Sunday, August 4, 2019

ब्रह्मजाल-सुत्त

🌷ब्रह्मजाल-सुत्त🌷 



१-बुद्ध में साधारण बातें--आरंभिक शील, मध्यम शील, महाशील। 
२-बुद्ध में असाधारण बातें बासठ दार्शनिक मत-(१) आदि के सम्बन्ध की 18 धारणायें; (२) अन्त के सम्बन्ध की 44 धारणायें ।

ऐसा मैंने सुना--एक समय भगवान् पाँच सौ भिक्षुओं के बडे संघ के साथ राजगृह और नालन्दाके बीच लम्बे रास्ते पर जा रहे थे ।
सुप्रिय परिव्राजक भी अपने शिष्य ब्रह्मदत माणवक के साथ जा रहा था। उस समय सुप्रिय परिव्राजक अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म और संघ की निन्दा कर रहा था। किन्तु सुप्रिय का शिष्य ब्रह्मदत्त माणवक अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म और संघ की प्रशंसा कर रहा था। इस प्रकार वे आचार्य और शिष्य दोनों परस्पर अत्यन्त विरुद्ध पक्ष का प्रतिपादन करते भगवान् और भिक्षु-संघ के पीछे-पीछे जा रहे थे।
तब भगवान् भिक्षु-संघ के साथ रात-भर के लिए अम्बलठ्ठिका (नामक बाग) के राजकीय भवन में टिक गये।

सुप्रिय भी अपने शिष्य ब्रह्मदत्त के साथ उसी भवन में टिक गया। वहाँ भी सुप्रिय अनेक प्रकार ले बुद्ध, धर्म और संघ की निन्दा कर रहा था और ब्रह्मदत्त० प्रशंसा। इस प्रकार वे आचार्य और शिष्य दोनों परस्पर विरोधी पक्ष का प्रतिपादन कर रहे थे।
रात ढल जानेके बाद पौ फटने के समय उठकर बैठक में इकठ्ठ हो बैठे बहुत से भिक्षुओं में ऐसी बात चली-“आवुस ! यह बडी आश्चर्य और अद्भुत है कि सर्वज्ञ, सर्वद्रप्टा, अर्हत् और सम्यक् सम्बुद्ध भगवान् (सभी) जीवोंके (चित के) नाना अभिप्राय को ठीक-ठीक जान लेते हैं। यही सुप्रिय अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म और संघ की निन्दा कर रहा है, और उसका शिष्य ब्रह्मदत्त प्रशंसा ।

तब भगवान् उन भिक्षुओं के वार्तालाप को जान बैठक में गये, और बिछे हुए आसन पर बैठ गये।
बैठकर भगवान्ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया--"भिक्षुओ ! अभी क्या बात चल रही थी; किस बात में लगे थे ?"

इतना कहनेपर उन भिक्षुओं ने भगवान्से यह कहा-“भन्ते(स्वामिन्) ! रात के ढल जाने के बाद पौ फटने के समय उठकर बैठक में इकट्ठ बैठे हम लोगों में यह बात चली—आवुस ! यह बडा आश्चर्य और अद्भुत है कि सर्ववित्, सर्वद्रप्टा, अर्हत्, सम्यक् सम्बुद्ध भगवान् (सभी) जीवों के (चित्त के) नाना अभिप्राय को ठीक-ठीक जान लेते हैं। यही सुप्रिय० निन्दा कर रहा है और ब्रह्मदत्त प्रशंसा । इस तरह ये पीछे-पीछे आ रहे हैं। भन्ते ! हम लोगों की बात यही थी कि भगवान् पधारे।"

(भगवान् बोले-) "भिक्षुओ ! यदि कोई मेरी निन्दा करे, या धर्म की निन्दा करे, या संघ की निन्दा करे, तो तुम लोगों को न (उससे) वैर, न असन्तोष और न चित्त कोप करना चाहिए।
"भिक्षुओ ! यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की निन्दा करे, और तुम (उससे) कुपित या खिन्न हो जाओगे, तो इसमें तुम्हारी ही हानि है।
“भिक्षुओ ! यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की निन्दा करे, तो क्या तुम लोग (झट) कुपित और खिन्न हो जाओगे, और इसकी जांच भी न करोगे कि उन लोगों के कहने में क्या सच बात है और क्या झूठ ?" 
“भन्ते ! ऐसा नहीं ।”

"भिक्षुओ ! यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की निन्दा करे, तो तुम लोगों को सच और झूठ बातका पूरा पता लगानी चाहिए-क्या यह ठीक नहीं हैं, यह असत्य है, यह बात हम लोगों में नहीं है, यह बात हम लोगों में बिलकुल नहीं है ? 

"भिक्षुओ ! और यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की प्रशंसा करे, तो तुम लोगों को न आनन्दित, न प्रसन्न और न हर्षोत्फुल्ल हो जाना चाहिए । यदि तुम लोग आनन्दित, प्रसन्न और हर्षोत्फुल्ल हो जाओगे, तो उसमें तुम्हारी ही हानि है ।  "भिक्षुओ ! यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की प्रशंसा करे, तो तुम लोगों को सच और झूठ बात का पूरा पता लगाना चाहिए---क्या यह बात ठीक है, यह बात सत्य है, यह बात हम लोगों में है और यथार्थ में है। 

🌷१–बुद्ध में साधारण बातें
(१) आरम्भिक शील 
"भिक्षुओ ! यह शील तो बहुत छोटा और गौण है, जिसके कारण अनाडी लोग (पृथग् जन) मेरी प्रशंसा करते हैं। भिक्षुओ ! वह छोटा और गौण शील कौन सा है, जिसके कारण अनाडी मेरी प्रशंसा करते हैं ?-
(वे ये हैं)--श्रमण गौतम जीव हिंसा (प्राणातिपात) को छोड हिंसा से विरत रहता है। वह दंड और शस्त्र को त्यागकर लज्जावान, दयालु और सब जीवों को हित चाहनेवाला है ।
“भिक्षुओ ! अथवा अनाडी मेरी प्रशंसा इस प्रकार करते हैं--श्रमण गोतम चोरी (-अदत्तादान) को छोडकर चोरीसे विरत रहता है। वह किसी से दो-गई चीज को ही स्वीकार करता है (दत्तादायी), किसी से दी गई चीज ही की अभिलाषा करता है (दत्ताभिलाषी), और इस तरह पवित्र आत्मावाला, होकर विहार करता है।
"भिक्षुओ ! अथवा अनाडी मेरी प्रशंसा इस प्रकार करते हैं-व्यभिचार छोडकर श्रमण गौतम निकृष्ट स्त्री-संभोग से सर्वथा विरत रहता है।
"भिक्षुओ ! अथवा०-मिथ्या-भाषणको छोड श्रमण गौतम मिथ्या-भाषण से सदा विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्यव्रत, दृढ़वक्ता, विश्वास-पात्र और जैसी कहनी वैसी करनीवाला है। 

"भिक्षुओ ! अथवा--चुगली करना छोड श्रमण गौतम चुगली करने से विरत रहता है । फूट डालने के लिए न इधर की बात उधर कहता है और न उधर की बात इधर; बल्कि फूटे हुए लोगों को मिलानेवाला, मिले हुए लोगों के मेल को और भी दृढ़ करनेवाला, एकता-प्रिय, एकता-रत, एकता से प्रसन्न होने वाला और एकता स्थापित करने के लिये कहनेवाला है।
“भिक्षुओ ! अथवा०–कठोर भाषण को छोड श्रमण गौतम कठोर भाषण से विरत रहता है। वह निर्दोष, मधुर, प्रेमपूर्ण, जँचनेवाला, शिष्ट और बहुजनप्रिय भाषण करनेवाला है ।
"भिक्षुओ ! अथवा०—निरर्थक बातूनीपन को छोड श्रमण गौतम निरर्थक बातूनीपन से विरत रहता है। वह समयोचित बोलनेवाला, यथार्थवक्ता, आवश्यकोचित वक्ता, धर्म और विनय की बात बोलनेवाला तथा सारयुक्त बात कहनेवाला है।

“भिक्षुओ ! अथवा०–श्रमण गौतम किसी बीज या प्राणी के नाश करने से विरत रहता है, एकाहारी है, और बेवक्त के खाने से, नृत्य, गीत, वाद्य और अश्लील हाव-भाव के दर्शन से विरत रहता है। माला, गन्ध, विलेपन, उबटन तथा अपने को सजने-धजने से श्रमण गौतम विरत रहता है। श्रमण गौतम ऊँची और बहुत ठाट-बाटकी शय्यासे विरत रहता है । ० कच्चे अन्न ग्रहणसे विरत रहता है। ० कच्चे माँस के ग्रहण से विरत रहता है। ० स्त्री और कुमारी के ग्रहण से विरत रहता है। ० दास और दासी के ग्रहण से विरत रहता है। बकरी या भेड के ग्रहण से विरत रहता है। कुत्ता और सूअर के ग्रहण से विरत रहता है। ० हाथी, गाय, घोडा और खच्चरके ग्रहण से विरत रहता है।० खेत तथा माल असबाब के ग्रहण से विरत रहता है।० दूत के काम करने से विरत रहता है।० खरीद-बिक्री के काम करने से विरत रहता है।० तराजू, पैला और बटखरे में ठगबनीजी करने से विरत रहता है।० दलाली, ठगी और झूठा सोना-चाँदी बनाना (निकति) के कुटिल काम से, हाथ-पैर काटने, बध करने, बाँधने, लुटने-पीटने और डाका डालने के काम से विरत रहता है। "भिक्षुओ ! अनाडी तथागत की प्रशंसा इसी प्रकार करते हैं।

 🌷 ( २ ) मध्यम शील 
भिक्षुओ ! अथवा अनाडी मेरी प्रशंसा इस प्रकार करते हैं जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण (गृहस्थों के द्वारा) श्रद्धापूर्वक दिये गये भोजन को खाकर इस प्रकार के सभी बीज और सभी प्राणी के नाशमें लगे रहते हैं, जैसे—मूलबीज (जिनका उगना मूल से होता है), स्कन्धबीज (जिनका प्ररोह गाँठ से होता है, जैसे-ईख), फलबीज और पाँचवाँ अग्रबीज (ऊपर से उगता पौधा) । उस प्रकार श्रमण गौतम बीज और प्राणीका नाश नहीं करता।

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार के जोडने और बटोरने में लगे रहते हैं, जैसे—अन्न, पान, वस्त्र, वाहन, शय्या, गन्ध तथा और भी वैसी ही दूसरी चीजों का इकट्ठा करना, उस प्रकार श्रमण गौतम जोडने और बटोरने में नहीं लगा रहता।

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार के अनुचित दर्शन में लगे रहते हैं, जैसे-नृत्य, गीत, बाजा, नाटक, लीला, ताली, ताल देना, घडीपर तबला बजानी, गीतमण्डली, लोहे की गोली का खेल, बाँस का खेल, धोफ्न,' हस्ति-युद्ध, अश्व-युद्ध, महिष-युद्ध, वृषभ-युद्ध, बकरों का युद्ध, भेडो का युद्ध, मुर्गो का लडाना, बत्तक को लडाना, लाठी का खेल, मुष्टि-युद्ध, कुश्ती, मारपीट का खेल, सेना, लडाई की चालें इत्यादि उस प्रकार श्रमण गौतम अनुचित दर्शन में नहीं लगा रहता है।

“भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण  जूआ आदि खेलों के नशे में लगे रहते हैं, जैसे-अष्टपद, दशपद, आकाश, परिहारपथ, सन्निक, खलिक, घटिक, शलाक-हस्त, अक्ष, पंगचिर, वंकक, मोक्खचक, चिलिगुलिक, पत्ताल्हक, रथ की दौड, तीर चलाने की बाजी, बुझौअल, और नकल, उस प्रकार श्रमण गौतम जूआ आदि खेलों के नशे में नहीं पडता है।

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस तरह की ऊँची और ठाट-बाट की शय्यापर सोते हैं, जैसे-दीर्घ आसन, पलंग, बडे बडे रोयेंवाला आसन, चित्रित आसन, उजला कम्बल, फूलदार बिछावन, रजाई, गद्दा, सिंह-व्याघ्र आदि के चित्रवाला आसन, झालरदार आसन, काम किया हुआ आसन, लम्बी दरी, हाथी का साज, घोडे का साज, रण का साज, कदलिमृग के खाल का बना आसन, चँदवादार आसन, दोनों ओर तकिया रखा हुआ (आसन) इत्यादि; उस प्रकार श्रमण गौतम ऊँची और ठाट-बाटकी शय्या पर नहीं सोता।

"भिक्षुओ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार अपने को सजने-वजने में लगे रहते हैं, जैसे--उबटन लगवाना, शरीर को मलवाना, दूसरे के हाथ नहाना, शरीर दबवाना, दर्पण, अंजन, माला, लेप, मुख-चूर्ण, मुख-लेपन, हाथ के आभूषण, शिखा में कुछ बाँधना; छडी, तलवार, छाता, सुन्दर जूता, टोपी, मणि, चंवर, लम्बे-लम्बे झालरवाले साफ उजले कपडे इत्यादि, उस प्रकार श्रमण गौतम अपनेको सजने-धजने में नहीं लगा रहता। 

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकारकी व्यर्थकी (तिरश्चीन) कथा में लगे रहते हैं, जैसे-राजकथा, चोर, महामंत्री, सेना, भय, युद्ध, अन्न, पान, वस्त्र, शय्या, माला, गन्ध, जाति, रथ, ग्राम, निगम, नगर, जनपद, स्त्री, मूर, नीरस्ता (विशिखा), पनघट, और भूत-प्रेत की कथायें, संसार की विविध घटनाएँ, सामुद्रिक घटनाएँ, तथा इसी तरहकी इधर उधर की जनश्रुतियाँ; उस प्रकार श्रमण गौतम तिरश्चीन कथाओं में नहीं लगता।

"भिक्षओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्राण इस प्रकारकी लडाई-झगडो की बातों में लगे रहते हैं, जैसे-तुम इस मत (धर्मविनय)को नहीं जानते, मैं जानता हूँ, तुम क्या जानोगे ? तुमने इसे ठीक नहीं समझा है; मैं इसे ठीक-ठीक समझता हूँ। मैं धर्मानुकूल कहता हूँ। तुम धर्म-विरुद्ध कहते हो; जो पहले कहना चाहिए था, उसे तुमने पीछे कह दिया, और जो पीछे कहना चाहिए था, उसे पहले कह दिया; बात कट गई; तुम पर दोषारोपण किया गया; तुम पकड लिये गये; इस आपत्ति मे छूटने की कोशिश करो; यदि सको, तो उत्तर दो इत्यादि; इस प्रकार श्रमण गौतम लडाई-झगडे की बात में नहीं रहता।

"भिक्षुओ ! अथवा--जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण (इधर-उधर) जैसे-राजा, महामन्त्री, क्षत्रिय, ब्राह्मणों, गृहस्थों, कुमारों के दूत का काम करते फिरते हैं, वहाँ जाओ, यहाँ आओ, यह लाओ, यह वहाँ ले जाओ इत्याद; उस प्रकार श्रमण गौतम दूत का काम नहीं करता।

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण पाखंडी और वंचक, बातूनी, जोतिष के पेशावाले, जादू-मन्त्र दिखाने वाले और लाभ से लाभ की खोज करते हैं, वैसा श्रमण गौतम नहीं है।

🌷 (३) महाशील 
जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक दिये गये भोजनको खाकर इस प्रकारकी हीन (नीच) विद्या से जीवन बिताते हैं, जैसे--अंगविद्या, उत्पाद०, स्वप्न०, लक्षण, मूषिक-विप० अग्निहवन, दर्वी-होम, तुष-होम, कण-होम, तण्डले-होम, घृत-होम, तैल-होम, मुख मैं घी लेकर कुले से होम, रुधिर-होम, वास्तुविद्या, क्षेत्रविद्या, शिव०, भूत, भूरि०, मर्प ०, विष०, बिच्छू के झाड-फूक की विद्या, मूषिक विद्या, पक्षि०, शरपरित्राण (मन्त्र जाप, जिससे लडाई में बाण शरीर पर न गिरे), और मृगचक्र; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकार की हीन विद्या से निन्दित जीवन नहीं बिताता।

"भिक्षुओ ! अथवा०—जिस प्रकार कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे--मणि-लक्षण, वस्त्र, दण्ड लक्षण, असि लक्षण, वाण लक्षण, धनुष लक्षण, आयुध लक्षण, स्की लक्षण, पुरुष लक्षण, कुमार लक्षण, कुमारी लक्षण, दास लक्षण, दासी लक्षण, हस्ति लक्षण, अश्व लक्षण, भैस लक्षण, वृषभ लक्षण, गाय लक्षण, अज लक्षण, मेष लक्षण, मुर्गा लक्षण, बत्तक लक्षण, गोह लक्षण, कणिका लक्षण, कच्छप लक्षण और मृगलक्षण; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकारको हीन विद्यासे निन्दित जीवन नहीं बिताता ।

"भिक्षुओ ! अथवा- कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से जिस प्रकार निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे-राजा बाहर निकल जायेगा नहीं निकल जायेगा, यहाँ का राजा बाहर निकल जायगा, बाहर को राजा यह आवेगा, यहाँ के राजा की जीत होगी और बाहर के राजा की हार, यहाँ के राजा की हार होगी और बाहर के राजा की जीत, इसकी जीत होगी और उसकी हार; श्रमण गौतम इस प्रकार की हीन विद्या से निन्दित जीवन नहीं बिताता। 

"भिक्षओ ! अथवा-- कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे–चन्द्र-ग्रहण होगा, सूर्य-ग्रहण, नक्षत्रग्रहण, चन्द्रमा और सूर्य अपने-अपने मार्ग ही पर रहेंगे, चन्द्रमा और सूर्य अपने मार्ग से दूसरे मार्ग पर चले जायेंगे, नक्षत्र अपने मार्ग पर रहेगा, मार्ग से हट जायगा, उल्कापात होगा, दिशा दाह होगा, भूकम्प होगा, सूखा बादल गरजेगा, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्रों का उदय, अस्त, सदोष होगा और शुद्ध होना होगा, चन्द्र-ग्रहण का यह फल होगी, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्र के उदय, अस्त सदोष या निर्दोष होने से यह फल होगा; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकार को हीन विद्या मे निन्दित जीवन नहीं बिताता।

"भिक्षुओ ! अथवा०— कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे-अच्छी वृष्टि होगी, बुरी०, सस्ती होगी, महँगी पडेगी, कुशल होगा, भय होगा, रोग होगा, आरोग्य होगा, हस्तरेखा-विद्या, गणना, कवितापोट इत्यादि; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकार को हीन विद्या मे निन्दित जीवन नहीं बिताता।
 
"भिक्षुओ ! अथवा०— कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे—सगाई, विवाह, विवाह के लिए उचित नक्षत्र बताना, तलाक देने के लिए उचित नक्षत्र बताना, उधार यो ऋण में दिये गये धन के वसूल करने के लिए उचित नक्षत्र बताना, उधार या ऋण देनेके लिए उचित नक्षत्र बताना, सजना-धजना, नष्ट करना, गर्भपुष्टि करना, मन्त्र बल से जीभ को बाँध देना, ठुड्डी को बाँध देना, दूसरे के हाथ को उलट देना, दूसरे के कान को बहरा बना देना, दर्पण पर देवता बुलाकर प्रश्न पूछना, कुमारी के शरीर पर और देववाहिनी के शरीरधर देवता बुलाकर प्रश्न पूछना, सूर्य-पूजा, महाब्रह्म-पूजा, मन्त्र के बल मुंहसे अग्नि निकालना; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकार को हीन विद्या मे निन्दित जीवन नहीं बिताता।
 
"भिक्षुओ ! अथवा० कितने श्रमण और ब्राह्मण इस प्रकार हीन विद्या से निन्दित जीवन बिताते हैं, जैसे-मिन्नत मानना, मिन्नत पुराना, मन्त्र को अभ्यास करना, मन्त्रबल से पुरुष को नपुंसक और नपुंसक को पुरुष बनाना, इन्द्रजाल, बलिकर्म, आचमन, म्नान-कार्य, अग्नि-होम, दवा देकर वमन, विरेचन, ऊर्चीवरेचन, शिरोविरेचन कराना, कान में डालने के लिए तेल तैयार कराना, आँग्वके लिये०, नाक में तेल देकर छिकवाना, अंजन तैयार करना, छुरी काँटा की चिकित्सा करना, वैद्यकर्म; उस प्रकार श्रमण गौतम इस प्रकार को हीन विद्या मे निन्दित जीवन नहीं बिताता।

"भिक्षुओ ! यह शील तो बहुत छोटे और गौण है, जिसके कारण अनाडी लोग मेरी प्रशंसा करते हैं।

🌷२-बुद्ध में असाधारण बातें
बासठ दार्शनिक मत 
“भिक्षुओ ! (इनके अतिरिक्त) और दूसरे धर्म हैं, जो गम्भीर, दुर्जेय, दुरनुबोध, शान्त, सुन्दर, अतर्कवचर (...जो तर्क से नहीं जाने जी सकते), निपुण और पंडितो के समझने योग्य हैं, जिन्हें तथागत स्वयं जानकर और साक्षात्कर कहते हैं, और जिन्हें तथागत के यथार्थ गुण को ठीक-ठीक कहने वाले कहते हैं।

🌷(१)  आदिके सम्बन्धकी 18 धारणायें 
"भिक्षुओ ! वे धर्म कौन से है ?
"भिक्षुओ ! कितने ही श्रमण और ब्राह्मण हैं, जो 18 कारणों से पूर्वान्त-कल्पिक-आदिम छोरवाले मत को माननेवाले और पूर्वान्नके आधार पर अनेक (केवल) व्यहवहार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे किस कारण और किस प्रमाण के बल पर पूर्वान्त के आधारपर अनेक व्यवहार के शब्दोंका प्रयोग करते हैं।
"भिक्षुओ ! कितने ही श्रमण और ब्राह्मण नित्यवादी (शाश्वतवादी) हैं, जो चार कारणों से आत्मा और लोक दोनों को नित्य मानते हैं ? वे किस कारण और किस प्रमाण के बल पर आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं ?

