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Tuesday, November 22, 2011

“इहि पस्सिको ”- आओ और देखो


इहि पस्सिको


बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो भि देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।
कहते हैं कि एक बार बुद्ध अपने कुछ अनुयायियों  के साथ यात्रा कर रहे  थे . जब वे एक झील के पास से गुजर रहे थे तब बुद्ध को प्यास की  अनूभूति हुई , तब बुद्ध ने अपने एक अनुयायी से कहा , " भिक्षुक मुझे प्यास लगी है  और  इस झील से पानी लेकर आओ’। ” जैसे ही शिष्य झील के समीप पहुँचा उसी समय    एक बैलगाड़ी झील से होती हुई गुजरी  ।  परिणाम स्वरुप झील का पानी बहुत गन्दा और मटमैला हो गया । तब  शिष्य ने सोचा, "मैं बुद्ध को  यह  गंदा पानी पीने के लिये कैसे दे सकता हूँ ?"   वह वापस आ गया और बुद्ध से कहा, " शास्ता पानी तो  वहाँ बहुत गंदा है और मुझे नहीं लगता कि यह पीने के लिए उपयुक्त  है."  लगभग आधे घंटे के बाद, बुद्ध ने दोबारा शिष्य से पानी लने के लिये कहा । वह वापस  झील के नजदीक गया और उसने पाया   कि पानी अभी भी मैला था.  वह लौट आया  और  बुद्धको सूचित किया.  कुछ समय बाद फिर से बुद्ध ने  शिष्य  को वापस जाने के लिए कहा . इस बार  शिष्य ने पाया कि पानी अपेक्षाकृत काफ़ी साफ़ है , मिट्टी नीचे बैठ चुकी है  ।  वह एक बर्तन में थोड़ा सा पानी एकत्र कर के बुद्ध के लिये ले गया । बुद्ध ने पानी में देखा, और अनुयायी को देखते हुये कहा , " आयुस तुम जानते हो कि तुमने पानी को साफ़ करने के लिये क्या किया , तुमने पानी को कुछ देर के लिये छॊड दिया और मिट्टी नीचे बैठ गयी । इसी तरह यह मन भी है , अगर वह परेशान है , व्याकुल है तो उसे थोडा समय दो , वह अपने आप शांत हो जायेगा । तुमको उसे शांत करने के लिये कोई विशेष प्रयास नही करना है , मन की शांति एक सरल प्रक्रिया है , इसके लिये विशेष प्रयास  नही करना पडता है ।”
( बुद्ध से संबधित इस गाथा के लिये साभार : रोहित पवार )

Tuesday, August 10, 2010

भिक्षुणी अम्बपाली (आम्रपाली) के अद्भुत उद्गार

 

buddhaभगवान बुद्ध के प्रभाव में आकर वैशाली की पिंगला-गणिका अम्बपाली (आम्रपाली) एक दिन भिक्षुणी हो गई. उसने समाधि की उच्चतम अवस्था का स्पर्श किया और पूर्णता प्राप्त भिक्षुणियों में वह एक हुई. अपने निरंतर जर्जरित होते हुए शरीर में बुद्ध-वचनों की सत्यता को प्रतिफलित होते देख अम्बपाली हमारे लिए कुछ उद्गार छोड़ गयी है जो अनित्यता की भावना से भरे हुए हैं. वह कहती है:-

काले, भौंरे के रंग के सामान, जिनके अग्र भाग घुंघराले हैं, ऐसे एक समय मेरे बाल थे.
वही आज जरावस्था में जीर्ण सन के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पुष्पाभरणों से गुंथा हुआ मेरा केशपाश कभी हजारा चमेली के पुष्प की सी गंध वहन करता था.
उसी में से आज जरावस्था में खरहे के रोओं की सी दुर्गन्ध आती है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कंघी और चिमटियों से सजा हुआ मेरा सुविन्यस्त केशपाश कभी सुन्दर रोपे हुए सघन उपवन के सदृश शोभा पाता था.
वही आज जराग्रस्त होकर जहाँ-तहाँ से बाल टूटने के कारण विरल हो गया है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सोने के गहनों से सुसज्जित, महकती हुई सुगंधियों से सुशोभित, चोटियों से गुंथा हुआ कभी मेरा सिर रहा करता था.
वही आज जरावस्था में भग्न और नीचे लटका हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

