चार संस्कृतियों का संगम रहा है यह स्थान
30 एकड़ है नालंदा का क्षेत्रफल
99 मीटर लंबे और 33 मीटर चौड़ाई में हुई है अंबारां में खोदाई
चिनाब नदी के किनारे अखनूर के पास अंबारां में कभी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय और महाविहार से भी बड़ा महाविहार था। हालांकि, अभी इस पूरे इलाके की पूरी खोदाई होनी बाकी है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति बताती है कि यहां कई प्राचीन संस्कृतियों और सभ्यताओं के अवशेष छिपे हैं।
यह स्थान इसलिए भी खास है कि यहां हुई खोदाई में विशेष किस्म की एक मंजूषा (कास्केट) मिली है। इसमें कुछ रत्नों के साथ ही किसी मनुष्य के अवशेष मिले हैं। इसमें राख और अस्थियों के कुछ टुकड़े हैं।
करीब डेढ़ दशक पहले भारतीय पुरातत्व सर्वे (एएसआई) द्वारा यहां की गई खोदाई में चार प्रमुख संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। इनमें प्री कुषाण काल ईसा पूर्व पहली शताब्दी, ईसा पूर्व पहली से तीसरी शताब्दी तक कुषाण काल, चौथी-पांचवीं सदी गुप्त काल और गुप्त काल के बाद छठवीं से सातवीं शताब्दी के अवशेष मिले हैं।
इनमें टेराकोटा की मूर्तियां, मास्क कुछ लोहे के औजार और कई स्तूपों के अवशेष मिले हैं। अगस्त 2014 में इस स्थान के महत्व को देखते हुए बौद्ध गुरु दलाईलामा भी यहां की यात्रा कर चुके हैं।
साभार : http://www.amarujala.com/jammu-and-kashmir/ambarn-buddhist-monastery-was-bigger-than-nalanda-monastery
Friday, May 13, 2016
जम्मू कश्मीर के अंबारां में था नालंदा से भी बड़ा बौद्ध महाविहार
Tuesday, June 30, 2015
धनकर बौद्ध मठ हिमाचल प्रदेश
Photo credit : wikipedia
धनकर बौद्ध मठ
धनकर बौद्ध मठ धनकर गांव में है जो कि हिमाचल के स्पीति में समुद्र तल से 3890 मीटर की उंचाई पर स्थित है । यह जगह ताबो और काजा दो प्रसिद्ध जगहो के बीच में भी है । स्पीति और पिन नदी के संगम पर स्थित ये जगह दुनिया में बौद्ध धर्म के भी और ऐतिहासिक विरासतो में भी स्थान रखती है
यह जगह प्राचीन काल का इतिहास आंखो के सामने खोलकर रख देती है । 1000 फुट उंची एक ढांग पर बनाया गया और दो नदियो के संगम पर स्थित ये किसी भी बौद्ध मठ के लिये आदर्श जगह मानी जाती है । ढांग जो कि हमारे यहां पर देशी भाषा में बोला जाता है यानि की पहाड का एक छोटी सा भाग और कर या कार का मतलब किला कहा जाता है इसीलिये इसका नाम धनकर जो कि अब अपभ्रंश में हो गया है पडा ।
यहां से स्पीति और पिन दोनो नदियो का अदभुत दृश्य दिखायी देता है । गोम्पा के नीचे गांव बसा हुआ है । गोम्पा और किला आपस में जुडे हुए थे । हालांकि लगातार होते वायु एवं जल के क्षरण के कारण अब ये विलुप्त होने की कगार पर खडे हैं क्योंकि ये जगह लगातार गिर रही है
ताबो गोम्पा
इस गोम्पा की स्थापना रिंगचेन जैंगपो ने 996 ई. में की थी। जैंगपो एक प्रसिद्ध विद्धान थे। इस मठ की स्थापना स्पीती के पूर्वी क्षेत्र में एक शिक्षा केंद्र के रुप में की गई थी। वह इस गोम्पा को एक उच्चतर अध्ययन के केंद्र के रुप में विकसित करना चाहते थे। इस गोम्पा में पेंटिग्स तथा धर्मग्रंथों का विशाल संग्रह है। इस गोम्पा की दीवारों पर सुंदर चित्र बने हुए हैं। ये चित्र अजंता गुफा की चित्रों की याद दिलाता हैं। तुस्लांग यहां का मुख्य मठ है। इस गोम्पा में 60 धार्मिक शिक्षक रहते हैं। इस गोम्पा का निर्माण ईट और मिट्टी से किया गया है। यहां कश्मीरी शैली में बनी हुए भगवान बुद्ध की एक मूर्त्ति स्थापित है। 1996 ई. में इस गोम्पा ने अपने स्थापना के 1000 वर्ष पूरे किए। दलाई लामा यहां हर वर्ष जुलाई और अगस्त महीने में होने वाले कालचक्र प्रवर्तन समारोह का शुभारंभ करते हैं।
