैं ।
“ क्या सारे धर्मों के मतालम्बी  साथ रहकर यह नही कर सकते ? ” उस वृद्ध ने एक बार सोचा । “ वह अपने –२ धर्मों को सही और परिपूर्ण रुप से जानें और उसके बाद मनन करें कि उनके धर्म का निचोड ‘ मैत्रीभावना और प्यार ’ से बढकर अधिक कुछ भी नही है । एक बार अपने धर्म को समझने के बाद आगे बढे और आर्केस्ट्रा के सदस्यों की तरह अलग-२ धर्मॊ के मतालम्बियों के साथ रहने की कला को सीखें । ”
शायद तभी सार्थक और सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना की जा सकती है ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ The most beautiful sound” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, February 8, 2015

बातूनी कछुआ ( the talkative tortoise )

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जीवन मे कम और मतलब की बात बोलना हमे अपने आंरभिक दिनो से ही  सीख लेना चाहिये ताकि आने वाले समय मे हम उससे उठने वाली तमाम विपत्तियों से बच सके । मोनेस्ट्री मे आने वाले बच्चॊ  को मै अकसर यह कहानी सुनाता हूँ । कहानी के माध्यम से मै उनको यह सीख देना चाहता हूँ कि बेमतलब और फ़िजूल का बोलना अकसर कितना अधिक अनर्थकारी हो जाता है ।

बहुत समय पहले की बात है कि एक पहाडी झील मे एक बहुत बातूनी कछुआ रहता था । वह इतना अधिक बातूनी था कि झील मे रहने वाले उसके  साथी सहचर जीव  उसको देखते ही कन्नी काट लेते । उसकी बात करने की हद इतनी अधिक थी कि सुनने वाला  थक जाता , बोर हो जाता और यहाँ तक चिढ भी जाता । सहचर जीवो को अचरज होता कि उसका यह साथी बिना रुके कैसे बात कर लेता है । कभी-२  उनको लगता कि यह कछुआ शायद अपने कान का प्रयोग सुनने की बजाय बोलने के लिये ही करता है । उसके बातूनी पन की हद इतनी अधिक थी कि खरगोश उसको देखते ही बिल मे छुप जाते , चिडयाये पेडॊं की शाखाओं से उड जाती  और यहाँ तक मछलियाँ चट्टानों के पीछे छुप जाती ।

जाहिर है यह बातूनी कछुआ अपनी आदतों के कारण अकेले ही रह्ता था ।

हर साल की तरह गर्मियों मे सफ़ेद हंसों का जोडा अपना अवकाश बिताने उस पहाडी झील पर आता था । वह दयालु प्रवृति के थे क्योंकि वह बातूनी कछुये को बोलने की पूरी अनुमति देते थे या उनको यह भी लगता कि उनका प्रवास  कुछ माह के लिये ही है ; इसलिये मेजबान को नाराज करना अच्छी बात नही है । बातूनी कछुये को तो उनका साथ बहुत ही अच्छा लगता । वह उनके साथ तब तक बाते करता जब तक तारे ओझल न हो पाते और रात बीत न जाती ।

गर्मियाँ सामाप्त होने लगी और दिन सर्द होने लगे । हंसो के जोडे ने भी तय किया कि वह अब अपने घर को लौट चलेगें । यह सुनते ही बातूनी कछुये की आँखों मे पानी भर आया । उसको सर्दियों से चिढ भी थी और अपने मित्रों का जाने का गम भी था ।

“ काश मै भी तुम्हारे साथ जा पाता “ बातूनी कछुये ने गहरी साँसे भरते हुये कहा । “ कभी-२ जब ढलानॊ और पानी पर बर्फ़ जम जाती है तब मुझे बहुत ही ठंड लगती है और मै अपने आप को बहूत ही अकेला महसूस करता हूँ । हम कछुये उड नही सकते और धीमा चलने के कारण इधर उधर दूर नही जा सकते । “

