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Tuesday, June 30, 2015

धनकर बौद्ध मठ हिमाचल प्रदेश

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Photo credit : wikipedia

धनकर बौद्ध मठ

धनकर बौद्ध मठ धनकर गांव में है जो कि हिमाचल के स्पीति में समुद्र तल से 3890 मीटर की उंचाई पर स्थित है । यह जगह ताबो और काजा दो प्रसिद्ध जगहो के बीच में भी है । स्पीति और पिन नदी के संगम पर स्थित ये जगह दुनिया में बौद्ध धर्म के भी और ऐतिहासिक विरासतो में भी स्थान रखती है

यह जगह प्राचीन काल का इतिहास आंखो के सामने खोलकर रख देती है । 1000 फुट उंची एक ढांग पर बनाया गया और दो नदियो के संगम पर स्थित ये किसी भी बौद्ध मठ के लिये आदर्श जगह मानी जाती है । ढांग जो कि हमारे यहां पर देशी भाषा में बोला जाता है यानि की पहाड का एक छोटी सा भाग और कर या कार का मतलब किला कहा जाता है इसीलिये इसका नाम धनकर जो कि अब अपभ्रंश में हो गया है पडा ।

यहां से स्पीति और पिन दोनो नदियो का अदभुत दृश्य दिखायी देता है । गोम्पा के नीचे गांव बसा हुआ है । गोम्पा और किला आपस में जुडे हुए थे । हालांकि लगातार होते वायु एवं जल के क्षरण के कारण अब ये विलुप्त होने की कगार पर खडे हैं क्योंकि ये जगह लगातार गिर रही है

ताबो गोम्‍पा

इस गोम्‍पा की स्‍थापना रिंगचेन जैंगपो ने 996 ई. में की थी। जैंगपो एक प्रसिद्ध विद्धान थे। इस मठ की स्‍थापना स्‍पीती के पूर्वी क्षेत्र में एक शिक्षा केंद्र के रुप में की गई थी। वह इस गोम्‍पा को एक उच्‍चतर अध्‍ययन के केंद्र के रुप में विकसित करना चाहते थे। इस गोम्‍पा में पेंटिग्‍स तथा धर्मग्रंथों का विशाल संग्रह है। इस गोम्‍पा की दीवारों पर सुंदर चित्र बने हुए हैं। ये चित्र अजंता गुफा की चित्रों की याद दिलाता हैं। तुस्‍लांग यहां का मुख्‍य मठ है। इस गोम्‍पा में 60 धार्मिक शिक्षक रहते हैं। इस गोम्‍पा का निर्माण ईट और मिट्टी से किया गया है। यहां कश्‍मीरी शैली में बनी हुए भगवान बुद्ध की एक मूर्त्ति स्‍थापित है। 1996 ई. में इस गोम्‍पा ने अपने स्‍थापना के 1000 वर्ष पूरे किए। दलाई लामा यहां हर वर्ष जुलाई और अगस्‍त महीने में होने वाले कालचक्र प्रवर्तन समारोह का शुभारंभ करते हैं।

गुफा भित्ति

ताबो गोम्‍पा के सामने ही प्रकृति निर्मित गुफा है। इन गुफाओं में अब सिर्फ एक ही गुफा 'फो गोम्‍पा' सुरक्षित अवस्‍था में है। बाकी गुफाओं के संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग प्रयत्‍नशील है। इन गुफाओं की दीवारों पर चित्र भी बने हुए हैं। कुछ चित्र अभी भी सुरक्षित अवस्‍था में हैं। इन चित्रों में कुछ पशुओं के चित्र भी हैं। इन पशुओं में जंगली बकरा तथा तेंदुआ शामिल है।