🌷१----शाश्वत-वाद--(१) 
“भिक्षुओ ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर-चित्त से उस प्रकार चित्तसमाधि को प्राप्त करता है, जिसे समाधिप्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के-जैसे एक सौ० हजार० लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है— मैं इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहाँ मरकर वहाँ उत्पन्न हुआ । वहाँ भी मैं इस नाम का इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहाँ मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ।
“इस प्रकार वह अपने पूर्वजन्म के सभी आकार प्रकार को स्मरण करता है। वह (इसी के बल पर) कहता है-आत्मा और लोक नित्य, अपरिणामी, कूटस्थ और अचल हैं। प्राणी चलते, फिरते, उत्पन्न होते और मर जाते हैं, (किन्तु) अस्तित्व नित्य है।
“सो कैसे ?  मैं भी ० उस प्रकार को चितसमाधि को प्राप्त करता हूँ, जिस समाहित चित्त में अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है। अतः ऐसा जान पडता है, मानो आत्मा और लोक नित्य हैं।
"भिक्षुओ ! यह पहला कारण है, जिस प्रमाण के आधार पर कितने श्रमण और ब्राह्मण शाश्वतवादी हो, आत्मा और लोक को नित्य बताते हैं।

"(२) दूसरे, वे किस कारण और किस प्रमाण के आधार पर आत्मा और लोक को शाश्वत मानते हैं ? 
"भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण० उस प्रकार की चित्तसमाधि को प्राप्त करना है, जिस समाहित चित्त में अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों को जैसे-एक संवर्त-विवर्त (कल्प), दस संवर्त--में इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहाँ मरकर वहाँ उत्पन्न हुआ । ०स्मरण करता है, सो मैं वहाँ मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ।
“इस प्रकार वह अपने पूर्व जन्म के सभी आकार-प्रकारों को स्मरण करता है। अतः वह (इसी के बल पर) कहता है—अत्मा और लोक दोनों नित्य हैं। प्राणी० मर जाते है; किन्तु अस्तित्व नित्य है। 
सो कैसे ? मैं भी० उस प्रकार की चित्तसमाधी को प्राप्त करता हूँ, जिस समाहित चित्त में अनेक प्रकार के पूर्व जन्मोंकी स्मृति हो जाती है । अतः ऐसा जान पडता है, मानो आत्मा और लोक नित्य है।
"भिक्षुओ ! यह दूसरा कारण है । जिस प्रमाण के आधार पर कितने श्रमण और ब्राह्मण शाश्वतवादी हो, आत्मा और लोक को नित्य बताते हैं। 

(३) "तीसरे, वे किस कारण आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं ?
"भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण उस चितसमाधि को प्राप्त करता है, जिस समाहित चित्त में अनेक प्रकार के पूर्व जन्मो को स्मरण करता है, जैसे-दस संवर्त-विवर्त कल्प, बीस०, तीस०, चालीस संवर्त-विवतं कल्प --में इस नाम का था, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहाँ मरकर वहाँ उत्पन्न हुआ । ०स्मरण करता है, सो मैं वहाँ मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ।
“इस प्रकार वह अपने पूर्व जन्म के सभी आकार-प्रकारों को स्मरण करता है। सो मैं वह मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ। अतः वह (इसी के बलपर) कहता है --आत्मा और लोक दोनों नित्य हैं। प्राणी० मर जाते हैं; किन्तु अस्तित्व नित्य है ।
'सो कैसे ? मै भी उस चित्त-समाधि को प्राप्त करता हूँ, जिस समाहित चित्त में अनेक प्रकारके पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है । अतः ऐसा जान पडता है, मानो आत्मा और लोक नित्य हैं।
"भिक्षुओ यह तीसरा कारण है । जिस प्रमाण के आधार पर कितने श्रमण और ब्राह्मण शाश्वतवादी हो, आत्मा और लोक को नित्य बताते हैं।

(४) "चौथे, वे किस कारण आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं ? "भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण तर्क करनेवाला है। वह अपने तर्क से विचारकर ऐसा मानता है- आत्मा और लोक नित्य, अपरिणामी, कूटस्थ और अचल हैं। प्राणी चलते, फिरते, उत्पन्न होते और मर जाते हैं, (किन्तु) अस्तित्व नित्य है।
“भिक्षुओ ! यह चौथा कारण है। जिस प्रमाण के आधार पर कितने श्रमण और ब्राह्मण शाश्वतवादी हो, आत्मा और लोक को नित्य बताते हैं।

"भिक्षुओ ! इन्हीं चार कारणों से शाश्वतवादी श्रमण और ब्राह्मण आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं। जो कोई आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं, उनके यही चार कारण हैं। इनको छोड और कोई कारण नहीं है।
‘‘तथागत उन सभी कारणों को जानते हैं, उन कारणों के प्रमाण और प्रकार को जानते हैं, और अधिक भी जानते हैं; जानकर भी “मैं जानता हूँ” ऐसा अभिमान नहीं करते। अभिमान न करते हुए स्वयं मुक्ति को जान लेते हैं। वेदनाओं की उत्पत्ति (समुदय), अन्त, रस (आस्वाद), दोष और निराकरण को ठीक-ठीक जानकर तथागत अनासक्त होकर मुक्त रहते हैं। भिक्षुओ ! वे धर्म गम्भीर, दुर्जेय, दुरनुबोध, शान्त, उत्तम, अतर्कावचर, निपुण और पंडितों के समझने योग्य हैं, जिन्हें तथागत स्वयं जानकर और साक्षात्कर कहते हैं, जिसे कि तथागत के यथार्थ गुण को कहने वाले कहते हैं।

🌷 (इति) प्रथम भाणार ॥१॥ 
२-नित्यता-अनित्यता-वाद (५)—
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण है, जो अंशतः। नित्य और अंशत: अनित्य माननेवाले हैं। वे चार कारणोंसे आत्मा और लोकको अंशतः नित्य और अंशतः अनित्य मानते हैं। वे किस कारण और किस प्रमाण के बल पर आत्मा और लोक को अंशतः नित्य और अंशतः अनित्य मानते हैं ?

"भिक्षुओ ! बहुत वर्ष के बीतने पर एक समय आता है, जब इस लोक का प्रलय (संवर्त) हो जाता है । प्रलय हो जाने के बाद आभास्वर ब्रह्मलोक के रहने वाले वहाँ मनोमय, प्रीतिभक्ष (समाधिज प्रीति में रत रह्नेवाले) प्रभावान्, अन्तरिक्षचर, मनोरम वस्त्र और आभरण से युक्त बहुत दीर्घ काल तक रहते हैं। 
"भिक्षुओ ! बहुत वर्षों के बीतने पर एक समय आता है, जब उस लोक को प्रलय हो जाता है । प्रलय हो जाने के बाद सूना (शून्य) ब्रह्मविमान उत्पन्न होता है । तब कोई प्राणी आयु या पुण्य के क्षय होने से आभास्वर ब्रह्मलोक से गिरकर ब्रह्मविमान में उत्पन्न होता है । वह वहाँ मनोमय प्रीतिभक्ष (समाधिज प्रीति में रत रह्नेवाले) प्रभावान्, अन्तरिक्षचर, मनोरम वस्त्र और आभरण से युक्त बहुत दीर्घ काल तक रहता हैं। वहां वह अकेले बहुत दिनों तक रहकर ऊब जाता है, और उसे भय होने लगता है-अहो ! यहाँ दूसरे भी प्राणी आवे !  

“तब. (कुछ समय बाद) दूसरे भी आयु और पुण्य के क्षय होने से आभास्वर ब्रह्मलोक से गिरकर ब्रह्मविमान में उत्पन्न होते हैं । वे उस (पहले) सत्व के साथी होते हैं। वे भी वहाँ मनोमय प्रीतिभक्ष (समाधिज प्रीति में रत रह्नेवाले) प्रभावान्, अन्तरिक्षचर, मनोरम वस्त्र और आभरण से युक्त बहुत दीर्घ काल तक रहते हैं। "वहाँ जो सत्व पहले उत्पन्न होता है, उसके मन में ऐसा होता है-मैं ब्रह्मा, महाब्रह्मा, अभिभू, अजित, सर्वद्रष्टा, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, महायशस्वी, वशी और हुए और होनेवाले (प्राणियों) का पिता हूँ; ये प्राणी मेरे ही द्वारा निर्मित हुए हैं। 
सो कैसे ? मेरे ही मन में पहले ऐसा हुआ था-अहो ! दूसरे भी जीव यहाँ आवे । फिर मेरी ही इच्छा से ये सत्व यहाँ उत्पन्न हुए हैं।

"जो प्राणी पीछे उत्पन्न हुए थे, उनके मन में भी ऐसा हुआ--यह ब्रह्मा, महाब्रह्मा  अभिभू, अजित, सर्वद्रष्टा, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, महायशस्वी, वशी और हुए और होनेवाले (प्राणियों) का पिता है । हम सभी इसी ब्रह्मा द्वारा निर्मित किये गये हैं। सो किस हेतु इनको हम लोगों ने पहले ही उत्पन्न देखा, हम लोग तो इनके पीछे उत्पन्न हुए। अतः जो (हम लोगों से) पहले ही उत्पन्न हुआ, वह हम लोगों से दीर्घ आयु का, अधिक गुणपूर्ण और अधिक यशस्वी है, और जो (हम सब) प्राणी उसके पीछे हुए वे अल्प आयु के, अल्पगुणों से युक्त और अल्प यशवाले हैं।

"भिक्षुओ! तब कोई प्राणी वहाँ से च्युत होकर यहाँ उत्पन्न होता है। यहाँ आकर वह घर से बे-घर हो साधु हो जाता है। वह  उस चित्तसमाधि को प्राप्त करता है, जिस समाहित चित्त में वह अपने पहले जन्म को स्मरण करता है, उससे पहले को नहीं,०। वह ऐसा कहता है-जो ब्रह्मा, महाब्रह्मा है, जिसके द्वारा हम लोग निमित किये गये हैं, वह नित्य, ध्रुव, शाश्वत, अपरिणामधर्मा और अचल है , और ब्रह्मा से निर्मित किये गये हम लोग अनित्य, अध्रुव, अशाश्वत, परिणामी और मरणशील हैं।
"भिक्षुओ ! यह पहला कारण हैं, जिसके प्रमाण के बलपर वे आत्मा और लोक को अंशतः नित्य और अंशत: अनित्य मानते हैं।

(६) "दुसरे ०?  भिक्षुओ ! क्रीडाप्रदूषिक नाम के कुछ देव हैं । वे बहुत काल तक रमण क्रीडा में लगे रहते हैं। उससे उनकी स्मृति क्षीण हो जाती है। स्मृति के क्षीण हो जाने से वे उस शरीर से च्युत हो जाते है, और यहाँ उत्पन्न होते हैं । यहाँ आकर साघु हो जाते हैं। साधु हो उस चित्तसमाधि को प्राप्त करते हैं, जिस समाहित चित्त में अपने पहले जन्म को स्मरण करते हैं, उसके पहले को वह ऐसा कहते हैं जो क्रीडाप्रदूषिक देव नहीं होते हैं, वे बहुत काल तक रमण-क्रीडा में लगे होकर नहीं विहार करते। इससे उनकी स्मृति क्षीण नहीं होती। स्मृति के क्षीण न होने के कारण वे उस शरीर से च्युत नहीं होते, वे नित्य, ध्रुव रहते हैं; और जो हम लोग क्रीडा-प्रदूषिक देव हैं, सो बहुत काल तक रमण-क्रीडा में लगे होकर विहार करते रहे, जिससे हम लोगों की स्मृति क्षीण हो गई । स्मृति के क्षीण होने से हम लोग उस शरीर से च्युत हो गये । अतः हम लोग अनित्य, अधृव मरणशील हैं।
"भिक्षुओ ! यह दूसरा कारण है, जिसके प्रमाण के बलपर वे आत्मा और लोक को अंशतः नित्य और अंशतः अनित्य मानते हैं।

"(७) तीसरे ०? भिक्षुओ ! मनःप्रदूषिक नाम के कुछ देव हैं। वे बहुत काल तक परस्पर एक दूसरे को क्रोध से देखते हैं। उससे वे एक दूसरे के प्रति द्वेष करने लगते है। एक दूसरे प्रति बहुत काल तक द्वेष करते हुए शरीर और चित्त से क्लान्त हो जाते हैं, अतः वे देव उस शरीर से च्युत हो जाते हैं। 
"भिक्षुओ ! तब कोई प्राणी उस शरीर से च्युत होकर यहाँ (इस लोक में) उत्पन्न होते हैं । यहाँ आकर साधु हो जाते हैं। साधु हो उस समाधि को प्राप्त करते हैं, जिस समाहित चित्त से अपने पहले जन्म को स्मरण करते हैं, उसके पहले को नहीं । (तब) वह ऐसा कहते हैं जो मनःप्रदूषिक देव नहीं होते, वे बहुत काल तक एक दूसरे को क्रोध की दृष्टि से नहीं देखते रहते, जिससे उनमें परस्पर द्वेष भी नहीं उत्पन्न होता । द्वेष नहीं करने में वे शरीर और चित्त मे क्लान्त भी नहीं होते । अतः वे उस शरीर से च्युत भी नहीं होते । वे नित्य, ध्रुव० हैं।
और जो हम लोग मनःप्रदूषिक देव थे, सो० क्रोध, द्वेष करते रहे, (और) मन तथा शरीर से थक गये । अतः हम लोग उस शरीर से च्युत हो गये । हम लोग अनित्य, अध्रुव० है ।
"भिक्षुओ ! यह तीसरा कारण हैं । जिसके प्रमाण के बलपर वे आत्मा और लोक को अंशतः नित्य और अंशतः अनित्य मानते हैं।

"(८) चौथे ? भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण तर्क करने वाले है ? वे तर्क और न्याय से ऐसा कहते हैं--जो यह चक्षु, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा और शरीर है, वह अनित्य, अधुव है, और (जो) यह चित्त, मन या विज्ञान है (वह) नित्य, ध्रुव हैं ।
“भिक्षुओ । यह चौथा कारण है जिसके प्रमाण के बलपर वे आत्मा और लोक को अंशतः नित्य और अंशतः अनित्य मानते हैं।

"भिक्षुओ ! ये ही श्रमण और ब्राह्मण अंशतः नित्य और अंशत: अनित्य मानते हैं। वे सभी इन्हीं चार कारणों से ऐसा मानते हैं; इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है।
"भिक्षुओ ! तथागत उन सभी कारणों को जानते हैं, उन कारणों के प्रमाण और प्रकार को जानते हैं, और अधिक भी जानते हैं; जानकर भी “मैं जानता हूँ” ऐसा अभिमान नहीं करते। अभिमान न करते हुए स्वयं मुक्ति को जान लेते हैं। वेदनाओं की उत्पत्ति (समुदय), अन्त, रस (आस्वाद), दोष और निराकरण को ठीक-ठीक जानकर तथागत अनासक्त होकर मुक्त रहते हैं। भिक्षुओ ! वे धर्म गम्भीर, दुर्जेय, दुरनुबोध, शान्त, उत्तम, अतर्कावचर, निपुण और पंडितों के समझने योग्य हैं, जिन्हें तथागत स्वयं जानकर और साक्षात्कर कहते हैं, जिसे कि तथागत के यथार्थ गुण को कहने वाले कहते हैं।

🌷३-सान्त-अनन्त-वाद-(९) 
"भिक्षुओ! कितने श्रमण और ब्राह्मण चार कारणों से अन्तानन्तवादी हैं, जो लोक को सान्त और अनन्त मानते हैं। वे किस कारण ऐसा मानते है ?. .
"भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण उस चित्तसमाधि को प्राप्त करता है, जिस समाहित चित्त में 'लोक सान्त हैं। ऐसा भान होता है। वह ऐसा कहता है-यह लोक सान्त और परिछिन्न है । सो कैसे ? मुझे समाहित चित्त में 'लोक सान्त है', ऐसा भान होता है, इसी से मैं समझता हूँ कि लोक सान्त और परिछिन्न हैं।
"भिक्षुओ ! यह पहला कारण है कि जिससे वे लोक को सान्त और अनन्त मानते हैं। 

"(१०) दूसरे ? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण समाहित चित्त से ‘लोक अनन्त है ऐसा भान होता है । वह ऐसा कहता है-यह लोक अनन्त है, इसका अन्त कहीं नहीं है। जो ऐसा कहते हैं कि यह लोक सान्त और परिच्छिन्न है, वे मिथ्या कहने वाले हैं। (यथार्थ में) यह लोक अनन्त है, इसका अन्त कहीं नहीं है । सो कैसे ? मुझे समाहित चित्त 'लोक अनन्त है' ऐसा भान होता है, अतः मैं समझता हूँ कि यह लोक अनन्त है ।
"भिक्षुओ ! यह दूसरा कारण है कि जिससे वे० लोक को सान्त और अनन्त मानते हैं। 

"(११) तीसरे ०? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण समाहित चित्त से ‘यह लोक ऊपर से नीचे सान्त और दिशाओं की ओर अनन्त है', ऐसा भान होता है। वह ऐसा कहना है---यह लोक सान्त और अनन्त दोनों है। जो लोक को सान्त बताते हैं और जो अनन्त, दोनों मिथ्या कहनेवाले हैं। (यथार्थ में) यह लोक सान्त और अनन्त दोनों है । सो कैसे ? मुझे समाहित चित्त से  ऐसा भान होता हैं, जिससे मैं समझता हूँ कि यह लोक सान्त और अनन्त दोनों है।
"भिक्षुओ ! यह तीसरा कारण है कि जिससे वे  लोक को सान्ति और अनन्त मानते हैं।

"(१२) चौथे ०? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण तर्क करनेवाला होता है। वह अपने तर्क मे ऐसा समझता है कि यह लोक ने सान्त है और न अनन्त ।' जो ० लोक को सान्त, या अनन्त, (सान्तानन्त) मानते हैं, सभी मिथ्या कहनेवाले हैं। (यथार्थ में) यह लोक न सान्त और न अनन्त है।
"भिक्षुओ ! यह चौथा कारण है कि जिससे वे लोक को सान्त और अनन्त मानते हैं।
“भिक्षुओ ! इन्हीं चार कारणों से कितने श्रमण अन्तानन्तवादी हैं; लोक को सान्त और अनन्त बनाते हैं। वे सभी इन्ही चार कारणों से ऐसा कहते हैं। इन्हें छोड और कोई दूसरा कारण नहीं है।
"भिक्षुओ ! उन कारणों को तथागत जानते हैं ।

"भिक्षुओ! कुछ श्रमण और ब्राह्मण अमराविक्षेपवादी हैं, जो चार कारणों से प्रश्नों के पूछे जानेपर उत्तर देनेमें  घबडा जाते हैं ? वे क्यों घबडा जाते हैं ?

