56.
🍁मज्झिम निकाय🍁
🔱मज्झिम-पण्णासक🔱
🛐गहपतिवग्ग🛐
🍃56-उपालि-सुत्त (2.1.6)🍃
👂ऐसा मैंने सुना--
🚶एक समय भगवान् नालन्दा में प्रावारिक के अम्बवन में विहार कर रहे थे।
😷उस समय निगंठ नातपुत्त निगंठों (=जैन-साधुओं) की बड़ी परिषद् (=जमात) के साथ नालन्दा में विहार करते थे। तब दीर्घ-तपस्वी निग्रंथ (=जैन साधु) नालन्दा में भिक्खाचार कर, पिंडपात खत्म कर, भोजन के पश्चात् जहां प्रावारिक-अम्बवन में भगवान् थे, वहां गया। जाकर भगवान् के साथ संमोदन (कुशल प्रश्न पूछ) कर, एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए दीर्घ-तपस्वी निगंठ (निग्रन्थ) को भगवान ने कहा
🌷“तपस्वी! आसन मौजूद हैं, यदि इच्छा है तो बैठ जाओ।"
🔯ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निर्ग्रन्थ एक नीचा आसन ले एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे दीर्घ-तपस्वी निर्ग्रन्थ से भगवान बोले
☝“तपस्वी! पाप कर्म के करने के लिए, पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए निर्ग्रन्थ ज्ञातृपुत्र कितने कर्मों का विधान करते हैं?"
😷“आवुस ! गोतम! 'कर्म' 'कर्म' विधान करना निर्ग्रन्थ ज्ञातृपुत्र का कायदा (=आचिण्ण) नहीं है।
आवुस! गोतम! ‘दंड' ‘दंड' विधान करना निगंठ नातपुत्त का कायदा है।”
☝“तपस्वी! तो फिर पाप-कर्म के करने के लिए,
पापकर्म की प्रवृत्ति के निए निगंठ नातपुत्त कितने 'दंड' विधान करते हैं?”
😷“आवुस! गोतम! पाप कर्म के करने के लिए,
पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए निगंठ नातपुत्त तीन दंडों का विधान करते हैं। जैसे:-
काय-दंड,
वचन-दंड,
मन-दंड।”
☝“तपस्वी!
तो क्या कायदंड दूसरा है,
वचन-दंड दूसरा है,
मन-दंड दूसरा है?”
😷“आवुस! गोतम!
(हां) काय-दंड दूसरा ही है,
वचन-दंड दूसरा ही है, और
मन-दंड दूसरा ही है।"
☝"तपस्वी! इस प्रकार भेद किए, इस प्रकार विभक्त, इन तीनों दंडों में निगंठ नातपुत्त पाप कर्म के करने के लिए,
पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए किस दंड को महादोष-युक्त विधान करते हैं,
काय-दंड को, या
वचन-दंड को या
मन-दंड को?"
😷“आवुस ! गोतम! इस प्रकार भेद किए, इस प्रकार विभक्त, इन तीनों दंडों में निगंठ नाथपत्त. पाप कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए,
काय-दंड को महादोष-युक्त विधान करते हैं; वैसा वचन-दंड को नहीं,
वैसा मन-दंड को नहीं?"
☝“तपस्वी! काय-दंड कहते हो?"
😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।" “
☝तपस्वी! काय-दंड कहते हो?"
😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।"
☝“तपस्वी! काय-दंड कहते हो?"
😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।"
🔱इस प्रकार भगवान ने दीर्घ-तपस्वी निगंठ को इस (कथा-वस्तु बात) में तीन बार प्रतिष्ठापित किया।
😷ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान से कहा👄--
🌷“तुम आवुस! गोतम! पाप-कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए कितने दंड-विधान करते हो?"
☝"तपस्वी!
'दंड' 'दंड' कहना तथागत का कायदा नहीं है, 'कर्म' 'कर्म' कहना तथागत का कायदा है।"
😷“आवुस!
गोतम! तुम कितने कर्म-विधान करते हो?"
☝ "तपस्वी!
मैं ...तीन कर्म बतलाता हूं, जैसे,
काय-कर्म,
वचन-कर्म,
मन-कर्म।”
😷“आवुस! गोतम!
काय-कर्म दूसरा ही है,
वचन-कर्म दूसरा ही है, और
मन-कर्म दूसरा ही है?"
☝“तपस्वी!