चित्रकार के हांथों से कुशलतापूर्वक अंकित की हुई जैसे मेरी दो भौंहें थीं.
वही आज जरा के कारण झुर्रियां पड़ कर नीचे लटकी हुई हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

गहरे नीले रंग की दो उज्जवल, सुन्दर, मणियों के समान मेरे दो विस्तृत नेत्र थे.
वही आज बुढ़ापे से अभिहत हुए भद्दे और आभाहीन हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

उठते हुए यौवन की सुन्दर शिखर के समान वह मेरी कोमल, सुदीर्घ नासिका थी.
वही आज जरावस्था में दबकर पिचकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पूरी कारीगरी के साथ बनाये हुए, सुन्दर, सुगठित कंकण के समान, कभी मेरे कानों के सिरे थे.
वही आज जरावस्था में झुर्री पड़कर नीचे लटके हुए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कदली-पुष्प की कली के समान रंगवाले कभी मेरे सुन्दर दांत थे.
वही आज जरावस्था में खंडित होकर जौ के समान पीले रंगवाले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

वनचारिणी कोकिला की मधुर कूक के समान एक समय मेरी प्यारी मीठी बोली थी.
वही आज जरा के कारण स्खलित और भर्राई हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

अच्छी तरह खराद पर रखे हुए, चिकने शंख के समान, एक समय मेरी सुन्दर ग्रीवा थी.
वही आज जरावस्था में टूटकर नीचे लटकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुगोल गदा के समान एक समय मेरी दोनों सुन्दर बांहें थीं.
वही आज जरावस्था में पाडर वृक्ष की दुर्बल शाखाओं के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर मुंदरी और स्वर्णालंकारों से विभूषित कभी मेरे हाथ रहते थे.
वही आज जरा के कारण गाँठ-गठीले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

स्थूल, सुगोल, उन्नत, कभी मेरे स्तन सुशोभित होते थे.
वही आज जरावस्था में पानी से रीती लटकी हुई चमड़े की थैली के सदृश हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, विशुद्ध, स्वर्ण-फलक के समान कभी मेरा शरीर चमकता था.
वही आज जरावस्था में झुर्रियों से भरा हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

हाथी की सूंड के समान कभी मेरे सुन्दर उरु-प्रदेश थे.
वही आज पोले बांस की नली के समान हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर नूपुर और स्वर्णालंकारों से सजी हुई कभी मेरी जंघाएँ रहती थीं.
वही आज जरावस्था में तिल के सूखे डंठल के समान हो गईं हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, सुकोमल, रुई के फाहे के समान कभी मेरे दोनों पैर थे.
वही आज जरावस्था में झुर्रियां पड़कर सूखे काठ से हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

एक समय यह शरीर ऐसा था. इस समय वह जर्जर और बहुत दुखों का घर है.
जीर्ण घर जैसे बिना लिपाई-पुताई के गिर जाता है, उसी प्रकार यह जरा का घर, यह शरीर बिना थोड़ी सी रखवाली किये गिर जायेगा.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

(श्री भरतसिंह उपाध्याय की पुस्तक ‘बुद्ध और बौद्ध साधक’ से लिया गया अंश, आभार सहित)

(A Buddhist anecdote about Amrapali / Ambapali – in HIndi)

