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Tuesday, August 27, 2013

ध्यान और हमारा सचेतन मन

ध्यान
जिस प्रकार आप गाड़ी / वाहन / कार चलते समय आगे की खिड़की से सामने और पीछे देखने के लगे हुए शीशे ( रिअर मिरर ) से अपने पीछे और अपने दाए , बाए हमेशा ध्यान बनाये रखते है ठीक उसी प्रकार अपने जीवन में हमेशा सजग बने रहे I पल प्रति पल अपनी समस्या , अपने अगल बगल के लोगो , अपने देश काल , प्रगति के मार्ग और अपने मन में उठाने वाले विचारो के प्रति सजग रहे .. याद रखिये ध्यान साधना के माध्यम से आपका मन जितना शांत होगा यह कार्य उतना ही आसान होगा I
ट्राई साइकल बुद्ध संघ , जापान

लेख और फ़ोटॊ के लिये आभार : सस्नेही मित्र अजय सिंह मौर्या

Friday, June 21, 2013

Meditation reduces the risk of DEPRESSION in schoolchildren

  • Children taught 'mindfulness' have lower stress levels
  • Mindfulness is a meditative technique used to focus awareness on a particular thought or object
  • The practice was also shown to improve pupils'  school results

Children who are taught meditation are less likely to develop depression, a new study has revealed.

Teaching children a form of meditation called ‘mindfulness’ – a psychological technique which focuses awareness and attention – can reduce a pupil's stress levels meaning their mental health improves.

The technique can also improve their academic performance, the researchers found.

Teaching children 'mindfulness' - a technique which focuses the attention - can reduce their stress levels meaning their mental wellbeing improves

Teaching children 'mindfulness' - a technique which focuses the mind - can reduce their stress levels which in turn improves their mental health

Scientists at the University of Exeter, the University of Oxford, the University of Cambridge and the Mindfulness in Schools Project (MiSP), taught 256 pupils aged between 12 and 16 the MiSP curriculum.

The curriculum involved teaching the children nine lessons in how to better control their stress levels by directing what they focused their attention on.

This involved them recognising what it was that caused them to become stressed, and challenging their difficult emotions.

Professor Willem Kuyken of the University of Exeter, who led the study, claims that intervening to reduce stress levels in pupils by using techniques usually given to adults improves their mental health and academic performance.

He said: ‘We found that those young people who took part in the programme had fewer low-grade depressive symptoms, both immediately after completing the programme and at three-month follow-up.

‘This is potentially a very important finding, given that low-grade depressive symptoms can impair a child's performance at school, and are also a risk factor for developing adolescent and adult depression.’

It is important to find novel ways of boosting performance in schools at a time of budget cuts and other pressures explained Professor Katherine Weare, who was involved in implementing the lessons.

The technique can also improve their academic performance because they are more likely to do well academically if they are not depressed

The technique can also improve their academic performance because they are more likely to do well academically if they are not depressed

She said: ‘These findings are likely to be of great interest to our overstretched schools which are trying to find simple, cost effective, and engaging ways to promote the resilience of their students - and of their staff too - at times when adolescence is becoming increasingly challenging, staff are under considerable stress, and schools under a good deal of pressure to deliver on all fronts.

‘This study demonstrates that mindfulness shows great promise in promoting wellbeing and reducing problems - which is in line with our knowledge of how helpful well designed and implemented social and emotional learning can be.

‘The next step is to carry out a randomised controlled trial into the MiSP curriculum, involving more schools, pupils and longer follow-ups.’

However, teaching children to focus on their emotions is tough, according to the curriculum's co-creator, Richard Burnett.

He said: ‘Our mindfulness curriculum aims to engage even the most cynical of adolescent audiences with the basics of mindfulness.

‘We use striking visuals, film clips and activities to bring it to life without losing the expertise and integrity of classic mindfulness teaching.’
Around 80 per cent of the pupils said that they carried on using the techniques after the curriculum finished.'