काय-कर्म दूसरा ही है,
वचन कर्म दूसरा ही है,
मन-कर्म दूसरा ही है।”
😷“आवुस! गोतम! ...इस प्रकार विभक्त... इन तीन कर्मों में, पाप-कर्म करने के लिए ... किसको महादोषी ठहराते हो -
काय-कर्म को, या
वचन-कर्म को, या
मन-कर्म को?" -
☝“तपस्वी! ...इस प्रकार विभक्त... इन तीनों कर्मों में मन-कर्म को मैं ... महादोषी बतलाता हूं।"
😷“आवुस! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?"
☝ “तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।"
😷“आवुस! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?"
☝“तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।"
😷“आवुस ! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?"
☝“तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।"
🔱इस प्रकार दीर्घ-तपस्वी निगंठ भगवान् को इस कथा-वस्तु (=विवाद-विषय) में तीन बार प्रतिष्ठापित करा, आसन से उठ जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां चला गया।
🌷उस समय निगंठ नातपुत्त, बालक (-लोणकार) - निवासी उपालि' आदि की बड़ी गृहस्थ परिषद् के साथ बैठे थे। तब निगंठ नातपुत्त ने दूर से ही दीर्घ-तपस्वी निगंठ को आते देख पूछा--
🤔“हे! तपस्वी! मध्याह्न में तू कहां से (आ रहा है)?"
🙏 “भन्ते! श्रमण गोतम के पास से आ रहा हूं।"
🤔 “तपस्वी! क्या तेरा श्रमण गोतम के साथ कुछ कथा-संलाप हुआ?"
🙏"भन्ते! हां! मेरा श्रमण गोतम के साथ कथा-संलाप हुआ।"
🤔 "तपस्वी! श्रमण गोतम के साथ तेरा क्या कथा-संलाप हुआ?"
🙏तब दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान के साथ जो कुछ कथा-संलाप हुआ था, वह सब निगंठ नातपुत्त से कह दिया।
🤔“साधु! साधु!! तपस्वी! (यही ठीक है) जैसा कि शास्ता (=गुरु) के शासन (=उपदेश) को अच्छी प्रकार जाननेवाले, बहुश्रुत श्रावक दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने श्रमण गोतम को बतलाया।
वह मुवा मन-दंड,
इस महान् काय-दंड के सामने क्या शोभता है? पाप-कर्म के करने के लिए पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए काय-दंड ही महादोषी है,
वचन दंड, मन-दंड वैसे नहीं।"
🌷ऐसा कहने पर उपालि गृहपति ने निगंठ नातपुत्त से यह कहा👄--
🙏“साधु! साधु!! भन्ते तपस्वी! जैसा कि शास्ता के शासन के मर्मज्ञ, बहुश्रुत श्रावक भदन्त दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने श्रमण गोतम को बतलाया।
तो भन्ते! मैं जाऊं, इसी कथा-वस्तु में श्रमण गोतम के साथ विवाद रोपूं?
यदि मेरे (सामने) श्रमण गोतम वैसे (ही) ठहरा रहा,
जैसा कि भदन्त दीर्घ-तपस्वी ने (उसे) ठहराया, तो जैसे बलवान् पुरुष लम्बे बाल वाली भेड़ को बालों से पकड़कर खींचे, घुमावे, डुलावे;
उसी प्रकार मैं श्रमण गोतम के वाद को खीचूंगा, घुमाऊंगा, डुलाऊंगा।
(अथवा) जैसे कि बलवान् शौंडिक-कर्मकर (=शराब बनाने वाला) भट्टि के छन्ने (=सोंडिका-किलंज)को गहरे पानी (वाले) तालाब में फेंककर; कानों को पकड़ खींचे, घुमावे, डुलावे, ऐसे ही मैं ।
(अथवा) जैसे बलवान् शराबी, बालक को कान से पकड़कर हिलावे, डुलावे", ऐसे ही मैं । (अथवा) जैसे कि साठ वर्ष का पट्ठा हाथी गहरी पुष्करिणी में घुसकर सन-धोवन नामक खेल को खेले, ऐसे ही मैं श्रमण गोतम को सन-धोवन ।
हां! तो भन्ते! मैं जाता हूं। इस कथा-वस्तु में श्रमण गोतम के साथ वाद रोपूंगा।"
👉“जा गृहपति! जा, श्रमण गोतम के साथ इस कथा-वस्तु में वाद रोप।
गृहपति! श्रमण गोतम के साथ मैं वाद रोप, या
दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ रोपे,
या तू।”
🙏ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ ने निगण्ठनात-पुत्त से कहा--
🌷"भन्ते! (आपको) यह मत रुचे, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम के पास जाकर वाद रोपे। भन्ते! श्रमण गोतम मायावी है, (मति) फेरनेवाली माया जानता है, जिससे दूसरे तैर्थिकों (=पंथाइयों) के श्रावकों (को अपनी ओर) फेर लेता है।"
🖐"तपस्वी! यह संभव नहीं, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए। संभव है कि श्रमण गोतम (ही) उपालि गृहपति का श्रावक हो जाए।
जा गृहपति! श्रमण गोतम के साथ इस कथा-वस्तु में वाद रोप।
गृहपति! श्रमण गोतम के साथ मैं वाद रोपूं, या दीर्घ-तपस्वी निगंठ रोपे, या तू।”
🙏दूसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ ने...।
🙏तीसरी बार भी...।
🌷“अच्छा भन्ते!" कह,
उपालि गृहपति निगण्ठ नातपुत्त को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर जहां प्रावारिक अम्बवन था, जहां भगवान थे, वहां गया। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।
☝ एक ओर बैठे हुए उपालि गृहपति ने भगवान से कहा--
🙏"भन्ते! क्या दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ यहां आए थे?"
