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Monday, March 6, 2017

तवांग मोनेस्ट्री ( Tawang Monastery ) अरुणाचल प्रदेश,भारत

Tawang_Monastery_(Tibetan_Buddhist)

 

तवांग मठ भारत के अरुणाचल प्रदेश में स्थित एक बौद्ध मठ है। यह भारत का सबसे बड़ा बौद्ध मठ है और ल्हासा के पोताला महल के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। यह तवांग नदी की घाटी में तवांग कस्बे के निकट स्थित है।

300 साल पहले बने इस मठ को बौद्ध भिक्षु अंतरराष्ट्रीय धरोहर मानते हैं। इसे 1680 में मेराक लामा लोद्रे ग्यास्तो ने बनवाया। इसमें 570 से ज्यादा बौद्ध भिक्षु रहते हैं। समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर तवांग चू घाटी में बने इस मठ में दुनिया भर के बौद्ध भिक्षु और पर्यटक आते हैं। पहाड़ी पर बने होने के कारण तवांग मठ से पूरी त्वांग घाटी के खूबसूरत दृश्य देखे जा सकते हैं।

यह मठ दूर से दुर्ग जैसा दिखाई देता है। इसके प्रवेश द्वार का नाम 'काकालिंग' है जो देखने में झोपडी जैसा लगता है और इसकी दो दीवारों के निर्माण में पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इन दीवारों पर खूबसूरत चित्रकारी की गई है जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है

तेजपुर हवाई अड्डे से 143 किमी की दूरी पर स्थित

ट्रेन से तेजपुर स्टेशन सबसे करीब

तेजपुर (असम) से टैक्सी और बस आसानी से तवांग और बोमडिला तक

 

साभार : बुद्धकथाएँ

Wednesday, September 14, 2016

तीन गांठें

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भगवान‌ बुद्ध अकसर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे । बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे ।
वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे ; तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
एक शिष्य ने उत्तर में कहा,” गुरु जी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है । दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है।”
“सत्य है !”, बुद्ध ने कहा ,” अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”
“नहीं-नहीं , ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा। “, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।
बुद्ध ने कहा, ‘ ठीक है , अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’
शिष्य बोला ,’”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा , ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था , और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं। “
“मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असम्भव है। मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं , कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ ? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया , लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ ?
प्रिय शिष्यों , जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही , और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा, आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें, निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । ” , महात्मा बुद्ध ने अपनी बात पूरी की।
जब तक हम रस्सी की गाँठो को अच्छे से देख कर समझेंगे नहीं,तब तक उसे खोल न सकेंगे।
"विपश्यना" से हम अपने मन की गाँठो को देखने,समझने और उसके बाद उन्हें खोलने का कार्य करते हैं।

Wednesday, October 7, 2015

वसलसुत्तं–कौन है जातिच्‍युत ( Vasala Sutta: Discourse on Outcasts )

