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Tuesday, April 21, 2015

मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी धरोहरें

Buddha in mathura

देश-दुनिया में कृष्ण की जन्मभूमि के तौर पर पहचाने जाने वाले मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी कई धरोहरें मौजूद हैं। बताया जाता है कि टीलों पर बसे मथुरा में ही बुद्ध की पहली मूर्ति बनी थी। लाल बलुआ पत्थर से बनीं शैव, बौद्ध व जैन धर्मों से जुड़ी कई मूर्तियां यहां के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यहां कुषाण और गुप्तकालील मथुरा शैली की कलाकृतियों के साथ ही सिक्के, लघुचित्र, धातुमूर्ति, काष्ठ और स्थानीय कला के ढेरों दुर्लभ रत्न सहेज कर रखे गए हैं।

राजकीय संग्रहालय मथुरा के  सहायक निदेशक डॉ. एसपी सिंह, के अनुसार कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी। इसके बाद दूसरी जगहों पर भी बुद्ध की मूर्तियां बनने लगीं।

संग्रहालय के पूर्व विथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा के अनुसार शुरुआत में मूर्तिकला की सिर्फ दो ही शैलियां प्रचलित थीं, मथुरा मूर्ति कला और गांधार मूर्तिकला। बुद्ध से जुड़ी मूर्तियां भी सबसे पहले इन्हीं शैलियों में बनीं। ढाई फीट ऊंची और डेढ़ फीट चौड़ी बुद्ध की पहली मूर्ति 1860 में कटरा केशव देव मंदिर खुदाई के दौरान मिली।

1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खोदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थिज जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में संग्रहालय की स्थापना की। 1933 में संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया।

Tuesday, October 21, 2014

थेरी गाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ–श्री रजनीश कुमार

महात्मा बुद्ध के द्वारा स्त्रियों का संघ में प्रवेश की अनुमति एक युगांतकारी घटना थी . प्रव्रज्या प्राप्त स्त्रियाँ थेरी कहलाती थीं , जिन्होंने कविता में अपनी गाथाएँ लिखीं . थेरी गाथाएँ  तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति  की समझ के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं . रजनीश कुमार बौद्ध कालीन इस सामाजिक क्रान्ति की व्याख्या कर रहे हैं इस आलेख में. स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक में प्रकाशित आलेख का यह एक बड़ा हिस्सा है  ।

भगवान बुद्ध  ने संघ में जातिवाद या लिंग भेद को कोई स्थान नहीं दिया। उनकी दृष्टि में सभी लोग समान थे, भगवान बुद्ध ने चुल्लवग्ग में स्पष्ट कहा था, ‘ हे! भिक्षुओं! जिस प्रकार महानदियाँ, महासमुद्र में  मिलकर अपने पहले नाम गोत्र को छोड़ देती हैं ,अर्थात महासमुद्र के ही नाम से ही प्रसिद्ध होती हैं ऐसे ही भिक्षुओ! विभिन्न जाति वर्णों के लोग तथागत द्वारा बतलाये गये। धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर पूर्व के नाम गोत्र को छोड़ देते हैं।  अर्थात् दीक्षा लेकर यह भूल जाते हैं कि हमारा अमुक वर्ण था अमुक वंश था।‘
तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफी निम्नस्तर की थी, उन्हें  सम्मान प्राप्त न था, उसको देखते हुये भिक्षुणी संघ की स्थापना एक बड़ा ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय था.  भिक्षुणी संघ की स्थापना कराने में आनन्द का विशेष योगदान रहा- उन्होंने ही भगवान बुद्ध से महिलाओं को संघ में दीक्षित करने के लिए प्रार्थना की थी और तर्क सहित प्रेरित भी किया था।
आनन्द भगवान बुद्ध  के चचेरे भाई थे। इनकी माता का नाम विदेह कुमारी था तथा पिता का नाम अमितोदन था- जो शुद्धोदन  भगवान बुद्ध  के पिता से छोटे थे। बुद्धत्व  प्राप्ति के दूसरे साल भिक्षु आनन्द की प्रव्रज्या हुयी थी। आनन्द पच्चीस वर्ष तक छाया की तरह भगवान बुद्ध  की सेवा करते रहे। आनन्द को चैरासी हजार धर्मस्कंध याद थे। पहली बौद्ध  संगीति में ध्म्म का ज्ञाता होने के कारण उन्हें ‘धम्मधर’ की उपाधि से विभूषित किया गया था .  इन्होंने इस संगीति में मुख्य रूप से भाग लेकर ध्म्म का संगायन किया।
भिक्षुणी-संघ की स्थापना का विवरण  चुल्लवग्ग में मिलता है वह महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक है-‘उस समय भगवान बुद्ध  शाक्यों के देश में कपिलवस्तु के न्योग्राधराम में विहार कर रहे थे। तब महाप्रजापतीगौतमी ने भगवान के सम्मुख जाकर निवेदन पूर्वक याचना की , ‘ भन्ते! अच्छा हो यदि स्त्रियाँ भी तथागत के दिखाये धर्म - विनय में प्रव्रज्या पायें.’                 

गौतमी ने तीन बार प्रार्थना की, भगवान बुद्ध  ने तीनों बार प्रार्थना अस्वीकार कर दी और वहाँ से वे वैशाली चले गये और वैशाली जाकर महावन की कूटागार शाला में विहार करने लगे। कुछ समय पश्चात् महाप्रजापती गौतमी अपना सिर मुड़वाकर पाँच सौ शाक्य स्त्रियों को साथ लेकर  भगवान बुद्ध के पास वैशाली आ गयीं। यात्रा करते-करते उनके पैर फूल गये थे, शरीर धूल से भर गया था और काफी दुःखी व उदास लग रही थीं। जब यहाँ स्थविर आनन्द ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो महाप्रजापती गौतमी ने आनन्द को बताया कि ‘स्त्रिायों को बौद्ध  संघ में प्रव्रज्या देने के लिये भगवान आज्ञा नहीं दे रहे,  इसलिये मैं उदास हूँ। तब आनन्द ने भगवान बुद्ध  के पास जाकर स्त्रिायों को संघ में प्रव्रजित करने के लिये तीन बार आग्रह किया ,परंतु भगवान ने तीनों बार अस्वीकार कर दिया। तब आनन्द ने दूसरी प्रकार से भगवान से अनुज्ञा माँगते हुये कहा कि ‘भन्ते! क्या तथागत प्रवेदित धर्म   घर से वेघर,  प्रव्रजित हो स्त्रिायाँ स्रोतापत्ति फल,  सक्रदागामिफल, अनागामि फल तथा अर्हत्व का साक्षात् कर सकती हैं?  भगवान ने कहा, ‘साक्षात् कर सकती हैं, आनन्द !
तब आनन्द ने पुनः कहा, ‘ भन्ते! यदि तथागत-प्रवेदित धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर स्त्रियाँ साक्षात् कर सकने योग्य हैं। तो भन्ते! जो अभिभाविका हैं,पोषिका हैं, वह भगवान की मौसी महाप्रजापति गौतमी बहुत उपकार करने वाली हैं, उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद भगवान का पालन पोषण किया है। भन्ते! अच्छा हो यदि महिलाओं को प्रव्रज्या की आज्ञा मिले।‘ और तब भगवान बुद्ध ने उत्तरदायित्व पूर्ण नियमों के साथ महाप्रजापतीगौतमी व अन्य पाँच सौ शाक्य महिलाओं को प्रव्रज्या की अनुमति दे दी।
थेरीगाथा-
थेरीगाथाओं में 73 भिक्षुणियों की 522 गाथाओं  का संग्रह किया गया है, जो कि 16 भागों में विभक्त हैं। कुछ  गाथाओं का संग्रह सामूहिक रूप में किया गया है। ये सभी भिक्षुणियाँ बुद्ध कालीन थीं और उनकी शिष्यायें भी थीं। अत्यन्त संगीतात्मक भाग में आत्म अभिव्यंजना पूर्ण गीत काव्य शैली के  आधर पर भिक्षुणियों ने अपने जीवन अनुभव को बताया है.  नैतिक सच्चाई और भावनाओं की गहनता की विशेषता ही उसका काव्यगत सौन्दर्य है। भिक्षुणियाँ निराशावदी नहीं है। निर्वाण की परम शक्ति का वे खुशी से वर्णन करती हैं- ‘अहो सुखं ति सुखो झायामी ‘ ‘अहो! मैं कितनी सुखी हूँ! मैं कितने सुख से ध्यान करती हूँ’ यह उद्गार आत्मध्वनि को प्रदर्शित करते हैं। बार-बार उनका यही प्रसन्न उद्गार होता है, ‘सीतिभूतम्हि निब्बुता’ अर्थात ‘ निर्वाण को प्राप्त कर मैं परम शांत हो गई,  निर्वाण की परम शांति का मैंने साक्षात्कार कर लिया है।‘  थेरीगाथा के स्वरूप को आम्रपाली की गाथाओं  में सन्निहित उद्गारों से समझा जा सकता है-‘ पुष्पराशि से सुगन्ध्ति मेरे केश सुगन्ध् से परिपूर्ण मंजूषा के  समान महकते थे। परंतु आज इनमें खरगोश के  रोमों की सी दुर्गन्ध् आती है। सत्यवादी बुद्ध  के  वचन कभी मिथ्या नहीं होते।‘ इस प्रकार अन्य उत्कृष्ट उद्गारों के  साथ आम्रपाली ने अपनी वृद्धावस्था में अपने शरीर के  प्रति विचार प्रकट किये हैं। इसी तरह के  सभी उदाहरण साहित्यिक दृष्टि से काव्य के  सर्वोत्तम उदाहरण हैं। थेरीगाथा के  संबंध् में  डा.रायस डैविड्स का कथन है कि ‘थेरीगाथा की बहुत सी गाथायें न केवल उनके  बाह्य रूप की दृष्टि से अत्यंत मनोरम हैं बल्कि वे उस उँची आध्यात्मिक साध्ना की भी गवाही देती हैं, जिसका आदर्श बौद्ध  जीवन से  सम्बन्ध् था। जिन स्त्रियों ने भिक्षुणी की दीक्षा ली , उनमें से अधिकांश उँची आध्यात्मिक पहुँच के  लिए और नैतिक जीवन के  लिए प्रसिद्ध  हुईं। कुछ स्त्रियाँ तो न केवल पुरुषों की शिक्षिका तक बन गईं ध,र्म की बारीकियों को समझा सकने वाली, बल्कि उन्होंने उस चिरन्तन शन्ति को भी प्राप्त कर लिया था, जो आध्यात्मिक उड़ान और नैतिक साध्ना के  ही पफलस्वरूप प्राप्त की जा सकती है।‘
थेरीगाथा ग्रंथ की महत्ता इस संबंध् में और अधिक  बढ़ जाती है , जब हमें उसमें इतिहास के  उस कालखण्ड की विशेष जानकारी मिल जाती है, जहाँ भगवान बुद्ध  ने एक ऐसे समय में महिलाओं को आध्यात्म का रास्ता बताया, जब समाज में महिलाओं की भूमिका काफी सीमित व निम्न स्तर की रही हो ,व विश्व की रचना व प्रगति में महिलाओं को भागी मानने के  बजाय पुरुषों ने उन्हें बाधक  के  रूप में देखा हो, तथा ग्रंथ द्वारा यह भी जानकारी उपलब्ध् होती है कि स्त्रियाँ किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं होती और वे बहन, माँ, पत्नी के  अतिरिक्त एक कुशल शिक्षिका व उपदेशकर्ता भी बन सकती हैं। थेरी शुक्ला द्वारा राजगृह निवासियों को ध्म्म उपदेश देना , थेरी नन्दउत्तरा द्वारा निग्र्रन्थ साधुओं के  साथ तर्क  करना, सोणा भिक्षुणी को स्वयं भगवान बुद्ध  ने भिक्षुणी – साधिकाओं में अग्रणी उद्घोषित किया था, पटाचारा भिक्षुणी द्वारा अपनी भिक्षुणी-शिष्याओं को कुशलता से उपदेशित करना, किसा गौतमी तथा अन्य और बहुत सारी भिक्षुणियों का समाज में अग्रणी भूमिका निभाने का साक्ष्य मिलता है। जो ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
संघ में सभी वर्णों की महिलायें दीक्षित हुई थीं, इससे यह स्पष्ट होता है भगवान बुद्ध  ने सभी के लिये समान रूप से संघ में प्रवेश को बल दिया था। थेरीगाथा में संदर्भ मिलता है कि भिन्न-भिन्न जाति, कुल ,धर्म से प्रव्रजित होने वाली महिलाओं में ब्राह्मण कुल  से- कुल अट्ठारह थेरी  मैत्रिका, दंतिका, सोमा, भद्राकापिलायिनी,नंदउत्तरा, मुक्ता-१ , मुक्ता-2, उत्तमा-2, मित्तकाली, सवुफला,चन्द्रा,गुप्ता, चाला,उपचाला, शीर्षोपचाला, रोहिणी,सुन्दरी,शुभा-2 सम्मिलित थीं। क्षत्रिय वुफल से दो थेरीयाँ, आतरा और सिंहा थीं। पूर्णा, तिष्या-1,तिष्या 2, अभिरूपानन्दा,  मित्रा, सुंदरीनंदा,महाप्रजापतीगौतमी, ये सभी शाक्य कुल  से सात-थेरी संबंध् रखती थी,वैश्य कुल  की सात-थेरी- महिलाओं में ध्म्मदिन्ना, उत्तमा-1, भद्राकुण्डलवेफशा, पटाचारा, सुजाता, अनुपमा, दासी सम्मिलित थीं। जबकि राजवंशों की चार-थेरी- महिलाओं में सुमना-2 ,वृद्ध आलविका ,शैला, क्षेमा, सुमेध आदि थीं। अड्ढकासी और विमला वैश्यायें थीं तो पद्मावती और आम्रपाली जैसी गणिकाओं ने भी संघ में दीक्षा ली थी. इसके अतिरिक्त उच्चकुल -प्रतिष्ठित व कुलीन घरों की महिलाओं की संख्या भी काफी थी यदि पूर्णिका दासी की पुत्री थी तो चापा बहेलिया सरदार की  और शुभा-1 सुनार की पुत्री थी। सारांश यह है कि अनेक जाति-कुलों से आकर महिलाओं ने बुद्ध शासन में दीक्षा ग्रहण की थी, यह एक क्रांन्तिकारी सफलता थी कि महिलाऐं मुक्ति की खोज में स्पष्ट रूप से शामिल थीं,  दूसरे शब्दों में भगवान बुद्ध  व उनके  शिष्य आनन्द- जैसे कुछ  अन्य शिष्यों का यह स्पष्ट मानना था कि जाति की तरह लिंग भी किसी व्यक्ति द्वारा दुःख से छुटकारा पाने के  लक्ष्य में बाधा नहीं हो सकता।
सामाजिक जीवन में ‘स्त्री जीवन  की यदि बात की जाये तो ग्रंथ में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विषय में संपूर्ण जानकारी मिलती है,  थेरीगाथा में सम्मिलित गाथाओं के आधर पर तत्कालीन स्त्री  की स्थिति, घर परिवार की जानकारी, दास-प्रथा, वैश्यावृत्ति,पुनर्विवाह,जाति-वर्ग,अश्पृश्यता आदि को लेकर समाज में क्या मान्यतायें थी, क्या रूढि़याँ थी, सभी का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। महिलाएँ घर से बाहर निकल कर उपदेशकर्ता गुरु के रूप में स्वीकारी गयीं ,जो संघ कि में आकर संभव हो सका। उनको संपूर्ण स्वतंत्राता के साथ पूर्ण विकास का माहौल लगभग शत प्रतिशत संघ में मिला, पर यदि बुद्ध  से पूर्व और बुद्ध  काल के सामाजिक जीवन के चिह्न  तलाशें जाएँ तो थेरीगाथा में बहुतायत में मिलते हैं जिनका सहज अनुमान किये गये विश्लेषण के आधर पर लगाया जा सकता है-