Source : Daily Mail

Wednesday, January 30, 2013

ध्यान क्या है?--ओशो एस धम्मो सनंतनो, भाग-9

 

 

 

 

 

 

 

प्रश्न: ध्यान क्या है?
इस छोटी सी घटना को समझें। चांग चिंग के संबंध में कहा जाता है, वह बड़ा कवि था, बड़ा सौंदर्य-पारखी था। कहते हैं, चीन में उस जैसा सौंदर्य का दार्शनिक नहीं हुआ। उसने जैसे सौंदर्य-शास्त्र पर, एस्थेटिक्स पर बहुमूल्य ग्रंथ लिखे हैं, किसी और ने नहीं लिखे। वह जैसे उन पुराने दिनों का क्रोशे था। बीस साल तक वह ग्रंथों में डूबा रहा। सौंदर्य क्या है, इसकी तलाश करता रहा।
एक रात, आधी रात, किताबों में डूबा-डूबा उठा, पर्दा सरकाया, द्वार के बाहर झाँका-पूरा चांद आकाश में था। चिनार के ऊंचे दरख्त जैसे ध्यानस्थ खड़े थे। मंद समीर बहती थी। और समीर पर चढ़कर फूलों की गंध उसके नासापुटों तक आयी। कोई एक पक्षी, जलपक्षी जोर से चीखा, और उस जलपक्षी की चीख में कुछ घटित हुआ-कुछ घट गया। चांग चिंग अपने आपसे ही जैसे बोला-हाउ मिस्टेकन आइ वाज! हाउ मिस्टेकन आइ वाज! रेज द स्क्रीन एंड सी द वल्र्ड। कैसी मैं भूल में भरा था! कितनी भूल में था मैं! पर्दा उठाओ और जगत को देखो! बीस साल किताबों में से उसे सौंदर्य का पता न चला। पर्दा हटाया और सौंदर्य सामने खड़ा था, साक्षात।
तुम पूछते हो, ‘ध्यान क्या है?’
ध्यान है पर्दा हटाने की कला। और यह पर्दा बाहर नहीं है, यह पर्दा तुम्हारे भीतर पड़ा है, तुम्हारे अंतस्तल पर पड़ा है। ध्यान है पर्दा हटाना। पर्दा बुना है विचारों से। विचार के ताने-बानों से पर्दा बुना है। अच्छे विचार, बुरे विचार, इनके ताने-बाने से पर्दा बुना है। जैसे तुम विचारों के पार झांकने लगो, या विचारों को ठहराने में सफल हो जाओ, या विचारों को हटाने में सफल हो जाओ, वैसे ही ध्यान घट जाएगा। निर्विचार दशा का नाम ध्यान है।
ध्यान का अर्थ है, ऐसी कोई संधि भीतर जब तुम तो हो, जगत तो है और दोनों के बीच में विचार का पर्दा नहीं है। कभी सूरज को ऊगते देखकर, कभी पूरे चांद को देखकर, कभी इन शांत वृक्षों को देखकर, कभी गुलमोहर के फूलों पर ध्यान करते हुए-तुम हो, गुलमोहर है, सजा दुल्हन ही तरह, और बीच में कोई विचार नहीं है। इतना भी विचार नहीं कि यह गुलमोहर का वृक्ष है, इतना भी विचार नहीं; कि फूल सुंदर हैं, इतना भी विचार नहीं-शब्द उठ ही नहीं रहे हैं-अवाक, मौन, स्तब्ध तुम रह गए हो, उस घड़ी का नाम ध्यान है।
पहले तो क्षण-क्षण को होगा, कभी-कभी होगा, और जब तुम चाहोगे तब न होगा, जब होगा तब होगा। क्योंकि यह चाह की बात नहीं, चाह में तो विचार आ गया। यह तो कभी-कभी होगा।
इसलिए ध्यान के संबंध में एक बात खयाल से पकड़ लेना, खूब गहरे पकड़ लेना-यह तुम्हारी चाहत से नहीं होता है। यह इतनी बड़ी बात है कि तुम्हारी चाहने से नहीं होती है। यह तो कभी-कभी, अनायास, किसी शांत क्षण में हो जाती है।
तो हम करें क्या? ध्यान के लिए हम करें क्या? यही शायद तुमने पूछना चाहा है कि ध्यान क्या है? कैसे करें?
ध्यान के लिए हम इतना ही कर सकते हैं कि अपने को शिथिल करें, दौड़धाप से थोड़ी देर के लिए रुक जाएं, घड़ी भर को चौबीस घंटे में सब आपाधापी छोड़ दें। लेकर तकिया निकल गए, लेट गए लान पर, टिक गए वृक्ष के साथ, आंखें बंद कर लीं; पहुंच गए नदी तट पर, लेट गए रेत में, सुनने लगे नदी की कलकल। मंदिर-मस्जिद जाने को मैं कह ही नहीं रहा हूं, क्योंकि पत्थरों में कहां ध्यान! तुम जीवंत प्रकृति को खोजो। इसलिए बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा, जंगल चले जाओ। वहां प्रकृति नाचती चारों तरफ। चौबीस घंटे वहां रहोगे, कितनी देर तक बचोगे, कभी न कभी-तुम्हारे बावजूद-किसी क्षण में अनायास प्रकृति तुम्हें पकड़ लेगी। एक क्षण को संस्पर्श हो जाएं, एक क्षण को द्वार खुल जाएं, एक क्षण को पर्दा हट जाए, तो ध्यान का पहला अनुभव हुआ।