साभार : http://buddhkathaiye.blogspot.in/

Friday, June 26, 2015

कान्हेरी गुफाएं

कान्हेरी  गुफाएं
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photo credit : wikipedia
प्राचीन अभिलेखों में कान्‍हाशैल, कृष्‍णगिरी, कान्‍हागिरी के नाम से उल्लिखित कान्हेरी  (19° 13’ उत्‍तर, 72° 55’ पू.) मुम्‍बई के उत्‍तर में स्थित है और यह बौद्धों का प्रमुख केंद्र था। कान्‍हेरी सलसेत्‍ती द्वीप में स्थित है और थाणे से 6 मील की दूरी पर है। गुफाओं का उत्खनन ज्‍वालामुखीय संकोणाश्‍म निक्षेप में किया गया है। कई स्थानों पर इन पहाडियों की ऊंचाई औसत समुद्र तल से 1550’ है। कान्हेरी की ख्‍याति इस बात से है कि यहां एक ही पहाड़ी में सर्वाधिक संख्‍या में गुफाओं का उत्खनन हुआ है। इसके पश्चिम में बोरीविली रेलवे स्‍टेशन है और खाड़ी के पार अरब सागर है।
कान्‍हेरी इसलिए फूला-फला क्‍योंकि यह सोपारा (सुरपरक, द सुपारा आफ ग्रीक; अरबी लेखकों का सुबारा; उत्‍तरी कोंकण की प्राचीन राजधानी) एक विकसित पत्‍तन- कल्‍याण, चेमुला, ग्रीक भूगोलविदों का सामिल्ला, ट्राम्‍बे के द्वीप पर शिलाहारों का चेमुला जैसे प्राचीन समुद्री पत्‍तन शहरों के निकट था; वस्य, शायद वसाई अथवा बस्सीन, श्री स्तानर अथवा थाणा, घोड़ाबंदर जैसी अन्य नजदीकी प्राचीन बसावटें थी। प्राय: ऐसा विश्वास किया जाता है कि बौद्ध धर्म सर्वप्रथम सोपार स्थित अपरंथ (पश्चिमी भारत) में आया जो कान्हेरी के अत्यंत निकट है। इन गुफाओं का उत्‍खनन तीसरी शताब्‍दी ई.पू. के मध्‍य में किया गया था और ये 11 वीं शताब्‍दी ईसवी तक इस्तेमाल में रहीं। इनका उल्‍लेख 16 वीं शताब्दी में पुर्तगालियों जैसे आंरभिक आगंतुकों तथा यूरोप के अन्‍य यात्रियों और समुद्री यात्रियों द्वारा किया गया।
यहां पाए गए अनगिनत संदाता अभिलेखों में प्राचीन नगरों जैसे सुपारक (सोपारा), नासिका (नासिक), चेमुली (चेमुला); कल्‍याण (कल्‍याण), धेनुकाकट (धान्‍यकटक, आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में आधुनिक अमरावती) का उल्‍लेख मिलता है। संदाताओं में राजपरिवारों के सदस्यों से लेकर आम आदमी तक समाज के सभी वर्गो के व्यक्ति शामिल थे। अभिलेखों में वर्णित प्रतिष्ठित राजपरिवारों में गौतमीपुत्र सातकर्णी (लगभग 106-130 ई.); वसिष्‍ठीपुत्र श्री पुलुमावी (लगभग 130 से 158 ई.) श्री यज्ञ सातकर्णी (लगभग 172 से 201 ई.); मधारीपुत्र शकसेना (लगभग तीसरी शताब्‍दी ई. के अंत में); सातवाहन राजवंश के शासक जिनकी प्राचीन राजधानी प्रतिष्‍ठान थी (आधुनिक पैठन, जिला औरंगाबाद); राष्‍ट्रकूट राजवंश के अमोघवर्ष जिसका काल 853 ई. था, आदि शामिल हैं।
कान्‍हेरी में हुए उत्‍खनन इस प्रकार के हैं :- (i) चैत्यगृह, बौद्ध समुदाय का पूजा स्‍थल (ii) विहार या बौद्ध विहार- इनमें एक या अनेक प्रकोष्‍ठ होते हैं जहां बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। (iii) पौड़ियां अथवा जल कुंड, जिनका उत्खनन वर्षा जल संचयन के लिए बुद्धिमत्‍तापूर्वक किया गया था ताकि इस जल को ग्रीष्‍म काल के दौरान प्रयोग में लाया जा सके और (iv) चट्टानों को काटकर बनाई गई बेंचे और आसान।
