Thursday, July 27, 2023

मनोवैज्ञानिक चिकित्सा में में विपश्यना की भूमिका (The Role of Vipassana in Psychiatric Practice- डॉ. आर. एम. चोखानी Dr R.M Chokhani )

मनोवैज्ञानिक चिकित्सा में में विपश्यना की भूमिका
The Role of Vipassana in Psychiatric Practice
- डॉ. आर. एम. चोखानी  Dr R.M Chokhani

यह पत्र धम्मगिरि पर 1986 ई. में आयोजित विपश्यना सेमिनार में उपस्थापित किया गया।
[The following was presented as a paper at the Vipassana Seminar held at Dhamma Giri in 1986; it has been duly revised and updated.]
चित्त या मन को नियंत्रित करने की जो पारंपरिक विधियां हैं उनका एक आधुनिक रूपान्तरण विपश्यना ध्यान विधि है जो आम जनता तथा मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वालों में बहुत ही लोकप्रिय है
.     विपस्सना पालि भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है 'प्रज्ञा' या अन्तर्ज्ञान। यह आत्मपर्यवेक्षण से आत्मरूपान्तरण की प्रणाली है। इसका उद्देश्य है अंततः मानसिक संतुलन तथा समता प्राप्त करना (थ्रे सिदु सयाजी ऊ बा खिन, 1963) और अपने तथा औरों के लिए ऐसा जीवन जीना जो सबों के लिए लाभदायक हो (स. ना. गोयन्का, 1990)

आत्ममुक्ति के लिए ध्यान का अभ्यास विभिन्न संस्कृतियों में अपने अध्यात्म के संदर्भ में धार्मिक समूहों के सदस्यों द्वारा अपने समूह के सदस्यों के लिए विकसित किया गया । बुद्ध की शिक्षा में मनोवैज्ञानिक प्रणाली के साथ-साथ एक ब्रह्मांड विज्ञान है ( कुटज. 1, बोरिसेंको जे. जे. एण्ड वेनसन एच 1985)। इसे अभिधम्म कहा जाता है जो बहुत ही सुव्यवस्थित किंतु जटिल तरीके से व्याख्यायित है। इसमें मानसिक व्यापार क्रिया को समझने के लिए एक प्रत्यय समूह का उपस्थापन किया गया है तथा मानसिक विकार को ठीक करने का तरीका भी है जो आधुनिक मनश्चिकित्साओं के दृष्टिकोण से एकदम भिन्न है (गोलमैन. डी. 1977) 

मन का अभिधम्म मॉडेलः 
 मानसिक क्रिया का नमूना मोटे तौर पर 'वस्तु संबंध' का सिद्धांत है, इसकी मूल गतिशीलता संवेदी वस्तुओं के साथ मानसिक अवस्थाओं का नित नवीन सबंध होना है। पांच इन्द्रियां अपने-अपने विषयों को जैसे रूप, शब्द आदि जानती हैं और छठे इन्द्रिय धर्म को जानती है। मानसिक अवस्थाएं या चित्त सतत परिवर्तनशील है।
इस विश्लेषण में मानसिक अवस्था की सबसे छोटी इकाई चित्तक्षण का जो बोध या ज्ञान का क्षण है परिवर्तन दर अविश्वनीय रूप से तेज है, इतनी तेज कि जितनी देर में बिजली कौंधे, उतनी देर में वह दस लाख बार उत्पन्न होती है।
हर एक के बाद दूसरा उत्पन्न होने वाला चित्त कछ विशेष गुणों से बना होता है। चित्त में चैतसिक होते हैं जो उसे सुस्पष्ट प्रत्यक्षज्ञानात्मक लक्षण प्रदान करते हैं। इन गुणों की 52 मूल संज्ञानात्मक और भावात्मक श्रेणियां हैं (नारद थेर, 1968) चैतसिकों को मूलतः कुशल और अकुशल दो भागों में बाँटा जाता है। ठीक जैसे सिस्टेमिक डिसेन्सीटाईजेशन में, जहां तनाव इसके शारीरिक प्रतिपक्ष विश्राम द्वारा दूर किया जाता है, स्वस्थ स्थितियां अस्वस्थ स्थितियों की विरोधी हैं और उन्हें रोकती हैं। विपश्यना का उद्देश्य अस्वस्थ गुणों को, विकारों को मन से निर्मूल करना है। मानसिक स्वास्थ्य की ऑपरेशनल परिभाषा उनका सर्वथा अभाव होना है, जैसा अर्हत में होता है (गोलमैन. डी. 1977) (इसकी) 

प्रक्रिया तथा मनोवैज्ञानिक प्रभावः
“जो भी धर्म मन में उत्पन्न होता है उसके साथ-साथ शरीर में संवेदना होती है।” बुद्ध ने कहा वेदना समोसरणा सब्बेधम्मा | मन और शरीर का यह संबंध ही विपश्यना साधना के अभ्यास की कुंजी है। विपश्यना एकाग्र मन को प्रशिक्षित करती है ताकि वह निरपेक्ष भाव से अर्थात उपेक्षा भाव से शरीर पर होने वाली संवेदनाओं का आधार लेकर मेंटल प्रोसेसिंग मेकेनिक्स का अनुगमन करे। किसी दर्शक का यह परिप्रेक्ष्य मन में अतीत तथा भविष्य में होने वाले धर्म जैसे राग और द्वेष को नियंत्रित मुक्ति की अनुमति देता है जो स्मृति 'इच्छा' विचार, वार्तालाप, दृश्य, इच्छाएं भय तथा आसक्ति के अंतहीन प्रवाह के रूप में प्रकट होते हैं। मन के धरातल पर हजारों हजार हर प्रकार के राग द्वारा प्रेरित दृश्य उभरते हैं और बिना प्रतिक्रिया जगाये समाप्त हो जाते हैं और साथ ही उस व्यक्ति को वर्तमान की सच्चाई में स्थिर किये रहते हैं। (फ्लेशमेन. पी. डी. 1986)

ध्यान मन की कंडीशनिंग क्रिया को बदल करके डीकंडीशन करता है ताकि यह भविष्य के कर्मों का प्रधान निर्धारक नहीं हो (गोलमैन डी. 1977)

स्मृति का परिष्करण होता है और जीवन में जो भी स्थितियां आती हैं उनका जान-बूझ कर सामना किया जाता है। इस तरह जो सीमाएं हैं और जो परिस्थितियों की प्रतिक्रिया करके बनी थीं, उनसे मुक्त होता है। जीवन में अधिक मात्रा में जागरूकता आती है, सच्चाई को जानने लगता है तथा माया को दूर करता है। आत्म संयम और शांति बढ़ जाती है (फ्लेशमेन पी. 1986) ऐसा व्यक्ति शीघ्र निर्णय लेने के योग्य बनता है वह निर्णय जो ठीक और सही होगा और वह संगठित प्रयत्न कर सकता है जो मानसिक योग्यताओं को बढ़ा आधुनिक जीवन में सफलता प्राप्त करने में सहायता करेगी। 

विपश्यना, स्वास्थ्य और डॉक्टरः अनुसंधान पुनर्विलोकनः
बहुत से आंकड़े (डाटा) प्राप्त हैं, जिनसे प्रमाणित हो जाता है कि विपश्यना ध्यान के अभ्यास से बहुत प्रकार के जैव मनोसामाजिक लाभ मिलते हैं। इससे विपश्यना की चिकित्सकीय अंतःशक्ति कितनी है- इसका भी पता चलता है। उदाहरणार्थ बहुत से रोगियों की रिपोर्टों का अध्ययन किया गया है जो विपश्यना के सकारात्मक प्रभावों को बताते हैं। ये परिणाम विभिन्न क्षेत्रों में पाये जाते हैं जैसे मनोकायिक रोगों में जैसे- पुराना दर्द, सर दर्द, उच्च रक्तचाप, पेपटिक अल्सर, सरदर्द, bronchial asthma (श्वसनी दमा), खाज आदि और ऐसा ही भिन्न-भिन्न मानसिक रोगों में जैसे शराब पीने की आदत या नशे की गोली संवेदन भेदक दवाओं का आदी। इसका अच्छा प्रभाव मानसिक रोगों पर भी पड़ता है जिसमें शराब तथा ड्रग के आदी लोग सम्मिलित हैं। विपस्सना का अच्छा प्रभाव विशेष समूहों में भी देखा गया जैसे- विद्यार्थी, कैदी, पुलिस विभाग के कर्मचारी और वैसे व्यक्ति जो पुराने दर्द तथा अन्य मानसिक रोगों से पीड़ित हैं—

जो भी हो, रोग से मुक्ति नहीं, बल्कि मानवीय दुःख का आवश्यक उपचार हो- यही विपश्यना का उद्देश्य है। दुःख का स्रोत है अविद्या अर्थात अपने सच्चे स्वभाव को न जानना। प्रज्ञा- आनुभूतिक स्तर पर सच्चाई का ज्ञान ही किसी को मुक्त कर सकती है (फ्लेशमेन पी. 1997) 'स्वयं को जानो'- सभी ज्ञानी जनों ने कहा है। विपश्यना अपने मन और शरीर की सच्चाई को जानने का एक व्यावहारिक रास्ता है।

काया तथा मन में गहरी दबी उन समस्यायों का पता लगाने तथा उनसे मुक्त होने की जो अप्रयुक्त अन्तःशक्ति है, उसको विकसित करना है एवं अपने लिए तथा अन्यों के लिए इसको उचित माध्यम बनाना ही विपश्यना है।

उपचार की आवश्यकता सबको है, सबसे अधिक आवश्यकता तो स्वयं डॉक्टरों को है। 'डॉ. अपना उपचार आप करो'- यह एक प्रसिद्ध कहावत है। फ्रायड एवं जुंग ने इस बात पर जोर दिया था कि विश्लेषण करने वाले को अपना विश्लेषण स्वयं करना चाहिए। जो कोमलता और करुणा किसी उपचार करने वाले को जीवन पर्यंत उपचार करने के पथ पर लाती है, जिसका मानवीय दुःखों से सतत पाला पड़ता है, वे उसे अपना इलाज करने को आवश्यक बनाती है। विपश्यना विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों को स्वीकार्य है तथा प्रासंगिक है क्योंकि यह हठधर्मिता से मुक्त है, अनुभव पर आधारित है, इसका केंद्र बिन्दु मानवीय दु:ख तथा इससे छुटकारा पाना है। इसके अभ्यास से, चिकित्सक अपनी स्वायत्तता तथा आत्मज्ञान को बढ़ाते हैं, साथ ही साथ वे अन्यों के लिए उनके जीवन के शोरगुल में उनकी योग्यता की वृद्धि करने में सहारा बनते हैं। विपश्यना वस्तुतः सभी प्रकार के उपचारों जिनमें आत्मोपचार तथा अन्य उपचार भी शामिल हैं, का मार्ग है (फ्लेशमेन 1991)

हम लोग पाते हैं कि अधिकतर आनुभविक शोध का संबंध इस बात को देखना है कि स्वतः नियामक योजना के रूप में विपश्यना ध्यान शारीरिक तथा आचरणिक उपायों के प्रयोग से संबंधित है।
विपश्यना के चिर प्रतिष्ठित परिप्रेक्ष्य पर भी ध्यान देना आवश्यक है जो ध्यान द्वारा चित्त की बदली हुयी अवस्थाओं की घटना क्रिया का वैज्ञानिक पहलू है।

रोगविषयक प्रयोग के लिए नमूनाः
विपश्यना ध्यान की रोग विषयक उपयोगिता अधिकांशत: इस बात से संबंधित है कि वह किसी विशेष समस्या का समाधान न होकर सकारात्मक मानसिक अवस्थाएं विकसित करने के लिए साधारण मनोवैज्ञानिक ढांचा का प्रबंध करे। साधारणतया परंपरागत मनश्चिकित्साओं का सहारा किसी विशेष समस्या को दूर करने के लिए लिया जाता है। फिर भी लेखक एक संज्ञानात्मक (कॉगनिटिव) चिकित्सकीय प्रविधि का प्रयोग कर रहा है जो विपश्यना ध्यान से व्युत्पन्न है और जो अनुपूरक चिकित्सा के रूप में काम में लाया जाता है। लेखक ने तनाव प्रबंधन तथा भय और फोबिया को कम करने में इसे प्रभावी पाया है। 

यह ध्यातव्य है कि चिकित्सक को विपश्यना ध्यान विधि से पूर्ण परिचित होना चाहिए और उसे स्वयं एक परिपक्व साधक होना चाहिए। विपश्यना की भाषा में कहें तो रोगी आनापान का अभ्यास करता है जबकि डॉक्टर मेत्ता ध्यान करता है।
औपचारिक चिकित्सा प्रारंभ करने के पूर्व चिकित्सक रोगी को विपश्यना के संभावित लाभ के बारे में विशेषकर विश्राम के बारे में बताता है। इससे यह होता है कि रोगी का भय कम हो जाता है और यह उसे उपचार में सक्रियता से भाग लेने तथा चिकित्सक को सहयोग देने के योग्य बनाता है। इसके अतिरिक्त इस बात को सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि विश्राम के लिए जो भौतिक वातावरण चाहिए वह वहां मिले अर्थात विपश्यना केंद्र पर जैसा वातावरण मिले, उसका कमरा भी शांत हो, आने-जाने वाले लोग कम हों और रोगी का विछावन पर्याप्त आरामदायक होना चाहिए।

रोगी को आराम से विछावन पर लेट जाने के लिए कहा जाता है, आंख मूंद कर आने-जाने वाली सास को ऊपर वाले ओठ के ऊपर और नासिका के नीचे छोटे से स्थान पर एकाग्रचित्त हो देखने के लिए कहा जाता है। सांस जैसी है उसी को देखना है, अंदर आती हुई सांस को. बाहर जाती सांस को। गहरी सांस हो या उथली, तेज सांस हो या धीमा; स्वाभाविक सांस को, सिर्फ सांस को देखने को कहा जाता है। जब उसका मन भागता है, उसे कहा जाता है कि वह फिर से उसी स्थान पर आती-जाती सांस को बार-बार देखे, बिना इस बात पर पश्चात्ताप किये कि उसका मन भाग गया था। मन भाग गया- इस बात से न तो वह घबड़ाये और न ही परेशान हो। 

दो बातें घटती हैं- पहली उसका मन आतीजाती सांस पर एकाग्र हो जाता है और दूसरी वह इस बात से अवगत हो जाता है कि मानसिक अवस्था और सांस में संबंध है। मन में चाहे कुछ भी हो- क्रोध, घृणा, भय, राग आदि । सांस की जो प्राकृतिक गति है वह इनमें से किसी के होने पर अस्वाभाविक हो जाती है। वह तब सिर्फ अपने को पर्यवेक्षण करते हुए जागरूक रहता है, स्मृतिमान, सावधान और तटस्थ रहता है। 

रोगी को स्वयं इस विधि का अभ्यास करने के लिए कहा जाता है, कम से कम दो बार दिन में सुबह और शाम कम से कम 30 मिनट के लिए। चिकित्सक रोगी को समय-समय पर जांच करता है और साथ ही साथ सलाह भी देता है और दसदिवसीय विपश्यना शिविर में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है। रोगी को इस प्रकार उत्साहित किया जाता है, अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने को कहा जाता है और इस तरह उसको यह बताया जाता है कि वह स्वयं अपने स्वास्थ्य तथा अपने कल्याण के लिए जिम्मेवार बने।

उपसंहारः
मेरा यह दावा है कि यह विधि उपचार के समय को कम करती है और यह रोगी को समाज का अच्छी तरह से सामना करने के लिए एक पैटर्न ऑफ जेनरल स्ट्रेस रिस्पॉन्सॅबिलिटि देती है जो स्पेसीफिक ऑभर लर्नेड मेलएडेप्टिम रेसपोन्सेज को उत्पन्न करने की संभावना कम करती है चाहे वह प्रतिक्रिया मनोवैज्ञानिक हो या शारीरिक । इसके अतिरिक्त रोगी की आंतरिक अवस्था में परिवर्तन होता है जिससे उसका ध्यान केंद्रित होता है, उसकी बोधात्मक और प्रेरक प्रणाली आदर्श रूप में कार्य करती है और उसकी चिंता कम हो जाती है। इसके बावजूद यह होता है कि उसे बाह्य वातावरण से परिवर्तन होते रहने वाली मांग आती हैं, और यह वह करता है आत्म नियंत्रण से तथा विपश्यना ध्यान से आंतरिक क्षमता को विकसित करके।
अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियों को रोकने तथा ठकि करने में इस विधि के महत्त्व तथा इसकी सीमा को अध्ययन करने में सोफिस्टिकेटेड एक्सपेरीमेन्टल डिजायन्स से मल्टिसेंटर्ड क्लिनिकल परीक्षण हमें सहायता करेगा। इस बात को भी यहां स्पष्ट करना चाहिए कि कौन रोगी किस क्लिनिकल प्रोब्लम वाला विपश्यना ध्यान से लाभान्वित होगा, विपश्यना ध्यान जो उसके च्वायस की विधि है विस-एविस अन्य सेल्फ रेगुलेशन स्ट्रेटेजी उदाहरण स्वरूप वायोफीड बेक, हिप्नोसिस, प्रोग्रेसिभ रिलेक्सेसन आदि।

*The Role of Vipassana in Psychiatric Practice*
*Ref: U Ba Khin Journal*
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Saturday, July 22, 2023

अनाथपिण्डिक की कथा

बुद्ध - धर्म - संघ शरण सर्वोपरि सर्वोच्च शरण

[अनाथपिण्डिक की कथा। धम्मपद गाथा 119 और 120].