☝ “गृहपति! दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ यहां आया था।"
🙏 “भन्ते! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ आपका कुछ कथा-संलाप हुआ।"
☝“गृहपति! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ मेरा कुछ कथा-संलाप हुआ।”
🙏 "तो भन्ते! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ क्या कुछ कथा-संलाप हुआ?"
🌷तब भगवान ने दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ जो कुछ कथा-संलाप हुआ था, उस सबर उपालि गृहपति से कह दिया। ऐसा कहने पर उपालि गृहपति ने भगवान से कहा--
🙏“साधु! साधु! भन्ते तपस्वी! जैसा कि शास्ता के शासन के मर्मज्ञ, बहु-श्रुत, श्रावक दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान को बतलाया!! वह मुर्दा मन-दंड इस महान काया-दंड के सामने क्या शोभता है?
पाप-कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए काय-दंड ही महा-दोषी है; वैसा वचन-दंड नहीं है, वैसा मन-दंड नहीं है।"
☝“गृहपति! यदि तू सत्य में स्थिर हो मंत्रणा (=विचार) करे, तो हम दोनों का संलाप हो।"
🙏 “भन्ते! मैं सत्य में स्थिर हो मंत्रणा करूंगा। हम दोनों का संलाप हो।"
☝"क्या मानते हो गृहपति! (यदि) यहां एक बीमार-दुखित भंयकर रोगग्रस्त शीत-जल-त्यागी उष्ण-जल-सेवी निगंठ... हो, वह शीत-जल न पाने के कारण मर जाए, तो निगंठ नातपुत्त उसकी (पुनः) उत्पत्ति कहां बतलाएंगे?"
🙏“भन्ते! (जहां) मनोसत्त्व नामक देवता हैं; वह वहां उत्पन्न होगा।"
☝“सो किस कारण?"
🙏"भन्ते! वह मन से बंधा हुआ मरा है।"
☝“गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) करके कहो।
तुम्हारा पूर्व (पक्ष)से पश्चिम (पक्ष) नहीं मिलता, तथा पश्चिम से पूर्व नहीं ठीक खाता। और गृहपति! तुमने यह बात (भी) कही है-भन्ते! मैं सत्य में स्थिर हो मंत्रणा करूंगा, हम दोनों का संलाप हो।”
🙏“और भन्ते! भगवान् ने भी ऐसा कहा है-पापकर्म करने के लिए काय-दंड ही महादोषी है, वैसा वचन-दंड (और) मन-दंड नहीं?”
☝“तो क्या मानते हो गृहपति! यहां एक चातुर्याम-संवर,
((*(1) प्राण-हिंसा न करना, न अनुमोदन करना,
(2) चोरी न करना ।
(3) झूठ न बोलना
(4) भावित (=विषय-भोग) न चाहना । यह चातुर्याम संवर है।*))
से संवृत (=गोपित, रक्षित), सब वारि से निवारित, सब वारि (=वारितों) को निवारण करने में तत्पर, सब (पाप) वारि से धुला हुआ, सब (पाप) वारि से छूटा हुआ, निगंठ
(निग्रंथ =जैन-साधु) है।
वह आते-जाते बहुत से छोटे-छोटे प्राणि-समुदाय को मारता है।
गृहपति! निगंठ नातपुत्त इसका क्या विपाक (=फल) बतलाते हैं?"