कान्‍हेरी में चट्टान काट कर बनाई गई गुफाओं के उत्खनन का आंरभ संयोगवश अपरंथ में बौद्ध धर्म के आगमन से जुड़ा हुआ है। ये गुफाएं आम तौर पर छोटी हैं और इनमें एक प्रकोष्‍ठ है जिसमें आगे की ओर स्तंभ युक्‍त बरामदा है जिस तक सीढ़ीयों का मार्ग जाता है। इन गुफाओं में जल संचयन के लिए निरपवाद रूप से एक जलकुंड है। आंरभिक उत्‍खनन बहुत छोटे और सीधे-सादे थे। उनमें कोई आलंकारिक तत्‍व नहीं थे। स्तंभ सपाट वर्गाकार या अष्‍टकोणीय थे और इनमें आधार फ़लक नहीं हैं जिनका प्रचलन बाद में शुरु हुआ। कान्‍हेरी में जो सर्वाधिक विशिष्‍ट उत्खनन हुआ, वह गुफा संख्या-3 का उत्खनन है जो कि एक चैत्यगृह है जिसका उत्खनन यज्ञ सातकर्णी (लगभग) 172 से 201 ई.) के शासन काल के दौरान किया गया था। यह चैत्यगृह भारत के सबसे बड़े चैत्‍यागृहों में से एक है। इससे बड़ा चैत्यगृह केवल करला का है जो पुणे जिले में है। यह चैत्यगृह करला के चैत्यगृह से बहुत अधिक मेल खाता है। निर्माण योजना की दृष्टि से इसमें एक आयताकार हॉल है जो गजपृष्ठीय है। एक बरामदा है और  आगे की ओर एक खुला प्रांगण है। हॉल की लंबाई 26.36 मीटर, चौड़ाई 13.6 मीटर और ऊंचाई 12.9 मीटर है। 24 स्तंभों की एक पंक्ति हॉल को एक केंद्रीय मध्‍य भाग और पार्श्‍व गलियारों में विभक्‍त करती है। मध्‍य भाग की छत ढ़ोलाकार महराबी है जबकि गलियारे सपाट हैं। मध्‍य भाग की मेहराबी छत में काष्‍ठ की कड़ियों के प्रावधान के प्रमाण हैं जो अब प्रचलन में नहीं है। हॉल के स्तंभ एक जैसे नहीं हैं और विभिन्‍न शैलियों और आकारों के हैं और इनमें एक रूपता नहीं है। हॉल के अर्धवृत्तकक्ष में एक स्‍तूप निर्मित है जिसका व्‍यास 4.9 मीटर और ऊंचाई 6.7 मीटर है। हॉल का अग्रभाग दो बंधनों के दो समूहों के साथ तीन द्वारों द्वारा वेधित है। प्रत्‍येक समूह को द्वारों के बीच आयताकार आलों में तराशा गया है। अलंकरण रहित एक विशाल चैत्‍य खिड़की प्रकाश की व्यवस्था के लिए बनाई गई थी। पार्श्‍वभित्तियों पर वरद मुद्रा में खड़े बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं तथा अन्‍य बोधिसत्‍व प्रतिमाओं को बारीकी से उकेरा गया है। ये मूर्तियां बाद में जोड़ी गई हैं और इनका काल लगभग पांचवीं से छठी शताब्‍दी ई. है।
चैत्यगृह के निकट कभी दो संरचनात्‍मक स्‍तूप हुआ करते थे। एक स्‍तूप पत्‍थर का था जिसमें तांबे के दो कलश मिले थे जिनमें राख थी। एक छोटा सोने का बॉक्‍स है जिसमें कपड़े का एक टुकड़ा, एक चांदी का बॉक्‍स, एक माणिक, एक मोती, सोने के कुछ टुकड़े, तांबे की दो प्‍लेटें थी जिनमें से एक सन् 324 की थी। दूसरा स्‍तूप ईंटों का बना था जिसमें से एक उत्‍कीर्णित पत्‍थर मिला जिसकी लिपि पाँचवीं से छठी शताब्‍दी ई. की है।