अनाथपिण्डिक ने केवल विहार बनवाने के लिए ही चौवन करोड़ धन, बुद्धशासन के निमित्त त्याग दिया-बिखेर दिया। वह तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म, संघ) को रत्न समझ, और किसी (रत्न) को रत्न ही न समझ, शास्ता के जेतवन में विहार करने के समय, प्रतिदिन तीन बार दर्शनार्थ जाता था। एक बार प्रातःकाल ही जाता, दूसरी बार जलपान करके जाता, तीसरी बार शाम को जाता।

और भी बीच बीच में जाता ही था। जाते समय 'श्रामणेर' वा अन्य बच्चे मेरे हाथ की ओर देखेंगे कि क्या ले कर आया है' सोच वह कभी खाली हाथ नहीं गया। प्रातःकाल जाते समय यवागु लिवा कर जाता, जलपान करके जाते समय घी, मक्खन, मधु, गुड़ आदि और शाम को जाते समय गन्ध, माला, वस्त्र आदि ले कर जाता। इस प्रकार प्रतिदिन परित्याग करते करते इसने कितना परित्याग किया, इसका (कोई) माप नहीं। बहुत से व्यापारियों ने भी, हाथ की लिखित देकर इससे अट्ठारह करोड़ धन ऋण लिया था। महासेट्ठी उनसे वह धन नहीं मंगवाता था और भी, इसका कुलायत अट्ठारह करोड़ धन नदी के किनारे गाड़ा हुआ था। जल-वायु से नदी के कूल के टूटने से वह समुद्र में बह गया। वहाँ वे लोहे की गागरें, जैसी की तैसी मुहर लगी हुई, समुद्र में बहती घूमती थीं और, इसके घर में पांच सौ भिक्षुओं को नित्यभात बँधा ही था। सेठ का घर भिक्षुसंघ के लिए चौरस्ते पर खोदी गई पुष्करणी की तरह था। वह सब भिक्षुओं के लिए माता-पिता तुल्य था। सो, उसके घर, सम्यक सम्बुद्ध भी जाते, अस्सी महास्थविर भी जाते, शेष जाने वाले भिक्षुओं की तो गणना ही नहीं थी। 

वह घर सात तल्लों का और सात ड्योढ़ियों वाला था। उसकी चौथी ड्योढ़ी में एक मिथ्या-धारणा वाली देवी रहती थी। सम्यक सम्बुद्ध के घर में प्रवेश करते समय वह अपने विमान पर बैठी न रह सकती थी। बच्चों को साथ ले उतर कर, वह जमीन पर खड़ी होती। अस्सी महास्थविर तथा अन्य स्थविरों के भी प्रविष्ट होते तथा निकलते समय उसे वैसा ही करना पड़ता। उसने सोचा : जब तक श्रमण गौतम, अथवा उसके श्रावक इस घर में आते-जाते रहेंगे, तब तक मुझे सुख नहीं। मैं नित्य-प्रति उतर उतर कर जमीन पर नहीं खड़ी हो सकती, सो मुझे ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए, जिसमें ये लोग इस घर में प्रवेश न करें।

सो एक दिन वह लेटे हुए महाकर्मचारी के पास जाकर, अपना प्रकाश फैला कर खड़ी हो गई। “यहाँ कौन है ?" पूछने पर उत्तर दिया, "मैं चौथी ड्योढ़ी में रहने वाली देवी हूँ।"
"किस लिए आई है ?"
"क्या तुम सेठ की करनी को नहीं देखते? वह अपने भविष्य का कुछ भी विचार न कर, धन ले जा कर, केवल श्रमण गौतम की पूजा करता है। धन को न व्यापार में लगाता है, न कर्मान्त (खेती) में। तुम सेठ को उपदेश दो, जिससे वह अपने काम में लगें; जिससे श्रावकों सहित श्रमण गौतम, इस घर में प्रवेश न किया करें।"
उस महाकर्मचारी ने उत्तर दिया-"मूर्ख देवी! सेठ जो धन खर्च करता है, वह कल्याणकारी बुद्ध-शासन के लिए खर्च करता है। यदि वह मेरी चोटी पकड़ कर मुझे बेच भी देगा, तो भी मैं कुछ न कहूंगा। तू जा।"

इसी तरह, एक दिन, उसने सेठ के पुत्र को जाकर उपदेश दिया। सेठ के पुत्र ने भी उसे पूर्वोक्त प्रकार से झाड़ लगाई। सेठ को तो वह जाकर, कुछ कह ही न सकती थी।

सेठ के निरन्तर दान देते रहने से, व्यापार न करने के कारण आमदनी कम हो जाने से, धन में बहुत न्यूनता आ गई और ऐसे ही क्रम से होते रहने से, उसके दरिद्र हो जाने पर, उसके पहनने के वस्त्र, बिस्तर, भोजन आदि भी पूर्वसदृश न रहे। ऐसा होने पर भी, वह भिक्षुसंघ को दान देता, लेकिन हां, अब प्रणीत आहार न दे सकता। एक दिन वन्दना करके बैठे उसे, शास्ता ने पूछा "गृहपति! तुम्हारे घर से दान दिया जाता है?"
“भन्ते! दिया जाता है, लेकिन वह होता है (केवल) कणी का चावल और मट्ठा।"
गृहपति! 'मैं रूखा-सूखा दान दे रहा हूँ' सोच संकुचित न हो, प्रसन्न (पवित्र) चित्त से बुद्धों, प्रत्येक-बुद्धों तथा बुद्ध-श्रावकों को दिया हुआ दान रूखा-सूखा दान नहीं होता, क्यों? (उसका) बड़ा फल होने से। चित्त प्रसन्न (पवित्र) रख सकने वाले का दान 'रूखा-सूखा-दान' नहीं होता- यह इस प्रकार जानना चाहिए :-----

नत्थि चित्तै पसन्नम्हि अप्पिका नाम दक्षिणा,
 तथागते वा सम्बुद्ध अथवा तस्स सावके। 
न किरत्थि अनोमदस्सिसु पारिचरिया बुढेसु अप्पिका,
सुखाय अलोणिकाय च पस्त फलं कुम्मासपिण्डिया॥ 

[चित्त प्रसन्न हो तो तथागत सम्यक सम्बुद्ध अथवा उसके श्रावक को दी गई दक्षिणा थोड़ी नहीं होती और न ही अनोमदर्शी आदि बुद्धों की, की हुई सेवा (परिचरिया) “थोड़ी" होती है। सूखे, अलूणे, कुल्माश-पिण्ड के (ही दान के) फल को देख।]

उसे और भी कहा कि हे गृहपति! तू अपना 'रूखा-सूखा' दान देता हुआ ही आठ आर्य पुद्गलों को दे रहा है। लेकिन वेलाम ब्राह्मण के जन्म में उत्पन्न होने के समय, सारे जम्बुद्वीप के हलों को रुकवा कर सात रत्न देते हुए, पांच महानदियों को एक साथ, एक प्रवाह करने की तरह (चित्त को प्रसन्नता से भरकर) महादान देने के समय, कोई त्रिशरण-गत वा पञ्च-शील रक्षक (सदाचारी) न मिला। इस प्रकार दान का अधिकारी पुद्गल मिलना भी दुर्लभ है। सो "मेरा दान रूखा-सूखा है" समझ, तू संकुचित मत हो। यह कह वेलामसूत्र कहा।

सो वह देवी यद्यपि पहले सेठ के साथ बात भी न कर सकती थी, तो भी अब सेठ के दुर्गति-प्राप्त होने से, 'शायद वह मेरी बात मान ले' सोच, आधी रात के समय, सेठ के शयनागार में प्रविष्ट हो, अपना प्रकाश फैला आकाश में खड़ी हुई।
सेठ ने उसे देख कर पूछा-"यह कौन है ?" 
“सेठ ! मैं चौथी ड्योढ़ी में रहने वाली देवी।" 
"किस लिए आई है ?" 
"तुझे नेक-सलाह देने की इच्छा से।"

"बड़े सेठ! तू भविष्य की चिन्ता नहीं करता। बेटे-बेटी की ओर नहीं देखता। तूने श्रमण गौतम के शासन के लिए बहुत धन खर्च कर दिया। सो, तू चिरकाल तक धन खर्च करते रहने से तथा (खेती आदि) नवीन कर्मान्तों के न करने से, श्रमण गौतम के कारण निर्धन हो गया। ऐसा होने पर भी तू श्रमण गौतम का पीछा नहीं छोड़ता। आज भी श्रमण तेरे घर में आते ही हैं। जो कुछ वह ले गये, सो अब वापिस नहीं मंगवाया जा सकता; वह ले जायें। लेकिन अब से, तू श्रमण गौतम के पास जाना और उसके श्रावकों को इस घर में आने देना-बन्द कर दे। (चलते चलते जरा) रुक कर भी, श्रमण गौतम को बिना देखे, अपने व्यापार और वाणिज्य को करते हुए, कुटुम्ब को पाल।"

उसने उसे पूछा-"जो नेक-सलाह तू मुझे देना चाहती है, वह यही है?" 
"हाँ! यही है।"
"तुझ जैसे सौ हज़ार और लाख देवताओं के उपदेश से भी मैं हिलने वाला नहीं। दस-बलधारी के प्रति मेरी श्रद्धा सुमेरु पर्वत की तरह अचल है, सुप्रतिष्ठित है। मैंने कल्याणकारी त्रिरत्न-शासन के लिए जो धन खर्च किया है, उसे तूने 'अनुचित' कहा। तूने बुद्ध-शासन को दोष दिया। इस प्रकार की अनाचारिणी, दुश्शीला और मनहूस के साथ मैं एक घर में नहीं रह सकता। निकल, मेरे घर से, शीघ्र निकल और किसी दूसरी जगह जा।" 

श्रोतापन्न, आर्य-श्रावक अनाथपिण्डिक की बात सुन कर, न ठहर सकने के कारण, वह अपने निवास स्थान पर गई और बच्चों को हाथ से पकड़े हुए, वहाँ से निकल आई। लेकिन निकल कर, अन्य निवास स्थान न मिलने के कारण, 'सेठ से क्षमा मांग, वहीं रहूंगी' सोच, नगर-रक्षक देवपुत्र के पास जा, उसे प्रणाम कर, खड़ी हुई।
"किस लिए आई?' पूछने पर, वह बोली-"स्वामी ! मैंने बिना सोचे समझे, सेठ को (कुछ) कह दिया। उसने क्रुद्ध हो, मुझे निवास स्थान से निकाल दिया। सेठ के पास ले जा, उससे क्षमा दिलवा मुझे रहने के लिए स्थान दिलवाइए।"
“तूने सेठ को क्या कहा ?"
"स्वामी ! मैंने सेठ को कहा कि अब से बुद्ध-उपस्थान (सेवा), संघ-उपस्थान मत करो। श्रमण गौतम को घर में मत आने दो।"
“तूने अनुचित कहा। बुद्धशासन की निन्दा की। मैं तुझे लेकर सेठ के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सकता।" 

वह, उससे कुछ सहायता न पा, चारों महाराजाओं के पास गई। उनसे भी वैसा ही इन्कार मिलने पर शक्र देवेन्द्र के पास जा, वह हाल कह, बड़ी नम्रता से याचना करने लगी-“हे देव! निवास स्थान न मिलने से, मैं बच्चों को हाथ से पकड़े पकड़े, अशरणा हो घूमती हूँ। अपनी कृपा से, मुझे निवास स्थान दिलवाइये।"
उसने भी कहा-"तूने अनुचित किया जो बुद्ध-शासन की निन्दा की! मैं भी तेरे पक्ष में सेठ के साथ बातचीत तो नहीं कर सकता; लेकिन एक ऐसा उपाय बताता हूँ कि जिससे सेठ क्षमा कर दे।"
"अच्छा ! देव! कहें।" 

“मनुष्यों ने तमस्सुक देकर सेठ के हाथ से अट्ठारह करोड़ की संख्या में धन लिया है। तू सेठ के मुनीम का भेष बना, किसी को बिना जनाये, उन लेखों को ले, कुछ यक्ष तरुणों के साथ, एक हाथ में लेख और एक हाथ में कलम लेकर, उन पुरुषों के घर जा; और घर के बीच में खड़ी हो, अपने यक्ष-बल (आनुभाव) से उन्हें डरा, 'यह तुम्हारे लेख हैं। हमारे सेठ ने अपने ऐश्वर्य के समय में तुम्हें कुछ नहीं कहा, लेकिन अब वह निर्धन (दुर्गति-प्राप्त) हो गया है। तुमने जो कार्षापण लिए हैं सो दो' कह अपनी यक्षपन की सामर्थ्य दिखा कर, वह सब अट्ठारह करोड़ सोना वसूलकर सेठ के खाली कोठे को भर। दूसरे अचिरवती नदी के किनारे गड़ा धन, नदी-कूल के टूट जाने से समुद्र में बह गया है, उसे भी अपने सामर्थ्य से लाकर, खाली कोठे भर। और भी, अमुक स्थान पर बिना स्वामी का अट्ठारह ही करोड़ धन है, उसे भी ला कर खाली कोठे भर। इस चौवन करोड़ धन से इन खाली कोठों को भरने से दण्ड-कर्म कर के, महासेठ से क्षमा मांगना।"
वह 'देव! अच्छा' कह, उसके कथन को स्वीकार कर, तदनुसार सब धन लाकर, आधी रात के समय, सेठ के शयनागार में प्रविष्ट हो, अपना प्रकाश फैला, आकाश में खड़ी हुई। 

 “यह कौन है ?" पूछने पर बोली-“सेठ जी! मैं तुम्हारी चौथी ड्योढ़ी में रहने वाली अंधी-मूर्ख देवी हूँ। मैंने अपनी महामोह भरी मूढ़ता के कारण, बुद्धगुणों को न जानकर, पिछले दिनों में आपसे जो कुछ कहा, मेरे उस दोष को क्षमा करें। मैने देवेन्द्र शक्र के कथनानुसार आपका ऋण वसूलकर अट्ठारह करोड़; समुद्र में बहा हुआ अट्ठारह करोड़, जिस किसी स्थान में बिना स्वामी का अट्ठारह करोड़;-इस प्रकार चौवन करोड़ लाकर, खाली कोठों को भरने से, दण्ड चुका दिया; जेतवन विहार के निर्माण में जितना धन खर्च हुआ, उतना एकत्र कर दिया. निवास-स्थान न मिलने से मैं कष्ट पा रही हूँ। सेठ जी! मैंने अज्ञान से जो भूल कर दी, उसे क्षमा करें।"

अनाथपिण्डिक ने, उसकी बात सुन, यह कहती है-'मैंने दण्ड भुगत लिया, और अपने दोष को स्वीकार करती हूँ' सोच विचार किया कि इसे सम्यक सम्बुद्ध के पास ले चलना चाहिए; इसका विचार कर तथागत अपने गुणों को जनायेंगे। सो उसे कहा, “अम्म ! देवी ! यदि तू मुझसे क्षमा प्रार्थना करना चाहती है, तो शास्ता के सम्मुख क्षमा-प्रार्थना करना।"

"अच्छा! ऐसा करूँगी; लेकिन मुझे शास्ता के पास ले चलना।" उसने 'अच्छा' कह, रात्रि समाप्त होने पर प्रातःकाल ही उसे ले, शास्ता के पास जा, शास्ता को उसका सब किया-कराया कह सुनाया। शास्ता ने कहा:---

 “हे गृहपति! जब तक पाप-कर्म करने वाले का पाप पकता नहीं है, तब तक वह सुख भोगता है, लेकिन जब उसका पाप-कर्म पकता है (फल देता है), तब से वह दुःख ही दुःख भोगता है। इसी प्रकार जब तक पुण्य-कर्म करने वाले का पुण्य पकता नहीं, तब तक वह दुःख भोगता है, लेकिन जब उसका पुण्य-कर्म पकता है, तब से वह सुख ही सुख भोगता है." 