गुफा भित्ति
ताबो गोम्पा के सामने ही प्रकृति निर्मित गुफा है। इन गुफाओं में अब सिर्फ एक ही गुफा 'फो गोम्पा' सुरक्षित अवस्था में है। बाकी गुफाओं के संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग प्रयत्नशील है। इन गुफाओं की दीवारों पर चित्र भी बने हुए हैं। कुछ चित्र अभी भी सुरक्षित अवस्था में हैं। इन चित्रों में कुछ पशुओं के चित्र भी हैं। इन पशुओं में जंगली बकरा तथा तेंदुआ शामिल है।
Friday, June 26, 2015
कान्हेरी गुफाएं
photo credit : wikipedia
प्राचीन अभिलेखों में कान्हाशैल, कृष्णगिरी, कान्हागिरी के नाम से उल्लिखित कान्हेरी (19° 13’ उत्तर, 72° 55’ पू.) मुम्बई के उत्तर में स्थित है और यह बौद्धों का प्रमुख केंद्र था। कान्हेरी सलसेत्ती द्वीप में स्थित है और थाणे से 6 मील की दूरी पर है। गुफाओं का उत्खनन ज्वालामुखीय संकोणाश्म निक्षेप में किया गया है। कई स्थानों पर इन पहाडियों की ऊंचाई औसत समुद्र तल से 1550’ है। कान्हेरी की ख्याति इस बात से है कि यहां एक ही पहाड़ी में सर्वाधिक संख्या में गुफाओं का उत्खनन हुआ है। इसके पश्चिम में बोरीविली रेलवे स्टेशन है और खाड़ी के पार अरब सागर है।
कान्हेरी इसलिए फूला-फला क्योंकि यह सोपारा (सुरपरक, द सुपारा आफ ग्रीक; अरबी लेखकों का सुबारा; उत्तरी कोंकण की प्राचीन राजधानी) एक विकसित पत्तन- कल्याण, चेमुला, ग्रीक भूगोलविदों का सामिल्ला, ट्राम्बे के द्वीप पर शिलाहारों का चेमुला जैसे प्राचीन समुद्री पत्तन शहरों के निकट था; वस्य, शायद वसाई अथवा बस्सीन, श्री स्तानर अथवा थाणा, घोड़ाबंदर जैसी अन्य नजदीकी प्राचीन बसावटें थी। प्राय: ऐसा विश्वास किया जाता है कि बौद्ध धर्म सर्वप्रथम सोपार स्थित अपरंथ (पश्चिमी भारत) में आया जो कान्हेरी के अत्यंत निकट है। इन गुफाओं का उत्खनन तीसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य में किया गया था और ये 11 वीं शताब्दी ईसवी तक इस्तेमाल में रहीं। इनका उल्लेख 16 वीं शताब्दी में पुर्तगालियों जैसे आंरभिक आगंतुकों तथा यूरोप के अन्य यात्रियों और समुद्री यात्रियों द्वारा किया गया।
यहां पाए गए अनगिनत संदाता अभिलेखों में प्राचीन नगरों जैसे सुपारक (सोपारा), नासिका (नासिक), चेमुली (चेमुला); कल्याण (कल्याण), धेनुकाकट (धान्यकटक, आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में आधुनिक अमरावती) का उल्लेख मिलता है। संदाताओं में राजपरिवारों के सदस्यों से लेकर आम आदमी तक समाज के सभी वर्गो के व्यक्ति शामिल थे। अभिलेखों में वर्णित प्रतिष्ठित राजपरिवारों में गौतमीपुत्र सातकर्णी (लगभग 106-130 ई.); वसिष्ठीपुत्र श्री पुलुमावी (लगभग 130 से 158 ई.) श्री यज्ञ सातकर्णी (लगभग 172 से 201 ई.); मधारीपुत्र शकसेना (लगभग तीसरी शताब्दी ई. के अंत में); सातवाहन राजवंश के शासक जिनकी प्राचीन राजधानी प्रतिष्ठान थी (आधुनिक पैठन, जिला औरंगाबाद); राष्ट्रकूट राजवंश के अमोघवर्ष जिसका काल 853 ई. था, आदि शामिल हैं।