मेरी बात को खयाल में ले लेना। ध्यान को सीधा-सीधा नहीं किया जाता, बाधा न दो। इसीलिए तो मैं कहता हूं, नाचो, गाओ। नाचने और गाने में तुम लीन हो जाओ, अचानक तुम पाओगे, हवा के झोंके की तरह ध्यान आया, तुम्हें नहला गया, तुम्हारा रोआं-रोआं पुलकित कर गया, ताजा कर गया। धीरे-धीरे तुम समझने लगोगे इस कला को-ध्यान का कोई विज्ञान नहीं है, कला है। धीरे-धीरे तुम समझने लगोगे कि किन घड़ियों में ध्यान घटता है, उन घड़ियों में मैं कैसे अपने को खुला छोड़ दूं। जैसे ही तुम इतनी सी बात सीख गए, तुम्हारे हाथ में कुंजी आ गयी।
इसलिए मेरे सूत्र अनूठे हैं। मैं तुमसे कहता हूं, जब तुम्हारा मन बहुत सुखी मालूम पड़े। कोई मित्र आया है, बहुत दिनों बाद मिले हैं, गले लगे हैं, गपशप हुई है, मन ताजा है, हलका है, खूब प्रसन्न हो तुम, इस मौके को छोड़ना मत। बैठ जाना एकांत में। इस घड़ी में सुख का सुर बज रहा है, परमात्मा बहुत करीब है।
सुख का अर्थ ही होता है, जब तुम्हारे जाने-अनजाने परमात्मा करीब होता है; चाहे जानो, चाहे न जानो! सुख जब तुम्हारे भीतर बजता है, तो उसका अर्थ हुआ कि परमात्मा तुमसे बहुत करीब आ गया। तुम किसी अनजाने मार्ग से घूमते-घूमते परमात्मा के पास पहुंच गए हो, मंदिर करीब है, इसीलिए सुख बज रहा है। इस घड़ी को चूकना मत। इसी घड़ी में तो जल्दी से खोजना, कहीं किनारे पर ही, हाथ के बढ़ाने से ही मंदिर का द्वार मिल जाएगा।
लेकिन जीवनभर याद करते हैं कि बचपन में बड़ा सुख था। किस सुख की याद है यह? क्या तुम सोचते हो बचपन में तुम्हारे पास बहुत धन था? नहीं था, जरा भी नहीं था, दो-दो पैसे के लिए रोना पड़ता था! एक-एक पैसे के लिए बाप और मां के मोहताज होना पड़ता था! धन तो नहीं था। कोई बड़ा पद था? कहां से होता पद! सब तरह की झंझटें थीं, स्कूल कारागृह था, जहां रोज-रोज बांधकर भेज दिए जाते थे; जहां बैठे-बैठे परेशान होते थे और कुछ समझ में न पड़ता था। और हर कोई दबा देता था, बल भी नहीं था। हर एक छाती पर सवार था।
तो बचपन में सुख कैसा था? न धन था, न पद था, न प्रतिष्ठा थी; न कोई सम्मान देता था, सुख हो कैसे सकता था? सुख कुछ और था। तितलियों के पीछे भागने में ध्यान की किरण उतर आयी थी। सागर के किनारे शंख-सीप बीनने में परम आनंद का क्षण उतरा था। कंकड़-पत्थर बीन लाए थे और समझे थे कि हीरे ले आए, और किस चाल से मस्त होकर आए थे! कुछ भी न था हाथ में, लेकिन कुछ ध्यान की सुविधा थी।
यहूदियों में एक कथा है कि जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो देवता आते हैं और उस बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हैं; ताकि वह भूल जाए उस सुख को जो सुख परमात्मा के घर उसने जाना था, नहीं तो जिंदगी बड़ी कठिन हो जाएगी-दयावश ऐसा करते हैं वे, नहीं तो जिंदगी बड़ी कठिन हो जाएगी। अगर वह सुख याद रहे, तो बड़ी कठिन हो जाएगी, तुलना में। तुम फिर कुछ भी करो, व्यर्थ मालूम पड़ेगा। धन कमाओ, पद कमाओ, सुंदर से सुंदर पत्नी और पति ले आओ, अच्छे से अच्छे बच्चे हों, बड़ा मकान हो, कार हो, कुछ भी सार न मालूम पड़ेगा, अगर वह सुख याद रहे। तो यहूदी कथा कहती है कि एक देवता उतरता है करुणावश और हर बच्चे के माथे पर सिर्फ हाथ फेर देता है। उस हाथ के फेरते ही पर्दा बंद हो जाता है, उसे भूल जाता है परमात्मा। सुख भूल गया, फिर यह जीवन के दुखों में ही सोचने लगता है, सुख होगा।
उस पर्दे को फिर से खोलना है, जो देवताओं ने बंद कर दिया है। मुझे तो नहीं लगता कि कोई देवता बंद करते हैं। देवता ऐसी मूढ़ता नहीं कर सकते। लेकिन समाज बंद कर देता है। शायद कहानी उसी की सूचना दे रही है। मां-बाप, परिवार, समाज, स्कूल बंद कर देते हैं, पर्दे को डाल देते हैं। ऐसा डाल देते हैं कि तुम भूल ही जाते हो कि यहां द्वार है, तुम समझने लगते हो दीवार है। ध्यान का अर्थ है, इस पर्दे को हटाना।
और इसे अनायास होने दो, इसे कभी-कभी तुम्हें पकड़ लेने दो-और जब तुम्हें यह तरंग पकड़े तो लाख काम छोड़कर बैठ जाना। क्योंकि इससे बहुमूल्य कोई और काम ही नहीं है। रात हो कि दिन, सुबह हो कि सांझ, फिर मत देखना। कुछ चूकोगे नहीं तुम, कुछ खोएगा नहीं। और अपूर्व होगी तुम्हारी संपदा फिर। और यह संपदा तुम्हारे भीतर पड़ी है, बस पर्दा हटाने की बात है।
‘ध्यान क्या है?’
ध्यान भीतर पड़े पर्दे को हटाना है।

-ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग-9

Saturday, January 5, 2013

ध्यान , मन और पानी की लहरें

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इन्सान का मन तालाब के जल की तरह है । इसमें उत्पन्न हो रहे बैचेन विचार पानी में फ़ेंके गये कंकड की तरह हैं । यह विचार मन की शांत सतह पर लहर के रुप मे आ कर उद्देलित  कर जाते हैं । जब पानी इन बैचेन विचारों से उद्देलित रहता है तब हम स्पष्ट रुप से पानी की तलहटी को नही देख पाते । यह पानी की तलहटी हमारे भीतर के ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है ।  लेकिन अगर हम इन बैचेन विचारों पर अंकुश लगाते हैं तब हम स्पष्ट रुप से शांत पानी को नीचे तक देख सकते हैं , वह जगह जहाँ हमारा प्रबुद्ध स्व रहता है ।

                                                              -  डा. नील नीमार्क

The mind is likened to a pond of water. Restless thoughts are like pebbles thrown into the water. They send out a ripple of activity, disturbing the tranquil surface. When the water is constantly agitated with restless thoughts, we cannot see clearly to the bottom of the pond, which represents our inner wisdom. When we stop the restless thoughts, we calm the waters, enabling us to see clearly to the bottom—where our wisest, most enlightened self resides. -Dr. Neal F. Neimark, M.D.

courtesy : Meditation, Medication and Psychological Disorders.