कह, धम्मपद की इन दो गाथाओं को कहा :----

119. पापोपि पस्सति भद्रं, याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं, अथ पापो पापानि पस्सति।
120. भद्रोपि पस्सति पापं, याव भद्रं न पच्चति।
यदा च पच्चति भद्रं, अथ भद्रो भद्रानि पस्सति।

अर्थ:-------
119. पापी भी पाप को तब तक अच्छा ही समझता है जब तक पाप का विपाक (पाप का फल देना) नहीं होता और जब पाप का विपाक होता है, तब पापी पापों को देखने लगता है।
120. भद्र (पुण्य करने वाला व्यक्ति) भी तब तक पाप को देखता है जब तक पुण्य का विपाक नहीं होता. जब पुण्य का परिपाक होता है, तब वह भद्र व्यक्ति पुण्यों को देखने लगता है।

इन गाथाओं के कहे जाने के अन्त में, वह देवी श्रोतापत्ति-फल में प्रतिष्ठित हुई। उसने शास्ता के चक्रांकित चरणों में गिर कर कहा-“भन्ते ! मैंने राग में अनुरक्त हो, द्वेष ( क्रोध) से दूषित हो, मोह से मूढ़ हो, अविद्या से अंधी हो, आपके गुणों को न जानने के कारण अपशब्दों का प्रयोग किया, सो आप मुझे क्षमा करें।" शास्ता से क्षमा मांग, उसने सेठ से क्षमा माँगी।

उस समय अनाथपिण्डिक ने शास्ता के सम्मुख अपना गुण वर्णन किया। "भन्ते ! यह देवी 'बुद्ध-सेवा आदि मत कर' (कह) मना करने पर भी, मुझे रोक नहीं सकी, 'दान नहीं देना चाहिए' कह रोकने पर भी, मैंने दान दिया ही। भन्ते! क्या यह मेरा गुण नहीं?" 
 
शास्ता ने, “हे गृहपति ! तू श्रोतापन्न आर्य-श्रावक है, अचल श्रद्धा वाला है, विशुद्ध-दृष्टि है; यदि यह अल्प-शाक्य देवी तुझे दान देने से रोकने पर भी, नहीं रोक सकी, तो यह आश्चर्य की बात नहीं। आश्चर्य तो यह है कि बुद्ध के अनुत्पन्न हुए रहने पर भी, उनके ज्ञान के अपरिपक्व रहने पर भी, पूर्व समय में पण्डितों ने, कामावचर लोक के स्वामी 'मार' के आकाश में खड़े होकर यदि इस प्रत्येक-बुद्ध दान दोगे तो इस नरक में पकोगे कहते हुए अस्सी हाथ गहरा अंगारों का ढे़र दिखाकर 'दान मत दो' मना करने पर भी, पद्म की कलि के बीच में खड़े होकर प्रत्येक-बुद्ध को दान दिया। यह कह, अनाथपिण्डिक के याचना करने पर पूर्वजन्म की कथा खदिर-अंगार जातक कही।

खदिर-अंगार जातक
https://www.palikanon.com/english/pali_names/ku/khadirangaara_jat_40.htm

Thursday, July 20, 2023

लोक-भ्रांति - " सत्यनारायण गोयन्का"

लोक-भ्रांति  - " सत्यनारायण गोयन्का"
आर्यभट्ट और पाइथागोरस ने अपने-अपने वैज्ञानिक शोध द्वारा जानकर जब यह घोषित किया कि पृथ्वी चपटी नहीं बल्कि गोल है, तब अनेक लोगों ने उन पर मूर्खता के लांछन लगाये होंगे, यह कहते हुए कि आंखों के सामने पृथ्वी दूर-दूर तक चपटी ही स्पष्ट दिखती है। इसे गोल कैसे मान लें!

इसी प्रकार जब गेलीलियो ने यह कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और इसी के कारण हमें यह भ्रम होता है कि सूरज और चंद्रमा पूर्व में उगते हैं और पश्चिम में अस्त होते हैं। तब इस सच्चाई को भी सुन कर उस समय के कई लोगों ने उसकी हँसी उड़ाई होगी कि हम सूरज और चांद को प्रत्यक्ष पूर्व में उगते और पश्चिम में डूबते देखते हैं। ये दोनों ही पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं तब हम यह कैसे मान लें कि सूरज नहीं घूमते बल्कि पृथ्वी घूमती है। परंतु कुछ समय पश्चात अन्य वैज्ञानिकों ने भी अनुसंधान द्वारा इन सच्चाइयों को जाना  स्वीकार किया। इस कारण समय बीतते-बीतते अनेक लोगों द्वारा भी इसे स्वीकार किया जाने लगा।

फिर भी उस समय के और आज के भी कुछ लोगों के मन में यह भ्रांति है ही कि सूरज और चांद किसी सर्वशक्तिमान की आज्ञा के आधार पर उदय-अस्त होते हैं। मुझे स्मरण है कि छोटी उम्र में मैं भी ईश्वरभक्ति का एक गीत गाया करता था जिसमें यह पद था -- ‘सूरज व चांद घूमते किसके आधार हैं?" यानी उन दिनों मैं भी यही समझता था कि परमपिता परमात्मा की कृपा के आधार पर ही ये घूमते हैं।

अनेक वैज्ञानिकों की शोध के द्वारा यह सत्य पुष्ट होता गया कि सूरज और चांद नहीं घूमते बल्कि पृथ्वी ही अपनी धुरी पर घूमती रहती है। तब अधिकांश लोगों के मन से यह भ्रांति दूर होने पर भी कुछ तो ऐसे थे ही और आज भी हैं ही जो इस वैज्ञानिक शोध की सच्चाई को नहीं स्वीकारते और सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा की इच्छा के आधार को ही स्वीकारते रहते हैं।

इसी प्रकार न्यूटन ने यह वैज्ञानिक शोध की कि प्रकृति में ऐसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति है जो एक-दूसरे ग्रह को अपनी ओर खींचती है। इसे भी तब अनेक लोगों ने स्वीकार नहीं किया। लेकिन समय बीतते-बीतते यह वैज्ञानिक सच्चाई भी लोगों की समझ में आने लगी और तब स्वीकार की गई। । ठीक इसी प्रकार अध्यात्म जगत के सर्वोच्च वैज्ञानिक तपस्वी सिद्धार्थ गौतम ने जब प्रकृति की यह सच्चाई ढूंढ निकाली कि वह स्वयं ही अपने पुरुषार्थ से मुक्त हुए, किसी अन्य के द्वारा उन्हें मुक्ति नहीं मिली। उन्होंने अपने द्वारा मुक्ति की खोज की तो उसका विवरण इन शब्दों में प्रकट किया – 

''अनेकजातिसंसारं संधाविस्सं अनिब्बिसं' यानी मैं अनेक जन्म-जन्मांतरों तक इस सच्चाई की खोज करता हुआ संसार-चक्र में बिना रुके दौड़ लगाता ही रहा । खोज यही थी कि मृत्यु के बाद पुनः जन्म देकर जो हमारे लिए नई देह का नया घर बनाता है, वह कौन है? उस घर बनाने वाले की गवेषणा में ही बार-बार दुःखमय जन्म लेता गया, इसीलिए कहा—

"गहकारं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं''। इस बार-बार जन्म लेने और उसके लिए नया-नया देहरूपी घर बनाने वाला आखिर वह ईश्वर है कौन? खोज करते-करते यह जान लिया कि कोई ईश्वर नहीं है। हम स्वयं ही हैं जो बार-बार नये जन्म लेकर देहरूपी नया गृह बनाते रहते हैं। इस खोज द्वारा यह सच्चाई स्पष्ट हुई कि जब तक मानस में अनेक जन्मों के कर्म-संस्कार संगृहीत हैं और हम तृष्णा द्वारा नये-नये संस्कार बनाते रहते हैं तब तक उनके कारण हमारा पुनर्जन्म होता रहता है। अतः यह स्पष्ट हुआ कि स्वयं हम ही बार-बार अपने लिए नया-नया जन्म और उसके लिए नया-नया घर बनाते रहते हैं। अन्य कोई घर बनाने वाला नहीं है। यह केवल एक मिथ्या, काल्पनिक मान्यता ही है। 

अपने अनुसंधान द्वारा इस अनजानी सच्चाई को लोगों के सामने रखते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि व्यक्ति स्वयं ही अपना मालिक है, उसके परे और कौन मालिक होगा भला! "अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परोसिया' । अनुसंधान की गयी इस सच्चाई को सुन कर लोगों को बहुत अटपटा लगा होगा।

जब अध्यात्म के इस सर्वोच्च वैज्ञानिक ने अपनी शोध द्वारा यह भी घोषित किया कि 'अत्ता हि अत्तनो नाथी, अत्ता हि अत्तनो गति" - तब तो समाज में भूकंप उठ खड़ा हुआ होगा। हमें सद्गति अथवा अधोगति प्रदान करने वाले तो ऊपर आकाश में बैठे हुए ईश्वर के प्रतिनिधि धर्मराज अथवा यमराज हैं। यह कैसी मान्यता है जो उनके अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारती और कहती है कि अपनी सद्गति या दुर्गति अथवा इन दोनों के परे जन्म-मरण की गतियों से सर्वथा मुक्ति का पुरुषार्थ स्वयं हमें ही करना होता है। अन्य किसी सर्वशक्तिमान की कृपा से यह नहीं होता। उस समय भी अनेक लोगों की यह मान्यता थी कि उस परमपिता परमात्मा का पूजन-अर्चन करके अथवा उसका नाम-स्मरण करके उसे प्रसन्न कर लेंगे तब वह हमें भव-सागर से तार देगा। कुछ लोग तब भी और अब भी, इस मान्यता को मान कर ही चलते हैं कि – 

“पुनरपि जन्मम्, पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननीजठरे शयनम्'' इस दुस्तर भव-संसार को पार । करने के लिए किसी परमात्मा की याचना करते हैं। इस जनमान्यता को भी परमोच्च वैज्ञानिक सम्यक सम्बुद्ध द्वारा निरर्थक बताये जाने पर लोगों को बहुत चोट लगी होगी । लेकिन सम्बुद्ध के इस कथन का आधार कोई कल्पना नहीं थी, बल्कि स्वानुभूति द्वारा शोध किये गये और जाने गये निसर्ग के नियमों की सच्चाई का ही उद्घाटन था, न कि इस प्रकार की घोषणा करके वे किसी नये संप्रदाय की स्थापना करना चाहते थे।

महान वैज्ञानिक तपस्वी सिद्धार्थ गौतम ने अपने अनुसंधान का वर्णन करते हुए कहा कि "पुब्बे अननुस्सुतेसु" -- मैंने वह सच्चाई ढूंढ निकाली जिसे पहले कभी सुनी ही नहीं थी। उसने अपने खोजे हुए मुक्ति के मार्ग पर स्वयं चल कर अपने सारे संचित कर्म-संस्कारों को भग्न कर लिया और नये संस्कार बनाने वाली तृष्णा का नितांत क्षय कर लिया। अब पुनर्जन्म कहां? न कोई पुराना कर्म-संस्कार बचा जो पुनर्जन्म दे सके और न ही कोई तृष्णा रही जो पुनर्जन्म के लिए नया संस्कार बनाये। दोनों को ही स्वयं नष्ट करके यह जान लिया कि अब मेरा पुनर्जन्म नहीं हो सकता और यह भी जान लिया कि पहले जो अनेक बार पुनर्जन्म होते रहे, वे भी मेरे ही अपने कर्म-संस्कारों के कारण हुए। व्यक्ति स्वयं अपनी नासमझी से तृष्णा के कारण नये-नये कर्म-संस्कार बनाता रहता है और इसलिए बार-बार जन्म लेता रहता है। अपने पूर्व संचित कर्म-संस्कारों को नष्ट कर दें और नये न बनने दें यानी ''खीणं पुराणं, नवं नत्थि सम्भवं" - तब पुनर्जन्म कैसे हो? इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर ही गौतम सम्यक सम्बुद्ध ने कहा- "अयं अन्तिमा जाति" -- यह मेरा अंतिम जन्म है। "नत्थि दानि पुनड्भवति"- अब पुनः जन्म नहीं होगा।

संभव है कि बुद्ध के द्वारा जानी और प्राप्त हुई इस सच्चाई की घोषणा को लोगों ने नहीं माना होगा। लेकिन सत्य तो सत्य है। सम्यक सम्बुद्ध ने प्रकृति के अटूट नियमों की सच्चाई प्रकाशित की जो कि अंध-मान्यता और अंधश्रद्धा से नितांत दूर थी। उस महान वैज्ञानिक की खोज की गई प्रकृति के नियमों की सच्चाइयों को अन्य लोग भी अपनी अनुभूति द्वारा जान लें, इसीलिए उन्होंने अष्टांगिक आर्य मार्ग पर पटिपत्ति यानी प्रतिपत्ति यानी प्रतिपादन करना सिखाया। इसी पटिपत्ति के अभ्यास के कारण पांच तपस्वी साथियों ने भी अरहंत यानी अरिहंत अवस्था प्राप्त की। अरिहंत उसे कहते हैं जिसने अपने सभी अरियों यानी अपने कर्म-संस्काररूपी दुश्मनों का हनन कर लिया । अरहंत होने पर उनके वे पांचों साथी भी इस अवस्था पर पहुँचे जहां पुनर्जन्म नहीं होता - ''नत्थि दानि पुनभवोति'। ऐसे ही अन्य पचपन लोगों को भी भगवान ने यही मुक्ति का मार्ग । सिखाया, जिस पर चल कर वे सब अनार्य से आर्य हो गये। पृथकजन से अरहंत हो गये, भव-मुक्त हो गये।

इस कल्याणकारी आर्यमार्ग को अनेक लोगों तक पहुँचाने के लिए अब इन साठ लोगों ने अलग-अलग मार्ग से अलग-अलग स्थानों पर पहुँच कर अधिक से अधिक लोगों के हित-सुख के लिए आर्यमार्ग की यही विपश्यना विद्या सिखायी। इससे उन्हें लाभ होना स्वाभाविक था। जब स्वानुभूति द्वारा धर्म का स्वयं लाभ होता है तब साधक के मन में यह करुण-भाव जागता ही है कि इसे अन्य अनेक लोग भी अपना कर लाभान्वित हों। इस कारुणिक भावना को ही -- 'एहिपस्सिको' कहा गया यानी आओ, तुम भी इस मार्ग पर चल कर देखो! इसी आह्वान के कारण अनेकों ने विपश्यना का अभ्यास किया और लाभान्वित हुए। अतः भगवान की शिक्षा उनके जीवनकाल में ही फैलने लगी। जैसे परमात्मा संबंधी भ्रांतियों को दूर किया वैसे ही आत्मा संबंधी भ्रांतियों को भी।

उनके द्वारा प्रशिक्षित विपश्यना के अभ्यास से जो शरीर और चित्त से संबंधित संवेदनाओं की अनुभूति होती है, उनसे साधक जान लेता है कि ये अनित्य हैं, दुःख हैं, अनात्म हैं। अनित्य की सच्चाई तो आसानी से समझ में आ जाती है और कुछ अंशों में दुःख की भी, परंतु अनात्म को लेकर कुछ लोगों के मन में संदेह रहा ही होगा। क्योंकि वे मानते थे कि हमारे भीतर कोई नित्य, शाश्वत, ध्रुव आत्मा तो है ही।

यही समस्या मेरे लिए भी थी। मैं स्वयं कट्टर सनातनी घर में जन्मा और पला और इसका मुझपर गहरा प्रभाव था। बुद्ध की विपश्यना का अभ्यास करने के लिए मेरे मन में जो झिझक थी वह इसीलिए कि इसमें आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता। परंतु जब पहले ही शिविर में से निकला तो सारे विरोध दूर हो गये। मैंने देखा कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं? इस साधना द्वारा अपने अंतर्मन के विकारों को दूर करके उसे निर्मल बनाने का काम ही तो कर रहा हूं। इसमें किसी को क्या विरोध हो सकता है? मुझे भी क्या विरोध हो सकता है? उस समय मेरे मन में यह भाव जागा कि यदि कोई विश्व-नियंता ईश्वर है तो मुझे अपने चित्त को निर्मल करते हुए देख कर वह प्रसन्न ही होगा, इसका विरोध क्यों करेगा? इसी प्रकार यदि कोई आत्मा है तो चित्त को निर्मल कर लेने से उस बेचारी का भला ही होगा, वह नाराज क्यों होगी? और यदि आत्मा और परमात्मा है ही नहीं, तो उनकी मान्यताओं का वृथा बोझ अपने सिर पर क्यों उठाये फिरू?