दयालु हंस कछुये की दुख भरी बातों को सुनकर द्रवित हो गये और उन्होने कछुये से कहा “ हम तुहारे लिये एक प्रस्ताव रखते हैं । हम तुमको अपने साथ ले जाने के लिये तैयार हैं लेकिन तुमको भी एक वचन देना होगा । “

“ हाँ ! हाँ !  मै वचन देता हूँ ! “ कछुये ने उत्साह मे कहा , हाँलाकि वह यह नही जानता था कि प्रस्ताव क्या है । “ हम कछुये वचनॊ के बहुत पक्के होते हैं । मुझे याद है कि कुछ दिन पहले मैने खरगोश को वचन दिया था कि मै कछुओं कॆ अलग –२ प्रकार के खोलों के बारे मे जानकारी दूँगा और जब उन खरगोशॊ ने  ………..”

एक घंटा बीत गया , जब बातूनी कछुये ने बोलना बंद किया और हंसों को बोलने का मौका मिला , तब उन्होने कछुये से कहा , “ तुमको यह वचन देना होगा कि तुम अपना मुँह बन्द रखोगे । “

“ बहुत आसान है !!” बातूनी कछुये ने कहा । “ वास्तव मे कछुये ही अपना मुँह बन्द रखने के लिये जाने जाते हैं । हम बहुत कम ही बोलते हैं । यही बात कुछ दिन पहले मै एक मछ्ली को समझा रहा था ………”

एक घंटा और बीत गया , जब कछुआ साँसे लेने के लिये रुका , तब हंस ने कछुये से कहा कि अगर वह अपने दांतो से  लकड़ी की डंडॆ को बीच से पकड़ ले, तो डंडॆ के दोनों किनारों को हंस अपने मुंह में दबा कर उड़ जाएंगे। लेकिन शर्त यह है कि कछुआ अपना मुँह बन्द रखेगा ।

तब एक हंस ने लकडी  के डंडॆ को  एक किनारे औए दूसरे ने दूसरे किनारे से पकडा । लेकिन अपने पंखों को जोर से फ़डफ़डाने का परिणाम कुछ भी न निकला। बातूनी कछुआ बहुत ही वजनी जो था । अकसर जो लोग अधिक बोलते हैं वह खाते भी खूब हैं । और यह कछुआ तो इतना वजनी था कि वह अपने खोल को भी बहुत कठिनाई से संकुचित कर पाता था ।

अब की बार हंसो ने हल्के वजन की डंडी ली । एक बार फ़िर से उसी प्रक्रिया को दोहराया । लकडी के डंडॆ के दोनों सिरों को अपनी चोंच से  और डंडॆ के बीच के हिस्से को कछुये ने अपने दांतों से दबाया । इस बार हंसों का अपने परों को जोर से फ़डफ़डाना काम आ गया ।

इतिहास मे पहली बार कोई कछुआ आसमान मे उड रहा था ।

और इस तरह उनकी यात्रा शुरु  हुई। वे बहुत ऊँचा  उड़ते हुए पहाड़, खेत, मैदान के ऊपर से जा रहे थे।  बातूनी कछुये की पहाडी झील , ऊँचे पर्वतों की श्रंखलाये अब बहुत छॊटी सी नजर आ रही थी । बातूनी कछुआ आसमान मे वह नजारे देख रहा था जिसकी कल्पना आज तक किसी भी अन्य कछुये ने नही की थी । वह यह सब अपनी यादों मे सुरुक्षित रखना चाहता था ताकि वह घर पहूँचने पर अपने साथियों को भी बता सके ।

पर्वतों की श्रंखलाये अब दिखना बन्द हो चुकी थी । मैदानी इलाके नजर आने लगे थे । सब कुछ सही चल रहा था , दोपहर के तीन बज रहे थे और उनकी यह यात्रा का दौर अब एक स्कूल के ऊपर से गुजर रहा था । स्कूली बच्चॊ के झुंड मे से एक बच्चे की नजर आसमान मे उडने वाले जीवों पर पडी । वह चिल्लाया , “ देखो देखो !!..जल्दी  आओ !  ऊपर देखो इस बेवकूफ़ कछुये को …ऊडने वाला बेवकूफ़ कछुआ “