Thursday, September 20, 2012

संतुलन ध्यान

ध्यान

लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक सूत्र है लाओत्से की ध्यान की पद्धति का। वह सूत्र यह है।
लाओत्से कहता है कि पालथी मार कर बैठ जाएं और भीतर ऐसा अनुभव करें कि एक तराजू है, बैलेंस, एक तराजू। उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच, तीसरी आंख जहां समझी जाती है, वहां उसका कांटा है। तराजू की डंडी आपके मस्तिष्क में है। दोनों उसके पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं। और लाओत्से कहता है, चौबीस घंटे ध्यान रखें कि वे दोनों पलड़े बराबर रहें और कांटा सीधा रहे।

लाओत्से कहता है कि अगर भीतर उस तराजू को साध लिया, तो सब सध जाएगा। लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे! जरा इसका प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा। जरा सी श्वास भी ली नहीं कि एक पलड़ा नीचा हो जाएगा, एक पलड़ा ऊपर हो जाएगा। अकेले बैठे हैं, और एक आदमी बाहर से निकल गया दरवाजे से। उसको देख कर ही, अभी उसने कुछ किया भी नहीं, एक पलड़ा नीचा, एक ऊपर हो जाएगा।
लाओत्से ने कहा है कि भीतर चेतना को एक संतुलन! दोनों विपरीत द्वंद्व एक से हो जाएं और कांटा बीच में बना रहे।
जीवन में सुख हो या दुख, सम्मान या अपमान, अंधेरा या उजाला, भीतर के तराजू को साधते चला जाए कोई, तो एक दिन उस परम संतुलन पर आ जाता है, जहां जीवन तो नहीं होता, अस्तित्व होता है; जहां लहर नहीं होती, सागर होता है; जहां मैं नहीं होता, सब होता है।

साभार : ओशो हिंदी

Saturday, September 8, 2012

जीवन जीने की कला – विपश्यना साधना

ध्यान प्रक्रियायों मे विपशयना ध्यान पद्द्ति भगवान बुद्ध द्वारा अन्वेषित प्रक्रिया सबसे अलग और तर्क और वैज्ञानिक सम्पत है । 

बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । विपशयना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बदले बिना ..शवास के प्रति साक्षीभाव । जहाँ प्राणायाम मे शवास को बदलने की चेष्टा की जाती है वही विपशयना मे शवास जैसी है वैसे ही देखने की आंकाक्षा है ।

बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो  भी  देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।

हिन्दी मे ध्यान पर बहुत ही कम वीडियो उपलब्ध हैं । Meditation Techniques in Hindi  यू ट्यूब पर उपलब्ध है , मूलत:Spiritual Reality –journey withinका हिन्दी अनुवाद है । न सिर्फ़ यह विपशयना के बारे मे आपको बतायेगा बल्कि और भी ध्यान पद्द्तियों से भी रुबरु करायेगा । य टूयूब पर सीधे देखने के लिये http://youtu.be/L4thsq2m0ic पर क्लिक करें ।

Friday, July 13, 2012

ध्यानपूर्ण मन….

