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Wednesday, September 14, 2016

तीन गांठें

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भगवान‌ बुद्ध अकसर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे । बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे ।
वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे ; तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
एक शिष्य ने उत्तर में कहा,” गुरु जी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है । दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है।”
“सत्य है !”, बुद्ध ने कहा ,” अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”
“नहीं-नहीं , ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा। “, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।
बुद्ध ने कहा, ‘ ठीक है , अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’
शिष्य बोला ,’”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा , ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था , और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं। “
“मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असम्भव है। मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं , कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ ? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया , लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ ?
प्रिय शिष्यों , जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही , और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा, आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें, निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । ” , महात्मा बुद्ध ने अपनी बात पूरी की।
जब तक हम रस्सी की गाँठो को अच्छे से देख कर समझेंगे नहीं,तब तक उसे खोल न सकेंगे।
"विपश्यना" से हम अपने मन की गाँठो को देखने,समझने और उसके बाद उन्हें खोलने का कार्य करते हैं।

Saturday, June 27, 2015

अरञ्‍ञसुत्तं

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ऐसा  सुना जाता है कि एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती मे अनाथपिणिक के जेतवन आराम मे विहार कर रहे थे । तब कोई देवता रात बीतने पर अपनी चमक से सारे जेतवन को चमकाते हुये आया और भगवान बुद्ध का अभिवादन कर के एक और खडा हो गया ।

एक ओर खडा हो कर वह देवता भगवान से बोला ,

“ जंगल मे विहार करने वाले ब्रह्म्मचारी तथा एक  बार ही भोजन करने वालों का चेहरा कैसे खिला रहता है ? ”

शास्ता ने कहा ,

बीते हुये का वे शोक नही करते ,

आने वाले पर बडे मनसूबे नही  बाँधते ,

जो मौजूद है उसी से गुजारा करते हैं ;

इसी से उनका चेहरा खिला रहता है ॥

आने वाले पर बडे मनसूबे बाँध,

बीते हुये का शोक करते रह ,

मूर्ख लोग फ़ीके पडे रहते हैं ,

हरा नरकट ( ईख )जैसे कट जाने पर ॥                         

    संयुत्तनिकायो -१०. अरञ्‍ञसुत्तं

Wednesday, June 17, 2015

भदिद्कारता सुत्त “ Bhaddekaratta Sutta ”

भदिद्कारता सुत्त
साभार : : Pingala Wanjari
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"अतीत का पीछा न करो ।
भविष्य के भ्रम जाल मे न फ़ंसो।
अतीत व्यतीत हो गया ।
भविष्य अभी अनागत है ।
यहाँ अभी इस क्षण जीवन जैसा है , उसी को धारण करो
साधनाभ्यासी ,स्थिरता और मुक्त भाव मे जीता है ।
कल की प्रतीक्षा की , तो विलम्ब होगा।
मृत्यु अचानक धर दबोचती है
उससे हम क्या समझोता कर सकते हैं ?
भिक्खुजन उसी का आह्वान करते हैं
जो दिन और रात
सचेतानावस्था मे जागृत रहता है
जो जानता है कि
एकान्तवास का उत्तमतर मार्ग क्या है । ”
स्त्रोत : मॆट्टा सुत्त(M. 131); भदिद्कारता सुत्त, आंनद भद्दकारता सुत्त
“Do not pursue the past.
Do not lose yourself in the future.
The past no longer is.
The future has not yet come.
Looking deeply at life as it is
in the very here and now,
the practitioner dwells
in stability and freedom.
We must be diligent today.
To wait until tomorrow is too late.
Death comes unexpectedly.
How can we bargain with it?
The sage calls a person who knows
how to dwell in mindfulness
night and day
‘one who knows
the better way to live alone.’”
Source : Bhaddekaratta Sutta (M. 131); Ananda Bhaddekaratta Sutta (M. 132); Mahakaccana Bhaddekaratta Sutta (M. 133);