मेरे अनुभव की यह बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था थी। लेकिन जैसे-जैसे और शिविर लेता गया, गहराई में जाकर शरीर और चित्त के संबंधों की गहरी जानकारी अनुभूति द्वारा होती गई, तब बात खूब समझ में आयी कि यह तो कुदरत का कानून है, निसर्ग का नियम है कि जैसा बीज वैसा फल । इस नियम को कोई भी शक्ति बदल नहीं सकती। न कोई देवी, न देवता, न ईश्वर, न ब्रह्म और न कोई गुरु महाराज । बीज नीम का बोया हो तो निसर्ग के नियमों के अनुसार उसमें से नीम ही उत्पन्न होगा। आम का बोया हो तो उसमें से आम ही उत्पन्न होगा। यह सच्चाई खूब समझ में आयी कि ऐसी कोई बाह्य शक्ति है ही नहीं जो नीम के बोये हुए बीज से आम पैदा कर दे अथवा आम के बोये हुए बीज से नीम पैदा कर दे। जैसा बीज वैसा फल। ठीक इसी प्रकार जैसा कर्म-बीज वैसा ही कर्म-फल। इस नियम को कोई बदल नहीं सकता। यदि किसी दुष्कर्म का दुष्फल आया है तो कोई हजार प्रार्थना करे, पूजन-अर्चन करे, कर्मकांड करे तो भी उससे छुटकारा नहीं मिल सकता । विपश्यना की साधना द्वारा यथाकृत नहीं, यथा कल्पित नहीं, यथा आरोपित नहीं बल्कि यथाभूत सत्य को समतापूर्वक देखते-देखते ही कोई दुष्कर्म के बीज का उन्मूलन कर सकता है। इसी प्रकार किसी सत्कर्म का सफल आया है तो इसमें भी कोई बाह्य शक्ति रुकावट पैदा नहीं कर सकती । प्रकृति के नियमों की यह सच्चाई खूब समझ में आने लगी तो विपश्यना की वैज्ञानिकता भी खूब समझ में आने लगी । भिन्न-भिन्न दार्शनिक मान्यताओं के जंजाल से स्वतः छुटकारा हो गया। आत्मा और परमात्मा संबंधी सारे संदेह भी दूर हो गये।

जैसे इन दिनों वैसे ही उन दिनों में भी, विपश्यना करने वाले अनेक साधकों के मन से मिथ्या काल्पनिक मान्यताओं और उनके आधार पर मिथ्या विश्वासों के जंजाल दूर होते गये। अनेक लोग प्रकृति के नियमों की सच्चाई स्वीकार करने लगे। परंतु कुछ अज्ञानी और विरोधी संप्रदायवादियों ने बुद्ध का विरोध तो किया ही। यथा—

परिव्राजक मागण्डिय -- उन दिनों की एक बुद्ध-विरोधी मान्यता का प्रसिद्ध परिव्राजक था मागण्डिय। गौतम बुद्ध जिस आसन पर बैठ कर गये, उसे देख कर उसने भगवान को गालियां देते हुए कहा कि श्रमण गौतम भ्रूणहा है यानी भ्रूणों की हत्या करने वाला है। अंततः धर्म सीख कर वह भी अरहंत हुआ।

मागण्डिया -- ब्राह्मण मागण्डिय की पुत्री मागण्डिया परम सुंदरी थी। ब्राह्मण मागण्डिय ने बुद्ध के सुंदर रूप को देख कर उनसे अपनी पुत्री का विवाह करना चाहा। भगवान ने अस्वीकार कर दिया। सुंदरी मागण्डिया को इससे बहुत चोट लगी। आगे जाकर वह कौशांबी देश के राजा उदयन की रानी बनी और जब भगवान उस नगर में विहार करते हुए गुजरे तब उन पर अपना गुस्सा निकालने के लिए उसने कुछ भाड़े के लोगों को उनके पीछे लगा दिया जो उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार से गालियां देते हुए साथ चलने लगे, जैसे कि तू चोर है, मूर्ख है, गधा है, ऊंट है...।।

अक्कोस भारद्वाज -- जब इसने देखा कि बहुत बड़ी संख्या में लोग भगवान बुद्ध के अनुयायी होते जा रहे हैं तब वह इसे सहन नहीं कर सका। वह अत्यंत क्रोधित हो, गालियां बकते हुए भगवान के पास आया लेकिन भगवान की शांति देख कर उनकी ओर आकर्षित हुआ और उनसे विपश्यना सीख कर क्रोधमुक्त हो गया। 

वेरज ब्राह्मण - इसने भी भगवान पर ये लांछन लगाये कि श्रमण गौतम रूखा है, निर्भोगी है, अक्रियावादी है, उच्छेदवादी है, घृणा करने वाला है, लोकधर्म का नाश करने वाला है, अप्रगल्भ यानी देवलोक में उत्पन्न नहीं होने वाला है, आदि..।

भिक्षुओं को गालियां -- भगवान के सत्कार को सहन नहीं कर सकने के कारण कुछ विरोधी लोग उनके भिक्षुओं को भी गालियां दिया करते थे।
कई विरोधियों ने भगवान पर मिथ्या लांछन लगा कर उन्हें बदनाम करने का निष्फल प्रयत्न किया। यथा –

चिञ्चा माणविका -- एक सुंदरी युवती गर्भवती का भेष बना कर भगवान की धर्मसभा में उन्हें अपशब्द कहने लगी -- "अरे मथमुंडे, अपने होने वाले बच्चे के लिए तेरे पास कुछ नहीं है तो अपने इन धनी अनुयायियों को कह, वे कुछ प्रबंध करेंगे।'' भगवान इस मिथ्या लांछन से रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए। यह देख कर वह स्वयं घबरा उठी। उसके पेट पर बँधी रस्सी ढीली पड़ गई और लकड़ी का टुकड़ा पांव पर आ गिरा। 

सुंदरी परिव्राजिका -- विरोधियों ने एक सुंदरी परिव्राजिका को मार कर उसकी लाश जेतवन विहार के किसी गड्ढे में फिंकवा दी। फिर यह झूठी बात फैलाई कि भिक्षुओं ने उसके साथ दुष्कर्म करके उसका वध कर दिया। परंतु यह मिथ्यारोपण भी सफल नहीं हुआ। सच्चाई सामने आ गयी। इस प्रकार के अवरोधों के रहते हुए भी धीरे-धीरे अधिक से अधिक लोगों को भगवान की शिक्षा स्वीकार होने लगी। क्योंकि वह स्वानुभूत सच्चाई पर आधारित थी, न कि अंधविश्वासों पर और साथ-साथ आशुफलदायिनी भी थी।

शील, समाधि, प्रज्ञा-- ये तीनों सार्वजनीन धर्म हैं, सर्व धर्म हैं, सब के धर्म हैं। किसी को भी सांप्रदायिक बाड़े में नहीं बाँधते । जब यह बात लोगों की समझ में आने लगी तब आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलते हुए विपश्यना के अभ्यास द्वारा अधिक से अधिक लोग सदाचारी बन कर लाभान्वित होने लगे। यही सच्चाई हम आज भी देख रहे हैं कि किस प्रकार सभी संप्रदायों के लोग लाखों की संख्या में बिना झिझक विपश्यना को स्वीकार कर रहे हैं, उनमें से कोई आत्मा या परमात्मा को माने या न माने। परंतु विपश्यना के अभ्यास से उनके मन का बुरा स्वभाव क्षीण होता जाता है और अच्छा स्वभाव सबल होता जाता है। इसी में सबका कल्याण है। शील, समाधि, प्रज्ञा के अभ्यास में कल्याण ही कल्याण समाया हुआ है।

कल्याणमित्र, 
सत्यनारायण गोयन्का

दिसम्बर 2011 हिंदी विपश्यना पत्रिका में प्रकाशित

Wednesday, April 5, 2023

RATANA SUTTA (A Buddhist prayer to combat epidemics) रतन – सुत्त

 

THE JEWEL DISCOURSE


एक बार जब वैशाली नगरी भयंकर रोगों, अमानवी उपद्रवों और दुर्भिक्ष-पीड़ाओं से संतप्त हो उठी , तो इन तीनों प्रकार के दुःखों का शमन करने के लिए महास्थविर आनंद ने भगवान के अनंत गुणों का स्मरण किया ।



कोटीसतसहस्सेसु , चक्कवालेसु देवता ।
यस्साणं पटिगण्हन्ति , यञ्च वेसालिया पुरे।।
रोगा-मनुस्स-दुब्भिक्खं , सम्भूतं तिविधं भयं।
खिप्पमन्तरधापेसि, परित्तं तं भणामहे।।


शत-सहत्र-कोटि चक्रवालों के वासी सभी देवगण जिसके प्रताप को स्वीकार करते हैं तथा जिसके प्रभाव से वैशाली नगरी रोग अमानवी उपद्रव और दुर्भिक्ष से उत्पन्न त्रिविध भय से तत्काल मुक्त हो गई थी उस परित्राण को कह रहे हैं ।




यानीध भूतानि समागतानि ,
भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे ।
सब्बेव भूता सुमना भवन्तु ,
अथोपि सक्कच्च सुणन्तु भासितं ।।१।।

इस समय धरती या आकाश में रहने वाले जो भी प्राणी उपस्थित हैं वे सौमनस्य पूर्ण हों / प्रसन्न – चित्त हों और कथन / धर्म वाणी को आदर के साथ सुनें ।।

तस्मा हि भूता निसामेथ सब्बे ,
मेत्तं करोथ मानुसिया पजाय ।
दिवा च रत्तो च रहन्ति ये बलिं,
तस्मा हि ते रक्खथ अप्पमत्ता ।।२।।

यहां उपस्थित आप सभी ध्यान से सुनें और मनुष्यों के प्रति मैत्री भाव रखें । जिन मनुष्यों से आप दिन रात बलि / भेंट – पूजा – प्रसाद ग्रहण करते हैं प्रमाद रहित होकर उनकी रक्षा करें ।।

यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा,
सग्गेसु वा यं रतनं पणीतं।
न नो समं अत्थि तथागतेन,
इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।३।।

इस लोक में अथवा अन्य लोकों में जो भी धन-संपत्ति है, और स्वर्गों में जो भी अमूल्य-रत्न हैं, उनमें से कोई भी तथागत(बुद्ध)के समान (श्रेष्ठ) नहीं है।
सचमुच यह भी बुद्ध में उत्तम गुण – रत्न है !
इस सत्य कथन के प्रभाव से कल्याण हो !!

खयं विरागं अमतं पणीतं,
यदज्झगा सक्यमुनी समाहितो ।
न तेन धम्मेन समत्थि किञ्चि,
इदम्पि धम्मे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।४।।

समाहित-चित्त से शाक्य-मुनि भगवान बुद्ध ने जिस राग – विमुक्त आश्रव – हीन श्रेष्ठ अमृत को प्राप्त किया था, उस लोकोत्तर निर्वाण -धर्म के समान अन्य कुछ भी नहीं है ।
सचमुच यह भी धर्म में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य कथन के प्रभाव से कल्याण हो !!

यं बुद्धसेट्ठो परिवण्णयी सुचिं,
समाधिमानन्तरिकञ्ञमाहु ।
समाधिना तेन समो न विज्जति,
इदम्पि धम्मे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।५।।

जिस परम विशुद्ध आर्य – मार्गिक समाधि की प्रशंसा स्वयं भगवान बुद्ध ने की है और जिसे “आनन्तरिक” याने तत्काल फलदायी कहा है, उसके समान अन्य कोई भी समाधि नहीं है ।
सचमुच यह भी धर्म में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य कथन के प्रभाव से कल्याण हो !!

ये पुग्गला अट्ठ सतं पसत्था,
चत्तारि एतानि युगानि होन्ति,
ते दक्खिणेय्या सुगतस्स सावका,
एतेसु दिन्नानि महप्फलानि,
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।६।।

जिन आठ प्रकार के आर्य पुदग्ल (व्यक्तियों) की संतों ने प्रशंसा की है (मार्ग और फल की गणना से) जिनके चार जोड़े होते हैं, वे ही बुद्ध के श्रावक संघ (शिष्य ) दक्षिणा के उपयुक्त पात्र हैं । उन्हें दिया गया दान महाफलदायी होता है ।
सचमुच यह भी संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य कथन के प्रभाव से कल्याण हो !!

ये सुप्पयुत्ता मनसा दल्हेन ,
निक्कामिनो गोतमसासनम्हि।
ते पत्तिपत्ता अमतं विगय्ह ,
लद्धा मुधा निब्बुतिं भुञ्जमाना।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।७।।

जो आर्य पुद्गल भगवान बुद्ध के साधना शासन में दृढ़ता-पूर्वक एकाग्रचित्त और वितृष्ण हो कर संलग्न हैं, तथा जिन्होंने सहज ही अमृत में गोता लगा कर अमूल्य निर्वाण रस का आस्वादन कर लिया है और प्राप्तव्य को प्राप्त कर लिया है ( उत्तम अरहंत फल को पा लिया है )।
सचमुच यह भी संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो !!

यथिन्दखीलो पठविं सितो सिया ,
चतुब्भि वातेहि असम्पकम्पियो ।
तथूपमं सप्पुरिसं वदामि ,
यो अरियसच्चानि अवेच्च पस्सति।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।८।।

जिस प्रकार पृथ्वी में (दृढ़ता से) गड़ा हुआ इंद्र-कील (नगर-द्वार-स्तंभ) चारों ओर के पवन-वेग से भी प्रकंपित नहीं होता, उस प्रकार के व्यक्ति को ही मैं सत्पुरूष कहता हूं, जिसने (भगवान के साधना-पथ पर चल कर) आर्य-सत्यों का सम्यक दर्शन (साक्षात्कार ) कर उन्हें स्पष्टरूप से जान लिया है ; (वह आर्यपुद्गल भी प्रतेक अवस्था में अविचलित रहता है ) ।
सचमुच यह भी (आर्य )संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो !!

ये अरियसच्चानि विभावयन्ति ,
गम्भीरपञ्ञेन सुदेसितानि ।
किञ्चापि ते होन्ति भुसप्पमत्ता,
न ते भवं अट्ठममादियन्ति ।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।९।।

जिन्होंने गंभीर – प्रज्ञावान भगवान बुद्ध के द्वारा उपदिष्ट आर्यसत्यों का भली प्रकार साक्षात्कार कर लिया है, वे स्रोतापन्न यदि किसी कारण से बहुत प्रमादी भी हो जायं ( और साधना के अभ्यास में सतत तत्पर न भी रहें ) तो भी आठवां जन्म ग्रहण नहीं करते ।(अधिक से अधिक सातवें जन्म में उनकी मुक्ति निश्चित है ) ।
सचमुच यह भी (आर्य )संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो !!