🌷४-*अमराविक्षेप-वाद-(१३) 
“भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण ठीक से नहीं जानता कि यह अच्छा है और यह बुरा । उसके मन में ऐसा होता है-मैं ठीक से नहीं जानता हूँ कि यह अच्छा है और यह बुरा। तब मैं ठीक से बिना जाने कह दूँ-'यह अच्छा है' और 'यह बुरा', यदि यह अच्छा है' या 'यह बुरा है तो यह असत्य ही होगा। जो मेरा असत्य-भाषण होगा, सो मेरा घातक (नाश का कारण) होगा, और जो घातक होगा, वह अन्तराय (मुक्तिमार्ग में विघ्नकारक) होगा। अतः वह असत्य-भाषण के भय और घृणा से न यह कहता है कि 'यह अच्छा है और न यह कि 'यह बुरा' ।
"प्रश्नों के पूछे जानेपर कोई स्थिर बातें नहीं करता—यह भी मैंने नहीं कहा, वह भी नहीं कहा, अन्यथा भी नहीं, ऐसा नहीं है-यह भी नहीं, ऐसा नहीं नहीं है- यह भी नहीं कहा। भिक्षुओ ! यह पहला कारण है जिससे कितने अमराविक्षेपवादी श्रमण या ब्राह्मण प्रश्नों के पूछे जानेपर कोई स्थिर बात नहीं कहते । "

(१४) दूसरे० ? भिक्षुओं ! जब कोई श्रमण या ब्राह्मण ठीक से नहीं जानता, कि यह अच्छा है और यह बुरा । उसके मन में ऐसा होता है मैं ठीक से नहीं जानता हूँ कि यह अच्छा है और यह बुरी तब यदि मैं बिना ठीकसे जाने कह दूं तो यह मेरा लोभ, राग, द्वेष और क्रोध ही होगा। लोभ, राग और क्रोध मेरा उपादान (संसार की ओर आसक्ति) होगा । जो मेरा उपादान होगा, वह मेरा घात होगा, और घात मुक्ति के मार्ग में विघ्नकर होगा । अतः वह उपादान के भय से और घृणा मे यह भी नहीं कहता कि यह अच्छा है, और यह भी नहीं कहता कि यह बुरा है। प्रश्नों के पूछे जानेपर कोई स्थिर बात नहीं कहता-मैं यह भी नहीं कहता, वह भी नहीं कहता ।
“भिक्षुओ ! यह दूसरा कारण है कि जिससे वे कोई स्थिर बात नहीं कहते। 

"(१५) तीसरे० ? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण यह ठीक से नहीं जानता कि यह अच्छा है और यह बुरा। उसके मनमें  ऐसा होता है - यदि मैं बिना ठीक मे जाने कह दूँ ०, और जो श्रमण और ब्राह्मण पण्डित, निपुण, बडे शास्त्रार्थ करने वाले, कुशाग्रबुद्धि तथा दूसरे के सिद्धान्तों को अपनी प्रज्ञा से काटनेवाले हैं, वे यदि मुझ से पूछे, तर्क करें, या बातें करें, और मैं उसका उत्तर न दे सकूं तो यह मेरा विघात (दुर्भाव) होगा । जो मेरा विघात होगा, वह मेरी मुक्ति के मार्ग में बाधक होगा। अतः, वह पूछे जाने के भय और घृणा से न तो यह कहता है कि यह अच्छा है और न यह कि यह बुरा है । प्रश्नों के पूछे जानेपर कोई स्थिर बात नहीं करता–मैं यह भी नहीं कहता, वह भी नहीं कहता ॥ 
"भिक्षुओ ! यह तीसरा कारण है, जिससे वे कोई स्थिर बात नहीं कहते ।

 (१६) चौथे ०?  भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण मन्द और महामूढ़ होता है। वह अपनी मन्दता और महामूढ़ता के कारण प्रश्नों पूछे जाने पर कोई स्थिर बात नहीं कहता । यदि मुझे इस तरह पूछे---‘क्या परलोक है ?' और यदि मैं समझुँ कि परलोक है, तो कहूँ कि 'परलोक है। मैं ऐसा भी नहीं कहता, वैसा भी नहीं कहता । यदि मुझे पूछे, 'क्या परलोक नहीं है। परलोक है, नहीं है, और न है, न नहीं है। औपपातिक (अयोनिज) सत्व (-ऐसे प्राणी जी बिना माता पिता के संयोगके उत्पन्न हुए हों) हैं, नहीं हैं, है-भी-और-नहीं-भी, और-न-है-न-नहीं है । सुकृत और दुष्कृत कर्मो के विपाक (फल) है, नहीं-हैं, हैं-भी-और-नहीं-भी, और-न-हैं, न-नही हैं। तथागत मरने के बाद रहते हैं, नहीं रहते हैं। ऐसा भी मैं नहीं कहता, वैसा भी नहीं कहता ।
"भिक्षुओ ! यह चौथा कारण है जिसमे वे कोई स्थिर बातें नहीं कहते ।
"भिक्षुओ ! वे सभी इन्हीं चार कारणों से ऐसा मानते हैं। इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है। भिक्षुओ ! तथागत उन सभी कारणों को जानते हैं ।

🌷५--अकारण-बाद--(१७) 
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण के कारणवादी (बिना किसी कारण के सभी चीजें उत्पन्न होती हैं, ऐसा माननेवाले) हैं। दो कारणों से आत्मा और लोक को अकारण उत्पन्न मानते हैं। वे किस कारण और किस प्रमाणके आधार पर ऐसा मानते हैं? 
भिक्षुओ ! 'असंज्ञीसत्व' (जो संज्ञा से रहित हैं) नाम के कुछ देव है। संज्ञा के उत्पन्न होने से वे देव उस शरीर से व्युत हो जाते हैं। तब, उस शरीर से च्युत होकर यहाँ (इस लोक में) उत्पन्न होते हैं। यहाँ साधु हो जाते हैं। साधु होकर समाहित चित्त में संज्ञा के उत्पन्न होने को स्मरण करते हैं, उसके पहले को नहीं । वह ऐसा कहते हैं—आत्मा और लोक अकारण उत्पन्न हुए हैं। सो कैसे ? मैं पहले नहीं था, मैं नहीं होकर भी उत्पन्न हो गया। 
"भिक्षुओ ! यह पहला कारण है, जिससे कितने श्रमण और ब्राह्मण 'अकारणवादी' हो आत्मा और लोक को अकारण उत्पन्न बतलाते हैं।

"(१८) दूसरे० ? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण तार्किक होता है। वह स्वयं तर्क करके ऐसा समझता है—आत्मा और लोक अकारण उत्पन्न होते हैं।
“भिक्षुओ ! यह दूसरा कारण है, जिससे कितने श्रमण और ब्राह्मण 'अकारणवादी'• हैं। 
"भिक्षुओ ! इन्हीं दो कारणों से वे अकारणवादी हैं, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है। भिक्षुओ ! तथागत उन सभी कारणों को जानते हैं ०।

"भिक्षुओ ! वे श्रमण और ब्राह्मण इन्हीं अट्ठारह कारणों से पूर्वान्तकल्पिक, पूर्वछोर के मत को माननेवाले और पूर्वान्तके आधार पर अनेक (केवल) व्यवहार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है।
"भिक्षुओ ! उन दृष्टि-स्थानों (सिद्धान्तों) के प्रकार, विचार, गति और भविष्य क्या हैं, (वह सब) तथागत को विदित है । तथागत उसे और उससे भी अधिक जानते हैं। जानते हुए ऐसा अभिमान नहीं करते---‘मैं इतना जानता हूँ। अभिमान नहीं करते हुए वे निर्वृति (मुक्ति) को जान लेते हैं। वेदनाओंके समुदय (उत्पत्तिस्थान), उपशम, आस्वाद, दोष और निःसरण (दूर करना) को यथार्थतः जानकर तथागत उपादान (लोकासक्ति) से मुक्त होते हैं। 
"भिक्षुओ ! ये धर्म गम्भीर, दुर्जेये, दुरनुबोध, शान्त, सुन्दर, तर्क से परे, निपुण और पण्डितों के जानने योग्य है, जिसे तथागत स्वयं जानकर और साक्षात्कर उपदेश देते हैं। जिन्हें कि तथागतके यथार्थ गुणों को कहनेवाले कहते हैं।

🌷 (२) अन्त के सम्बन्धकी चवालीस धारणायें 
"भिक्षओ ! कितने ही श्रमण और ब्राह्मण हैं, जो चवालीस कारणों मे अपरान्तकल्पिक, अपरान्त मत माननेवाले और अपरान्त के आधारपर अनेक (केवल) व्यवहार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे किस कारण और किस प्रमाण के बलपर अपरान्न के आधार पर अनेक व्यवहार के शब्दोंका प्रयोग करते हैं ?

६-मरणान्तर होशवाला आत्मा--(१९-३४) 
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण ‘मरने के बाद आत्मा' संज्ञी रहता है', ऐसा मानते हैं। वे सोलह कारणों से ऐसा मानते हैं। वे सोलह कारणों से ऐसा क्यों मानते हैं ? 'मरने के बाद आत्मा रूपवान्, रोगरहित और आत्म-प्रतीति (संज्ञा प्रतीति) के साथ रहता है । अरूपवान् और रूपवान् आत्मा होता है, न रूपवान्, न अरूपवान् आत्मा होता है; आत्मा सान्त होता है, आत्मा अनन्त होता है, आत्मा सान्त और अनन्त होता है, आत्मा न सान्त और न अनन्त होता है, आत्मा एकात्मसंज्ञी होता है, आत्मा नानात्मसंज्ञी होता है, आत्मा परिमित-संज्ञावाला होता है, आत्मा अपरिमितसंज्ञावाला होता है, आत्मा बिल्कुल शुद्ध होता है, आत्मा बिल्कुल दुःखी होता है, आत्मी सुखी और दुःखी होता है, आत्मा सुख दुःख से रहित होता है, आत्मा अरोग और संज्ञी होता है। 
"भिक्षुओ ! इन्हीं सोलह कारणों से वे ऐसा कहते हैं। इनके अतिरिक्त और कोई दूसरा कारण नहीं है। "भिक्षुओ ! तथागत उन कारणों को जानते हैं ।

(इति) द्वितीय भाणवार ॥ ३ ॥
७–मरणान्तर बेहोश आत्मा--(३५-४२) 
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण आठ कारणों से मरने के बाद आत्मा असंज्ञी रहता है', ऐसा मानते हैं। वे ऐसा क्यों मानते हैं ? वे कहते हैं—मरने के बाद आत्मा असंज्ञी, रूपवान् और अरोग रहता है-अरूपवान्०, रूपवान् और अरूपवान्,० न रूपवान् और न अरूपवान्, सान्त०, अनन्त०, सान्त और अनन्त०, न सान्त और ने अनन्त० । 
"भिक्षुओ ! इन्हीं आठ कारणोंसे वे 'मरनेके बाद आत्मा असंज्ञी रहता है, ऐसा मानते हैं।
वे सभी इन्हीं आठ कारणों से इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है। | "भिक्षुओ ! तथागत इन कारणोंको जानते हैं।

८-मरणान्तर न-होशवाला न-बेहोश आत्मा-(४३-५०) 
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण आठ कारणों से मरने के बाद आत्मा नैवसंज्ञी, नैवअसंज्ञी रहता है', ऐसा मानते हैं। वे ऐसा क्यों मानते हैं ?
"भिक्षुओ ! मरनेके बाद आत्मा रूपवान्, अरोग और नैवसंज्ञी नैवासंज्ञी रहता है। वे ऐसा कहते हैं-अरूपवान् ।
"भिक्षुओ ! इन्हीं आठ कारणों से वे 'मरने के बाद आत्मा नैवसंज्ञी नैवअसंज्ञी रहता है, ऐसा मानते हैं। वे सभी इन्हीं आठ कारणों से, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है। 
"भिक्षुओ ! तथागत इन कारणोंको जानते हैं।

९-आत्मा का उच्छेद--(५१-५७) 
"भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण सात कारणों से ‘सत्व (आत्मा) का उच्छेद, विनाश और लोप हो जाता है' ऐसा मानते हैं। वे ऐसा क्यों मानते हैं ? भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण ऐसा मानते हैं—यथार्थ में यह आत्मा रूपी -चार महाभूतो से बना है, और माता पिता के संयोग से उत्पन्न होती हैं, इसलिए शरीर के नष्ट होते ही आत्मा भी उच्छिन्न, विनष्ट और लुप्त हो जाता है। क्योंकि यह आत्मा बिल्कुल समुच्छिन्न हो जाता है, इसलिए वे सत्व (जीव) का उच्छेद, विनाश और लोप बताते हैं । 

"(जब) उन्हें दूसरे कहते-जिसके विषय में तुम कहते हो, वह आत्मा है; (उसके विषय में) मैं ऐसा नहीं कहता हूँ कि नहीं है, किन्तु यह आत्मा इस तरह से बिल्कुल उच्छिन्न नहीं हो जाता। दूसरा आत्मा है, जो दिव्य, रूपी, कामावचर लोकमें रहनेवाला (जहाँ आत्मी सुखोपभोग करता है), और भोजन खाकर रहनेवाली है। उसको तुम न तो जानते हो और न देखते हो। उसको मैं जानता और देखता हूँ। वह मत् आत्मा शरीर के नष्ट होने पर उच्छिन्न और विनष्ट हो जाता है, मरने के बाद नहीं रहता। इस तरह आत्मा समुच्छिन्न हो जाता है। इस तरह कितने सत्वों का वह उच्छेद, विनाश ओर लोग बताते हैं। 

"उनसे दूसरे कहने हैं--जिसके विषय में तुम कहते हो, वह आत्मा है, (उसके विषय में) 'यह नहीं है', ऐसा मै नहीं कहता; किन्तु यह उस तरह बिल्कुल उच्छिन्न नहीं हो जाता। दूसरा आत्मा है, जो दिव्य, रूपी मनोमय, अंग-प्रत्यंग से युक्त और अहीनेन्द्रिय है। उसे तुम नहीं जानते, मैं जानता हूँ। वह सत् आत्मा शरीर के नष्ट होने पर उच्छिन्न हो जाता है । आत्मा समुच्छिन्न हो जाता है। इसलिये वह कितने सत्वों का उच्छेद, विनाश और लोप बताते हैं।

"उन्हें दूसरे कहते हैं--० वह आत्मा है; किन्तु उस तरह नहीं । दूसरा आत्मा है, जो सभी तरह से रूप और संज्ञा से भिन्न, प्रतिहिंसा की संज्ञाओ के अस्त हो जाने से नानात्म (नाना शरीर की) संज्ञाओं को मन में न करने से अनन्त आकाश की तरह अनन्त आकाश शरीरवाला है। उसे तुम नहीं जानते, मैं जानता हैं। वह आत्मा उच्छिन्न हो जाता है, अतः कितने इस प्रकार सत्व को उच्छेद बताते हैं।

“उनसे दूसरे कहते हैं----०। दूसरी आत्मा है, जो सभी तरह से अनन्त आकाश-शरीर को अतिक्रमण (लाँघ) कर अनन्त विज्ञान-शरीरवाला है।

"उन्हें दूसरे कहते हैं-०। दूसरा आत्मा है, जो सभी तरह से विज्ञान-आयतन को अतिक्रमण कर कुछ नहीं ऐसा अकिंचन (शून्य) शरीरवाला रहता है।

“उन्हें दूसरे कहते हैं-०। दूसरा आत्मा है, जो सभी तरहसे आकिंचन्य-आयतन को अतिक्रमण कर शान्त और प्रणीत नैवसंज्ञा-न-असंज्ञा है ।
"भिक्षुओ ! वे श्रमण और ब्राह्मण इन्हीं सात कारणों से उच्छेदवादी हो, जो (वस्तु) अभी है, उसका उच्छेद, विनाश और लोप बताते हैं। इनके अतिरिक्त और कोई दूसरा कारण नहीं है।
"भिक्षुओ ! तथागत उन सभी को जानते हैं ।

🌷१०-इसी जन्म में निर्वाण---(५८-६२) 
भिक्षुओ ! कितने श्रमण और ब्राह्मण पाँच कारणों से दृष्टधर्मनिर्वाणवादी (इसी संसार में देखते-देखते निर्वाण हो जाता है, ऐसा माननेवाले) है, जो ऐसा बतलाते हैं कि प्राणी का इसी संसार में देखते-देखते निर्वाण हो जाता है। वे ऐसा क्यों मानते हैं ?