गृहकार्यो और उनके कारण उत्पन्न-दुखों से उद्विग्न होकर मुक्ता, गुप्ता और शुभा जैसी स्त्रियों ने घर छोड़कर सन्यास ले लिया था। इसके अतिरिक्त हमें थेरीगाथा से पता चलता है कि इस समय पर दास प्रथा लागू थी। धनिकों  की औरतें अपने घरों का काम नहीं करती थीं,  उनके घर का काम दासियाँ करती थीं। पुण्णिका ऐसी ही दासी थी, वह अपनी गाथा में कहती है- ‘मैं पनहारिन थी। सदा पानी भरना ही मेरा काम था। स्वामिनियों के दण्ड के भय से,उनकी क्रोध् भरी गलियों से पीडि़त होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता था।‘ 

थेरी सुमंगल माता अपनी गाथा में कहती हैं ‘ सुमुत्तिका सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स। अहिरिको मे छत्तकं वा पि, उक्खलिका में देड्डुभं वा ति।।  ‘अहो! मैं मुक्त नारी हूँ। मेरी मुक्ति कितनी ध्न्य है! पहले मैं मूसल ले कर धान कूटा करती थी, आज मैं उससे मुक्त हो गई हूँ। मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे ,खाना पकाने ,  बरतन धोने के कामों से मैं मुक्त हो गई हूँ , मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों की छतरी से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।‘
मुत्ता थेरी की अपनी गाथा इस प्रकार है- ‘सुमुत्ता साधुमुत्ताहि, तीहि खुज्जेहि मुत्तिया, उदुक्खलेन मुसलेन, पतिना खुज्जकेन च। मुत्ताम्हि जातिमरणा, भवनेत्तिसमूहता ति।। ‘मैं अच्छी तरह से विमुक्त हो गई हूँ। तीन टेढ़ी चीजों से ओखली से, मूसल से और अपने कुबड़े स्वामी से, मैं अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ। मैं आज.....जाति और मरण से भी मुक्त हो गई हूँ। मेरी संसार-तृष्णा ही समाप्त हो गई है।‘
गुत्ता थेरी  ने पुत्र और धन  संग्रह आदि भौतिक ऐश्वर्यों को त्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण की थी- गुत्ते यदत्थं पब्बज्जा, हित्वा पुत्तं वसुं पियं.’
सुनार की बेटी सुभा थेरी  ने क्या-क्या छोड़ा, गाथा में उत्तर इस प्रकार है- ‘मैं अपने सभी भाई-बंधु, सम्बन्धी  जनों,दास, सेवक, ग्राम, विस्तृत और समृदद्ध  खेत, जीवन की सभी रमणीय प्रमोदकारी वस्तुएँ और विपुल सम्पत्ति आदि सब को छोड़ कर प्रव्रजित हो गई।‘
संघा थेरी  इस मामले में मनोवैज्ञानिक बात कहती हुई वर्णन करती है- ‘प्रव्रज्या ले कर मैंने घर छोड़ा, अपनी प्रिय सन्तान को छोड़ा, अपने प्रिय पशुओं को छोड़ा। राग और द्वेष को छोड़ा, अविद्या को छोड़कर विरक्त हुई। तृष्णा को समूल नष्ट कर अब मैंने निर्वाण की परम शक्ति का अनुभव किया है। निर्वाण का अनुभव करके मैं परम शान्त हो गई हूँ।' थेरी इसिदासी की गाथाओं में असमान समाज-व्यवस्था और परिवार में अपने ही पति द्वारा तिरस्कृत-स्त्री  की कथा मिलती है। वह निर्दोष व सदाचारिणी रूप में रहकर दासी के समान सबकी सेवा करती रही। जिस पुरुष की उसने सेवा की उसी ने उपेक्षा की और तिरस्कृत किया और अपमानपूर्वक त्याग भी दिया था। इसी वितृष्णा से पूर्ण इसिदासी ने उसी को छोड़कर सभी वासनाओं पर मुक्ति पा ली थी,  और उसी अन्याय से क्षुब्ध् होकर उसने उपसम्पदा ग्रहण की और भिक्षुणी-संघ में प्रवेश लिया था। अतः नारी की समाज में क्या स्थिति थी कुछ हद तक इसका साक्षात् प्रतिबिम्ब इसिदासीथेरी की गाथाओं में वर्णित है।
सोमा थेरी श्यामा ने अपनी प्रिय सखी की मृत्यु के कारण शोक  मग्न होकर प्रव्रज्या ली और चित्त की शान्ति प्राप्त करने में सपफल रही। उब्बिरी थेरीगाथा में उब्बिरी के रूप में उस स्त्री  की करुण स्वर है जो पसेनदि राजा की राजमहिषी होने के उपरान्त भी अपनी कन्या की मृत्यु के कारण निरन्तर श्मशान में विलाप करती थी। पुत्री  से पुत्रा की श्रेष्ठता तो युगीन सामाजिक-सन्दर्भों की अपनी विशेषता थी। तथागत के उपदेश से उब्बिरी ने अपनी शोक-विमुक्ति की उद्घोषणा की थी। कठोर-साध्नारत चीरवरधरिणी भिक्षुणियों में प्रधान  मानी जाने वाली किसागोतमी थेरी की गाथा में दुःख का अनुभव करने वाली सहस्रों उन अनेक स्त्रिायों की मानसिक-वेदनाओं की यातना भरी है जो सदैव दुखमय-जीवन की यात्रा में ही अपनी नियति देखती है।
शाक्यवंशीय सुन्दरी नन्दा अपने परिवारजनों के प्रव्रजित होने के कारण भिक्षुणी-संघ में सम्मिलित हुई थी। तथागत ने जिस मानव-मुक्ति का द्वार खोला, उसके प्रभाव से उसके सभी परिवार जन बौद्ध  ध्म्म में दीक्षित हो बुद्ध  के अनुयायी बन गए। तब नन्दा ने सोचा- ‘इस सांसारिक जीवन का मेरे लिए भी क्या महत्व है!  बाद में भगवान ने जिस रूप की अनित्यता का उपदेश दिया था उसके कारण उसका स्वयं के प्रति भी आकर्षण नहीं रहा। जीवन की अनित्यता और दुःख के कारण नन्दा का चित्त वैराग्य में स्थित हुआ और देह-सौन्दर्य से विमुख उस नन्दा ने अपनी ही प्रज्ञा से शाश्वत-सत्य का अवलोकन किया व निर्वाण प्राप्त किया।
पटाचाराथेरी की मर्मान्तक वेदना कठोर से कठोर चित्त वाले के हृदय को विचलित करने वाली वेदना की कथा है। धनी  श्रेष्ठि-परिवार की कन्या पटाचारा अपने दुःखों को सहती अकेली विक्षिप्त सी घूमती रही थी। सब कुछ अनित्य है इस तथ्य का बोध् होने पर पटाचारा की चित्त-साध्ना निर्वाणोन्मुख दीपशिखा की भांति पूर्ण निवृत्त रूप में उसके उद्गारों में व्यंजित हुई है। महाप्रजापतीगौतमी भारतीय नारी-जीवन के इतिहास में युगान्तरकारी चेतना की अग्रदूत बनीं। अनेक जाति-संस्कार से विमुक्त होकर प्रजापति द्वारा भगवान् बुद्ध  के दर्शनोपरान्त भाव-विभोर होकर की गयी वन्दना निश्चय ही पालि-साहित्य का उत्कृष्ट अंश है। अतः सर्वोत्तम व कालजयी ऐसे ही उद्गार अन्य थेरियों ने भी व्यक्त किये हैं। बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा व्यक्त की गई सभी गाथाएँ मानव इतिहास की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियाँ हैं।
भगवान बुदद्ध स्त्रिायों को संघ में ऐतिहासिक प्रव्रज्या देकर, शिक्षा के अध्किार की दृष्टि से उनके ज्ञान प्राप्ति में सहयोगी बने थे। अतः स्त्रियों के सम्पूर्ण उत्थान पतन के लिये भगवान बुद्ध  से पूर्व काल से लेकर आधुनिक काल तक की स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है। आदिकाल से लेकर इतिहास के सभी कालखडों में विभिन्न रूपों में स्त्री  की स्थिति में बहुत परिवर्तन हुये हैं ,समाज में उसे कभी तो मानवीय तथा कभी अमानवीय दृष्टियों से देखा गया। जिनका सम्पूर्ण  प्रभाव स्त्री की शिक्षा, विवाह, परिवार, संपत्ति और सत्ता संबंधी  अध्किारों पर पड़ा है। इन अधिकारों के प्रकाश में किसी भी समाज में स्त्री  की सामान्य स्थिति को परखा जा सकता है। लेकिन समाज में स्त्री  का स्थान और स्वरूप जानने के लिये उसकी दीर्घ जीवन परम्पराओं को देखना जरूरी है। और इसके लिये सभी उपलब्ध् ऐतिहासिक ग्रंथों , दस्तावेजों और साहित्यिक रचनाओं को ही आधर माना जा सकता है। थेरीगाथा ग्रन्थ  व सम्पूर्ण पालि साहित्य इसी क्रम की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