सहावस्स दस्सन-सम्पदाय ,
तयस्सु धम्मा जहिता भवन्ति ।
सक्कायदिट्ठि विचिकिच्छितं च ,
सीलब्बतं वा पि यदत्थि किञ्चि ।।१०।।

दर्शन – प्राप्ति ( स्रोतापन्न फल प्राप्ति ) के साथ उसके ( स्रोतापन्न व्यक्ति के ) तीन बंधन छूट जाते हैं — सत्कायदृष्टि ( आत्म सम्मोहन ) , विचिकित्सा ( संशय ) , शीलव्रत परामर्श ( विभिन्न व्रतों आदि कर्मकांडो से चित्तशुद्धि होने का विश्वास ) अथवा अन्य जो कुछ भी ऐसे बंधन हों ।

चतूहपायेहि च विप्पमुत्तो ,
छच्चाभिठानानि अभब्बो कातुं ।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।११।।

वह चार अपाय गतियों ( निरय लोकों ) से पूरी तरह मुक्त हो जाता है । छह घोर पाप कर्मों (मातृ-हत्या, पितृ-हत्या, अर्हंत-हत्या, बुद्ध का रक्तपात, संघ-भेद एवं मिथ्या आचार्यों के प्रति श्रद्धा) को कभी नहीं करता ।
सचमुच यह भी (आर्य )संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो !!

किञ्चापि सो कम्मं करोति पापकं,
कायेन वाचा उद चेतसा वा ।
अभब्बो सो तस्स पट्ठिच्छादाय ,
अभब्बता दिट्ठपदस्स वुत्ता ।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।१२।।

भले ही वह / स्रोतापन्न व्यक्ति, काया, वचन अथवा मन से कोई पाप कर्म कर भी ले तो उसे छिपा नहीं सकता । भगवान ने कहा है – निर्वाण का साक्षात्कार करने वाला अपने दुष्कृत कर्म को छिपाने में असमर्थ है ।
सचमुच यह भी (आर्य )संघ में उत्तम – रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो!!

वनप्मपगुम्बे यथा फुस्सितग्गे ,
गिम्हानमासे पठमस्मिं गिम्हे ।
तथूपमं धम्मवरं अदेसयि ,
निब्बानगामिं परमं हिताय ।
इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।१३।।

ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभिक माह में जिस प्रकार सघन वन प्रफूल्लित वृक्षशिखरों से शोभायमान होता है, उसी प्रकार भगवान बुद्ध ने श्रेष्ठ धर्म का उपदेश दिया जो निर्वाण की ओर ले जाने वाला तथा परम हितकारी है।
सचमुच यह भी (आर्य ) संघ में उत्तम रत्न है !
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो!!

वरो वरञ्ञू वरदो वराहरो ,
अनुत्तरो धम्मवरं अदेसयि ।
इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।१४।।

सर्वश्रेष्ठ निर्वाण के दाता, श्रेष्ठ धर्म के ज्ञाता ,श्रेष्ठ मार्ग को दर्शाने वाले, सर्वश्रेष्ठ बुद्ध ने सर्वोच्च धर्म का उपदेश दिया है ।
सचमुच यह भी बुद्ध में उत्तम गुण रत्न है ।
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो ।।

खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्मवं ,
विरत्तचित्तायतिके भवस्मिं ।
ते खीणबीजा अविरूल्हिछन्दा ,
निब्बन्ति धीरा यथा ‘ यं पदीपो ।
इदम्पि संघे रतनं पणीतं ,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।१५।।

जिनके सारे पुराने कर्म क्षीण हो गये हैं और नये कर्मों की उत्पत्ति नहीं होती ; पुनर्जन्म में जिनकी आसक्ति समाप्त हो गयी है, वे क्षीण – बीज / अरहंत तृष्णा – विमुक्त हो गये हैं । वे इसी प्रकार निर्वाण को प्राप्त होते हैं जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक ।
सचमुच यह भी आर्य संघ में श्रेष्ठ रत्न है ।
इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो।।

यानीध भूतानि समागतानि ,
भुम्मानि वा यानिव अन्तलिक्खे ।
तथागतं देवमनुस्सपूजितं ,
बुद्धं नमस्साम सुवत्थि होतु ।।१६।।

इस समय धरती या आकाश में रहने वाले जो प्राणी यहां उपस्थित हैं, हम सभी समस्त देवों और मनुष्यों द्वारा पूजित –
तथागत बुद्ध को नमस्कार करते हैं , कल्याण हो !

यानीध भूतानि समागतानि ,
भुम्मानि वा यानिव अन्तलिक्खे ।
तथागतं देवमनुस्सपूजितं ,
धम्मं नमस्साम सुवत्थि होतु ।।१७।।

इस समय धरती या आकाश में रहने वाले जो प्राणी यहां उपस्थित हैं, हम सभी समस्त देवों और मनुष्यों द्वारा पूजित –
तथागत और धर्म को नमस्कार करते हैं , कल्याण हो !

यानीध भूतानि समागतानि ,
भुम्मानि वा यानिव अन्तलिक्खे ।
तथागतं देवमनुस्सपूजितं ,
सघं नमस्साम सुवत्थि होतु ।।१८।।

इस समय धरती या आकाश में रहने वाले जो प्राणी यहां उपस्थित हैं, हम सभी समस्त देवों और मनुष्यों द्वारा पूजित – तथागत और संघ को नमस्कार करते हैं , कल्याण हो !

भवतु सब्ब मंगलं
सबका मंगल हो

Thursday, November 14, 2019

सुख कहां मिलता है-Where do you get happiness-Buddha story


अतीत का पीछा न करो ।
भविष्य के भ्रम जाल मे न फ़ंसो।
अतीत व्यतीत हो गया ।
भविष्य अभी अनागत है ।
यहाँ अभी इस क्षण जीवन जैसा है , उसी को धारण करो
साधनाभ्यासी ,स्थिरता और मुक्त भाव मे जीता है ।
कल की प्रतीक्षा की , तो विलम्ब होगा।
मृत्यु अचानक धर दबोचती है
उससे हम क्या समझोता कर सकते हैं ?
भिक्खुजन उसी का आह्वान करते हैं
जो दिन और रात
सचेतानावस्था मे जागृत रहता है
जो जानता है कि
एकान्तवास का उत्तमतर मार्ग क्या है । ”
स्त्रोत : मॆट्टा सुत्त(M. 131); भदिद्कारता सुत्त, आंनद भद्दकारता सुत्त
“Do not pursue the past.
Do not lose yourself in the future.
The past no longer is.
The future has not yet come.
Looking deeply at life as it is
in the very here and now,
the practitioner dwells
in stability and freedom.
We must be diligent today.
To wait until tomorrow is too late.
Death comes unexpectedly.
How can we bargain with it?
The sage calls a person who knows
how to dwell in mindfulness
night and day
‘one who knows
the better way to live alone.’”
Source : Bhaddekaratta Sutta (M. 131); Ananda Bhaddekaratta Sutta (M. 132); Mahakaccana Bhaddekaratta Sutta (M. 133);


ध्यान क्या है और ध्यान कैसे करें - power of meditation - Buddha story


Tuesday, November 12, 2019

कार्तिक पूर्णिमा का बुद्ध-धम्म में महत्व

🌹कार्तिक-पूर्णिमा🌹

🌷 कार्तिक पूर्णिमा का बुद्ध-धम्म में महत्व🌷

आज 12 नवम्बर 2019 कार्तिक पूर्णिमा है. कार्तिक पूर्णिमा की सभी देशवासियों को - 
🙏 हार्दिक बधाई , 
🙏 मंगलकामनाएँ, 
🙏 धम्मकामनाएँ...

🔸1) विश्वगुरु शाक्यमुनि भगवान् तथागत गोतम बुद्ध द्वारा ,
संघ के प्रथम 60 अर्हत भिक्खुओं को लोक कल्याण हेतु चारों दिशाओं में जाकर धम्म प्रचार का निम्वनवत शब्दों में आदेश —
🎯
🌹चरथ, भिक्खवे, चारिकं -
🌹बहुजनहिताय 
🌹बहुजनसुखाय 
🌹लोकानुकंपाय,
🌹अत्थाय हिताय सुखान देवमनुस्सानं। 
🌹देसेथ, भिक्खवे, धम्म -
🌹आदिकल्याण,
🌹मज़्झेकल्याण,
🌹परियोसानकल्याण सात्थं, 
🌹सब्बजनं केवलं परिपुण्ण परिसुद्ध
     ब्रह्मचरिय पकासेथ’। " 🎯

🔸2) देवानंपिय (बुद्ध/अर्हत/देवों के प्रिय)
     राजा चक्रवर्ती सम्राट असोक महान का
     परिनिब्बान दिवस (मृत्यु) ।

🔸3) तथागत बुद्ध द्वारा जटिल उरूवेल
     कस्सप की धम्मदीक्षा ।

🔸4) तथागत बुद्ध द्वारा सारिपुत्त की
     धम्मदीक्षा ।

🔸5) सारिपुत्त के तीन भाई -
🔺सुंद, 
🔺उपसेन व 
🔺रेवत और 
🔸तीन बहनें -
🔺चाला, 
🔺उपचाला, 
🔺सिसुपाला को भिन्न-भिन्न वर्षों में धम्मदीक्षा
     प्राप्त हुई ।

🔸6) भिक्खु उरूवेला कस्सप का
     परिनिब्बान ।

🔸7) धम्म सेनापति सारिपुत्त का नालाग्राम में
     परिनिब्बान ।

🔸8) सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में
    अनागारिक धम्मपाल ने 1931 में तक्षशिला
    से विश्वगुरु तथागत गोतम बुद्ध की धातु
   (अस्थि अवशेष) को लाकर स्थापित किया ।

               🌹भवतु सब्ब मंगलं🌹

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Wednesday, September 4, 2019

🍃55-जीवक-सुत्त (2.1.5)🍃

55
             🍁मज्झिम निकाय🍁
          🔱मज्झिम-पण्णासक🔱
                🛐गहपतिवग्ग🛐

          🍃55-जीवक-सुत्त (2.1.5)🍃



👂ऐसा मैंने सुना-

🚶एक समय भगवान राजगृह में जीवक कौमारभृत्य के' अम्बवन में विहार करते थे।

🛐तब जीवक कौमारभृत्य जहां भगवान थे, वहां गया; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे जीवक ने भगवान से यह कहा--

🙏“भन्ते! मैंने सुना है - 
'श्रमण गोतम उद्देश्य से (लोग) जीव मारते हैं, श्रमण गोतम जानते हुए (अपने) उद्देश्य से बनाये (अपने) उद्देश्य से किए कर्म वाले मांस को खाता है। 
भन्ते! जो यह कहते हैं - 'श्रमण गोतम... खाता है' 
क्या भन्ते! वे भगवान के विषय में यथार्थ वादी हैं? 
वे भगवान पर झूठा आक्षेप तो नहीं लगाते? सत्य के अनुसार कहते हैं? 
(उनके इस कथन से) किसी धर्मानुसार वचन-अनुवचन की निन्दा तो नहीं हो जाती?"

☝“...जीवक! जो यह कहते हैं- 
'श्रमण गोतम... खाता है'; 
वे मेरे विषय में यथार्थवादी नहीं हैं; 
वे मुझ पर झूठा इलजाम (=अभ्याख्यान) लगाते हैं। 
जीवक! मैं तीन प्रकार के मांस को अ-भोज्य कहता हूं- 
🎆दृष्ट, 
🎆श्रुत और 
🎆परिशंकित।"
(जीव का अपने लिए मारा जाना देखना, सुनना, या शंका होना।)

☝"...जीवक! तीन प्रकार के मांस को मैं भोज्य कहता हूं-
🔱अ-दृष्ट, 
🔱अ-श्रुत, 
🔱अ-परिशंकित।"

☝“जीवक! कोई भिक्खु किसी गांव, या निगम (=कस्बे) के पास विहार करता है। 
वह मैत्री-पूर्ण चित्त से सारे लोक को पूर्णकर विहरता है। 
उसके पास आकर कोई गहपति या गहपति-पुत्त दूसरे दिन के भोजन के लिए आमंत्रण देता है। 
इच्छा होने पर जीवक! भिक्खु (उस निमंत्रण) को स्वीकार करता है। 
वह उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न समय पहनकर पात्र-चीवर ले, 
जहां उस गहपति या गहपति-पुत्त का घर होता है, वहां जाता है। जाकर बिछे आसन पर बैठता है। उसे वह गहपति या गहपति-पुत्त उत्तम पिंडपात (भिक्खान्न) परोसता है। 
उस (भिक्खु) को यह नहीं होता-
'अहो! यह गहपति या गहपति - पुत्त मुझे उत्तम पिंडपात परोसे। 
अहो! यह आगे भी इसी प्रकार का पिंडपात परोसे। 
वह उस पिंडपात को अ-लोलुप अ-मूर्छित हो, अनासक्त हो अवगुण का ख्याल रखते, निस्तार की बुद्धि से खाता है। 
तो क्या मानते हो, जीवक! क्या वह भिक्खु उस समय 
निज-पीड़ा (की बात) को सोचता है, 
पर-पीड़ा को सोचता है, 
(स्वयं पर) उभय-पीड़ा को सोचता है?"

🙏"नहीं, भन्ते!"

☝"क्यों जीवक! उस समय वह निर्दोष (=अनवद्य) आहार ही का ग्रहण कर रहा है न?"

🙏“हां, भन्ते! 
🌷मैंने सुना है भन्ते! कि ब्रह्मा मैत्री-विहारी (=सदा सबको मित्र भाव से देखने वाला) है; सो मैंने भन्ते! भगवान साक्षात् देख लिया। भन्ते! भगवान मैत्री विहारी हैं।"

☝"जीवक! 
जिस राग से, 
जिस द्वेष से, 
जिस मोह से (आदमी) व्यापादवान् ( द्वेषी, उत्पीड़क) होता है, 
वह राग-द्वेष-मोह तथागत का नष्ट हो गया, उच्छिन्न मूल, 
कटे सिर वाले-ताड़ जैसा अ-भाव-प्राप्त, भविष्य में उत्पन्न होने के-अयोग्य हो गया। 
यदि जीवक! तुमने वह ख्याल करके कहा, तो मैं सहमत हूं।"

🙏“यही ख्याल! कर भन्ते! मैंने कहा।"

☝“यहां जीवक! कोई भिक्खु किसी गांव या निगम के पास विहार करता है। 
वह करुणापूर्ण चित्त से । 
मुदिता-पूर्ण चित्त से । 
उपेक्षा पूर्ण चित्त से सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है। उसके पास आकर कोई गहपति या गहपति-पुत्त दूसरे दिन के लिए भोजन का निमंत्रण देता है।... (पहले की आवृत्ति)"

🙏“यही ख्याल कर भन्ते! मैंने कहा।"

☝“जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के सावक (श्रावक) के उद्देश्य से जीव मारता है, वह पांच स्थानों से अ-पुण्य (=पाप) कमाता है,

🌷(1) जो वह यह कहता है-
'जाओ, अमुक जीव को लाओ'; 
इस पहले स्थान (=बात से) वह बहुत अपुण्य कमाता है। 

🌷(2) जो वह गले में (रस्सी) बांधकर खींच कर लाते (पशु) को (देख) दुखदौर्मनस्य अनुभव करता है, 
यह दूसरे स्थान... । 

🌷(3) जो वह यह कहता है-
'जाओ; इस जीव को मारो' 
इस तीसरे स्थान... ।

🌷(4) जो वह जीवों को मारते दुख-दौर्मनस्य (=संताप) अनुभव करता है; 
इस चौथे स्थान...। 

🌷(5) जो वह तथागत या तथागत के श्रावक को अ-कल्प्य (अनुचित, अविहित)को खिलाता है; इस पांचवें स्थान..।"

☝"जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के सावक के उद्देश्य से जीव मारता है, वह इन पांचों स्थानों से अ-पुण्य कमाता है।"

🙏यह कहने पर जीवक कौमारभृत्य ने भगवान् से यह कहा-
‘आश्चर्य! भन्ते! अद्भुत!! भन्ते! कल्प्य (=उचित, विहित) आहार को भन्ते! भिक्खु ग्रहण करते हैं। अहो! निर्दोष आहार को भन्ते! भिक्खु! ग्रहण करते हैं। आश्चर्य! भन्ते! अद्भुत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे...। यह मैं भन्ते! 
भगवान् की शरण जाता हूं, धम्म और भिक्खुसंघ की भी। 
भगवान् आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।"

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 

Tuesday, September 3, 2019

🍃57-कुक्कुरवतिक-सुत्त (2.1.7)🍃

57.