 
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                                   वसल सुत्त ( हिन्दी ) - कौन है जातिच्‍युत             
ऐसा मैने सुना । एक समय भगवान्‌ श्रावस्ती मे अनाथपिण्डक के जेतवाराम में विहार करते थे । तब भगवान्‌ पूर्वान्ह समय पात्र और चीवर पहनकर श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिये प्रविष्ट हुये । उस समय अग्निकभारद्धाज ब्राह्म्न्ण के घर मे अग्नि प्रज्विल्लित हो रही थी , जिसमे आहुति की सामाग्री डाली गई थी । अग्निकभारद्धाज ब्राहम्ण ने भगवान्‌ को दूर से ही आते देखा । देखकर भगवान्‌ से यह कहा – “ वही मुण्डक ! वही श्रमणक ! वही वृषलक ! ठहरो । ” ऐसा कहने पर भगवान्‌ ने अग्निकभारद्धाज से ऐसा कहा – “ ब्राहम्ण क्या तुम वृषल ( नीच ) या वृषल बनाने वाली बातों को जानते हो । ? ”
‘ हे गौतम मै वृषल या वृषल बानाने वाली बातों को नही मानता हूँ । अच्छा हो कि हे गौतम ! आप मुझे वैसा धर्मोपदेश दें ताकि मै  वृषल या वृषल बानाने वाली बातों को मान और जान सकूँ । ’
तो ब्राहम्ण भली भाँति सुनो और मन में, धारण करॊ ।
बहुत अच्छा , कहकर अग्निकभारद्धाज ने भगवान को उत्तर दिया । तब भगवान्‌ ने यह कहा -
१. जो नर क्रोधी , बँधे पैर वाला , बहुत ईर्ष्यालु , मिथ्यादृष्टि वाला और  मा्यावी है , उसे वृषक जानें ।
२. जो योनिज या अण्डज किसी भी प्राणी की हिंसा करता है , जिसे प्राणियों के प्रति दया नही है , उसे वृषल जानें ।
३. जो ग्रामों और कस्बों को नष्ट करता और घेरता है , जो अत्याचारी के रुप मे प्रसिद्ध है , उसे वृषल जानें ।
४. जो ग्राम या अरण्य मे जो दूसरॊ की अपनी सम्पति है , उसे चोरी से ले जाता है , उसे  वृषल जानें ।
५. जो ऋण लेकर माँगने पर “ तेरा ऋण नही है ” कहकर भागता है , उसे वृषल जानें ।
६. जो किसी चीज की इच्छा से मार्ग में, चलते हुये व्यक्ति  को मारकर कुछ ले लेता है , उसे वृषल जानें ।
७. जो नर अपने या दूसरे के धन के लिये झूठी गवाही देता है , उसे वृषल जानें ।
८. जो जबरद्स्ती या प्रेम से भाई – बन्धुओं  या मित्रों की स्त्रियों के साथ दिखाई देता है ,उसे वृषल जानें ।
९. जो समर्थ होते हुये भी अपने माता पिता , बूढे –पुरनियाँ का भरण पोषण नही करता है , उसे वृषल जानें ।
१०. जो माता –पिता , भाई , बहिन या सासु को मारता या कडे वचन से क्रोध करता है , उसे वृषल जानें ।.
११. जो भलाई की बात पूछने पर बुराई का रास्ता दिखाता है ,  उसे वृषल जानें ।
१२. जो पाप कर्म कर के “ लोग मुझे न जानें “ – ऐसा चाहता है , जो  छिपे कर्म करने वाला है , उसे वृषल जानें ।
१३. जो दूसरे के घर जाकर स्वादिष्ट भोजन करता है और उसके आने पर स्वागत सत्कार नही करता , उसे वृषल जानें ।
१४. जो ब्राहम्ण , श्रमण , या भिखारी को झूठ बोलकर धोखा देता है , उसे वृषल जानें ।
१५. जो भोजन के समय आये श्रमण या ब्राहम्ण से क्रोध से बोलता है और उसे कुछ नही देता है , उसे वृषल जानें ।
१६. जो मोह से मोहित होकर किसी चीज को चाहता और झूठ बोलता है , उसे वृषल जानें ।
१७. जो अपनी बडाई करता है और दूसरे की निन्दा करता है , और अपने उस अभिमान से गिर गया हो , उसे वृषल जानें ।
१८. जो क्रोधी , कंजूस और बुरी इच्छा वाला , कृपण , शठ , निर्लज्ज और असंकोची है , उसे वृषल जानें ।
१९. जो बुद्ध और उनके प्रवजित अथवा गृहस्थ शिष्यों को गाली देता है , उसे वृषल जानें ।
२०. जो अर्हत न होते हुये भी अपने को अर्हत बताता है , वह ब्रह्म सहित सारे लोक मे चोर है और वह अधम वृषल है । मैने इतने वृषलों को तुमको बतलाया है ।
२१. कोई जाति  से वृषल नही होता और न जाति से ब्राहम्ण होता है । कर्म से कोई वृषल होता है और कर्म से ब्राहम्ण भी होता है ।
२२. इस उदाहरण से भी जानॊ कि चण्डाल पुत्र सोपाक जो मातंग नाम से प्रसिद्ध था ।
२३. उस मांतग ने जिस महान यश को प्राप्त किया , वह दूसरों के लिये बहुत ही दुर्लभ था । उसकी सेवा मे बहुत ही छ्त्रिय और ब्राहम्ण आया करते थे ।
२४. वह कामराग को त्याग कर दिव्य रथ मे सवार होकर , शुद्ध महापथ से ब्र्ह्मलोक चला गया । उसके ब्रह्म लोक मे उत्पन्न होने मे कोई जाति उसको रोक न पायी ।
२५. जो वेद पाठियों के घर में वेद मंत्रो के जानकार ब्राहम्ण हैं , वे भी नित्य पाप कर्मॊ में संलग्न दिखाई देते हैं ।
२६. इस जन्म मे ही उनकी निन्दा होती है और परलोक मे दुर्गति को प्राप्त होते हैं । उन्हें दुर्गति और निन्दा से जाति बचा नही पाती ।
२७. जाति से कोई न वृषल ( नीच ) होता है और न जाति से कोई ब्राह्म्ण होता है । कर्म से ही कोई वृषल होता है और कर्म से ही ब्राहम्ण होता है ।
ऐसा कहने पर अग्निकभारद्धाज ब्राह्म्न्ण ने भगवान्‌ से ऐसा कहा – “ आशचर्य है , हे गौतम , जैसे कि हे गौतम ! उल्टे हुये बर्तन को सीधा कर दे , ढँके हुये को उधाड दे , रास्ता भूले को रास्ता दिखा दे अथवा अन्धकार में तेल के प्रदीप को धारण करे , जिससे कि आँख वाले लोग चीजॊ को देख सके , ऐसे ही आप गौतम द्वारा अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है । यह मै आप गौतम की शरण मे जाता हूँ , धर्म और भिक्षुसंघ की भी । मुझे आप गौतम आज से ही जीवन पर्यन्त शरणागत उपासक धारण करें ।
                                                   वसल सुत्त ( पालि )             
एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि। तेन खो पन समयेन अग्गिकभारद्वाजस्स ब्राह्मणस्स निवेसने अग्गि पज्‍जलितो होति आहुति पग्गहिता। अथ खो भगवा सावत्थियं सपदानं पिण्डाय चरमानो येन अग्गिकभारद्वाजस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमि।
अद्दसा खो अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवन्तं दूरतोव आगच्छन्तं। दिस्वान भगवन्तं एतदवोच – ‘‘तत्रेव [अत्रेव (स्या॰ क॰)], मुण्डक; तत्रेव, समणक; तत्रेव, वसलक तिट्ठाही’’ति।
एवं वुत्ते, भगवा अग्गिकभारद्वाजं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘जानासि पन त्वं, ब्राह्मण, वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे’’ति? ‘‘न ख्वाहं, भो गोतम, जानामि वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे; साधु मे भवं गोतमो तथा धम्मं देसेतु, यथाहं जानेय्यं वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे’’ति। ‘‘तेन हि, ब्राह्मण, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भो’’ति खो अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवतो पच्‍चस्सोसि। भगवा एतदवोच –
१.. ‘‘कोधनो उपनाही च, पापमक्खी च यो नरो।
विपन्‍नदिट्ठि मायावी, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
२. ‘‘एकजं वा द्विजं [दिजं (पी॰)] वापि, योध पाणं विहिंसति।
यस्स पाणे दया नत्थि, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
३.‘‘यो हन्ति परिरुन्धति [उपरुन्धेति (स्या॰), उपरुन्धति (क॰)], गामानि निगमानि च।
निग्गाहको [निग्घातको (?)] समञ्‍ञातो, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
४.‘‘गामे वा यदि वा रञ्‍ञे, यं परेसं ममायितं।
थेय्या अदिन्‍नमादेति [अदिन्‍नं आदियति (सी॰ पी॰)], तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
५.‘‘यो हवे इणमादाय, चुज्‍जमानो [भुञ्‍जमानो (?)] पलायति।
न हि ते इणमत्थीति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
६.‘‘यो वे किञ्‍चिक्खकम्यता, पन्थस्मिं वजन्तं जनं।
हन्त्वा किञ्‍चिक्खमादेति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
७.‘‘अत्तहेतु परहेतु, धनहेतु च [धनहेतु व (क॰)] यो नरो।
सक्खिपुट्ठो मुसा ब्रूति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
८.‘‘यो ञातीनं सखीनं वा, दारेसु पटिदिस्सति।
साहसा [सहसा (सी॰ स्या॰)] सम्पियेन वा, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
९.‘‘यो मातरं पितरं वा, जिण्णकं गतयोब्बनं।
पहु सन्तो न भरति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१०.‘‘यो मातरं पितरं वा, भातरं भगिनिं ससुं।
हन्ति रोसेति वाचाय, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
११.‘‘यो अत्थं पुच्छितो सन्तो, अनत्थमनुसासति।
पटिच्छन्‍नेन मन्तेति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१२.‘‘यो कत्वा पापकं कम्मं, मा मं जञ्‍ञाति इच्छति [विभ॰ ८९४ पस्सितब्बं]।
यो पटिच्छन्‍नकम्मन्तो, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१३.‘‘यो वे परकुलं गन्त्वा, भुत्वान [सुत्वा च (स्या॰ क॰)] सुचिभोजनं।
आगतं नप्पटिपूजेति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१४.‘‘यो ब्राह्मणं समणं वा, अञ्‍ञं वापि वनिब्बकं।
मुसावादेन वञ्‍चेति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१५.‘‘यो ब्राह्मणं समणं वा, भत्तकाले उपट्ठिते।
रोसेति वाचा न च देति, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१६.‘‘असतं योध पब्रूति, मोहेन पलिगुण्ठितो।
किञ्‍चिक्खं निजिगीसानो [निजिगिंसानो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)], तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१७.‘‘यो चत्तानं समुक्‍कंसे, परे च मवजानाति [मवजानति (सी॰ स्या॰ पी॰)]।
निहीनो सेन मानेन, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१८.‘‘रोसको कदरियो च, पापिच्छो मच्छरी सठो।
अहिरिको अनोत्तप्पी, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
१९.‘‘यो बुद्धं परिभासति, अथ वा तस्स सावकं।
परिब्बाजं [परिब्बजं (क॰), परिब्बाजकं (स्या॰ कं॰)] गहट्ठं वा, तं जञ्‍ञा वसलो इति॥
२०.‘‘यो वे अनरहं [अनरहा (सी॰ पी॰)] सन्तो, अरहं पटिजानाति [पटिजानति (सी॰ स्या॰ पी॰)]।
चोरो सब्रह्मके लोके, एसो खो वसलाधमो॥
२१.‘‘एते खो वसला वुत्ता, मया येते पकासिता।
जच्‍चा वसलो होति, न जच्‍चा होति ब्राह्मणो।
कम्मुना [कम्मना (सी॰ पी॰)] वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो॥
२२.‘‘तदमिनापि जानाथ, यथामेदं [यथापेदं (क॰)] निदस्सनं।
चण्डालपुत्तो सोपाको [सपाको (?)], मातङ्गो इति विस्सुतो॥
२३.‘‘सो यसं परमं पत्तो [सो यसप्परमप्पत्तो (स्या॰ क॰)], मातङ्गो यं सुदुल्‍लभं।
आगच्छुं तस्सुपट्ठानं, खत्तिया ब्राह्मणा बहू॥
२४.‘‘देवयानं अभिरुय्ह, विरजं सो महापथं।
कामरागं विराजेत्वा, ब्रह्मलोकूपगो अहु।
न नं जाति निवारेसि, ब्रह्मलोकूपपत्तिया॥
२५.‘‘अज्झायककुले जाता, ब्राह्मणा मन्तबन्धवा।
ते च पापेसु कम्मेसु, अभिण्हमुपदिस्सरे॥
२६.‘‘दिट्ठेव धम्मे गारय्हा, सम्पराये च दुग्गति।
न ने जाति निवारेति, दुग्गत्या [दुग्गच्‍चा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] गरहाय वा॥
२७.‘‘न जच्‍चा वसलो होति, न जच्‍चा होति ब्राह्मणो।
कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो’’ति॥
एवं वुत्ते, अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्‍कन्तं, भो गोतम…पे॰… उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्‍जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति।
वसलसुत्तं सत्तमं निट्ठितं।
         Vasala Sutta: Discourse on Outcasts
Thus have I heard:
On one occasion the Blessed One was living near Savatthi at Jetavana at Anathapindika's monastery. Then in the forenoon the Blessed One having dressed himself, took bowl and (double) robe, and entered the city of Savatthi for alms. Now at that time a fire was burning, and an offering was being prepared in the house of the brahman Aggikabharadvaja. Then the Blessed One, while on his alms round, came to the brahman's residence. The brahman seeing the Blessed One some way off, said this: "Stay there, you shaveling, stay there you wretched monk, stay there you outcast." When he spoke thus the Blessed One said to the brahman: "Do you know, brahman, who an outcast is and what the conditions are that make an outcast?" "No, indeed, Venerable Gotama, I do not know who an outcast is nor the conditions that make an outcast. It is good if Venerable Gotama were to explain the Dhamma to me so that I may know who an outcast is and what the conditions are that make an outcast."
"Listen then, brahman, and pay attention, I will speak."
"Yes, Venerable Sir," replied the brahman.
1. "Whosoever is angry, harbors hatred, and is reluctant to speak well of others (discredits the good of others), perverted in views, deceitful — know him as an outcast.
2. "Whosoever in this world kills living beings, once born or twice born, in whom there is no sympathy for living beings — know him as an outcast.
3. "Whosoever destroys and besieges villages and hamlets and becomes notorious as an oppressor — know him as an outcast.
4. "Be it in the village, or in the forest, whosoever steals what belongs to others, what is not given to him — know him as an outcast.
5. "Whosoever having actually incurred a debt runs away when he is pressed to pay, saying, 'I owe no debt to you' — know him as an outcast.
6. "Whosoever coveting anything, kills a person going along the road, and grabs whatever that person has — know him as an outcast.
7. "He who for his own sake or for the sake of others or for the sake of wealth, utters lies when questioned as a witness — know him as an outcast.
8. "Whosoever by force or with consent associates with the wives of relatives or friends — know him as an outcast.
9. "Whosoever being wealthy supports not his mother and father who have grown old — know him as an outcast.
10. "Whosoever strikes and annoys by (harsh) speech, mother, father, brother, sister or mother-in-law or father-in-law — know him as an outcast.
11. "Whosoever when questioned about what is good, says what is detrimental, and talks in an evasive manner- know him as an outcast.
12. "Whosoever having committed an evil deed, wishes that it may not be known to others, and commits evil in secret — know him as an outcast.
13. "Whosoever having gone to another's house, and partaken of choice food, does not honor that host by offering food when he repays the visit — know him as an outcast.
14. "Whosoever deceives by uttering lies, a brahman or an ascetic, or any other mendicant — know him as an outcast.
15. "Whosoever when a brahman or ascetic appears during mealtime angers him by harsh speech, and does not offer him (any alms) — know him as an outcast.
16. "Whosoever in this world, shrouded in ignorance, speaks harsh words (asatam) or falsehood expecting to gain something — know him as an outcast.
17. "Whosoever debased by his pride, exalts himself and belittles other — know him as an outcast.
18. "Whosoever is given to anger, is miserly, has base desires, and is selfish, deceitful, shameless and fearless (in doing evil) — know him as an outcast.
19. "Whosoever reviles the Enlightened One (the Buddha), or a disciple of the Buddha, recluse or a householder — know him as an outcast.
20. "Whosoever not being an arahant, a Consummate One, pretends to be so, is a thief in the whole universe — he is the lowest of outcasts.
21. "Not by birth is one an outcast; not by birth is one a brahman. By deed one becomes an outcast, by deed one becomes a brahman.






























