कान्हेरी में हुए उत्खनन इस प्रकार के हैं :- (i) चैत्यगृह, बौद्ध समुदाय का पूजा स्थल (ii) विहार या बौद्ध विहार- इनमें एक या अनेक प्रकोष्ठ होते हैं जहां बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। (iii) पौड़ियां अथवा जल कुंड, जिनका उत्खनन वर्षा जल संचयन के लिए बुद्धिमत्तापूर्वक किया गया था ताकि इस जल को ग्रीष्म काल के दौरान प्रयोग में लाया जा सके और (iv) चट्टानों को काटकर बनाई गई बेंचे और आसान।
कान्हेरी में चट्टान काट कर बनाई गई गुफाओं के उत्खनन का आंरभ संयोगवश अपरंथ में बौद्ध धर्म के आगमन से जुड़ा हुआ है। ये गुफाएं आम तौर पर छोटी हैं और इनमें एक प्रकोष्ठ है जिसमें आगे की ओर स्तंभ युक्त बरामदा है जिस तक सीढ़ीयों का मार्ग जाता है। इन गुफाओं में जल संचयन के लिए निरपवाद रूप से एक जलकुंड है। आंरभिक उत्खनन बहुत छोटे और सीधे-सादे थे। उनमें कोई आलंकारिक तत्व नहीं थे। स्तंभ सपाट वर्गाकार या अष्टकोणीय थे और इनमें आधार फ़लक नहीं हैं जिनका प्रचलन बाद में शुरु हुआ। कान्हेरी में जो सर्वाधिक विशिष्ट उत्खनन हुआ, वह गुफा संख्या-3 का उत्खनन है जो कि एक चैत्यगृह है जिसका उत्खनन यज्ञ सातकर्णी (लगभग) 172 से 201 ई.) के शासन काल के दौरान किया गया था। यह चैत्यगृह भारत के सबसे बड़े चैत्यागृहों में से एक है। इससे बड़ा चैत्यगृह केवल करला का है जो पुणे जिले में है। यह चैत्यगृह करला के चैत्यगृह से बहुत अधिक मेल खाता है। निर्माण योजना की दृष्टि से इसमें एक आयताकार हॉल है जो गजपृष्ठीय है। एक बरामदा है और आगे की ओर एक खुला प्रांगण है। हॉल की लंबाई 26.36 मीटर, चौड़ाई 13.6 मीटर और ऊंचाई 12.9 मीटर है। 24 स्तंभों की एक पंक्ति हॉल को एक केंद्रीय मध्य भाग और पार्श्व गलियारों में विभक्त करती है। मध्य भाग की छत ढ़ोलाकार महराबी है जबकि गलियारे सपाट हैं। मध्य भाग की मेहराबी छत में काष्ठ की कड़ियों के प्रावधान के प्रमाण हैं जो अब प्रचलन में नहीं है। हॉल के स्तंभ एक जैसे नहीं हैं और विभिन्न शैलियों और आकारों के हैं और इनमें एक रूपता नहीं है। हॉल के अर्धवृत्तकक्ष में एक स्तूप निर्मित है जिसका व्यास 4.9 मीटर और ऊंचाई 6.7 मीटर है। हॉल का अग्रभाग दो बंधनों के दो समूहों के साथ तीन द्वारों द्वारा वेधित है। प्रत्येक समूह को द्वारों के बीच आयताकार आलों में तराशा गया है। अलंकरण रहित एक विशाल चैत्य खिड़की प्रकाश की व्यवस्था के लिए बनाई गई थी। पार्श्वभित्तियों पर वरद मुद्रा में खड़े बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं तथा अन्य बोधिसत्व प्रतिमाओं को बारीकी से उकेरा गया है। ये मूर्तियां बाद में जोड़ी गई हैं और इनका काल लगभग पांचवीं से छठी शताब्दी ई. है।
चैत्यगृह के निकट कभी दो संरचनात्मक स्तूप हुआ करते थे। एक स्तूप पत्थर का था जिसमें तांबे के दो कलश मिले थे जिनमें राख थी। एक छोटा सोने का बॉक्स है जिसमें कपड़े का एक टुकड़ा, एक चांदी का बॉक्स, एक माणिक, एक मोती, सोने के कुछ टुकड़े, तांबे की दो प्लेटें थी जिनमें से एक सन् 324 की थी। दूसरा स्तूप ईंटों का बना था जिसमें से एक उत्कीर्णित पत्थर मिला जिसकी लिपि पाँचवीं से छठी शताब्दी ई. की है।
