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Wednesday, September 14, 2016

तीन गांठें

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भगवान‌ बुद्ध अकसर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे । बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे ।
वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे ; तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
एक शिष्य ने उत्तर में कहा,” गुरु जी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है । दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है।”
“सत्य है !”, बुद्ध ने कहा ,” अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”
“नहीं-नहीं , ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा। “, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।
बुद्ध ने कहा, ‘ ठीक है , अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’
शिष्य बोला ,’”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा , ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था , और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं। “
“मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असम्भव है। मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं , कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ ? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया , लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ ?
प्रिय शिष्यों , जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही , और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा, आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें, निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । ” , महात्मा बुद्ध ने अपनी बात पूरी की।
जब तक हम रस्सी की गाँठो को अच्छे से देख कर समझेंगे नहीं,तब तक उसे खोल न सकेंगे।
"विपश्यना" से हम अपने मन की गाँठो को देखने,समझने और उसके बाद उन्हें खोलने का कार्य करते हैं।

Tuesday, May 26, 2015

गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

कोपिया
गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को केंद्र सरकार संवारेगी। इसके लिए प्रस्तावित बौद्ध परिपथ योजना में कोपिया को भी शामिल किया जाएगा। यहां गौतमबुद्ध ने घर छोड़ने के बाद कौपीन (राजसी वस्त्र) त्यागे थे। समीप में स्थित बखिरा पक्षी विहार की भी दशा सुधार इसे राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का खाका बना है। केंद्र सरकार ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए थीम बेस्ड टूरिजम सर्किट को बढ़ावा देने के लिए स्वेदश योजना लॉन्च की है। इसमें नॉर्थ-ईस्ट इंडिया सर्किट, बुद्धिस्ट सर्किट, हिमालयन सर्किट, कोस्टल सर्किट और कृष्णा सर्किट शामिल हैं। बुद्धिस्ट सर्किट और कृष्णा सर्किट का ज्यादातर हिस्सा यूपी से जुड़ा हुआ है। बुद्ध सर्किट में बिहार के बोधगया, राजगीर, वैशाली से लेकर यूपी में सारनाथ, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर से लेकर नेपाल का लुंबिनी शामिल है। बुद्ध के जन्म से लेकर ज्ञान प्राप्ति, उपदेश, कर्मस्थली से लेकर महापरिनिर्वाण तक सर्किट में कवर होते हैं। इस सर्किट में आने वाले बुद्ध से जुड़े उन स्थलों को भी विकसित करने की योजना है, जो अहम होते हुए भी उपेक्षित हैं।
पर्यटन मंत्रालय ने योजना को प्रभावी बनाने और मॉनिटरिंग बेहतर करने के लिए सांसदों को भी इसका हिस्सा बनाया है। पूर्वांचल से जुड़े बुद्ध के स्थलों के सांसद कुशीनगर से राजेश पाण्डेय, श्रावस्ती से दद्दन मिश्र, संतकबीर नगर से शरद त्रिपाठी, गोरखपुर से महंत योगी आदित्यनाथ भी इस कमिटी में शामिल हैं। पिछले दिनों केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री महेश शर्मा की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में उन स्थलों के चयन और विकास पर सहमति बनी जो बौद्ध सर्किट में छूटे हुए हैं। इसमें कोपिया को भी शामिल किया गया है।
संतकबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी का कहना है कि बौद्ध सर्किट की लगभग 125 करोड़ रुपये की योजना पर्यटन और रोजगार के लिहाज से अहम है। संतकबीर नगर मुख्यालय से मेहदावल रोड पर स्थित कोपिया आगे कपिलवस्तु से जुड़ता है। बौद्धकालीन टीले के साथ प्राचीन शिव मंदिर यहां मौजूद है। टीले के सरंक्षण के साथ यहां गेस्ट हाउस और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव बना है। बौद्ध सर्किट से जुड़ने के बाद श्रीलंका, जापान, चीन के बौद्ध अनुयायियों का यहां आवागमन होगा। साथ ही यहां से पास में स्थित लगभग 30 किमी के बखिरा झील और पक्षी विहार को विकसित कराकर दोनों स्थलों को इंटरलिंक किया जाएगा।
साभार : नवभारत टाइम्स, लखनऊ , दिनांक २३-५-२०१५

Tuesday, April 28, 2015

बुद्ध की एक मूर्ति के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी ।

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नीदरलैंड में ड्रेंथे के ऐतिहासिक संग्रहालय के कर्मचारियों ने एक चौंकाने वाला आविष्कार किया है।

बैठे हुए बुद्ध की एक चीनी प्रतिमा के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी। इस का पता तब चल गया जब मूर्ति की बहाली करते वक्त उसको एक सीटी स्कैनर में रखा गया। अब यह प्रतिमा बुडापेस्ट के एक संग्रहालय में प्रदर्शित की जा रही है जहां वह 2015 के मई तक प्रदर्शित रहेगी।
शोधकर्ताओं ने टोमोग्राफी के समय प्राप्त छवियों में एक ममी को देखा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ममी चीनी भिक्षु  लूत्सुआन की है जिसकी मौत 1100 ईस्वी के आसपास चीन में हुई थी। प्रतिमा की जांच करते वक्त इस बात का पता लगाया गया कि ममीकरण के समय शरीर के आंतरिक अंग हटाये गये थे जिसके बाद उसको कागज़ के छोटे छोटे टुकड़ों से भर गया, जिन पर प्राचीन चीनी अक्षर लिखे हुए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि भिक्षु की ममी ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी में बनायी गयी थी। यानी वह लगभग एक हजार साल पुरानी है।

साभार  : http://hindi.sputniknews.com/vishv/20150302/1013625844.html#ixzz3YZB33HmI

Tuesday, April 21, 2015

मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी धरोहरें

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देश-दुनिया में कृष्ण की जन्मभूमि के तौर पर पहचाने जाने वाले मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी कई धरोहरें मौजूद हैं। बताया जाता है कि टीलों पर बसे मथुरा में ही बुद्ध की पहली मूर्ति बनी थी। लाल बलुआ पत्थर से बनीं शैव, बौद्ध व जैन धर्मों से जुड़ी कई मूर्तियां यहां के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यहां कुषाण और गुप्तकालील मथुरा शैली की कलाकृतियों के साथ ही सिक्के, लघुचित्र, धातुमूर्ति, काष्ठ और स्थानीय कला के ढेरों दुर्लभ रत्न सहेज कर रखे गए हैं।