यह सुनते ही  कछुये को तो बहुत गुस्सा आने लगा । वह अपने आप को रोक न पाया और चिल्लाया “ किसने मुझे कहा … बे… वकू..फ़..! “

धडाम की आवाज आई और बेचारा कछुआ अपनी मूर्खता और बेसब्री से जमीन पर गिरते ही मर गया ।

बातूनी कछुआ का अंत इसलिये हुआ क्योंकि वह अपना मुँह उस समय बन्द नही कर पाया जब उस की वाकई मे जरुरत थी । जीवन के परिपेक्ष मे इसको इसी प्रकार देखे । उतना ही बोलें जितनी समयनुसार जरुरत हो , बिलावजह  बोलना आपको वैसे ही मुसीबत मे डाल सकता है जैसे उस बेचारे कछुये को डाल गया ।

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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the talkative tortoise ” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 5, 2014

निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”

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किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन  हम लोगों मे   बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे  हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि  मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे  चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि  हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान  के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर  नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे ।  जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और  प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल  हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी  निराश नही  करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास  है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता  है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन  हमारे विहार के  एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने  बिना दान लिये  उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से  विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी ।  उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह  कहते थे  कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, September 12, 2014

भविष्यवक्ता - “ Predicting the future ”

All is well
हममे से अधिकतर लोग अपने भविष्य को जानने की उत्सुकता रखते हैं । इसके  लिये हम से कुछ अति शंकालु लोग  भविष्यवक्ताओ और ज्योतिषयों  से समय समय पर मदद लेते रहते हैं । थाइलैंड मे  निवास के दौरान मैने देखा कि भिक्षुओं की भी गिनती भविष्यवक्ताओं के रुप मे भी  होती है । लेकिन व्यवाहारिक रुप से अधिकतर भिक्षु इनसे दूर ही रहना पसंद करते हैं ।
मेरे गुरु अजह्न्ह शाह को कई शक्तियाँ प्राप्त थी । अधिकतर उनकी कही बाते पत्थर में खींची  लकीरो की तरह ही होती । एक दिन अजह्न्ह के एक पुराने शिष्य ने उनसे अपना भविष्य बताने पर जोर दिया । अजह्न्ह ने हमेशा की य्तरह उसको मना किया । लेकिन वह जानेको तैयार नही हुआ । उसने अजहन्ह को याद दिलाया कि उसने कितनी बार उस मठ की मदद की थी और  कितनी बार अपने महत्वपूर्ण कार्यों को छोडकर वह अजन्ह को लेकर जगह –२ घूमा था ।
अजह्न्ह ने जब देखा कि वह टलने वाला नही है तो उन्होने उससे कहा , “ अपना हाथ आगे करो । मै तुम्हारी हाथॊ की लकीरों को देखना चाहता हूँ । “
वह तो बहुत ही हर्ष मे पड गया । लेकिन सबसे मजे की बात यह थी कि अजह्न्ह ने इसके पहले किसी का हाथ कभी भी देखा भी नही था । अजह्न्ह बार अपनी ऊँगलियों को उसकी हथेली पर घुमाते और अपने आप बड्बडाते हुये कहते , “ आशचर्यजनक , अद्‌भुत !! “ बेचारे उनके शिष्य की धड्कने अनुमान लगाने मे लगी रही ।
अजहन्ह ने उसका हाथ देखना समाप्त किया और उससे बोले , “ इस तरह  तुम्हारा भविष्य अब सामने आ गया है और  मैरी भवीष्यवाणी कभी भी गलत नही होती ।  “
“हाँ , हाँ मै भी अपना भविष्य जानना चाहता हूँ कि वह कैसा होगा ?  “ शिष्य ने अधीरता से कहा ।
“ तुम्हारा भविष्य  बहुत ही अनिश्चित है |  “ अजह्न्ह यह कह कर चुप हो गये और उनका प्रिय शिष्य विस्मयपूर्ण नजरों से उनको देखता रह गया  ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this trucload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Predicting the future ” का हिन्दी अनुवाद ।