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ध्यानपूर्ण मन शांत होता है। यह मौन विचार की कल्पना और समझ से परे है। यह मौन किसी निस्तब्ध संध्या की नीरवता भी नहीं है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिमाओं सहित पूर्णत: विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है। यह ध्यानपूर्ण मन ही धार्मिक मन है-धर्म, जिसे कोई मंदिर, गिरजाघर या भजन-कीर्तन छू भी नहीं पाता।
धार्मिक मन प्रेम का विस्फोटक है। यह प्रेम किसी भी अलगाव को नहीं जानता। इसके लिए दूर निकट है। यह न एक है न अनेक, अपितु यह प्रेम की अवस्था है जिसमें सारा विभाजन समाप्त हो चुका होता है। सौंदर्य की तरह उसे भी शब्दों के द्वारा नहीं मापा जा सकता। इस मौन से ही एक ध्यानपूर्ण मन का सारा क्रियाकलाप जन्म लेता है।
ध्यान जीवन की महानतम कलाओं में से एक है- बल्कि शायद यही महानतम् कला है। यह कला संभवत: दूसरे से नहीं सीखी जा सकती-और यही इसका सौन्दर्य है। ध्यान की कोई तकनीक और तरकीब नहीं होती, इसलिए इसका कोई अधिकारी और दावेदार भी नहीं होता। जब आप स्वयं का निरीक्षण करते हुए अपने बारे में सीखते हैं, अर्थात् किस तरह आप खाते-पीते हैं, किस ढंग से आप चलते-फिरते हैं, क्या बातचीत और गपशप करते हैं, आपका ईर्ष्या करना, नफरत करना-जब आप अपने भीतर और बाहर इन सारी चीज़ों के प्रति सचेत होते हैं, बिना किसी कांट-छांट के, तो यह ध्यान का ही अंग है।
और यह ध्यान हर जगह हर समय हो सकता है: जब आप किसी बस में बैठे हों या जब आप धूप और छाया से परिपूर्ण किसी वनस्थली में टहल रहे हों या जब आप पक्षियों के कलरव-गान को सुन रहे हों या जब आप अपनी पत्नी या अपने बच्चे के चेहरे को देख रहे हों।
ध्यान का सहसा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हो जाना कितना अद्भुत और विचित्र है ! ध्यान-जिसका न आदि है न अन्त। यह वर्षा की एक बूँद के समान है। इसी बूंद में छिपी हैं सारी की सारी नदियां और जलधाराएं, इसी में समाये हैं बड़े से बड़े समुद्र और जल-प्रपात। जल की यह बूँद पृथ्वी को भी पोषण देती है और मानव को भी। इसके बिना तो यह धरती रेगिस्तान बन जाती ! ध्यान के बिना हमारा हृदय भी ऊसर-बंजर मरुस्थल हो जाता है।
ध्यान का अर्थ यह पता लगाना है कि अपनी सारी गतिविधियों और अपने सारे अनुभवों समेत मस्तिष्क क्या पूर्णत: शान्त हो सकता है। बाध्य होकर नहीं, क्योंकि जिस क्षण आप इसे बाध्य करते हैं, फिर से द्वैत आ खड़ा होता है, और वह सत्ता भी, जो कहती है, ‘‘अद्भुत अनुभूतियों के जगत में प्रवेश के लिए मुझे अपने मस्तिष्क को नियंत्रित कर शान्त कर लेना चाहिए’’-ऐसा कभी संभव नहीं होगा।
लेकिन अगर आप विचार की सारी खोजों और गतिविधियों को, इसके भय, सुखों और संस्कारों को देखने, सुनने और समझने लग जायें, अगर आप अपने मस्तिष्क का निरीक्षण करने लग जायें कि यह किस तरह कार्य करता है, तो आप देखेंगे कि मस्तिष्क असाधारण रूप से शान्त, मौन हो जाता है। यह शांति निद्रा नहीं है बल्कि यह प्रचंड रूप से सक्रिय है और इसलिए शांत है। विद्युत उत्पन्न करने वाला एक बड़ा यंत्र जब अच्छी तरह कार्य करता है तो इससे शायद ही कोई ध्वनि निकलती हो। ध्वनि और शोर-गुल तभी पैदा होता है जब कहीं घर्षण होता है।
मौन और विस्तार का आपसी मेल है। मौन की अनंतता वह अनंतता है जिसके भीतर का केन्द्र मिट चुका है।
जे. कृष्णमूर्ति