राजकीय संग्रहालय मथुरा के  सहायक निदेशक डॉ. एसपी सिंह, के अनुसार कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी। इसके बाद दूसरी जगहों पर भी बुद्ध की मूर्तियां बनने लगीं।

संग्रहालय के पूर्व विथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा के अनुसार शुरुआत में मूर्तिकला की सिर्फ दो ही शैलियां प्रचलित थीं, मथुरा मूर्ति कला और गांधार मूर्तिकला। बुद्ध से जुड़ी मूर्तियां भी सबसे पहले इन्हीं शैलियों में बनीं। ढाई फीट ऊंची और डेढ़ फीट चौड़ी बुद्ध की पहली मूर्ति 1860 में कटरा केशव देव मंदिर खुदाई के दौरान मिली।

1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खोदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थिज जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में संग्रहालय की स्थापना की। 1933 में संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया।

Tuesday, August 27, 2013

ध्यान और हमारा सचेतन मन

ध्यान
जिस प्रकार आप गाड़ी / वाहन / कार चलते समय आगे की खिड़की से सामने और पीछे देखने के लगे हुए शीशे ( रिअर मिरर ) से अपने पीछे और अपने दाए , बाए हमेशा ध्यान बनाये रखते है ठीक उसी प्रकार अपने जीवन में हमेशा सजग बने रहे I पल प्रति पल अपनी समस्या , अपने अगल बगल के लोगो , अपने देश काल , प्रगति के मार्ग और अपने मन में उठाने वाले विचारो के प्रति सजग रहे .. याद रखिये ध्यान साधना के माध्यम से आपका मन जितना शांत होगा यह कार्य उतना ही आसान होगा I
ट्राई साइकल बुद्ध संघ , जापान

लेख और फ़ोटॊ के लिये आभार : सस्नेही मित्र अजय सिंह मौर्या

Thursday, June 20, 2013

सिद्धांत की परिभाषा

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भगवान गौतम बुद्ध उस समय वैशाली में थे। उनके धर्मोपदेश जनता बड़े ध्यान से सुनती और अपने आचरण में उतारने का प्रयास करती थी। बुद्ध का विशाल शिष्य वर्ग भी उनके वचनों को यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के सत्कार्य में लगा हुआ था। एक दिन बुद्ध के शिष्यों का एक समूह घूम-घूमकर उनके उपदेशों का प्रचार कर रहा था कि मार्ग में भूख से तड़पता एक भिखारी दिखाई दिया।
उसे देखकर बुद्ध के एक शिष्य ने उसके पास जाकर कहा- अरे मूर्ख! इस तरह क्यों तड़प रहा है? तुझे पता नहीं कि तेरे नगर में भगवान बुद्ध पधारे हुए हैं। तू उनके पास चल, उनके उपदेश सुनकर तुझे शांति मिलेगी। भिखारी भूख सहन करते-करते इतना शक्तिहीन हो चुका था कि वह चलने में भी असमर्थ था।
सायंकाल उस शिष्य ने तथागत को इस प्रसंग से अवगत कराया। तब बुद्ध स्वयं भिखारी के पास पहुंचे और उसे भरपेट भोजन करवाया। जब भिखारी तृप्त हो गया तो वह सुख की नींद सो गया। शिष्य ने आश्चर्यचकित हो पूछा- भगवन्! आपने इस मूर्ख को उपदेश तो दिया ही नहीं,बल्कि भोजन करा दिया। भगवान बुद्ध मुस्कराकर बोले- वह कई दिनों से भूखा था। इस समय भरपेट भोजन कराना ही उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है। भूख से तड़पता मनुष्य भला धर्म के मर्म को क्या समझेगा?
कथा का सार यह है कि प्रत्येक सिद्धांत अथवा सर्वस्वीकृत आचरण सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। परिस्थिति के अनुसार उसका पालन, अपालन या परिवर्तन मान्य किया जाना ही श्रेष्ठ आचरण है।

साभार : I Am Proud To Be A "Buddhist"

Tuesday, June 18, 2013

आधारभूत प्रश्न

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एक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.
बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.
सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”
शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”
“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”
“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.
“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”
शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता”.
“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.
“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, परिग्रह, आदि-आदि वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन वृत्तियों में कैसे पड़े?”

Sunday, June 16, 2013

चिकित्सा विज्ञान के समान है चार आर्य सत्य

सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जडों को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हैं । दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार है । इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है। ( अनित्यता )

मेडिकल सांइस भी अब मानसिक लक्षणॊं की प्रमुखता को मानने लगा है । हाँलाकि यह क्रम बहुत पहले हिपोक्रेट्स से शुरु हुआ था  । हिप्पोक्रेट्स से लेकर गैलन और आखिरकार होम्योपैथी के प्रवर्तक डां  हैनिमैन ने इन्सान के स्वाभाव का विशेलेषण करने मे बहुत अंह भूमिका निभायी । जहाँ हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) का मानना था कि शरीर चार ह्यूमर ( Humor ) अर्थात रक्त,कफ, पीला पित्त और काला पित्त से बना है. Humors का असंतुलन, सभी रोगों का कारण है . वही गैलन Galen (130-200 ई.) ने इस शब्द  का इस्तेमाल  शारीरिक स्वभाव के लिये किया , जो यह निर्धारित करता है  कि शरीर  रोग के प्रति किस हद तक संवेदन्शील है । डां हैनिमैन ; आर्गेनान आफ़ होम्योपैथी मे स्पष्ट रुप से लिखते हैं ( पूरे लेख के लिये देखें : http://drprabhattandon.wordpress.com/2011/06/17/constitutional-prescribing-body-language-and-homeopathy/ )

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

शारिरिक लक्षण दरअसल मन के लक्षण का रुपक मात्र हैं । एक होम्योपैथ के रुप मे मै यह कह सकता हूँ कि अधिकांश रोगियों में हमें मानसिक लक्षणॊं के आधार पर चुनाव करने से ही सफ़लता मिल जाती है । अगर हम २५०० वर्ष पूर्व भगवान्‌ बुद्ध के दर्शन का अवलोकन करे और उसे होम्योपैथी के प्रवर्तक डां हैनिमैन के सिद्धातों के अनुरुप देखें तो एक ही बात साफ़ दिखाई पडती है और वह है हमार मन । तभी तो  भगवान बुद्ध कहते हैं :

मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।

ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्‍कंव वहतो पदं॥

मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को मैला करके कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई कर्म करता है तो दु:ख उसके पीछे ऐसे हो लेता है , जैसे गाडी के चक्के बैल के पीछे हो लेते हैं ।

Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind-wrought. If with an impure mind one speaks or acts, suffering follows one like the wheel that follows the foot of the ox.

मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पसन्‍नेन, भासति वा करोति वा।

ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (क॰)]॥

मन सभी प्रवॄतियों का अगुआ है , मन ही प्रधान है , सभी धर्म मनोनय हैं । जब कोई व्यक्ति अपने मन को उजला रख कर कोई वाणी बोलता है , अथवा शरीर से कोई ऐसा कर्म करता है तब सुख उसके पीछॆ ऐसे हो लेता है जैसे कभी संग न छॊडने वाली छाया संग-२ चलने लगती है ।

Mind precedes all mental states. Mind is their chief; they are all mind wrought. If with a pure mind one speaks or acts, happiness follows one like one's never-departing shadow.

 भगवान्‌ बुद्ध एक  चिकित्सक की भूमिका में :

डां प्रवीन  गोस्वामी मेरे परम  मित्रों मे से एक हैं , वह एक अच्छे होम्योपैथिक चिकित्सक भी हैं और एक अच्छे साधक भी । बोधगया मे वह अकसर   ध्यान शिविर आयोजित कराते रहते हैं । पिछ्ले दिनों उनकी एक पोस्ट ने मेरा ध्यान बरबस खीचां । एक छोटी सी कहानी में जो ओशो के एक प्रवचन से ली गई थी , बुद्ध से किसी व्यक्ति ने पूछा कि आप कौन हैं ? आप का परिचय क्या है ? क्या आप दार्शिनिक  हैं , विचारक हैं , संत हैं , योगी या ज्ञाता या ईशवर के दूत ? भगवान बुद्ध ने कहा कि मै सिर्फ़ एक चिकित्सक हूँ ।

One day somebody went to Buddha and asked, “Who are you? Are you a philosopher, or a thinker or a saint or a yogi?” Buddha replied, “I am only a healer, a physician.”

This answer of his is truly marvellous: Only a healer — I know something about the inner diseases and that is what I discuss with you.

The day we understand that we will have to do something about these mindoriented diseases — because anyway we will never be able to eradicate all the bodyoriented diseases completely — that day we will see that religion and science have come closer to each other. That day we will see that medicine and meditation have come nearer to each other. My own understanding is that no other branch of science will help as much as medicine in bridging this gap.

From Medication to Meditation – OSHO, page no 15

Osho from the blog : Mind-Oriented Diseases

जिस प्रकार एक चिकित्सक को रोगी को स्वस्थ करने के लिये चार तथ्यों की आवशयकता पडती है

  • रोग
  • रोग का कारण ( aetiology )
  • रोग का उपचार (आरोग्य )
  • भैषज्य ( रोग दूर करने की दवा )

उसी प्रकार भगवान्‌ बुद्ध दु:ख रुपी रोग का चिकित्सा पद्द्ति द्वारा इलाज करते हैं । बुद्ध ने संसार मे दुख देखा । वह जानते थे कि इस दुख को कोई भी आध्यात्मिक उपदेश ठीक नही कर सकता बल्कि उसे एक विशेष सिस्टम द्वारा ठीक किया जा सकता है ।

भगवान बुद्ध के अनुसार

  • अगर दुख है  तो
  • दुख के  कारण भी होगे ( समुदय )
  • कारण है तो उसे दूर भी किया जा सक्लता है ( निदान )
  • दूर करने के लिये उपाय यानि दवा भी होगी । ( अष्टांगिक मार्ग )

भगवान्‌ बुद्ध की भैषज्य गुरु के रुप मे उपासना चीन , जापान , तिब्बत आदि कई देशों मे है । इस उपासना का प्रतिपादक सूत्र है , भैषज्यगुरु वैदूय्रप्रभराज सूत्र “ जिसका अनुवाद चीनी और तिब्बती भाषा में उपलब्ध है ।

भैषज्यगुरु मंत्र

नमो भगवते भैषज्यगुरु वैडूर्यप्रभराजाय
तथागताय अर्हते सम्यक्संबुद्धाय तद्यथा
ॐ भैषज्ये भैषज्ये भैषज्य समुद्गते स्वाहा
तद्यथा ॐ भैषज्ये भैषज्ये भैषज्य समुद्गते स्वाहा

चार आर्य सत्य

सम्बोधि को उपल्ब्ध होकर बुद्ध ने चार आर्य सत्यों को अनुभव किया ।

  • दुख
  • दुखसमुदय
  • दुख निरोध
  • दुखनिरोधगामिनी प्रतिपद

१. दुख :  समस्त प्राणी दु:ख में है

बुद्ध ने इस आर्य सत्य में दैनिक जीवन में घटित सभी घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है ।

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खं अरियसच्‍चं।

जातिपि दुक्खा, जरापि दुक्खा, ब्याधिपि दुक्खो, मरणम्पि दुक्खं,

अप्पियेहि सम्पयोगो दुक्खो, पियेहि विप्पयोगो दुक्खो, यम्पिच्छं न लभति,

तम्पि दुक्खं; संखित्तेन पञ्‍चुपादानक्खन्धा दुक्खा। इदं खो पन, भिक्खवे ।

दु:ख सामान्यत: पीडा के रुप में अनुवादित होता है लेकिन इसमॆ तनाव , असंन्तुष्टि और शारीरिक पीडाऒ सहित नकारात्मक भावनाओं की एक विस्तृत श्रंखला समाहित है । प्राणिमात्र के जीवन में रुग्णता , प्रियजनों के वियोग , मनोवांक्गित की अप्राप्ति, वृद्धावस्था और मृत्यु के रुप मे दु:ख अस्तिव में है ।

२. दुखसमुदय – दु:ख का कारण ‘ तृष्णा ’