गुफा संख्‍या-1 एक अधूरा निर्मित चैत्यगृह है जिसमें मूल रूप से एक स्तंभ युक्‍त हॉल के अलावा, दो मंजिला बरामदा और एक द्वारमंडप बनाने की योजना थी। यह गुफा पांचवीं से छठी शताब्‍दी की है क्‍योंकि संपीडित कुशन या अमलक शीर्ष वाले स्तंभ आम तौर पर उसी अवधि के प्रतीत होते हैं।
दरबार हॉल’ के नाम से ज्ञात गुफा संख्‍या-11 में सामने की ओर बरामदे सहित एक विशाल हॉल है। इस हॉल की पृष्‍ठभित्ति में मंदिर है और दोनों ओर प्रकोष्‍ठ हैं। हॉल का फर्श, दो पत्‍थर की कम ऊंची बेंचे एलोरा की गुफा सं. 5 से मेल खाती हैं। बुद्ध की धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा मंदिर के सौंदर्य को चार चांद लगा देती है। गुफा में विभिन्‍न कालों के 4 अभिलेख हैं- एक शक 775 (सन् 853) का है जो राष्‍ट्रकूट वंश के राजा अमोघवर्ष और उसके सामंत शिलाहार राजकुमार, कपार्दिन के शासन काल का है। इस अभिलेख में पुस्‍तकों की खरीद और क्षतियों की मरम्‍मत के लिए उपलब्‍ध कराए गए विभिन्‍न उपहारों और निधियों के दान को लेखबद्ध किया गया है।
यहां की मूर्ति कला गुफा संख्‍या 2, 3, 41, 67, 89, 90 आदि में देखी जा सकती हैं। बुद्ध की छवि या मुद्रा या तो खड़े हुए रूप में है या बैठे हुए रूप में। बैठी हुई मुद्रा की मूर्तियों में कुछ मामलों में बोधिसत्व भी उनकी बगल में बैठे हुए हैं और बहुत ही विरले मामलों में उनके संगी- साथी भी उनके साथ आसीन हैं। यहां बुद्ध के अलावा अवलोकितेश्‍वर की मूर्ति भी विद्यमान है और जिसे यहां महत्‍व प्राप्‍त है। (अवलोकितेश्‍वर ने सभी प्राणियों की मुक्ति तक बुद्धत्व प्राप्त करने से इन्कार कर दिया था)। अवलोकितेश्‍वर की मूर्ति प्रमुख रूप से गुफा संख्‍या 2, 41 और 90 में देखी जा सकती है जिनमें वे आठ बड़े संकटों अर्थात् पोतभंग, अग्निकांड, जंगली हाथी, शेर, सांप, चोर, कारावास, दानव से अपने भक्‍तों को बचने के लिए उपदेश दे रहे हैं। अवलोकितेश्‍वर की एक अन्‍य रोचक मूर्ति गुफा संख्‍या 41 में पाई गई है जिसकी चार भुजाएं और ग्‍यारह मुख हैं। यह अपनी किस्म की भारत में एकमात्र मूर्ति है। इस रूप की उपासना चीन, चीनी तुर्कीस्‍तान, कम्‍बोडिया और जापान में 7वीं - 8वीं सदी में लोकप्रिय थी। जातक कथाएं भी चित्रित पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए गुफा सं. 67 में दीपांकर जातक की कथाएं हैं।
कान्‍हेरी की बौद्ध संस्थापना में कुछ गुफाओं के फर्श पर निर्मित छोटे संरचनात्‍मक स्‍तूपों के रूप का एक रोचक साक्ष्‍य है। ऐसे स्‍तूप गुफा संख्‍या-33 और 38 आदि में भी मिले थे। इन स्‍तूपों में प्राय: मिट्टी के फलक काफी संख्‍या में मिले जो बौद्ध धर्म की 10वीं सदी ईसवी की लिपि में उत्‍कीर्णित किए गए थे। एक अन्‍य उल्‍लेखनीय विशेषता यह है कि एक अलग-थलग और निर्जन टीले पर समाधि मौजूद है। यहां पत्‍थर निर्मित और ईंट निर्मित संरचनात्‍मक स्‍तूप, प्रतिष्ठित संन्यासियों के जले हुए अवशेषों पर निर्मित पाए गए हैं। 
साभार : http://asi.nic.in/asi_hn_monu_tktd_maharashtra_upnagar.asp