गुफा संख्या-1 एक अधूरा निर्मित चैत्यगृह है जिसमें मूल रूप से एक स्तंभ युक्त हॉल के अलावा, दो मंजिला बरामदा और एक द्वारमंडप बनाने की योजना थी। यह गुफा पांचवीं से छठी शताब्दी की है क्योंकि संपीडित कुशन या अमलक शीर्ष वाले स्तंभ आम तौर पर उसी अवधि के प्रतीत होते हैं।
दरबार हॉल’ के नाम से ज्ञात गुफा संख्या-11 में सामने की ओर बरामदे सहित एक विशाल हॉल है। इस हॉल की पृष्ठभित्ति में मंदिर है और दोनों ओर प्रकोष्ठ हैं। हॉल का फर्श, दो पत्थर की कम ऊंची बेंचे एलोरा की गुफा सं. 5 से मेल खाती हैं। बुद्ध की धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा मंदिर के सौंदर्य को चार चांद लगा देती है। गुफा में विभिन्न कालों के 4 अभिलेख हैं- एक शक 775 (सन् 853) का है जो राष्ट्रकूट वंश के राजा अमोघवर्ष और उसके सामंत शिलाहार राजकुमार, कपार्दिन के शासन काल का है। इस अभिलेख में पुस्तकों की खरीद और क्षतियों की मरम्मत के लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न उपहारों और निधियों के दान को लेखबद्ध किया गया है।
यहां की मूर्ति कला गुफा संख्या 2, 3, 41, 67, 89, 90 आदि में देखी जा सकती हैं। बुद्ध की छवि या मुद्रा या तो खड़े हुए रूप में है या बैठे हुए रूप में। बैठी हुई मुद्रा की मूर्तियों में कुछ मामलों में बोधिसत्व भी उनकी बगल में बैठे हुए हैं और बहुत ही विरले मामलों में उनके संगी- साथी भी उनके साथ आसीन हैं। यहां बुद्ध के अलावा अवलोकितेश्वर की मूर्ति भी विद्यमान है और जिसे यहां महत्व प्राप्त है। (अवलोकितेश्वर ने सभी प्राणियों की मुक्ति तक बुद्धत्व प्राप्त करने से इन्कार कर दिया था)। अवलोकितेश्वर की मूर्ति प्रमुख रूप से गुफा संख्या 2, 41 और 90 में देखी जा सकती है जिनमें वे आठ बड़े संकटों अर्थात् पोतभंग, अग्निकांड, जंगली हाथी, शेर, सांप, चोर, कारावास, दानव से अपने भक्तों को बचने के लिए उपदेश दे रहे हैं। अवलोकितेश्वर की एक अन्य रोचक मूर्ति गुफा संख्या 41 में पाई गई है जिसकी चार भुजाएं और ग्यारह मुख हैं। यह अपनी किस्म की भारत में एकमात्र मूर्ति है। इस रूप की उपासना चीन, चीनी तुर्कीस्तान, कम्बोडिया और जापान में 7वीं - 8वीं सदी में लोकप्रिय थी। जातक कथाएं भी चित्रित पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए गुफा सं. 67 में दीपांकर जातक की कथाएं हैं।
कान्हेरी की बौद्ध संस्थापना में कुछ गुफाओं के फर्श पर निर्मित छोटे संरचनात्मक स्तूपों के रूप का एक रोचक साक्ष्य है। ऐसे स्तूप गुफा संख्या-33 और 38 आदि में भी मिले थे। इन स्तूपों में प्राय: मिट्टी के फलक काफी संख्या में मिले जो बौद्ध धर्म की 10वीं सदी ईसवी की लिपि में उत्कीर्णित किए गए थे। एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह है कि एक अलग-थलग और निर्जन टीले पर समाधि मौजूद है। यहां पत्थर निर्मित और ईंट निर्मित संरचनात्मक स्तूप, प्रतिष्ठित संन्यासियों के जले हुए अवशेषों पर निर्मित पाए गए हैं।
साभार : http://asi.nic.in/asi_hn_monu_tktd_maharashtra_upnagar.asp
Monday, June 15, 2015
अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल बाद फिर 'मुस्कुराए' बुद्ध
काबुल