भगवान भिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहते हैं  भिक्षुओं ' भद्देकरत्त ' अर्थात जो भिक्षु
अकेले में अनुरक्त रहने वाला एकांत प्रेमी एवं एकाग्रता से साधना करने वाला होता है ➡
उसके उद्देश नाम-कथन और विभङ्ग-विभाग का आज तुम्हें उपदेश करता हूँ। उसे सुनो, अच्छी तरह मनमें धारण करो,
कहता हूँ ➡
1 ] अतीत का अनुगमन न करें।
2 ] न भविष्य की चिंता में पडे।
3 ] जो अतीत था वह तो नष्ट हो गया।
4 ] जो भविष्य है वह अभी आया नहीं उसकी चिंता करना व्यर्थ है। और भिक्षुओं
5 ] केवल वर्तमान में जो हैं, उसे यथाप्रसंग देखना चाहिए । जो असंहारी है और न टलने वाला है अर्थात जो अटल हैं, विद्वानको दृढ़ता से उस परिस्थिति का सामना करना चाहिए।
6 ] क्या पता हमारा कब मरण हो जाय अतः अभी से ही, इसी क्षण से ही हमें अपने कर्तव्य में जुड़ना चाहीये ,कौन जानता है ,गई हुई साँस वापस आये ना आये , अगले ही पल मृत्यु हो । इसलिये बिना रुके  शुभ कर्मों में लग जाना चाहिए। हम पामर मृत्युराज से नहीं लड़ सकते।
महासेना वाली मृत्यु से कोई समय निश्चित नहीं है ।
7 ] भिक्षुओं रात -दिन निरालस ,उद्योगी हो ,इस प्रकार विहार ने वाले को ही , शान्त एवं भद्देकरत्त /भद्रैकरत्न कहते हैं। अर्थात वह भिक्षु सर्वोपरि उत्तम माना जाता है। उसका लक्ष्य  निश्चित है ।
वह भगवदुपदिष्ट वचनों का पालन ' जी-जान ' से करता हैं ।
भिक्षुओं कोई भिक्षु किस प्रकार अतीत का अनुगमन करता है
वह अज्ञानवश इस प्रकार चिंतन करने लगता है कि अतीत काल में मैं इस प्रकार के रूप वाला था, इस प्रकार के सुख भोगने वाला था । ऐसा सोचकर उसमें नन्दी, आसक्ति या यूं कहें कि राग उत्पन्न करता हैं।
मैं अतीत काल में इस प्रकार की वेदना वाला,
इस संज्ञा वाला , इस प्रकार के संस्कार वाला , इस प्रकार के विज्ञान वाला था , मैंने यह किया , मैंने वैसा किया था , मैं ऐसा था और क्या क्या नहीं ……………
इस प्रकार, भिक्षुओं वह अतीत का अनुगमन करता हैं। अपने बिते हुए कल से ➡ वह छुटकारा नहीं पाता । भिक्षुओं यह बड़ा दुखदायी होता है ।
भिक्षुओं अतीत का अचिंतन कैसे होता है
अतीत काल में मैं इस प्रकार के रूप वाला था । पहले मैं ऐसा था , यह सोच, उसमें राग उत्पन्न नहीं करता। अतीत में मैं इस वेदना वाला, इस संज्ञा वाला था , इस विज्ञानवाला था , ऐसा सोचकर भी वह उस भूतकाल में अटका पड़ा नहीं रहता । इस प्रकार भिक्षुओं वह अतीत का अनुगमन नहीं करता। इसे ही अतीत का अचिंतन कहते हैं । यह स्थिति साधना में बहुत सहायक होती है ।
कैसे भिक्षुओं भविष्य, अनागत की चिंता नहीं करता ध्यान से सुनो ➡
मैं भविष्य में इस प्रकार के रूप वाला होऊंगा, यह सोचकर उसमें नन्दी या राग उत्पन्न नहीं करता , आसक्ति नहीं जगाता । इसी प्रकार वेदना, संज्ञा वाला , इस संस्कार वाला , इस विज्ञान वाला होऊंगा के संदर्भ में भी, वह भविष्य में ऐसा होगा, सोचकर उसमें राग उत्पन्न नहीं करता। अनागत की चिंता नहीं करता। भिक्षुओं यह स्थिति साधक के लिए अच्छी मानी जाती है ।
कैसे भिक्षुओं प्रत्युत्पन्न अर्थात वर्तमान धर्मों में आसक्त होता है
यहां भिक्षुओ आर्योंके दर्शन से वंचित, अश्रुतवान,
जिसने सत्पुरुषों के साथ बैठकर धर्म के बारे मे कुछ सुना ही ना हो ऐसा अनाड़ी व्यक्ति रूपकों matter को ही मैं हूँ ऐसा मानता है और मैं अविनाशी हूँ । ये वेदना मेरी है और यह शरीर भी मैं ही हूँ । इस प्रकार मैं और मेरे के चक्कर में फँसकर प्रत्युत्पन्न धर्मोंमें आसक्त होता है।
कैसे भिक्षुओं साधक प्रत्युत्पन्न धर्मोंमें आसक्त नहीं होता
यहां भिक्षुओ  आर्योंके दर्शन को प्राप्त कर, बहुश्रुत आर्यश्रावक, रूपकों मैं और मेरे के तौर पर नहीं देखता। वह धर्म के मर्म को ज़ड सहित जान लेता है जैसा समझाया गया हो बिल्कुल वैसे ही ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार भिक्षुओं वर्तमान धर्मोंमें वह आसक्त नहीं होता। यही बात , यही गुण उसे साधना में बहुत काम आता है । ऐसा साधक प्रगति करता हुआ आगे बढता चला जाता है ।
अतीतका अनुगमन न करने वाला , या यूं कहें कि भूत भविष्य में जो साधक कदापि रमन नहीं करता । जो केवल और केवल इसी क्षण में , वर्तमान से ही जुड़ा रहता है । उसका केवल वास्तविकता से ही नाता रहता है । जिसके शब्दकोश में कल्पना को कोई स्थान ना हो ऐसा शांत मुनिजन भद्देकरत्त या भद्रैकरत्न कहलाता है।
स्त्रोत -- मज्झिमनिकाय पालि 3 , भद्देकरत्तसुत्तं
साभार :
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Pingala Wanjari