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खसमुदयं अरियसच्‍चं – यायं तण्हा पोनोभविका नन्दिरागसहगता

तत्रतत्राभिनन्दिनी, सेय्यथिदं – कामतण्हा, भवतण्हा, विभवतण्हा।

दु:ख का कारण , दूसरा आर्य सत्य है । दु:ख का कारण है तृष्णा जो बार-२ प्राणियों मे उत्पन्न होती रहती है । प्राणिमात्र सुखद्‌ संवेदानाओं की कामना करता है और दु:खद संवेदानाओं से बचने की कोशिश करता  है । ये संवेदानायें कायिक भी हो सकती हैं और मानसिक भी और जब इन कामनाओं की परिपूर्ति नही होती तो दु:ख उत्पन्न होता है ।

३. दु:ख निरोध : तूष्णाओं और कामनाओं का मूलोच्छेद

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खनिरोधं अरियसच्‍चं यो तस्सायेव तण्हाय असेसविरागनिरोधो चागो पटिनिस्सग्गो मुत्ति अनालयो।

तीसरा आर्य सत्य हमॆ बताता है कि दु:ख का नाश संभव है । किसी वस्तु की प्राप्ति होने पर अन्य वस्तु की उत्पति होती है । कार्यकारण का यह सिद्धांत उनकी महत्वपूर्ण खोज है । यह चिकित्साशास्त्र के इस बात का पोषक है कि रोग दूर होगा और रोगी स्वस्थ हो सकता है । बुद्ध का भी यह कहना है कि कार्यकारण के इस चक्र को तोड्कर हम निर्वाण ( शान्ति )  को प्राप्त कर सकते हैं ।

४. दुखनिरोधगामिनी प्रतिपद : दु:ख मुक्ति का मार्ग है आर्य अष्टांगिक मार्ग

इदं खो पन, भिक्खवे, दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा अरियसच्‍चं – अयमेव अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि। सम्मा संकल्पो । सम्मा वाचा । सम्मा कम्मन्तो । सम्मा आजीवो । सम्मा वायामो । सम्मा सति । सम्मा समाधि ।

यह चौथा आर्य सत्य है जो हमॆ तृष्णा से मुक्ति का मार्ग दिखाता है । यदि रोग है और उसके ठीक होने की संभावना है तब निशचित रुप से उसे ठीक करने की दवा भी होगी । चिकित्साशास्त्र के इसी सिद्धान्त को बुद्ध ने चौथे आर्य सत्य में प्रस्तुत किया है । दु:ख निरोध के लिये भगवान्‌ बुद्ध नें अष्टांगिक मार्ग बताये हैं जिससे दु:ख को कम किया जा सकता है , शिथिल भी किया जा सकता है और अन्तत: समूल नाश भी किया जा सकता है और तब निर्वाण की उपलब्धि होती है ।

आर्य अंष्टागिक मार्ग

the eight fold path[15]

१. सम्यक दृष्टि- उचित समझ

चार आर्य सत्यों को समझना और स्वीकार करना ।

२. सम्यक संकल्प-उचित उद्देशय

दान , मैत्री और करुणा के संकल्पॊ को विकसित करना ।

३. सम्यक वाचा- उचित वाणी

मिथ्या , चुगली , कठॊर और व्यर्थ भाषण से विरत रहना । सत्य , सौम्य , विनभ्र और अर्थपूर्ण वाणी विकसित करना ।

४. सम्यक कर्मान्त-उचित कर्म

हिंसा , चोरी और लैंगिक दुराअचार से विरत रहना । परोपकार , ईमानदारी और विशवास विकसित करना ।

५. सम्यक आजीविका –उचित जीविका

(मानव अथवा  पशु ) हिंसा के व्यवसाय , पशु मांस की बिक्री , मानवों की बिक्री , शस्त्र , विष और मादक पदार्थॊम की बिक्री के व्यवसाओं से विरत रहना । ऐसे व्यवसाय जो अनैतिक , शीलरहित और अवैधानिक हैं ।

६. सम्यक व्यायाम-उचित प्रयास

प्रकट हो चुकी अकुशल वृतियों से विरत रहना , जो प्रकट नही हुई हैं उन अकुशल वृतियों को प्रकट न होने देने का अभ्यास । प्रकट कुशल वृतियों को पोषित करना , अप्रकट कुशल वृतियों को विकसित करने  का प्रत्न्न करना ।

७. समयक स्मृति-उचित विचार

शरीर , शरीर की मुद्राओं और संवेदानाओं के प्रति स्मृतिपूर्ण होना । मन और उसमॆम उत्पन्न विचारों , भावनाओं व संवेदानाओं के प्रति स्मृतिपूर्ण होना ।

८. सम्यक समाधि-उचित चिंतन मनन

प्रज्ञा के विकास और उपल्ब्धि के लिये मन को एकाग्रता व अनुशान का प्रशिक्षण देने हेतु ध्यान का अभ्यास करना ।

मझिजमनिकाये अकुसल्कुसल्धम्मा

भगवान्‌ बुद्ध के अनुसार अष्टांगी मार्ग पर कुशलता के साथ चलने के लिये अकुशल तत्वों का त्याग अनिवार्य है । अकुसला संहिता धम्म में वर्जित यह तत्व हैं :

१.लोभ

२.द्धेष

३.मोह

इन प्रमुख तत्वों पर नियंत्रण अत्यावशयक है क्योंकि इन तत्वों से भी तो अन्य अकुशल तत्व उत्पन्न होते हैं । यह तत्व हैं :

प्राणातिपातो- अर्थात जीवन संहार

अदिन्नादानं- अप्राप्त को प्राप्त करने की कुचेष्ठा

कामेसु मिच्छाचारो- अर्थात अशुद्धता

मुसावादो- मिथ्यावादी आचरण

पिसुणावाचा- झूठी निन्दा

फ़रुसावाचा- अर्थात कटुवाणी

सम्फ़प्पलापो–व्यर्थ वाद विवाद

अभिज्झा- लोभ लालच

व्यापादो- अथात दूसरों के अहित की कामना

मिच्छादिट्ठि- यानि भ्रमित दृष्टिकोण

अस्तित्व के तीन लक्षण

बुद्ध ने यह भी खोजा कि सकल अस्तित्व की तीन और विशेषतायें हैं :