अफगानिस्तान में बुद्ध फिर ‘मुस्कराए’ हैं! अफगानिस्तान के बामियान में 14 साल पहले महात्मा बुद्ध की जिन दो विशाल मूर्तियों को तालिबान ने तबाह कर दिया था, ठीक उसी जगह एक बार फिर 3-D टेक्नीक से बुद्ध की वैसी ही मूर्तियां बनाई गईं। चीन के एक दंपती ने इस परियोजना को पूरा किया। दंपती ने काबुल के उत्तर-पश्चिम में 230 किलोमीटर पर स्थित हजराजात की बामियान घाटी में चट्टान की खाली गुफाओं में 3D लेजर लाइट प्रॉजेक्शन टेक्नीक का प्रयोग किया। दंपती जॉनसन यू और लियान हू छठी शताब्दी में बनाई गई दो प्रतिमाओं को ढहाए जाने से दुखी थे और उन्होंने इस परियोजना को पूरा करने का फैसला किया।
उन्होंने चट्टान में खाली गुफाओं में केवल एक रात के लिए प्रतिमाएं वापस लाने के लिए अफगान सरकार और यूनेस्को से अनुमति ली। सात जून को हुए इस समारोह मे प्रॉजेक्टरों की मदद से पूर्व की प्रतिमाओं के आकार की होलोग्राफिक प्रतिमाएं प्रदर्शित की गईं।
महात्मा बुद्ध की मूर्तियां 115 फीट और 174 फीट लंबी थीं और ये 1500 साल से ज्यादा समय तक खड़ी रहीं। मार्च 2001 में तालिबान ने इन्हें उड़ा दिया था। यूनेस्को ने इन्हें वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तहत सूचीबद्ध किया हुआ था।
साभार : http://tinyurl.com/qawotdo
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Chinese Duo Use 3D Technology to ‘Resurrect’ Bamiyan Buddhas in Afghanistan
Kabul: Fourteen years after the Taliban blew up the world-famous Buddhas of Bamiyan, the giant statues were resurrected with 3D light projection technology in the empty cavities where they once stood.
The project is the initiative of a Chinese couple who used the technology to give new life to the statues in the cliff off the Bamiyan Valley by projecting Buddha's virtual images. The statues were located in Hazarajat, 230 kilometers northwest of Kabul.
The couple – Janson Yu and Liyan Hu – was saddened by the destruction of the two 16thcentury statues. They obtained permissions from Afghanistan and the UNESCO to bring the statues back for just one night.
The event, on June 7, saw projectors displaying huge holographic images of the exact size of the precious monuments that were damaged in the Taliban attacks. The display was accompanied by music.
"The projections were not widely publicized, but over 150 people came to see the spectacle. Crowds remained well into the night and some people played music while others looked on," a journalist who witnessed the show was quoted as saying by The Atlantic.
The statues of standing Buddhas – measuring 115 feet and 174 feet respectively – were carved out of sandstone cliffs. They survived for more than 1,500 years. But the Taliban blew them up in 2001, as part of its campaign to remove all non-Islamic art from Afghanistan.
The statues were among the most famous cultural landmarks of the region, and the site was listed by UNESCO as a World Heritage Site, along with the archaeological remains of the Bamiyan Valley.