साभार : HINDIZEN-निशांत का ब्लाग

Sunday, August 8, 2010

लोक-अपवाद को जीतना

image कुरु देश में मागंदिय नाम का अग्निपूजक ब्राह्मण रहता था। मागंदिया उसकी एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। मागंदिय ने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, परन्तु योग्य वर न मिला। बड़े-बड़े कुलों से कन्या की मँगनी आयी, लेकिन मागंदिया को वर पसन्द न आया।
एक दिन बुद्ध भगवान् प्रातःकाल अपना पात्र और चीवर लेकर नगर के बाहर ब्राह्मण के अग्नि-स्थान के पास खड़े हुए।
बुद्ध को देख ब्राह्मण ने सोचा- इसके समान किसी अन्य पुरुष का मिलना दुर्लभ है। मैं क्यों न इसके साथ अपनी कन्या की शादी कर दूँ ?
ब्राह्मण ने भगवान् से निवेदन किया-‘‘हे श्रमण ! मैंने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, मगर कोई वर न मिला। बड़े भाग्य से आप मिले हैं। मागंदिया बहुत रूपवती है। वह सचमुच आपके चरणों की दासी बनने योग्य है।’’
इतना कह ब्राह्मण अपनी कन्या को लाने के लिए चल दिया। बुद्ध को वह वहीं ठहरने के लिए कहता गया।
जल्दी-जल्दी घर पहुँच ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-‘‘भद्रे ! कन्या के लिए वर मिल गया है। जल्दी करो, वस्त्राभूषणों से सज्जित कर मागंदिया को ले चलो।’’
नगर के लोगों को जब मालूम हुआ कि मागंदिया को अपनी कन्या के लिए वर मिल गया है तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भी ब्राह्मण के साथ-साथ वर देखने चले।
बुद्ध उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र गमन कर गये थे। अतः ब्राह्मणी को जब वहाँ कोई न दिखायी दिया तो उसने ब्राह्मण से जिज्ञासा व्यक्त की। ब्राह्मण बोला-‘‘मैं तो उससे यहीं रुकने को कह गया था, किन्तु वह न जाने कहाँ चला गया !’’
इधर-उधर ढूँढ़ने के बाद ब्राह्मण को बुद्ध के पद-चिह्न दिखाई दिये। ब्राह्मणी लक्षणशास्त्र की पण्डित और तीनों वेदों में पारंगत थी। उसने लक्षण विचारकर कहा कि ये पद-चिह्न किसी विषयभोगी के नहीं, किसी तपस्वी के जान पड़ते हैं।
ब्राह्मण को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने अपनी पत्नी से कहा-‘‘ब्राह्मणी ! तुम्हें हमेशा पानी में मगर और घर में चोर दिखाई देते हैं। तुम्हें कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत नहीं।’’
ब्राह्मणी ने उत्तर दिया-‘‘आप चाहे जो कहें, ये पैर किसी विषयभोगी के नहीं हो सकते।’’
ब्राह्मण ने बुद्ध को दूर से देख ब्राह्मणी से कहा-‘‘देखो, देखो, वह है मागंदिया का वर !’’ और तीर की तरह बुद्ध के पास जाकर बोला-‘‘हे भिक्षु ! मैं आपकी सेवा में अपनी कन्या समर्पित करता हूँ।’’
बुद्ध ने कोई उत्तर न देकर ब्राह्मण से कहा-‘‘देखो ब्राह्मण ! अपने महाभिनिष्क्रमण के समय से लगाकर अजापालनिग्रोध वृक्ष के नीचे बोधि प्राप्त करने तक कामदेव ने मुझे कितने कष्ट दिये ! कितना सताया ! जब वह मेरा कुछ न बिगाड़ सका तो एक दिन वह उदास होकर बैठा था कि इतने में उसकी कन्याएँ वहाँ आयीं और उसे सान्त्वना देकर कहने लगीं-‘‘पिताजी, आप क्यों चिन्ता करते हैं। आज्ञा हो तो हम बुद्ध का ध्यान भंग करें।’ लेकिन हे ब्राह्मण ! विषय-भोगों के प्रति मेरी तनिक भी कामना नहीं। यह शरीर मल-मूत्र का भण्डार है। मैं इसका स्पर्श तक करना नहीं चाहता।’’
बुद्ध की बातें सुनकर ब्राह्मण-कन्या मागंदिया को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा-यदि इस भिक्षु को मेरी आवश्यकता नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन यह मेरा अपमान क्यों करता है ? मैं अच्छे कुल में पैदा हुई हूँ, भोग-विलास की मुझे कमी नहीं, सौन्दर्य मेरे चरणों में लोटता है, निस्सन्देह मैं योग्य पति पाऊँगी। फिर यह भिक्षु मुझे इस तरह के वचन क्यों कहता है ? मैं बदला लिये बिना न रहूँगी।
दिन जाते देर नहीं लगती। कुछ समय के बाद मागंदिया के माता-पिता ने अपने भाई चुल्ल मागंदिय को अपनी कन्या सौंपकर प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
चुल्ल मागंदिय ने सोचा मागंदिया को किसी राजा की रानी बनना चाहिए। वस्त्राभूषणों से सजाकर वह उसे कौशाम्बी ले गया और राजा उदयन के साथ विवाह कर दिया।
राजा उदयन मागंदिया को बहुत चाहता था। उसने उसे पटरानी के पद पर अभिषिक्त कर दिया। पाँच सौ दासियाँ उसकी सेवा में रहने लगीं।
एक बार रानी मागंदिया अपने महल से उतरकर घूम रही थीं। पता लगा कि श्रमण गौतम कौशाम्बी आ रहा है। उसने नगर वासियों को प्रलोभन देकर आदेश दिया कि जब श्रमण गौतम नगरी में प्रवेश करें तो वे अपने नौकर-चाकर के साथ मिलकर उसे अपशब्द कह नगर से निकाल दें।
बुद्ध ने नगर में प्रवेश किया तो लोग उन्हें चोर, मूर्ख, ऊँट, बैल, गधा, नारकी, पशु आदि शब्दों से सम्बोधित कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहने लगे-‘‘याद रख श्रमण, तुझे अच्छी गति मिलनेवाली नहीं। तू मरकर दुर्गति को प्राप्त होगा !’’
नगरवासियों के ये वचन सुनकर भगवान् के प्रिय शिष्य आनन्द ने बुद्ध से कहा-‘‘भन्ते ! ये नागरिक हमें अपशब्द कहते हैं। चलिए कहीं अन्यत्र चलकर रहें।’’
बुद्ध-आनन्द, कहाँ जाना चाहते हो ?
आनन्द-किसी दूसरे नगर में ! बुद्ध-यदि वहाँ भी लोगों ने अपशब्द कहे तो कहाँ जाओगे ? आनन्द-अन्यत्र कहीं ! बुद्ध-अगर वहाँ के लोगों ने भी ऐसा बर्ताव किया ? आनन्द-भन्ते, वहाँ से अन्यत्र चले जाएँगे ! बुद्ध-आनन्द, यह ठीक नहीं ! देखो, जहाँ लोकापवाद होता हो, वह जब तक शान्त न हो जाये, तब तक, उस नगर को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहिए। तथा आनन्द, जानते हो अपवाद करने वाले लोग कौन हैं ? आनन्द-भन्ते, नौकर-चाकर तक हमें अपशब्द कहते हैं ! बुद्ध-देखो आनन्द, मैं संग्राम में आगे बढ़े हुए हाथी के समान निश्चल हूँ ! यदि चारों दिशाओं से हाथी को तीर आकर लगें तो वीरतापूर्वक डटे खड़े रहना चाहिए। इसी प्रकार अनेक दुष्ट पुरुषों के अपवाद को सहन करना मेरा कर्तव्य है। याद रखो आनन्द, वश में किये हुए खच्चर, सिन्धु देश के घो़ड़े तथा जंगली हाथी उत्तम समझे जाते हैं, लेकिन इन सबसे उत्तम वह है जो अपने आपको वश में रखता है !