ध्यान

mediatation

ध्यान, निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर इस तरह उतरता है जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा। यह इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है जैसे रात। वहां किसी तरह का प्रयास या केन्द्रीकरण या विक्षेप विकर्षण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता। वहां पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती। ना किसी तरह का नकार होता है ना स्वीकार। ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है। मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है पर बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत रहता है, बिना किसी दखलंदाजी के, वह जागता तो है पर प्रतिक्रियाहीन होता है।
वहां नितांत शांति स्तब्धता होती है पर शब्द विचारों के साथ धंुधले पड़ जाते हैं। वहां अनूठी और निराली ऊर्जा होती है, उसे कोई भी नाम दें, वह जो भी हो उसका महत्व नहीं है, वह गहनतापूर्वक सक्रिय होती है बिना किसी लक्ष्य और उद्देश्य के। वह सृजित होता है बिना कैनवास और संगमरमर के... बिना कुछ तराशे या तोड़े। वह मानव मस्तिष्क की चीज नहीं होती, ना अभिव्यक्ति की.. कि अभिव्यक्त हो और उसका क्षरण हो जाये। उस तक नहीं पहुंचा जा सकता, उसका वर्गीकरण या विश्लेषण नहीं किया जा सकता। विचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नहीं हो सकते। वह किसी भी चीज से पूर्णतया असम्बद्ध है और अपने ही असीम विस्तार और अनन्तता में अकेली ही रहती है। उस अंधेरे मार्ग पर चलना, वहां पर असंभवता का आनंद होता है ना कि उपलब्धि का। वहां पहुंच, सफलता और ऐसी ही अन्यान्य बचकानी मांगों और प्रतिक्रियाओं का अभाव होता है। होता है तो बस असंभव असंभवता असंभाव्य का अकेलापन। जो भी संभव है वह यांत्रिक है और असंभव की परिकल्पना की जा सके तो कोशिश करने पर उसे उपलब्ध किये जा सकने के कारण वह भी यांत्रिक हो जायेगा। उस आनन्द का कोई कारण या कारक नहीं होता। वह बस सहजतः होती है, किसी अनुभव की तरह नहीं बस अपितु किसी तथ्य की तरह। किसी के स्वीकारने या नकारने के लिए नहीं, उस पर वार्तालाप या वादविवाद या चीरफाड़-विश्लेषण किये जायें इसके लिए भी नहीं। वह कोई चीज नहीं कि उसे खोजा जाये, उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं। सब कुछ उस एक के लिए मरता है; वहां मृत्यु और संहार प्रेम है। क्या आपने भी कभी देखा है - कहीं बाहर, गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदूर किसान को जो सांझ ढले... अपनी मरियल हड्डियों का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है।
जे कृष्णमूर्ति

Wednesday, April 25, 2012

धम्मं शरणं गच्छामि

थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के मंदिर मे देखा जा सकता है

थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के बौद्ध मंदिर मे देखा जा सकता है ।

साभार : दुनिया का एकमात्र टेंपल जहां बाघ और इंसान रहते हैं साथ-साथ

Sunday, July 18, 2010

विपश्यना साधना – पहला दिन ( Vipassana meditation Discourse No. 1 )

आचार्य श्री सत्य नारायण गोयन्काजी के इन अमूल्य वचनों की तलाश मुझे कई दिनों से थी । दस दिनों तक चलने वाले शिविरों  मे अपना समय निकालना एक समस्या लगती है । कल जब इन वीडियो को मेगाअपलोड पर देखा तो इनको सब के  साथ बाँट देने का लोभ छॊड न पाया ।

 

Discourse No 1 : http://www.megaupload.com/pt/?d=MO6WJEP8

Monday, June 1, 2009

The Five Hindrances

Moments of Awakening “  is a page created  by Allan O'Marra ; It’s a series of paintings that metaphorically illustrate moments of transcendence on the path to the realization of enlightenment.
The Buddha likened the 5 hindrances to 5 kinds of impurities affecting a bowl of water, preventing one from seeing one's own reflection as it really is & they are :

  • Sensual Desire or Greed
  • Aversion or Ill-will
  • Sloth and Torpor
  • Restlessness and Anxiety
  • Doubt

sensualDesires8

Sensual Desire or Greed : is like a colorful water surface colored by paint, that interferes with our ability to see clearly.

illWilFinal8

Aversion or Ill-will  : is like a bubbling, boiling water surface that obscures our ability to see clearly. 

drowsy8


Sloth and Torpor : is like a stagnant water surface that obscures our ability to see clearly.  

restlessness8

Restlessness and Anxiety  : is like a churned up water surface with waves that interferes with our ability to see clearly.

doubt8

Doubt : is like a muddy water surface that clouds our ability to see clearly.