              🍁मज्झिम निकाय🍁
            🔱मज्झिम-पण्णासक🔱
                  🛐गहपतिवग्ग🛐
      🍃57-कुक्कुरवतिक-सुत्त (2.1.7)🍃


👂ऐसा मैंने सुना--

🚶एक समय भगवान् कोलिय (जनपद) में कोलियों के हलिद्दवसन (=हरिद्रवसन) नामक निगम में विहार (=निवास) करते थे।

🌷तब गोव्रतिक (=गाय की भांति खाने पीने का व्रत रखने वाला) कोलिय-पुत्त पूर्ण और कुक्कुर-वतिक अचेल (=नंगा) सेनिय (=श्रेणिक) जहां भगवान् थे, वहां गए; जाकर गोव्रतिक कोलियपुत्त पूर्ण, भगवान् को अभिवादनकर एक ओर बैठ गया। कुक्कुर-वतिक अचेल सेनिय भगवान् के साथ ...सम्मोदन (=कुशल-मंगल पूछ) कर कुक्कुर की भांति गेंडुरी मार, एक ओर बैठ गया।

🌷एक ओर बैठे पूर्ण ने भगवान से यह कहा--

🙏“भन्ते! यह कुक्कुर-वतिक अचेल सेनिय बड़ा मुश्किल करने वाला (=दुष्कर-कारक) है, भूमि में रखे (भोजन) को खाता है। इसने इस कुक्कुर-व्रत को दीर्घकाल से निरन्तर ले रखा है। उसकी क्या गति, क्या अभिसम्पराय (=जन्मान्तर फल) होगा?”

☝"बस, रहने दे, पूर्ण! मत मुझसे यह पूछ।”, 

🙏दूसरी बार भी पूर्ण ने भगवान् से यह कहा-“भन्ते!..।"

🙏 तीसरी बार भी पूर्ण ने भगवा से यह कहा- “भन्ते!..।"

☝“पूर्ण! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार करा) पाया- 'बस, रहने दे, पूर्ण! मत मुझसे यह पूछ' । "

☝"अच्छा, तो मैं तुझसे कहता हूं। (जब) कोई पूर्ण! परिपूर्ण अ-खण्ड कुक्कुर-व्रत की भावना (=अभ्यास) करता है, परिपूर्ण अ-खंड कुक्कुर-शील की भावना करता है, कुक्कुर-चित्त की भावना करता है, कुक्कुर-आकल्प (=तौर-तरीका) की भावना करता है; वह परिपूर्ण अखण्ड कुक्कुर-व्रत की भावना करके, "कुक्कुर-शील", "कुक्कुर-चित्त”, “कुक्कुर-आकल्प" की भावना करके काया छोड़ मरने के बाद कुक्कुरों की योनि में उत्पन्न हता है।"

☝" यदि पूर्ण! उसकी ऐसी दृष्टि हो-'मैं इस (कुक्कुर के) शील, व्रत, तप, ब्रह्मचर्य से देवों में से कोई देवता होऊंगा; तो यह उसकी मिथ्या-दृष्टि (=झूठी धारण) है।"

☝" पूर्ण! मिथ्या-दृष्टि (पुरुष) की मैं दो गतियों में से एक ही गति कहता हूं - नरक या तिर्यक् (=पशु)-योनि ।"

☝"इस प्रकार पूर्ण! कुक्कुर-व्रत का करना कुक्कुर की योनि में ले जाता है, (या) विद्यमान नरक को।”

ऐसा2⃣🌷 कहने पर कुक्कुर वतिक अचेल सेनिय रो पड़ा; आंसू बहाने लगे😭। 

☝तब भगवान् ने पूर्ण से यह कहा-“पूर्ण! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया-'बस, रहने दे...।"

🙏(सेनिय बोला-) "भगवान के मुझे ऐसा कहने के ख्याल से मैं नहीं रो रहा हूं, लेकिन “भन्ते! मैंने इस कक्करव्रत को दीर्घकाल से ले रखा है।भन्ते! इस ... पूर्ण ने भी गोव्रत दीर्घ काल से ले रखा है। उसकी क्या गति है क्या अभिसम्पराय है?"


☝"बस, रहने दे सेनिय! मत मुझसे यह पूछ।” 

🌷दुसरी बार भी..। 

🌷तीसरी बार भी...।

☝"सेनिय! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया- 'बस..।"

☝" अच्छा तो मैं तुझसे कहता हूं। (जो) कोई सेनिय! परिपूर्ण अ-खंड गोव्रत की भावना करता है,... गो-शील..., ...गो-चित्त..., .."गो-आकल्प...;... (वह) काया छोड़ मरने के बाद गौ की योनि में उत्पन्न होता है। यदि सेनिय! उसकी ऐसी दृष्टि हो- ...विद्यमान नरक को।”

🌷ऐसा कहने पर गोवतिक कोलियपुत्त पूर्ण रो पड़ा, आंसू बहाने लगे😭।

☝तब भगवान ने सेनिय से यह कहा- “सेनिय! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया- 'बस रहने दे...।"

🙏(पूर्ण बोला-) “भन्ते! भगवान् के मुझे ऐसा कहने के ख्याल से मैं नहीं रो रहा हूं। लेकिन भन्ते! मैंने इस व्रत को दीर्घकाल से ले रखा है। भन्ते! भगवान् पर मैं इतना श्रद्धावान् (=प्रसन्न) हूं; भगवान् ऐसा धर्म-उपदेश करें, जिसमें मैं इस गोव्रत को छोड़ दूं, और यह सेनिय कुक्कुर-व्रत को छोड़ दें।"

☝"तो पूर्ण! सुनो! अच्छी तरह मन में करो, कहता हूं।" 

🙏“अच्छा, भन्ते!"- (कह) पूर्ण ने भगवान् को उत्तर दिया।

☝भगवान् ने यह कहा-“पूर्ण! मैंने इन चार कर्मों को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर अनुभव किया है। कौन से चार?-

🌷(1) पूर्ण! कोई कर्म होता है कृष्ण (=बुरा) और कृष्ण-विपाक (=बुरे परिणाम वाला); 

🌷(2) पूर्ण! कोई कर्म होता है, शुक्ल (=अच्छा) और शुक्ल-विपाक; 

🌷(3) ...कृष्ण-शुक्ल... ; 

🌷(4) ...अकृष्ण-अशुक्ल-विपाक (जो कि) कर्म के क्षय के लिए (उपयोगी) होता है।"

☝“क्या है पूर्ण! कृष्ण, कृष्ण-विपाक कर्म? -यहां, पूर्ण! कोई (पुरुष) व्यापाद (=पीड़ा)-युक्त काय-संस्कार (=कायिक क्रिया) करता, व्यापाद-युक्त वचन-संस्कार... , व्यापाद-युक्त मन के संस्कार करता है; वह व्यापाद-युक्त काय-संस्कार को करके, ...वचन-संस्कार... , ...मन-संस्कार को करके, व्यापाद-युक्त लोक में उत्पन्न होता है। व्यापाद-युक्त लोक में उत्पन्न हुए उसे व्यापाद-युक्त स्पर्श (=कर्म-विपाक) आ लगते हैं। वह व्यापाद-युक्त स्पर्शों के लगने से व्यापाद (=पीड़ा)-युक्त केवल दुखमय वेदना को अनुभव करता है, जैसे कि नरक के प्राणी। इस प्रकार पूर्ण! भूत (=यथाभूत-जैसे)से भूत (=तथाभूत-जैसे)की उत्पत्ति होती है; जैसा करता हूं उसके साथ उत्पन्न होता है। उत्पन्न हुए को स्पर्श आ लगते हैं। इसलिए भी पूर्ण मैं कहता हूं-'प्राणी (अपने) कों के दायाद (=वारिस) हैं।' पूर्ण! यह कृष्ण कृष्ण-विपाक कर्म कहा जाता है।"

☝“क्या है पूर्ण! शुक्ल, शुक्ल-विपाक कर्म?-यहां, पूर्ण कोई (पुरुष) व्यापाद-रहित काय-संस्कार व्यापाद-रहित लोक में उत्पन्न हुए उसे व्यापाद-रहित स्पर्श छूते हैं। वह व्यापाद-रहित स्पर्शों के लगने से व्यापाद-रहित केवल सुखमय वेदना को अनुभव करता है, जैसे कि शुभ-कृत्स्न देवता। इस प्रकार पूर्ण! भूत से भूत की उत्पत्ति होती है। (प्राणी) जैसा करता है, उसके साथ उत्पन्न होता है। उत्पन्न हुए को स्पर्श (=भोग) आ लगते हैं। इसीलिए पूर्ण! मैं कहता हूं-'प्राणी कर्मों के दायाद हैं'। पूर्ण! यह शुक्ल, शुक्ल-विपाक कर्म कहा जाता है।"

☝“क्या है पूर्ण! कृष्ण-शुक्ल कृष्ण-शुक्ल-विपाक कर्म?-यहां पूर्ण! कोई (पुरुष) व्यापाद-युक्त भी, अव्यापाद-युक्त भी काय-संस्कार वह व्यापाद-रहित और व्यापाद-रहित स्पर्शों के लगने से व्यापाद-रहित, व्यापाद-सहित सुख-दुख मिश्रित वेदना को अनुभव करता है, जैसे कि मनुष्य, कोई-कोई देवता, और कोई-कोई विनिपातिक (=नीच योनि के प्राणी)। इस प्रकार पूर्ण! भूत से भूत ...। पूर्ण! यह कृष्ण-शुक्ल ...।"

☝“क्या है पूर्ण! अकृष्ण-अशुक्ल अकृष्ण-अशुक्ल विपाक कर्म जो कि कर्मक्षय के लिए उपयोगी होता है?-यहां पूर्ण! कृष्ण-विपाक कृष्ण कर्म के क्षय के लिए (उपयोगी) जो चेतना (=मानस कम) है, "शुक्ल कर्म के क्षय के लिए जो चेतना है, "कृष्ण-शुक्ल कर्म के क्षय के लिए जो चेतना है। पूर्ण यह अकृष्ण-अशुक्ल कर्म कहा जाता है। पूर्ण! मैंने इन चार कर्मों को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर अनुभव किया है।"

🌷ऐसा कहने पर ... पूर्ण ने भगवान् से यह कहा-“आश्चर्य! भन्ते! अद्भुत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे। यह मैं भगवान की शरण जाता हूं, धम्म और भिक्खुसंघ की भी। आज से भगवान् मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।"

🌷और कुक्कुर-वतिक अचेल सेनिय ने भगवान से यह कहा-“आश्चर्य! भन्ते! अद्भुत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे यह मैं भगवान की शरण जाता हूं, धर्म और भिक्खुसंघ की भी। भन्ते! मैं भगवान्। के पास प्रव्रज्या (=संन्यास) पाऊं, उपसम्पदा (=भिक्खु दीक्षा) पाऊं।"

☝"सेनिय! जो कोई भूतपूर्व अन्यतीर्थिक (=दूसरे पंथ का व्यक्ति) इस (=बुद्ध के) धर्म-विनय (=धम) में प्रव्रज्या उपसम्पदा चाहता है; वह चार मास तक परिवास (=परीक्षार्थ वास) करता है; फिर पसन्द होने पर उसे भिक्खु प्रव्रजित करते हैं, भिक्खु-भाव के लिए उपसम्पादित करते हैं; किंतु यहां मुझे व्यक्ति की विभिन्नता विदित है।"

🙏“यदि, भन्ते! भूतपूर्व अन्य-तीर्थिक, इस धर्म-विनय में प्रव्रज्या उपसम्पदा की इच्छा करने पर चार मास परिवास करते हैं, फिर पसन्द होने पर... ; तो चार वर्ष परिवास करूंगा। चार वर्षों के बाद पसन्द होने पर भिक्खु मुझे प्रव्रजित करें, ...उपसम्पादित करें।”

🌷...सेनिय ने भगवान के पास प्रव्रज्या पाई, उपसम्पदा पाई। आयुष्मान् सेनिय उपसम्पदा पाने के थोड़े ही समय बाद, एकाकी, एकान्तवासी, प्रमाद-रहित, उद्योगी (और) निज-संयमी हो, विहरते. जल्दी ही, जिस के लिए कुल-पुत्र अच्छी तरह घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस अनपम काम-रहित-फल को इसी जन्म में जानकर साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरने लगे-'जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य-वास (पूरा) हो गया, करना था सो कर लिया, और कुछ यहां करने को नहीं रहा'-यह जान गए। आयुष्मान् सेनिय अर्हतों में से एक हुए।🌴


🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

Monday, September 2, 2019

🍃56-उपालि-सुत्त (2.1.6)🍃

56.

                 🍁मज्झिम निकाय🍁
               🔱मज्झिम-पण्णासक🔱
                    🛐गहपतिवग्ग🛐

        🍃56-उपालि-सुत्त (2.1.6)🍃



👂ऐसा मैंने सुना--

🚶एक समय भगवान् नालन्दा में प्रावारिक के अम्बवन में विहार कर रहे थे।

😷उस समय निगंठ नातपुत्त निगंठों (=जैन-साधुओं) की बड़ी परिषद् (=जमात) के साथ नालन्दा में विहार करते थे। तब दीर्घ-तपस्वी निग्रंथ (=जैन साधु) नालन्दा में भिक्खाचार कर, पिंडपात खत्म कर, भोजन के पश्चात् जहां प्रावारिक-अम्बवन में भगवान् थे, वहां गया। जाकर भगवान् के साथ संमोदन (कुशल प्रश्न पूछ) कर, एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े हुए दीर्घ-तपस्वी निगंठ (निग्रन्थ) को भगवान ने कहा

🌷“तपस्वी! आसन मौजूद हैं, यदि इच्छा है तो बैठ जाओ।"

🔯ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निर्ग्रन्थ एक नीचा आसन ले एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे दीर्घ-तपस्वी निर्ग्रन्थ से भगवान बोले

☝“तपस्वी! पाप कर्म के करने के लिए, पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए निर्ग्रन्थ ज्ञातृपुत्र कितने कर्मों का विधान करते हैं?"

😷“आवुस ! गोतम! 'कर्म' 'कर्म' विधान करना निर्ग्रन्थ ज्ञातृपुत्र का कायदा (=आचिण्ण) नहीं है। 
आवुस! गोतम! ‘दंड' ‘दंड' विधान करना निगंठ नातपुत्त का कायदा है।”

☝“तपस्वी! तो फिर पाप-कर्म के करने के लिए, 
पापकर्म की प्रवृत्ति के निए निगंठ नातपुत्त कितने 'दंड' विधान करते हैं?”

😷“आवुस! गोतम! पाप कर्म के करने के लिए, 
पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए निगंठ नातपुत्त तीन दंडों का विधान करते हैं। जैसे:- 
काय-दंड, 
वचन-दंड, 
मन-दंड।”

☝“तपस्वी! 
तो क्या कायदंड दूसरा है, 
वचन-दंड दूसरा है, 
मन-दंड दूसरा है?” 

😷“आवुस! गोतम! 
(हां) काय-दंड दूसरा ही है, 
वचन-दंड दूसरा ही है, और 
मन-दंड दूसरा ही है।"

☝"तपस्वी! इस प्रकार भेद किए, इस प्रकार विभक्त, इन तीनों दंडों में निगंठ नातपुत्त पाप कर्म के करने के लिए, 
पापकर्म की प्रवृत्ति के लिए किस दंड को महादोष-युक्त विधान करते हैं, 
काय-दंड को, या 
वचन-दंड को या 
मन-दंड को?"

😷“आवुस ! गोतम! इस प्रकार भेद किए, इस प्रकार विभक्त, इन तीनों दंडों में निगंठ नाथपत्त. पाप कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए, 
काय-दंड को महादोष-युक्त विधान करते हैं; वैसा वचन-दंड को नहीं, 
वैसा मन-दंड को नहीं?"

☝“तपस्वी! काय-दंड कहते हो?" 

😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।" “

☝तपस्वी! काय-दंड कहते हो?" 

😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।" 

☝“तपस्वी! काय-दंड कहते हो?"

😷“आवुस! गोतम! काय-दंड कहता हूं।"

🔱इस प्रकार भगवान ने दीर्घ-तपस्वी निगंठ को इस (कथा-वस्तु बात) में तीन बार प्रतिष्ठापित किया।

😷ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान से कहा👄--

🌷“तुम आवुस! गोतम! पाप-कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए कितने दंड-विधान करते हो?"

☝"तपस्वी! 
'दंड' 'दंड' कहना तथागत का कायदा नहीं है, 'कर्म' 'कर्म' कहना तथागत का कायदा है।"

😷“आवुस! 
गोतम! तुम कितने कर्म-विधान करते हो?"