Sunday, August 16, 2015

" गणकमोग्गल्लानसुत्तं "

6-june
हम सभी साधकों का कल्याण करने हेतु
करुणानिधान भगवान बुद्ध ने, गणकमोग्गल्लान
ब्राह्मण को केवल माध्यम बनाकर यह हितोपदेश
किया है। इसे ऐसे पढ़ो की जीवन में उतर जाय।
अपितु यह निश्चित समझ लो कि यह हमारे पूर्वजों
की वसीयत ही है। यही तो हमारा परम धन है।
मंगल कामना के साथ इसे अपना बना लो।
ऐसा मैंने सुना है कि एक समय भगवान् बुद्ध
श्रावस्ती स्थित पूर्वाराम के मृगारमातृप्रासाद में
साधना हेतु विराजमान थे।
तब एक गणितज्ञ गणकमौद्गल्यायन ब्राह्मण,
जहां भगवान विराजमान थे वहां गया।
जाकर भगवान से कुशलमंगल पूछ कर,
वंदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे
गणक मौद्गल्यायन ब्राह्मण ने भगवान से यों
निवेदन किया,
भो गौतम हम गणित शास्त्र पढ़ाते समय अपने विद्यार्थियों को क्रमशः पाठ पढ़ाते हैं।
मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि ……
" क्या, भो गौतम ! आपके इस धर्मविनय में भी
इसी तरह क्रमशः शिक्षा प्रदान की जाती हैं? "
भगवान बुद्ध ने कहा, ' हाँ, ब्राह्मण ! हमारे इस
धर्मविनय में भी ऐसी ही क्रमिक शिक्षा दी जाती हैं।
एक उदाहरण से समझाते हुए कहते हैं ……
ब्राह्मण ! जैसे चतुर अश्वारोही अच्छी नस्ल का
अश्व पाकर प्रारंभ में उसे मुँह में लगाम पकड़ने की
क्रिया सिखाता है, फिर आगे की क्रियाएं सिखाता है।
हे ब्राह्मण ! बिल्कुल इसी तरह तथागत किसी
साधक को अनुशासन के लिए योग्य पाकर, पहले
उसे यह शिक्षा देते हैं …
आओ, भिक्षु ! तुम पहले शीलवान् बनो,
' प्रातिमोक्ष संवर ' अर्थात भिक्षु नियमों का पालन
करते हुए स्वयं में संयम के बीज बोना
सिख लो।
आचारगोचर संपन्न बनना सिखों।
इंद्रियों को संयम में रखना सिखों।
और हे भिक्षु ! अपने में अत्यल्प, छोटे से छोटा भी
दोष देखकर उससे भय मानों। यों मेरे बतलाये
शिक्षापदों का पालन करते हुए साधना में निरंतर
लगे रहों।
यह पहली कक्षा समझों ➖
ब्राह्मण ! जब वह भिक्षु शीलवान् होकर
शिक्षापदों का पालन करने में सतत जागरूक
रहने लगता है, तब उसे आगे की शिक्षा देना प्रारंभ
करते हैं। वह इस प्रकार है ……
" आओ भिक्षु ! अब तुम सभी इंद्रियों में संयम रखना
सिखों ; चक्षु से किसी रूप को देखकर भी उसमें
राग या द्वेष उत्पन्न नहीं करना ।
दोनों ही साधना में भिक्षु के लिए घातक है ।
इसका कारण बताते हैं ।
क्योंकि चक्षुरिन्द्रिय को असंयत छोड़कर साधना करने
वाले को अभिध्या ( राग - लोलुपता ) ,
दौर्मनस्य ( अप्रसन्न या उदास होना ) ,
आदि अकुशल पापमय कर्मों का विघ्न उत्पन्न होगा ,
या यों कहें कि ---
ये दोष उसकी साधना में बाधा उत्पन्न करेंगे ही ।
इसलिए साधक का यह प्रथम कर्तव्य होता है कि वह
अपने इंद्रियों को संयम में रखें । यही स्थिति अन्य
इंद्रियों की होती हैं … नाक , कान , जिभ , त्वचा ।
हे ब्राह्मण ! जब भिक्षु अपने इंद्रियों में संयम करना
सिख लेता है, तब उसे साधना में आगे बढ़ने के लिए
तथागत आगे की विनय शिक्षा इस प्रकार देते हैं ।
भगवान बुद्ध आगे बताते हैं ➖
" आओ , भिक्षु ! अब तुम भोजन में मात्रा का ,
ज्ञान रखने वाले बनो । इतना ही अन्न ग्रहण करना
चाहिए कि जिससे तुम्हारी काम करने की क्षमता
बनी रहें , ना अति कम ना ज्यादा पेट भरकर
भोजन करें । इतना स्मरण रहे की तुम्हारी
शरीरयात्रा सुचारु रूप से चलती रहें । "
हे ब्राह्मण जब भिक्षु भोजन की मात्रा का
ज्ञान रखने वाला हो जाता हैँ , तब भगवान उसे आगे
की शिक्षा देना प्रारंभ करते हैं ।
आओ , भिक्षु ! तुम जागरण में तत्पर रहना सिखों ।
शरीर को थोड़ा विश्राम मिलें इतना ही सोना चाहिए ।
रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर चंक्रमण के साथ
' चलत - ध्यान ' करते हुए चित्त को विमुक्त करने का
सतत प्रयास करते रहों । "
भगवान आगे बताते हैं ----
हे ब्राह्मण जब भिक्षु , जागरण में तत्पर होकर
साधनासुख जान लेता है , तब तथागत उसे आगे की
शिक्षा देते हैं । " आओ , भिक्षु ! तुम स्मृतिसम्प्रजन्य युक्त होकर , विपस्सना साधना करते हुए इस साढ़े तीन हाथ
की काया में कायानुपश्यी होकर , तटस्थ रहते हुए ,
काया में उत्पन्न होने वाली संवेदनाओं को साक्षी भावसे देखो , ना उसे अच्छी मानकर उसमें राग जगाना , ना ही दुःखावेदना को बुरी मानकर उसे दूर धकेलनेकी कोशिश करना ।
इस प्रकार संपूर्ण लोक में अर्थात शरीर में संवेदनाओं
को साक्षी भावसे देखना , शरीर में उपर-नीचे ,
आड़े-तिरछे , सभी अङ्गों-प्रत्यङ्गो का मन के सहयोग
से निरिक्षण करना ।
भिक्षु जब यह अच्छी तरह से सिख लेता है कि
वह ' काया - वाणी और मन ' से संपूर्ण मौन साध्य
कर लेता है , तब वह साधना में अग्रसर होता है ।
और फिर हे ब्राह्मण जब भिक्षु सतत जागृत
स्मृति सम्प्रजन्य युक्त हो जाता है तब वह उठत-बैठते ,
चलते , हर समय इर्यापथस्मृति वाला होता है ।
वह अपने चिवर के प्रति सजग रहता है ।
हाथ-पैर पसारने की क्रिया में , खाते पिते समय
हर वक्त वह बहुत ही सजग रहता है ।
ऐसी परिपक्व साधना की अवस्था में जब वह भिक्खु पहुंचता है , तब तथागत उसे आगे की शिक्षा देना
उचित समझते हैं ।
आओ भिक्षु अब तुम एकांतवास के लिए
योग्य हुए हो , एवं तुम अभी वन में किसी पेड़ के
नीचे बैठकर मन को एकाग्र कर साधना करो ।
निद्रा , आलस्य , तन्द्रा , भय , इत्यादि सभी को
छोड़कर , भिक्षाटन के बाद , देह को सीधा कर ,
मन को एकाग्र कर , आसन लगाकर आस्रवोंके
क्षय के लिए चित्त को लगाने की कोशिश कर वह
आगे बढता चला जाता है ।
फिर वह भिक्षु , कामछंद , व्यापाद ,
आलस्य , औद्धत्यकौकृत्य और विचिकित्सा
इन पाँचों निवरणों का प्रहाण कर ,
चित्त के उपक्लेशों को दूर हटाकर ,
उन्हें दुर्बल बनाकर , अकुशल धर्मोंका नाश
करता हुआ वितर्क-विचार सहित विवेकजन्य
प्रीतिसुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त कर
विहार करता है ।
हे ब्राह्मण फिर वह भिक्षु , आठों ध्यानों को
प्राप्त कर विहार करता है । उसका लक्ष्य निश्चित
होता है कि , हर अवस्था में आस्रवोंका क्षय करना ।
हे ब्राह्मण जो भिक्षु अभी तक शैक्ष्य है , जिन्हें कुछ सिखना अभी शेष है , अतः जो निर्वाण तक नहीं पहुंचे , उनको मेरी उपर वर्णन की हुई शिक्षा होती हैं । ताकि वे अपने लक्ष्य को , नितांत निर्मल निर्वाण को
प्राप्त कर सकें ।
और हे ब्राह्मण मेरे श्रावक जिन्होंने अपनी
साधना पूर्ण कर ली है , जो परम निर्वाण प्राप्त कर
चुके हैं , उनके लिए मेरी ये बातें ( शिक्षापद ) अपने
अवशिष्ट जीवन में सुखविहार के लिए होती हैं ।
हे ब्राह्मण तथागत तो केवल मार्ग बताने
वाले हैं । आगे जिसकी जैसी साधना वैसे वह फल
पाता है । हे ब्राह्मण
निर्वाण भी वही है ,
निर्वाणगामी मार्ग भी वही है ,
निर्वाणमार्गोपदेष्टा मैं भी वही हूँ ,
कुछ भिक्षु निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं और
कुछ नहीं । ऐसा क्यों ?
उनकी साधना की कमी के कारण ।
मैं इस विषय में क्या कर सकता हूँ ?
मैं केवल मार्ग बताने मात्र का उत्तरदायी हूँ ।
गणकमोग्गल्लान ब्राह्मण संतुष्ट होकर भगवान् बुद्ध की शरण में आते हुए कहता है ------
आश्चर्य भो गौतम आप गौतम द्वारा उपदेशित
धर्म ( धर्मसाधना ) वर्तमान में सभी मतवादों में श्रेष्ठ है । आज से आगे मुझे जीवनपर्यंत अपना शरणागत
और उपासक समझें ।