साभार : http://www.streekaal.com/2014/07/blog-post_14.html

रजनीश कुमार

रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता है

Wednesday, June 19, 2013

बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दी

बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दी
  • डा। तुलसी राम
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बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य ( चित्र को साफ़ देखने के लिये चित्र पर किल्क करें )
विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हैं। पिछले दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा 'इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।
मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।` बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि सत्य को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि 'सत्य हो` तभी मानो। अब तक इस धरती पर किसी दार्शनिक या ईश्वर ने अपने बारे में ऐसा नहीं कहा।
ढाई हजार वर्ष पूर्व जब बुद्ध के विचार विकसित हुए उस समय भारत में कुल ६२ विचारधाराओं के मत केन्द्र प्रचलित थे, जिनमें ऊंच-नीच पर आधारित वैदिक विचारधारा सर्वोपरि थी। इस तथ्य की ज्वलंत पुष्टि संघ परिवार द्वारा शासित गुजरात के नवीं कक्षा के 'सामाजिक अध्ययन` नाम पाठ्यक्रम से होती है, जिसमें कहा गया है : 'वर्ण-व्यवस्था आर्यों द्वारा मानव जाति को दिया गया एक अमूल्य उपहार है।` यदि सही मायनों में देखा जाए तो इसी ऊंची-नीच पर आधारित वर्ण व्यवस्था के विरोध में तथागत् बुद्ध का दर्शन विकसित हुआ। यही कारण था कि आर्य संस्कृति की रक्षा करने का नारा देने वाले तत्वों ने हर सदी में बौद्ध धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र जारी रखा। इसी षड्यंत्र के तहत आज का 'संघ परिवार` स्कूली पाठ्यक्रमों में आर्य संस्कृति का गुणगान करते हुए एक तरफ वर्ण व्यवस्था को न्यायोचित ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म को रोकने का प्रयास कर रहा है।
यदि विश्व स्तर पर देखा जाय तो बुद्ध के समय में चीन में कनफ्यूसियस विचार तथा ईरान में जोरोस्टर या जर्तुस्ती विचारधारा का बोलबाला था। बाकी दुनिया ग्रीस को छोड़कर लगभग विचार शून्य ही थी। उस समय भारत सैकड़ों रियासतों में बंटा हुआ था तथा हर एक दूसरे के खून के प्यासे थे। स्वयं बुद्ध के पिता शक्यवंशीय शुद्दोधन की राजधानी कपिलवस्तु हमेशा से पासवर्ती राज्य कोसल के निशाने पर थी। अंततोगत्वा कोसल के राजा विदुदाभ ने शाक्यों को बर्बाद कर दिया तथा बुद्ध की प्रिय स्थली श्रावस्ती के राजा प्रसेनजित् को अपने ही बेटे ने पदच्युत कर दिया। प्रसेनजित बुद्ध के प्रशंसक मगध सम्राट अजातशत्रु से सहायता के लिए भागा, किन्तु रास्ते में ही मर गया। एक तरफ ऐसा अशांत वातावरण तो दूसरी ओर जिसे आर्य संस्कृति कहा जाता है, उसके तहत वर्ण व्यवस्था-जन्य ऊंच-नीच का भेदभाव, वैदिक कर्मकाण्डों के चलते हजारों पशुओं, जिनमें गाय भी शामिल थी, की बलि, नरबलि, घातक हथियारधारी भगवानों का भय, पुनर्जन्म का मिथकीय आविष्कार, आत्मा का अमरत्व, अंधविश्वास तथा युद्धोन्माद आदि का बोलबाला था। तथागत् बुद्ध के दर्शन ने इन्हीं मान्यताओं के विरूद्ध शीघ्र ही एक विश्वव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। हैरत सिर्फ इस बात पर होती है कि बुद्ध का यह महान दर्शन चीन, जापान, श्रीलंका, वर्मा, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, मध्य एशिया, साइबेरिया समेत लगभग समस्त एशिया, तथा दुनिया के अन्य लाखों लोगों के बीच आज भी विकासमान है, किन्तु सदियों पहले अपनी जन्मभूमि भारत में क्यों विलुप्त हो गया? हकीकत यह है कि आर्य संस्कृति के पालकों ने भारत में बौद्ध धर्म की हत्या कर दी। आज बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से पीड़ित होकर आर्य-पूजक लोग उसे हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग सिद्ध करने का विश्वव्यापी अभियान चला रहे हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म एक हैं, तो फिर विश्व भर के लोगों ने बौद्ध धर्म के बदले हिन्दू धर्म को क्‍यों नहीं अपनाया? जाहिर है, वर्ण व्यवस्था तथा ऊंच-नीच के कारण हिन्दू धर्म कहीं और नहीं फैला। विदेशों में यह सिर्फ प्रवासी भारतीयों तक सीमित है। एक समय था जब दुनिया की एक-तिहाई आबादी बौद्ध थी। अनेक हिन्दू इतिहासकार यह दावा पेश करते हैं कि अफ्रीकी देश मारीशस हिन्दू देश है किन्तु वहां वर्ण व्यवस्था नहीं है। इस संदर्भ में सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि करीब १७० वर्ष पहले अंग्रेजों ने भारत से हजारों दलितों तथा अति पिछड़ी जातियों के लोगों को मारीशस में मजदूरी कराने के लिए जबरन भेजा था, जो वहीं बस गये तथा बाद में वे स्वयं वहां के शासक बन बैठे। असलियत यह है कि वहां आर्य संस्कृति के पोषक, विशेष रूप से ब्राह्मण तथा क्षत्रिय नहीं पहुंच सके, इसलिए मारीशस में वर्ण व्यवस्था उस रूप में नहीं जा सकी, जिस रूप में वह अभी भी भारत में है।
जहां तक बौद्ध धर्म का सवाल है, यह अन्य धर्मों की तरह नहीं है। बुद्ध ने इसे हमेशा 'धम्म` कहा। पाली में 'धम्म` का अर्थ सिद्धांत होता है, किन्तु संस्कृत में गलत अनुवाद करके इसे 'धर्म` बना दिया गया। बुद्ध के दार्शनिक विचार मूल रूप से आर्य-सांस्कृतिक मान्यताओं के विरूद्ध ईश्वर को न मानने, आत्मा के अमरत्व को इनकार करने, किसी ग्रंथ को स्वत: प्रमाण न मानने तथा जीवन को सिर्फ इसी शरीर तक सीमित मानने से संबद्ध थे। एक बार आत्मा तथा पुनर्जन्म पर दो भिक्षुओं के बीच चल रही गहन बहस में हस्तक्षेप करते हुए बुद्ध ने कहा कि जिस किसी भी वस्तु का जन्म होता है, उसका विनाश अवश्यंभावी है, किन्तु उस रूप में नहीं, उसका रूप बदल जाता है, जिसे बुद्ध ने 'प्रतीत्य-समुत्पाद` कहा तथा जिसमें आत्मा के लिए कोई स्थान नहीं है। इसे और भी साफ करते हुए बुद्ध ने कहा कि किसी भी जीवधारी की मृत्यु के साथ ही उसका हमेशा के लिए व्यक्तिगत विलोप हो जाता है, जिसे निर्वाण कहते हैं, अर्थात् पुनर्जन्म से संपूर्ण मुक्ति। यही प्रतीत्य-समुत्पाद बुद्ध के दर्शन की एकमात्र कुंजी है, जिसके कारण दुनिया के अनेक वैज्ञानिक दार्शनिकों ने उन्हें विश्व का पहला वैज्ञानिक बताया।
बुद्ध इस दुनिया को ईश्वर की कृति नहीं मानते थे। उनका तर्क यह था कि घड़ा मिट्टी का रूपान्तर है अर्थात् मिट्टी का गुण घड़े में चला गया। इसी तरह यदि शिशु पैदा होता है, तो वह अपने मां-बाप का रूपान्तर हो जाता है, न कि किसी ईश्वर की कृति का। मनुष्य अत्याचारी तथा दु:खदायी होता है, इसलिए मानव समाज का प्रचण्ड बहुमत दु:खी रहता है। यदि मनुष्य ईश्वर का रूपान्तर है तो ईश्वर स्वयं अत्याचारी एवं दु:खदायी है। यदि ईश्वर वैसा नहीं है तो मनुष्य उसका रूपान्तर या कृति भी नहीं है। इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि में बुद्ध ने बौद्धगया में महाज्ञान प्राप्त करके दु:ख है, दु:ख का कारण है, दु:ख का निवारण है तथा दु:ख से मुक्ति है, का रहस्य ढूंढ निकाला। उनके दार्शनिक विचार शीघ्र ही अन्य विचारों पर हावी होकर उनके जीवनकाल में ही सारी दुनिया में फैल गये। बुद्ध के समकालीन राजा बिम्बसार, अजातशत्रु तथा प्रसेनजित ने बौद्ध धर्म के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया, किन्तु ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने इसे विश्वव्यापी बनाने का चमत्कारिक काम किया। अशोक के प्रयासों से श्रीलंका से लेकर यूनान तक बौद्ध धर्म की गूंज सुनायी देने लगी।
इस तरह हम देखते हैं कि ईसा पूर्व की अर्द्ध सहस्राब्दी बौद्ध धर्म के उत्तरोत्तर विकास की अवधि थी। इस बीच पुष्यमित्र तथा मिहिरकुल दो ऐसे शासक हुए, जिन्होंने बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने की कोशिश की। पुष्यमित्र ने अंतिम मोर्य बौद्ध सम्राट बृहद्रथ को ई.पू. १८७ में मार कर शुंगवंश की स्थापना की थी। पुष्यमित्र बृहद्रथ का सेनापति था। सोलवहीं सदी के महान तिब्बती बौद्ध भिक्षु तथा इतिहासकार तारानाथ के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का घनघोर दुश्मन था तथा उसने मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब के जालंधर तक सैकड़ों बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के साथ-साथ अनेक विद्वान भिक्षुओं की हत्या कर दी थी। पुष्यमित्र ने पाटलीपुत्र के विख्यात मठ कुक्कुटराम को भी ध्वस्त करने की कोशिश की थी, किन्तु अंदर से सिंह के दहाड़ने जैसी आवाज सुनकर वह भाग गया। पुष्यमित्र ने वैदिक कर्मकाण्डों तथा ब्राह्मणों के वर्चस्व को पुनर्जीवित करने का अथक प्रयास किया था। इसी तरह हूण शासक मिहिरकुल ने छठी ईसवी में कश्मीर से लेकर गान्धार तक बौद्ध मठों की भयंकर तोड़फोड़ की। प्रख्यात् चीनी बौद्ध यात्री, ह्उावेन सांग के अनुसार मिहिरकुल ने १६०० मठों को ध्वस्त कर दिया था। वह भारत आकर शिवपूजक बन गया था।
ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज येरुशलम तक पहुंच चुकी थी। यही कारण है कि बुद्ध की करुणा तथा शांति की झलक बाइबिल में साफ दिखायी देती है। अनेक यूरोपी विद्वानों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बुद्ध का ईसा मसीह पर गहरा प्रभाव पड़ा था, विशेष रूप से उनका चर्च-सिस्टम बौद्ध मठों का प्रतिरूप है। ईसा की प्रथम सहस्राब्दी में बौद्ध धर्म का दार्शनिक विकास बड़ी तेजी से हुआ। इसे बौद्ध दार्शनिकों की सहस्राब्दी कहा जाए, तो अनुचित न होगा। पहली सदी से लेकर हजारहवीं सदी के बीच अश्वघोष, नागार्जुन, आर्यदेव, मैत्रेय, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग, धर्मपाल, शीलभद्र, धर्मकीर्ति, देवेन्द्रबोधि, शाक्यबोधि, शान्त रक्षित, कमलशील, कल्याणरक्षित, धर्मोत्तराचार्य, मुक्तकुंभ, रत्नकीर्ति, शंकरानंद, शुभकार गुप्त तथा मोक्षकार गुप्त आदि अनेक बौद्ध दार्शनिक पैदा हुए। अश्वघोष ने प्रथम सदी में वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध 'वज्रसूची` (हीरे की सुई) नामक संस्कृत काव्य लिख कर ब्राह्मणवाद की नींव हिला दी थी। उक्त बौद्ध दार्शनिकों में नागार्जुन, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग तथा धर्मकीर्ति ने बौद्ध तर्कशा (लॉजिक) को वैज्ञानिक ऊंचाईयों तक पहुंचाते हुए हिन्दू तर्कशास्त्रियों को मूक बना दिया था। 