"भिक्षुओ ! कोई श्रमण या ब्राह्मण ऐसा मत माननेवाला होता है-चूंकि यह आत्मा पाँच काम-गुणों (भोगों) में लगकर सांसारिक भोग भोगता है, इसलिए यह इसी संसार में आँखों के सामने ही निर्वाण पा लेता है। अतः कितने ऐसा बतलाते हैं कि सत्व इसी संसार में देखते-देखते निर्वाण पा लेता है।

“उनसे दूसरे कहते है--- ०। यह आत्मा इस तरह देखते-देखते संसार ही में निर्वाण नहीं प्राप्त कर लेता । सो कैसे ? सांसारिक काम-भोग अनित्य, दुःख और चलायमान हैं। उनके परिवर्तन होने रहने से शोक, रोना पीटना, दुःख-दौर्मनस्य और बडी परेशानी होती है ।
"अतः यह आत्मा कामों से पृथक् रहे, बुरी बातोंको छोड, सवितर्क, सविचार विवेकज प्रीति-सुखवाले प्रथम ध्यानको प्राप्तकर विहार करता है। इसलिए यह आत्मा इसी संमार में आँखों के सामने ही निर्वाण प्राप्त कर लेता है ।

“उनसे दूसरे कहते हैं-०। आत्मा इस प्रकार निर्वाण नहीं पाता । सो कैसे ? जो वितर्क और विचार करने से बडा स्थूल (उदार) मालूम होता है, वह आत्मा वितर्क और विचार के शान्त हो जाने से भीतरी प्रसन्नता (आध्यात्म सम्प्रसाद), एकाग्रचित्त हो, वितर्क-विचार-रहित मुमाधिज प्रीति-सुखवाले दूसरे ध्यान को प्राप्त हो विहार करता है । 
"इतने से यह आत्मा संसार ही में आँखों के सामने निर्वाण प्राप्त कर लेता है ।

उनसे दूसरे कहते हैं-०। सो कैसे ? जो प्रीति पा चित्त का आनन्द मे भर जाना है, उसी से स्थूल प्रतीत होता है। क्योंकि यह आत्मा प्रीति और विराग से उपेक्षायुक्त (अनासक्त) होकर विहार करता है, तथा ज्ञानयुक्त पण्डितों से वर्णित सभी सुख को शरीर से अनुभव करता है, अतः उपेक्षायुक्त स्मृतिमान् और सुखविहारी तीसरे ध्यान को प्राप्त करता है।  "इतने से यह आत्मा संसार ही में आँखों के सामने निर्वाण प्राप्त कर लेता है।

उनसे दूसरे कहते हैं-०। जो वहाँ इतने से चित्त का सुखोपभोग स्थूल प्रतीत होता हैं, यह आत्मा सुख और दुःख के नष्ट होने से, सौमनस्य और दौर्मनस्य के पहले ही अस्त होने से, न सुख ने दुःख वाले, उपेक्षा और स्मृति से परिशुद्ध चौथे ध्यान को प्राप्तकर विहार करता है ।
"इतने से यह आत्मा संसार ही में आँखों के सामने निर्वाण प्राप्त कर लेता है।

"भिक्षुओ ! इन्हीं पाँच कारणों से वे 'इसी संसार में आँखों के सामने निर्वाण प्राप्त होता है, ऐसा मानते हैं। इनके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं है। 
 "भिक्षुओ ! तथागत उन कारणोंको जानते हैं ।
"भिक्षुओ ! श्रमण और ब्राह्मण इन्हीं चवालीस कारणों से अपरान्तकल्पिक मत माननेवाले और अपरान्तके आधारपर अनेक व्यवहारके शब्दोंका प्रयोग करते हैं। इनके अतिरिक्त और कोई दूसरा कारण नहीं है ।

"भिक्षुओ ! ये श्रमण और ब्राह्मण इन्हीं बासठ कारणों से पूर्वान्तकल्पिक और अपरान्तकल्पिक, पूर्वान्त और अपरान्त मत माननेवाले तथा पूर्वान्त और अपरान्त के आधार पर अनेक व्यवहार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। इनके अतिरिक्त और दूसरा कोई कारण नहीं है।
"तथागत उन सभी कारणों को जानते हैं, उन कारणों के प्रमाण और प्रकार को जानते हैं, और उससे अधिक भी जानते हैं; जानकर भी मैं जानता हूँ', ऐसा अभिमान नहीं करते ।
“वेदनाओंकी निवृत्ति, उत्पत्ति (समुदय), अन्त, आस्वाद, दोष और लिप्तता को ठीक-ठीक जानकर तथागत अनासक्त होकर मुक्त रहते हैं। भिक्षुओ ! ये धर्म गम्भीर, दुर्जेय, दुरनुबोध, शान्त, उत्तम, तर्क से परे, निपुण और पण्डितों के समझने के योग्य हैं, जिन्हें तथागत स्वयं जानकर और साक्षात्कर कहते हैं, जिसे तथागत के यथार्थ गुण को कहनेवाले कहते हैं ।

"भिक्षुओ ! जो श्रमण और ब्राह्मण चार कारणों से नित्यतावादी हैं तथा आत्मा और लोक को नित्य कहते हैं, वह उन सांसारिक वेदनाओं को भोगनेवाले तथा तृष्णा से चकित उन अज्ञ श्रमणों और ब्राह्मणों की चंचलता मात्र है।

"भिक्षुओ! जो श्रमण और ब्राह्मण चार कारणों से अंशतः नित्यतावादी और अंशतः अनित्यतावादी हैं, जो ० चार कारणों से आत्मा और लोक को अन्तानन्तिक (सान्त भी और अनन्त भी) मानते हैं; जो चार कारणों से प्रश्नों के पूछे जाने पर कोई स्थिर बात नहीं कहते; जो अकारणवादी हो दो कारणों से आत्मा और लोक को अकारण उत्पन्न मानते हैं; जो श्रमण और ब्राह्मण इन अट्ठारह कारणों से  पूर्वान्त के आधार पर नाना प्रकार के व्यवहार के शब्द को प्रयोग करते हैं।

जो श्रमण और ब्राह्मण सोलह कारणों से मरने के बाद आत्मा संज्ञा वाला रहती है, ऐसा मानते; जो श्रमण और ब्राह्मण आठ कारणों से मरनेके बाद आत्मा संज्ञावाली नहीं रहता', ऐसा मानते हैं, जो आठ कारणों से आत्मा न तो संज्ञावाली और न नहीं-संज्ञावाली रहती है, ऐसा मानते हैं; जो सात कारणों से उच्छेदवादी हैं; जो पाँच कारणों से दृष्टधर्मनिर्वाणवादी  हैं। जो इन चवालीस कारणों से  अपरान्त के आधार पर नाना प्रकार के व्यवहार के शब्दों का प्रयोग करते हैं।

"जो श्रमण और ब्राह्मण इन बासठ कारणों से पूर्वान्तकल्पिक और अपरान्तकल्पिक ० पूर्वान्त और अपरान्त के आधार पर नाना प्रकार के व्यवहार के शब्दोंका प्रयोग करते हैं, वह सभी उन सांसारिक वेदनाओं को भोगनेवाले तथा तृष्णा से चकित उन अज्ञ श्रमणों और ब्राह्मणों की चंचलता मात्र है ।

"भिक्षुओ ! जो श्रमण और ब्राह्मण  चार कारणों से आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं वह स्पर्श के होने से ऐसा मानते हैं  । जो श्रमण और ब्राह्मण इन बासठ कारणों से पूर्वान्तकल्पिक और अपरान्तकल्पिक हैं, वह स्पर्श के ही होने से ऐसा मानते हैं ।

"भिक्षुओ ! जो श्रमण और ब्राह्मण चार कारणों से आत्मा और लोक को नित्य मानते हैं, उन्हें स्पर्श के बिना ही वेदना होती है, ऐसी बात नहीं हैं ०।
"भिक्षुओ ! जो श्रमण और ब्राह्मण चार कारणों से पूर्वान्तकल्पिक और अपरान्तकल्पिक हैं, वे सभी छै स्पर्शायतनों (विषयों) से स्पर्श करके वेदना को अनुभव करते हैं। उनकी वेदना के कारण तृष्णा, तृष्णा से उपादान, उपादान से भव, भव से जन्म और जन्म से जरा, मरण, शोक, रोनापीटना, दुःख, दौर्मनस्य और परेशानी होती है। 
भिक्षुओ ! जब भिक्षु छै स्पर्शायतनों के समुदय, अस्त होने, आस्वाद, दोष और विराग को यथार्थतः जान लेता है, तब वह इनसे ऊपर की बातों को भी जान लेता है।

"भिक्षुओ ! ० वे सभी इन्हीं बासठ कारणों के जाल में फंसकर वहीं बंधे रहते हैं। भिक्षुओ ! जैसे कोई दक्ष मल्लाह, या मल्लाह का लडको छोटे-छोटे छेदबाले जाल से सारे जलाशय को हींडे; उसके मन में ऐसा हो--इस जलाशय में जो अच्छी-अच्छी मछलियाँ हैं; सभी जाल में फंसकर बझ गई हैं, उसी तरह से  "भिक्षुओ ! भव-तृष्णा(जन्म के लोभ) के उच्छिन्न हो जाने पर भी तथागत का शरीर रहता है। जब तक उनका शरीर रहता है, तभी तक उन्हें मनुष्य और देवता देख सकते हैं । शरीर-पात हो जाने के बाद उनके जीवन-प्रवाह निरुद्ध हो जाने से उन्हें देव और मनुष्य नहीं देख सकते। भिक्षुओ ! जैसे किसी आम के गुच्छे की ढेप के टूट जानेपर उस ढेप से लगे सभी आम नीचे आ गिरते हैं, उसी तरह भव-तृष्णा के छिन्न हो जानेपर तथागत का शरीर होता है।"

भगवान्के इतना कहने पर आयुष्मान आनन्द ने भगवान्से यह कहा--"भन्ते ! आश्चर्य है, अद्भुत है। भन्ते ! आपके इस उपदेश का नाम क्या हो ।”
“आनन्द ! तो तुम इस धर्म-उपदेश को ‘अर्थजाल' भी कह सकते हो, धर्मजाल भी, ब्रह्मजाल भी, दृष्टिजाल भी, तथा अलौकिक संग्रामविजय भी कह सकते हो।"

भगवान्ने यह कहा। उन भिक्षुओं ने भी अनुकूल मन से भगवान्के कथन का अभिनन्दन किया। भगवान के इस प्रकार विस्तारपूर्वक कहने पर दस हजार ब्रह्मांड प्रकंपित हो उठे।
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*उस समय के खेल । उस समय के जूये।
* अमराविषेप नामक छोटी-छोटी मछलियाँ बळी चंचल होती हैं। जिस तरह बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे हाथ में नहीं आती हैं, उसी तरह इनके सिद्धान्त मैं भी कोई स्थिरता नहीं।

Saturday, August 3, 2019

अलियवसाणि सुत्त (भाब्रूसिलालेख) 🌹🌹अरियवंस सुत्त (अंगुत्तर निकाय 4,3,8) 🌹🌹

अलियवसाणि सुत्त (भाब्रूसिलालेख) 

🌹🌹अरियवंस सुत्त
          (अंगुत्तर निकाय 4,3,8)
                                          🌹🌹



🌸1. भिक्षुओं!! ये चार अरियवंस (आर्य परम्परा से प्राप्त धर्म) अग्रगण्य हैं, दीर्घकालीन हैं, वंश परम्परा से प्राप्त हैं, पुराने (प्राचीनतम ) हैं, आज भी शुद्ध हैं, इनमें कोई कृत्रिमता (=मिलावट नहीं है), पहले भी शुद्ध थे। इनके विषय में किसी को न आज शंका है, न पहले कभी थी, तथा ये सभी श्रमण ब्राह्मण एवं विद्वानों द्वारा प्रशंसा प्राप्त हैं। कौन से चार ?

🌸 (1) “यहां, भिक्षुओं! कोई भिक्षु जिस किसी तरह के चीवर की प्राप्ति से संतुष्ट रहता है, साथ ही वह ऐसी संतुष्टि की प्रशंसा करता है। वह ऐसे वैसे चीवर से असंतोष या अनिच्छा या प्रतिकूलता प्रकट नही करता। अनुकूल चीवर न मिले तो उसे कोई परिसर्षणा (हैरानी) नहीं होती, तथा मनोनुकूल चीवर मिलने पर न उसमें कोई व्यामोह होता है न कोई आसक्ति ही होती है। अपितु उसके प्रति अनासक्त भाव रखता हुआ , उसमें साधनाविघ्नकारक दोष देखता हुआ, उससे छुटकारा पाने की इच्छा से ही उसका उपभोग करता है। ऐसा करता हुआ भी न उससे अपने में महत्त्व दिखाता है, न उसके कारण दूसरे का तिरस्कार ही करता है। जो साधक भिक्षु उस चीवर के प्रति ऐसे समीक्षण में दक्ष है, सावधान है, उत्साही है, वास्तविक समझ रखता है, अपनी अकिंचन स्थिति का सदा स्मरण रखता है; भिक्षुओं ! ऐसा भिक्षु ही इस प्राचीन अरियवंस में प्रतिष्ठित माना जाता है। (१)

🌸 (2) "फिर, भिक्षुओ! यहाँ कोई भिक्षु जिस किसी तरह के भिक्षादान (पिण्डपात) से संतुष्ट रहता है, साथ ही यह ऐसी संतुष्टि से प्रशंसा भी करता है । यह ऐसे-वैसे भिक्षादान के असन्तोष या अनिच्छा या प्रतिकूलता प्रकट नहीं करता। अनुकूल भिक्षा न मिले तो उसे कोई परितर्षणा (हैरानी) नहीं होती। तथा मोननुकूल भिक्षा मिलने पर उसे कोई व्यामोह होता है और न कोई आसक्ति ही। अपितु, उसके प्रति आनासक्त भाव रखता हुआ, उसमें साधना विध्नकारक दोष देखता हुआ उससे मुक्ति पाने की इच्छा से उसका उपयोग करता है। ऐसा करता हुआ भी, वह न उससे दूसरों के सम्मुख अपना महत्त्व दिखाता है, न उसके कारण , दूसरों का तिरस्कार ही करता है। जो साधक भिक्षु उस भिक्षादान के ऐसे समीक्षण में दक्ष है, सावधान है, उत्साही है, वास्तविक समझ रखता है। अपनी अकिंचन स्थिति का सदा स्मरण रखता है, भिक्खुओ! ऐसा भिक्खु ही उस प्राचीन अरियवंस में प्रतिष्ठित माना जाता है | (2)                     
 🌸 (3) भिक्षुओं! यहाँ कोई भिक्षु जिस किसी तरह के शय्यासन (मंच, ओढ़ना, बिछोना) से संतुष्ट रहता है, साथ ही वह ऐसी संतुष्टि की प्रशंसा भी करता है। यह ऐसे-वैसे शय्यासन से असंतोष अनिच्छा या प्रतिकुलता प्रकट नहीं करता। अनुकूल शय्यासन न मिले तो उसे कोई परितर्षणा (हैरानी) भी नहीं होती, तथा मोननुकूल शय्यासन मिलने पर उसके प्रति न कोई व्यामोह होता है, न कोई आसक्ति ही। अपितु, उसके प्रति अनासक्त भाव रखता हुआ, उसमें साधना-विध्नकारक दोष देखता हुआ उससे मुक्ति पाने की इच्छा से ही उसका उपयोग करता है। ऐसा करता हुआ भी , वह न उसके सहारे से दूसरों के सम्मुख अपना महत्त्व दिखाता है और न उसके कारण दूसरों का तिरस्कार ही करता है। जो साधक भिक्षु उस शय्यासन के ऐसे समीक्षण में दक्ष है, सावधान है, उत्साही है, वास्तविक समझदारी रखता है, अपनी अकिंचन स्थिति का स्मरण रखता है; भिक्षुओं ! ऐसे भिक्षु ही उस प्राचीन अरियवंस में प्रतिष्ठित माना जाता है। (३)

🌸 (4) “और फिर, भिक्षुओं ! कोई भावना में ही सुख मानता है अतः भावना में ही लगा रहता है ;  और अन्य कोई साधनारत भिक्षु प्रहाण (त्याग) में ही सुख मानता है, अतः प्रहाण में रत (लगा) रहता है। परन्तु ये दोनों प्रकार के भिक्षु अपनी भावनारति एवं प्रहाणरति के कारण न तो स्वयं को अन्य भिक्षुओं से उच्च मानते हैं, न दूसरे भिक्षुओं को इन गुणों के अभाव के कारण अपने से हीन समझते हैं। अपितु, वह अपनी धर्मसाधना में निरन्तर दक्ष, उत्साही, सम्प्रज्ञता (समझदार) एवं अकिंचन स्थिति का सतत स्मरण रखता है। भिक्षुओ ! ऐसा भिक्षु ही उस प्राचीन अरियपरम्पार के ज्ञान में प्रतिष्ठित माना जाता है। (४)

   🌹🌹🌹
    “ इस तरह भिक्षुओं! इन चार अरियवंसों से समन्वित भिक्षु भले ही पूर्व दिशा से, भले ही पश्चित दिशा से, भले ही उत्तर दिशा से या फिर दक्षिण दिशा से साधना करे वहाँ न उसको कोई अरूचि होती है न किसी प्रकार की अरूचि ही उसके पास पहुंच पाती है । वह किस कारण? वह इसलिए भिक्षुओं! कि वह साधना करते करते इतना धैर्यवान् हो जाता है कि वह इस अरूचि को सहन करने की स्थिति में आ जात है।
“ऐसे उस सर्वकर्मत्यागी को, स्वयं सब कुछ से भली भाँचि दूर हटे हुए को कौन पीछे हटाने का साहस कर सकता है! कसौटी चढ़े सुवर्ण के समान वह भी सबका प्रशंसापात्र ही होता है, उसकी निंदा कौन कर सकता है!  देवता भी उसकी प्रशंसा ही करते है। यहाँ तक कि ब्रह्मा भी उसके सर्वदा प्रशंसक ही बने रहते हैं।।"
               
                  🌷🌷🌷🌷🌷

Friday, August 2, 2019

(मौनेयसुत्त, भाब्रू सिलालेख) सुत्तनिपात:- नाळकसुत्त ( ३,११

🎯 (मौनेयसुत्त, भाब्रू सिलालेख)

 सुत्तनिपात:-    नाळकसुत्त ( ३,११)

(असित ऋषि के भांजे नाळ्क को भगवान् बुद्ध की धम्म उपदेशना )






☀ असित ऋषि ने (तुषित देवलोक में) दिन के विहार के लिए जाकर देखा कि सभी देवता आनन्दित है, प्रसन्न हैं। देवता और इन्द्र सत्कार पूर्वक सुद्ध वस्त्र धारण किए हुए हैं तथा वस्त्र लेकर अत्यधिक स्तुति कर रहे हैं ।।१।।

🌷देवताओं को प्रसन्न और हर्षित मन देखकर विचार कर (असित ऋषि ने) वहाँ यह कहा-

 👇“किस कारण देवगण अत्यन्त प्रसन्न हो वस्त्र लेकर घूम रहा है? क्या कारण है? ।।२।।

जिस समय असुरों से युद्ध हुआ था, देवताओं की विजय हुई थी और असुर पराजित हुए थे, उस समय भी ऐसा रोमांचकारी आनन्द नहीं मनाया गया था,
 किस अद्भुत बात को देखने के लिए देवता प्रमुदित हैं? ।।३।।

देवता चिल्लाते हैं, गाते है, बजाते हैं, भुजाओं को फड़काते हैं और नाचते हैं। मैं मेरू शिखर पर रहने वाले आप लोगों से पूछता हूँ, मार्ष! मेरे संशय को शीध्र दूर करें ।।४।।

⚜ “वह अतुलनीय, श्रेष्ठ-रत्न , बोधिसत्व मनुष्यों के हित सुख के लिए मनुष्य लोक में साक्य /शाक्य जनपद के लुम्बिनी ग्राम में उत्पन्न हुए हैं, इसीलिए हम लोग अत्याधिक तुष्ट और प्रसन्न हैं।।५।।

☸ वह सब प्राणियों में उत्तम , श्रेष्ठ-व्यक्ति , सब मनुष्यों में श्रेष्ठ, सारी प्रजा में उत्तम जिस प्रकार बलवान् मृगराज सिंह गर्जना करता है उसी प्रकार ऋषिवन (=ऋषिपत्तन) में (धम्म चक्क ) चक्र का प्रवर्तन करेंगें।।६।।
उस बात को सुनकर व (असित ऋषि ) शीध्र शुद्दोदन के भवन में आए। वहाँ बैठकर शाक्यों से यह कहे- “कुमार कहाँ है? मैं भी देखना चाहता हूँ" ।।७।।


🌺 तब सुन्दर ढंग से निर्मित , चमकदार, स्वर्ण के समान कान्ति से दमकते हुए उत्तम रूपवान् पुत्र को शाक्यों ने असित ऋषि को दिखालया।।८।।

☀ जलती आग, आकाश में निर्मल चन्द्रमा और मेध रहित शरद में सूर्य के समान तपते हुए कुमार ोक देखकर ऋषि आनन्दित हो गए और उन्हे विपुल प्रीति उतपन्न हो आई ।।९।।

🌺आकाश में देवताओं ने अनेक शाखा और सहस्त्र मण्डल वाले छत्र को धारण किया, स्वर्ण दण्ड लगे चामर (=चँवर) डुलाये, किन्तु चामर और छत्र को धारण करने वाले दिखाई नहीं दे रहे थे ।।१०।।

🌺 जटाधारी असित नामक ऋषि ने पीतवर्ण कम्बल में रखी स्वर्ण मुद्रा के समान सुन्दर , ऊपर श्वेत छत्रधारी कुमार को देख हर्षित और प्रमुदित मन हो उन्हें ग्रहण किया ।।११।।

☀उत्तम  साक्य /शाक्य कुमार को ग्रहण कर, लक्षण शास्त्र और मन्त्र-पारंगत जिज्ञासु ऋषि ने प्रसन्न मन से यह बात कही- “यह सर्वोत्तम हैं। मनुष्यों में उत्तम है!” ।।१२।।

🌺तब अपने (परलोक-) गमन का स्मरण करते हुए उनके नेत्रों से आँसू पघरने लगे। शाक्यों ने ऋषि को रोता हुआ देख कहा- “क्या कुमार के लिए कोई विध्न तो नहीं होगा?” ।।१३।।