Tuesday, May 26, 2015

गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

कोपिया
गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को केंद्र सरकार संवारेगी। इसके लिए प्रस्तावित बौद्ध परिपथ योजना में कोपिया को भी शामिल किया जाएगा। यहां गौतमबुद्ध ने घर छोड़ने के बाद कौपीन (राजसी वस्त्र) त्यागे थे। समीप में स्थित बखिरा पक्षी विहार की भी दशा सुधार इसे राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का खाका बना है। केंद्र सरकार ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए थीम बेस्ड टूरिजम सर्किट को बढ़ावा देने के लिए स्वेदश योजना लॉन्च की है। इसमें नॉर्थ-ईस्ट इंडिया सर्किट, बुद्धिस्ट सर्किट, हिमालयन सर्किट, कोस्टल सर्किट और कृष्णा सर्किट शामिल हैं। बुद्धिस्ट सर्किट और कृष्णा सर्किट का ज्यादातर हिस्सा यूपी से जुड़ा हुआ है। बुद्ध सर्किट में बिहार के बोधगया, राजगीर, वैशाली से लेकर यूपी में सारनाथ, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर से लेकर नेपाल का लुंबिनी शामिल है। बुद्ध के जन्म से लेकर ज्ञान प्राप्ति, उपदेश, कर्मस्थली से लेकर महापरिनिर्वाण तक सर्किट में कवर होते हैं। इस सर्किट में आने वाले बुद्ध से जुड़े उन स्थलों को भी विकसित करने की योजना है, जो अहम होते हुए भी उपेक्षित हैं।
पर्यटन मंत्रालय ने योजना को प्रभावी बनाने और मॉनिटरिंग बेहतर करने के लिए सांसदों को भी इसका हिस्सा बनाया है। पूर्वांचल से जुड़े बुद्ध के स्थलों के सांसद कुशीनगर से राजेश पाण्डेय, श्रावस्ती से दद्दन मिश्र, संतकबीर नगर से शरद त्रिपाठी, गोरखपुर से महंत योगी आदित्यनाथ भी इस कमिटी में शामिल हैं। पिछले दिनों केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री महेश शर्मा की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में उन स्थलों के चयन और विकास पर सहमति बनी जो बौद्ध सर्किट में छूटे हुए हैं। इसमें कोपिया को भी शामिल किया गया है।
संतकबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी का कहना है कि बौद्ध सर्किट की लगभग 125 करोड़ रुपये की योजना पर्यटन और रोजगार के लिहाज से अहम है। संतकबीर नगर मुख्यालय से मेहदावल रोड पर स्थित कोपिया आगे कपिलवस्तु से जुड़ता है। बौद्धकालीन टीले के साथ प्राचीन शिव मंदिर यहां मौजूद है। टीले के सरंक्षण के साथ यहां गेस्ट हाउस और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव बना है। बौद्ध सर्किट से जुड़ने के बाद श्रीलंका, जापान, चीन के बौद्ध अनुयायियों का यहां आवागमन होगा। साथ ही यहां से पास में स्थित लगभग 30 किमी के बखिरा झील और पक्षी विहार को विकसित कराकर दोनों स्थलों को इंटरलिंक किया जाएगा।
साभार : नवभारत टाइम्स, लखनऊ , दिनांक २३-५-२०१५

Tuesday, April 21, 2015

मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी धरोहरें

Buddha in mathura

देश-दुनिया में कृष्ण की जन्मभूमि के तौर पर पहचाने जाने वाले मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी कई धरोहरें मौजूद हैं। बताया जाता है कि टीलों पर बसे मथुरा में ही बुद्ध की पहली मूर्ति बनी थी। लाल बलुआ पत्थर से बनीं शैव, बौद्ध व जैन धर्मों से जुड़ी कई मूर्तियां यहां के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यहां कुषाण और गुप्तकालील मथुरा शैली की कलाकृतियों के साथ ही सिक्के, लघुचित्र, धातुमूर्ति, काष्ठ और स्थानीय कला के ढेरों दुर्लभ रत्न सहेज कर रखे गए हैं।