मज्झिमनिकायपालि , उपरिपण्णासकमिता ,
पञ्चमो भागो , 7 , गणकमोग्गल्लानसुत्तं .
साभार :
Pingala Wanjari
Pingala Wanjari









Saturday, June 27, 2015

प्राचीन बौद्ध स्थल “सोपारा" -वर्तमान-नालसोपारा (मुंबई)

प्राचीन बौद्ध स्थल “सोपारा" -वर्तमान-नालसोपारा (मुंबई)

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सोपारा महाराष्ट्र राज्य के ठाणे ज़िले में स्थित एक प्राचीन स्थान है। आजकल सोपारा दादर स्टेशन से वेस्टर्न सबर्बन रेलमार्ग पर लगभग 48 किलोमीटर दूर अंतिम पड़ाव 'विरार' से पहले पड़ता है।

'नाल' और 'सोपारा' दो अलग अलग गाँव थे। रेलवे लाइन के पूर्व की ओर 'नाल' है तो पश्चिम में 'सोपारा' गावँ है। वर्तमान में यह एक बड़ा शहर हो गया है। पुराने सोपारा गाँव के क़रीब चारों तरफ हरियाली और बहुत सारे पेड़ हैं।

सोपारा गाँव में सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी सदी में निर्मित स्तूप भी है। यह स्तूप भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है।

वहां बुद्ध और साथ ही किसी बौद्ध भिक्षु की मूर्ती भी थी. हमें बताया गया कि यहाँ से निकली मूर्तियाँ, शिलालेख आदि औरंगाबाद के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं.

जिस प्रकार दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर ईसा पूर्व से ही “मुज़रिस” (कोडूनगल्लूर) विदेश व्यापर के लिए ख्याति प्राप्त बंदरगाह रहा उसी प्रकार उत्तर भारत के पश्चिमी तट पर उसी कालक्रम में सोपारा भी भारत में प्रवेश के लिए एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था. इस बंदरगाह का संपर्क विभिन्न देशों से रहा है. सोपारा को सोपारका, सुर्परका जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता था. प्राचीन अपरानता राज्य की राजधानी होने का भी गौरव सोपारा को प्राप्त है. इस्राइल के राजा सोलोमन के समय से ही बड़ी मात्रा में उनके देश से व्यापार का उल्लेख मिलता है. कदाचित बाइबिल में उल्लेखित भारतीय बंदरगाह “ओफिर” सोपारा ही था. बौद्ध साहित्य “महावंश” में उल्लेख है कि श्रीलंका के प्रथम राजा, विजय ने “सप्पारका” से श्रीलंका के लिए समुद्र मार्ग से प्रस्थान किया था. प्राचीन काल में सोपारा से नानेघाट, नासिक, महेश्वर होते हुए एक व्यापार मार्ग उज्जैन तक आता था. इस बात की पुष्टि नानेघाट में सातवाहन वंशीय राजाओं के शिलालेख से होती है, जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद हावी हो गए थे. सोपारा इनके आधीन आ गया था. नानेघाट में तो बाकायदा चुंगी वसूली एवं भण्डारण हेतु प्रयुक्त पत्थर से तराशा हुआ कलश आज भी विद्यमान है.

.साभार : http://buddhkathaiye.blogspot.in/

Thursday, June 25, 2015

मैत्री भावना

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अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि [अजिनी (?)] मं अहासि मे।

ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥

’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं बाँधतें रहते हैं , उनका वैर शांत नही होता है ।

 

अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।

ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥

’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं नहीं बाँधतें हैं , उनका वैर शांत हो जाता है ।

धम्मपद : यमकवग्गो, गाथा ३-४

बाहर के दुश्मनो को जीतना कोई जीत नहीं है।
हिंसा के बल पर एक को जीत लेंगे तो अधिक बलवान दूसरा अपना सिर उठाएगा और हमें डराएगा।
जय पराजय का यह चक्र हमें सदा अशांत ही रखेगा।
हम सदा अपने से अधिक बलवान से भयभीत ही रहेंगे। निर्भयता हमसे कोसो दूर रहेगी।
भगवान् ने कहा है की सच्चा विजयी तो वही है, जो की अपने आप को जीत चूका है।
सचमुच जिसने अपना मन जीत लिया, उसने जग जीत लिया।जो अपने मानसिक व्यसनों का गुलाम है, वह चक्रवर्ती सम्राट होकर भी पराजित ही है।
यदि किसी दूसरे को जीतना ही है तो अपने निश्छल प्यार से जीतो, असीम करुणा से जीतो।
डंडे और बंदूक की जीत, जीत नहीं होती।हर डंडे के मुकाबले में कोई न कोई बड़ा डंडा तैयार हो जाता है।
परंतु जिसे प्यार से जीत लें, मैत्री और करुणा से जीत लें, वह जीत फिर हार में नहीं बदल सकती। कोई उससे बड़ी मैत्री पैदा करके उस विजय को पुष्ट ही करेगा। उसके नष्ट होने की कोई आशंका नहीं।।

साभार :

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 परेश गुजराती

Friday, June 12, 2015

पात्र और सामाग्री ( The Container and the Content )

 

AFGHANISTAN-BUDDHAS/

ब्रिसबेन  में एक स्थानीय पत्रकार ने मुझसे बडा ही अटपटा सा प्रशन पूछा . “ अजह्न्ह , आप की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर कोई इन्सान बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक जैसे त्रिपटक को शौचालय मे बहा दे । “

एक क्षण रुके बगैर मैने उससे कहा , “ अगर कोई बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक को शौचालय मे बहा देगा तो मै सबसे पहले मै रुकी हुई पाइपलाइन को खुलवाने के लिये एक योग्य प्लम्बर को बुलाऊगाँ । “

संभवत: उसको मेरे उत्तर  की अपेक्षा नही थी । वह हँसा और मुझसे बोला कि क्या आप इस बात से उद्देलित नही होगे ।

मैने उससे कहा , “  हो सकता है कि बुद्ध धम्म के विरोधी बुद्ध की कई प्रतिमाओं को उडा दें , कई मंदिरों को नष्ट कर दें या बौद्ध भिक्खुओं और भिक्खुनियों की हत्या तक कर दें लेकिन फ़िर भी मैं उनको बौद्ध धर्म को नष्ट करने की अनुमति नही दे सकता । आप एक शौचालय में एक पवित्र पुस्तक को बहा सकते हैं लेकिन क्या आप बौद्ध धम्म के मूल आधार क्षमा , करुणा , शांति और मैत्री को शौचालय मे बहा सकते हैं । “

कोई  भी पुस्तक , मूर्ति , मन्दिर , विहार या उसको संचालित करने वाले पुजारी और महंत धर्म नही हो सकते । वे केवल “ पात्र “ हैं । पात्र वह जिसमे सामाग्री रखी जाती है । वह ह्मेशा पात्र ही रहेगें ।

लेकिन दूसरी तरफ़ यह पुस्तकें हमें क्या सिखाती हैं ? बुद्ध की मूर्ति हमॆ क्या दर्शाती है ? भिक्खुओं के गुण हमें किस बात की शिक्षा देते हैं ?  यह वह  “ सामाग्री  “ हैं जिसको हमें बचाना है ।

जब हम पात्र और सामाग्री के बीच के अंतर को समझ लेगें तब हम पात्र के नष्ट हो जाने के बाद भी सामाग्री की रक्षा कर सकते हैं ।

यह भी संभव है कि हम अधिक संख्या मे धम्म की पुस्तकें छ्पवायें , यह भी हो सकता है कि हम बहुत से भिक्खुओं और भिक्खुनियों को प्रशिक्षित कर लें लेकिन जिस दिन हम दूसरों के लिये हमारे प्यार और सम्मान को खो बैठते हैं और अपने आप को हिंसा मे लिप्त कर लेते हैं तो मेरे अनुसार पूरे के पूरे धर्म को ही शौचालय मे बहा बैठते हैं ।

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अजह्न्ह ब्रह्म्ह की पुस्तक “ GOOD ? BAD ? WHO KNOWS ” मे से ली गई कहानी “ The Container and the Content ” का हिन्दी अनुवाद ।

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The Container and the Content – Ajahn Brahm

A local journalist called and asked me “ What would you do, Ajahn Brahm, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet?”

Without hesitation I answered “Sir, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet, the first thing I would do is call a plumber!”

When the journalist finished laughing, he confided in me that that was the most sensible answer he had heard.

Then I went further. I explained that someone may blow up many statues of the Buddha, burn down Buddhist temples or kill Buddhist monks and nuns; they may destroy all of this but I will never allow them to destroy Buddhism. You may flush a Holy Book down a toilet, but you will never flush forgiveness, peace and compassion down a toilet.

The book is not the religion, nor the statue, the building or the priest. These are only “containers.”

What does the book teach us? What does the statue represent? What qualities are the priests supposed to embody? This is the “content”.

When we recognize the difference between the container and the contents, then we will preserve the contents even when the container is being destroyed.

We can print more books, build more temples and statues and even train more monks and nuns, but when we lose our love and respect for others and ourselves and replace it with violence, then the whole religion has gone down the toilet.