🙏"भन्ते! अनजान को निगंठ नातपुत्त महादोष नहीं कहते।”
☝ “गृहपति! यदि जानता हो।”
🙏—“(तब) भन्ते! महादोष होगा।"
☝"गृहपति! जानने को निगंठ नातपुत्त किसमें कहते हैं?” –
🙏 “भन्ते! मन-दंड में।"
☝ "गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) करके कहो...।”
🙏 “और भन्ते! भगवान ने भी... ।"
☝“तो गृहपति! क्या यह नालन्दा सुख-सम्पत्ति-युक्त बहुत जनों वाली, (बहुत) मनुष्यों से भरी है?"
🙏“हां भन्ते!"
☝“तो ... गृहपति! (यदि) यहां एक पुरुष (नंगी) तलवार उठाए आए, और कहे-इस नालन्दा में जितने प्राणी हैं, मैं एक क्षण में एक मुहूर्त में, उन (सब) का एक मांस का खलिहान, एक मांस का ढेर कर दूंगा। तो क्या गृहपति! वह पुरुष ... एक मांस का ढेर कर सकता है?"
🙏"भन्ते! दस भी पुरुष, बीस भी पुरुष, तीस ...चालीस ...पचास ... भी पुरुष, एक मांस का ढेर नहीं कर सकते, वह एक मुवा क्या है?"
☝"तो... गृहपति! यहां एक ऋद्धिमान्,
चित्त को वश में किया हुआ,
श्रमण या ब्राह्मण आए,
वह ऐसा बोले-मैं इस नालंदा को एक ही मन के क्रोध से भस्मकर दूंगा।
तो क्या ... गृहपति । वह श्रमण या ब्राह्मण इस नालंदा को (अपने) एक मन के क्रोध से भस्स कर सकता है।"
🙏“भन्ते! दस नालन्दाओं को भी... पचास नालन्दाओं को भी ...वह श्रमण या ब्राह्मण (अपने एक क्रोध से भस्म कर सकता है।
एक मुई नालन्दा क्या है?"
☝“गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) कर कहो।"
🙏“और भगवान ने भी..।”
☝"तो गृहपति! क्या तुमने दंडकारण्य, कलिंगारण्य, मेध्यारण्य (=मेज्झारज्ञ), मातंगारण्य का अरण्य होना सुना है?"
🙏“हां, भन्ते!"।”
☝“तो गृहपति! तुमने सुना है, कैसे दण्डकारण्य हुआ?"
🙏 "भन्ते! मैंने सुना है-ऋषियों के मन के-कोप से दण्डकारण्य ... हुआ।"
☝"गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) कर कहो। तुम्हारा पूर्व से पश्चिम नहीं मिलता, पश्चिम से पूर्व नहीं मिलता। और तुमने गृहपति! यह बात कही है-'सत्य में स्थिर हो मैं भन्ते! मंत्रणा (=वाद) करूंगा, हमारा संलाप हो।”
🙏“भन्ते! भगवान की पहली उपमा से ही मैं सन्तुष्ट अभिरत हो गया था। विचित्र प्रश्नों के व्याख्यान (=पटिभान) को और भी सुनने की इच्छा से ही मैंने भगवान् को प्रतिवादी बनाना पसन्द किया।"
🌷आश्चर्य! भन्ते!! आश्चर्य! भन्ते!! जैसे औंधे को सीधा कर दे... आज से भगवान मुझे सांजलि शरणागत उपासक धारण करें।”
☝“गृहपति! सोच-समझकर (काम) करो। तुम्हारे जैसे मनुष्यों का सोच-समझकर ही करना अच्छा होता है।"
🙏"भन्ते! भगवान के इस कथन से मैं और भी प्रसन्न-मन, सन्तुष्ट और अभिरत हुआ; जो कि भगवान ने मुझे कहा-
'गृहपति! सोच-समझकर करो...।' भन्ते! दूसरे तैर्थिक (=पंथाई) मुझे श्रावक पाकर, सारे नालन्दा में पताका उड़ाते–
'उपालि गृहपति हमारा श्रावक हो गया। और भगवान मुझे कहते हैं-
'गृहपति! सोच-समझकर करो...। भन्ते! यह दूसरी बार मैं भगवान की शरण जाता हूं, धर्म और भिक्खुसंघ की भी...।"
☝“गृहपति! दीर्घ-काल से तुम्हारा कुल निगण्ठों के लिए प्याऊ की तरह रहा है,
उनके जाने पर 'पिंड नहीं देना चाहिए'-यह मत समझना।”
🙏“भन्ते! इससे और भी प्रसन्न-मन, सन्तुष्ट और अभिरत हुआ, जो मुझे भगवान ने कहा-दीर्घकाल से तेरा घर... ।
भन्ते! मैंने सुना था कि श्रमण-गोतम ऐसा कहता है-मुझे ही दान देना चाहिए, दूसरों को दान न देना चाहिए। मेरे ही श्रावकों को दान देना चाहिए, दूसरों को दान न देना चाहिये। मुझे ही देने का महा-फल होता है, दूसरों को देने का महा-फल नहीं होता। मेरे ही श्रावकों को देने का महाफल होता है, दूसरों के श्रावकों को देने का महाफल नहीं होता।
और भगवान तो मुझे निगण्ठों को भी दान देने को कहते हैं।
भन्ते! हम भी इसे युक्त समझेंगे।
भन्ते! यह मैं तीसरी बार भगवान की शरण जाता हूं...।"