'माध्यमक` लिख कर नागार्जुन 'शून्यवाद` के प्रवर्तक बने। वे बुद्ध के अनात्मवाद को शून्यवाद कहते थे। वे पूंजीवाद के भी प्रबल विरोधी थे। उन्होंने अपने समकालीन सत्वाहन राजा यज्ञश्री को एक पत्र लिखकर सारे धन को भिक्षुओं, गरीबों, मित्रों तथा ब्राह्मणों को दान में बांट देने का आग्रह किया था। नागार्जुन दूसरी सदी के दार्शनिक थे। चौथी सदी के पेशावर निवासी असंग अद्वैत विज्ञानवाद के प्रवर्तक थे। उनके छोटे भाई वसुबन्धु थे, जिन्होंने अयोध्या में रहकर बौद्ध त्रिपिटक के सार के रूप में 'अभिधम्म कोश` की रचना की थी। दिग्नाग पांचवीं सदी के दार्शनिक थे। वे बौद्ध तर्कशा तथा ज्ञान मीमांसा के सबसे महान प्रवर्तक थे। रूस तथा विश्व के अति विशिष्ट बौद्ध दार्शनिक श्चेर्वात्सकी ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है कि यदि दिग्नाग जैसे दार्शनिकों ने बौद्ध लॉजिक को विकसति नहीं किया होता, तो तथाकथित 'हिन्दू लॉजिक` कभी पैदा ही नहीं होता, क्योंकि हिन्दू दार्शनिकों ने बौद्धों की तर्कसंगत तर्कणा के विरोध में अपनी लॉजिक विकसित की थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सातवीं-आठवीं सदी के दो अति महत्वपूर्ण हिन्दू दार्शनिक कुमारिल भट्ट तथा आदि शंकराचार्य का सारा दर्शन बौद्धों के खण्डन-मण्डन पर आधारित है। बौद्धों की दार्शनिक परंपरा में सातवीं सदी के सबसे महान दार्शनिक धर्मकीर्ति थे, जिन्होंने दिग्नाग के प्रमाण शा को आगे विकसित करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'प्रमाणवार्तिकम्` की रचना की। श्चेर्वात्स्की ने धर्मकीर्ति की तुलना जर्मन दार्शनिक कान्ट से की है। धर्मकीर्ति को तत्कालीन नालन्दा बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति तथा उद्भट विद्वान भिक्षु धर्मपाल ने भिक्षु बनाया था। धर्मकीर्ति ने 'न्याय बिन्दु` लिखकर न्याय दर्शन को सर्वाधिक संपन्न बताया तथा उन्होंने अपने समय के तमाम ब्राह्मणों को शाा़र्थ के लिए ललकारा था और जिसने भी उनके साथ शाा़र्थ किया, हार गया। इन हारे हुए वैदिक विद्वानों में कुमारिल भट्ट भी शामिल थे, जो शर्त के अनुसार नालंदा में बौद्ध भिक्षु बन कर धर्मपाल के शिष्य बन गये थे। किन्तु बाद में कुमारिल भट्ट की विजय को वैदिक कर्मकांडों की विजय समझा गया। अत: उन्होंने बौद्ध धर्म को नष्ट करने का हिंसक अभियान चलाया। कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म को 'फटा दूध` कहकर उस पर यह आरोप लगाया कि उसके चक्कर में आकर विभिन्न राजाओं ने वैदिक कर्मकांडों को नष्ट कर दिया था। हकीकत यह है कि बौद्ध धर्म ने हिंसा के बल पर कभी कोई परिवर्तन नहीं किया, बल्कि तर्कसंगत मस्तिष्क परिवर्तन के मध्यम से वैदिक कुरीतियों को बदला था, जबकि कुमारिल भट्ट ने स्वयं विभिन्न राजाओं को उकसा कर बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने का अभियान चलाया था, जिसमें आदि शंकराचार्य भी शामिल हो गये थे। शंकराचार्य दर्शन के प्रचारक स्वामी अपूर्नानन्द जी द्वारा मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखित तथा रामकृष्ण मठ द्वारा अधिकारिक रूप से प्रकाशित शंकराचार्य की आत्मकथा 'अचार्य शंकर` में प्रस्तुत यह तथ्य विचारणीय है, जिसमें कहा गया है : 'कुमारिल की इस विजय ने समस्त भारत के लोगों में वैदिक धर्म के नवजागरण की सृष्टि की। उस समय के मगध राज आदित्य सेन ने उस विजय को गौरवान्वित करने के लिए विशेष ठाट-बाट से कुमारिल भट्ट को प्रधान पुरोहित रख कर एक विराट अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया। गौड़ देश (बंगाल) के हिन्दू राजा शशांक नरेन्द्र वर्धन वैदिक धर्म के अनुरागी थे। उन्होंने मौका पाकर हिन्दू धर्म के विजय अभियान के यज्ञ में बोध गया के जिस बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर तथागत् ने सिद्धि प्राप्त की थी, उस बोधिद्रुम को काट डाला और बौद्ध मंदिर पर अधिकार स्थापित कर बुद्धदेव की मूर्ति को दिवाल उठा कर बंद कर दिया। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने तीन बार उस वृक्ष के मूल को खोद कर उसे समूल नष्ट कर दिया। कुमारिल भट्ट ने उत्तर भारत में सर्वत्र विजयी होकर बुद्ध और जैन धर्मों के प्राधान्य को नष्ट किया।`
कुमारिल भट्ट ने 'श्लोक वार्तिका`, 'तंत्र वार्तिका` तथा 'तुप्तिका` नामक ग्रंथों को लिखकर वैदिक कर्मकाण्डों को चमत्कारित किया। उनके बौद्ध विनाश के अधूरे कार्य को शंकराचार्य ने पूरा किया। शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन को खण्डित करने के लिए अपनी प्रसिद्ध रचना 'ब्रह्मसूत्र भाष्य` को दिग्नाग के विज्ञानवाद, धर्मकीर्ति के बौद्ध न्याय तथा नागार्जुन के माध्ययक (शून्यवाद) के विरुद्ध खड़ा किया। शंकराचार्य ने बड़ी चालाकी से बौद्ध धर्म के विरूद्ध अभियान चलाया था, यहां तक कि जनता में भ्रम पैदा करने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तक 'दसावतान स्न्नानेत` में बुद्ध वन्दना में एक श्लोक भी लिखा, जिसमें बुद्ध को सबसे बड़े योगी के रूप में प्रस्तुत करते हुए ध्यानमग्न अवस्था में उनके नेत्रों के नासिका पर उतरने का उन्होंने जिक्र किया है। शंकराचार्य ने बुद्ध को अपने मस्तिष्क का परिचालक भी बताया है, किन्तु दूसरी तरफ उन्होंने बौद्ध स्थलियों को नेस्तोनाबूद करने का अभियान भी चलाया। प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी तथा इतिहासकार विश्वंभर नाथ पाण्डे ने लिखा है कि बौद्ध विरोधी राजा 'सुधन्वा की सेना के आगे-आगे शंरकाचार्य चलते थे। स्मरण रहे कि उज्जैन के राजा सुधन्वा ने अनगिनत मठों को धवस्त कराया था। जिन चार पीठों की स्थापना शंकराचार्य ने की, वहां पुराने बौद्ध मठ हुआ करते थे, आचार्य शंकर का तथाकथित 'विश्व विजय` अभियान कुछ और न होकर वास्तव में बौद्धों के ऊपर हिंसक विजय का अभियान था। शंकर ने इसे 'विश्व विजय` इस लिए कहा था, क्योंकि उनके समय (आठवीं सदी) तक बौद्ध धर्म विश्व के दर्जनों देशों में फैल चुका था। इस तरह हम देखते हैं कि पहली सहस्राब्दी जहां एक ओर बौद्ध दर्शन के विकास के रूप में उमड़ कर सामने आयी, वहीं दूसरी ओर कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य ने उसके विनाश की ठोस नींव भी डाली। इस तरह पांचवीं सदी से दसवीं सदी के बीच वर्ण व्यवस्था पर आधारित ब्राह्मणवाद या आधुनिक हिन्दूत्व की नींव पड़ी। यह वही समय था जब वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराने वाले अनेक हिन्दू ग्रंथों की रचना की गयी, जिनमें याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति, गीता, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशा, वाल्मीकि रामायण तथा सारे पुराण आदि शामिल थे। इन सारे ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराते हुए बौद्ध दर्शन पर हमला किया गया है, किन्तु अक्सर बुद्ध का जिक्र किए बिना। एक भी हिन्दू ग्रंथ ऐसा नहीं है, जिसमें वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय न कहा गया हो। हिन्दू लोग इन ग्रंथों को ईश्वर के मुख से निकला अनन्तकालीन कहकर रहस्यमयी सिद्ध करने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु एक अकाट्य सत्य यह है कि चूंकि बौद्ध दर्शनिकों ने हमेशा वर्ण व्यवस्था का विरोध किया, इसलिए उसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ब्राह्मणों ने नये ग्रंथों की रचना करके उन्हें 'इश्वरीय` बना दिया, जबकि ये सारे ग्रंथ बुद्ध के बाद के हैं। वर्ण व्यवस्था को दैवी ठहराने वाले इन तमाम हिन्दू ग्रंथों के रचनाकाल को निर्धारित करने की यह सबसे बड़ी कुंजी है। अन्यथा, इन ग्रंथों में बौद्धों का जिक्र कैसे आता? गीता का अठारहवां अध्याय सिर्फ वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय बताने के लिए लिखा गया। कौटिल्य के 'अर्थशा` में शूद्र विरोधी कानून हंै। याज्ञवल्क्य स्मृति में बौद्धों के दर्शन को अपशकुन बताया गया है। वाल्मीकि रामायण में बौद्धों को चोरों की तरह दण्ड देने की बात है। मनुस्मृति की तो बात ही कुछ और है।
इस काल की एक खास बात यह है कि जहां एक तरफ ब्राह्मणों ने लाखों बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम कराया तथा बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के बाद बचे-खुचे को मंदिरों में बदल दिया था, वहीं इस कुत्सित उद्देश्य के साथ बड़ी चालाकी से बुद्ध के प्रति तथाकथित 'आत्म सात्करण` के सिद्धान्त को अपनाते हुए 'अग्निपुराण` में उन्हें विष्णु का अवतार घोषित कर दिया था। साथ ही, बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को अपना बनाकर ब्राह्मणों ने लोगों के समक्ष पेश करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाली भाषा को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि बौद्ध धर्म के वर्चस्व के स्थापित होते ही वर्ण व्यवस्था का मिथकीय रूप बड़ी तेजी से लागू होने लगा। कालिदास जैसे संस्कृत कवियों ने बौद्धों के खिलाफ टिप्पणी की। उन्होंने 'मेघदूत` में 'दिग्नागिनाम् पथि परिहरन्` अर्थात् दिग्नागों के बताये गये रास्ते पर चलने से लोगों को मना कर दिया। स्मरण रहे कि महान बौद्ध दार्शनिक दिग्नाग का आम जनता में बहुत असर था, इसलिए कालिदास को उक्त टिप्पणी करनी पड़ी। संस्कृत साहित्य में बौद्धों के खिलाफ अनगिनत टिप्पणियां मिलती हैं। आत्मसात्करण के संदर्भ में एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि आज हिन्दू लोग गाय को 'गोमाता` कहकर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए धार्मिक दंगा फैलाने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु सदियों पहले ये हिन्दू वैदिक यज्ञों में हजारों गायों की न सिर्फ बलि चढ़ाते थे, बल्कि उसका मांस भी खाया करते थे। सर्वप्रथम तथागत बुद्ध ने ही इन बलियों के विरूद्ध संघर्ष चलाकर गोहत्या बंद करायी थी तथा उन्होंने स्वयं गाय को माता कहकर पुकारा था। 'दीर्घ निकाय` समेत अनेक बौद्ध ग्रंथों में इसके उदाहरण मिलते हैं। गोमाता तथा गोहत्या से संबंधित बुद्ध की शिक्षा को अपहृत करके ब्राह्मणों ने उल्टा आरोप बौद्धों पर लगा दिया कि वे गोमांस भक्षण करते हैं। बौद्धों के खिलाफ इस आरोप को ब्राह्मणों ने इतने बड़े पैमाने पर प्रचारित किया कि देश भर में बौद्ध बदनाम हो गये। वास्तविकता यह थी कि बुद्ध की शिक्षा के अनुसार भिक्षा में मिली किसी भी वस्तु को खाने का प्रावधान था, भले ही वह गोमांस क्यों न हो, किन्तु बुद्ध ने किसी जीव को मार कर खाने को कड़ाई से प्रतिबंधित किया था। इसके अनुसार बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिले किसी भी पशु मांस को खा लेते थे। स्वयं तथागत् बुद्ध ने कुशीनारा में चुन्दक नामक लोहार द्वारा भोजदान में दिये गये सूअर के मांस को खाकर निर्वाण प्राप्त किया था। इस तरह बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को ब्राह्मणों ने उल्टा करके बौद्धों को हमेशा बदनाम किया।
ईसा की दूसरी सहस्राब्दी भारत में बौद्ध धर्म के लिए समापन की अवधि थी। इसके पहले ही भारत में इस्लाम पहुंच चुका था तथा सल्तनत स्थापित हो चुकी थी। मध्य एशिया से आने वाले मुस्लिम हमलावरों ने बौद्ध स्थलियों को तोड़ऩे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिसके पीछे स्वार्थी ब्राह्मणों की भूमिका पथ प्रदर्शक की थी। बारहवीं-तेरहवीं सदी में बख्तियार खिलजी नाम एक हमलावर उत्तर भारत की उन समस्त बौद्ध स्थलियों पर गया, जिनका सीधा संबंध बुद्ध से था। उसने कुशी नगर की विश्व प्रसिद्ध सात मीटर लंबी सुनहरी मूर्ति को तीन टुकड़ों में तोड़कर फेंक दिया था। उसने ही नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर हमेशा के लिए राख कर दिया था। इसके पहले हिन्दू राजा शशांक ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था। बख्तियार ने उदान्तपुरी (बिहार शरीफ) के प्रख्यात बौद्ध मठ के विशाल टावर को किला समझ कर ध्वस्त कर दिया, जिसमें सैकड़ों बौद्ध भिक्षु मारे गये तथा हजारों बौद्ध ग्रंथ खून से लथ-पथ होकर नष्ट हो गये। बचे-खुचे बहुमूल्य बौद्ध ग्रंथों को जीवित बचे कुछ भिक्षु अपने रक्त रंजित चीवरों में छिपाकर बर्मा, नेपाल तथा तिब्बत ले गये। स्मरण रहे कि हजरत मोहम्मद के समय बौद्ध पश्चिम एशिया में फैल चुका था, इसलिए वहां के अरबी भाषी लोगों ने 'बुद्ध पूजा` को गलत उच्चारण के कारण 'बुत पूजा` कहकर विरोध किया, जिसके चलते मुस्लिम हमलावार जहां भी गये, उन्होंने बुद्ध मूर्तियों को तोड़ डाला। मुस्लिम विजेताओं ने अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक फैले बौद्ध धर्म को समूल नष्ट कर दिया।
बौद्धों की कीमत पर भारत में ईसाई तथा इस्लाम धर्म जरूर पनपा, जिसके कारण ए.एल. बाशम जैसे नामी इतिहासकारों ने हिन्दू धर्म को उदार कहकर अपनी श्रद्धांजली पेश की, जो सही नहीं है। हकीकत यह है कि इन दोनों धर्मों का विकास हिन्दू धर्म की उदारता के कारण नहीं, बल्कि उसके वर्ण व्यवस्थावादी कट्टरता के कारण हुआ। यदि हिन्दू धर्म उदार होता, तो इस धरती से उत्पन्न विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शन बौद्ध धर्म को क्रूरता के साथ नष्ट नहीं करता। प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने बौद्ध धर्म को भारतीय इतिहास का करिश्मा कहा है। अत: यह करिश्मा आज भी जारी है। हाल ही में एक अमरीकी मीडिया सर्वेक्षण में बौद्ध धर्म को सर्वाधिक तीव्र गति से पनपने वाला धर्म बताया गया। विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म को अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हंै। विगत् दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये एक साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा : 'इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`
यह भी देखें :
भगवान्‌ बुद्ध - अवतारवाद का अधूरा सत्य : http://preachingsofbuddha.blogspot.in/2012/10/blog-post.html