Source : www. audiodharmacourse.org

Thursday, February 5, 2009

Open Space

मुक्त आकाश की परिकल्पना क्या हम अपने साथ नही कर सकते ? क्यूं हम इतनी अधिक पीडओं से गुजरते हैं , उनको अपनी जिंदगी का अह्म हिस्सा बना लेते हैं और फ़िर उनको छोडना हमारे लिये नामुनिकन सा हो जाता है । मन जिस को एक तरफ़ अस्वीकृत करता है उसकी न सुनते हुये हम उन कडवाहटॊ को न सिर्फ़ अपनाते हैं बल्कि अपने को हानि भी पहुँचाते रहते हैं ।

लेकिन इस चाल को नम्रता और अभ्यास से मुक्त भी कर सकते हैं । बजाय इसके कि इन कड्वाहटॊं  के  विरुद्ध संधर्ष करें हम जागृत होकर इन परिस्थितियों से बखूबी निजात पा सकते हैं क्योंकि हर इन्सान मे मुक्त आकाश की जगह अवशय है , बस देर है  जागृत होकर  उसको    तलाशने   की ।

It is never too late for any of us to look at our minds. We can always sit down and allow the space for anything to arise. Sometimes we have a shocking experience of ourselves. Sometimes we try to hide. Sometimes we have a surprising experience of ourselves. Often we get carried away. Without judging, without buying into likes and dislikes, we can always encourage ourselves to just be here again and again and again.

The painful thing is that when we buy into disapproval, we are practicing disapproval. When we buy into harshness, we are practicing harshness. The more we do it, the stronger these qualities become. How sad it is that we become so expert at causing harm to ourselves and others.

The trick then is to practice gentleness and letting go. We can learn to meet whatever arises with curiosity and not make it such a big deal. Instead of struggling against the force of confusion, we could meet it and relax. When we do that, we gradually discover that clarity is always there. In the middle of the worst scenario of the worst person in the world, in the midst of heavy dialogue with ourselves, open space is always there.

Pema Chodron, from "When Things Fall Apart"

Source: Mindfulness Meditation Course 

Thursday, January 22, 2009

वर्षा का फ़ार्मूला (The RAIN Formula )

 

audiodharmacourse द्वारा संचालित mindfullness meditation course का यह तीसरा सप्ताह है । आरम्भ मे तो मैने इसको गम्भीरता से  नही लिया लेकिन नोना ओलीवा  द्वारा भेजे कई ई मेल से इसकी गम्भीरता को समझना ही पडा । आज के सुविचार हैं : वर्षा का फ़ार्मूला यानि Rain Formulae

कभी-२ उद्देलित करती हुई परिस्थितयाँ और भावनायें हम पर भारी पड जाती हैं । इन परिस्थितयाँ मे वर्षा का फ़ार्मूला बहुत ही सहायक हो सकता है । अधिकतर परिस्थितयों मे तो पहला कदम ही मददगार साबित होता है । वह कैसे , इसको समझें :

R:  Recognize it. Name it.

       पहचानो और इसे एक नाम दो ।

A:  Accept it.

       इसे स्वीकार करो ।

I:   Investigate it, be curious.  What is it like, right now, this moment, in the body, heart and mind?

      इसे उत्सुकता से तफ़्तीश करो कि यह कैसा है, क्या है जो  हर      पल मन और शरीर को प्रभावित करता रहता है ।

N: Non-identification (Not-me).  This feeling is just a passing process that comes and goes, it’s not who I am.

     और सबसे आवशयक , मै नही का बोध रखो । यह परिस्थितयाँ आती और जाती रहेगी ; यह एक गुजरती हुई प्रक्रिया है और इसमे मेरा अस्तित्व और रोल नगण्य है ।