🌷तब भगवान ने उपालि गृहपति को आनुपूर्वी-कथा (नोट- दान-कथा, शील-कथा, स्वर्ग कथा और मार्ग-कथा को क्रमशः कहने को आनुपूर्वी कथा कहते हैं-अट्ठकथा।) कही । जैसे कालिमा-रहित शुद्ध-वस्त्र अच्छी प्रकार रंग को पकड़ता है, इसी प्रकार उपालि गृहपति को उसी आसन पर विरज, विमल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ :-
'जो कुछ समुदय-धर्म है, वह सब निरोध-धर्म है'।
तब उपालि गृहपति ने दृष्ट-धर्म हो भगवान से कहा
🙏“भन्ते! अब हम जाते हैं, हम बहुकृत्य, बहुकरणीय हैं।"
☝“गृहपति! जिसका तुम काल समझो (वैसा करो)।”
☝तब उपालि गृहपति! भगवान के भाषण का अभिनन्दन कर, अनुमोदन कर, आसन से उठ, भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, जहां उसका घर था, वहां गया। जाकर द्वारपाल से बोला--
🎆“सौम्य! दौवारिक! आज से मैं निगण्ठों और निगण्ठियों के लिए द्वार बन्द करता हूं, भगवान के भिक्खु-भिक्खुनी, उपासक और उपासिकाओं के लिए द्वार खोलता हूं।"
🎆 "यदि निगण्ठ आएं, तो कहना -
‘ठहरें भन्ते! आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हुआ।
निगंठों, निगंठियों के लिए द्वार बन्द है;
भगवान् के भिक्खु, भिक्खुनी, उपासक, उपासिकाओं के लिए द्वार खुला है।"
🎆 "यदि भन्ते! आप को पिंड (=भिक्खा) चाहिए तो यहीं ठहरें, (हम) यहीं ला देंगे।"
🙏“अच्छा भन्ते!"
(कह) दौवारिक ने उपालि गृहपति को उत्तर दिया।
🌷दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने सुना-
‘उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया।'
तब दीर्घ-तपस्वी निगंठ, जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां गया। जाकर निगंठ नातपुत्त से बोला
👄“भन्ते! मैंने सुना है, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया।"
✊“यह स्थान नहीं, यह अवकाश नहीं (=यह असम्भव) है, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए, और यह स्थान (=संभव) है, कि श्रमण गोतम (ही) उपालि गृहपति का श्रावक (=शिष्य) हो।”
👄दूसरी बार भी दीर्घ तपस्वी निगंठ ने कहा...।
👄तीसरी बार भी दीर्घ तपस्वी निगंठ ने...।
🙏"तो भन्ते! मैं जाता हूं और देखता हूं कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया, या नहीं।"
🖐“जा तपस्वी! देख कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया, या नहीं।"
🌷तब दीर्घ-तपस्वी! निगंठ जहां उपालि गृहपति का घर था, वहां गया। द्वारपाल ने दूर से ही दीर्घ-तपस्वी निगंठ को आते देखा। देखकर दीर्घतपस्वी निगंठ से कहा--
🖐“भन्ते! ठहरो, मत प्रवेश करो। आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया। यहीं ठहरो, यहीं तुम्हें पिंड ला देंगे।"
👄“आवुस ! मुझे पिंड का काम नहीं है।”
🙏-यह कह दीर्घ-तपस्वी निगंठ जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां गया। जाकर निगंठ नातपुत्त से बोला👄--
🙏“भन्ते! सच ही है। उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया। भन्ते! मैंने आप से पहले ही न कहा था, कि मुझे यह पसन्द नहीं कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम के साथ वाद करे। श्रमण गोतम भन्ते! मायावी है, आवर्तनी माया जानता है, जिससे दूसरे तैर्थिकों के श्रावकों को फेर लेता है। भन्ते! उपालि गृहपति को श्रमण गोतम ने आवर्तनी-माया से फेर लिया।"
🖐“तपस्वी! यह... (संभव नहीं)... कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए।"
🙏दूसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने निगंठ नातपुत्त से यह कहा...।
🔱तीसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी...।
🖐“तपस्वी! यह (संभव नहीं)। अच्छा तो तपस्वी! मैं जाता हूं। स्वयं जानता हूं, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हुआ या नहीं।"
🚶तब निगंठ नातपुत्त बड़ी भारी निगंठों की परिषद् के साथ, जहां उपालि गृहपति का घर था, वहां गया। द्वारपाल ने दूर से आते हुए निगंठ नातपुत्त को देखा। (और) कहा__
👄“ठहरें भन्ते! मत प्रवेश करें। आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का उपासक हुआ। यहीं ठहरें, यहीं आपको (पिंड) ला देंगे।" .