Thursday, March 14, 2013

मिन्ड्रोलिंग स्तूप, देहरादून- संस्मरण

 
 
 
 
 
 
 
मिन्डोलिग स्तूप , देहरादून जाने का मौका मुझे दो बार मिला । सन्‌ २००८ में सपरिवार और उसके उपरांत २०१० मे अकेले ही अपने पुत्र आयुष के साथ । स्तूप या चैत्य मुझे सम्मोहित करते रहते हैं । इसका शायद एक कारण इन स्तूपों से मिलने वाली सकरात्मक उर्जा है । कहते हैं कि इन स्तूपों का  प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कभी यह बौद्ध प्रार्थना स्थल होते थे। महापरिनर्वाण सूत्र में भगवान्‌ बुद्ध अपने शिष्य आनन्द से कहते हैं- "मेरी मृत्यु के उपारांत  मेरे अवशेषों पर उसी प्रकार का स्तूप बनाया जाये जिस प्रकार चक्रवर्ती राजाओं के अवशेषों पर बनते हैं- (दीघनिकाय- १४/५/११)। ” स्तूप समाधि, अवशेषों अथवा चिता पर स्मृति स्वरूप निर्मित किया गया अर्द्धाकार टीला होता है जिसे चैत्य भी कहा जाता है ।
अगर आप देहरादून जा रहे हों तो क्लेमेंट टाउन जाना न भूलें । प्राकृतिक परिवेश के मध्य स्थित देहरादून पर्यटकों  को कई तरह से आकर्षित करता है । अन्य कई आकर्षणॊं   के अलावा देहरादून के तिब्बती समुदाय ने सन्‌ १९६५ मे एक तिब्बती मठ की प्रतिकृति के रूप में बुद्ध मंदिर का निर्माण किया था । कहते हैं कि यह स्तूप एशिया का सबसे बडा स्तूप है । इसकी ऊँचाई १८५ फ़ुट और चौडाई १०० वर्ग फ़ुट है । यह स्तूप बौद्ध कला और स्थापत्य कला का एक शानदार उदाहरण है.
स्तूप के मुख पर मैत्र बुद्ध या शक्यमुनि भगवान बुद्ध को खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है । देखें नीचे  चित्र में
लगभग २ एकड वर्ग मे फ़ैले परिसर में प्रवेश करने पर हमें वीणा धारण किये हुये एक  मूर्ति का दर्शन होता है । एक बार तो हिंदू धर्म में आराध्य  माँ सरस्वती को देखकर विस्मय मे पड जाता हूँ लेकिन स्थानीय लामा  से मालूम पडता है कि यह तिब्बती कल्चर मे पूज्य माँ मञ्जुश्री का रुप है जो माँ सरस्वती के अनुरुप ज्ञान और सहचरी की देवी मानी जाती हैं । कहते हैं कि त्रिपिटक को कंठस्थ कराने के लिये भिक्खू जन अपने सह भिक्खूओं को माँ मञ्जुश्री के माध्यम का प्रयोग करते थे ।
अब हम स्तूप के अन्दर प्रवेश कर रहे हैं । इस इमारत में कुल पांच मंजिलें है ; स्तूप का  भूतल तिब्बती गुरु पद्मसंभव को समर्पित है , भूतल की दीवारॊ पर अति सुन्दर भित्तीय चित्र निर्मित हैं जो  गुरु पद्मसंभव की जीवन कहानी को दर्शाती है.
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इस इमारत का प्रथम तल शाक्यमुनि भगवान्‌ बुद्ध को समर्पित है , यहाँ भी दीवारों पर सुन्दर भित्तीय चित्रों और जातक कथाओं के माध्यम से बुद्ध की जीवनी को चित्रित किया गया
है ।
 
 
मंजिल का दूसरा तल शाइन कक्ष के रुप मे जाना जाता है । यह तल मिन्ड्रोलिंग मे महान शासकों को समर्पित है ।
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मिन्डोंलिग मन्दिर  के परिसर का   आकर्षण बुद्ध की विशाल  मूर्ति है ।यह मूर्ति लगभग 103 फुट ऊची है और लगभग   10 साल पहले इसका निर्माण किया गया था ।यह तिब्बती समुदाय  के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को  समर्पित है । यहाँ कई मोनेस्ट्री भी हैं जहाँ लगभग  पाँच सौ लामा अध्ययन करते हैं ।
 
मन्दिर परिसर का एक और आकर्षण प्रार्थना चक्र या prayer wheel है । इसका निर्माण स्तूप के निकट किया गया है । कहते हैं कि यह प्रार्थना का पहिया सभी प्राणियों , भिक्खूओं और धर्मालंबियों के लिये सकरात्मक उर्जा का संचय करता है ।
 
 
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तिब्बती समुदाय के लिये स्वतंत्र तिब्बत एक स्वप्न की तरह ही है । देहारदून के इस मिन्डोलिग स्तूप  परिसर में यह पीडा दीवारों पर अंकित देखी जा सकती है , देखें ऊपर चित्र में ।
उपर की दो मंजिले को देख न पाने का खेद मुझे दोनों बार रहा , शायद दोनों बार वह अवकाश का दिन था , संभव है  मौका फ़िर कभी लगे  :)