Friday, May 15, 2015

सागर कवि

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वसन्त ऋतु आते ही बुद्ध और उनका भिक्खु समूह पूर्वी छेत्र मे लौट आये । वह वैशाली और चम्पा मे रुके । नदी किनारे चलते-२ हुये  बुद्ध समुद्र  तट पर आ गये । मछुआरों से अनायास ही भिक्खु संघ का वार्तालाप शुरु हुआ । मान्य आनंद ने उत्सुकतावश मछुआरों से समुद्र के विषय मे अनेक विचार जानने चाहे ।

एक लम्बे और सुन्दर मछुआरे ने आनंद से कहा , “ मुझे समुद्र की कई बाते अच्छी लगती हैं । पहला , इसका बालू का किनारा पानी तक ढलान युक्त होता है जिससे नावें खींच लाने और जाल फ़ेंकने मे सुविधा होती है ।

दूसरे , समुद्र सदैव अपने स्थान पर रहता है जिससे हम जानते हैं कि वह कहाँ मिलेगा ।

तीसरे , समुद्र किसी शव को अपने मे डुवाता नही , उसे तट पर फ़ेंक देता है ।

चौथे , सभी नदियाँ – गंगा , यमुना , अचिरावती , सरयु और माही समुद्र मे आ मिलती है जिसके बाद उनका नाम नही रहता । समुद्र उनको अपने गर्भ मे समा लेता है ।

पांचवे , यधपि नदियाँ दिन रात जल ला कर समुद्र मे पहुंचाती हैं , किन्तु उसका जल स्तर अपनी मर्यादा मे रहता है ।

छ्ठे , समुद्र का जल सदैव हमेशा खारा होता है ।

सातवें , समुद्र मे सुन्दर घॊंघा , सीप , शंख , मोती और मूल्यवान पत्थर होते हैं ।

आठवें  , समुद्र हजारों प्रकार के प्राणियों को अपने मे समाये रखता है जिनमे लम्बे प्राणि से लेकर सूक्ष्मतम  प्राणि तक होते हैं ।

अत: आप समझ ही गये होगें कि हम समुद्र को कितना प्रेम करते हैं । ”

आनंद ने सराहानापूर्ण दृष्टि से मछुआरे को देखा जो मछुआरा होकर भी कवि की भाषा बोल रहा था । आंनद ने बुद्ध से कहा , “  यह व्यक्ति समुद्र को उसी प्रकार प्रेम करता है जैसे कि मै संबोधि के मार्ग को । क्या आप इस संबध मे कुछ शिक्षा देगे ? ”

बुद्ध मुस्कराये और चट्टान पर बैठकर सद्‌धर्म मार्ग की कुछ विशेतायें बताने लगे । वह मछुआरा भी उनके साथ बैठ गया ।

बुद्ध ने कहा , “ हमारे मछुआरे बधुं ने समुद्र की आठ विशेतायें बताई और अब मै अब आपको सच्चे धर्म की आठ विशॆताये बताउगां ।

पहला , धर्म समुद्र के समान नीचे की ओर ढलवां नही होता । सद्‌धर्म मार्ग पर व्यक्ति तभी प्रगति कर सकता है , जब वह सभी प्रकार की मानसिकताओं को समाहित कर सके । युवा या वृद्ध , शिक्षित या अशिक्षित सभी कोई धर्म मार्ग पर चल सकता है । हर व्यक्ति अपनी आवशकताओं के अनुसार साधाना – पद्‌तियों को अपना  सकता है ।

दूसरे , समुद्र की भांति धर्म भी अपने स्थान पर रहता है । धर्म शिक्षाओं के सिद्धांत कभी नही बदलते । शीलों को स्पष्ट रुप से समझा और सम्झाया जा सकता है । कोई भी व्यक्ति कही भी धर्म के सिद्धांतों का अध्यन्न और शीलों का पालन करके कही भी साधना कर सकता है । धर्म न कही जाता है और न कभी गुम हो सकता है ।

तीसरे , समुद्र जैसे शव को अपने गर्भ में नही रखता , उसी प्रकार धर्म अज्ञान , आलस्य या शीलाचार को भंग करना सहन नही करता । साधना न करने वाला व्यक्ति अन्तत: स्वयं को समुदाय से बाहर निकाल पाता है ।

चौथे , समुद्र सभी नदियों को समान रुप से आत्मसात्‌ कर लेता है , इसी प्रकार सद्‌धर्म सभी जातियों को समान रुप से अपनाता है । समुद्र में मिलने के बाद नदी का नाम समाप्त हो जाता है , इसी प्रकार सद्‌धर्म पर चलने वाला व्यक्ति अपनी जाति , वंश और पूर्व पद सभी त्याग कर मात्र भिक्खु रह जाता है ।

पांचवे , जैसे समुद्र का जल सदैव एक समान रहता है , समुद्र अपनी मर्यादा मे रहता है , सद्‌धर्म भी एक ही स्तर पर रहता है , चाहे उसके अनुयायी की संख्या कम हो अथवा अधिक । धर्म को शिष्यों की संख्या से नही नापा जा सकता ।

छ्ठे , समुद्र का जल हमेशा खारा होता है । अनगिनत मार्गों और अनगिनत साधन – पद्‌तियों के होने के बावजूद धर्म का एक ही स्वाद होता है और वह स्वाद है – मुक्ति का आनंद । यदि धर्म शिक्षाओं से मुक्ति न मिले तो वह सच्ची शिक्षा नही है ।

सांतवे , समुद्र में शंख , मोती और मूल्यवान रत्न होते हैं तो धर्म में भी ऊद्र्गामी और मूल्यवान  शिक्षायें यथा चार आर्य सत्य , चार विशुद्ध साधनायें , पांच गुण , पांच शक्तियाँ . आत्म जागृति के सात चरण और श्रेष्ठ मार्ग होते हैं ।

आठवें , समुद्र हजारों जीवित प्राणियों को शरण देता है तो धर्म भी सभी को अपनी शरण मे ले लेता है , फ़िर वे अशिक्षित बच्चे हों या बोधिसत्व हों । धर्म के असंख्य अनुयायी हैं जिन्होनें जन्म मृत्यु की धारा मे प्रवेश  , प्रथम प्रत्यागत , प्रत्यागथीन अवस्था और  अर्हत  पदों के पुण्य फ़ल पाये हैं ।

“ इस प्रकार समुद्र के समान सद्‌धर्म भी प्रेरणा का और अपरिमित संपदा प्राप्त करने का स्त्रोत है । ”

मान्य आनंद ने हाथ जोडकर बुद्ध की ओर देखा और कहा  , “ प्रभु , आप महान अध्यात्मिक गुरु तो हैं ही और साथ भी एक अच्छे कवि भी हैं । ”

संकलन : जहं जहं चरन परे गौतम के ‘ तिक न्यात हन्ह ’ प्रकाशन - हिन्द पाकेट बुक्स

Tuesday, April 28, 2015

बुद्ध की एक मूर्ति के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी ।

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नीदरलैंड में ड्रेंथे के ऐतिहासिक संग्रहालय के कर्मचारियों ने एक चौंकाने वाला आविष्कार किया है।

बैठे हुए बुद्ध की एक चीनी प्रतिमा के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी। इस का पता तब चल गया जब मूर्ति की बहाली करते वक्त उसको एक सीटी स्कैनर में रखा गया। अब यह प्रतिमा बुडापेस्ट के एक संग्रहालय में प्रदर्शित की जा रही है जहां वह 2015 के मई तक प्रदर्शित रहेगी।
शोधकर्ताओं ने टोमोग्राफी के समय प्राप्त छवियों में एक ममी को देखा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ममी चीनी भिक्षु  लूत्सुआन की है जिसकी मौत 1100 ईस्वी के आसपास चीन में हुई थी। प्रतिमा की जांच करते वक्त इस बात का पता लगाया गया कि ममीकरण के समय शरीर के आंतरिक अंग हटाये गये थे जिसके बाद उसको कागज़ के छोटे छोटे टुकड़ों से भर गया, जिन पर प्राचीन चीनी अक्षर लिखे हुए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि भिक्षु की ममी ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी में बनायी गयी थी। यानी वह लगभग एक हजार साल पुरानी है।

साभार  : http://hindi.sputniknews.com/vishv/20150302/1013625844.html#ixzz3YZB33HmI

Saturday, April 25, 2015

दो पल शांति के ….