Tuesday, June 18, 2013

आधारभूत प्रश्न

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एक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.
बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.
सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”
शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”
“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”
“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.
“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”
शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता”.
“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.
“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, परिग्रह, आदि-आदि वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन वृत्तियों में कैसे पड़े?”

Friday, January 11, 2013

दो खराब ईंटॊं की दीवार – " Two bad bricks "

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जिस मठ मे अजह्न ब्रह्म की शिक्षा आरम्भ हुयी वहीं  एक भिक्षु के रूप में पहली बार  उनको ईंटॊं  की दीवार बनाने  का कार्य सौंपा गया । जब निर्माण कार्य  समाप्त हो गया तब  उन्होंने देखा है कि दो ईंटॊं को छोडकर अन्य सभी ईंटें अच्छी तरह से व्यवस्थित रुप से लाइन में थीं " वह दो ईंटॆ एक कोण पर झुकी थी और बेतुकी  लग रही थी  " अजह्न ने अपने आप से कहा ।
अजह्न मठ की इस दीवार को गिरा कर दोबारा बनाना चाहते थे लेकिन मठ के मठाधीश ने इसके लिये मना कर दिया ।
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नव निर्मित मठ  मे आने वाले आगुतंको को अजह्न मठ के चारों ओर दिखाते सिवाय उस ईंट की दीवार के जिसका उन्होने  निर्माण किया था । लेकिन एक दिन एक आंगुतक की नजर इस दीवार पर पड गयी और उसने टिप्पणी मे दीवार की प्रंशसा कर दी ।
अजह्न आशचर्य मे पड गये और उस आंगुतक से बोले ,  " महोदय ,लगता है कि आप अपना चशमा गाडी  मे भूल आये हैं या शायद आप नेत्रहीन हैं ?  क्या आप उन दो ईटॊं को नहीं  देख पा रहे हैं जिनकी वजह से पूरी की पूरी दीवार खराब और बेतुकी  दिख रही है । आगंतुक के जवाब ने अजह्न ने दीवार के परिपेक्ष  खुद स्वयं  और अपने जीवन के कई अन्य पहलुओं के बारे मे सोचने की प्रक्रिया को  बदल दिया । उसने  कहा, " हाँ,  मैं उन दो खराब  ईंटों को भी देख रहा हूँ और साथ ही में उन ९९८ अच्छी और व्यवस्थित ढंग से लगी  ईटॊ को भी देख रहा हूँ जो बहुत सुरुचिपूर्ण लग रही है ।  ”
अजह्न आगुतंक की  बात सुनकर  दंग रह गये । पहली बार के लिए उन्होने दो खराब ईटॊं के अलावा अन्य ईटॊं को गौर से देखा । इन दो ईटॊ  के ऊपर, नीचे, बायें  और दायें  ओर अच्छी और व्यवस्थित ढंग से लगी ईंटॆं थी । और सबसे मुख्य बात कि सुरुचिपूर्ण ईटॊं  की संख्या खराब ईटॊं से कही अधिक थी । अब अजह्न को यह दीवार बुरी नही दिख रही थी ।
अजह्न ने अपने आप से कहा , “ न जाने कितने लोग बिलावजह रिशतों को समाप्त कर देते हैं या पति पत्नी संबध विच्छेद के मोड पर खडॆ हो जाते हैं क्योंकि वह अपने साथी में उन ‘ दो खराब ईटॊ ’  को देखने की चेष्टा करते हैं ?  हम में से कितने   अभागे ऐसे भी हैं जो छॊटी-२ बातों पर शोकागुल हो जाते हैं या कुछ ऐसे भी जो जीवन से तंग आ कर  मृत्यु को गले लगा लेते हैं ।  ”                         सच तो यह है कि हम सब में वह खराब और बुरी ईंटॆं हैं लेकिन यह भी सच है कि उन खराब ईटॊं की संख्या तमाम अच्छाईयो की तुलना में बहुत कम हैं ।
चुनाव आपके हाथों में है कि किस तरह की  दीवार का चुनाव आप इस जीवन में करेगें दो खराब दिखने वाली ईटॊं का या उन ९९८ अच्छी तरह से व्यवस्थित ईटॊं का ?
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this trucload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Two bad bricks” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, May 23, 2012

