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Thursday, March 14, 2013

मिन्ड्रोलिंग स्तूप, देहरादून- संस्मरण

 
 
 
 
 
 
 
मिन्डोलिग स्तूप , देहरादून जाने का मौका मुझे दो बार मिला । सन्‌ २००८ में सपरिवार और उसके उपरांत २०१० मे अकेले ही अपने पुत्र आयुष के साथ । स्तूप या चैत्य मुझे सम्मोहित करते रहते हैं । इसका शायद एक कारण इन स्तूपों से मिलने वाली सकरात्मक उर्जा है । कहते हैं कि इन स्तूपों का  प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कभी यह बौद्ध प्रार्थना स्थल होते थे। महापरिनर्वाण सूत्र में भगवान्‌ बुद्ध अपने शिष्य आनन्द से कहते हैं- "मेरी मृत्यु के उपारांत  मेरे अवशेषों पर उसी प्रकार का स्तूप बनाया जाये जिस प्रकार चक्रवर्ती राजाओं के अवशेषों पर बनते हैं- (दीघनिकाय- १४/५/११)। ” स्तूप समाधि, अवशेषों अथवा चिता पर स्मृति स्वरूप निर्मित किया गया अर्द्धाकार टीला होता है जिसे चैत्य भी कहा जाता है ।
अगर आप देहरादून जा रहे हों तो क्लेमेंट टाउन जाना न भूलें । प्राकृतिक परिवेश के मध्य स्थित देहरादून पर्यटकों  को कई तरह से आकर्षित करता है । अन्य कई आकर्षणॊं   के अलावा देहरादून के तिब्बती समुदाय ने सन्‌ १९६५ मे एक तिब्बती मठ की प्रतिकृति के रूप में बुद्ध मंदिर का निर्माण किया था । कहते हैं कि यह स्तूप एशिया का सबसे बडा स्तूप है । इसकी ऊँचाई १८५ फ़ुट और चौडाई १०० वर्ग फ़ुट है । यह स्तूप बौद्ध कला और स्थापत्य कला का एक शानदार उदाहरण है.
स्तूप के मुख पर मैत्र बुद्ध या शक्यमुनि भगवान बुद्ध को खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है । देखें नीचे  चित्र में
लगभग २ एकड वर्ग मे फ़ैले परिसर में प्रवेश करने पर हमें वीणा धारण किये हुये एक  मूर्ति का दर्शन होता है । एक बार तो हिंदू धर्म में आराध्य  माँ सरस्वती को देखकर विस्मय मे पड जाता हूँ लेकिन स्थानीय लामा  से मालूम पडता है कि यह तिब्बती कल्चर मे पूज्य माँ मञ्जुश्री का रुप है जो माँ सरस्वती के अनुरुप ज्ञान और सहचरी की देवी मानी जाती हैं । कहते हैं कि त्रिपिटक को कंठस्थ कराने के लिये भिक्खू जन अपने सह भिक्खूओं को माँ मञ्जुश्री के माध्यम का प्रयोग करते थे ।
अब हम स्तूप के अन्दर प्रवेश कर रहे हैं । इस इमारत में कुल पांच मंजिलें है ; स्तूप का  भूतल तिब्बती गुरु पद्मसंभव को समर्पित है , भूतल की दीवारॊ पर अति सुन्दर भित्तीय चित्र निर्मित हैं जो  गुरु पद्मसंभव की जीवन कहानी को दर्शाती है.
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इस इमारत का प्रथम तल शाक्यमुनि भगवान्‌ बुद्ध को समर्पित है , यहाँ भी दीवारों पर सुन्दर भित्तीय चित्रों और जातक कथाओं के माध्यम से बुद्ध की जीवनी को चित्रित किया गया
है ।
 