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यह देखने की बात है कि कहानियों के मूल तत्व को कौन किस रुप मे लेता है। मेरी पिछ्ली कहानी , “ जो हो चुका , सो हो चुका “ को ही लें । पर्थ मे मैने यह कहानी एक सभागार में श्रोतागणॊ को सुनाई । उसके अगले ही दिन एक कम उभ्र के लडके के माता – पिता बहुत ही क्रोध मे भरे हुये मेरे पास आये और बोले कि यह आप कैसी कहानियाँ सुनाकर लोगो को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । कल शाम को जब  मेरा लडका  अपने मित्रों के साथ घूमने  को जाने के लिये निकला तब मैने उससे पूछा कि क्या तुमने अपना होम वर्क पूरा कर लिया है । वह कहने लगा , “  डैड , कल आपने विहार में अजह्न्ह ब्रह्म को सुना होगा , उन्होने ही कहा था ‘ जो हो चुका है वह समाप्त हो गया । ’
मै एक और कहानी से पिछ्ली कहानी को समझाने की कोशिश करता हूँ ।
आस्ट्रेलिया मे अधिकतर लोग घरों में बगीचे का प्रावाधान अवशय  रखते हैं । लेकिन कुछ ही लोग हैं जो उस बगीचे में अपने लिये दो पल सूकून का निकाल पाते होगें । अधिकतर लोगों के लिये बगीचा सिर्फ़ कार्य करने की जगह मात्र हैं । मै अधिकतर लोगों को सलाह देता हूँ वह अपने बगीचे की सुन्दरता  के लिये उसका पालन  पोषण अवशय  करे लेकिन उसके साथ ही अपने दिल के पालन पोषण के लिये अपने बाग मे कुछ देर शांति से बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द अबशय लें ।
अब देखे कि चार गृहस्थ  मालियों ने इस वक्तत्व को  कैसे  समझा ।
पहले माली ने सोचा कि पहले बचे हुये सारे कामों को  निपटा लें उसके पश्चात शांति से दो पल बगीचे में बैठेगे । आखिरकार बाग की कटाई करनी थी , पौधो मे पानी देना था और पत्तियों और झाडियों की छ्टाई भी करनी थी । उसके बाद जो समय बचेगा उसमें शांति के दो पल ढूंढ लेगें । लेकिन उसका काम अन्त तक समाप्त नही हुआ इसलिये उसके  शांति और सूकून के दो पल नही मिल पाये । वैसे आपने भी अपनी संस्कृति मे देखा  होगा कि जो लोग शांति की तलाश करते रहते है उनकी तलाश कब्र मे ही जाकर पूरी होती है ।
दूसरा माली पहले माली से अधिक चतुर निकला । उसने कताई और छ्टाई के औजारों को किनारे किया , पानी के  डिब्बों को एक तरफ़ रखा और आराम से एक कुर्सी में बौठकर  अपनी मन पसंन्द पत्रिका को पढने लगा । लेकिन यह तो पत्रिका को पढने का आनंद लेना था , सूकून उससे कोसों दूर था ।
तीसरे माली ने बागवानी के सारे औजार , पत्रिकायें , समाचार पत्र को किनारे रखा और  दो सेकन्ड के लिये बाग में शांन्ति से बैठ गया । कुछ ही देर बाद उसने सोचना शुरु किया , “ अब मुझे इस मैदान कि लवाई शुरु कर देनी चाहिए , झाँडियां की भी कँटाई – छ्टाई करनी है और अगर मै इन पौधॊ को पानी नही दूँगा तो यह फ़ूल तो मुर्झाने की कगार पर खडे हो जायेगें । ” उसके शांति और सूकून के पल विचारों और योजना बनाने मे ही निकल गये । लेकिन हाँ , शांन्ति नही मिली ।
चौथा माली ने विचार किया , “ चलो काफ़ी काम हो गया है , कुछ देर सूकून से बैठते हैं। हाँलाकि , झाडियों और पेडो की कटाई – छ्टाई करनी है , लेकिन यह सब तो बाद मे भी हो जायेगा लेकिन अभी यह सब काम बिल्कुल नही …। ”
मेरी नजर मे चौथा माली ही समझदार निकला , हाँलाकि वह यह जानता था कि उसका बाग अभी परिपूर्ण नही है लेकिन इसके बावजूद वह आगे की न सोचकर , जो हो चुका है उसमे संतोष कर पाया ।
जीवन के परिपेक्ष मे इसको देखें , जो काम आगे का रह गया है , इसकी व्यर्थ मे चिंता न कर के जो हो चुका है उसमे संतोष और आनन्द ले तब ही जीवन मे वास्तविक शांन्ति पा सकते हैं । अगर हम अपनी और दूसरों की कमियों को देखते रहेगे और अगर हम जीवन को हमेशा व्यवस्थित करने मे अपनी उर्जा लगायेगे तो हमे सूकून के उन पलो का हमेशा अभाव रहेगा ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ the idiot’s guide to peace of mind ” का हिन्दी अनुवाद ।

Thursday, February 26, 2015

‘पचमढ़ी’ में पांडव गुफ़ाये या बौद्ध स्तूप ?

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DSCN3034अब स्तूप हो , ध्यान करने की उचित जगह तो ध्यान मुद्रा में बैठने का कैसे लोभ छोड दे Smile भले ही वह फ़ोटॊ सेशन के लिये ही हो Smileऊपर मै स्वयं और नीचे मेरा पुत्र ‘आयुष’
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गत अक्टबूर में पंचमढी में कुछ दिन बिताये । पचमढ़ी में आपके घूमने की शुरुआत पांडवों की गुफा से होती है। यहाँ कहते हैं कि महाभारत काल की मानी जाने वाली पाँच गुफाएँ है जिनको पांडव गुफ़ायें के नाम से भी जाना जाता है । लेकिन पुरातत्वविद मानते हैं कि ये गुफाएँ गुप्तकाल की हैं जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने बनवाया था। ( ऊपर देखें पुरातत्वविभाग का साइन बोर्ड ) ।  गुफ़ा क्रमांक तीन मॆ एक उत्कीर्ण अभिलेख है जिसमॆ लिखा है ‘ उत्कीर्ण भगवकेण ‘ अर्थात यह गुफ़ा भगवक नाम के व्यक्ति ने बनाई थी जो संभवत: बौद्ध भिक्षु था । इसके आधार पर इसका निर्माण गुप्त काल ( चौथी या पाँचवी शताब्दी ई. ) में हुआ होगा । इसके अलावा गुफ़ा क्रमांक नं. २ के सामने वाले भाग में साधारण चैत्य देखा जा सकता है । इसी के आधार पर संभवत: यह बौद्ध धर्म से संबधित हो सकती है ।
बहराल जो भी सच हो लेकिन यह एक बेहद दर्शनीय स्थल है जिसको मध्य प्रदेश टूरिज्म ने संर्क्षित किया है ।

Sunday, January 18, 2015

कार्य–कारण का सिद्धांत ( The Law Of Karma )

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पशचिम मे बहुत से लोग कार्य-कारण के सिद्धांत को गलत ढंग से समझते हैं । अधिकतर लोग उसको भाग्यवाद से जोडते हैं जहाँ एक व्यक्ति या उसके  परिवार को उसका दंड उसकी पिछ्ली जिन्दगी मे किये अज्ञात गलत कर्मो के कारण  भोगना पडता है । जब कि ऐसा बिल्कुल भी नही है जैसे इस कहानी से स्पष्ट है ।

मैने सुना है कि दो औरतों मे केक बनाने की एक प्रतियोगिता हुयी ।

उनमे से पहली औरत के पास जो केक बनाने की सामग्री थी उसको देखकर यह बिल्कुल भी नही लग रहा था कि वह इस प्रतियोगिता के लायक है । पुराना सा दिखने वाला मैदा , कोलेस्ट्रॉल युक्त बासी मक्खन ,  गाँठ युक्त चीनी (   गीला चमच्च डाल देने के कारण ) , फ़लो के नाम पर थोडॆ बहुत सख्त किशिमिश। और   उसकी रसोई के तो कहने ही क्या , हर चीज अस्त – व्यस्त बिल्कुल विशव युद्ध की याद दिलाती हुई ।

दूसरी औरत  पहले औरत से बिलकुल विपरीत स्वभाव कीथी ।  सब कुछ व्यवस्थित , उच्च क्वालिटी की  सामाग्री ,  उच्च स्तर का मैदा , कोलेस्ट्रॉल रहित मक्खन , कच्ची चीनी और यहाँ तक कि रसीले दार फ़ल जो उसने अपनी बगिया मे उगाये थे । उसकी रसोई एक मिसाल थी , सारे मार्ड्न गैजडस उसकी रसोई मे मौजूद थे ।

बता सकते हैं कि किस औरत ने सबसे अच्छी केक बनाई ?

यह आवशयक नही कि जिस व्यक्ति के पास  उच्च स्तर की सामग्री हो वह ही बेहतर केक बना सकता है । केक बनाने के लिये सामग्री से अधिक कला , समर्पण और प्रयास की जरुरत पडती है । इसलिये  निम्म क्वालिटी की सामग्री होने के बावजूद वह औरत अधिक बेहतर केक बना पायी जिसके पास यह तीन बहूमूल्य वस्तुयें  थी ।

मेरे कुछ मित्र है जिनकी जिन्दगी मे सब कुछ अस्त व्यस्त था । वह गरीबी मे पैदा हुये , बचपन उनका बहुत ही कठिन बीता , लोगॊ से ताने सहे और यहाँ तक गालियाँ भी खाई , उनकी तालीम या तो हुई नही और कुछ तो पढने मे साधारण से रह गये , और इनमें  से कुछ तो बेचारे विकलांग भी थे जिनके लिये खेल कूद बहुत दूर की चीज थी । लेकिन इसके बावजूद भी उनमे ऐसे गुण थे जिसकी वजह से वह अपनी जिन्दगी बना पाये । क्या आप ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर सकते है ?

मेरे कुछ   ऐसे मित्र भी हैं जिनके पास सब कुछ था , धनाढय परिवारों मे पैदा हुये , ऐशवर्य सी जिन्दगी पाई , पढाई मे बहुत ही काबिल रहे , बढिया खिलाडी भी  थे और स्मार्ट भी  लेकिन उन्होने अपनी जिन्दगी नशा ,  शराब और जुये जैसे व्यसनो मे बरबाद कर दी । क्या आप ऐसे लोगो की पहचान कर सकते हैं ?

कर्म का आधा हिस्सा वह सामाग्री है जिनके जरिये हमे कार्य करना है और आधा हिस्सा , जो जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है कि  उसके जरिये हम क्या करना चाहते हैं ।

कर्म को बीज के रुप मे भी देख सकते हैं । चयन आपके हाथॊ मे है  कि जीवन मे आप कौन से बीज बोयेगें ।

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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the Law of Karma ” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 26, 2014

पीडा का भय–“ जाने दो ” - “ Fear of pain & Letting go of pain”