🌷ऋषि ने शाक्यों को दुःखित देखकर कहा-- “मैं कुमार का कोई अहित नहीं देखता और न उनकार कोई विध्न होगा। यह साधारण मनुष्य नहीं है।”आप लोग प्रसन्न हों ।।१४।।

⚜उत्तम , विसुद्धदर्शी /विशुद्धदर्शी यह कुमार सम्बोधि को प्राप्त करेंगे और बहुजन के प्रति अनुकम्पा कर उनके हित के लिए कर उनके हितके लिए धम्मचक्क का प्रवर्तन करेंगे, उनका ब्रह्मचर्य फैलेगा।।१५।।

🌷यहाँ मेरी आयु अधिक शेष नहीं है। इस बीच में ही मेरी मृत्यु हो जायेगी, सो मैं असदृश पराक्रमी के धम्म को नहीं सुन पाऊँगा, इसीलिए मैं आतुर हूँ, कष्ठ में हूँ और दुःखित हूँ।।१६।।

☀ साक्यों/शाक्यों को विपुल आनन्द देकर वह ब्रह्मचारी अन्तःपुर से निकेल। उन्होनें अपने भांजे पर अनुकम्पा करके उसे असदृश पराक्रमी के धम्म में लगाया।।१७।।

☸“सम्बोधि प्राप्त, धम्म मग्ग/ मार्ग का उपदेश देने वाले 'बुद्ध’ का घोष, जब दूसरे से सुनना तो उनके पास जा, धम्म के विषय में पूछकर उन भगवान् के पास ब्रह्मचर्य का पालन करना”।।१८।।

🌺हितैषीभाव से स्थिर , उत्तम , विसुद्ध/ विशुद्ध भविष्य-द्रष्टा से उपदिष्ट पुण्यवान् उन नालक ने जिन (=बुद्ध) की प्रतीक्षा में तपस्वी हो इन्द्रियों की रक्षा की ।।१९।।

☀धम्म चक्क-प्रवर्तन के समय बुद्ध का घोष सुनकर, पास जा , श्रेष्ठ ऋषि को देख धर्म के विष में असित के सिखाये प्रश्नों को उत्तम प्रज्ञ से पूछा ।।२०।।

वस्तुगाथा समाप्त।

🌷नालक- मैनें यह बात असित (ऋषि) से यथार्थ रुप से जानीं थी। सभी धम्मों के पारंगत हे गोतम ! मैं उसे आपसे पूछ रहा हूँ ।।२१।।

☀बेघर हो भिक्खा /दान पर जीने वाले मुझे प्रश्न करने पर उत्तम पद के विषय में मुनि बतलायें ।।२२।। 

   ☸ भगवान्- दुष्कर और कठिनता से प्राप्त ज्ञान मार्ग की व्याख्या करुँगा। मैं अब उसके विषय में तुम्हें बताऊँगा , इसलिए तुम स्थिर चित्त और दृढ़ हो जाओ ।।२३।।

🌺ग्राम में जो वन्दना करते हैं या जो निन्दा करते हैं, उनके प्रति समान भाव रखे, मन को दूषित न होने दे, शान्त और विनीत होकर विचरण करें।।२४।।

⚜दावाग्नि की ज्वाला के समान नाना प्रकार के आलम्बन (=आकर्षण) उपस्थित होते हैं। स्त्रियाँ मुनि को प्रलोभित करती हैं, उनके प्रिति तुम प्रलोभित मत हो ।।२५।।

☀मैथुन धम्म से विरत हो अच्छे-बुरे काम-भोगों को त्यागकर स्थावर और जंगम प्राणियों के प्रति विरोघभाव या आसत्ति रहित होवे।।२६।।

🌷जिस इच्चा और लोभ में पृथक् जन प्राणी आसक्त रहता है उसे त्यागकर चक्खुमान विचरण करे और इस नरक को पारकर जाय ।।२८।।

🌺जो पेटू नहीं होता, मात्रा से भोजन करता है, अल्पेच्छ और लोभ रहित होता है, वही इच्छा से रहित सन्तोषी व्यक्ति शान्त होता है ।।२९।।

☀ पिण्डापात भिक्खा चारिका करके वह मुनि वन में जाय और पेड़ के नीचे जा आसन लगा कर बैठे ।।३०।।

🌷वन में रहते हुए वह धीर ध्यान तत्पर होवे , अपने को संतोष प्रदान कर पेड़ के नीचे ध्यान करे ।।३१।।

☸ तब रात्रि के बीतने पर प्रातः पिण्डापात भिक्खा चारिका के लिए गाँव में प्रवेश करेे वहाँ न तो किसी का निमंत्रण स्वीकार करे और न किसी के द्वारा गाँव से लाये गये भोजन को ।।३२।।

⚜ मुनि गाँव में आकर सहसा कुलों में विचरण न करे। चुपचाप रहकर पिण्डपात भिक्खा चारिका करे, संकेत करने वाली कोई बात न बोले ।।३३।।

☀यदि कुछ मिल जाय तो उत्तम है और न मिले तो भी ठीक है। एक स्थान पर स्थित वृक्ष के समान वह दोनों ही अवस्थाओं में समान रहता है ।।३४।।

🌺गूँगा न होते हुए भी गूंगे की भांति हाथ में पिण्डापात्र (भोजनपात्र ) पात्र लेकर विचरण करते हुए अल्प दान का अनादर न करे और न तो दाता की निन्दा करे ।।३५।।

☀समण (=भगवान् बुद्ध) द्वारा अच्छे-बुरे मार्ग बतलाये गए हैं। लोग दो बार संसार-सागर के पार नहीं जाते और न तो इस पार को एक बारगी ही प्राप्त किया जा सकता है ।।३६।।

🌷जिसमें तण्हा नहीं है, जिस भिक्खु का (भव-) स्रोत नष्ट हो गया है , जो कृत्या-कृत्य से परे है, उसे किसी प्रकार का संताप नहीं होता ।।३७।।

⚜मैं तुम्हें ज्ञानयोग (=मौनेय) को बातऊँगा। वह छुरे की धार  के समान होता है। तालू से जीभ सटा कर पेट के प्रति संयमी बने ।।३८।।

☸ आलस्य रहित चित्त वाला बने, बहुत चिन्तन न करे, क्लेश-रहित और अनासक्त हो ब्रह्मचर्य का पालन करे ।।३९।।

☀एक आसन पर रहन का अभ्यास करे और समणों की संगति करे। एकान्त वास मौनेय कहा जाता है। यदि अकेले विहार करेगा तो दसों दिशाओं को प्रकाशित करेगा ।।४०।।

☸ध्यानी ,विषय-वासना-त्यागी धीरों के धोष को सुनकर श्रद्धालु व्यक्ति (पाप कम्म करने में) लज्जा करे और (पुण्य कम्मों के करने में ) श्रद्धा को अधिकाधिक बढ़ावें ।।४१।।

☀छोटी नदियों और नालों के मध्य उसे नदी समझे । छोटी नदी शोर करते बहती है, किन्तु सागर चुपचाप बहता है ।।४२।।

☸जो समण अर्थयुक्त बहुत बात बोलता है, वह जानते हुए धम्म देशना( उपदेश ) देता है और जानते हुए ही बहुत बोलता है ।।४४।।

☀जो जानते हुए भी संयम के कारण जाने हुए (धम्म) तो बहुत नही कहता है वह मुनि मौनेय के योग्य है। उस मुनि ने मौनेय (=ज्ञान) को प्राप्त कर लिया है ।।४५।।

🌷नालकसुत्त समाप्त।🌷

Wednesday, July 31, 2019

🌹🌹🌹तुवटकसुत्त (सुत्त निपात ४.१४) (भिक्षुचर्य्या)🌹🌹🌹

विनयसमुकसे सुत्त (भाब्रूसिलालेख)

तुवटकसुत्त (सुत्त निपात ४.१४)
(भिक्षुचर्य्या)



देवता-
आदित्यबंधु! महर्षि! मैं आपसे विवेक शान्तिपद के विषय मे पूछता हूँ। भिक्षु लोक में किसी में भी आसक्ति न करता हूआ कैसे देखकर शान्त होता है?।।१।।

भगवान्-
सारे प्रपंचो की जड़ अहंकार को समझकर सब तरह से उसका अंत कर दे। जो कुछ भी तृष्णायें भीतर है, उनसे रहित होने के लिए सदा स्मृतिमान् हो अभ्यास करे ।।२।।

भीतर या बाहर के जिस किसी धर्म को माने , उससे अभिमान न करें, सन्त लोक उसे शान्ति नहीं कहते ।।३।।

उसके कारण न दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझे , न नीच और न समान। अनेक प्रकार का स्पर्श पाकर भी अपने को विकल्प में न डाले ।।४।।

अपने भीतर शांत रहे। भिक्षु दूसरे उपाय से शांति की खोज न करे। जो भीतर से शांत है उसमे अपनत्व नहीं है , फिर परत्व कहां? ।।5।।

जैसे समुंद्र के बीच में लहर नहीं उठती, प्रत्युत स्थिरता बनी रहती है, वैसे ही स्थिर, चंचलता रहित भिक्खु कहीं तृष्णा न करे ॥6॥ौ


देवता- 
खुले नेत्र वाले ! ऐपने बाधाओं को दूर करने के लिए साक्षात धर्म बताया है। अपना भद्र प्रतिपदा को बतावें जो कि प्रतिमोक्ष या समाधि है ।।७।।

भगवान्-
चक्षु के विषय से लोलुप न हो। ग्राम्य कथाओं से कान को बंद कर ले। स्वाद की लोलुपता न करे और न संसार से कुछ अपनाये ।।८।।

दु:खद स्पर्श होने पर भी भिक्षु कहीं भी विलाप न करें। भव की तृष्णा न करे और भयानकता से कंपित न हो ।।९।।

अन्न अथवा पेय, खाद्य अथवा वस्त्र के मिलने पर उसका संग्रह न करे। उनके न मिलने पर चिन्ता न करें ।।१०।।

ध्यानी बने , घुमक्कर न बने, कौकृत्य (संदेह) न करे, प्रमाद न करे। भिक्षु शोर न होने वाले आसनो और शय्याओं में विहार करे ।।११।।

बहुत निद्रालु न हो , उद्योगी बन जागरणशील बने। तन्द्रा , माया , हँसी - मजाक , क्रीडा, मैथुन और श्रृंगार को त्याग दे ।।१२।।

तन्त्र मंत्र , स्वप्न-विचार , लक्षण - देखना और नक्षत्रो के विश्वास को त्यागदे।पशु -पक्षियों की बोली को सुनकर बतलाना , गर्भ धारण कराना , चिकित्सा कराना (=वैद्यक) - श्रद्धालु भिक्षु इन सबका अभ्यास न करें ।।१३।।

भिक्षु निंदा से विचलित न हो, प्रशंसा से न फूले और लोभ , कंजूसी , क्रोध तथा चुगली को त्याग दें ।।१४।।

भिक्षु क्रय विक्रय में न लगें। कहीं किसी को दोष न दें। गांव में किसी को गाली न दें और लाभ इच्छा से लोगो को न बोले
।।१५।।

भिक्षु अपनी प्रशंसा करने वाला न बने , स्वार्थ की बात न करें, उद्दण्ड (=प्रगल्भ) न हो और झगड़े- लड़ाई की बात न करें ।।१६।।

असत्य भाषण न करे, जान बुझ कर शठता न करे, फिर जीविका , प्रज्ञा , शील-व्रत के विषय में दूसरे का अनादर न करे ।।१७।।

बहुभाषी श्रमनो की दोषयुक्त बहुत-सी बातों को सुनकर उनको कठोर जबाब न दें, संतलोग प्रतिहिंसक नहीं होते।।१८।।

इस धर्म को जानकर विवेका भिक्षु सदा स्मृतिमान रहने का अभ्यास करे, निर्वाण को शांति जानकर गौतम की शिक्षा में प्रमाद न करे ।।१९।।

उन विजयी में अजेय हो धर्म को साक्षात् जान लिया है, इसलिए अप्रमत्त हो उन भगवान की शिक्षा का सम्मानपूर्वक अभ्यास करें ।।२०।।

                  तुवटकसुत्त समाप्त।

                   

Friday, July 26, 2019

🌿121-चूलसुञता-सुत्त🌿 🍁मज्झिम निकाय (3.3.1)🍁

🌿121-चूलसुञता-सुत्त🌿
       🍁मज्झिम निकाय (3.3.1)🍁

🌏चित्त की शून्यता का योग🌏




👂 ऐसा मैंने सुना --

🚶एक समय भगवान् सावत्थि में, मिगारमाता के प्रासाद (महल) पुब्बाराम में विहार करते थे।

🏃तब आयुष्मान् आनन्द सायंकाल को प्रतिसंलयन (=ध्यान) से उठकर जहां भगवान थे, वहां गए। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठे। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनन्द ने भगवान से यह कहा👄--

🙏 "भन्ते! एक समय भगवान् शाक्य (जनपद) में नगरक नामक शाक्यों के निगम (=कस्बे) में विहार करते थे। वहां मैंने, भन्ते! भगवान् के मुख से सुना, भगवान् के मुख से ग्रहण किया-‘आनन्द! इस समय मैं अधिकतर शून्यता-विहार से विहरता हूं' -क्या, भन्ते! मैंने इसे ठीक से सुना, ठीक से ग्रहण किया, ठीक से मन में किया, ठीक से धारण किया?” ।

☝“हां, आनन्द! तुमने यह ठीक से सुना...। आनन्द! पहले भी, और इस समय भी मैं अधिकतर शून्यता-विहार से विहरता हूं। 
जैसे आनन्द! 
यह मिगारमाता का प्रासाद हाथी-गाय-घोड़ा-घोड़ी से शून्य है; 
सोना-चांदी से शून्य है; 
स्त्री-पुरुष-सन्निपात (=जमावड़े) से शून्य है; किंतु यह एक भिक्खु-संघ से शून्य नहीं; 
ऐसे ही, आनन्द! 
भिक्खु ग्राम-संज्ञा (=गांव के ख्याल) को मन में न कर, 
मनुष्य-संज्ञा को मन में न कर, 
एक अरण्य-संज्ञा को ले मन में करता है। अरण्य-संज्ञा में उसका चित्त प्रस्कंदित=प्रसन्न होता है; ठहरता है, लगता है। 
वह यह जानता है - 
ग्राम-संज्ञा को लेकर जो दरथ (=पीड़ा) थे, वे नहीं हैं; 
मनुष्य-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वे भी नहीं हैं; 
किंतु अकेली अरण्य-संज्ञा को लेकर यह दरथ-मात्र है ही। 
वह जानता है - 
यह जो ग्राम-संज्ञा (=गांव का ख्याल) है, वह संज्ञा शून्य है। 
वह जानता है - 
यह जो मनुष्य-संज्ञा है,वह संज्ञा शून्य है। 
इस अकेली अरण्य-संज्ञा को लेकर अ-शून्यता तो है ही। 
इस प्रकार जो वहां नहीं होता, उससे उसे शून्य देखता है; और जो वहां बाकी रहता है, उस विद्यमान को ‘यह है' - जानता है। 
ऐसे भी आनन्द! यह यथार्थ =अ-विपर्यस्त, परिशुद्ध शून्यता में उसका प्रवेश होता है।"

🌷 “और फिर, 
आनन्द! भिक्खु मनुष्य-संज्ञा को..., 
अरण्य-संज्ञा को मन में न कर, 
केवल पृथ्वी-संज्ञा मात्र को लेकर मन में करता है। 
पृथ्वी-संज्ञा में उसका ‘चित्त... ठहरता है...। जैसे, आनन्द! बैल का चमड़ा सौ कांटों से तना बलि (=शिकन) के बिना होता है; 
ऐसे ही आनन्द! वह भिक्खु इस पृथ्वी के ऊंचे नीचे तट, नदी घाट, खांड, कटंकस्थान, पर्वत की विषमता -- सभी को मन में न कर, एक मात्र पृथ्वी-संज्ञा को ही लेकर मन में करता है। 
पृथ्वी-संज्ञा में उसका चित्त... ठहरता है...। 
वह ऐसा जानता है - 
मनुष्य-संज्ञा को लेकर जो दरथ, थे, वे नहीं हैं। अरण्य संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं। किंतु केवल पृथ्वी-संज्ञा को लेकर दरथ तो हैं ही। 
वह जानता है - 
वह जो मनुष्य-संज्ञा है, वह (यहां) शून्य है; 
जो अरण्य-संज्ञा है, वह भी शून्य है; 
किंतु इस केवल पृथ्वी-संज्ञा को लेकर अ-शून्यता तो है ही। 
इस प्रकार जो वहां नहीं होता...। 
इस प्रकार भी आनन्द! यथार्थ शून्यता में उसका प्रवेश होता है।"

🌷 “और फिर, 
आनन्द! भिक्खु अरण्य-संज्ञा को..., 
पृथ्वी-संज्ञा को मन में न कर, 
केवल अन्तरहित आकाश के आयतन (=अधिकरण, स्थान) (=आकाशानन्त्यायतन) की संज्ञा (=ख्याल) को लेकर मन में करता है। आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा में उसको चित्त ठहरता है। 
वह ऐसा जानता है-
अरण्य संज्ञा..., 
पृथ्वी-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं। किंतु आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को लेकर दरथ तो हैं ही।
...अरण्य-संज्ञाशून्य ... है; 
...पृथ्वी-संज्ञा ...शून्य है; 
किंतु इस केवल आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को लेकर अशून्यता तो है ही। 
इस प्रकार जो वहां नहीं होता...। 
ऐसे भी, आनन्द! यथार्थ ... शून्यता में उसका प्रवेश होता है।"

"और फिर, आनन्द! भिक्खु पृथ्वी-संज्ञा को मन में न कर आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, अन्तरहित-विज्ञान के आयतन (=विज्ञानानन्त्यायतन) की संज्ञा को लेकर मन में करता है...।"

" ...आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, 
विज्ञानानन्त्यायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल आकिंचन्य (=नहीं-कुछ-पन) आयतन की संज्ञा को लेकर मन में करता है...।" 

"...विज्ञानानन्त्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, आकिंचन्यायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन-संज्ञा को लेकर मन में करता है...।"

"...आकिंचन्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल अ-निमित्त (=लिंग आदि रहित) चेतःसमाधि को लेकर मन में करता है...।"

"... आकिंचन्यायतन-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं, 
नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं; 
किंतु जीवन (=जीवित) के कारण इसी षड्-आयतन वाली काया को लेकर यह दरथ तो है ही। 
... आकिंचन्यायतन-संज्ञा ... शून्य है, ... नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-संज्ञा ... शून्य है; 
किंतु जीवन के कारण, इसी षड्-आयतन वाली काया को लेकर अ-शून्यता तो है ही। 
इस प्रकार जो वहां नहीं होता। 
ऐसे भी आनन्द! ...।"

🌷" ... आकिंचन्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, (जो) केवल अ-निमित्त चेतसमाधि को लेकर मन में करता है; (सो) उसका चित्त अनिमित्त चेतः समाधि में ... ठहरता  है... । वह ऐसा जानता है - चूंकि यह अनिमित्त चेतःसमाधि अभिसंस्कृत (कृत) है, चिन्तन करते (यह) अभिसंस्कृत (=कृत) हुई है। जो अभिसंस्कृत (=कृत) है, वह अ-नित्य है, नाशवान (=निरोध धर्मा) है ... यह जानता है। तब इस प्रकार जानते-देखते उसका चित्त काम-आस्रवों (=भोगेच्छा सम्बन्धी चित्त कालुष्यों से मुक्त होता है, “भव-आस्रव (=जन्मान्तर की लालसा रूपी आस्रव), अविद्या आस्रवों (=अज्ञान) से भी मुक्त होता है। ‘विमुक्त होने पर ‘विमुक्त हूं'–ज्ञान होता है। ‘आवागमन खत्म हो गया, (ब्रह्मचर्य) वास पूरा हो गया, करना था सो कर लिया, और यहां के लिए (कुछ शेष) नहीं है - जानता है। वह ऐसा जानता है - 
काम-आस्रव को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं। भव-आस्रव ... 
अविद्या-आस्रव को लेकर जो दरथ थे, वे नहीं हैं; 
किंतु जीवन के कारण, इसी षड्-आयतन वाली काया को लेकर दरथ तो है ही। 
वह जानता है -
 कामास्रव सम्बन्धी संज्ञा से यह शून्य है। 
वह जानता है  - 
भवास्रव सम्बन्धी संज्ञा से यह शून्य है।
वह जानता है-
अविद्याग्नव-सम्बन्धी संज्ञा से यह शून्य है, 
किंतु ... इसी षडायतन वाली काया को लेकर अशून्यता तो है ही। 
इस प्रकार जो वहां नहीं होता, उससे उसे शून्य देखता है, और जो वहां बाकी रहता है, उस विद्यमान को–“यह है'-जानता है। ऐसे, आनन्द! यह यथार्थ=अ-विपर्यस्त, परिशुद्ध परम-अनुत्तर (=सर्वोत्तम) शून्यता में प्रवेश होता है।"

🌷"आनन्द! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण अतीत काल में परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरे, वे सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरे, जो कोई श्रमण या ब्राह्मण भविष्यकाल में विहरेंगे, वे सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरेंगे। जो कोई श्रमण या ब्राह्मण वर्तमान काल में परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरते हैं, वे सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरते हैं। इसलिये, आनन्द! ‘परिशुद्ध, परमानुत्तर शून्यता को प्राप्त कर विहरूंगा’-यह मुझे सीखना चाहिए।” 

🌷भगवा ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवा के भाषण अभिनन्दन किया।🙏

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Thursday, July 25, 2019

🍁38-महातण्हासंखय-सुत्त🍁 🍁मज्झिम निकाय (1.4.8) 🍁

🍁38-महातण्हासंखय-सुत्त🍁
         🍁मज्झिम निकाय (1.4.8) 🍁


👂ऐसा मैंने सुना-

🚶एक समय भगवान सावत्थि में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। 
👀उस समय साति केवट्टपुत्त भिक्खु को ऐसी बुरी दृष्टि (=धारणा) उत्पन्न हुई थी-

“मैं भगवान के उपदेश किए धर्म को इस प्रकार जानता हूं, कि वही विज्ञान संसरण (जन्म-मरण में जाना) करता है, संधावन (=धावन) करता है, अन्य नहीं।” ।

💔बहुत से भिक्खुओं ने सुना कि-साति केवट्टपुत्त (= केवर्त-पुत्र) भिक्खु को ऐसी बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है-संधावन करता है। तब वह भिक्खु जहां साति केवट्टपुत्त भिक्खु था, वहां गए। जाकर साति केवट्टपुत्त भिक्खु से यह बोले--👄

“सचमुच, आवुस साति! तुम्हें इस प्रकार की बुरी धारण उत्पन्न हुई है?-संधावन करता है!”