☝ "तपस्वी! 
मैं ...तीन कर्म बतलाता हूं, जैसे, 
काय-कर्म, 
वचन-कर्म, 
मन-कर्म।” 

😷“आवुस! गोतम! 
काय-कर्म दूसरा ही है, 
वचन-कर्म दूसरा ही है, और 
मन-कर्म दूसरा ही है?" 

☝“तपस्वी! 
काय-कर्म दूसरा ही है, 
वचन कर्म दूसरा ही है, 
मन-कर्म दूसरा ही है।”

😷“आवुस! गोतम! ...इस प्रकार विभक्त... इन तीन कर्मों में, पाप-कर्म करने के लिए ... किसको महादोषी ठहराते हो - 
काय-कर्म को, या 
वचन-कर्म को, या 
मन-कर्म को?" -

☝“तपस्वी! ...इस प्रकार विभक्त... इन तीनों कर्मों में मन-कर्म को मैं ... महादोषी बतलाता हूं।" 

😷“आवुस! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?"

☝ “तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।" 

😷“आवुस! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?" 

☝“तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।" 

😷“आवुस ! गोतम! मन-कर्म बतलाते हो?" 

☝“तपस्वी! मन-कर्म बतलाता हूं।"

🔱इस प्रकार दीर्घ-तपस्वी निगंठ भगवान् को इस कथा-वस्तु (=विवाद-विषय) में तीन बार प्रतिष्ठापित करा, आसन से उठ जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां चला गया।

🌷उस समय निगंठ नातपुत्त, बालक (-लोणकार) - निवासी उपालि' आदि की बड़ी गृहस्थ परिषद् के साथ बैठे थे। तब निगंठ नातपुत्त ने दूर से ही दीर्घ-तपस्वी निगंठ को आते देख पूछा--

🤔“हे! तपस्वी! मध्याह्न में तू कहां से (आ रहा है)?"

🙏 “भन्ते! श्रमण गोतम के पास से आ रहा हूं।"

🤔 “तपस्वी! क्या तेरा श्रमण गोतम के साथ कुछ कथा-संलाप हुआ?" 

🙏"भन्ते! हां! मेरा श्रमण गोतम के साथ कथा-संलाप हुआ।" 

🤔 "तपस्वी! श्रमण गोतम के साथ तेरा क्या कथा-संलाप हुआ?"

🙏तब दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान के साथ जो कुछ कथा-संलाप हुआ था, वह सब निगंठ नातपुत्त से कह दिया।

🤔“साधु! साधु!! तपस्वी! (यही ठीक है) जैसा कि शास्ता (=गुरु) के शासन (=उपदेश) को अच्छी प्रकार जाननेवाले, बहुश्रुत श्रावक दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने श्रमण गोतम को बतलाया। 
वह मुवा मन-दंड, 
इस महान् काय-दंड के सामने क्या शोभता है? पाप-कर्म के करने के लिए पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए काय-दंड ही महादोषी है, 
वचन दंड, मन-दंड वैसे नहीं।"

🌷ऐसा कहने पर उपालि गृहपति ने निगंठ नातपुत्त से यह कहा👄--

🙏“साधु! साधु!! भन्ते तपस्वी! जैसा कि शास्ता के शासन के मर्मज्ञ, बहुश्रुत श्रावक भदन्त दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने श्रमण गोतम को बतलाया। 
तो भन्ते! मैं जाऊं, इसी कथा-वस्तु में श्रमण गोतम के साथ विवाद रोपूं? 
यदि मेरे (सामने) श्रमण गोतम वैसे (ही) ठहरा रहा, 
जैसा कि भदन्त दीर्घ-तपस्वी ने (उसे) ठहराया, तो जैसे बलवान् पुरुष लम्बे बाल वाली भेड़ को बालों से पकड़कर खींचे, घुमावे, डुलावे; 
उसी प्रकार मैं श्रमण गोतम के वाद को खीचूंगा, घुमाऊंगा, डुलाऊंगा। 
(अथवा) जैसे कि बलवान् शौंडिक-कर्मकर (=शराब बनाने वाला) भट्टि के छन्ने (=सोंडिका-किलंज)को गहरे पानी (वाले) तालाब में फेंककर; कानों को पकड़ खींचे, घुमावे, डुलावे, ऐसे ही मैं । 
(अथवा) जैसे बलवान् शराबी, बालक को कान से पकड़कर हिलावे, डुलावे", ऐसे ही मैं । (अथवा) जैसे कि साठ वर्ष का पट्ठा हाथी गहरी पुष्करिणी में घुसकर सन-धोवन नामक खेल को खेले, ऐसे ही मैं श्रमण गोतम को सन-धोवन । 
हां! तो भन्ते! मैं जाता हूं। इस कथा-वस्तु में श्रमण गोतम के साथ वाद रोपूंगा।"

👉“जा गृहपति! जा, श्रमण गोतम के साथ इस कथा-वस्तु में वाद रोप। 
गृहपति! श्रमण गोतम के साथ मैं वाद रोप, या
 दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ रोपे, 
या तू।”

🙏ऐसा कहने पर दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ ने निगण्ठनात-पुत्त से कहा--

🌷"भन्ते! (आपको) यह मत रुचे, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम के पास जाकर वाद रोपे। भन्ते! श्रमण गोतम मायावी है, (मति) फेरनेवाली माया जानता है, जिससे दूसरे तैर्थिकों (=पंथाइयों) के श्रावकों (को अपनी ओर) फेर लेता है।"

🖐"तपस्वी! यह संभव नहीं, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए। संभव है कि श्रमण गोतम (ही) उपालि गृहपति का श्रावक हो जाए। 
जा गृहपति! श्रमण गोतम के साथ इस कथा-वस्तु में वाद रोप। 
गृहपति! श्रमण गोतम के साथ मैं वाद रोपूं, या दीर्घ-तपस्वी निगंठ रोपे, या तू।”

🙏दूसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ ने...। 

🙏तीसरी बार भी...।

🌷“अच्छा भन्ते!" कह, 
उपालि गृहपति निगण्ठ नातपुत्त को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर जहां प्रावारिक अम्बवन था, जहां भगवान थे, वहां गया। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।

☝ एक ओर बैठे हुए उपालि गृहपति ने भगवान से कहा--

🙏"भन्ते! क्या दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ यहां आए थे?"

☝ “गृहपति! दीर्घ-तपस्वी निगण्ठ यहां आया था।"

🙏 “भन्ते! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ आपका कुछ कथा-संलाप हुआ।" 

☝“गृहपति! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ मेरा कुछ कथा-संलाप हुआ।”

🙏 "तो भन्ते! दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ क्या कुछ कथा-संलाप हुआ?"

🌷तब भगवान ने दीर्घ-तपस्वी निगंठ के साथ जो कुछ कथा-संलाप हुआ था, उस सबर उपालि गृहपति से कह दिया। ऐसा कहने पर उपालि गृहपति ने भगवान से कहा--

🙏“साधु! साधु! भन्ते तपस्वी! जैसा कि शास्ता के शासन के मर्मज्ञ, बहु-श्रुत, श्रावक दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने भगवान को बतलाया!! वह मुर्दा मन-दंड इस महान काया-दंड के सामने क्या शोभता है? 
पाप-कर्म के करने के लिए, पाप-कर्म की प्रवृत्ति के लिए काय-दंड ही महा-दोषी है; वैसा वचन-दंड नहीं है, वैसा मन-दंड नहीं है।"

☝“गृहपति! यदि तू सत्य में स्थिर हो मंत्रणा (=विचार) करे, तो हम दोनों का संलाप हो।"

🙏 “भन्ते! मैं सत्य में स्थिर हो मंत्रणा करूंगा। हम दोनों का संलाप हो।"

☝"क्या मानते हो गृहपति! (यदि) यहां एक बीमार-दुखित भंयकर रोगग्रस्त शीत-जल-त्यागी उष्ण-जल-सेवी निगंठ... हो, वह शीत-जल न पाने के कारण मर जाए, तो निगंठ नातपुत्त उसकी (पुनः) उत्पत्ति कहां बतलाएंगे?"

🙏“भन्ते! (जहां) मनोसत्त्व नामक देवता हैं; वह वहां उत्पन्न होगा।" 

☝“सो किस कारण?" 

🙏"भन्ते! वह मन से बंधा हुआ मरा है।"


☝“गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) करके कहो। 
तुम्हारा पूर्व (पक्ष)से पश्चिम (पक्ष) नहीं मिलता, तथा पश्चिम से पूर्व नहीं ठीक खाता। और गृहपति! तुमने यह बात (भी) कही है-भन्ते! मैं सत्य में स्थिर हो मंत्रणा करूंगा, हम दोनों का संलाप हो।”

🙏“और भन्ते! भगवान् ने भी ऐसा कहा है-पापकर्म करने के लिए काय-दंड ही महादोषी है, वैसा वचन-दंड (और) मन-दंड नहीं?”

☝“तो क्या मानते हो गृहपति! यहां एक चातुर्याम-संवर, 

((*(1) प्राण-हिंसा न करना, न अनुमोदन करना,
 (2) चोरी न करना ।
 (3) झूठ न बोलना 
 (4) भावित (=विषय-भोग) न चाहना । यह चातुर्याम संवर है।*)) 

से संवृत (=गोपित, रक्षित), सब वारि से निवारित, सब वारि (=वारितों) को निवारण करने में तत्पर, सब (पाप) वारि से धुला हुआ, सब (पाप) वारि से छूटा हुआ, निगंठ 
(निग्रंथ =जैन-साधु) है। 
वह आते-जाते बहुत से छोटे-छोटे प्राणि-समुदाय को मारता है। 
गृहपति! निगंठ नातपुत्त इसका क्या विपाक (=फल) बतलाते हैं?"

🙏"भन्ते! अनजान को निगंठ नातपुत्त महादोष नहीं कहते।”

☝ “गृहपति! यदि जानता हो।”

🙏—“(तब) भन्ते! महादोष होगा।" 

☝"गृहपति! जानने को निगंठ नातपुत्त किसमें कहते हैं?” – 

🙏 “भन्ते! मन-दंड में।"

☝ "गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) करके कहो...।”

🙏 “और भन्ते! भगवान ने भी... ।" 

☝“तो गृहपति! क्या यह नालन्दा सुख-सम्पत्ति-युक्त बहुत जनों वाली, (बहुत) मनुष्यों से भरी है?" 

🙏“हां भन्ते!"

☝“तो ... गृहपति! (यदि) यहां एक पुरुष (नंगी) तलवार उठाए आए, और कहे-इस नालन्दा में जितने प्राणी हैं, मैं एक क्षण में एक मुहूर्त में, उन (सब) का एक मांस का खलिहान, एक मांस का ढेर कर दूंगा। तो क्या गृहपति! वह पुरुष ... एक मांस का ढेर कर सकता है?"

🙏"भन्ते! दस भी पुरुष, बीस भी पुरुष, तीस ...चालीस ...पचास ... भी पुरुष, एक मांस का ढेर नहीं कर सकते, वह एक मुवा क्या है?"

☝"तो... गृहपति! यहां एक ऋद्धिमान्, 
चित्त को वश में किया हुआ, 
श्रमण या ब्राह्मण आए, 
वह ऐसा बोले-मैं इस नालंदा को एक ही मन के क्रोध से भस्मकर दूंगा। 
तो क्या ... गृहपति । वह श्रमण या ब्राह्मण इस नालंदा को (अपने) एक मन के क्रोध से भस्स कर सकता है।"

🙏“भन्ते! दस नालन्दाओं को भी... पचास नालन्दाओं को भी ...वह श्रमण या ब्राह्मण (अपने एक क्रोध से भस्म कर सकता है। 
एक मुई नालन्दा क्या है?"

☝“गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) कर कहो।" 

🙏“और भगवान ने भी..।”

☝"तो गृहपति! क्या तुमने दंडकारण्य, कलिंगारण्य, मेध्यारण्य (=मेज्झारज्ञ), मातंगारण्य का अरण्य होना सुना है?"

🙏“हां, भन्ते!"।” 

☝“तो गृहपति! तुमने सुना है, कैसे दण्डकारण्य हुआ?"

🙏 "भन्ते! मैंने सुना है-ऋषियों के मन के-कोप से दण्डकारण्य ... हुआ।"

☝"गृहपति! गृहपति! मन में (सोच) कर कहो। तुम्हारा पूर्व से पश्चिम नहीं मिलता, पश्चिम से पूर्व नहीं मिलता। और तुमने गृहपति! यह बात कही है-'सत्य में स्थिर हो मैं भन्ते! मंत्रणा (=वाद) करूंगा, हमारा संलाप हो।”

🙏“भन्ते! भगवान की पहली उपमा से ही मैं सन्तुष्ट अभिरत हो गया था। विचित्र प्रश्नों के व्याख्यान (=पटिभान) को और भी सुनने की इच्छा से ही मैंने भगवान् को प्रतिवादी बनाना पसन्द किया।"

🌷आश्चर्य! भन्ते!! आश्चर्य! भन्ते!! जैसे औंधे को सीधा कर दे... आज से भगवान मुझे सांजलि शरणागत उपासक धारण करें।”

☝“गृहपति! सोच-समझकर (काम) करो। तुम्हारे जैसे मनुष्यों का सोच-समझकर ही करना अच्छा होता है।"

🙏"भन्ते! भगवान के इस कथन से मैं और भी प्रसन्न-मन, सन्तुष्ट और अभिरत हुआ; जो कि भगवान ने मुझे कहा-
'गृहपति! सोच-समझकर करो...।' भन्ते! दूसरे तैर्थिक (=पंथाई) मुझे श्रावक पाकर, सारे नालन्दा में पताका उड़ाते–
'उपालि गृहपति हमारा श्रावक हो गया। और भगवान मुझे कहते हैं-
'गृहपति! सोच-समझकर करो...। भन्ते! यह दूसरी बार मैं भगवान की शरण जाता हूं, धर्म और भिक्खुसंघ की भी...।"

☝“गृहपति! दीर्घ-काल से तुम्हारा कुल निगण्ठों के लिए प्याऊ की तरह रहा है, 
उनके जाने पर 'पिंड नहीं देना चाहिए'-यह मत समझना।”

🙏“भन्ते! इससे और भी प्रसन्न-मन, सन्तुष्ट और अभिरत हुआ, जो मुझे भगवान ने कहा-दीर्घकाल से तेरा घर... । 
भन्ते! मैंने सुना था कि श्रमण-गोतम ऐसा कहता है-मुझे ही दान देना चाहिए, दूसरों को दान न देना चाहिए। मेरे ही श्रावकों को दान देना चाहिए, दूसरों को दान न देना चाहिये। मुझे ही देने का महा-फल होता है, दूसरों को देने का महा-फल नहीं होता। मेरे ही श्रावकों को देने का महाफल होता है, दूसरों के श्रावकों को देने का महाफल नहीं होता। 
और भगवान तो मुझे निगण्ठों को भी दान देने को कहते हैं। 
भन्ते! हम भी इसे युक्त समझेंगे। 
भन्ते! यह मैं तीसरी बार भगवान की शरण जाता हूं...।"

🌷तब भगवान ने उपालि गृहपति को आनुपूर्वी-कथा (नोट- दान-कथा, शील-कथा, स्वर्ग कथा और मार्ग-कथा को क्रमशः कहने को आनुपूर्वी कथा कहते हैं-अट्ठकथा।)  कही । जैसे कालिमा-रहित शुद्ध-वस्त्र अच्छी प्रकार रंग को पकड़ता है, इसी प्रकार उपालि गृहपति को उसी आसन पर विरज, विमल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ :-

'जो कुछ समुदय-धर्म है, वह सब निरोध-धर्म है'। 

तब उपालि गृहपति ने दृष्ट-धर्म हो भगवान से कहा

🙏“भन्ते! अब हम जाते हैं, हम बहुकृत्य, बहुकरणीय हैं।" 

☝“गृहपति! जिसका तुम काल समझो (वैसा करो)।”

☝तब उपालि गृहपति! भगवान के भाषण का अभिनन्दन कर, अनुमोदन कर, आसन से उठ, भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, जहां उसका घर था, वहां गया। जाकर द्वारपाल से बोला--

🎆“सौम्य! दौवारिक! आज से मैं निगण्ठों और निगण्ठियों के लिए द्वार बन्द करता हूं, भगवान के भिक्खु-भिक्खुनी, उपासक और उपासिकाओं के लिए द्वार खोलता हूं।"