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भय तकलीफ़ का एक अभिग्न अंग है । और यही वजह है कि दर्द का एहसास हमे भय के कारण ही अधिक होता है । अगर भय को एक बार हटा ले तो सिर्फ़ एहसास ही बच जाता है और दर्द चला जाता है ।
१९७० के मध्य के दश्क मे मै उतर पूर्व थाइलैड के जंगल मे एक मोनेस्ट्री मे अन्य भिक्खुओं के साथ रह  रहा था । उस रात मुझे जो दाँत मे दर्द हुआ उसकी कल्पना करना भी असहनीय थी । उस जंगल मे न तो कोई दाँत का डाक्टर था , न ही कोई दवा , न टेलीफ़ोन की सुविधा और न बिजली का इन्तजाम ।
रात होते-२ दर्द भंयकर रुप से बढ चुका था । वैसे मै अपने आप को काफ़ी सख्त रुप का भिक्खु समझता हूँ लेकिन उस रात लगता है कि यह दर्द मेरे मुझ जैसे भिक्खु की योग्यता की परीक्षा ले रहा था । दर्द से बचने के लिये मैने ध्यान करना शुरु किया लेकिन दर्द तो कम न हुआ और मेरा ध्यान अपनी श्वास के बजाय उन मच्छरों पर ही लगा रहा जो बार-२ मुझे काट के हलकान किये जा रहे थे ।
मै उठा , बाहर गया और चलित ध्यान करने की असफ़ल कोशिश की । लेकिन मुझे यह भी जल्द ही छोडना पडा क्योंकि मुहे यह लगने लगा था कि मै चल नही रहा था बल्कि मै दौड रहा था । दर्द की तरिवता मुझे दौडा रही थी हाँलाकि उस मठ मे दौडने की जगह बिल्कुल भी न थी ।
मै वापस अपने कुटिया मे आया और बैठ कर  जप करने की भी कोशिश की । अकसर मेरे साथी भिक्खु कहते थे कि बौद्ध मंत्रों के जप करने  मे अभूत पूर्व शक्तियाँ होती है , यह  शक्तियाँ आपका भविष्य बदल सकती है , जंगल मे से जानवरों को भगा सकती हैं आदि आदि । मेरा परिवेश एक वैज्ञानिक तरीके से हुआ था इसलिये मुझे कभी भी इन चीजों पर विशवास न रहा । मंत्रों का जाप करना मेरी दृष्टि मे भोले भाले लोगों को धोखा देने जैसा ही है । लेकिन इसके बावजूद भी मै जाप करता गया लेकिन इससे भी पीडा कम न हुई । मुझे यह इसलिये भी छोडना पडा क्योंकि मै  जाप कम बल्कि शोर अधिक मचा रहा था ।
अपने घर से लगभग १००० किमी दूर एक जंगल मे जो कुछ मुझे समझ आया मैने  प्रयास किये लेकिन सभी असफ़ल सिद्ध हुये । निराशा और गहन पीडा की उस घडी मे एक रोशनी मेरे दिल और दिमाग मे कौधीं । एक दरवाजा खुला और उसके बाद सारे दरवाजे एक के बाद खुलते गये ।
मुझे अपने बचपन के दिनों मे पढे हुये दो शब्द याद आये , “ जाने दो ” न जाने इन शब्दों को मैने कितनी बार सुना था , न जाने अनगिनत बार अपने मित्रों से मैने इसकी व्याख्या की थी । लेकिन इसका वास्तविक अर्थ मुझे आज मालूम पडा ।
अगले कुछ क्षण मे जो हुआ वह मेरे लिये  अकल्पनीय था । भीषण दर्द का एहसास लगभग समाप्त हो चुका था और उसके बद्ले मे मनोरम आनंद की अनूभूति हो रही थी । मेरा मन  और मस्तिष्क शांति की गहन अवस्था मे स्थिर हो चुका था । एक बार पु:न मै ध्यान करने के लिये बैठा । सुबह होते-२ ध्यान करने के पशचात मैने अल्प लेकिन  पूर्ण नींद ली । मठ के कर्तव्यों को पूरा करने के लिये जब मै सुबह सोकर  उठा तो मुझे ध्यान आया कि मेरे दाँत मे दर्द है लेकिन यह पीडा बीती रात की तुलना मे कुछ भी नही थी ।
मेरे कई मित्रो ने दर्द मे इस तरीके को आजमाया और पाया कि यह काम नही करता । वह मेरे पास आये और उन्होने शिकायत की कि उनका दर्द मेरे दाँत के तुलना मे अधिक था । लेकिन मै जानता हूँ कि यह सच नही है । पीडा का मूल्याकंन नही किया जा सकता । मेरी पीडा इसलिये कम हुई क्योकि मैने दर्द का स्वागत किया , उसको गले लगा के उसे आने दिया । इसलिये वह ओझल भी हो गया ।
मैने अपने मित्रो को “ जाने दो ” के असफ़ल रहने के कारण को मेरे तीन अनुयायियों  की  कहानी के जरिये से समझाया ।
पहले अनुयायी ने अपनी  वेदना के दौरान  “ जाने दो “ शब्द  का कुछ इस तरह से प्रयोग किया ।
उसने मन ही मन कहा “ जाने दो ” और इतंजार करने लगा ।
एक बार फ़िर उसने “ जाने दो ” शब्द को दोहराया लेकिन कोई परिवर्तन नही दिखा ।
अबकी बार कुछ शिकायत भरे तरीके से कहा ,  “चलो अब बहुत हो गया जाने भी दो | ”
कुछ झल्लाये और क्रोधित अंदाज मे , “ जाते हो यह नही !! ”
यही तो हम अपनी वास्तविक जिन्दगी मे करते हैं । “ जाने दो ” शब्द  का अर्थ है कि जहाँ कोई भी  नियत्रंण करने वाला नही हो । लेकिन हम अपने नियत्रण करने वाले स्वयं ही बन जाते हैं जो मेरी समझ मे यह  सनक के अलावा कुछ भी नही है ।
दूसरे अनुयायी ने यह जानते और समझते हुये कि वह नियत्रंक की भूमिका नही निभा रहा है , चुपचाप मेरी सलाह को याद रखा और शांति से  बैठकर यह अनुमान लगाने लगा कि उसकी पीडा कम हो रही है । दस मिनट बीत गये लेकिन कुछ भी परिवर्तन नही दिखा । उसने मुझसे शिकायत की मेरे तरीके उसके काम नही आ रहे हैं । मैने  उसको समझाया कि “ जाने दो ” शब्द  किसी दर्द को छुट्कारा पाने का तरीका नही है बल्कि यह दर्द को शांति  से सहने की विधि है । दूसरे अनुयायी ने अबकी  बार  अपनी पीडा से सौदा करने की कोशिश की , “ मै तुम्हे १० मिनट का समय देता हूँ , अब तुम यहाँ से चले जाओ । ”
लेकिन यह दर्द को जाने देने का तरीका नही है , यह तो पीडा को छुट्कारा पाने का ढंग हुआ ।
तीसरे अनुयायी ने अपनी तीव्र पीडा से कुछ ऐसे कहा , “ मेरी व्यथाओं तुम्हारा स्वागत है , मेरा दिल तुम्हारे लिये खुला है , आओ और मेरे लिये   तुमसे जो बन सकता करो ।  ”
जाने दो का सही अर्थ यही है । मेरा तीसरा अनुयायी नियत्रंक की भूमिका को निभाये बगैर अपनी पीडाओं को यह स्वतंत्रता देता है कि वह जब तक रहना चाहे रहे । एक सच्चे साधक के लिये व्यथा का रहना या न रहना , दोनो ही एक समान है । और यही कारण है कि तीसरे अनुयायी को  दर्द सहने और मुक्ति का मार्ग आसानी से मिल गया   ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Fear of pain और Letting go of pain ” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 5, 2014

निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”

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किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन  हम लोगों मे   बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे  हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि  मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे  चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि  हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान  के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर  नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे ।  जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और  प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल  हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी  निराश नही  करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास  है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता  है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन  हमारे विहार के  एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने  बिना दान लिये  उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से  विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी ।  उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह  कहते थे  कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, October 17, 2014

सच्चा धर्म

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गौतम बुद्ध जिन दिनों वाराणसी के पास प्रवास कर रहे थे और उनका जीवन उनके कुछ साथियों के साथ भिक्षा पर चल रहा था, उन दिनों उनके एक अति प्रिय शिष्य को एकबार कहीं भीख नहीं मिली। उदास भाव से वो लौट रहा था कि अचानक उसके कटोरे में मांस का एक टुकड़ा आ गिरा। शिष्य बहुत हैरान हुआ कि ये कहां से आया? उसने उपर देखा तो पाया कि एक चील अपने पंजे में इसे ले जा रही थी, और वही उसके पंजे से छूट कर कटोरे में आ गिरा है। शिष्य बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आखिर में बुद्ध के सामने गया और उसने सारी कथा उन्हें कह सुनाई कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला, बस ये मांस का एक टुकड़ा मेरे पात्र में आ गिरा।
बुद्ध ने उसे समझाया कि अब जो मिला वही तुम्हारी किस्मत। तो तुम उसका अनादर मत करो, और उसे ही पका कर खा लो। शिष्य ने ऐसा ही किया। मांस बहुत स्वादिष्ट पका।
बुद्ध के तमाम शिष्य इस पूरी घटना को देख रहे थे। पहले तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज मांस लाने की वजह से उस अति प्रिय शिष्य को डांट पड़ेगी, लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था। कहां बाकी शिष्य वही सादा भोजन ग्रहण कर रहे थे, और वो मांसाहारी भोजन कर रहा था। इस घटना को देख कर बाकी शिष्यों ने भी धीरे-धीरे कहीं से मांस उठा कर लाना शुरू कर दिया और आकर बुद्ध से कहने लगे कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला बस यही मांस का टुकड़ा मिला है। बुद्ध उसे देख मुस्कुराते और कहते जो मिला उसे ही स्वीकार करो।
एक दिन एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा कि भगवन्‌ आप जानते हैं कि ये झूठ बोल कर मांस पका कर खा रहे हैं, फिर आप इन्हें रोकते क्यों नहीं?
बुद्ध ने कहा कि रोकने से कोई नहीं रुकता। जिसे रुकना होता है वो खुद रुकता है। और वो रुकना भी क्या रुकना जिसमें मन न रुके? और अगर मन ही न रुके तो तन के रुकने का कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में जिसे जिसे जो अच्छा लगता है उसे करने दो। जब मन की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे जब हो, तभी आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ता है।

साभार : श्री संजय सिन्हा ( फ़ेसबुक की वाल  से )

Thursday, October 16, 2014

“ यह भी बीत जायेगा ”- This too shall pass

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मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों को समझाना  एक दुरुह कार्य है । अकसर साधारण दिखने वाली सीखे भी इन रोगियों को समझाने मे उलटी ही पड जाती हैं । लेकिन एक बार जब वह उन अवसाद से निकलते हैं तब ही इस कहानी का मर्म समझ सकते हैं ।