अनिन्यता

सब कुछ अनित्य है और प्रत्येक वस्तु कुछ और होने की प्रक्रिया में है ।

दु:खता

चूँकि सब कुछ अनित्य है , इसलिये अस्तित्व भी दु:खबद्ध है । सुख के लिये तृष्णा हमेशा रहेगी . असुखद से विकर्षण हमेशा रहेगा . जो कि अस्तित्व के परिवर्तन्कारी स्वभाव का परिणाम है ।

अनात्मता

नित्य अथवा अपरिवर्तनीय आत्मा जैसा कोई तत्व नही है । स्व जिसके अस्तित्व में हम संस्कारित हैं , यह हमारे भिन्न –२ मानसिक व शारीरिक अवययों के सिवा कुछ भी नही है , जो कि कार्यु कारण की सतत स्थायी परिवर्तन की अवस्था में है ।

संदर्भित ग्रन्थ

१. इस लेख की मुख्य थीम भिक्षु बुद्ध रत्न डां मनोज भन्ते के लेख से ली गयी है जो बोद्ध गया मन्दिर मैनेजंमैन्ट कमेटी द्वारा प्रकाशित जर्नल ‘ प्रज्ञा ’ मॆ सन्‌ २०१२ की बुद्ध जंयती को प्रकाशित हुई थी ।

२. ‘ स्वर्ग कोई भी जा सकता है ,बस अच्छे बनो ’ टी. वाई .ली. की पुस्तक का श्री राजेश चन्द्रा जी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद ।

३. आचार्य गोयन्का जी द्वारा हिन्दी मे अनुवादित “ धम्मपद

४. महास्थविर ज्ञानातिलोक द्वारा संग्रहित बुद्ध वचन का भिक्षु आनन्द कौसल्लायन द्वारा हिन्दी अनुवाद

५. अनगरिक  धर्मपाल द्वारा संग्रहित बुद्ध की शिक्षा का भिक्षु आनन्द कौसल्लायन  और त्रिपटिकाचार्य भिक्षु धर्मरक्षित द्वारा हिन्दी अनुवाद