Wednesday, February 15, 2012

बौद्ध - विनय एवं आचरण- डां के. श्री. धम्मानन्द

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डां के. श्री. धम्मानन्द जी की यह लघु पुस्तिका ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ उनकी अंगेजी मे लिखी ’ Moral & Ethical conduct of a Buddhist ‘ का हिन्दी  मे अनुवाद है । डां श्रीमती इन्दु अग्रवाल ने इस पुस्तिका का सुरुचिपूर्ण भाषा मे प्रवाहमेय अनुवाद किया है और हमेशा की तरह श्री राजेश चन्द्रा जी ने इस पुस्तिका का उत्कृष्ट रुप से संपादन किया है ।

गत सप्ताह  मेरे अभिग्न मित्र श्री  राजेश जी ने मुझे दो पुस्तिकायें भेटं स्वरुप दी । पिछ्ले  काफ़ी समय से हम नेट के माध्यम से जुडे रहे लेकिन अधिक व्यवस्सता  के कारण मिलना संभव न हो पाया । गत सप्ताह यह मिलन आकस्मिक और बहुत ही सुखद पूर्ण  रहा । पिछ्ले साल श्रावस्ती भ्रमण  के दौरान जिस तरह वह मेरे साथ फ़ोन के माध्यम से लगातार सुबह से रात तक जुडे रहे उससे मुझे कही नही लगा कि हम दोनों मे पूर्व  का  परिचय नही है ।

लेकिन बात पहले ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ की । डां के. श्री. धम्मानन्द जी इस पुस्तिका का केन्द्रीय विषय बौद्धों की आचरण नियमावली है । यह पुस्तिका न सिर्फ़ भिक्खुओं के लिये उपयोगी है बल्कि उपासकों के लिये भी लाभकारी है । जनमानस को भगवान बुद्ध का यही संदेश मिलता है “ सत्कर्म करो , शुद्ध विचार रखो और दुषकर्म से दूर रहो । ” बुद्ध के समय मे भी ये शब्द उतने ही सच थे जितने आज हैं और कल भी रहेगें ।

इस पुस्तिका की scanned image बहुत ही उत्कृष्ट quality की नही है लेकिन जैसे ही यह सिगांपुर से  श्री टी वाई ली की साइट पर उपलोड होगी तब उसका डाउनलोड लिंक यहाँ उपलब्ध करा दिया जायेगा ।

डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/lcp84ip2t6cg676j5rs9

बौद्ध नियम एवं आचरण

Tuesday, November 22, 2011

“इहि पस्सिको ”- आओ और देखो


इहि पस्सिको


बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो भि देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।
कहते हैं कि एक बार बुद्ध अपने कुछ अनुयायियों  के साथ यात्रा कर रहे  थे . जब वे एक झील के पास से गुजर रहे थे तब बुद्ध को प्यास की  अनूभूति हुई , तब बुद्ध ने अपने एक अनुयायी से कहा , " भिक्षुक मुझे प्यास लगी है  और  इस झील से पानी लेकर आओ’। ” जैसे ही शिष्य झील के समीप पहुँचा उसी समय    एक बैलगाड़ी झील से होती हुई गुजरी  ।  परिणाम स्वरुप झील का पानी बहुत गन्दा और मटमैला हो गया । तब  शिष्य ने सोचा, "मैं बुद्ध को  यह  गंदा पानी पीने के लिये कैसे दे सकता हूँ ?"   वह वापस आ गया और बुद्ध से कहा, " शास्ता पानी तो  वहाँ बहुत गंदा है और मुझे नहीं लगता कि यह पीने के लिए उपयुक्त  है."  लगभग आधे घंटे के बाद, बुद्ध ने दोबारा शिष्य से पानी लने के लिये कहा । वह वापस  झील के नजदीक गया और उसने पाया   कि पानी अभी भी मैला था.  वह लौट आया  और  बुद्धको सूचित किया.  कुछ समय बाद फिर से बुद्ध ने  शिष्य  को वापस जाने के लिए कहा . इस बार  शिष्य ने पाया कि पानी अपेक्षाकृत काफ़ी साफ़ है , मिट्टी नीचे बैठ चुकी है  ।  वह एक बर्तन में थोड़ा सा पानी एकत्र कर के बुद्ध के लिये ले गया । बुद्ध ने पानी में देखा, और अनुयायी को देखते हुये कहा , " आयुस तुम जानते हो कि तुमने पानी को साफ़ करने के लिये क्या किया , तुमने पानी को कुछ देर के लिये छॊड दिया और मिट्टी नीचे बैठ गयी । इसी तरह यह मन भी है , अगर वह परेशान है , व्याकुल है तो उसे थोडा समय दो , वह अपने आप शांत हो जायेगा । तुमको उसे शांत करने के लिये कोई विशेष प्रयास नही करना है , मन की शांति एक सरल प्रक्रिया है , इसके लिये विशेष प्रयास  नही करना पडता है ।”
( बुद्ध से संबधित इस गाथा के लिये साभार : रोहित पवार )

Friday, August 27, 2010

Buddhism vs. Bhagavad-Gita

BUDDHA-Buddhism-Light    

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In this paper I will attempt to compare and contrast the two works, “What the Buddha Taught”, which is based on the Pali texts of Tipitaka, and the “Bhagavad-Gita-The Song of God” by beginning with Buddhism for the first and every other paragraph thereafter, then continuing with Bhagavad-Gita for the second and every other paragraph thereafter. I am hoping this will help maintain a clear understanding of the comparisons I am making to each work throughout the paper.


There are still many similarities between the two works. They both try to teach us not to become so attached to the material world around us. They say the more you let go of the material world around you, the happier you will live your life on earth. If we give in to our desires, whether that be sex or greed, we only allow ourselves to suffer more and will never truly know completehappiness.

Buddhism is unique to every other religious belief because Buddha was a man who did not claim to be a God, nor a son of God. His teachings only claim is that man and only man can liberate himself through the impermanence of Dukkha and find ultimate happiness in his life. His own life on earth was said to be as a Buddha living a life of “par excellence.” He was referred to as a Supreme Being. It is through his life experience and wisdom that he promises to show us the path to Nirvana. The writings were originally done in Sanskrit, but they are what the Buddha taught and how the Buddha lived and why millions of people practice Buddhism today and millions more will tomorrow.

Bhagavad-Gita is also translated from Sanskrit, but is a religious doctrine of prose and song. It speaks of God being in all things as Brahman and inside each of us as Atman. Arjuna is the student and Krishna is God in a form Arjuna can see and hear. Bhagavad-Gita is a spiritual guide that is meant to show the impossibilities of judging thy neighbor because each of us can be faced with choices that are very hard to make and would not be able to explain to someone else. Still, it tries to show that as long as the choices you make are not based on greed, or evil and is a battle meant to be won for the good of mankind, then in the eyes of God, it is a battle worth fighting for. The Gita is an astonishing work that appeals to all religions and all cultures which is something that no other book can claim to be able to do. Many great men have used it as their spiritual guide, like Gandhi, and say that the there are passages within it to help man when he is struggling with difficulties in his life. The Gita teaches us about the Supreme Reality and tries to teach us how to break the chains of desire which bind us to our actions.

Buddhism teaches us about the five aggregates, the first aggregate of matter, the second of sensations, the third of perceptions, the fourth of mental formations and the fifth of consciousness. The first aggregate is the most important because it also contains the four great elements which are solidity, fluidity, heat and motion. It also contains the derivatives of the four great elements which are the five material sense organs which are the eye, ear, nose, tongue and body and their corresponding opposites in the external world which are visible formations, sounds, odors, tastes and tangible things. Thoughts and ideas of mind objects are also included here. The reason all of these are so important is because all aggregates of matter play a role in each of the remaining aggregates. Aggregates of sensation, perception, mental formation and consciousness all respond to the aggregates of matter that make up each of our realities. It is when we learn about the aggregate of consciousness that we begin to see the shift from religion to Buddhism. Buddhism says there is no Atman or soul as religious doctrine preaches. There is no permanent self. There is only a stored consciousness that feeds our ego of self-importance. Buddhism tries to teach us to let go of the aggregates of matter and see everything as impermanence. You find this awareness through repetitious meditations that bring you closer with each session. Learning to focus on each day as it comes and using self-control you learn to live your life with complete happiness.

The Gita uses the Vedas to teach us about the three Gunnas which are Satwas, Rajas, and Tomas. Satwa is light or clarity, Rajas is Energy or movement and Tomas is inertia or heaviness. They are considered as strings that vibrate and they make up our material existence. All of us are made of these of three Gunnas and the elements that remain the same from birth to death is what makes up our identity. The Gita says we must be free from the pairs of opposites and poise our mind in tranquility. It tries to teach us how to do our duties always without attachment.

Buddhism teaches us about the four-Nobel Truths which are Dukkha, the arising of Dukkha, the cessation of Dukkha and the way of leading to the cessation of Dukkha. The way of leading to cessation of Dukkha is to follow the Nobel 8-fold or Middle Path in the search for happiness. That is to know you have the right understanding, right thought, right speech, right action, right livelihood, right effort, right mindfulness and right concentration. By using 4-stages of meditation that begin with the body, then feelings and sensation, the mind and then moral and intelligent subjects you will find Nirvana.

Although the Bhagavad-Gita is a story about war, it is trying to say that every warrior that has died on a battlefield has considered that as a death of honor. Krishna teaches Arjuna that even though he is about to go commit evil acts against the enemy, if he doesn't the people that know him will think he was a coward and did not live up to his sense of duty. He says that the enemy he is fighting has brought him to this crossroad and has not left him with a better choice. He says no one will live forever, but if you die now, God will accept you in his Kingdom and if you conquer you will live the rest of your mortal life as a King here. It is because he is not fighting only because he wants to be a King and is instead fighting because of the way this King is treating his people that he deserves the throne. He has renounced attachment from the fruits. Mainly, Krishna argues he cannot gain freedom from activity by abstaining from action on the battlefield. Here we learn that we can find peace in Atman. The Gita says we must learn to be established in the consciousness of Atman, always.

Of all the differences I have listed there are still many similarities between the two works. They both try to teach us not to become so attached to the material world around us. They say the more you let go of the material world around you, the happier you will live your life on earth. If we give in to our desires, whether that be sex or greed, we only allow ourselves to suffer more and will never truly know complete happiness.

Courtesy :  Laura McCallum

Tuesday, August 10, 2010

भिक्षुणी अम्बपाली (आम्रपाली) के अद्भुत उद्गार

 

buddhaभगवान बुद्ध के प्रभाव में आकर वैशाली की पिंगला-गणिका अम्बपाली (आम्रपाली) एक दिन भिक्षुणी हो गई. उसने समाधि की उच्चतम अवस्था का स्पर्श किया और पूर्णता प्राप्त भिक्षुणियों में वह एक हुई. अपने निरंतर जर्जरित होते हुए शरीर में बुद्ध-वचनों की सत्यता को प्रतिफलित होते देख अम्बपाली हमारे लिए कुछ उद्गार छोड़ गयी है जो अनित्यता की भावना से भरे हुए हैं. वह कहती है:-

काले, भौंरे के रंग के सामान, जिनके अग्र भाग घुंघराले हैं, ऐसे एक समय मेरे बाल थे.
वही आज जरावस्था में जीर्ण सन के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पुष्पाभरणों से गुंथा हुआ मेरा केशपाश कभी हजारा चमेली के पुष्प की सी गंध वहन करता था.
उसी में से आज जरावस्था में खरहे के रोओं की सी दुर्गन्ध आती है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कंघी और चिमटियों से सजा हुआ मेरा सुविन्यस्त केशपाश कभी सुन्दर रोपे हुए सघन उपवन के सदृश शोभा पाता था.
वही आज जराग्रस्त होकर जहाँ-तहाँ से बाल टूटने के कारण विरल हो गया है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सोने के गहनों से सुसज्जित, महकती हुई सुगंधियों से सुशोभित, चोटियों से गुंथा हुआ कभी मेरा सिर रहा करता था.
वही आज जरावस्था में भग्न और नीचे लटका हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

चित्रकार के हांथों से कुशलतापूर्वक अंकित की हुई जैसे मेरी दो भौंहें थीं.
वही आज जरा के कारण झुर्रियां पड़ कर नीचे लटकी हुई हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