Sunday, June 20, 2010

सिमसा वृक्ष के पत्ते और बुद्ध का चितंन

Simsapa leaves

एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे  विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों  को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने  हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह  या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “

भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “

इसी तरह  भिक्षुओं ऐसी अनगिनत  चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को  नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और  न ही मन को शांत करती है ।

इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को  दूर करता हैं और मन को शांत करता है ।

संयुत्त निकाय 56.31

( हिन्दी मे ’ The Simsapa Leaves-Simsapa Sutta ’ से अनुवादित )

Saturday, May 29, 2010

बिलाल्पादक की कथा

किसी नगर में बिलाल्पादक नामक एक धनिक रहता था. वह बहुत स्वार्थी था और सदाचार के कार्यों से कोसों दूर रहता था. उसका एक पड़ोसी निर्धन परन्तु परोपकारी था. एक बार पड़ोसी ने भगवान् बुद्ध और उनके शिष्यों को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया. पड़ोसी ने यह भी विचार किया कि इस महान अवसर पर अधिकाधिक लोगों को भोजन के लिए बुलाना चाहिए. ऐसे संकल्प के साथ पड़ोसी ने बड़े भोज की तैयारी करने के लिए नगर के सभी व्यक्तियों से दान की अपेक्षा की एवं उन्हें भोज के लिए आमंत्रित किया. पड़ोसी ने बिलाल्पादक को भी न्यौता दिया.