६. डां सैमुएल हैनीमैन द्वारा रचित आरेगान आफ़ होम्योपैथी का छवाँ संस्करण ।

Wednesday, January 2, 2013

श्रावस्ती संस्मरण - भाग २

पिछ्ले अंक से आगे …….
053
जेतवन और प्राचीन श्रावस्ती खण्डरों के मध्य कोई अधिक दूरी नही है । लगभग दो बजे तक जेतवन से हम निकल कर प्राचीन श्रावस्ती के खण्डरों  की तरफ़ चल पडे । यहाँ  सडक किनारे कई मोनेस्ट्री और जैन मन्दिर दिखाई पडे  । इसलिये पहले यही निर्णय  लिया गया लि इन मन्दिरों से ही शुरुआत की जाये ।
प्रतिहार टीला ( ओडाझार )
056
मुख्य सडक के ठीक किनारे पर यह स्थान है । कहते हैं कि इस स्थान  भगवान्‌ बुद्ध ने विशाल जन समुदाय के मध्य श्रद्धी चमत्कार लिया था । हाँलाकि बुद्ध चमत्कारों  के बिल्कुल भी पक्ष मे नही थे लेकिन एक वर्ग द्वारा उन्हें चुनोती देने के कारण बुद्ध ने यह निर्णय लिया । यह भी कहा जाता है कि बुद्ध ने यहाँ महामाया को अभिधम्म की देशना देकर अहर्त लाभ करवाया था एवं वर्षावास यहीं पूरा किया था ।
श्रीलंका आरामय बुद्ध मन्दिर 
श्रीलंका की श्रद्धालु जनता के द्वारा निर्मित इस भव्य मन्दिर में भगवान बुद्ध की जीवन चर्या को भित्त चित्रों में बडे ही सजीव व कलात्मक शैली में अंकित किया गया है ।
कम्बोज बुद्ध मन्दिर
156 
इस मन्दिर में  बौद्ध शिल्प संस्कृति की अनूठी प्रस्तुति देखने को मिलती है । यह सहेठ महेठ तिराहे पर मुख्य सडक के दक्षिण मे स्थित है ।
जैन मन्दिर 
158
161
जैन मत के अनुसार श्रावस्ती तीर्थकर भगवान्‌ सम्भवनाथ की जन्मस्थली है । घण्टा पार्क के पूर्व मध्य सडक के दक्षिण में शवेताम्बर व दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों के जैन मन्दिर बने हैं । शवेताम्बर मन्दिर सफ़ेद संगमरमर पत्थर का बना हुआ है । दोनों मन्दिर दर्शनीय हैं ।
जापानी घण्टा पार्क
143
मुख्य सडक पर एक उधान में विशाल घण्टा लगा है ।
कोरिया बुद्ध मन्दिर
106
122
126
कोरियन शिल्प का यह महायानी बुद्ध मन्दिर मुख्य सडक पर है ।
मायानामर मोनेस्ट्री
0903
0913
इसके अतिरिक्त इसी सडक के दोनों ओर कई और भी मन्दिर हैं जैसे भारत के नव बौद्धों द्वारा निर्मित भारतीय बुद्ध मन्दिर , समय माता मन्दिर , महामंकोल बुद्ध मन्दिर आदि । ओडिझार पर हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ एक ‘शिव बाबा ’ का मन्दिर है जो वास्तव मे सम्राट अशोक द्वारा स्थापित पत्थर की शिला है जिसे स्थानीय जनता शिव लिंग मानकर पूजा अर्चना करती है । यहाँ तक पहुँचने के लिये ओडीझार के ठीक सामने की रोड से ‘ काब्धारी गाँव ’  के बगल से होकर इस स्थान तक वाहन या पैदल  पहुँचाजा सकता है । यहाँ पहुँचने पर हमारी मुलाकात भिक्षु श्री विमल तिस्स से हुयी ।  भिक्षु श्री विमल तिस्स धर्म प्रसाद पूर्वाराम महाविहार को काफ़ी समय से देख रहे हैं ।
084
062
भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में प्राचीन श्रावस्ती खण्डर का क्षेत्रफ़ल लभग २५० एकड है । इस विस्तूत खण्डरी जंगल के चारों तरफ़ ऊँचे टीले यह सिद्ध करते हैं कि सम्पूर्ण नगर ऊँचे प्राकारों से घिरा था । इन खणडरों के गर्भ में अभी बहुत कुछ अज्ञात पडा है । बुद्ध वाडगमय त्रिपिटक में सम्पूर्ण श्रावस्ती की तत्कालीन कला संस्कृति व सुख समृद्धि की भव्यता का विराट वर्णन है । भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही खुदाई व संरक्षण मे कुछ स्थल प्रमाणित किये गये हैं ।
सम्भवनाथ मन्दिर
sambhav nath temple
सम्भवनाथ मन्दिर : साभार : shunya.net
279
प्राचीन श्रावस्ती के खण्डर परिसर में प्रवेश करते ही यह देखा जा सकता है । इस स्थल पर जैनियों के तीसरे तीर्थांकर सम्भवनाथ का जन्म हुआ था। लाखोरी ईटॊं से बना हुआ यह गुम्बद युक्त मन्दिर ध्वंस मध्यकालीन युग का प्रतीत होता है ।
सुदत्त महल ( कच्ची कुटी )
299
300
291
सुद्त्त यानी अनाथपिण्डक का यह निवास स्थल है । आज यह विध्वंस अतीत के विभिन्न काल खण्डों के मिश्रित वास्तु शिल्प का प्रतीक है । ये प्रतीक कुषाण काल से लेकर बारहवीं सदी तक के हैं । ऊपर पार्शव में  चित्र मे सुदत महल के आस पास विदेशी सैलानियों के अपार समूह को  देख सकते हैं । यह चित्र अगुंलिमाल गुफ़ा की छ्त से लिया गया है । कहते हैं कि काल प्रवाह में कोई संत जी कच्ची मिट्टी की कुटी बनाकर रहते थे इसी हेतु जनश्रुति में इस विध्वंस का नाम कच्ची कुटी पड गया ।
आंगुलिमाल गुफ़ा ( पक्की कुटी )
286
284
आंगुलिमाल गुफ़ा नाम जनधारणा में अनजाने में ही कहा गया है । चीनी यात्री ह्वेनसांग व फ़ाह्यान के यात्रा दृष्टातों में इस विध्वंस का आंगुलिमाल के स्तूप के रुप मे वर्णन है , परन्तु पुरातत्वविद होई के अनुसार यह धर्म मंडप का विध्वंस चिन्ह है । इसकी वास्तु रचना से यह विध्वंस स्तूप ही सिद्ध होता है । चित्र को देखें तो नीचे एक सुरंग नजर आ रही है । होई ने विध्वंस की सुरक्षा के लिये वर्षा के जल की निकासी हेतु यह सुरंग खुदवाई  थी । एक मत के अनुसार यह  स्तूप उस दुखी महिला का है जो प्रसव पीडा से आक्रान्त थी और जिसे भिक्षु आंगुलिमाल ने अपने तपोपुण्य से पीडा मुक्त कर माता एंव शिशु दोनों को जीवन प्रदान किया था । कालांतर मे कोई संत जी पक्की कुटी बना के रहने लगे तभी से इसका नाम पक्की कुटी पड गया ।
राजा प्रसेनजित का महल
पुरातव की खुदाई मे भी यह स्थल चिन्हित नही किया जा सका है , परन्तु  यह सर्वविदित है कि श्रावस्ती बुद्ध काल में कोशल देश की एक मात्र राजधानी थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उस महल के विध्वंस को देखा था ।
शाम के ४.३० बज रहे थे । श्रावस्ती में  और भी बहुत कुछ देखने को था लेकिन समय अब नही था । कुछ कडवी यादें भी रही , स्थानीय श्रावस्ती के कुछ युवकों  को  थाई मन्दिर मे उत्पात मचाते देखा , थाई युवतियों और विदेशी सैलानियों को वे बिलावजह निशाना बना रहे थे , यह सब करतूतें अपने देश की गरिमा को कम करती है  । इस तथ्य को भी  याद रखना होगा कि श्रावस्ती भी किसी धर्म विशेष की आराध्य भूमि है , जैसा सम्मान  आप अपने धर्म को देते हैं उतना ही दूसरे धर्मों  को भी देना सीखें । दूसरा श्रावस्ती के अधिकतर खंडहर बहुत ही जीर्ण- शीर्ण  अवस्था मे है , अधिकतर लाखोरी ईटॆं जगह –२ से गायब मिली या रास्ते मे जगह –२ बिखरी मिली । पुरातत्व विभाग को इस विरासत को सँभालने का प्रयास करना होगा ।
शायद अब यह समय है देश मे फ़ैली तमाम बौद्ध विरासत को  बौद्ध मतावलम्बियों के हवाले कर दिया जाये , संभव है इससे  इन विरासतॊ की सम्मानपूर्वक रक्षा की जा सके  ।