गहरे नीले रंग की दो उज्जवल, सुन्दर, मणियों के समान मेरे दो विस्तृत नेत्र थे.
वही आज बुढ़ापे से अभिहत हुए भद्दे और आभाहीन हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

उठते हुए यौवन की सुन्दर शिखर के समान वह मेरी कोमल, सुदीर्घ नासिका थी.
वही आज जरावस्था में दबकर पिचकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पूरी कारीगरी के साथ बनाये हुए, सुन्दर, सुगठित कंकण के समान, कभी मेरे कानों के सिरे थे.
वही आज जरावस्था में झुर्री पड़कर नीचे लटके हुए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कदली-पुष्प की कली के समान रंगवाले कभी मेरे सुन्दर दांत थे.
वही आज जरावस्था में खंडित होकर जौ के समान पीले रंगवाले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

वनचारिणी कोकिला की मधुर कूक के समान एक समय मेरी प्यारी मीठी बोली थी.
वही आज जरा के कारण स्खलित और भर्राई हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

अच्छी तरह खराद पर रखे हुए, चिकने शंख के समान, एक समय मेरी सुन्दर ग्रीवा थी.
वही आज जरावस्था में टूटकर नीचे लटकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुगोल गदा के समान एक समय मेरी दोनों सुन्दर बांहें थीं.
वही आज जरावस्था में पाडर वृक्ष की दुर्बल शाखाओं के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर मुंदरी और स्वर्णालंकारों से विभूषित कभी मेरे हाथ रहते थे.
वही आज जरा के कारण गाँठ-गठीले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

स्थूल, सुगोल, उन्नत, कभी मेरे स्तन सुशोभित होते थे.
वही आज जरावस्था में पानी से रीती लटकी हुई चमड़े की थैली के सदृश हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, विशुद्ध, स्वर्ण-फलक के समान कभी मेरा शरीर चमकता था.
वही आज जरावस्था में झुर्रियों से भरा हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

हाथी की सूंड के समान कभी मेरे सुन्दर उरु-प्रदेश थे.
वही आज पोले बांस की नली के समान हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर नूपुर और स्वर्णालंकारों से सजी हुई कभी मेरी जंघाएँ रहती थीं.
वही आज जरावस्था में तिल के सूखे डंठल के समान हो गईं हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, सुकोमल, रुई के फाहे के समान कभी मेरे दोनों पैर थे.
वही आज जरावस्था में झुर्रियां पड़कर सूखे काठ से हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

एक समय यह शरीर ऐसा था. इस समय वह जर्जर और बहुत दुखों का घर है.
जीर्ण घर जैसे बिना लिपाई-पुताई के गिर जाता है, उसी प्रकार यह जरा का घर, यह शरीर बिना थोड़ी सी रखवाली किये गिर जायेगा.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

(श्री भरतसिंह उपाध्याय की पुस्तक ‘बुद्ध और बौद्ध साधक’ से लिया गया अंश, आभार सहित)

(A Buddhist anecdote about Amrapali / Ambapali – in HIndi)

साभार : HINDIZEN-निशांत का ब्लाग

Sunday, August 8, 2010

लोक-अपवाद को जीतना

image कुरु देश में मागंदिय नाम का अग्निपूजक ब्राह्मण रहता था। मागंदिया उसकी एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। मागंदिय ने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, परन्तु योग्य वर न मिला। बड़े-बड़े कुलों से कन्या की मँगनी आयी, लेकिन मागंदिया को वर पसन्द न आया।
एक दिन बुद्ध भगवान् प्रातःकाल अपना पात्र और चीवर लेकर नगर के बाहर ब्राह्मण के अग्नि-स्थान के पास खड़े हुए।
बुद्ध को देख ब्राह्मण ने सोचा- इसके समान किसी अन्य पुरुष का मिलना दुर्लभ है। मैं क्यों न इसके साथ अपनी कन्या की शादी कर दूँ ?
ब्राह्मण ने भगवान् से निवेदन किया-‘‘हे श्रमण ! मैंने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, मगर कोई वर न मिला। बड़े भाग्य से आप मिले हैं। मागंदिया बहुत रूपवती है। वह सचमुच आपके चरणों की दासी बनने योग्य है।’’
इतना कह ब्राह्मण अपनी कन्या को लाने के लिए चल दिया। बुद्ध को वह वहीं ठहरने के लिए कहता गया।
जल्दी-जल्दी घर पहुँच ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-‘‘भद्रे ! कन्या के लिए वर मिल गया है। जल्दी करो, वस्त्राभूषणों से सज्जित कर मागंदिया को ले चलो।’’
नगर के लोगों को जब मालूम हुआ कि मागंदिया को अपनी कन्या के लिए वर मिल गया है तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भी ब्राह्मण के साथ-साथ वर देखने चले।
बुद्ध उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र गमन कर गये थे। अतः ब्राह्मणी को जब वहाँ कोई न दिखायी दिया तो उसने ब्राह्मण से जिज्ञासा व्यक्त की। ब्राह्मण बोला-‘‘मैं तो उससे यहीं रुकने को कह गया था, किन्तु वह न जाने कहाँ चला गया !’’
इधर-उधर ढूँढ़ने के बाद ब्राह्मण को बुद्ध के पद-चिह्न दिखाई दिये। ब्राह्मणी लक्षणशास्त्र की पण्डित और तीनों वेदों में पारंगत थी। उसने लक्षण विचारकर कहा कि ये पद-चिह्न किसी विषयभोगी के नहीं, किसी तपस्वी के जान पड़ते हैं।
ब्राह्मण को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने अपनी पत्नी से कहा-‘‘ब्राह्मणी ! तुम्हें हमेशा पानी में मगर और घर में चोर दिखाई देते हैं। तुम्हें कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत नहीं।’’
ब्राह्मणी ने उत्तर दिया-‘‘आप चाहे जो कहें, ये पैर किसी विषयभोगी के नहीं हो सकते।’’
ब्राह्मण ने बुद्ध को दूर से देख ब्राह्मणी से कहा-‘‘देखो, देखो, वह है मागंदिया का वर !’’ और तीर की तरह बुद्ध के पास जाकर बोला-‘‘हे भिक्षु ! मैं आपकी सेवा में अपनी कन्या समर्पित करता हूँ।’’
बुद्ध ने कोई उत्तर न देकर ब्राह्मण से कहा-‘‘देखो ब्राह्मण ! अपने महाभिनिष्क्रमण के समय से लगाकर अजापालनिग्रोध वृक्ष के नीचे बोधि प्राप्त करने तक कामदेव ने मुझे कितने कष्ट दिये ! कितना सताया ! जब वह मेरा कुछ न बिगाड़ सका तो एक दिन वह उदास होकर बैठा था कि इतने में उसकी कन्याएँ वहाँ आयीं और उसे सान्त्वना देकर कहने लगीं-‘‘पिताजी, आप क्यों चिन्ता करते हैं। आज्ञा हो तो हम बुद्ध का ध्यान भंग करें।’ लेकिन हे ब्राह्मण ! विषय-भोगों के प्रति मेरी तनिक भी कामना नहीं। यह शरीर मल-मूत्र का भण्डार है। मैं इसका स्पर्श तक करना नहीं चाहता।’’
बुद्ध की बातें सुनकर ब्राह्मण-कन्या मागंदिया को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा-यदि इस भिक्षु को मेरी आवश्यकता नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन यह मेरा अपमान क्यों करता है ? मैं अच्छे कुल में पैदा हुई हूँ, भोग-विलास की मुझे कमी नहीं, सौन्दर्य मेरे चरणों में लोटता है, निस्सन्देह मैं योग्य पति पाऊँगी। फिर यह भिक्षु मुझे इस तरह के वचन क्यों कहता है ? मैं बदला लिये बिना न रहूँगी।
दिन जाते देर नहीं लगती। कुछ समय के बाद मागंदिया के माता-पिता ने अपने भाई चुल्ल मागंदिय को अपनी कन्या सौंपकर प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
चुल्ल मागंदिय ने सोचा मागंदिया को किसी राजा की रानी बनना चाहिए। वस्त्राभूषणों से सजाकर वह उसे कौशाम्बी ले गया और राजा उदयन के साथ विवाह कर दिया।
राजा उदयन मागंदिया को बहुत चाहता था। उसने उसे पटरानी के पद पर अभिषिक्त कर दिया। पाँच सौ दासियाँ उसकी सेवा में रहने लगीं।
एक बार रानी मागंदिया अपने महल से उतरकर घूम रही थीं। पता लगा कि श्रमण गौतम कौशाम्बी आ रहा है। उसने नगर वासियों को प्रलोभन देकर आदेश दिया कि जब श्रमण गौतम नगरी में प्रवेश करें तो वे अपने नौकर-चाकर के साथ मिलकर उसे अपशब्द कह नगर से निकाल दें।
बुद्ध ने नगर में प्रवेश किया तो लोग उन्हें चोर, मूर्ख, ऊँट, बैल, गधा, नारकी, पशु आदि शब्दों से सम्बोधित कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहने लगे-‘‘याद रख श्रमण, तुझे अच्छी गति मिलनेवाली नहीं। तू मरकर दुर्गति को प्राप्त होगा !’’
नगरवासियों के ये वचन सुनकर भगवान् के प्रिय शिष्य आनन्द ने बुद्ध से कहा-‘‘भन्ते ! ये नागरिक हमें अपशब्द कहते हैं। चलिए कहीं अन्यत्र चलकर रहें।’’
बुद्ध-आनन्द, कहाँ जाना चाहते हो ?
आनन्द-किसी दूसरे नगर में ! बुद्ध-यदि वहाँ भी लोगों ने अपशब्द कहे तो कहाँ जाओगे ? आनन्द-अन्यत्र कहीं ! बुद्ध-अगर वहाँ के लोगों ने भी ऐसा बर्ताव किया ? आनन्द-भन्ते, वहाँ से अन्यत्र चले जाएँगे ! बुद्ध-आनन्द, यह ठीक नहीं ! देखो, जहाँ लोकापवाद होता हो, वह जब तक शान्त न हो जाये, तब तक, उस नगर को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहिए। तथा आनन्द, जानते हो अपवाद करने वाले लोग कौन हैं ? आनन्द-भन्ते, नौकर-चाकर तक हमें अपशब्द कहते हैं ! बुद्ध-देखो आनन्द, मैं संग्राम में आगे बढ़े हुए हाथी के समान निश्चल हूँ ! यदि चारों दिशाओं से हाथी को तीर आकर लगें तो वीरतापूर्वक डटे खड़े रहना चाहिए। इसी प्रकार अनेक दुष्ट पुरुषों के अपवाद को सहन करना मेरा कर्तव्य है। याद रखो आनन्द, वश में किये हुए खच्चर, सिन्धु देश के घो़ड़े तथा जंगली हाथी उत्तम समझे जाते हैं, लेकिन इन सबसे उत्तम वह है जो अपने आपको वश में रखता है !