वर्तामान और सचेतावस्था मे जीना

बच्चे सचेतावस्था मे भगवान बुद्ध के साथ

संबोधि प्राप्ति के पशचात गौतम बुद्ध ने उरुबेला गांव  के बच्चों से वन से जाने की आज्ञा माँगी । सुजाता, नंद बाला , सुभाष , स्वास्ति और रुपक उनके इस कथन से विस्मित से रह गये । सिदार्थ ने सुजाता और अन्य बच्चों से कहा कि आज वह तीसरे पहर बच्चों से वन मे मिलना चाहते हैं ताकि जो संबोधि का मार्ग उन्होने चुना है उसको वह उन्हें बाँट सकें ।

उनके बताये समय के अनुसार बहुत से बच्चे आये और सब पीपल के वृक्ष के पास घेरा बना के बैठ गये । सुजाता अपने साथ नारियल और ताडगुड की बट्टियाँ  उपहार स्वरुप लायी थी और वहीं नंद बाला और सुभाष अपने साथ टॊकरी में मिठ्ठे ( संतरे जैसा फ़ल ) लाया था । सब बच्चॊ ने आदर भाव से सिद्धार्थ को नमन किया और फ़लस्वरुप सिद्धार्थ ने उनको बैठ जाने को कहा । सिद्धार्थ ने बच्चों से कहा , “ तुम सब बच्चे समझदार हो और मुझे विशवास है कि जो मै तुम्हें बताउगाँ उन पर तुम अमल करोगे । जो मार्ग मैने सदधर्म का चुना है वह बहुत गूढ और सूक्ष्म है लेकिन जो भी उस पर अपना ह्रदय और चित्त लगायेगा वह उसे समझ सकता है और उस पर चल सकता है । ”

बच्चों जब तुम संतरे को छीलकर खाते हो तो उसे सचेतावस्था के साथ भी खा सकते हो और बगौर जागरुक रह कर भी । जब तुम मिट्ठा खाओ तो तुम को भली भाँति ज्ञान हो कि तुम मिट्ठा खा रहे हो । तुम उसकी गंध और स्वाद को आत्मसात करो । जब तुम उसका छिल्का उतारो तब भी सजग रहो और जब उसकी फ़ाँक मुँह में रखो तब भी । जब तुम इस फ़ल की गंध और मिठास को अनुभव करो तो उस अनुभूति के प्रति भी सजग रहो ।  इस मिठ्ठे को देखकर चेतनावस्था का अभ्यास करने वाला सृष्टि की अदभुतताओं को समझ सकता है कि किस प्रकार समस्त वस्तुयें  एक दूसरे  के प्रति क्या क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं । सचेतावस्था का अभ्यास करने वाला व्यक्ति इस मिठ्ठे में वे चीजें देख सकता है जिसे अन्य लोग देखने मे असमर्थ रहते हैं । सचेत व्यक्ति  मिठ्ठे का पेड देख सकता है , वसन्त ऋतु  मे मिठ्ठे को फ़लता देख सकता है , उस धूप और वर्षा को देख सकता है जिससे मिठ्ठे के पॆड का पोषण होता है और गहराई से देखने पर वह उन बातों को जान लेता है जिनके स्व्बरुप मिठ्ठा पककर तौयार होता है ।