Sunday, April 26, 2015
टाइगर नेस्ट बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री ,भूटान
टाइगर'स नेस्ट बुद्धिस्ट भूटान में पारो वैली में एक सीधे पहाड़ की चोटी पर स्थित है। और यह मोनेस्ट्री समुद्र तल से 3,000 मीटर ऊपर है ,यह मोनेस्ट्री को पहली बार 1692 में बनाया गया था,कहा ऐसा जाता है यह वह स्थान पर बनी है जहा बौद्ध गुरु पद्मसंभव ने 8 वीं सदी में तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन तक ध्यान किया था और वही स्थान पर यह मोनेस्ट्री है। भूटान में यह मान्यता है की हर भूटानी व्यक्ति को कम से कम एक बार इस स्थान पर आना ही चाहिए ,बौद्ध गुरु पद्मसंभव को ही भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार का श्रेय जाता है
साभार : http://buddhkathaiye.blogspot.in/
Tuesday, April 21, 2015
मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी धरोहरें
देश-दुनिया में कृष्ण की जन्मभूमि के तौर पर पहचाने जाने वाले मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी कई धरोहरें मौजूद हैं। बताया जाता है कि टीलों पर बसे मथुरा में ही बुद्ध की पहली मूर्ति बनी थी। लाल बलुआ पत्थर से बनीं शैव, बौद्ध व जैन धर्मों से जुड़ी कई मूर्तियां यहां के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यहां कुषाण और गुप्तकालील मथुरा शैली की कलाकृतियों के साथ ही सिक्के, लघुचित्र, धातुमूर्ति, काष्ठ और स्थानीय कला के ढेरों दुर्लभ रत्न सहेज कर रखे गए हैं।
राजकीय संग्रहालय मथुरा के सहायक निदेशक डॉ. एसपी सिंह, के अनुसार कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी। इसके बाद दूसरी जगहों पर भी बुद्ध की मूर्तियां बनने लगीं।
संग्रहालय के पूर्व विथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा के अनुसार शुरुआत में मूर्तिकला की सिर्फ दो ही शैलियां प्रचलित थीं, मथुरा मूर्ति कला और गांधार मूर्तिकला। बुद्ध से जुड़ी मूर्तियां भी सबसे पहले इन्हीं शैलियों में बनीं। ढाई फीट ऊंची और डेढ़ फीट चौड़ी बुद्ध की पहली मूर्ति 1860 में कटरा केशव देव मंदिर खुदाई के दौरान मिली।
1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खोदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थिज जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में संग्रहालय की स्थापना की। 1933 में संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया।
Tuesday, October 22, 2013
झारखंड का अनूठा बौद्ध मंदिर
झारखंड के प्राचीन स्मारक हमेशा से यहां के निवासियों के आकर्षण का केन्द्र रहे हैं । चाहे वो धार्मिक प्रकार के स्मारक हों या नागरिक भवन हों, सभी यहां के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। रामगढ-बोकारो मार्ग पर गोला के समीप सड़क की दक्षिण दिशा में एक विशालकाय शिखरयुक्त मंदिर सदियों से खड़ा झारखंड का इतिहास कहने को आतुर-सा दिखता है। स्थानीय लोगों में खीरी मठ के नाम से प्रसिद्ध यह भव्य संरचना वस्तुत: एक बौद्ध मंदिर है। लगभग अस्सी फीट ऊंचा यह मंदिर सप्तरत योजना के अनुरूप बनाया गया है तथा इसे देखने पर एकदम से अहसास होता है कि यह बोध गया के विश्व प्रसिद्ध मंदिर की प्रतिकृति है। इस मंदिर का निर्माण सीधे सीधे समतल जमीन पर किया गया है तथा भूमि पर इसका आकार लगभग चालीस फीट वर्गाकार है । इसमें पूरब और पश्चिम दिशा में श्रद्धालुओं के मंदिर में सहज प्रवेश के लिये लगभग पांच फीट उंचाई के दो द्वार बने हुये हैं। शिखर के समीप दा खिडकियों जैसी संरचनायें भी बनाई गई हैं जिससे सूरज की रौशनी मंदिर के अंदर लगातार आती रहती है और अंधेरा नहीं होता । अंदर गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं दिखती और अब यह