Sunday, June 20, 2010

सिमसा वृक्ष के पत्ते और बुद्ध का चितंन

Simsapa leaves

एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे  विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों  को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने  हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह  या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “

भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “

इसी तरह  भिक्षुओं ऐसी अनगिनत  चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को  नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और  न ही मन को शांत करती है ।

इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को  दूर करता हैं और मन को शांत करता है ।

संयुत्त निकाय 56.31

( हिन्दी मे ’ The Simsapa Leaves-Simsapa Sutta ’ से अनुवादित )

Wednesday, July 22, 2009

नालन्दा विशवविधालय – एक इतिहास जो संभवत: पुनर्जीवित हो …

इतिहास हमेशा कडवा ही क्यूं होता है । क्यूं एक धर्म के मतावल्म्बी दूसरे धर्म से इतनी नफ़रत रखते हैं । धम्मपद की गाथा मे  बुद्ध कहते हैं 

न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
इस लोक मे कभी भी वैर से वैर शांत नहीं होता , बल्कि अवैर से शांत होता है । यही सनातन धर्म है ।  धम्मपद : यमकवग्गो- गाथा ५

परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥
अनाडी लोग नही जानते कि हम इस संसार से जाने वाले हैं । जो इसे जान लेते हैं उनके झगडॆ शांत हो जाते हैं । धम्मपद: यमकवग्गो- गाथा ६
काश इस तथ्य को सभी धर्मालम्बी समझें  और परस्पर प्रेम से  रहें । लेकिन क्या यह संभव है ,  इतिहास इतना अधिक क्रूर और भयावह है कि इसकी परिकल्पना भी नही की जा सकती । अपने देश मे अनेक मन्दिर और बौद्ध शिक्षा केन्द्र इसलामी विचारों की भेंट चढे यह एक इतिहास की अजीब सी विडंबना है कि हिन्दू और बौद्ध विचारों को मुस्लिम सोच ने नष्ट किया और बाद में बुद्ध धर्म की फ़ैलती शाखाओं को हिन्दू धर्म से आदि शंकारकाचार्य ने नष्ट किया । यही नही यह सोच अब तक जारी है ,  वर्तमान मे पाकिस्तान मे स्वात में तालिबान की बौद्ध धर्मस्थलॊ को नष्ट करने की धमकी या कुछ वर्ष पूर्व अफ़गानिस्तान मे बामियान मे बुद्ध प्रतिमा को नष्ट करना भी इसी सोच का नतीजा है ।
नालन्दा विशवविधालय की वर्तमान स्थिति भी इसी कटरवादी सोच का नतीजा थी  । संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है ज्ञान देने वाला (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना)। बुद्ध अपने जीवनकाल में कई बार नालंदा आए और लंबे समय तक ठहरे। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण भी नालंदा में ही पावापुरी नामक स्थान पर हुआ। कहते हैं कि खिलजी जब नालंदा पहुंचा, तब उसने पूछा कि यहां पवित्र कुरान है क्या? उत्तर नहीं में मिलने पर उसने यहां आग लगवा दी, सब कुछ तहस-नहस कर दिया। इरानी विद्वान मिन्हाज के अनुसार कई विद्वान शिक्षकों को ज़िन्दा जला दिया गया और कईयों के सर काट लिये गए। इस घटना को कई विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म के पतन के एक कारण के रूप में देखा जाता है। कई विद्वान यह भी कहते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों के नष्ट हो जाने से भारत आने वाले समय में विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और गणित जैसे क्षेत्रों मे पिछड़ गया ।
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के अतुल्य भारत अभियान के साथ मिल कर एनडीटीवी द्वारा आयोजित एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के तहत कोणार्क सूर्य मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, खजुराहो, लाल किला, दिल्ली, जैसलमेर दुर्ग, नालंदा विश्वविद्यालय और धौलावीर जैसे स्थलों को भारत के सात आश्चर्य के रूप में चुना गया है। वीडियो के लिये साभार : यू ट्यूब
नालंदा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य में पटना से ९० कि.मी. दूर नालंदा शहर में स्थित एक प्राचीन विश्वविद्यालय था। देश विदेश से यहाँ विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। आज इसके केवल खंडहर देखे जा सकते हैं। नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेषों की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। माना जाता है कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना ४५०-४७० ई. में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी।  इस विश्वविद्यालय को इसके बाद आने वाले सभी शासक वंशों का सहयोग मिला। महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इसे केवल यहां के स्थासनीय शासक वंशों से ही नहीं वरन विदेशी शासकों से भी दान मिला था। इस विश्वविद्यालय का अस्तित्व १२वीं शताब्दी तक बना रहा। इसके ऊपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल द्वारा किया गया, व ११९९ में में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसको जला कर पूरी तरह समाप्त कर दिया।
इस विश्वविद्यालय के बारे में माना जाता है कि यह विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। इसमें करीब १०,००० छात्र एक साथ विद्या ग्रहण करते थे। यहां २००० शिक्षक छात्रों को पढ़ाते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अदभूत नमूना था। यह पूरा परिसर इस विश्वविद्यालय के बारे में माना जाता है कि यह विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। इसमें करीब १०,००० छात्र एक साथ विद्या ग्रहण करते थे। यहां २००० शिक्षक छात्रों को पढ़ाते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अदभूत नमूना था। यह पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था तथा इसमें प्रवेश के लिए केवल एक ही मुख्य द्वार था। इस परिसर में आठ विशाल भवन, दस मंदिर, कई प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष थे। इसके अलावा यहां सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी। यहां विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। यहां उनके रहने के लिए ३०० कक्ष बने थे, जिनमें अकेले या एक से अधिक छात्रों के रहने की व्यवस्था थीं। यहां के नौ तल के पुस्तकालय में ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था।[२] इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। ये पुस्तकें खिलजी के आक्रमण के बाद छः महीनों तक जलती रहीं। इस विश्वविद्यालय में केवल भारत से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। यहां विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शनशास्त्र, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। यहां खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था। यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे:
    * रत्नसागर पुस्तकालय
    * विद्यासागर पुस्तकालय
    * ग्रंथागार पुस्तकालय
इस विश्वविद्यालय के अवशेष चौदह हेक्टेयर क्षेत्र में मिले हैं। खुदाई में मिली सभी इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया था। यह परिसर दक्षिण से उत्तर की ओर बना हुआ है। मठ या विहार इस परिसर के पूर्व दिशा में व चैत्य (मंदिर) पश्चिम दिशा में बने थे। इस परिसर की सबसे मुख्य इमारत विहार-१ थी। आज में भी यहां दो मंजिला इमारत शेष है। यह इमारत परिसर के मुख्य आंगन के समीप बना हुई है। संभवत: यहां ही शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित किया करते थे। इस विहार में एक छोटा सा प्रार्थनालय भी अभी सुरक्षित अवस्था में बचा हुआ है। इस प्रार्थनालय में भगवान बुद्ध की भग्न प्रतिमा बनी है। यहां स्थित मंदिर नं ३ इस परिसर का सबसे बड़ा मंदिर है। इस मंदिर से समूचे क्षेत्र का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यह मंदिर कई छोटे-बड़े स्तूपों से घिरा हुआ है। इन सभी स्तूपों में भगवान बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां बनी हुई है।
नालन्दा पुरातात्विक संग्रहालय
विश्वविद्यालय परिसर के विपरीत दिशा में एक छोटा सा पुरातात्विक संग्रहालय बना हुआ है। इस संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है। इसमें भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। इनके साथ ही बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियां और प्रथम शताब्दी के दो मर्तबान भी इस संग्रहालय में रखा हुआ है। इसके अलावा इस संग्रहालय में तांबे की प्लेट, पत्थर पर खुदे अभिलेख, सिक्के, बर्त्तन तथा १२वीं सदी के चावल के जले हुए दाने रखे हुए हैं।
नव नालन्दा महाविहार
यह एक शिक्षण संस्थान है। इसमें पाली साहित्य तथा बौद्ध धर्म की पढ़ाई तथा शोध होती है। यह एक नया स्थापित संस्थान है। इसमें दूसरे देशों के छात्र भी पढ़ाई के लिए यहां आताे हैं।
ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल
यह एक नवर्निमित भवन है। यह भवन चीन के महान तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग की स्मृति में बनवाया गया है। इसमें ह्वेनसांग से संबंधित वस्तुएं तथा उनकी मूर्ति देखी जा सकती है।
नालन्दा विशविधालय – पुनर्जीवन का प्रयास :

नालंदा विश्वविद्यालय के नाम पर एक नए विश्वविद्यालय की स्थापना  भारत सरकार द्वारा इसके पुनर्जीवन का प्रयास है । प्रसिद्ध नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अमर्त्य सेन के अनुसार वर्ष २०१० तक शैक्षणिक सत्र भी आरंभ हो जाएगा। इसके पुनर्जीवन प्रयास में सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग देने का वादा किया है। इसके ऊपर संसद में विधेयक पारित होने पर इसके भवन का निर्माण भी शुरु हो जाएगा। इसमें ईस्ट एशिया सम्मेलन के १६ देश आर्थिक सहयोग देंगे।
साभारविकीपीडिया

Monday, June 1, 2009

The Five Hindrances

Moments of Awakening “  is a page created  by Allan O'Marra ; It’s a series of paintings that metaphorically illustrate moments of transcendence on the path to the realization of enlightenment.
The Buddha likened the 5 hindrances to 5 kinds of impurities affecting a bowl of water, preventing one from seeing one's own reflection as it really is & they are :

  • Sensual Desire or Greed
  • Aversion or Ill-will
  • Sloth and Torpor
  • Restlessness and Anxiety
  • Doubt

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Sensual Desire or Greed : is like a colorful water surface colored by paint, that interferes with our ability to see clearly.

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Aversion or Ill-will  : is like a bubbling, boiling water surface that obscures our ability to see clearly. 

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Sloth and Torpor : is like a stagnant water surface that obscures our ability to see clearly.  

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Restlessness and Anxiety  : is like a churned up water surface with waves that interferes with our ability to see clearly.

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Doubt : is like a muddy water surface that clouds our ability to see clearly.

Source : www. audiodharmacourse.org

Monday, May 25, 2009

Buddhist Calendar

Yesterday I came across to this beautiful Buddhist Calendar in Flickr . It was uploaded by an artist h.koppdelany . Enjoy & have fun! & don't forget to say thanks to him for such a beautiful collections .

Wednesday, May 20, 2009

Seeing the Disgusting Aspects of Food disables Craving!

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सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं।

भोजनम्हि चामत्तञ्‍ञुं, कुसीतं हीनवीरियं।

तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खंव दुब्बलं॥

अच्छी लगने वाली चीजों को शुभ ही शुभ देखते विहार करने वाले , इंद्रियों मे असंयत , भोजन की मात्रा के अजानकार , आलसी और उधोगहीन को मार ऐसे सताता है जैसे दुर्बल वृक्ष को मारुत ( पवन )

Just as a storm throws down a weak tree,so does Mara overpower the person who lives for the pursuit of pleasures, who is uncontrolled in one's senses, immoderate in eating, indolent and dissipated.  ……Dhammapada

The Blessed Buddha once said:
The experience of loathsome disgust with all food, Bhikkhus & friends,developed and frequently repeated, brings a high reward and blessing, and has the Deathless Dimension as its basis & the very nearby goal. Whoever, Bhikkhus & friends, often trains perceiving disgust with food, his mind shrinks and turns away from voracious greed, he is neither attracted, captivated or tempted, but feels only equanimity or disgust! Just as, Bhikkhus & friends, a cock's feather or a piece of bowstring, thrown into the fire, shrinks up, twists, rolls itself up, does not stretch out again: just so in one who often entertains the experience of disgust
in all food, the mind shrinks back from greediness, turns away from it, is repulsed by food, is not attracted; and equanimity or disgust arises!

Source: The Numerical Discourses of the Buddha. Anguttara Nikāya AN 7:46
http://What-Buddha-Said.net/Canon/Sutta/AN/Index.Numerical.htm

The experience of Disgust in Food includes:
Seeing it brings the danger and tribulation of having a fragile and sore body.
Seeing what it becomes like when chewed and sunk: Like dogs vomit!
Seeing that getting it daily costs one much pain of seeking, work & cleaning.
Seeing that it is turned into secretions as bile, pus, blood, snot, slime & spit.
Seeing that it undigested stays as vomit in the foul receptacle of the stomach.
Seeing that it when digested is turned into diarrheic brown fluid in the intestines.
Seeing that it causes a lifelong excretion of stinking messy excrement & urine.
Seeing the side effects of obesity, diabetes, cardiac failure and hypertension.

Source: Path of Purification: Visuddhimagga XI 5th century AC.

http://www.pariyatti.com/book.cgi?prod_id=771100