🎆 "यदि निगण्ठ आएं, तो कहना -
‘ठहरें भन्ते! आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हुआ। 
निगंठों, निगंठियों के लिए द्वार बन्द है; 
भगवान् के भिक्खु, भिक्खुनी, उपासक, उपासिकाओं के लिए द्वार खुला है।"
🎆 "यदि भन्ते! आप को पिंड (=भिक्खा) चाहिए तो यहीं ठहरें, (हम) यहीं ला देंगे।"

🙏“अच्छा भन्ते!"
 (कह) दौवारिक ने उपालि गृहपति को उत्तर दिया।

🌷दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने सुना-
‘उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया।'
तब दीर्घ-तपस्वी निगंठ, जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां गया। जाकर निगंठ नातपुत्त से बोला

👄“भन्ते! मैंने सुना है, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया।"

✊“यह स्थान नहीं, यह अवकाश नहीं (=यह असम्भव) है, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए, और यह स्थान (=संभव) है, कि श्रमण गोतम (ही) उपालि गृहपति का श्रावक (=शिष्य) हो।”

👄दूसरी बार भी दीर्घ तपस्वी निगंठ ने कहा...। 

👄तीसरी बार भी दीर्घ तपस्वी निगंठ ने...। 

🙏"तो भन्ते! मैं जाता हूं और देखता हूं कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया, या नहीं।" 

🖐“जा तपस्वी! देख कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया, या नहीं।"

🌷तब दीर्घ-तपस्वी! निगंठ जहां उपालि गृहपति का घर था, वहां गया। द्वारपाल ने दूर से ही दीर्घ-तपस्वी निगंठ को आते देखा। देखकर दीर्घतपस्वी निगंठ से कहा--

🖐“भन्ते! ठहरो, मत प्रवेश करो। आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया। यहीं ठहरो, यहीं तुम्हें पिंड ला देंगे।"

👄“आवुस ! मुझे पिंड का काम नहीं है।”

🙏-यह कह दीर्घ-तपस्वी निगंठ जहां निगंठ नातपुत्त थे, वहां गया। जाकर निगंठ नातपुत्त से बोला👄--

🙏“भन्ते! सच ही है। उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो गया। भन्ते! मैंने आप से पहले ही न कहा था, कि मुझे यह पसन्द नहीं कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम के साथ वाद करे। श्रमण गोतम भन्ते! मायावी है, आवर्तनी माया जानता है, जिससे दूसरे तैर्थिकों के श्रावकों को फेर लेता है। भन्ते! उपालि गृहपति को श्रमण गोतम ने आवर्तनी-माया से फेर लिया।"

🖐“तपस्वी! यह... (संभव नहीं)... कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हो जाए।"

🙏दूसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी निगंठ ने निगंठ नातपुत्त से यह कहा...। 

🔱तीसरी बार भी दीर्घ-तपस्वी...।

🖐“तपस्वी! यह (संभव नहीं)। अच्छा तो तपस्वी! मैं जाता हूं। स्वयं जानता हूं, कि उपालि गृहपति श्रमण गोतम का श्रावक हुआ या नहीं।"

🚶तब निगंठ नातपुत्त बड़ी भारी निगंठों की परिषद् के साथ, जहां उपालि गृहपति का घर था, वहां गया। द्वारपाल ने दूर से आते हुए निगंठ नातपुत्त को देखा। (और) कहा__

👄“ठहरें भन्ते! मत प्रवेश करें। आज से उपालि गृहपति श्रमण गोतम का उपासक हुआ। यहीं ठहरें, यहीं आपको (पिंड) ला देंगे।" .

🖐"तो सौम्य दौवारिक! जहां उपालि गृहपति है, वहां जाओ। जाकर उपालि गृहपति से कहो-भन्ते! बड़ी भारी निगंठ-परिषद् के साथ निगंठ नातपुत्त फाटक के बाहर खड़े हैं, (और) तुम्हें देखना चाहते हैं।"

🙏“अच्छा भन्ते!”–निगंठ नातपुत्त को ऐसा कह (द्वारपाल) जहां उपालि गृहपति था, वहां गया। जाकर उपालि गृहपति से बोला--

🙏"भन्ते! निगंठ नातपुत्त...।" 

👉“तो सौम्य! दौवारिक! बिचली द्वार-शाला (=दालान) में आसन बिछाओ।"

🙏 “अच्छा भन्ते!”–उपालि गृहपति से कह, बिचली द्वार-शाला में आसन बिछा कहा

🙏"भन्ते! बिचली द्वार-शाला में आसन बिछा दिए। अब (आप) जिसका काल समझें।"

🚶तब उपालि गृहपति जहां बिचली द्वार-शाला थी, वहां गया। जाकर जो वहां अग्र, श्रेष्ठ, उत्तम, प्रणीत आसन था, उस पर बैठकर दौवारिक से बोला--

👄"तो सौम्य दौवारिक! जहां निगंठ नातपुत्त हैं, वहां जाओ, जाकर निगंठ नातपुत्त से यह कहो-

'भन्ते! उपालि गृहपति कहता है-यदि चाहें तो भन्ते! प्रवेश करें।"

“अच्छा भन्ते!”– (कह) ...दौवारिक ने... निगंठ नातपुत्त से कहा--

🙏“भन्ते! उपालि गृहपति कहते हैं-यदि चाहें तो प्रवेश करें।"

🚶निगंठ नातपुत्त बड़ी भारी निगंठ-परिषद् के साथ जहां बिचली द्वार-शाला थी, वहां गए। पहले जहां उपालि गृहपति, दूर से ही निगंठ नातपुत्त को आते देखता; देखकर अगवानी कर वहां जो अग्र, श्रेष्ठ, उत्तम, प्रणीत आसन होता, उसे (अपनी) चादर से पोंछकर, उस पर बैठाता था। सो आज जो वहां उत्तम आसन था, उस पर स्वयं बैठकर निगंठ नातपत्त से बोला

🙏"भन्ते! आसन मौजूद हैं, यदि चाहें तो
      बैठें।”

🍁 ऐसा कहने पर निगंठ नातपुत्त ने उपालि-गृहपति से कहा👄--

🖐“उन्मत्त हो गया है गृहपति! 
       जड़ हो गया है गृहपति! तू-
  'भन्ते! जाता हूं श्रमण-गोतम के साथ रोपूंगा- (कहकर) जाने के बाद बड़े भारी वाद के संघाट (जाल) में बंधकर लौटा है। जैसे कि अंड (=अंडकोश)-हारक निकाले अंडों के साथ आए; जैसे कि... अक्षि (=आंख)-हारक पुरुष निकाली आंखों के साथ आए, वैसे ही गृहपति! तू-“भन्ते! जाता हूं, श्रमण गोतम के साथ वाद रोपूंगा” (कहकर) जा, बड़े भारी वाद-संघाट में बंधकर लौटा है। गृहपति! श्रमण गोतम ने आवर्तनी माया से तेरी (मत) फेर ली है।”

🙏“सुन्दर है, भन्ते आवर्तनी माया। कल्याणी है भन्ते! आवर्तनी माया। (यदि) मेरे प्रिय जातिभाई भी इस आवर्तनीय माया द्वारा फेर लिए जाएं, (तो) मेरे प्रिय जाति-भाइयों को दीर्घ-काल तक हित-सुख होगा। यदि भन्ते! सभी क्षत्रिय इस आवर्तनी-माया से फेर लिए जायं, तो सभी क्षत्रियों का दीर्घ-काल तक हित-सुख होगा। यदि सभी ब्राह्मण... । यदि सभी वैश्य... । यदि सभी शूद्र...। यदि देव-मार-ब्रह्मा-सहित सारा लोक, श्रमण-ब्राह्मण-देव-मनुष्य-सहित सारी प्रजा (=जनता) इस आवर्तनी-माया से फेर ली जाय, तो... (उसका) दीर्घकाल तक हित-सुख होगा। भन्ते आप को उपमा कहता हूं, उपमा से भी कोई-कोई विज्ञ पुरुष भाषण का अर्थ समझ जाते हैं "  --

👄“पूर्वकाल में भन्ते! किसी जीर्ण, बूढ़े, महल्लक ब्राह्मण की एक नव-वयस्का (=दहन) माणविका (=तरुण ब्राह्मणी) भार्या गर्भिणी आसन्न-प्रसवा हुई। तब भन्ते! उस माणविका ने ब्राह्मण से कहा-'ब्राह्मण! जा बाजार से एक वानर का बच्चा (=मर्कट-शावक) खरीद ला, वह मेरे कुमार (=बच्चे) का खेल होगा।”

🍁“ऐसा बोलने पर, भन्ते! उस ब्राह्मण ने उस माणविका से कहा-भवति (=आप)! ठहरिए, यदि आप कुमार जनेंगी, तो उसके लिए मैं बाजार से मर्कट-शावक (=खिलौना) खरीद कर ला दूंगा, जो आप के कुमार का खेल (खिलौना) होगा।”
🍁"दूसरी बार भी भन्ते! उस माणविका ने...।"

🍁" तीसरी बार भी ...।"

🍁 "तब भन्ते! उस माणविका में अति-अनुरक्त, प्रतिबद्ध-चित्त उस ब्राह्मण ने बाजार से मर्कट-शावक खरीद कर, लाकर उस माणविका से कहा-
'भवति! बाजार से यह तुम्हारा मर्कट-शावक खरीदकर लाया हूं, यह तुम्हारे कुमार का खिलौना होगा।' ऐसा कहने पर भन्ते! उस माणविका ने उस ब्राह्मण से कहा-'ब्राह्मण! इस मर्कट-शावक को लेकर वहां जाओ जहां रक्त-पाणि रजक-पुत्र (=रंगरेज का बेटा) है। जाकर रक्त-पाणि रजक-पुत्र से कहो-'सौम्य! रक्तपाणि! मैं इस मर्कट-शावक को पीतावलेपन रंग से रंगा, मला, दोनों ओर पालिश किया हुआ चाहता हूं।' 

🍁तब भन्ते! इस माणविका में अति-अनुरक्त प्रतिबद्ध-चित्त वह ब्राह्मण उस मर्कट-शावक को लेकर जहां रक्तपाणि रजक पुत्र था, वहां गया, जाकर रक्त-पाणि रजक पुत्र से बोला-'सोम्य! रक्तपाणि इस...।

🍁 ऐसा कहने पर रक्त-पाणि रजक-पुत्र ने उस ब्राह्मण से कहा-'भन्ते! यह तुम्हारा मर्कट-शावक न रंगने योग्य है, और न मलने योग्य है, न मांजने योग्य है।' इसी प्रकार भन्ते! बाल (=अज्ञ) निगंठों का वाद (सिद्धांत), बालों (=अज्ञों) को रंजन करने लायक है, पंडित को नहीं। (यह) न परीक्षा (=अनुयोग)के योग्य है, न मीमांसा के योग्य है।

🍁 तब भन्ते! वह ब्राह्मण दूसरे समय *नया धुस्से* का जोड़ा ले, जहां रक्त-पाणि रजकपुत्र था, वहां गया। जाकर रक्त-पाणि रजक-पुत्र से बोला-'सौम्य! रक्त-पाणि! धुस्से का जोड़ा पीतावलेपन (=पीले) रंग से रंगा, मला, दोनों ओर से मांजा (=पालिश किया) हुआ चाहता हूं।' ऐसा कहने पर भन्ते! रक्तपाणि रजक-पुत्र ने उस ब्राह्मण से कहा-'भन्ते! यह तुम्हारा धुस्सा-जोड़ा रंगने योग्य है, मलने योग्य भी है, मांजने योग्य भी है। इसी तरह भन्ते! उन भगवान अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध का वाद पंडितों को रंजन करने योग्य है, बालों (=अज्ञों) को नहीं। (यह) परीक्षा और मीमांसा के योग्य है।"

🖐“गृहपति! राजा-सहित सारी परिषद् जानती है कि उपालि गृहपति निगंठ नातपुत्त का श्रावक है। (अब) गृहपति! तुझे जिसका श्रावक समझें?"

🔱ऐसा कहने पर उपालि गृहपति आसन से उठकर (दाहिने कन्धे को नंगाकर) उत्तरासंग (=चद्दर) को, एक कन्धे पर कर, जिधर भगवान थे उधर हाथ जोड़, नातपुत्त से बोला -

“भन्ते! सुनें मैं किसका श्रावक हूं?

🌷धीर विगत-मोह खंडित-कील विजित-विजय,
 निर्दुख सु-सम-चित्त वृद्ध-शील सुन्दर-प्रज्ञ, 
विश्व के तारक, वि-मल-उस भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥1॥ 
🌷अकथं-कथी, संतुष्ट, लोक-भोग को वमन करने वाले, मुदित, 
श्रमण-हुए-मनुज अंतिम-शरीर-नर,
 अनुपम, वि-रज-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥2॥
🌷संयम-रहित, कुशल, विनय-युक्त-बनाने वाले, श्रेष्ठ-सारथी, 
अनुत्तर (=सर्वोत्तम), रुचिर-धर्म-वान्, निराकांक्षी, प्रभाकर, 
मान-छेदक, वीर-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥3॥ 
🌷उत्तम (=निसभ), अ-प्रमेय, गम्भीर, मुनित्त्व प्राप्त,
 क्षेमंकर, ज्ञानी, धर्मार्थ-वान्, संयत-आत्मा, 
संग-रहित, मुक्त-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥4॥
🌷 नाग, एकांत-आसन-वान् संयोजन (=बन्धन)-रहित, मुक्त, 
प्रति-मंत्रक (=वाद-दक्ष), धौत, प्राप्त-ध्वज, वीत-राग,
 दान्त, निष्प्रपंच, उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥5॥
🌷 ऋषि-सत्तम, अ-पाखंडी, त्रि-विद्या-युक्त, ब्रह्म (=निर्वाण)-प्राप्त,
 स्नातक, पदक (=कवि) प्रश्रब्ध, विदित वेद,
 पुरन्दर, शक-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥6॥ 
🌷आर्य, भावित-सत्व, प्राप्तव्य-प्राप्त वैयाकरण,
 स्मृतिमान्, विपश्यी अन-अभिमानी, अन्-अवनत, 
अ-चंचल, वशी-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥7॥
🌷 सम्यग्-गत, ध्यानी, अ-लग्न-चित्त (=अन्-अनुगत-अन्तर), शुद्ध। 
अ-सित (=शुद्ध), अ-प्रहीण, प्रविवेक-प्राप्त, अग्र-प्राप्त,
 तीर्ण, तारक-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥8॥
🌷 शांत, भूरी (=बहु)-प्रज्ञ, महा-प्रज्ञ, विगत-लोभ,
 तथागत, सुगत, अ-प्रति-पुद्गल (=अ-तुलनीय)=अ-सम,
 विशारद, निपुण-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥9॥
🌷 तृष्णा-रहित, बुद्ध, धूम-रहित, अ-लिप्त,
पूजनीय=यक्ष, उत्तम-पुद्गल, अ-तुल, 
महान् उत्तम-यश-प्राप्त-उन भगवान् का मैं श्रावक हूं ॥10॥"

🖐"गृहपति! श्रमण गोतम के (ये) गुण तुझे कब (से) सूझे?"

🙏"भन्ते! जैसे नाना पुष्पों की एक पुष्प-राशि (ले) एक चतुर माली या माली का अन्तेवासी (-शिष्य) विचित्र माला गूंथे; उसी प्रकार भन्ते! वे भगवान अनेक वर्ग (=गुण) वाले, अनेक शत वर्ण वाले हैं। भन्ते! प्रशंसनीय की प्रशंसा कौन न करेगा?"

😷निगंठ नातपुत्त ने भगवान के सत्कार को न सहनकर, वहीं मुंह से गर्म लहू फेंक दिया।

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नोट- 
 (1) निगंठ नात-पुत्त वही मुंह में खून फेंक कर गिर पड़े। उन्हें उनके शिष्यों ने पालकी में बैठा कर पावा पहुंचाया। वे वहां थोड़े ही दिनों में मर गए-अट्ठकथा।

 (2) गहपति उपालि (नालंदा-वासी) 
                          व 
    अरहत उपालि (साक्य व कपिलवस्तु-वासी, प्रथम संगीति मे विनय-पिटक का संगायन करने वाले) दोनो भिन्न भिन्न पुद्गल हैं |

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