Saturday, October 25, 2014

मन की शांति

एक राजा हमेशा उदास रहता था। लाख कोशिश करने के बावजूद उसे शांति नहीं मिलती थी। एक बार उसके नगर में एक बौद्ध भिक्षु आया। बौद्ध भिक्षु के ज्ञानपूर्ण उपदेश से राजा बहुत प्रभावित हुआ। उसने बौद्ध भिक्षु से पूछा - ‘मैं राजा हूं, मेरे पास सब कुछ है, किंतु फिर भी मेरे मन में शांति नहीं है। 

मुझे क्या करना चाहिए?’ बौद्ध भिक्षु बोला - ‘आप अकेले में बैठकर चिंतन करें।’ राजा अगले दिन सुबह अपने कक्ष में आसन जमाकर बैठ गया। तभी उसके महल का एक कर्मचारी सफाई के लिए उधर आया। राजा उससे बात करने लगा। कर्मचारी से राजा ने उसकी परेशानियां पूछीं, जिन्हें सुनकर उसका दिल भर आया। इसके बाद राजा ने हर कर्मचारी के कष्ट व दुख जाने। 

सबकी व्यथा सुनने के बाद राजा ने निष्कर्ष निकाला कि वेतन कम होने से सभी आर्थिक रूप से त्रस्त थे। राजा ने तत्काल उनके वेतन में वृद्धि की, जिससे वे सभी खुश हो गए और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। अगले दिन जब राजा की बौद्ध भिक्षु से भेंट हुई, तो उसने पूछा - ‘राजन! आपको कुछ शांति प्राप्त हुई?’ राजा बोला - ‘मुझे पूर्ण रूप से तो शांति नहीं मिली, किंतु जबसे मैंने मनुष्य के दुखों के स्वरूप को जाना है, अशांति थोड़ी-थोड़ी जाती रही।’ तब भिक्षु ने समझाया - ‘राजन! आपने शांति के मार्ग को खोज लिया है। बस, उस पर आगे बढ़ते जाएं। एक राजा तभी प्रसन्न रह सकता है, जब उसकी प्रजा सुखी हो।’ सार यह है कि मन की शांति स्वयं के सुख से अधिक दूसरों के दुख हरकर उन्हें सुखी बनाने से मिलती है, इसलिए यथाशक्ति दूसरों की सहायता करें।

साभार : भीम राव ( फेस बुक स्टेट्स से )

Friday, October 17, 2014

सच्चा धर्म

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गौतम बुद्ध जिन दिनों वाराणसी के पास प्रवास कर रहे थे और उनका जीवन उनके कुछ साथियों के साथ भिक्षा पर चल रहा था, उन दिनों उनके एक अति प्रिय शिष्य को एकबार कहीं भीख नहीं मिली। उदास भाव से वो लौट रहा था कि अचानक उसके कटोरे में मांस का एक टुकड़ा आ गिरा। शिष्य बहुत हैरान हुआ कि ये कहां से आया? उसने उपर देखा तो पाया कि एक चील अपने पंजे में इसे ले जा रही थी, और वही उसके पंजे से छूट कर कटोरे में आ गिरा है। शिष्य बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आखिर में बुद्ध के सामने गया और उसने सारी कथा उन्हें कह सुनाई कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला, बस ये मांस का एक टुकड़ा मेरे पात्र में आ गिरा।
बुद्ध ने उसे समझाया कि अब जो मिला वही तुम्हारी किस्मत। तो तुम उसका अनादर मत करो, और उसे ही पका कर खा लो। शिष्य ने ऐसा ही किया। मांस बहुत स्वादिष्ट पका।
बुद्ध के तमाम शिष्य इस पूरी घटना को देख रहे थे। पहले तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज मांस लाने की वजह से उस अति प्रिय शिष्य को डांट पड़ेगी, लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था। कहां बाकी शिष्य वही सादा भोजन ग्रहण कर रहे थे, और वो मांसाहारी भोजन कर रहा था। इस घटना को देख कर बाकी शिष्यों ने भी धीरे-धीरे कहीं से मांस उठा कर लाना शुरू कर दिया और आकर बुद्ध से कहने लगे कि प्रभु आज कुछ नहीं मिला बस यही मांस का टुकड़ा मिला है। बुद्ध उसे देख मुस्कुराते और कहते जो मिला उसे ही स्वीकार करो।
एक दिन एक शिष्य ने बुद्ध से पूछा कि भगवन्‌ आप जानते हैं कि ये झूठ बोल कर मांस पका कर खा रहे हैं, फिर आप इन्हें रोकते क्यों नहीं?
बुद्ध ने कहा कि रोकने से कोई नहीं रुकता। जिसे रुकना होता है वो खुद रुकता है। और वो रुकना भी क्या रुकना जिसमें मन न रुके? और अगर मन ही न रुके तो तन के रुकने का कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में जिसे जिसे जो अच्छा लगता है उसे करने दो। जब मन की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे जब हो, तभी आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ता है।

साभार : श्री संजय सिन्हा ( फ़ेसबुक की वाल  से )

Thursday, October 16, 2014

“ यह भी बीत जायेगा ”- This too shall pass

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मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों को समझाना  एक दुरुह कार्य है । अकसर साधारण दिखने वाली सीखे भी इन रोगियों को समझाने मे उलटी ही पड जाती हैं । लेकिन एक बार जब वह उन अवसाद से निकलते हैं तब ही इस कहानी का मर्म समझ सकते हैं ।

मैने सुना  है कि कि एक जेल मे एक कैदी  अपनी सजा को काट रहा था । घोर निराशा और अवसाद के बीच वह उस बद कोठरी  के एक एक क्षण को गिनता  । जैसे –२ उसकी सजा का समय  आगे खिसक रहा था  वैसे वैसे उसके दिल की धड्कन मध्यम होती जा रही थी  । लेकिन एक दिन उसकी नजर उस जेल के कोठरी  की छ्त पर जा पडी जहाँ शायद किसी और कैदी ने लिख छोडा था , “ यह भी बीत जायेगा “ यह वाक्य उस कैदी के लिये सहारा बने । जिस दिन उसको जेल से रिहा किया गया उस दिन उसको इस की महत्ता मालूम पडी ।

जेल से रिहा होने के बाद उसने अपनी सामन्य जिदंगी मे भी इस वाक्य को अपने साथ संजो कर रखा । यहाँ तक कि जब उसका समय खराब आया तब भी वह कभी अवसाद मे नही गया  । उसको याद रहा कि यह समय भी अधिक दिन नही टिकेगा । उसके जीवन मे खुशियों के भी क्षण आये लेकिन उसमे भी वह सामान्य रहा ।

जीवन के अंतिम दिनो मे वह कैसंर से पीडित रहा । लेकिन  सिर्फ़ एक वाक्य , “ यह भी बीत जायेगा “ ने उसको उम्मीद और हौसला दिया ।

मृत्यु शैया पर उसने अपने चाहने वालों को बुलाया और धीरे से  फ़ुसफ़ुसा के कहा ,“ यह भी बीत जायेगा “ और मृत्यु को समा गया । उसके शब्द उसके परिवार वालों और उसके मित्रों के लिये भेट से कम नही थे । उन्होने उससे सीखा कि दु:ख और परेशानी के क्षण भी चले जाते है ।

मानसिक अवसाद के क्षण ऐसे कैदखाने का रुप हैं जिससे हम मे से कोई भी भी बचा नही है । कभी न कभी , चाहे या न चाहे हम को उन क्षणॊ से गुजरना ही पडता है । लेकिन अगर हम सिर्फ़ एक वाक्य , यह भी बीत जायेगा  को याद रखे तो विशवास रखिये हमारा जीवन तनाव और अवसाद से मुक्त रह सकता है ।

अजह्न ब्रहम की कहानी “ This too will pass “ का हिन्दी अनुवाद

Monday, October 13, 2014

ज्ञान मार्ग से उपजी वैज्ञानिकता - श्री शम्भू नाथ शुक्ल

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साभार : दैनिक ट्रिब्यून 13 अक्टूबर 2014

बुद्ध चरित में एक कथा है—बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन‍‍् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआ अपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन‍् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन‍्? मुझे तो लगता है कि अनजाने में किया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए। पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।

शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैं तुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन‍् जो अनजाने में उस गर्म लोहे की छड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गया अपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गया अपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिए भी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझ में आया कि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने में सहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शन मनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं या आत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा भंते। मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्ध करते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।

कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता है वह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्ध मार्ग का विस्तार हुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फ साधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और काल की सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठ मिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत के अनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।

यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आज भी उसी धर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भले इस्लाम हो पर वहां पर आम जनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनों ही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद किया गया। यही कारण है कि बुद्ध वहां धर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतई नहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—भंते, अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति!


Thursday, July 4, 2013

बस अच्छॆ बनो !! ~~भगवान्‌ बुद्ध ~~

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कुशल कर्म करो. अकुशल कर्मों से बचो और चित्त का परिशोधन  करो ।
                                                              ~~भगवान्‌ बुद्ध~~

सूक्ति का स्त्रोत : स्वर्ग कोई भी जा सकता है , बस अच्छॆ बनो ! लेखक टी.वाई.ली,  अनुवाद : श्री राजेश चन्द्रा

Thursday, June 20, 2013

सिद्धांत की परिभाषा

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भगवान गौतम बुद्ध उस समय वैशाली में थे। उनके धर्मोपदेश जनता बड़े ध्यान से सुनती और अपने आचरण में उतारने का प्रयास करती थी। बुद्ध का विशाल शिष्य वर्ग भी उनके वचनों को यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के सत्कार्य में लगा हुआ था। एक दिन बुद्ध के शिष्यों का एक समूह घूम-घूमकर उनके उपदेशों का प्रचार कर रहा था कि मार्ग में भूख से तड़पता एक भिखारी दिखाई दिया।
उसे देखकर बुद्ध के एक शिष्य ने उसके पास जाकर कहा- अरे मूर्ख! इस तरह क्यों तड़प रहा है? तुझे पता नहीं कि तेरे नगर में भगवान बुद्ध पधारे हुए हैं। तू उनके पास चल, उनके उपदेश सुनकर तुझे शांति मिलेगी। भिखारी भूख सहन करते-करते इतना शक्तिहीन हो चुका था कि वह चलने में भी असमर्थ था।
सायंकाल उस शिष्य ने तथागत को इस प्रसंग से अवगत कराया। तब बुद्ध स्वयं भिखारी के पास पहुंचे और उसे भरपेट भोजन करवाया। जब भिखारी तृप्त हो गया तो वह सुख की नींद सो गया। शिष्य ने आश्चर्यचकित हो पूछा- भगवन्! आपने इस मूर्ख को उपदेश तो दिया ही नहीं,बल्कि भोजन करा दिया। भगवान बुद्ध मुस्कराकर बोले- वह कई दिनों से भूखा था। इस समय भरपेट भोजन कराना ही उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है। भूख से तड़पता मनुष्य भला धर्म के मर्म को क्या समझेगा?
कथा का सार यह है कि प्रत्येक सिद्धांत अथवा सर्वस्वीकृत आचरण सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। परिस्थिति के अनुसार उसका पालन, अपालन या परिवर्तन मान्य किया जाना ही श्रेष्ठ आचरण है।

साभार : I Am Proud To Be A "Buddhist"

Tuesday, June 18, 2013

आधारभूत प्रश्न

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एक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.
बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.
सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”
शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”
“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”
“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.
“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”
शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता”.
“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.
“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, परिग्रह, आदि-आदि वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन वृत्तियों में कैसे पड़े?”

Tuesday, April 16, 2013

जय मंगल गाथा


भारत की महाबोधि सोसाइटी द्धारा गाई गई मूल पालि मे ‘ जय मंगल गाथा ’ एक दुर्लभ रिकॉर्डिंग है जिसे मैने कुछ दिन पहले  यू ट्यूब पर देखी । पालि  एवं अग्रेजी में इसका अनुवाद कई साइट पर मिल सकता है लेकिन हिन्दी में इसका अनुवाद कही नही मिला । थोडा प्रयास करने के बाद इसका हिन्दी अनुवाद श्री राजेश चन्द्रा जी के पास मिला और  उनका  आभारी रहूगाँ जिन्होनें कल इस गाथा के स्कैन किये हुये पेज मुझे मेल पर भेजे ।
दो वजहों से इस गाथा मे मेरी रुचि बढी । अगर ऊपरी सतही रुप मे देखें तो यह गाथा जैसे आम धर्मों  जैसी ही अपने-२ देवदूतों का  गुणगान करती प्रतीत होती  है लेकिन इन सभी आठ गाथाओं को गौर से पढें तो यह सिर्फ़ शाब्दिक गुणगान कम बल्कि इन्सान की मूल कमजोरियों और नकारात्मक भावों पर  सत्य की जीत को प्रतिनिधित्व  करता है । उदाहरण के लिये मार , नागराज, चिन्चा , बक   इन्सान के नकारात्मक मन को दर्शाते हैं ।
त्रिपटक में इस मंत्र का अपना विशेष स्थान है और यह मंत्र मन मे उठने वाले नकारात्मक विचारों पर बुद्ध्त्व की जीत का सांकेतिक रुप है । यह आठ विजय हैं :
१, भगवान्‌ बुद्ध की मार पर विजय
२.आलवक नामक यक्ष पर विजय
३. नालगिरि  गजराज  पर विजय
४. अंगुलिमाल पर विजय
५. भगवान्‌ बुद्ध को अपशब्द और बदनाम करनी वाली चिन्चा के नापाक इरादों  पर विजय
६. अभिमानी और अंहकारी ब्राहम्ण सच्चक पर विजय
७. नन्दोपण्द नामक भुजगं पर विजय
८.  ब्रह्मा बक के मिथ्याग्रस्त विचारों  पर विजय
मूल पालि में महामंगल गाथा :
बाहुं सहस्समभिनिम्मितसायुधन्त,गिरिमेखलं उदितघोरससेनमारं।
दानादि धम्मविधिना जितवा मुनिन्दो, त तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।१।
मारातिरेकमभियुज्झित-सब्बरत्तिं,घोरं पनालवकमक्खमथद्धयक्ख।
खान्ति सुदन्तविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।२।

नालागिरि गजवरं अतिमत्तभूतं,दावग्गिचक्कमसनीव सुदारूणन्तं।
मेत्तम्बुसेकविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवुत ते जयमंगलानि।३।
उक्खित्तखग्ग-मतिहत्थ सुदारूणन्त,धावं तियोजनपथं-गुलिमालवन्त।
इद्धिभिसंखतमनो जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।४।

कत्वान कटठमुदरं इव गब्भिनीया, चिञ्चाय दुट्ठवंचन जनकायमज्झे।
सन्तेन सोमविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।५।

सच्चं विहाय मतिसच्चकवादकेतुं, वादाभिरोपितमनं अतिअन्धभूतं।।
पञ्ञापदीपजलिलो जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।६।

नन्दोवनन्दभुजगं विवुधं महिद्धि, पुत्तेन थेरभुजगेन दमापयन्तो।
इद्धुपधेसविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवुत ते जयमंगलानि ।७।

दुग्गाहदिठ्टिभुजगेन सुदठ्टहत्थं, ब्रम्ह विसुद्धि जुतिमिद्धि बकाभिधानं।
ञाणागदेन विधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।८।

एतापि बुद्ध जयमंगल अठ्ट गाथा, यो वाचको दिनदे सरते मतन्दी
हित्वान नेकाविविधानि चुपद्दवानि, मोक्खं सुंखं अधिगमेय्य नरो सपञ्ञो।९।

महामंगल गाथा का हिन्दी अनुवाद :
गिरीमेखला नामक गजराज पर सवार शस्त्र-सज्जित सह्स्त्र –भुजाधारी मार को उसकी भीषण सेना सहित जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने अपनी दान पारिमाताओं के बल पर जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो ! ।१।
मार से भी बढ चढ कर सारी रात युद्ध करने वाले , अत्यन्त दुर्घर्ष और कठोर ह्र्दय आलवक नामक यक्ष को जिन मुनीन्द्र ने अपनी शांति और संयम के बल से जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो ! ।२।
दावाग्नि – चक्र अथवा विधुत की भांति अत्यन्तं दारुण और विपुल मदमत्त नालागिरि गजराज को जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने अपने मैत्री रुपी जल की वर्षॊं से जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो ! ।३।
हाथ मे तलवार उठा कर योजन तक दौडने वाले अत्यन्तं भयावह अगुंलिमाल को जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने अपने ऋद्धि बल से जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो ! ।४।
पेट पर काठ बाँधकर गर्भिणी का स्वांग करने वाली चिंचा के द्वारा जनता के मध्य कहे गये अपशब्दों को जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने अपने शांत और सौम्य बल से जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो ! ।५।
सत्य विमुख , असत्यवाद के पोषक, अभिमानी , वादविवाद परायण औए अंहकार से अत्यन्तं अंधे हुये सच्चक नामक परिव्राजक को जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने प्रज्ञा प्रदीप जलाकर जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो !! ।६।
विविध प्रकार की महान ऋद्धियों से संपन्न नन्दोपनंद नामक भुजंग को अपने पुत्र ( शिष्य) महामौद्रल्लायन स्थविर द्वारा अपनी ऋद्धि-शक्ति और उपदेश के बल से जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो !! ।७।
मिथ्यादृष्टि रुपी भयानक सर्प द्वारा डसे गये , शुद्ध ज्योतिर्मय ऋद्धि-संपन्न बक ब्रह्मा को जिन मुनीन्द्र ( भगवान्‌ बुद्ध ) ने ज्ञान की वाणी से जीत लिया , उनके तेज प्रताप से तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा मंगल हो !! ।८।
९. जो बुद्दिमान प्राणी  भगवान्‌ बुद्ध की इन आठ विजय चक्रों को प्रतिदिन कंठस्थ और याद करते हैं , वह जीवन मे आने वाली विपत्तियों से दूर भी रहते हैं और निर्वाण को प्राप्त करते हैं । ।९।



English translation:
1. Creating thousand hands, with weapons armed was Mara seated on the trumpeting, ferocious elephant Girimekhala.
Him, together with his army, did the Lord of Sages subdue by means of generosity and other virtues. By its grace may joyous victory be thine.
2. More violent than Mara were the indocile, obstinate demon Alavaka, who battled with the Buddha throughout the whole night. Him, did the Lord of Sages subdue by means of His patience and self-control. By its grace may joyous victory be thine.
3. Nalagiri, the mighty elephant, highly intoxicated was raging like a forest-fire and was terrible as thunder-bolt.
Sprinkling the waters of loving-kindness, this ferocious Beast, did the Lord of Sages subdue. By its grace may joyous victory be thine.
4. With uplifted sword, for a distance of three leagues, did wicked Angulimala run. The Lord of Sages subdued him by
His psychic powers. By its grace may joyous victory be thine.
5. Her belly bound with faggots, to simulate the bigness of pregnancy, Cinca, with harsh words made foul accusation in the midst of an assemblage. Her, did the Lord ofSages subdue by His serene and peaceful bearing. By its grace may Joyous victory be thine.
6.Haughty Saccaka, who ignored truth, was like a banner in controversy, and his vision was blinded by his own disputation. Lighting the lamp of wisdom, Him did the Lord of Sages subdue. By its grace may Joyous victory be thine.
7.The wise and powerful serpent Nandopananda, the Noble Sage caused to be subdued by the psychic power of his disciple son (Thero Moggallana). By its grace may joyous victory be thine.
8. The pure, radiant, majestic Brahma, named Baka, whose hand was grievously bitten by the snake of tenacious false-views, the Lord of Sages cure with His medicine of wisdom.
By its grace may joyous victory be thine.
9.The wise one, who daily recites and earnestly remembers these eight verses of joyous victory of the Budhha, will get
rid of various misfortunes and gain the bliss of Nirvana.