🖐"तो सौम्य दौवारिक! जहां उपालि गृहपति है, वहां जाओ। जाकर उपालि गृहपति से कहो-भन्ते! बड़ी भारी निगंठ-परिषद् के साथ निगंठ नातपुत्त फाटक के बाहर खड़े हैं, (और) तुम्हें देखना चाहते हैं।"
🙏“अच्छा भन्ते!”–निगंठ नातपुत्त को ऐसा कह (द्वारपाल) जहां उपालि गृहपति था, वहां गया। जाकर उपालि गृहपति से बोला--
🙏"भन्ते! निगंठ नातपुत्त...।"
👉“तो सौम्य! दौवारिक! बिचली द्वार-शाला (=दालान) में आसन बिछाओ।"
🙏 “अच्छा भन्ते!”–उपालि गृहपति से कह, बिचली द्वार-शाला में आसन बिछा कहा
🙏"भन्ते! बिचली द्वार-शाला में आसन बिछा दिए। अब (आप) जिसका काल समझें।"
🚶तब उपालि गृहपति जहां बिचली द्वार-शाला थी, वहां गया। जाकर जो वहां अग्र, श्रेष्ठ, उत्तम, प्रणीत आसन था, उस पर बैठकर दौवारिक से बोला--
👄"तो सौम्य दौवारिक! जहां निगंठ नातपुत्त हैं, वहां जाओ, जाकर निगंठ नातपुत्त से यह कहो-
'भन्ते! उपालि गृहपति कहता है-यदि चाहें तो भन्ते! प्रवेश करें।"
“अच्छा भन्ते!”– (कह) ...दौवारिक ने... निगंठ नातपुत्त से कहा--
🙏“भन्ते! उपालि गृहपति कहते हैं-यदि चाहें तो प्रवेश करें।"
🚶निगंठ नातपुत्त बड़ी भारी निगंठ-परिषद् के साथ जहां बिचली द्वार-शाला थी, वहां गए। पहले जहां उपालि गृहपति, दूर से ही निगंठ नातपुत्त को आते देखता; देखकर अगवानी कर वहां जो अग्र, श्रेष्ठ, उत्तम, प्रणीत आसन होता, उसे (अपनी) चादर से पोंछकर, उस पर बैठाता था। सो आज जो वहां उत्तम आसन था, उस पर स्वयं बैठकर निगंठ नातपत्त से बोला
🙏"भन्ते! आसन मौजूद हैं, यदि चाहें तो
बैठें।”
🍁 ऐसा कहने पर निगंठ नातपुत्त ने उपालि-गृहपति से कहा👄--
🖐“उन्मत्त हो गया है गृहपति!
