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१. यमकवग्गो- छंद ९-१०
Courtesy : for images -Illustrated Dhammapda
for Hindi & Devnagiri scripts-Tipitika.org & VRI
for English text-Lankalibrary.com
९.
अनिक्कसावो कासावं, यो वत्थं परिदहिस्सति।
अपेतो दमसच्चेन, न सो कासावमरहति॥
जिसने कषायों ( चित्तमलों ) का परित्याग नहीं किया है पर कषाय वस्त्र धारण किये है वह संयम और सत्य से परे है । वह कषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी नही है ।
Whoever being depraved, devoid of self-control
and truthfulness, should don the monk's yellow
robe, that person surely is not worthy of the robe
१०.
यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो।
उपेतो दमसच्चेन, स वे कासावमरहति॥
जिसने कषायों को निकाल बाहर किया है , शीलों मे प्रतिष्ठित है, संयम और सत्य से युक्त है , वह नि:संदेह काषाय वस्त्र धारण करने का अधिकारी है ।
But whoever is purged of depravity, well
established in virtues and filled with self-control
and truthfulness, that person indeed is worthy of the robe
Chapter One -- The Pairs-verses 7-8
१. यमकवग्गो- छंद ७-८
७.
सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं।
भोजनम्हि चामत्तञ्ञुं, कुसीतं हीनवीरियं।
तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खंव दुब्बलं॥
अच्छी लगने वाली चीजों को शुभ ही शुभ देखते विहार करने वाले , इंद्रियों मे असंयत , भोजन की मात्रा के अजानकार , आलसी और उधोगहीन को मार ऐसे सताता है जैसे दुर्बल वृक्ष को मारुत ( पवन )
Just as a storm throws down a weak tree,so does Mara overpower the person who lives for the pursuit of pleasures, who is uncontrolled in one's senses, immoderate in eating, indolent and dissipated.
असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलंव पब्बतं॥
अशुभ को अशुभ जानकर साधना करने वाले , इंद्रियों में सुयंत, भोजन की मात्रा के जानकार , श्रद्धावान और उधोगरत को मार उसी प्रकार डिगा नही सकता जैसे वायु शैल पर्वत को ।
Just as a storm cannot throw down a rocky
mountain, so Mara can never overpower the person
who lives meditating on the impurities, who is
controlled in one's senses, moderate in eating, and
filled with faith and earnest effort.
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१. यमकवग्गो- छंद ५-६
५.
न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
इस लोक मे कभी भी वैर से वैर शांत नहीं होता , बल्कि अवैर से शांत होता है । यही सनातन धर्म है ।
Hatred is never appeased by hatred in this world; by non-hatred alone is hatred appeased. This is an Eternal Law.
परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥
अनाडी लोग नही जानते कि हम इस संसार से जाने वाले हैं । जो इसे जान लेते हैं उनके झगडॆ शांत हो जाते हैं ।
There are those who do not realize that one day we all must die, but those who realize this settle their quarrels.
१. यमकवग्गो- छंद-३-४
३.
अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि [अजिनी (?)] मं अहासि मे।
ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥
’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं बाँधतें रहते हैं , उनका वैर शांत नही होता है ।
"He abused me, he struck me, he overpowered me, he robbed me"--those who harbour such thoughts do not still their hatred.
अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।
ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥
’मुझे कोसा ’ मुझे मारा’ ’मुझे हराया’ जो मन मे ऐसी गाँठॆं नहीं बाँधतें हैं , उनका वैर शांत हो जाता है ।
"He abused me, he struck me, he overpowered
समूची बुद्ध वाणी को ’ तिपिटक ’ के नाम से जाना जाता है । तिपिटक के तीन बडे विभाजन हैं : १) विनयपिटक २) सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक । इनमें से सुत्तपिटक के अंतर्गत पाँच निकाय हैं १) दीघनिकाय २ ) मज्झिमनिकाय ३)संयुत्तनिकाय ४) अङ्गुत्तरनिकाय और ५) खुद्दकनिकाय ।’ खुद्दकनिकाय ’ के अंतर्गत १९ ग्रंथ हैं । इन १९ ग्रंथों मे से एक है “ धम्मपद्ध “ । “ धम्मपद्ध “ यानि धर्म का मार्ग जिसमें बुद्ध के धर्म संबधी सूक्त या कथन संग्रुहीत हैं । “ धम्मपद्ध “ बौद्ध धर्म की गीता है । इसमे कुल ४२३ गाथायें हैं जो गौतम बुद्ध ने बुद्ध्त्व प्राप्ति के समय से लेकर परिनिर्वाण काल तक उपदेश क्रम मे समय-२ पर कही गयी हैं ।यह सूक्त बुद्ध द्वारा विभिन्न-३ स्थानों मे जैसे जेतवन , वेणुवन , श्र्रावस्ती , वेसाली , गिज्झकूट इत्यादि में भिक्षुओं , थेरों और थेरियों को कहे गये हैं ।