भोज के एक-दो दिन पहले पड़ोसी ने चहुँओर घूमकर दान एकत्र किया. जिसकी जैसी सामर्थ्य थी उसने उतना दान दिया. जब बिलाल्पादक ने पड़ोसी को घर-घर जाकर दान की याचना करते देखा तो मन-ही-मन सोचा – “इस आदमी से खुद का पेट पालते तो बनता नहीं है फिर भी इसने इतने बड़े भिक्षु संघ और नागरिकों को भोजन के लिए आमंत्रित कर लिया! अब इसे घर-घर जाकर भिक्षा मांगनी पद रही है. यह मेरे घर भी याचना करने आता होगा.”

जब पड़ोसी बिलाल्पादक के द्वार पर दान मांगने के लिए आया तो बिलाल्पादक ने उसे थोड़ा सा नमक, शहद, और घी दे दिया. पड़ोसी ने प्रसन्नतापूर्वक बिलाल्पादक से दान ग्रहण किया परन्तु उसे अन्य व्यक्तियों के दान में नहीं मिलाया बल्कि अलग से रख दिया. बिलाल्पादक को यह देखकर बहुत अचरज हुआ कि उसका दान सभी के दान से अलग क्यों रख दिया गया. उसे यह लगा कि पड़ोसी ने सभी लोगों के सामने उसे लज्जित करने के लिए ऐसा किया ताकि सभी यह देखें कि इतने धनी व्यक्ति ने कितना तुच्छ दान दिया है.

बिलाल्पादक ने अपने नौकर को पड़ोसी के घर जाकर इस बात का पता लगाने के लिए कहा. नौकर ने लौटकर बिलाल्पादक को बताया कि पड़ोसी ने बिलाल्पादक की दान सामग्री को थोड़ा-थोड़ा सा लेकर चावल, सब्जी, और खीर आदि में मिला दिया. यह जानकार भी बिलाल्पादक के मन से जिज्ञासा नहीं गयी और उसे अभी भी पड़ोसी की नीयत पर संदेह था. भोज के दिन वह प्रातः अपने वस्त्रों के भीतर एक कटार छुपाकर ले गया ताकि पड़ोसी द्वारा लज्जित किये जाने पर वह उसे मार डाले.

वहां जानेपर उसने पड़ोसी को भगवान् बुद्ध से यह कहते हुए सुना – “भगवन, इस भोज के निमित्त जो भी द्रव्य संगृहीत किया गया है वह मैंने नगर के सभी निवासियों से दान में प्राप्त किया है. कम हो या अधिक, सभी ने पूर्ण श्रद्धा और उदारता से दान दिया अतः सभी के दान का मूल्य सामान है.”

पड़ोसी के यह शब्द सुनकर बिलाल्पादक को अपने विचारों की तुच्छता का बोध हुआ और उसने अपनी गलतियों के लिए सभी के समक्ष पड़ोसी से क्षमा माँगी.

बिलाल्पादक के पश्चाताप के शब्दों को सुनकर बुद्ध ने वहां उपस्थित समस्त व्यक्तियों से कहा – “तुम्हारे द्वारा किया गया शुभ कर्म भले ही कितना ही छोटा हो पर उसे तुच्छ मत जानो. छोटे-छोटे शुभ कर्म एकत्र होकर भविष्य में विशाल रूप धारण कर लेते हैं”.

“जब कभी तुम कोई शुभ कर्म करो तब यह मत सोचो कि ‘इतने छोटे कर्म से मुझे कुछ प्राप्त नहीं होगा’. जिस प्रकार बारिश का पानी बूँद-बूँद गिरकर पात्र को पूरा भर देता है उसी प्रकार सज्जन व्यक्तियों के छोटे-छोटे शुभकर्म भी धीरे-धीरे संचित होकर विशाल संग्रह का रूप ले लेते हैं”. – धम्मपद १२२

“जिस प्रकार धनी व्यक्ति निर्जन पथ से और लम्बा जीने की कामना करने वाले विष से दूर रहते हैं उसी प्रकार सभी को पाप एवं अशुभ से दूर रहना चाहिए”. – धम्मपद १२३

(A Buddhist story of Bilalpadaka – Merits of giving – ‘Dana’ – in Hindi)

साभार : Hindizen – निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग