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Friday, April 24, 2015

सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना

orchestra
एक पहाडी गाँव के अशिक्षित वृद्ध को पहली बार शहर आने का मौका मिला । उसकी पूरी जिन्दगी दूरदराज के पहाडी गाँव मे बीती । बचपन उसका तकलीफ़ों मे बीता , अपने बच्चॊं को पाल पोस के बडा किया और जब उसके बच्चे शहर मे बस गये तो उनके अनुरोध पर वह पहली बार उनके नये घर को और उनकी रहन सहन को देखने शहर की ओर चल पडा ।
एक दिन उस नये शहर मे घूमते हुये उसने दूर से आती हुई बहुत ही कर्कश आवाज सुनी । उसने ऐसी कर्कश आवाज अपने शांत पहाडी गाँव मे पहले कभी नही सुनी थी । उसका मन   उस आवाज के स्त्रोत को जानने का हुआ । आवाज का पीछा करते-२ वह एक कमरे कॆ पीछे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक बच्चे को वाइलन बजाते देखा । “ हाँ, फ़टी सी यह बेसुरी आवाज इसी यंत्र से आ रही है । ”   उसने सोचा ।
उसके पुत्र ने उसको बताया कि यह यंत्र “ वाइलन “ है तब उस वृद्ध ने यह निर्णय किया कि वह इस भयंकर से यंत्र को कहीं भी सुनना नही चाहेगा ।
अगले ही दिन उसको शहर के दूसरे हिस्से मे जाना पडा । एक बार फ़िर से उसे एक दूर सॆ आती हुई आवाज सुनने को मिली । उसको लगा कि  उसके वृद्ध कानॊ को कोई पुचकार और दुलार रहा है । ऐसी मीठी और सुरीली आवाज उसने अपने पहाडी घाटियों मे भी नही सुनी थी । आवाज के उद्‍गम को जानने के लिये वह एक घर के आगे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक वृद्ध महिला को वही यंत्र वाइलन को बजाते देखा ।
तत्काल ही उस वृद्ध को अपनी गलती का एहसास हो गया । एक दिन पहले जो उसने कर्कश आवाज सुनी थी , उसमे न तो वाइलन और  न ही उस बच्चे  का  दोष था । दोष  सिर्फ़ इतना ही था कि उस बच्चे को अभी वाइलन बजाना सीखना था ।
वह वृद्ध सोच मे पड गया । उसको लगा कि  साधारण से दिखने वाला यही  दोष तो सभी धर्मालम्बियों  के साथ  है । जब कुछ अति धार्मिक उत्साही अपनी –२ आस्था को कलह का कारण बनाते हैं तो क्या धर्म को दोष देना उचित है ? यह सिर्फ़ इतना ही है कि यह नौसीखिये अपने धर्म को ठीक से जान और समझ ही नही  पाये ।  दूसरि तरफ़ जब हम ऐसे संत और महापुरुषों से मिलते हैं जो अपने धर्म के सही जानकार हैं तब भले ही हमारी आस्थायें अलग-२ हों लेकिन उन धर्मॊ की छाप हमारे मन: पटल पर हमेशा बनी रहती है ।
… लेकिन इस  वृद्ध मनुष्य और वाइलन की कहानी का अंत अभी नही हुआ था ।
तीसरे दिन शहर के दूसरे हिस्से मे उस वृद्ध को ऐसी आवाज सुनने को मिली जो अपने मे अनोखी थी , उसकी मिठास वाइलन से भी बढकर थी । क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वझ आवाज किसकी थी ?
इस आवाज की मधुरता  बसंत ऋतु मे पहाडॊ से बहने वाले झरने से भी बढकर थी , उसकी कोमलता का एहसास शरद ऋतु मे जंगलो मे पेडो के माध्यम से बहनॆ वाली हवा से भी अधिक था , पहाडॊ मे भारी बारिश के बाद चिडियों के चहचहाने की आवाज भी उस आवाज के आगे शून्य थी और यहाँ तक सर्द जाडॊं की रातों मे पहाडॊं की नीरवता और शांति भी उस आवाज के आगे कुछ भी नही थी । आखिर वह कौन सी आवाज थी जिसने उस इन्सान के दिल को छू लिया ?
वह एक विशाल आर्केस्ट्रा कॆ सुरों का संगम था जहाँ वाइलन भी था और अलग –२ सुर यंत्र भी । लेकिन अलग –२ सुर यंत्रॊं के होते हुये भी वह एक लय मे थे । उस आर्केस्ट्रा  का हर सदस्य अपने मे निपुण और पारखी था । लेकिन इसके बावजूद उन्होने यह सीखा था कि मिल कर कैसे सुर दे सकते हैं ।
“ क्या सारे धर्मों के मतालम्बी  साथ रहकर यह नही कर सकते ? ” उस वृद्ध ने एक बार सोचा । “ वह अपने –२ धर्मों को सही और परिपूर्ण रुप से जानें और उसके बाद मनन करें कि उनके धर्म का निचोड ‘ मैत्रीभावना और प्यार ’ से बढकर अधिक कुछ भी नही है । एक बार अपने धर्म को समझने के बाद आगे बढे और आर्केस्ट्रा के सदस्यों की तरह अलग-२ धर्मॊ के मतालम्बियों के साथ रहने की कला को सीखें । ”
शायद तभी सार्थक और सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना की जा सकती है ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ The most beautiful sound” का हिन्दी अनुवाद ।

Wednesday, November 5, 2014

निर्णय लेना और आरोप लगाना - “ making decisions & blaming others ”

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किसी भी समस्या के समाधान के लिये निर्णय लेने की दृढ क्षमता होनी चाहिये । लेकिन  हम लोगों मे   बिरले ही होगें जो जीवन मे स्वंय ही निर्णाय़ लेने का साहस कर पाते हैं । अधिकतर परिस्थितयों मे  हम दूसरों पर यह बोझ दे कर स्वंय मुक्त होना चाहते है । शायद इसका एक कारण यह भी है कि अगर कल को कुछ गलत हो जाय तो दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है । मै स्वंय इन परिस्थितयों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ जबकि  मेरे कई मित्र मुझे अपने निर्णयों मे मुझे शामिल करना चाहते हैं ।
अकसर सडक मे  चौराहे पर खडे होकर हमे यह समझ मे नही आता कि हम किस ओर जायें । कभी सोचा है कि  हम क्या करते हैं ? कुछ देर रुकते हैं और इंतजार करते है आने वाली बस का । हर बस के शीर्ष पर गंतव्य स्थान  के बारे मे लिखा रहता है कि वह अमुक जगह जायेगी । अगर यह गंतव्य स्थान हमे रुचिकर लगता है तो हम उस बस का चुनाव करते हैं , और अगर  नही तो अगली बस का इंतजार करते हैं । अकसर यह इतंजार कोई बहुत लंबा नही होता और हमें जल्द ही दूसरी बस के आने की सूचना मिल जाती है ।
जीवन कॆ परिपॆक्ष मे इसकॊ देखे ।  जब हमको कोई निर्णय लेना पडे और उसके समाधान के बारे मे शंकालू हों तो थोडा विराम लें और  प्रतीक्षा करें । अकसर हमारे अनुमान से भी जल्दी समाधान हमारे सामने दिखने लगता है । हर समाधान की एक निश्चित मंजिल होती है । अगर यह मंजिल  हमरे अनुरुप है तो हमे निर्णय लेने मे कोई देरी नही करनी चाहिये और अगर अनुरुप नही है तो दूसरे विकल्प की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
मेरे स्वंय के निर्णय लेने का तरीका यही है । मै किसी भी समाधान के नतीजे लेने के पहले सारी जानकरियों को एकत्रित करता हूँ । धैर्यता के साथ इंतजार करता हूँ और अकसर अच्छे परिणाम मुझे कभी  निराश नही  करते । इन तरीको को अगर आप जीवन मे उतारगे तो मुहे विशवास  है कि आप भी कभी निराश नही होगे ।
मेरा यह तरीका दूसरॊ के लिये भी उदाहरण बन सकता  है लेकिन आप स्वतंत्र है अपने तरीकों का चुनाव करने के लिये । लेकिन अगर आप के तरीके काम न आये तो मुझे दोष न दीजीयेगा ।
मुझे याद है कि एक कालेज की छात्रा एक दिन  हमारे विहार के  एक भिक्खु से मिलने आई थी । उसकी अगले दिन कोई परीक्षा थी और वह चाहती थी कि वह भिक्खु उसके लिये प्रर्थाना और संगायन करे । उस भिक्खु ने  बिना दान लिये  उसको उपकृत किया ताकि शायद इससे उसको कुछ आत्मविशवास मिल सके ।
हममे से किसी ने भी उस छात्रा को फ़िर नही देखा । लेकिन मुझे उसके दूसरे मित्रों से मालुम पडा कि वह उस परीक्षा मे असफ़ल हो गई थी और अकसर अपने साथी मित्रों से  विहार के भिक्खुओं के अनुभवहीन होने की शिकायत भी करती रहती थी ।  उसके मित्रों ने मुझे बताया कि उसको पढने लिखने मे रुचि बिल्कुल भी नही थी और उसको उम्मीद थी कि उसके जीवन का यह कम महत्वपूर्ण काम यह भिक्खु अपनी प्रार्थना से पूरा कर देगें ।
हम अपनी संन्तुष्टि के लिये दूसरॊ पर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन दूसरों पर दोष मढने से किसी भी समस्या का निवारण नही कर सकते । मेरे गुरु अजह्न्ह शाह  कहते थे  कि दूसरों पर दोषारोपण करना वैसा ही है जैसे किसी इन्सान के खुजली कूल्हे मे हो रही हो और वह सर को खुजलाये ।
आज बस इतना ही …
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ making decisions & blaming others ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, September 12, 2014

भविष्यवक्ता - “ Predicting the future ”

All is well
हममे से अधिकतर लोग अपने भविष्य को जानने की उत्सुकता रखते हैं । इसके  लिये हम से कुछ अति शंकालु लोग  भविष्यवक्ताओ और ज्योतिषयों  से समय समय पर मदद लेते रहते हैं । थाइलैंड मे  निवास के दौरान मैने देखा कि भिक्षुओं की भी गिनती भविष्यवक्ताओं के रुप मे भी  होती है । लेकिन व्यवाहारिक रुप से अधिकतर भिक्षु इनसे दूर ही रहना पसंद करते हैं ।
मेरे गुरु अजह्न्ह शाह को कई शक्तियाँ प्राप्त थी । अधिकतर उनकी कही बाते पत्थर में खींची  लकीरो की तरह ही होती । एक दिन अजह्न्ह के एक पुराने शिष्य ने उनसे अपना भविष्य बताने पर जोर दिया । अजह्न्ह ने हमेशा की य्तरह उसको मना किया । लेकिन वह जानेको तैयार नही हुआ । उसने अजहन्ह को याद दिलाया कि उसने कितनी बार उस मठ की मदद की थी और  कितनी बार अपने महत्वपूर्ण कार्यों को छोडकर वह अजन्ह को लेकर जगह –२ घूमा था ।
अजह्न्ह ने जब देखा कि वह टलने वाला नही है तो उन्होने उससे कहा , “ अपना हाथ आगे करो । मै तुम्हारी हाथॊ की लकीरों को देखना चाहता हूँ । “
वह तो बहुत ही हर्ष मे पड गया । लेकिन सबसे मजे की बात यह थी कि अजह्न्ह ने इसके पहले किसी का हाथ कभी भी देखा भी नही था । अजह्न्ह बार अपनी ऊँगलियों को उसकी हथेली पर घुमाते और अपने आप बड्बडाते हुये कहते , “ आशचर्यजनक , अद्‌भुत !! “ बेचारे उनके शिष्य की धड्कने अनुमान लगाने मे लगी रही ।
अजहन्ह ने उसका हाथ देखना समाप्त किया और उससे बोले , “ इस तरह  तुम्हारा भविष्य अब सामने आ गया है और  मैरी भवीष्यवाणी कभी भी गलत नही होती ।  “
“हाँ , हाँ मै भी अपना भविष्य जानना चाहता हूँ कि वह कैसा होगा ?  “ शिष्य ने अधीरता से कहा ।
“ तुम्हारा भविष्य  बहुत ही अनिश्चित है |  “ अजह्न्ह यह कह कर चुप हो गये और उनका प्रिय शिष्य विस्मयपूर्ण नजरों से उनको देखता रह गया  ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this trucload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ Predicting the future ” का हिन्दी अनुवाद ।

Friday, March 9, 2012

समस्याग्रस्त जीवन और चेतना

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एक ज़ेन शिष्य  ने अपने गुरु से  पूछा, "जीवन इतना अधिक समस्याग्रस्त क्यूं दिखाई देता है ?".
ज़ेन गुरु ने कहा   " एक आदमी नाव के होते हुये भी पानी मे बैठता है तो उसको तुम क्या कहोगे ?"
शिष्य ने कहा , “ अगर उसके पास नाव है तो वह पानी में क्यूं बैठेगा ? ”

“ अगर तुम्हारे पास चेतना है तो समस्याग्रस्त जीवन मे क्यूं बैठते हो ” जेन गुरु ने उत्तर दिया ।

John Weeren की कहानी “ Story; a man, a boat ” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, February 26, 2012

सेब का वृक्ष

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मैं लक्ष्य तक पहुँचने में और अधिक किस तरह प्रभावी हो सकता हूँ ?" एक ज़ेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा.
" क्या तुमने  कभी सेब के वृक्ष को सेब के फ़ल के अतिरिक्त किसी और फ़ल का उत्पादन करते हुये देखा है ? ” जेन गुरु ने कहा ।

"नहीं," छात्र ने कहा. "लेकिन इसका मेरे प्रशन के साथ क्या संबध है ? "
” फ़िर तुम किस तरह के वृक्ष हो ? ” जेन गुरु ने एक भेदी मुस्कान के साथ पूछा !!

John Weeren की जेन कहानी “ apple tree ” का हिन्दी मे अनुवाद ।

Wednesday, September 1, 2010

जीवन जीने के लिए कुछ संक्षिप्त नियम

 

इस आपाधापी की जिदंगी मे क्या जिंदगी जीना वाकई मे कष्ट्दायक है … अधिकतर लोगॊं का मानना यही है लेकिन लियो बाबूटा ऐसा नही मानते । जीवन जटिल भी हो सकता है अगर ह्मारी  सोच ऐसी बन चुकी हैं लेकिन Thich Nhat Hanh के शब्दों मे सरल जीवन जीने की कला मात्र  छ्ह शब्दों पर केन्द्रित है , ’ मुस्कराओ , साँस लो और धीरे-२ चलो

अगर जीवन जीने के लिये इन छह शब्दों का पालन करेगें तो जीवन आसान हो सकता है लेकिन इसके अलावा  इस आधुनिक युग मे कुछ और दिशानिर्देशों की आवशयकता है जैसे :

  • कम टी.वी. देखें और अधिक पढें ।
  • कम खरीददारी करे और अधिक बाहर निकले ।
  • कम अव्यवस्था फ़ैलाये और व्यवस्थित जीवन जियें ।
  • कम जल्दवाजी मचायें और काम को आराम से करें ।
  • कम खपत करें और अधिक बनायें ।
  • कम जंक फ़ूड खायें और अधिक असली  खाने पर जायें ।
  • कम बिजी रहे लेकिन प्रभावी रुप से रहें ।
  • कम ड्राइविंग करें लेकिन अधिक टहलें ।
  • कम शोर लेकिन अधिक एकांत ढूँढें।
  • भविष्य पर कम ध्यान दें लेकिन वर्तमान पर अधिक देखें ।
  • कम काम करें और अधिक खेले ।
  • कम चिंता करें और चेहरे पर  अधिक मुस्कान लायें ।

क्यॊ भाई कैसी रही

( लाओ बाबूटा की अनुमति से लेख “ a brief guide to life’ का हिन्दी मे अनुवाद )