🙏हां आवुस!संधावन करता है।”

☝तब वह भिक्खु उस बुरी धारणा से हटाने के लिए साति केवट्टत्त भिक्खु को समझाते बुझाते समनुभाषण करने लगे --

☝"आवुस साति! मत ऐसा कहो, मत भगवान पर झूठ लगाओ। भगवान पर झूठ लगाना ठीक नहीं है। भगवान ऐसा नहीं कहते। आवुस साति! भगवान ने अनेक प्रकार से विज्ञान को प्रतीत्य समुत्पन्न (कार्य-कारण से उत्पन्न) कहा है। प्रत्यय (=हेतु)के बिना विज्ञान (=चेतना) का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता।”

💥इस प्रकार उन भिक्खुओं द्वारा समझाए बुझाए जाने पर भी साति केवट्टपुत्त भिक्खु, उसी बुरी धारणा को दृढ़ता से पकड़े कहता था-

‘मैं भगवान के उपदिष्ट धर्म को इस प्रकार जानता हूं।' 

जंब वह भिक्खु साति केवट्टपुत्त भिक्खु को उस बुरी धारणा को न हटा सके, तब जहां भगवान थे, वहां गए; जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए...उन भिक्खुओं ने भगवान से यह कहा--

🙏भन्ते! केवट्टपुत्त साति भिक्खु को ऐसी बुरी धारणा (=पापदृष्टि) उत्पन्न हुई है-'मैं भगवान के उपदिष्ट धर्म को इस प्रकार जानता हूं-“मैं भगवान के उपदेश किए धर्म को इस प्रकार जानता हूं, कि वही विज्ञान संसरण (जन्म-मरण में जाना) करता है, संधावन (=धावन) करता है, अन्य नहीं।” 

 --हमने भन्ते! ""साति की इस बुरी धारणा को सुना। तब हम भन्ते!“साति भिक्खु के पास जाकर यह बोले-सचमुच आवुस साति! तुम्हें इस प्रकार की बुरी धारण उत्पन्न हुई है?-संधावन करता है!”

"हां आवुस!' 

जब हम भन्ते! साति भिक्खु की इस बुरी धारणा को न हटा सके, तब हमने आकर इस बात को भगवान से कहा।”

☝तब भगवान ने एक भिक्खु को संबोधित किया- “आओ भिक्खु! तुम मेरी ओर से केवपुत्त साति भिक्खु को बोलना-‘आवुस साति! शास्ता (=उपदेशक, बुद्ध) तुम्हें बुला रहे हैं, ।”

"अच्छा, भन्ते!” (कह) वह भिक्खु“साति भिक्खु के पास जाकर यह बोला-आवुस! शास्ता तुम्हें बुला रहे हैं।

"अच्छा, आवुस !”–कह केवट्टपुत्त साति भिक्खु जहां भगवान थे वहां जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे... साति भिक्खु को भगवान ने यह कहा--

☝सचमुच, साति! तुझे इस प्रकार की बुरी धारणा उत्पन्न हुई है-
“मैं भगवान के उपदेश किए धर्म को इस प्रकार जानता हूं, कि वही विज्ञान संसरण (जन्म-मरण में जाना) करता है, संधावन (=धावन) करता है, अन्य नहीं।” 

🙏“हां, भन्ते! मैं भगवान के उपदिष्ट धर्म को इस प्रकार जानता हूं; कि वही विज्ञान संसरण, संधावन करता है, दूसरा नहीं ।”

☝"साति! वह विज्ञान क्या है?”

🙏"यह जो भन्ते! वक्ता, अनुभव-कर्ता है, जो कि तहां-तहां (जन्म लेकर) अच्छे, बुरे कर्मों के विपाक को अनुभव करता है।”

☝"मोघपुरुष' ! तुमने किस को मुझे ऐसा उपदेश करते सुना? मैंने तो मोघपुरुष! अनेक प्रकार से विज्ञान को प्रतीत्य-समुत्पन्न कहा है; प्रत्यय के बिना विज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता (–कहा है)। 
मोघपुरुष! तू अपनी ठीक से न समझी बात का हमारे पर लांछन लगाता है; अपना नुकसान कर रहा है, और बहुत पाप कमा रहा है; मोघपुरुष! यह तेरे लिए दीर्घकाल तक अहितकर, दुखकर होगा।”

☝तब भगवान ने भिक्खुओं को संबोधित किया--

“तो क्या मानते हो, भिक्खुओ! क्या इस... साति भिक्खु ने इस धर्म-विनय (=धर्म) में थोड़ा भी अवगाहन कर पाया (=उस्मीकत) है?”

🙏“क्या कर पायेगा, भन्ते? नहीं भन्ते!” ।

🌴ऐसा कहने पर केवट्टपुत्त साति भिक्खु गुमसुम हो, मूक हो, कंधा गिराकर, नीचे मुंह करके चिन्ता में पड़, प्रतिभाहीन हो बैठा रहा। तब भगवान ने साति भिक्खु को गुमसुम हो प्रतिभाहीन हो बैठे देख (उसे) यह कहा--

☝"मोघपुरुष! जानेगा तू इस अपनी बुरी धारणा को। अब मैं भिक्खुओं को पूछता हूं।”

 तब भगवान ने भिक्खुओं को संबोधित किया--

☝“भिक्खुओ! तुमने मुझे ऐसा धर्म उपदेश करते देखा है, जैसा कि साति भिक्खु अपनी ठीक से न समझी बात का, हमारे पर लांछन लगाता है; अपना नुकसान कर रहा है; और बहुत पाप कमा रहा है?”

🙏"नहीं भन्ते! भगवान ने तो भन्ते! हमें अनेक प्रकार से विज्ञान को प्रतीत्यसमुत्पन्न कहा है, प्रत्यय के बिना विज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं होता है (–कहा है)।"

☝"साधु, भिक्खुओ! तुम इस प्रकार मेरे उपदेशित धर्म को ठीक से जानते हो-‘अनेक प्रकार से से विज्ञान को प्रतीत्यसमुत्पन्न कहा है, प्रत्यय के बिना विज्ञान का  प्रादुर्भाव नहीं हो सकता' तो भी यह साति भिक्खु अपनी ठीक से न समझी यह उसके लिए दीर्घकाल तक अहितकर दुखकर होगा।"

☝"भिक्खुओ! जिस-जिस प्रत्यय (=निमित्त) से विज्ञान उत्पन्न होता है, वही-वही उसकी संज्ञा (=नाम) होती है।
🌴 चक्षु (=आंख) के निमित्त से रूप में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है; चक्षुर्विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।
🌴 श्रोत्र के निमित्त से शब्द में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है; श्रोत्र-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है। 
🌴घ्राण (नाक) के निमित्त से गंध में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, घ्राण-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।
🌴 जिह्वा के निमित्त से रस में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, रस-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है। 
🌴काया के निमित्त से स्पष्टव्य (=छुए जाने ले विषय) में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, काय-विज्ञान ही उसका नाम होता है। 
🌴मन के निमित्त से धर्म (=उपरोक्त पांच बाहरी इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, मनो-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।

जैसे कि, भिक्खुओ! जिस निमित्त (=प्रत्यय) को लेकर (जो) आग जलती है, वही वही उसकी संज्ञा होती है। 
🍃काष्ठ के निमित्त से (जो) आग जलती है, काष्ठ-अग्नि ही उसकी संज्ञा होती है।
🍃 (लकड़ी की) चुन्नी के निमित्त से जो आग जलती है, चुन्नी की आग ही उसकी संज्ञा होती है। 
🍃तृण के निमित्त से (जो) आग जलती है, तृण-अग्नि ही उसकी संज्ञा होती है।
🍃 कंडे (=गोमय)के निमित्त से (जो) आग जलती है, कंडे की आग ही उसकी संज्ञा होती है।
🍃 भूसी (=तष) के निमित्त से (जो) आग जलती है, भूसी की आग ही उसकी संज्ञा होती है। 
🍃 कूड़े (=संकार) के निमित्त से (जो) आग जलती है, कूड़े की आग ही उसकी संज्ञा होती है। 
🌷ऐसे ही भिक्खुओ! जिस-जिस निमित्त से विज्ञान उत्पन्न होता है, वही-वही उसकी संज्ञा होती है। 
🌴 चक्षु (=आंख) के निमित्त से रूप में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है; चक्षुर्विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।
🌴 श्रोत्र के निमित्त से शब्द में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है; श्रोत्र-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है। 
🌴घ्राण (नाक) के निमित्त से गंध में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, घ्राण-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।
🌴 जिह्वा के निमित्त से रस में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, रस-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है। 
🌴काया के निमित्त से स्पष्टव्य (=छुए जाने ले विषय) में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, काय-विज्ञान ही उसका नाम होता है। 
🌴मन के निमित्त से धर्म (=उपरोक्त पांच बाहरी इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) में (जो) विज्ञान उत्पन्न होता है, मनो-विज्ञान ही उसकी संज्ञा होती है।

☝भिक्खुओ! इस (पांच स्कंधों)को उत्पन्न देखते हो?” 

🙏हां, भन्ते!” ।

☝ “भिक्खुओ! अपने आहार से (उन्हें) उत्पन्न हुआ देखते हो?” 

🙏“हां, भन्ते!” ।

☝भिक्खुओ! जो उत्पन्न होनेवाला है, अपने आहार के निरोध से वह निरुद्ध (=नष्ट) होनेवाला होता है-इसे देखते हो?” ।

🙏“हां, भन्ते!”

☝भिक्खुओ! यह (पांच स्कंध) उत्पन्न हुआ है, या नहीं?—यह दुविधा करते सन्देह (=विचिकित्सा) उत्पन्न होती है न?”

🙏“हां, भन्ते!” । 

☝भिक्खुओ! अपने आहार से उत्पन्न हुआ है, या नहीं- यह दुविधा करते सन्देह (=विचिकित्सा) उत्पन्न होती है न?"

🙏 “हां, भन्ते!”

☝“भिक्खुओ! ‘जो उत्पन्न होनेवाला है, (वह) अपने आहार (=स्थिति के आहार) के निरोध से निरुद्ध होनेवाला होता है, या नहीं' -यह दुविधा करते सन्देह उत्पन्न होता है न?”

🙏“हां, भन्ते!” 

☝भिक्खुओ! ‘ये (=पांच स्कंध) उत्पन्न हैं' -यह अच्छी प्रकार प्रज्ञा से देखने पर सन्देह नष्ट हो जाता है न!”

🙏“हां, भन्ते!” ।

☝भिक्खुओ! इसे अपने आहार से उत्पन्न होनेवाला है जो उत्पन्न होने वाला है, (वह) अपने आहार के निरोध से निरुद्ध होने वाला होता है’ -यह ठीक से अच्छी प्रकार प्रज्ञा से देखने पर सन्देह नष्ट हो जाता है न?”

🙏“हां, भन्ते!” ।

☝" भिक्खुओ! ‘ये (पंच स्कंध) उत्पन्न हैं? –इस (विषय में) तुम सन्देह-रहित हो न?” 

🙏“हां, भन्ते!”

☝ भिक्खुओ! ‘वे अपने आहार से उत्पन्न है' -इस (विषय) में भी तुम सन्देह-रहित हो न?”

🙏 “हां, भन्ते!”

☝भिक्खुओ! ‘वे अपने आहार से उत्पन्न है अपने आहार के निरोध से निरुद्ध होनेवाला होता है-इस (विषय) में भी तुम सन्देह-रहित हो न?”

🙏“हां, भन्ते!” 

☝भिक्खुओ! ‘यह उत्पन्न है-इसे ठीक से अच्छी प्रकार जानना सुदृष्ट (=अच्छा दर्शन) है न?”

🙏हां, भन्ते!”

☝भिक्खुओ! ‘(यह) अपने आहार से उत्पन्न है-:।अपने आहार से निरोध से निरुद्ध होनेवाला होता है-यह ठीक से अच्छी प्रकार जानना सुदृष्ट है न?”

🙏हां, भन्ते!” 

☝“भिक्खुओ! क्या तुम इस ऐसे परिशुद्ध, उज्ज्वल, दृष्ट (=दर्शन, ज्ञान) में भी आसक्त होओगे, रमोगे, ‘(मेरा) धन है'–समझोगे, ममता करोगे? 
भिक्खुओ! 
(मेरे) उपदेशे धर्म को कुल्ल (=नदी पार करने के बेड़े) के समान, 
(यह) पार होने के लिए है, पकड़कर रखने के लिए नहीं है-(समझोगे)?”

🙏"(पकड़ कर रखने के लिए) नहीं है भन्ते!”

☝“भिक्खुओ! तुम इस ऐसे परिशुद्ध, उज्ज्वल, दृष्ट में भी आसक्त न होना, न रमना, ‘(मेरा) धन है'-न समझना ममता न करना। बल्कि भिक्खुओ! मेरे उपदेशे धर्म को कुल्ल (=बेड़े) के समान समझना, (यह) पार होने के लिए है, पकड़कर रखने के लिए नहीं है।” ।

🙏“हां, भन्ते!” 

☝भिक्खुओ! उत्पन्न प्राणियों की स्थिति के लिए, आगे उत्पन्न होनेवाले (सत्त्वों) की सहायता (=अनुग्रह)के लिए ये चार आहार हैं। कौन से चार?-
🌷(पहला) स्थूल या सूक्ष्म कवलीकार (=कवल, कवल करके खाने योग्य) आहार; 
🌷दूसरा स्पर्श (आहार); 
🌷तीसरा मनःसंचेतना (=मन से विषय का ख्याल करके तृप्तिलाभ करना),
🌷 चौथा विज्ञान (=चेतना) ।

☝भिक्खुओ! इन चार आहारों का क्या निदान (=हेतु) है=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है तृष्णा। समुदय है, तृष्णा। ये जन्मे हैं तृष्णा से= संभूत हैं तृष्णा से ।।

☝भिक्खुओ! इस तृष्णा का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है वेदना। समुदय है, वेदना। ये जन्मे हैं वेदना से= संभूत हैं वेदना से ।

☝भिक्खुओ! इस वेदना का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है स्पर्श। समुदय है, स्पर्श। ये जन्मे हैं स्पर्श से= संभूत हैं स्पर्श से ।

☝भिक्खुओ! इस स्पर्श का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है षड्-आयतन। समुदय है, षड्-आयतन। ये जन्मे हैं षड्-आयतन से= संभूत हैं षड्-आयतन से ।


☝भिक्खुओ! इस षड्-आयतन का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है नामरूप । समुदय है, नामरूप। ये जन्मे हैं नामरूप से= संभूत हैं नामरूप से ।


☝भिक्खुओ! इस नामरूप का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है विज्ञान । समुदय है, विज्ञान। ये जन्मे हैं विज्ञान से= संभूत हैं विज्ञान से ।


☝भिक्खुओ! इस विज्ञान का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है संस्कार । समुदय है, संस्कार। ये जन्मे हैं संस्कार से= संभूत हैं संस्कार से ।

☝भिक्खुओ! इस संस्कार का क्या निदान है?=क्या समुदय है? (ये) किससे जन्मे हैं=किस से संभूत हैं?—
☝भिक्खुओ! इन चारों आहारों का निदान है अविद्या । समुदय है, अविद्या। ये जन्मे हैं अविद्या से= संभूत हैं अविद्या से ।

🌷इस प्रकार भिक्खुओ! 
अ-विद्या के कारण संस्कार होता है, 
संस्कार के कारण विज्ञान, 
विज्ञान के कारण नाम-रूप, 
नाम-रूप के कारण षड्-आयतन, 
षड्-आयतन के कारण स्पर्श, 
स्पर्श के कारण वेदना, 
वेदना के कारण तृष्णा, 
तृष्णा के कारण उपादान (=ग्रहण या ग्रहण करने ही इच्छा), 
उपादान के कारण भव (=संसार), 
भव के कारण जन्म, 
जन्म के कारण जरा-मरण, शोक, रोना-कांदना, दुख=दौर्मनस्य, हैरानी-परेशानी होती है। 
🌷इस प्रकार इस सम्पूर्ण दुख-स्कंध(=दुखसमुदाय)की उत्पत्ति होती है।

☝“भिक्खुओ! जाति (=जन्म)के कारण जरा-मरण होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! जाति के कारण जरा-मरण होता है या नहीं-इसमें तुम्हें क्या जान पड़ता है? "

🙏जाति के कारण जरा-मरण होता है। भन्ते! हमको यही जान पड़ता है, कि जाति के कारण जरा-मरण होता है।

☝भिक्खुओ! भव के कारण जाति (=जन्म) होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! भव के कारण जाति होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏भव के कारण, भन्ते! जाति होती है।” 

☝भिक्खुओ! उपादान के कारण भव होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! उपादान के कारण भव होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏उपादान के कारण, भन्ते! भव होती है।”


☝भिक्खुओ! तृष्णा के कारण उपादान होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! तृष्णा के कारण उपादान होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏तृष्णा के कारण, भन्ते! उपादान होती है।”


☝भिक्खुओ! वेदना के कारण तृष्णा होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! वेदना के कारण तृष्णा होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏वेदना के कारण, भन्ते! तृष्णा होती है।”


☝भिक्खुओ! स्पर्श के कारण वेदना होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! स्पर्श के कारण वेदना होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏स्पर्श के कारण, भन्ते! वेदना होती है।”


☝भिक्खुओ! षड्-आयतन के कारण स्पर्श होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! षड्-आयतन के कारण स्पर्श होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏षड्-आयतन के कारण, भन्ते! स्पर्श होती है।”

☝भिक्खुओ! नामरूप के कारण षड्-आयतन होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! नामरूप के कारण षड्-आयतन होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏नामरूप के कारण, भन्ते! षड्-आयतन होती है।”


☝भिक्खुओ! विज्ञान  के कारण नामरूप होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! विज्ञान के कारण नामरूप होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏विज्ञान के कारण, भन्ते! नामरूप होती है।”


☝भिक्खुओ! संस्कार  के कारण विज्ञान होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! संस्कार के कारण विज्ञान होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏संस्कार के कारण, भन्ते! विज्ञान होती है।”


☝भिक्खुओ!  अविद्या के कारण संस्कार होती है-यह जो कहा। भिक्खुओ! अविद्या के कारण संस्कार होती है या नहीं-इसमें क्या जान पड़ता है?”