जड़ हो गया है गृहपति! तू-
'भन्ते! जाता हूं श्रमण-गोतम के साथ रोपूंगा- (कहकर) जाने के बाद बड़े भारी वाद के संघाट (जाल) में बंधकर लौटा है। जैसे कि अंड (=अंडकोश)-हारक निकाले अंडों के साथ आए; जैसे कि... अक्षि (=आंख)-हारक पुरुष निकाली आंखों के साथ आए, वैसे ही गृहपति! तू-“भन्ते! जाता हूं, श्रमण गोतम के साथ वाद रोपूंगा” (कहकर) जा, बड़े भारी वाद-संघाट में बंधकर लौटा है। गृहपति! श्रमण गोतम ने आवर्तनी माया से तेरी (मत) फेर ली है।”
🙏“सुन्दर है, भन्ते आवर्तनी माया। कल्याणी है भन्ते! आवर्तनी माया। (यदि) मेरे प्रिय जातिभाई भी इस आवर्तनीय माया द्वारा फेर लिए जाएं, (तो) मेरे प्रिय जाति-भाइयों को दीर्घ-काल तक हित-सुख होगा। यदि भन्ते! सभी क्षत्रिय इस आवर्तनी-माया से फेर लिए जायं, तो सभी क्षत्रियों का दीर्घ-काल तक हित-सुख होगा। यदि सभी ब्राह्मण... । यदि सभी वैश्य... । यदि सभी शूद्र...। यदि देव-मार-ब्रह्मा-सहित सारा लोक, श्रमण-ब्राह्मण-देव-मनुष्य-सहित सारी प्रजा (=जनता) इस आवर्तनी-माया से फेर ली जाय, तो... (उसका) दीर्घकाल तक हित-सुख होगा। भन्ते आप को उपमा कहता हूं, उपमा से भी कोई-कोई विज्ञ पुरुष भाषण का अर्थ समझ जाते हैं " --
👄“पूर्वकाल में भन्ते! किसी जीर्ण, बूढ़े, महल्लक ब्राह्मण की एक नव-वयस्का (=दहन) माणविका (=तरुण ब्राह्मणी) भार्या गर्भिणी आसन्न-प्रसवा हुई। तब भन्ते! उस माणविका ने ब्राह्मण से कहा-'ब्राह्मण! जा बाजार से एक वानर का बच्चा (=मर्कट-शावक) खरीद ला, वह मेरे कुमार (=बच्चे) का खेल होगा।”
🍁“ऐसा बोलने पर, भन्ते! उस ब्राह्मण ने उस माणविका से कहा-भवति (=आप)! ठहरिए, यदि आप कुमार जनेंगी, तो उसके लिए मैं बाजार से मर्कट-शावक (=खिलौना) खरीद कर ला दूंगा, जो आप के कुमार का खेल (खिलौना) होगा।”
🍁"दूसरी बार भी भन्ते! उस माणविका ने...।"
🍁" तीसरी बार भी ...।"
🍁 "तब भन्ते! उस माणविका में अति-अनुरक्त, प्रतिबद्ध-चित्त उस ब्राह्मण ने बाजार से मर्कट-शावक खरीद कर, लाकर उस माणविका से कहा-
'भवति! बाजार से यह तुम्हारा मर्कट-शावक खरीदकर लाया हूं, यह तुम्हारे कुमार का खिलौना होगा।' ऐसा कहने पर भन्ते! उस माणविका ने उस ब्राह्मण से कहा-'ब्राह्मण! इस मर्कट-शावक को लेकर वहां जाओ जहां रक्त-पाणि रजक-पुत्र (=रंगरेज का बेटा) है। जाकर रक्त-पाणि रजक-पुत्र से कहो-'सौम्य! रक्तपाणि! मैं इस मर्कट-शावक को पीतावलेपन रंग से रंगा, मला, दोनों ओर पालिश किया हुआ चाहता हूं।'
🍁तब भन्ते! इस माणविका में अति-अनुरक्त प्रतिबद्ध-चित्त वह ब्राह्मण उस मर्कट-शावक को लेकर जहां रक्तपाणि रजक पुत्र था, वहां गया, जाकर रक्त-पाणि रजक पुत्र से बोला-'सोम्य! रक्तपाणि इस...।
🍁 ऐसा कहने पर रक्त-पाणि रजक-पुत्र ने उस ब्राह्मण से कहा-'भन्ते! यह तुम्हारा मर्कट-शावक न रंगने योग्य है, और न मलने योग्य है, न मांजने योग्य है।' इसी प्रकार भन्ते! बाल (=अज्ञ) निगंठों का वाद (सिद्धांत), बालों (=अज्ञों) को रंजन करने लायक है, पंडित को नहीं। (यह) न परीक्षा (=अनुयोग)के योग्य है, न मीमांसा के योग्य है।
🍁 तब भन्ते! वह ब्राह्मण दूसरे समय *नया धुस्से* का जोड़ा ले, जहां रक्त-पाणि रजकपुत्र था, वहां गया। जाकर रक्त-पाणि रजक-पुत्र से बोला-'सौम्य! रक्त-पाणि! धुस्से का जोड़ा पीतावलेपन (=पीले) रंग से रंगा, मला, दोनों ओर से मांजा (=पालिश किया) हुआ चाहता हूं।' ऐसा कहने पर भन्ते! रक्तपाणि रजक-पुत्र ने उस ब्राह्मण से कहा-'भन्ते! यह तुम्हारा धुस्सा-जोड़ा रंगने योग्य है, मलने योग्य भी है, मांजने योग्य भी है। इसी तरह भन्ते! उन भगवान अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध का वाद पंडितों को रंजन करने योग्य है, बालों (=अज्ञों) को नहीं। (यह) परीक्षा और मीमांसा के योग्य है।"
🖐“गृहपति! राजा-सहित सारी परिषद् जानती है कि उपालि गृहपति निगंठ नातपुत्त का श्रावक है। (अब) गृहपति! तुझे जिसका श्रावक समझें?"