नंद ने जो मुझे मिठ्ठा दिया है उसमें नौ फ़ाँके हैं । जिस प्रकार मिठ्ठे की नौ फ़ांके हैं उसी प्रतिदिन के चौबीस घंटॆ होते हैं । एक घंटा  मिठ्ठे की एक फ़ांक के समान  है । दिन के चौबीस घंटॊं को जीना इस मिठ्ठे की सभी फ़ांको को खा लेने के समान है । मेरा मार्ग दिन के प्रत्येक घंटे को  सचेतावस्था के साथ जीना है जिसमे चित्त और शरीर हमेशा वर्तमान पर केन्द्रित हो । यदि हम अचेतावस्था में जी रह होते हैं तो हम जानते नही कि हम जी रह रहे हैं । हम जीवन का पूर्ण अनुभव इसी कारण नही कर पाते क्योंकि हमारा चित्त और शरीर वर्तमान को पूर्णता के साथ जीता ही नही है । “ बच्चों , सचेत होकर मिट्ठा खाने का अर्थ है कि तुम वास्तव में उसके संपर्क में हो । उस समय बीते हुये कल या आगामी कल के विचारों मे खोये हुये नही बल्कि पूरी तरह से इस क्षण को जी रहे हो । चेतन  जागरुकता का अर्थ है वर्तमान के इस क्षण को पूर्णता के साथ जीना जिसमें तुम्हारा चित्त्त और शरीर इस समय यहाँ हों ।”

इसी तरह  बच्चों सचेतावस्था में जीने वाला व्यक्ति जानता है कि वह क्या सोच रहा है , क्या कह रहा है और क्या कर रहा है । ऐसा व्यक्ति उन विचारों , शब्दों या कार्यों से बच सकता है  जिनसे उसे स्वयं  तथा दूसरे को कष्ट हो और इसी समझ और  ज्ञान से सहनशीलता और प्रेम का उदय होता है । फ़लस्वरुप संसार में अधिक कष्ट नही रह जाते ।

स्त्रोत : सतिपत्थन सुत्त्त , सचेतावस्था से जुडा विचार से लिया गया है ।  तिक न्यात हन्ह ( Thich Nhat Hanh ) की पुस्तक जहं जहं चरन पडे गौतम के ( Old paths white clouds )- प्रकाशक ‘हिन्द पाकेट बुक ’

Friday, March 9, 2012

समस्याग्रस्त जीवन और चेतना

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एक ज़ेन शिष्य  ने अपने गुरु से  पूछा, "जीवन इतना अधिक समस्याग्रस्त क्यूं दिखाई देता है ?".
ज़ेन गुरु ने कहा   " एक आदमी नाव के होते हुये भी पानी मे बैठता है तो उसको तुम क्या कहोगे ?"
शिष्य ने कहा , “ अगर उसके पास नाव है तो वह पानी में क्यूं बैठेगा ? ”

“ अगर तुम्हारे पास चेतना है तो समस्याग्रस्त जीवन मे क्यूं बैठते हो ” जेन गुरु ने उत्तर दिया ।

John Weeren की कहानी “ Story; a man, a boat ” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, February 26, 2012

सेब का वृक्ष

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मैं लक्ष्य तक पहुँचने में और अधिक किस तरह प्रभावी हो सकता हूँ ?" एक ज़ेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा.
" क्या तुमने  कभी सेब के वृक्ष को सेब के फ़ल के अतिरिक्त किसी और फ़ल का उत्पादन करते हुये देखा है ? ” जेन गुरु ने कहा ।

"नहीं," छात्र ने कहा. "लेकिन इसका मेरे प्रशन के साथ क्या संबध है ? "
” फ़िर तुम किस तरह के वृक्ष हो ? ” जेन गुरु ने एक भेदी मुस्कान के साथ पूछा !!

John Weeren की जेन कहानी “ apple tree ” का हिन्दी मे अनुवाद ।