🙏अविद्या के कारण, भन्ते! संस्कार होती है।”


☝🌷साधु, भिक्खुओ! तुम भी भिक्खुओ! इस प्रकार कहो, मैं भी ऐसे ही कहता हूं-‘इसके होनपर यह होता है, इसके उत्पन्न होने से यह उत्पन्न होता है। जो कि यह अविद्या के कारण संस्कार संस्कार के कारण विज्ञान विज्ञान के कारण नाम-रूप, नाम-रूप के कारण षड-आयतन,षड-आयतन के कारण स्पर्श, स्पर्श के कारण वेदना, वेदना के कारण तृष्णा, तृष्णा के कारण उपादान, उपादान के कारण भव, भव के कारण जाति, जाति के कारण जरा-मरण, जरा-मरण के कारण शोक, रोना=कांदना, दुख=दौर्मनस्य, हैरानी-परेशानी होती है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण दुख-स्कन्ध (=दुख-पुंज) की उत्पत्ति होती है।

☝“अविद्या के पूर्णतया निरुद्ध होने से, (अविद्या के) नष्ट होने से संस्कार का नाश (=निरोध) होता है, 
संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है, विज्ञान के निरोध से नाम-रूप का निरोध होता है, 
नाम-रूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है, 
षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है, 
स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है, वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है, तृष्णा के निरोध से उपादान का निरोध होता है, उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है, भव के निरोध से जाति का निरोध होता है, जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक रोने-कांदने, दुख-दौर्मस्य हैरानी-परेशानी का निरोध होता है। इस प्रकार इस केवल दुख-स्कन्ध का निरोध होता है।"

☝भिक्खुओ! “जाति के निरोध से जरा-मरण का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! जाति के निरोध से जरा-मरण का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘जाति के निरोध से जरा-मरण का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है-जाति के निरोध से जरा-मरण का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “भव के निरोध से जाति का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! भव के निरोध से जाति का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘भव के निरोध से जाति का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है-भव के निरोध से जाति का निरोध होता है।”


☝भिक्खुओ! “उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “तृष्णा के निरोध से भव का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! तृष्णा के निरोध से भव का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘तृष्णा के निरोध से भव का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- तृष्णा के निरोध से भव का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है।”


☝भिक्खुओ! “स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है' भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “ नामरूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! नामरूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘नामरूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- नामरूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है।”


☝भिक्खुओ! “ विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है।”

☝भिक्खुओ! “ संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है।”


☝भिक्खुओ! “अविद्या के निरोध से संस्कार का निरोध होता है-यह जो कहा। भिक्खुओ! अविद्या के निरोध से संस्कार का निरोध होता है या नहीं होता-यहां तुम्हें कैसा जान पड़ता है?”

🙏‘अविद्या के निरोध से संस्कार का निरोध होता है भन्ते! (यहा) भन्ते! हमें होता है- अविद्या के निरोध से संस्कार का निरोध होता है।”


☝🌷साधु, भिक्खुओ! तुम भी भिक्खुओ! इस प्रकार कहो, मैं भी ऐसे कहता हूं-
इसके न होने पर यह नहीं होता, 
इसके निरोध होने पर इसका निरोध होता है, 
जो कि यह विद्या के निरोध से संस्कार का निरोध होता है; 
संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है; विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है; 
नामरूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध होता है; 
षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है; 
स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है; वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है; तृष्णा के निरोध से उपादान का निरोध होता है;उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है; भव के निरोध से जाति का निरोध होता है; जाति के निरोध से वेदना का जरा-मरण, शोक, रोने-कांदने, दुख=दौर्मनस्य' हैरानी-परेशानी का निरोध होता है।


☝भिक्खुओ! इस प्रकार (पूर्वोक्त क्रम से) जानते-देखते हुए क्या तुम पूर्व के छोर (=पूर्व-अंत=पुराने समय जन्म) की ओर दौड़ोगे-“अहो! क्या हम अतीत-काल में थे, या हम अतीत-काल में नहीं थे? 
अतीत-काल में हम क्या थे? 
अतीत काल में हम कैसे थे? 
अतीत-काल में क्या होकर हम क्या हुए थे?” 

🙏 नहीं, भन्ते!” ।

☝भिक्खुओ! इस प्रकार जानते देखते हुए, क्या तुम बाद के छोर (=अपर-अंत=आगे आनेवाले समय) की ओर दौड़ोगे-“अहो! क्या हम भविष्य काल में होंगे, या हम भविष्य काल में नहीं होंगे? भविष्य काल में हम क्या होंगे? हम कैसे होंगे? भविष्य काल में क्या होकर हम क्या होंगे?” 

🙏नहीं, भन्ते!” ।

☝“भिक्खुओ! इस प्रकार जानते देखते हुए, क्या तुम इस वर्तमान काल में अपने भीतर इस प्रकार कहने-सुननेवाले (=कथंकथी) होंगे-“अहो! क्या मैं हूं, “या मैं नहीं हूं? मैं क्या हूं? मैं कैसा हूं? यह सत्त्व (=प्राणी) कहां से आया? वह कहां जाने वाला होगा?”

🙏“नहीं, भन्ते!”

☝भिक्खुओ! इस प्रकार देखते जानते क्या तुम ऐसा कहोगे-‘शास्ता (=उपदेष्टा) हमारे गुरु हैं, शास्ता के गौरव ( के ख्याल) से हम ऐसा कहते हैं–?”

🙏नहीं, भन्ते!”

☝“भिक्खुओ! इस प्रकार देखते जानते ऐसा कहोगे- ‘श्रमण (=संन्यासी) ने हमें ऐसा कहा, श्रमण के वचन से हम ऐसा कहते हैं ?',

🙏नहीं, भन्ते!” 

☝भिक्खुओ! इस प्रकार देखते-जानते क्या तुम दूसरे शास्ता के अनुगामी होगे?”

🙏 नहीं, भन्ते!”

☝“क्या तुम नाना श्रमण ब्राह्मणों के (जो वे) व्रत, कौतुक, मंगल (संबंधी क्रियाएं) हैं, उन्हें सार के तौर पर ग्रहण करोगे?”

🙏नहीं, भन्ते!”

☝क्या भिक्खुओ! जो तुम्हारा अपना जाना है, अपना देखा है, अपना अनुभव किया है; उसी को तुम कहते हो?”

🙏हां, भन्ते!” ।

☝🌷“साधु भिक्खुओ! मैंने भिक्खुओ! तुम्हें समयान्तर में नहीं तत्काल, यहीं दिखाई देनेवाले, विज्ञों द्वारा अपने आप में जानने योग्य इस धर्म के पास उपनीत किया (=पहुंचाया) है।
☝ भिक्खुओ! ‘यह धर्म समयान्तर में नहीं तत्काल फलदायक है, (इसका परिणाम) यहीं दिखाई देनेवाला है, (यह) विज्ञ-जनो द्वारा अपने आप में जानने योग्य है' -यह जो कहा है, वह इसी (उक्त कारण) से ही कहा है।

☝भिक्खुओ! तीन के एकत्रित होने से गर्भ धारण होता है-माता और पिता एकत्र होते हैं, किंतु माता ऋतुमती नहीं होती और गंधर्व' उपस्थित नहीं होता; तो गर्भधारण नहीं होता। माता-पिता एकत्र होते हैं, माता ऋतुमती होती है; किंतु गन्धर्व उपस्थित नहीं होता, तो भी गर्भधारण नहीं होता। जब माता-पिता एकत्र होते हैं, माता ऋतुमती होती है, और गंधर्व उपस्थित होता है; इस प्रकार तीनों के एकत्रित होने से गर्भधारण होता है। तब उस गुरु-भार-वाले गर्भ को बड़े संयम के साथ माता कोख में नौ या दस मास धारण करती है। फिर उस गुरु भार वाले गर्भ को बड़े संयम के साथ माता नौ या दस मास के बाद जनती है। तब उस जात (=सन्तान) को भिक्खुओ! माता अपने ही लोहित से पोसती है। भिक्खुओ! आर्यों के मत में यह लोहित (=खून) ही है, जो कि यह माता का दूध है।

🌷तब भिक्खुओ! वह कुमार बड़ा होने पर, इन्द्रियों के परिपक्व होने पर जो वह बच्चों के खिलौने हैं, जैसे कि-वंकक (=वंका), घटिक (=घड़िया), माक्खचिक (=मुंह का लटू), चिंगुलक (=चिंगुलिया), पात्र-आढक (=तराजू का खिलौना), रथक (=खिलौने की गाड़ी), धनुक (=धनुही)-उनसे खेलता है।

🌷तब भिक्खुओ! वह कुमार (और) बड़ा होने पर, इन्द्रियों के परिपक्व होने पर, संयुक्त संलिप्त हो, पांच (प्रकार के) काम-गुणों (विषय-भोगों)-चक्षु से विज्ञेय इष्ट (=अभिलषित) कान्त (=कमनीय), मनोज्ञ, प्रिय, कामनायुक्त, रंजनीय रूपों, श्रोत्र से विज्ञेय शब्दों, घ्राण से विज्ञेय गन्धों; जिह्वा से विज्ञेय रसों; काया से विज्ञेय स्पर्शो–को सेवन करता है। वह *चक्षु (=आंख) से प्रिय रूपों को देखकर राग-युक्त होता है* , अ-प्रिय रूपों को देखकर द्वेष-युक्त होता है। कायिक स्मृति (=होश)को न कायम रख छोटे चित्त से विहरता है। (वह) उस चित्त की विमुक्ति और प्रज्ञा की विमुक्ति (=मुक्ति)का ठीक से ज्ञान नहीं करता; जिससे कि उसकी सारी बुराइयां=अकुशल-धर्म निरुद्ध हो जाएं। वह इस प्रकार अनुरोध (=राग), विरोध में पड़ा सुखमय दुखमय न-सुख-न-दुखमय-जिस । किसी वेदना को वेदन (=अनुभव) करता है उसका वह अभिनन्दन करता है, अभिवादन करता है, अवगाहन करता है। इस प्रकार अभिनन्दन करते, अभिवादन करते, अवगाहन करते रहते उसे नन्दी (=तृष्णा) उत्पन्न होती है, वेदनाओं के विषय में जो यह नन्दी है, (यही) उसका उपादान है, उसके उपादान के कारण भव होता है, भव के कारण जाति, जाति के कारण जरा-मरण, शोक, रोना-कांदना, दुख=दौर्मनस्य, हैरानी-परेशानी होती है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण दुख-स्कंध की उत्पत्ति=समुदय, होता है। वह श्रोत्र से प्रिय शब्दों को सुनकर... घ्राण से प्रिय गंधों को सूंघकर... जिह्वा से प्रिय रसों को चखकर... काया से प्रिय स्प्रष्टयों को छूकर... मन में प्रिय धर्मों को जानकर... । इस प्रकार इस सम्पूर्ण दुख-स्कंध की उत्पत्ति होती है।

🌷भिक्खुओ! यहां लोक में तथागत, अर्हत्, सम्यक्-सम्बुद्ध, विद्या-आचरण-युक्त, सुगत, लोक-विद्, पुरुषों के अनुपम-चाबुक-सवार, देवताओं-और-मनुष्यों के उपदेष्टा भगवान बुद्ध उत्पन्न होते हैं। वे ब्रह्मलोक, मारलोक, देवलोक सहित इस लोक को, देव-मनुष्य-सहित श्रमण-ब्राह्मण-युक्त (सभी) प्रजा को स्वयं समझ कर=साक्षात्कारकर (धर्म को) बतलाते हैं। वे आदि में कल्याण (-कारी), मध्य में कल्याण (-कारी), अंत में कल्याण (-कारी) धर्म को अर्थ-सहित=व्यञ्जन-सहित उपदेशते हैं। वे केवल (=मिश्रण-रहित) परिपूर्ण परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं। उस धर्म को गृहपति या गृहपति का पुत्र, या और किसी छोटे कुल में उत्पन्न (पुरुष) सुनता है। वह उस धर्म को सुनकर तथागत के विषय में श्रद्धा लाभ करता है। वह उस श्रद्धा-लाभ से संयुक्त हो सोचता है-यह-वास जंजाल है, मैल का मार्ग है। प्रव्रज्या (=संन्यास) खुला मैदान है। इस नितान्त सर्वथा-परिशुद्ध, खरादे शंख जैसे (=उज्ज्वल) ब्रह्मचर्य का पालन घर में रहते सुकर नहीं है। क्यों न मैं सिर-दाढ़ी मुंड़ाकर, काषाय वस्त्र पहन, घर से बेघर हो प्रव्रजित हो जाऊं?' सो वह दूसरे समय अपनी अल्प भोग-राशि को या महा-भोग-राशि को, अल्प-ज्ञाति-मंडल को या महा-ज्ञाति-मंडल को छोड़ सिर-दाढ़ी मुंड़ा, काषाय वस्त्र पहन घर से बेघर हो प्रव्रजित (=संन्यासी) होता है।

🌷"वह इस प्रकार प्रव्रजित हो, भिक्खुओं की शिक्षा, समान-जीविका को प्राप्त हो, प्राणातिपात छोड़, प्राणिहिंसा से विरत होता है। दंड-त्यागी, शस्त्र त्यागी, लज्जालु, दयालु, सर्व प्राणियों, सारे प्राणि-भूतों का हित और अनुकम्पक हो विहरता है। अ-दिन्नादान (=चोरी) छोड़, दिन्नदायी (=दिए का लेनेवाला), दिए का चाहने वाला, पवित्र चित्त हो विहरता है। अ-ब्रह्मचर्य को छोड़ ब्रह्मचारी हो, ग्राम्य-धर्म मैथुन से विरत हो, आर-चारी (=दूर रहनेवाला) होता है। मृषावाद को छोड़, मृषावाद से विरत हो, सत्यवादी सत्य-संघ, लोक का अ-विसंवादक=विश्वास-पात्र होता है। पिशुन-वचन (=चुगली) छोड़, पिशुन-क्चन से विरत होता है-इन्हें फोड़ने के लिए यहां से सुनकर वहां कहनेवाला नहीं होता; या उन्हें फोड़ने के लिए वहां से सुनकर यहां कहनेवाला नहीं होता। (वह तो) फूटों को मिलानेवाला, मिले हुओं को न फोड़नेवाला, एकता में प्रसन्न, एकता में रत, एकता में आनन्दित हो, एकता करने वाली वाणी का बोलने वाला होता है। कटुवचन छोड़ कटु-वचन से विरत होता है। जो वह वाणी कर्ण-सुखा, प्रेमणीया, हृदयंगमा, सभ्य, बहुजन-कान्ता=बहुजन-मनाप है, वैसी वाणी का बोलनेवाला होता है। प्रलाप को छोड़ प्रलाप से विरत होता है। समय देखकर बोलनेवाला, यथार्थवादी=अर्थ-वादी, धर्म-वादी, विनय-वादी हो, तात्पर्य-युक्त, फल-युक्त, सार्थक, सारयुक्त वाणी का बोलनेवाला होता है।

🌷“वह बीज समुदाय, भूत-समुदाय के विनाश से विरत होता है। एकाहारी, रात को उपरत, विकाल (=मध्याह्नोत्तर)-भोजन से विरत होता है। माला, गंध विलेपन के धारण, मंडन, विभूषण से विरत होता है। उच्च-शयन और महाशयन से विरत होता है। सोना-चांदी लेने से विरत होता है। कच्चा अनाज लेने से विरत होता है। कच्चा मांस लेने से विरत होता है। स्त्री-कुमारी, दासी-दास, “भेड़-बकरी, मुर्गी-सूअर, हाथी-गाय, घोड़ा, खेत-घर लेने से विरत होता है। दूत बनकर जाने से विरत होता है। क्रय-विक्रय करने से विरत होता है। तराजू की ठगी, कांसे की ठगी, मान (=मन, सेर आदि तौल) की ठगी से विरत होता है। घूस, वंचना, जालसाजी, कुटिया-योग। छेदन, वध, बंधन, छापा मारने, ग्राम आदि के विनाश करने, डाका डालने से विरत होता है।

🌷वह शरीर के वस्त्र, और पेट के खाने से सन्तुष्ट रहता है। वह जहां-जहां जाता है (अपना सामान) लिए ही जाता है, जैसे कि पक्षी जहां कहीं उड़ता है, अपने पक्ष-भार के साथ ही उड़ता है। इसी प्रकार भिक्खु शरीर के वस्त्र, और पेट के खाने से सन्तुष्ट रहता है। वह इस प्रकार आर्य (=निर्दोष) शील-स्कंध (=सदाचार-समूहोसे युक्त हो; अपने भीतर निर्मल सुख को अनुभव करता है।

🌷“वह आंख से रूप को देखकर, निमित्त (=आकृति आदि) और अनुव्यंजन (=चिह) का ग्रहण करनेवाला नहीं होता। चूंकि चक्षु इन्द्रिय को अ-रक्षित रख विहरने वाले को, राग, द्वेष, बुराइयां=अ-कुशल धर्म उत्पन्न होते हैं; इसलिये वह उसे सुरक्षित रखता है; चक्षु-इन्द्रिय की रक्षा करता है-चक्षु-इन्द्रिय में संवर ग्रहण करता है। वह श्रोत्र से शब्द सुनकर निमित्त और अनुव्यंजन का ग्रहण करनेवाला नहीं होता...। घ्राण से गंध ग्रहणकर...। जिह्वा से रस ग्रहणकर...। काया से स्पर्श ग्रहणकर ...। मन से धर्म ग्रहणकर...। इस प्रकार वह आर्य इन्द्रिय-संवर से युक्त हो, अपने भीतर निर्मल सुख को अनुभव करता है। 
🌷 “वह आने-जाने में, जानकर करनेवाला (=संप्रजन्य-युक्त) होता है। अवलोकन-विलोकन में संग्रजन्य-युक्त होता है। समेटने में, फैलाने में, ...संघाटी-पात्र-चीवर के धारण करने में, ...खानपान भोजन आस्वादन में... । मल-मूत्र विसर्जन में, जाते-खड़े होते, बैठते, सोते-जागते, बोलते, चुप रहते। इस प्रकार वह आर्य स्मृति-संप्रजन्य से युक्त हो, अपने में निर्मल सुख को अनुभव करता है।