 
मंजिल का दूसरा तल शाइन कक्ष के रुप मे जाना जाता है । यह तल मिन्ड्रोलिंग मे महान शासकों को समर्पित है ।
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मिन्डोंलिग मन्दिर  के परिसर का   आकर्षण बुद्ध की विशाल  मूर्ति है ।यह मूर्ति लगभग 103 फुट ऊची है और लगभग   10 साल पहले इसका निर्माण किया गया था ।यह तिब्बती समुदाय  के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को  समर्पित है । यहाँ कई मोनेस्ट्री भी हैं जहाँ लगभग  पाँच सौ लामा अध्ययन करते हैं ।
 
मन्दिर परिसर का एक और आकर्षण प्रार्थना चक्र या prayer wheel है । इसका निर्माण स्तूप के निकट किया गया है । कहते हैं कि यह प्रार्थना का पहिया सभी प्राणियों , भिक्खूओं और धर्मालंबियों के लिये सकरात्मक उर्जा का संचय करता है ।
 
 
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तिब्बती समुदाय के लिये स्वतंत्र तिब्बत एक स्वप्न की तरह ही है । देहारदून के इस मिन्डोलिग स्तूप  परिसर में यह पीडा दीवारों पर अंकित देखी जा सकती है , देखें ऊपर चित्र में ।
उपर की दो मंजिले को देख न पाने का खेद मुझे दोनों बार रहा , शायद दोनों बार वह अवकाश का दिन था , संभव है  मौका फ़िर कभी लगे  :)

Tuesday, February 3, 2009

धम्मपद- यमकवग्गो ( The Dhammapada -Chapter One -- The Pairs-verses 9-10)

Chapter One -- The Pairs-verses 9-10

                             १. यमकवग्गो- छंद ९-१०

Courtesy : for images -Illustrated Dhammapda

                     for Hindi & Devnagiri scripts-Tipitika.org &  VRI

                    for English text-Lankalibrary.com

९.

अनिक्‍कसावो कासावं, यो वत्थं परिदहिस्सति।

अपेतो दमसच्‍चेन, न सो कासावमरहति॥

जिसने कषायों ( चित्तमलों ) का परित्याग नहीं किया है पर कषाय वस्त्र धारण किये है वह संयम और सत्य से परे है । वह कषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी नही है ।

Whoever being depraved, devoid of self-control
and truthfulness, should don the monk's yellow
robe, that person surely is not worthy of the robe


१०.

यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो।

उपेतो दमसच्‍चेन, स वे कासावमरहति॥

जिसने कषायों को निकाल बाहर किया है , शीलों मे प्रतिष्ठित है, संयम और सत्य से युक्त है , वह नि:संदेह काषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी है ।

But whoever is purged of depravity, well
established in virtues and filled with self-control
and truthfulness, that person indeed is worthy of the robe

Thursday, January 29, 2009

धम्मपद- यमकवग्गो ( The Dhammapada -Chapter One -- The Pairs-verses 7-8)

 

                              Chapter One -- The Pairs-verses 7-8

                               १. यमकवग्गो- छंद ७-८

७.

 

सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं।

भोजनम्हि चामत्तञ्‍ञुं, कुसीतं हीनवीरियं।

तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खंव दुब्बलं॥

अच्छी लगने वाली चीजों को शुभ ही शुभ देखते विहार करने वाले , इंद्रियों मे असंयत , भोजन की मात्रा के अजानकार , आलसी और उधोगहीन को मार ऐसे सताता है जैसे दुर्बल वृक्ष को मारुत ( पवन )

Just as a storm throws down a weak tree,so does Mara overpower the person who lives for the pursuit of pleasures, who is uncontrolled in one's senses, immoderate in eating, indolent and dissipated.


८.

 

असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं।

भोजनम्हि च मत्तञ्‍ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं।

तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलंव पब्बतं॥

अशुभ को अशुभ जानकर साधना करने वाले , इंद्रियों में सुयंत, भोजन की मात्रा के जानकार , श्रद्धावान और उधोगरत को मार उसी प्रकार डिगा नही सकता जैसे वायु शैल पर्वत को ।

Just as a storm cannot throw down a rocky
mountain, so Mara can never overpower the person
who lives meditating on the impurities, who is
controlled in one's senses, moderate in eating, and
filled with faith and earnest effort.