मंदिर अत्यंत उपेक्षित अवस्था में जीवन के संभवत: अंतिम दिन गिन रहा है। पूर्वी प्रवेश द्वार के ठीक उपर लगभग चालीस फीट की उंचाई पर पत्थर के एक पैनल में बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में बैठी मूर्ति लगाई गर्इ्र है और पास में ही दो मछलियों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। पश्चिम द्वार के उपर सिर्फ मछलियों की आकृतियां ही दिखती हैं। इसका निर्माण ईंट और पत्थर से मिश्रित रूप में किया गया है। शिखर के अंतिम छोर पर बौद्ध स्थापत्य के अनुरूप तीन स्तर की छत्रवली भी बनाई गई है। यह मंदिर तथा पास ही में बौद्ध धर्म की छिन्न मस्तिका परम्परा के मंदिर की उपस्थिति यह आभास देती है कि यह पूरा क्षेत्र एक समय बौद्ध धर्म के प्रभाव में अवश्य था। हजारीबाग क्षेत्र में भी गांव गांव में बौद्ध धर्म से संबंधित असंख्य प्राचीन मूर्तिया देखने को मिल जाती हैं। स्थापत्य शैली के आधार पर इसे लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी का माना जा सकता है। आप जब भी इधर से गुजरें, रूक कर इसके दर्शन अवश्य कर लें ,क्योंकि सरकार की अनवरत उपेक्षा डोलता हुआ स्थापत्य का यह अद्भुत नमूना ज्यादा दिन चल सके, ऐसा नहीं प्रतीत होता। झारखंड के प्राचीन स्मारक हमेशा से यहां के निवासियों के आकर्षण का केन्द्र रहे हैं । चाहे वो धार्मिक प्रकार के स्मारक हों या नागरिक भवन हों, सभी यहां के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। रामगढ-बोकारो मार्ग पर गोला के समीप सड़क की दक्षिण दिशा में एक विशालकाय शिखरयुक्त मंदिर सदियों से खड़ा झारखंड का इतिहास कहने को आतुर-सा दिखता है। स्थानीय लोगों में खीरी मठ के नाम से प्रसिद्ध यह भव्य संरचना वस्तुत: एक बौद्ध मंदिर है। लगभग अस्सी फीट ऊंचा यह मंदिर सप्तरत योजना के अनुरूप बनाया गया है तथा इसे देखने पर एकदम से अहसास होता है कि यह बोध गया के विश्व प्रसिद्ध मंदिर की प्रतिकृति है। इस मंदिर का निर्माण सीधे सीधे समतल जमीन पर किया गया है तथा भूमि पर इसका आकार लगभग चालीस फीट वर्गाकार है । इसमें पूरब और पश्चिम दिशा में श्रद्धालुओं के मंदिर में सहज प्रवेश के लिये लगभग पांच फीट उंचाई के दो द्वार बने हुये हैं। शिखर के समीप दा खिड़कियों जैसी संरचनायें भी बनाई गई हैं जिससे सूरज की रौशनी मंदिर के अंदर लगातार आती रहती है और अंधेरा नहीं होता । अंदर गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं दिखती और अब यह मंदिर अत्यंत उपेक्षित अवस्था में जीवन के संभवत: अंतिम दिन गिन रहा है। पूर्वी प्रवेश द्वार के ठीक उपर लगभग चालीस फीट की उंचाई पर पत्थर के एक पैनल में बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में बैठी मूर्ति लगाई गर्इ्र है और पास में ही दो मछलियों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। पश्चिम द्वार के उपर सिर्फ मछलियों की आकृतियां ही दिखती हैं। इसका निर्माण ईंट और पत्थर से मिश्रित रूप में किया गया है। शिखर के अंतिम छोर पर बौद्ध स्थापत्य के अनुरूप तीन स्तर की छत्रवली भी बनाई गई है। यह मेंिदर तथा पास ही में बौद्ध धर्म की छिन्न मस्तिका परम्परा के मंदिर की उपस्थिति यह आभास देती है कि यह पूरा क्षेत्र एक समय बौद्ध धर्म के प्रभाव में अवश्य था। हजारीबाग क्षेत्र में भी गांव गांव में बौद्ध धर्म से संबंधित असंख्य प्राचीन मूर्तिया देखने को मिल जाती हैं। स्थापत्य शैली के आधार पर इसे लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी का माना जा सकता है। आप जब भी इधर से गुजरें, रूक कर इसके दर्शन अवश्य कर लें ,क्योंकि सरकार की अनवरत उपेक्षा डोलता हुआ स्थापत्य का यह अद्भुत नमूना ज्यादा दिन चल सके, ऐसा नहीं प्रतीत होता।
स्त्रोत : दैनिक जागरण