Tuesday, January 1, 2013

श्रावस्ती संस्मरण - भाग १


174
पूरे दिन का अवकाश मुझे कम ही मिलता है , एक होली वाले दिन और दूसरा दीपावली के अगले दिन , जब क्लीनिक  बन्द रहती है । श्रावस्ती जाने  का मन कई सालों से था , लेकिन संयोग बना गत वर्ष दीपावली के अगले दिन । सोच कर गये थे कि दो घंटे मे श्रावस्ती  का  अतीत देख लेगें लेकिन लगे पूरे छ घंटे । भगवान बुद्ध , अंगुलिमाल  और कई  जैन तीर्थाकरों की कहानियाँ कई जगह पढी थी लेकिन सजीव ही अतीत के उन अवशेषों  को देखने का मौका मिला ।  देर रात घर लौटते हुये लगा कि कुछ पल और  श्रावस्ती में रुक लेते ।   श्रावस्ती भ्रमण  की यह यादें मानो मन:पटल मे आज भी सजीव रुप से अंकित है । यह पोस्ट शायद पिछले वर्ष ही डाल देनी चाहिये थी लेकिन समयभाव के कारण संभव न हो पाया । पूरी यात्रा के दौरान मेरे प्रिय मित्र श्री राजेश चन्द्रा जी का साथ फ़ोन के माध्यम से बना रहा , देर रात घर लौटने तक वह मेरे  और मेरे परिवार के कुशलप्रेम  की बार –२ खबर लेते रहे । उनके  प्रेम रुपी व्यवहार की मधुर स्मृतियाँ मुझे  हमेशा उनकी याद दिलाती रहेगी । साथ ही में पूर्वाराम विहार के भिक्षु श्री विमल तिस्स जी का भी जिनके सहयोग के बगैर कई तथ्यों को जानना मेरे लिये संभव नही होता ।
श्रावस्ती से भगवान्‌ बुद्ध का गहरा रिशता   रहा है । यह तथ्य इसी से प्रकट होता है कि जीवन के उत्तरार्थ के २५ वर्षावास( चार्तुमास ) बुद्ध ने श्रावस्ती मे ही बिताये । बुद्ध वाणी संग्रह त्रिपिटक के अन्तर्गत ८७१ सूत्रों ( धर्म उपदेशॊ )  को भगवान्‌ बुद्ध ने श्रावस्ती प्रवास मे ही दिये थे , जिसमें ८४४ उपदेशों को जेतवन – अनाथपिंडक महाविहार में व २३ सूत्रों को  मिगार माता पूर्वाराम मे उपदेशित किया था । शेष ४ सूत्रों समीप के अन्य स्थानों मे दिये गये थे । भगवान बुद्ध के महान आध्यात्मिक  गौरव का केन्द्र बनी श्रावस्ती का सांस्कृतिक प्रवाह मे भयानक विध्वंसों के बाद वर्तमान मे भी यथावत है ।
इतिहास मे दृष्टि दौडायें तो कई रोचक तथ्य दिखते हैं । प्राचीन काल में यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी। भगवान राम के पुत्र लव ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनो का तीर्थ स्थान है।
माना गया है कि श्रावस्ति के स्थान पर आज आधुनिक सहेत महेत ग्राम है जो एक दूसरे से लगभग डेढ़ फर्लांग के अंतर पर स्थित हैं। यह बुद्धकालीन नगर था, जिसके भग्नावशेष उत्तर प्रदेश राज्य के, बहराइच एवं गोंडा जिले की सीमा पर, राप्ती नदी के दक्षिणी किनारे पर फैले हुए हैं।
इन भग्नावशेषों की जाँच सन्‌ 1862-63 में जनरल कनिंघम ने की और सन्‌ 1884-85 में इसकी पूर्ण खुदाई डा. डब्लू. हुई (Dr. W. Hoey) ने की। इन भग्नावशेषों में दो स्तूप हैं जिनमें से बड़ा महेत तथा छोटा सहेत नाम से विख्यात है। इन स्तूपों के अतिरिक्त अनेक मंदिरों और भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। खुदाई के दौरान अनेक उत्कीर्ण मूर्तियाँ और पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जो नमूने के रूप में प्रदेशीय संग्रहालय (लखनऊ) में रखी गई हैं। यहाँ संवत्‌ 1176 या 1276 (1119 या 1219 ई.) का शिलालेख मिला है, जिससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म इस काल में प्रचलित था। जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान्‌ महावीर ने भी श्रावस्ति में विहार किया था। चीनी यात्री फाहियान 5वीं सदी ई. में भारत आया था। उस समय श्रावस्ति में लगभग 200 परिवार रहते थे और 7वीं सदी में जब हुएन सियांग भारत आया, उस समय तक यह नगर नष्टभ्रष्ट हो चुका था। सहेत महेत पर अंकित लेख से यह निष्कर्ष निकाला गया कि 'बल' नामक भिक्षु ने इस मूर्ति को श्रावस्ति के विहार में स्थापित किया था। इस मूर्ति के लेख के आधार पर सहेत को जेतवन माना गया। कनिंघम का अनुमान था कि जिस स्थान से उपर्युक्त मूर्ति प्राप्त हुई वहाँ 'कोसंबकुटी विहार' था। इस कुटी के उत्तर में प्राप्त कुटी को कनिंघम ने 'गंधकुटी' माना, जिसमें भगवान्‌ बुद्ध वर्षावास करते थे। महेत की अनेक बार खुदाई की गई और वहाँ से महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई, जो उसे श्रावस्ति नगर सिद्ध करती है। श्रावस्ति नामांकित कई लेख सहेत महेत के भग्नावशेषों से मिले हैं।
018
महामंकोल थाई मन्दिर
प्रात: दस बजे तक हम श्रावस्ती की सडकों पर थे । दूर से ही विशाल महामंकोल थाई मन्दिर और बुद्ध की प्रतिमा दिख रही  थी  । लेकिन मन्दिर मे पर्वेश करने पर ज्ञात हुआ कि स्थानीय लोगों के लिये मन्दिर के द्वार २ बजे के बाद खुलते है । मन्दिर की फ़ोटॊ लेने  की अनुमति नही है । हाँलाकि बाहर से फ़ोटॊ ले सकते हैं । दोपहर २.३० बजे हम इस विशाल फ़ैले हुये प्रांगण के अन्दर प्रवेश कर गये । मन्दिर का संचालन थाई युवतियों और उन्के स्टाफ़ द्वारा किया जाता है । थाई शैली पर बना यह मन्दिर बेहद दर्शीनीय  है ।
जेतवन अनाथपिण्क महाविहार ( सहेठ वन )
181
भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस आश्रम ( विहार ) में अब केवल कुटियों की बुनियाद मात्र रह गयी है । कहते हैं  कि बुद्ध विहार के निर्माण  लिये राजकीय जेतवन का चयन सुद्त्त ने किया था । सुदत्‌ ने राजकुमार जेत से उधान के लिये किसी भी कीमत पर आग्रह किया । कुमार जेत  ने  भूखन्ड के बराबर सोने की मोहरों में सुदत ने लेन देन सुनिशचित किया । १८ करोड में विशाल भव्य सुविधाजनक विहार का निर्माण हुआ । राजकीय गौरव सम्मान के साथ यह अति रमणीय स्थान भगवान बुद्ध को दानार्पित किया गया । यही कारण है कि धर्म क्षेत्र मे सुदत – अनाथपिडंक का नाम चिरस्थाई हो गया । इसी तपोभूमि पर भगवान बुद्ध ने विशाल भिक्षु संघ के साथ उन्नीस चार्तुमास ( वर्षावास ) व्यतीत किये । सम्पूर्ण ८७१ उपदेशों में से ८४४ सूत्र इस  जेताराम मे ही भगवान्‌ बुद्ध ने दिया था ।
271
270
                  मन्दिर सं. १ एवं मोनेस्ट्री
257
               ध्यान लगाते हुये विदेशी तीर्थयात्री
ऐसा लगता है कि  इस तपस्थली पर नैसर्गिक शान्ति की   सदोऊर्जा सर्वत्र आज भी विधमान है । कुछ क्षण आँखों को बन्द कर के गन्ध कुटी के सामने खडा रहकर इस उर्जा का स्वानुभव किया जा सकता है । यह मेरा  दिव्यस्वपन था या कल्पनाशीलता , यह कहना मुशकिल है ।
जेतवन मे ही  आगे बढने पर वयोवृद्ध पीपल वृक्ष ‘ आनन्द बोध ’ के दर्शन होते हैं । इसे पारिबोधि चैत्य भी कहते हैं । भन्ते आनन्द व भन्ते महामौदगल्यायन के सद्‌ प्रयत्न से बोध गया के महायोगी वृक्ष की संतति तैयार की गयी , जिसे आनाथपिडंक ने यहाँ आरोपित किया था । कहते हैं कि भगवान्‌ बुद्ध ने इसके नीचे एक रात्रि की समाधि लगाई थी ।
237
              आनन्द बोधि वृक्ष ( पारिबोधि चैत्य)
आनन्द बोधि वृक्ष के आस पास कई कुटियों की बुनियादें शेष हैं जो बुद्धकाल के स्वर्णिम युग की एक झलक दिखाती हैं । इनमें से प्रमुख हैं : कौशाम्बी कुटी ( मन्दिर सं० ३ ), चक्रमण स्थल , आनन्द कुटि , जल कूप , धर्म सभा मण्डप , करील कुटी( मन्दिर सं० १ ) , पुष्करिणी , शवदाह स्थल, सीवली कुटी (मन्दिर सं० ७ ), आंगुलिमाल कुटी , धातु स्तूप, जन्ताधर स्तूप, अष्ट स्तूप , राजिकाराम ( मन्दिर सं० १९ ) , पूतिगत तिस्स कुटी ( मन्दिर सं० १२ ) । शेष भग्नावशेष भी कुटियों के अथवा धातु स्तूपों के हैं ।
209
                                  अष्ट स्तूप
261
260
                 गन्ध कुटि ( मन्दिर सं० २ )
इन स्तूपों के अलावा जिस स्तूप का सर्वाधिक महत्व है,  वह है गन्ध कुटि ( मन्दिर सं० २ ) । भगवान्‌ बुद्ध का यह निवास स्थान था । चंदन की लकडी से निर्मित यह सात तल की सुंदर भव्य कुटी थी । इसे अनाथपिण्क ने बनवाया था । वर्तमान खण्डर के ऊपर का भाग बुद्धोतर काल का पुनर्निर्माण है । नीचे का भाग बुद्ध्कालीन है , इसमें भगवान्‌ बुद्ध की प्रतिमा बाद में स्थापित की गयी थी । चीनी यात्री फ़ाह्यान ने इस विध्वंस पर दो मंजिला ईंट का बना भव्य बुद्ध मन्दिर देखा था । ह्ववेनसांग के यात्रा काल मे वह मन्दिर नष्ट हो चुका था । ढांचें से स्पष्ट होता है कि दीवारों की आशारीय मोटाई छ: फ़ुट व प्रकारों की आठ फ़ुट है । सम्पूर्ण गन्धकुटी परिसर की माप ११५ * ८६ फ़ीट है ।
267
                        धर्म सभा मण्डप
गन्ध कुटि से लगा हुआ  धर्म सभा मण्डप भगवान्‌ बुद्ध का धर्मोपदेश देने का स्थान था । यहाँ  भिक्षुओं और अन्य जनों को बैठाकर भगवान बुद्ध धर्मौपदेश करते थे । इनके द्वारा ८४४ धर्म उपदेश यही से दिये गये थे ।
कुछ अन्य स्तूपों के चित्र :
169
170
                              मन्दिर सं. ११ एवं १२
189