Tuesday, January 27, 2009

अब तिपिटक आफ़लाइन भी उपलब्ध (New Desktop client for the Pali Tipitaka)

tip

तिपिटक  को आन लाइन और आफ़लाइन दोनो ही तरह से पढ सकते हैं । आनलाइन देखने के लिये यहाँ किल्क करें और कम्पयूटर पर आफ़लाइन पढने के लिये यहाँ पर किल्क करके डाउनलोड करें ।

Now the Pāli Tipitaka is  available online & offline in various scripts. Click here for instructions on downloading and installing the desktop version for the offline mode.

Sunday, January 25, 2009

धम्मपद- यमकवग्गो ( The Dhaamapada -Chapter One -- The Pairs-verses 5-6 )

Chapter One -- The Pairs-verses 5-6

                             १. यमकवग्गो- छंद ५-६

५.

न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।

अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥

इस लोक मे कभी भी वैर से वैर शांत नहीं होता , बल्कि अवैर से शांत होता है । यही सनातन धर्म है ।

Hatred is never appeased by hatred in this world; by non-hatred alone is hatred appeased. This is an Eternal Law.


६.

 

परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।

ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥

अनाडी लोग नही जानते कि हम इस संसार से जाने वाले हैं । जो इसे जान लेते हैं उनके झगडॆ शांत हो जाते हैं ।

There are those who do not realize that one day we all must die, but those who realize this settle their quarrels.

Thursday, January 22, 2009

धम्मपद- यमकवग्गो ( The Dhaamapada -Chapter One -- The Pairs)

Chapter One -- The Pairs-verses 3-4

                             १. यमकवग्गो- छंद-३-४

३.

अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि [अजिनी (?)] मं अहासि मे।

ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥

’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं बाँधतें रहते हैं , उनका वैर शांत नही होता है ।

"He abused me, he struck me, he overpowered me, he robbed me"--those who harbour such thoughts do not still their hatred.

 

४.

अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।

ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥

’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं नहीं बाँधतें हैं , उनका वैर शांत हो जाता है ।

"He abused me, he struck me, he overpowered
me, he robbed me"--those who do not harbour
such thoughts still their hatred.

Saturday, January 17, 2009

'तिपिटक ' बुद्ध की वाणी



 

 

 

 

 

 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

समूची बुद्ध वाणी को ’ तिपिटक ’ के नाम से जाना जाता है । तिपिटक के तीन बडे विभाजन हैं : १) विनयपिटक २) सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक । इनमें से सुत्तपिटक के अंतर्गत पाँच निकाय हैं १) दीघनिकाय २ ) मज्झिमनिकाय ३)संयुत्तनिकाय ४) अङ्गुत्तरनिकाय और ५) खुद्दकनिकाय ।’ खुद्दकनिकाय ’ के अंतर्गत १९ ग्रंथ हैं । इन १९ ग्रंथों मे से एक है “ धम्मपद्ध “ । “ धम्मपद्ध “ यानि धर्म का मार्ग जिसमें बुद्ध के धर्म संबधी सूक्त या कथन संग्रुहीत हैं । “ धम्मपद्ध “ बौद्ध धर्म की गीता है । इसमे कुल ४२३ गाथायें हैं जो गौतम बुद्ध ने बुद्ध्त्व प्राप्ति के समय से लेकर परिनिर्वाण काल तक उपदेश क्रम मे समय-२ पर कही गयी हैं ।यह सूक्त बुद्ध द्वारा विभिन्न-३ स्थानों मे जैसे जेतवन , वेणुवन , श्र्रावस्ती , वेसाली , गिज्झकूट इत्यादि में भिक्षुओं , थेरों और थेरियों को कहे गये हैं ।