🔱ऐसा कहने पर उपालि गृहपति आसन से उठकर (दाहिने कन्धे को नंगाकर) उत्तरासंग (=चद्दर) को, एक कन्धे पर कर, जिधर भगवान थे उधर हाथ जोड़, नातपुत्त से बोला -
“भन्ते! सुनें मैं किसका श्रावक हूं?
🌷धीर विगत-मोह खंडित-कील विजित-विजय,
निर्दुख सु-सम-चित्त वृद्ध-शील सुन्दर-प्रज्ञ,
विश्व के तारक, वि-मल-उस भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥1॥
🌷अकथं-कथी, संतुष्ट, लोक-भोग को वमन करने वाले, मुदित,
श्रमण-हुए-मनुज अंतिम-शरीर-नर,
अनुपम, वि-रज-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥2॥
🌷संयम-रहित, कुशल, विनय-युक्त-बनाने वाले, श्रेष्ठ-सारथी,
अनुत्तर (=सर्वोत्तम), रुचिर-धर्म-वान्, निराकांक्षी, प्रभाकर,
मान-छेदक, वीर-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥3॥
🌷उत्तम (=निसभ), अ-प्रमेय, गम्भीर, मुनित्त्व प्राप्त,
क्षेमंकर, ज्ञानी, धर्मार्थ-वान्, संयत-आत्मा,
संग-रहित, मुक्त-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥4॥
🌷 नाग, एकांत-आसन-वान् संयोजन (=बन्धन)-रहित, मुक्त,
प्रति-मंत्रक (=वाद-दक्ष), धौत, प्राप्त-ध्वज, वीत-राग,
दान्त, निष्प्रपंच, उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥5॥
🌷 ऋषि-सत्तम, अ-पाखंडी, त्रि-विद्या-युक्त, ब्रह्म (=निर्वाण)-प्राप्त,
स्नातक, पदक (=कवि) प्रश्रब्ध, विदित वेद,
पुरन्दर, शक-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥6॥
🌷आर्य, भावित-सत्व, प्राप्तव्य-प्राप्त वैयाकरण,
स्मृतिमान्, विपश्यी अन-अभिमानी, अन्-अवनत,
अ-चंचल, वशी-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥7॥
🌷 सम्यग्-गत, ध्यानी, अ-लग्न-चित्त (=अन्-अनुगत-अन्तर), शुद्ध।
अ-सित (=शुद्ध), अ-प्रहीण, प्रविवेक-प्राप्त, अग्र-प्राप्त,
तीर्ण, तारक-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥8॥
🌷 शांत, भूरी (=बहु)-प्रज्ञ, महा-प्रज्ञ, विगत-लोभ,
तथागत, सुगत, अ-प्रति-पुद्गल (=अ-तुलनीय)=अ-सम,
विशारद, निपुण-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥9॥
🌷 तृष्णा-रहित, बुद्ध, धूम-रहित, अ-लिप्त,
पूजनीय=यक्ष, उत्तम-पुद्गल, अ-तुल,
महान् उत्तम-यश-प्राप्त-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥10॥"
🖐"गृहपति! श्रमण गोतम के (ये) गुण तुझे कब (से) सूझे?"
🙏"भन्ते! जैसे नाना पुष्पों की एक पुष्प-राशि (ले) एक चतुर माली या माली का अन्तेवासी (-शिष्य) विचित्र माला गूंथे; उसी प्रकार भन्ते! वे भगवान अनेक वर्ग (=गुण) वाले, अनेक शत वर्ण वाले हैं। भन्ते! प्रशंसनीय की प्रशंसा कौन न करेगा?"
😷निगंठ नातपुत्त ने भगवान के सत्कार को न सहनकर, वहीं मुंह से गर्म लहू फेंक दिया।
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नोट-
(1) निगंठ नात-पुत्त वही मुंह में खून फेंक कर गिर पड़े। उन्हें उनके शिष्यों ने पालकी में बैठा कर पावा पहुंचाया। वे वहां थोड़े ही दिनों में मर गए-अट्ठकथा।
(2) गहपति उपालि (नालंदा-वासी)
व
अरहत उपालि (साक्य व कपिलवस्तु-वासी, प्रथम संगीति मे विनय-पिटक का संगायन करने वाले) दोनो भिन्न भिन्न पुद्गल हैं |
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