मैने सुना  है कि कि एक जेल मे एक कैदी  अपनी सजा को काट रहा था । घोर निराशा और अवसाद के बीच वह उस बद कोठरी  के एक एक क्षण को गिनता  । जैसे –२ उसकी सजा का समय  आगे खिसक रहा था  वैसे वैसे उसके दिल की धड्कन मध्यम होती जा रही थी  । लेकिन एक दिन उसकी नजर उस जेल के कोठरी  की छ्त पर जा पडी जहाँ शायद किसी और कैदी ने लिख छोडा था , “ यह भी बीत जायेगा “ यह वाक्य उस कैदी के लिये सहारा बने । जिस दिन उसको जेल से रिहा किया गया उस दिन उसको इस की महत्ता मालूम पडी ।

जेल से रिहा होने के बाद उसने अपनी सामन्य जिदंगी मे भी इस वाक्य को अपने साथ संजो कर रखा । यहाँ तक कि जब उसका समय खराब आया तब भी वह कभी अवसाद मे नही गया  । उसको याद रहा कि यह समय भी अधिक दिन नही टिकेगा । उसके जीवन मे खुशियों के भी क्षण आये लेकिन उसमे भी वह सामान्य रहा ।

जीवन के अंतिम दिनो मे वह कैसंर से पीडित रहा । लेकिन  सिर्फ़ एक वाक्य , “ यह भी बीत जायेगा “ ने उसको उम्मीद और हौसला दिया ।

मृत्यु शैया पर उसने अपने चाहने वालों को बुलाया और धीरे से  फ़ुसफ़ुसा के कहा ,“ यह भी बीत जायेगा “ और मृत्यु को समा गया । उसके शब्द उसके परिवार वालों और उसके मित्रों के लिये भेट से कम नही थे । उन्होने उससे सीखा कि दु:ख और परेशानी के क्षण भी चले जाते है ।

मानसिक अवसाद के क्षण ऐसे कैदखाने का रुप हैं जिससे हम मे से कोई भी भी बचा नही है । कभी न कभी , चाहे या न चाहे हम को उन क्षणॊ से गुजरना ही पडता है । लेकिन अगर हम सिर्फ़ एक वाक्य , यह भी बीत जायेगा  को याद रखे तो विशवास रखिये हमारा जीवन तनाव और अवसाद से मुक्त रह सकता है ।

अजह्न ब्रहम की कहानी “ This too will pass “ का हिन्दी अनुवाद

Monday, October 13, 2014

ज्ञान मार्ग से उपजी वैज्ञानिकता - श्री शम्भू नाथ शुक्ल

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साभार : दैनिक ट्रिब्यून 13 अक्टूबर 2014

बुद्ध चरित में एक कथा है—बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन‍‍् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआ अपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन‍् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन‍्? मुझे तो लगता है कि अनजाने में किया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए। पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।

शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैं तुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन‍् जो अनजाने में उस गर्म लोहे की छड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गया अपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गया अपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिए भी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझ में आया कि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने में सहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शन मनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं या आत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा भंते। मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्ध करते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।

कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता है वह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्ध मार्ग का विस्तार हुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फ साधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और काल की सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठ मिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत के अनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।

यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आज भी उसी धर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भले इस्लाम हो पर वहां पर आम जनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनों ही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद किया गया। यही कारण है कि बुद्ध वहां धर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतई नहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—भंते, अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति!


Monday, March 31, 2014

बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण ( गृह त्याग ) का सच ?

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माना  जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध    वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।, यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता , माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे , क्या वह कभी बीमार नही पडे , यह कहानी तर्क संगत नही लगती । हाँलाकि इसको ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के  अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार –२ क्युं पाया जाता रहा है । डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।”
फ़िर सच क्या है ? आखिर बुद्ध ने गृह त्याग क्यूँ किया ? डा. आंबेडकर ने ’ बुद्ध और उनका धम्म ’ मे इसके बारे मे चर्चा की है ।डा. अम्बेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया है जो अधिक प्रतीत लगता है ।
why buddha leaves the house
स्त्रोत : भगवान्‌ बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अंबेडकर

अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥
अर्थ :‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’
डा, आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे। शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।
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राहुल सांकृत्यायन ने इसी परम्परागत मान्यता के साथ लिखा है कि सिद्धार्थ गौतम ने अपनी पत्नी और बच्चे को सोता हुआ छोड़कर चुपके से गृहत्याग किया था। किन्तु, आंबेडकर इस मान्यता से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, उन्होंने पूरी तरह अपने पिता शुद्धोधन, अपनी माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से सहमति और अनुमति लेकर घर से अभिनिष्क्रमण किया था। राहुल ने सिद्धार्थ की परिवार-विमुखता को गम्भीरता से नहीं लिया, शायद इसलिये कि वे स्वयं भी परिवार-विमुख थे। पर, आंबेडकर ने इसे बहुत गम्भीर प्रश्न माना था। उनकी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति, जो परिवार-विमुख है, समाज-विमुख भी होगा, वह समाज-उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिये आंबेडकर ने इस बात को रेखांकित करना ज्यादा जरूरी समझा कि सिद्धार्थ जैसा जनवादी और जागरूक व्यक्ति परिवार-विमुख कैसे हो सकता है? वह परिवार के सदस्यों को धोखा देकर घर छोड़ ही नहीं सकते थे। इस तरह के विश्वासघात की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती थी। आंबेडकर ने लिखा है कि जब सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु छोड़ा, तो अनोमा नदी तक जनता उनके पीछे-पीछे आयी थी, जिसमें उनके पिता शुद्धोधन और उनकी माता प्रजापति गौतमी भी उपस्थित थे।
कंवल भारती की पुस्तक ’ राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर” ऐसे न जाने कितने ज्वलंत प्रशनों को उठा रही  है। अब यह ब्लाग के माध्यम से पाठकों के लिये पठनीय है । पढें और विचारें :
  1. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग १
  2. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग २
  3. राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर भाग ३

Friday, September 20, 2013

अप्रमाद ( awareness ) अमृत का पथ है और प्रमाद ( non awareness ) मृत्यु का

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ओशो : ‘ अप्रमाद अमृत का पथ है और प्रमाद मृत्यु का।’
साभारडां प्रवीन गोस्वामी

बुद्ध की सारी जीवन-प्रक्रिया को एक शब्द में हम रख सकते हैं, वह है, अप्रमाद, अवेयरनेस, जागकर जीना।
जागकर जीने का क्या अर्थ होता है? अभी तुम रास्ते पर चलते हो, बुद्ध से पूछोगे तो वे कहेंगे, यह चलना बेहोश है। रास्ते पर दुकानें दिखायी पड़ती हैं, पास से गुजरते लोग दिखायी पड़ते हैं, घोड़ागाड़ी, कारें दिखायी पड़ती हैं, लेकिन एक चीज तुम्हें चलते वक्त नहीं दिखायी पड़ती, वह तुम स्वयं हो। और सब दिखायी पड़ता है। पास से कौन गुजरा, दिखायी पड़ा। राह पर भीड़ है, दिखायी पड़ी। रास्ता सुनसान है, दिखायी पड़ा। सब तुम्हें दिखायी पड़ता है, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते। यही तो सपना है।
सपने में तुमने कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ता है, एक तुम दिखायी नहीं पड़ते। सपने का स्वभाव यही है। बहुत सपने तुमने देखे हैं। कभी खयाल किया, सब दिखायी पड़ते हैं, एक तुम भर दिखायी नहीं पड़ते सपने में। मित्र-शत्रु सब दिखायी पड़ते हैं, तुम भर नहीं दिखायी पड़ते।
यही तो स्थिति जीवन की है, जागने की है। जिसे तुम जागना कहते हो उसमें और नींद में कोई अंतर नहीं मालूम होता। दोनों में एक बात समान है कि तुम्हारा तुम्हें कोई पता नहीं चलता। भीतर अंधेरा है। भीतर दीया नहीं जला। इसको बुद्ध प्रमाद कहते हैं, मूर्च्छा कहते हैं।
अपना ही पता न चले, यह भी कोई जिंदगी हुई? चले, उठे, बैठे, उसका पता ही न चला जो भीतर छिपा था। अपने से ही पहचान न हुई, यह भी कोई जिंदगी है? अपने से ही मिलना न हुआ, यह भी कोई जिंदगी है? और जो अपने को ही न पहचान पाया, और क्या पहचान पाएगा? निकटतम थे तुम अपने, उसको भी न छू पाए, और परमात्मा को छूने की आकांक्षा बनाते हो? चांद-तारों पर पहुंचना चाहते हो, अपने भीतर पहुंचना नहीं हो पाता।
स्मरण रखो, निकटतम को पहले पहुंच जाओ, तभी दूरतम की यात्रा हो सकती है। और मजा यह है कि जिसने निकट को जाना, उसने दूर को भी जान लिया, क्योंकि दूर निकट का ही फैलाव है।
उपनिषद कहते हे, वह परमात्मा पास से भी पास, दूर से भी दूर है। क्या इसका यह अर्थ हुआ कि उसे जानने के दो ढंग हो सकते है-कि तुम उसे दूर की तरह जानने जाओ या पास की तरह जानने जाओ?
नहीं, दो ढंग नहीं हो सकते। जब तुम पास से ही नहीं जान पाते तो तुम दूर से कैसे जान पाओगे? जब मैं अपने को ही नहीं छू पाता, परमात्मा को कैसे छू पाऊंगा? जब आख अपने ही सत्य के प्रति नहीं खुलती, तो परमात्मा के विराट सत्य की तरफ कैसे खुल पाएगी?
इसलिए बुद्ध चुप रह गए, परमात्मा की बात ही नहीं की। वह बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से, जागकर जो दिखायी पड़ता है, उसकी बात करनी फिजूल है। सोए आदमी से तो यही बात करनी उचित है, कैसे उसका सपना टूटे, कैसे उसकी नींद टूटे?