राजकीय संग्रहालय मथुरा के  सहायक निदेशक डॉ. एसपी सिंह, के अनुसार कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी। इसके बाद दूसरी जगहों पर भी बुद्ध की मूर्तियां बनने लगीं।

संग्रहालय के पूर्व विथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा के अनुसार शुरुआत में मूर्तिकला की सिर्फ दो ही शैलियां प्रचलित थीं, मथुरा मूर्ति कला और गांधार मूर्तिकला। बुद्ध से जुड़ी मूर्तियां भी सबसे पहले इन्हीं शैलियों में बनीं। ढाई फीट ऊंची और डेढ़ फीट चौड़ी बुद्ध की पहली मूर्ति 1860 में कटरा केशव देव मंदिर खुदाई के दौरान मिली।

1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खोदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थिज जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में संग्रहालय की स्थापना की। 1933 में संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया।

Thursday, March 14, 2013

मिन्ड्रोलिंग स्तूप, देहरादून- संस्मरण

 
 
 
 
 
 
 
मिन्डोलिग स्तूप , देहरादून जाने का मौका मुझे दो बार मिला । सन्‌ २००८ में सपरिवार और उसके उपरांत २०१० मे अकेले ही अपने पुत्र आयुष के साथ । स्तूप या चैत्य मुझे सम्मोहित करते रहते हैं । इसका शायद एक कारण इन स्तूपों से मिलने वाली सकरात्मक उर्जा है । कहते हैं कि इन स्तूपों का  प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कभी यह बौद्ध प्रार्थना स्थल होते थे। महापरिनर्वाण सूत्र में भगवान्‌ बुद्ध अपने शिष्य आनन्द से कहते हैं- "मेरी मृत्यु के उपारांत  मेरे अवशेषों पर उसी प्रकार का स्तूप बनाया जाये जिस प्रकार चक्रवर्ती राजाओं के अवशेषों पर बनते हैं- (दीघनिकाय- १४/५/११)। ” स्तूप समाधि, अवशेषों अथवा चिता पर स्मृति स्वरूप निर्मित किया गया अर्द्धाकार टीला होता है जिसे चैत्य भी कहा जाता है ।
अगर आप देहरादून जा रहे हों तो क्लेमेंट टाउन जाना न भूलें । प्राकृतिक परिवेश के मध्य स्थित देहरादून पर्यटकों  को कई तरह से आकर्षित करता है । अन्य कई आकर्षणॊं   के अलावा देहरादून के तिब्बती समुदाय ने सन्‌ १९६५ मे एक तिब्बती मठ की प्रतिकृति के रूप में बुद्ध मंदिर का निर्माण किया था । कहते हैं कि यह स्तूप एशिया का सबसे बडा स्तूप है । इसकी ऊँचाई १८५ फ़ुट और चौडाई १०० वर्ग फ़ुट है । यह स्तूप बौद्ध कला और स्थापत्य कला का एक शानदार उदाहरण है.
स्तूप के मुख पर मैत्र बुद्ध या शक्यमुनि भगवान बुद्ध को खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है । देखें नीचे  चित्र में
लगभग २ एकड वर्ग मे फ़ैले परिसर में प्रवेश करने पर हमें वीणा धारण किये हुये एक  मूर्ति का दर्शन होता है । एक बार तो हिंदू धर्म में आराध्य  माँ सरस्वती को देखकर विस्मय मे पड जाता हूँ लेकिन स्थानीय लामा  से मालूम पडता है कि यह तिब्बती कल्चर मे पूज्य माँ मञ्जुश्री का रुप है जो माँ सरस्वती के अनुरुप ज्ञान और सहचरी की देवी मानी जाती हैं । कहते हैं कि त्रिपिटक को कंठस्थ कराने के लिये भिक्खू जन अपने सह भिक्खूओं को माँ मञ्जुश्री के माध्यम का प्रयोग करते थे ।
अब हम स्तूप के अन्दर प्रवेश कर रहे हैं । इस इमारत में कुल पांच मंजिलें है ; स्तूप का  भूतल तिब्बती गुरु पद्मसंभव को समर्पित है , भूतल की दीवारॊ पर अति सुन्दर भित्तीय चित्र निर्मित हैं जो  गुरु पद्मसंभव की जीवन कहानी को दर्शाती है.
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इस इमारत का प्रथम तल शाक्यमुनि भगवान्‌ बुद्ध को समर्पित है , यहाँ भी दीवारों पर सुन्दर भित्तीय चित्रों और जातक कथाओं के माध्यम से बुद्ध की जीवनी को चित्रित किया गया
है ।
 
 
मंजिल का दूसरा तल शाइन कक्ष के रुप मे जाना जाता है । यह तल मिन्ड्रोलिंग मे महान शासकों को समर्पित है ।
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मिन्डोंलिग मन्दिर  के परिसर का   आकर्षण बुद्ध की विशाल  मूर्ति है ।यह मूर्ति लगभग 103 फुट ऊची है और लगभग   10 साल पहले इसका निर्माण किया गया था ।यह तिब्बती समुदाय  के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को  समर्पित है । यहाँ कई मोनेस्ट्री भी हैं जहाँ लगभग  पाँच सौ लामा अध्ययन करते हैं ।
 
मन्दिर परिसर का एक और आकर्षण प्रार्थना चक्र या prayer wheel है । इसका निर्माण स्तूप के निकट किया गया है । कहते हैं कि यह प्रार्थना का पहिया सभी प्राणियों , भिक्खूओं और धर्मालंबियों के लिये सकरात्मक उर्जा का संचय करता है ।
 
 
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तिब्बती समुदाय के लिये स्वतंत्र तिब्बत एक स्वप्न की तरह ही है । देहारदून के इस मिन्डोलिग स्तूप  परिसर में यह पीडा दीवारों पर अंकित देखी जा सकती है , देखें ऊपर चित्र में ।
उपर की दो मंजिले को देख न पाने का खेद मुझे दोनों बार रहा , शायद दोनों बार वह अवकाश का दिन था , संभव है  मौका फ़िर कभी लगे  :)

Sunday, June 3, 2012

बौद्ध परिपथ की राह दिखाएगा ‘द पाथ’

the path -buddhist circuit

बोधिवृक्ष

उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विभाग बौद्ध परिपथ के जरिए उड़ान भरने की तैयारी में है। थाइलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, जापान, चीन, बर्मा जैसे देशों में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों को प्रदेश में फैली बौद्ध विरासत की तरफ आकृष्ट करने के लिए विभाग ने इन देशों के दूतावासों से सीधे तार जोड़े हैं। इन देशों में मिली जबर्दस्त प्रतिक्रिया से पर्यटन विभाग के हौसले बुलंद हैं। माना जा रहा है कि पर्यटन विभाग की यह कोशिश प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। इस कोशिश में विभाग ने कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, संकीसा, कौशांबी व कुशीनगर में फैले बौद्ध स्थलों को द पाथ नामक खूबसूरत ब्रोशर में समेटा है। कहते हैं कि कपिलवस्तु, जहां गौतम बुद्ध का बचपन गुजरा। 40 वर्ष से अधिक समय बुद्ध ने गंगा के मैदानी इलाकों की यात्रा की। पर्यटन विभाग में ओएसडी भारती सिंह बताती हैं कि बुद्ध से जुड़े सभी स्थलों की जानकारी एक ही ब्रोशर में पर्यटकों को मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि थाइलैंड, कंबोडिया, जापान, चीन, बर्मा सभी देशों के दूतावासों ने इस प्रयास की सराहना की है। यही नहीं थाईलैंड दूतावास ने अपनी वेबसाइट में उत्तर प्रदेश पर्यटन का लिंक देने का वादा किया है, जिससे थाईलैंड की वेबसाइट एक्सेस करने वालों को बौद्ध परिपथ की जानकारी मिल सकेगी। पर्यटन विभाग वेबसाइट पर ई-ब्रोशर देगा।

साभार : ई जागरण