188
                 मन्दिर सं. १९ एवं मोनेस्ट्री
225
227
                          स्तूप संख्या ५
जेतवन से हम चलते हैं महेठ वन की ओर ( लेकिन अगले अंक में )
…….. शेष अगले भाग में …..

Sunday, June 3, 2012

बौद्ध परिपथ की राह दिखाएगा ‘द पाथ’

the path -buddhist circuit

बोधिवृक्ष

उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विभाग बौद्ध परिपथ के जरिए उड़ान भरने की तैयारी में है। थाइलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, जापान, चीन, बर्मा जैसे देशों में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों को प्रदेश में फैली बौद्ध विरासत की तरफ आकृष्ट करने के लिए विभाग ने इन देशों के दूतावासों से सीधे तार जोड़े हैं। इन देशों में मिली जबर्दस्त प्रतिक्रिया से पर्यटन विभाग के हौसले बुलंद हैं। माना जा रहा है कि पर्यटन विभाग की यह कोशिश प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। इस कोशिश में विभाग ने कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, संकीसा, कौशांबी व कुशीनगर में फैले बौद्ध स्थलों को द पाथ नामक खूबसूरत ब्रोशर में समेटा है। कहते हैं कि कपिलवस्तु, जहां गौतम बुद्ध का बचपन गुजरा। 40 वर्ष से अधिक समय बुद्ध ने गंगा के मैदानी इलाकों की यात्रा की। पर्यटन विभाग में ओएसडी भारती सिंह बताती हैं कि बुद्ध से जुड़े सभी स्थलों की जानकारी एक ही ब्रोशर में पर्यटकों को मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि थाइलैंड, कंबोडिया, जापान, चीन, बर्मा सभी देशों के दूतावासों ने इस प्रयास की सराहना की है। यही नहीं थाईलैंड दूतावास ने अपनी वेबसाइट में उत्तर प्रदेश पर्यटन का लिंक देने का वादा किया है, जिससे थाईलैंड की वेबसाइट एक्सेस करने वालों को बौद्ध परिपथ की जानकारी मिल सकेगी। पर्यटन विभाग वेबसाइट पर ई-ब्रोशर देगा।

साभार : ई जागरण