🌷वह इस आर्य-शील-स्कंध से युक्त, इस आर्य इन्द्रिय-संवर से युक्त, इस आर्य स्मृति-संप्रजन्य से युक्त हो, एकान्त में-अरण्ड, वृक्ष-छाया, पर्वत, कन्दरा, गिरि-गुहा, श्मशान, वन-प्रान्त, खुले मैदान, या पुआल के गंज में-वास करता है। वह भोजन के बाद आसन मारकर, काया को सीधा रख, स्मृति को सम्मुख ठहरा कर बैठता है। वह लोक में -
🌷(1) अभिध्या (=लोभ) को छोड़, अभिध्या रहित चित्तवाला हो विहरता है; चित्त को अभिध्या से शुद्ध करता है। 
🌷(2) व्यापद (=द्रोह)-दोष को छोड़कर, व्यापाद-रहित चित्त-वाला हो, सारे प्राणियों का हितानुकम्पी हो विहरता है; व्यापाद के दोष से चित्त को शुद्ध करता है। 
🌷(3) स्त्यान-मृद्ध (=शारीरिक-मानसिक आलस्य) को छोड़ स्त्यान-मृद्ध-रहित हो, आलोक-संज्ञावाला (=रोशन-ख्याल) हो, स्मृति और संप्रजन्य (=होश) से युक्त हो विहरता है...। 
🌷(4)औद्धत्य-कौकृत्य (=उद्धतपने और हिचकिचाहट) को छोड़, अनुद्धत भीतर से शान्त हो विहरता है। ...
🌷(5) विचिकित्सा (=सन्देह) को छोड़, विचिकित्सा-रहित हो, निस्संकोच भलाइयों में (लग्न) हो विहरता है; विचिकित्सा से चित्त को शुद्ध करता है।

☝वह इन (अभिध्या आदि) पांच नीवरणों को चित्त से हटा, उपक्लेशों (=चित्त-मलों) को जान, उनके दुर्बल करने के लिए, काम (=विषयों) से अलग हो, बुराइयों से अलग हो, विवेक से उत्पन्न एवं वितर्क-विचार-युक्त प्रीति-सुख-वाले *प्रथम ध्यान* को प्राप्त हो विहरता है। और फिर भिक्खुओ! वह वितर्क और विचार के शान्त होने पर, भीतर की प्रसन्नता=चित्त की एकाग्रता को प्राप्तकर, वितर्क-विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति-सुख वाले *द्वितीय ध्यान* को प्राप्त हो विहरता है। और फिर भिक्खुओ! वह प्रीति और विराग से उपेक्षावाला हो, स्मृति और संप्रजन्य से युक्त हो, काया से सुख अनुभव करता विहरता है। जिस (से युक्त) को कि आर्य लोग उपेक्षक, स्मृतिमान् और सुखविहारी कहते हैं, ऐसे *तृतीय ध्यान* को प्राप्त हो विहरता है। और फिर भिक्खुओ! वह सुख और दुख के विनाश से, सौमनस्य (=चित्त-तुष्टि) और दौर्मनस्य (=चित्त की असंतुष्टि) के पूर्व ही अस्त हो जाने से, दुख-सुख-रहित और उपेक्षक हो, स्मृति की शुद्धता से युक्त *चतुर्थ ध्यान* को प्राप्त हो विहरता है।

🌷“वह चक्षु से रूप को देखकर, प्रिय रूप में राग-युक्त नहीं होता; अ-प्रिय रूप में द्वेष-युक्त नहीं होता; विशाल चित्त के साथ कायिक स्मृति को कायम रखकर विहरता है। (वह) उस चित्त के विमुक्ति (=मुक्ति) और प्रज्ञा की विमुक्ति को ठीक से जानता है; जिसमें कि उसकी सारी बुराइयां=अकुशल-धर्म निरुद्ध हो जाते हैं। वह इस प्रकार अनुरोध विरोध से रहित हो, सुखमय, न-सुख-न-दुख-मय-जिस किसी देवता को अनुभव करता है, ...उसका वह अभिनंदन नहीं करता, अभिवादन नहीं करता, (उसमें) अवगाहन कर नहीं स्थित होता। इस प्रकार अभिनंदन न करते, अभिवादन न करते, अवगाहन न करते, जो वेदना-विषयक नन्दी (=तृष्णा) है, वह उसकी निरुद्ध (=नष्ट) हो जाती है। उस नन्दी के निरोध से उपादान (=रागयुक्त ग्रहण) को निरोध, होता है। उपादान के निरोध से भव का निरोध, भव के निरोध से जाति (जन्म) का निरोध, जाति के निरोध से जरा-मरण, शोक, रोने-कांदने, दुख=दौर्मनस्य, हैरानी-परेशानी का निरोध होता है। इस प्रकार इस सारे दुख-स्कंध (=दुख-पुंज) का निरोध होता है। 
🌷श्रोत्र से शब्द सुन कर...। 
🌷घ्राण से गंध सूंघ कर...।
🌷 जिह्वा से रस को चख कर...। 
🌷काया से स्पष्टव्य (स्पर्श वस्तु) को छू कर...।
🌷 मन से धर्म को जानकर प्रिय धर्मों में राग-युक्त नहीं होता, अ-प्रिय धर्मों में द्वेष-युक्त नहीं होता...। 

☝इस प्रकार इस सारे दुख स्कंध का निरोध होता है।

☝🌷भिक्खुओ! मेरे संक्षेप से कहे इस तृष्णा-संक्षय-विमुक्ति (=तृष्णा के विनाश से होने वाली मुक्ति) को धारण करो; केवट्टपुत्त साति भिक्खु को तृष्णा के महाजाल-तृष्णा के महा-संघाट में फंसा (जानो) ।”

🌷भगवा (भगवान) ने वह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्खुओं ने भगवा के भाषण का अभिनन्दन किया।


🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅

🌿🌿अर्थविशेष-

1, मोघ (बनारसी हिन्दी)=फजूल का आदमी।

2. रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान ये पांच।
    खन्ध (स्कंध) हैं। 
- वेदना, संज्ञा, संस्कार रूप के संबंध से विज्ञान
  ही की तीन अवस्थाएं हैं, इस प्रकार वे उसके
  अन्तर्गत हैं। 
- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, ये रूप-स्कंध हैं। 
- जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता
  है, वह विज्ञान-स्कध है। 
- रूप और विज्ञान के मेल से ही सारा संसार
  बना है।

3. चक्षु आदि पांच  इन्द्रियां और छठा मन,
    ये छह आयतन है।

4. रूप चार-भूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) को
    कहते हैं, 
                          और
             नाम विज्ञान को कहते हैं ।

5. गंदब्भ (गंदर्भ) - उत्पन्न होने वाला चेतना
    प्रवाह।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

Wednesday, July 17, 2019

🌷महास्कन्धक🌷

🌷महास्कन्धक🌷


1-बुद्धत्त्व लाभ और बुद्धकी प्रथम यात्रा

उरुवेला
🌹 (1) बोधि-कथा 
उस समय बुद्ध भगवान् उरुवेला में नेरंजरा नदी के तीर बोधि-वृक्ष के नीचे, प्रथम बुद्धपद (अभिसंबोधि)को प्राप्त हुए थे। भगवान् बोधिवृक्ष के नीचे सप्ताह भर एक आसन से मोक्ष का आनंद लेते हुए बैठे रहे । उन्होंने रात के प्रथम याम में प्रतीत्यसमुत्पादका अनुलोम (आदि से अन्त की ओर) और प्रतिलोम (अन्त से आदि की ओर) मनन किया।--“अविद्याके कारण संस्कार होता है, संस्कार के कारण विज्ञान होता है, विज्ञान के कारण नाम-रूप, नाम-रूप के कारण छ आयतन, छ आयतनों के कारण स्पर्श, स्पर्श के कारण वेदना, वेदना के कारण तृष्णा, तृष्णा के कारण उपादान, उपादान के कारण भव, भव के कारण जाति, जाति (जन्म)के कारण जरा (बुढ़ापा), मरण, शोक, रोना पीटना, दुःख, चित्त-विकार और चित्त-खेद उत्पन्न होते हैं । इस तरह इस (संसार)की–जो केवल दुःखों का पुंज है—उत्पत्ति होती है। अविद्या के बिल्कुल विराग से, (अविद्या का) नाश होने से, संस्कार का विनाश होता है। संस्कार-नाश से विज्ञान का नाश होता है। विज्ञान-नाश से नाम-रूप का नाश होता है। नाम-रूप के नाश से छ आयतनों का नाश होता है। छ आयतनों के नाश से स्पर्श का नाश होता है। स्पर्श-नाश से वेदना का नाश होता है। वेदना-नाश से तृष्णा का नाश होता है। तृष्णा-नाश से उपादान का नाश होता है। उपादान-नाश से भव का नाश होता है। भव-नाश से जाति का नाश होता है। जाति नाश से जरा, मरण, शोक, रोना-पीटना, दुःख, चित्त-विकार और चित्त-खेद नाश होते हैं। इस प्रकार इस केवल दुःख-पुञ्ज का नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर, उसी समय यह उदान कहा – 
जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्र (ब्राह्मण) को।
तब शांत हों कांक्षा सभी, 
देखे स-हेतू धर्म को ॥" 

फिर भगवान्ने रातके मध्यम-याम में प्र तीत्य - समुत्पाद को अनुलोम-प्रतिलोम से मनन किया।--“अविद्याके कारण संस्कार होता है० दुःख पुंजका नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा--
"जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्र को।
तब शांत हों कांक्षा सभी ही 
जान कर क्षय-कार्य को ।” 

फिर भगवान्ने रात के अन्तिम-याम में प्रतीत्यसमुत्पाद को अनुलोम-प्रतिलोम करके मनन किया।--"अविद्या केवल दुःख-पुंज का नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा--
“जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्रको। 
ठहरे कॅपाता मार-सेना, 
रवि प्रकाशै गगन ज्यों ॥

 🌹 (2) अजपाल कथा 
सप्ताह बीतने पर भगवान् उस समाधिसे उठकर, बोधि वृक्ष के नीचे से वहाँ गये, जहाँ अजपाल नामक बर्गद का वृक्ष था, वहाँ पहुँचकर अजपाल बर्गद के वृक्ष के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनंद लेते हुए, एक आसन से बैठे रहे। उस समय कोई अभिमानी ब्राह्मण, जहाँ भगवान् थे, वहाँ आया। पास आकर भगवान्के साथ.... (कुशल क्षेम पूछ)....एक ओर खडा होगया। एक ओर खडे हुए उस ब्राह्ममण ने भगबान्से यों कहा-“हे गौतम ! ब्राह्मण कैसे होता है ? ब्राह्मण बनाने वाले कौन से धर्म है ?  भगवान्ने इस अर्थ को जानकर, उसी समय यह उदान कहा—

“जो विप्र बाहित-पाप मल-अभिमान-बिनु संयत रहे । 
वेदांत-पारग; ब्रह्मचारी ब्रह्मवादी धर्म से। 
सम नहिं कोई जिससा जगत् (में) ।"

🌹(3) मुचलिन्द कथा 
फिर सप्ताह बीतने पर भगवान् उस समाधिसे उठ, अजपाल बर्गद के नीचे से वहाँ गये, जहाँ मुचलिंद ( वृक्ष ) था। वहाँ पहुँचकर मुचलिद के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनन्द लेते हुए एक आसन से बैठे रहे। उस समय सप्ताह भर अ-समय महामेघ, (और) ठंडी हवा-वाली बदली पडी । तब मुचलिन्द नाग-राज अपने घर से निकलकर भगवान्के शरीरको सात बार अपने देह से लपेटकर, शिरपर बळा फण तानकर खळा हो गया जिसमें कि भगवान्को शीत, उष्ण, डॅस, मच्छर, वात, धूप तथा रेंगनेवाले जन्तु न छूनें। सप्ताह बाद मुचलि न्द नागराज आकाश को मेघ-रहित देख, भगबान्के शरीरसे (अपने ) देह को हटाकर (और उसे) छिपाकर, बालक का रूप धारणकर भगवान्के सामने खडा हुआ। भगवान्ने इसी अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा—
सन्तुष्ट देखनहार श्रुतधर्मा, सुखी एकान्तमें। 
निर्द्वन्द्व सुख है लोकमें, संयम जो प्राणी मात्रमें ॥ 
सब कामनायें छोडना, वैराग्य है सुख लोक में । 
है परम सुख निश्चय वही, जो साधना अभिमानका ॥

🌹 (4) राजायतन कथा 
सप्ताह बीतनेपर भगवान् फिर उस समाधिसे उठ, मुचलिद के नीचे से वहाँ गये, जहाँ राजायतन (वृक्ष) था। वहाँ पहुँचकर राजायतन के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनन्द लेते हुए एक आसन से वैठे रहे। उस समय तपस्सु और भल्लिक, (दो) बनजारे उकल देश से उस स्थान पर पहुँचे। उनकी जात-बिरादरी के देवताने तपस्सु, भल्लिक बनजारो से कहा-"मार्ष (मित्र) ! बुद्धपद को प्राप्त हो यह भगवान् राजायतन के नीचे विहार कर रहे हैं । जो उन भगवान्को मट्ठे (मन्थ) और लड्डू (मधुपिंड)से सम्मानित करो, यह् (दान) तुम्हारे लिये चिरकाल तक हित और सुखका देनेवाला होगा। तब तपस्सु और भल्लिक बनजारे मट्ठा और लड्डू ले जहा भगवान् थे वहाँ गये। पास जाकर भगवान को अभिवादन कर एक तरफ खड़े हो गये। एक तरफ खड़े हुए तपस्सु और भल्लिक बनजारों ने यह कहा—
“भन्ते ! भगवान् ! हमारे मट्ठे और लड्डुओं को स्वीकार कीजिये, जिससे कि चिरकाल तक हमारा हित और सुख हो।”

उस समय भगवान्ने सोचा-“तथागत (भिक्षा को) हाथ में नहीं ग्रहण किया करते; मैं मट्ठा और लड्डू किस (पात्र) में ग्रहण करूं।" तब चारों महाराजा भगवानु के मन की बात जान, चारों दिशाओं से चार पत्थर के (भिक्षा-) पात्र भगवान्के पास ले गये-"भन्ते ! भगवान् ! इसमें मट्ठा और लड्डू ग्रहण कीजिये ।” भगवान्ने उस अभिनव शिलामय पात्र में मट्ठा और लड्डू ग्रहणकर भोजन किया। उस समय तपस्सु, भल्लिक बनजारों ने भगवान्से कहा--'भन्ते ! हम दोनों भगवान् तथा धर्म की शरण जाते हैं। आजसे भगवान् हम दोनोंको अंजलिबद्ध शरणागत उपासक जानें ।” संसारमें वही दोनों (बुद्ध और धर्म) दो वचनों-से प्रथम उपासक हुए।

🌹 (5) ब्रह्मयाचन कथा 
सप्ताह बीतनेपर भगवान् फिर उस समाधि से उठ, राजायतन के नीचे से जहाँ अजपाल बर्गद था, वहाँ गये। वहाँ अजपाल बर्गद के नीचे भगवान् विहार करने लगे। तब एकान्त में ध्यानावस्थित भगवान्के चित्तमें  वितर्क पैदा हुआ--"मैने गंभीर, दुर्दर्शन, दुर्-ज्ञेय, शांत, उत्तम, तर्क से अप्राप्य, निपुण, पण्डितों द्वारा जानने योग्य, इस धर्म को पा लिया। यह जनता काम-तृष्णा (आलय में) रमण करने वाली काम-रत काम में प्रसन्न है। काम में रमण करनेवाली इस जनता के लिये, यह जो कार्य कारण रूपी प्रतीत्य - समुत्पाद है, वह दुर्दर्शनीय है; और यह भी दुर्दर्शनीय है, जो कि यह सभी संस्कारों का शमन, सभी मन्त्रों का परित्याग, तृष्णाका क्षय, विराग, निरोध (दुख-निरोध), और निर्वाण है। मैं यदि धर्मोपदेश भी करूं और दूसरे उसको न समझ पावें, तो मेरे लिये यह तरदुद्द, और पीड़ा (मात्र) होगी। उसी समय भगवान्को पहिले कभी न सुनी, यह अद्भुत गाथायें सुझ पड़ीं—

यह धर्म पाया कष्टसे, इसका न युक्त प्रकाशना । 
नहिं राग-द्वेष-प्रलिप्त को है सुकर इसका जानना। 
गंभीर उल्टी-धारयुत दुर्दृश्य सूक्ष्म प्रवीणका।
तम-पुंज-छादित रागरतद्वारा न संभव देखना ॥”

{ इस प्रकार (वैशाख पूर्णिमा के दूसरे दिन) प्रतिपद की रात को यह मन में कर (1) बोधि वृक्षके नीचे सप्ताह भर एक आसनसे बैठे।•••तब भगवान्ने आठवे दिन समाधि से उठ•••• (2) (वज्र-) आसन से थोड़ा पूर्वलिये उत्तर दिशा में खड़े हो.••• (वज्र -) आसन और बोधि वृक्षको, बिना पलक गिराये (अनिमेष) नेत्रों से देखते सप्ताह बिताया। वह स्थान अनिमेषं चैत्य नामवाला हुआ। फिर•••• (3) (वज्र-)आसन और खड़े होने (अनिमेष चैत्य) के स्थान के बीच, पूव से पश्चिम लम्बे रत्न-चंक्रम (रत्नमय टहलने के स्थान) पर टहलते सप्ताह बिताया, वह रत्न-चंक्रम चैत्य नामवाला हुआ।•••• (4) उसके पश्चिम दिशा में देवताओं ने रत्नघर बनाया। वहाँ आसन मार बेठ अभिधर्म-पिटक....पर विचार करते सप्ताह बिताया। वह स्थान रत्नघर-चैत्य नामवाला हुआ। इस प्रकार बोधि के पास चार सप्ताह बिता, पाँचवें सप्ताह बोधिवृक्ष से जहाँ•••• (5) अजपाल न्यग्रोध था, (भगवान्) वहाँ गये। उस न्यग्रोध (बर्गद) के नीचे बकरी चरानेवाले (अजपाल) जाकर बैठते थे, इसलिये उसका अजपाल न्यग्रोध नाम हुआ ।... बोधिसे पूर्वदिशा में यह वृक्ष था।•••• (6) मुचलन्द वृक्ष के पास वाली पुष्करिणी में उत्पन्न यह दिव्य शक्तिधारी नागराज था।... महाबोधि के पूर्वकोण मे स्थित (उस) मुचलिन्द वृक्ष से•••• (7) दक्षिण दिशा में स्थित राजायतन वृक्षके पास गए। (--अट्ठकथा) }}

 भगवान्के ऐसा समझने के कारण, (उनका) चित्त धर्मप्रचार की ओर न झुककर अल्प-उत्सुकता की ओर झुक गया। तब सहापति ब्रह्मा ने भगवान्के चित्त की बात को जानकर विचार किया-- लोक नाश हो जायगा रे ! जब तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का चित्त धर्म-प्रचार की ओर न झुक, अल्प उत्सुकता (उदासीनता) की ओर झुक जाये ।”

(ऐसा विचार कर) सहापति ब्रह्मा, जैसे बलवान् पुरुष (बिना परिश्रम) फैली बाँह को समेंट ले, समेटी बाँह को फैला दे, ऐसे ही ब्रह्मलोक से अन्तर्धान हो, भगवान्के सामने प्रकट हुए। फिर सहापति ब्रह्मा ने उपरना (चद्दर) एक कंधे पर करके, दाहिने जानु को पृथिवी पर रख, जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोड़, भगवान से कहा-“भन्ते ! भगवान् धर्मोपदेश करें,सुगत ! धर्मोपदेश करें। अल्पमल वाले प्राणी भी हैं, धर्म के न सुनने से वह नष्ट हो जायेंगे। (उपदेश करें) धर्म को सुनने वाले भी होवेंगे” 
सहापति ब्रह्माने यह कहा, और यह कहकर यह भी कहा—

"मगध में मलिन चित्तवालों से चिन्तित, पहिले अशुद्ध धर्म पैदा हुआ।
(अब संसार ) अमृत के द्वारको खोलने वाले विमल (पुरुष) से जाने गये इस धर्मको सुने । । 
“पथरीले पर्वतके शिखरपर खड़ा (पुरुष) जैसे चारों ओर जनता को देखे। 
उसी तरह हे सुमेध ! हे सर्वत्र नेत्रवाले ! धर्मरूपी महल पर चढ़ सब जनताको  देखो।
"हे शोक-रहित ! शोक-निमग्न जन्मजरा से पीडित जनता की ओर देखो। 
उठो वीर ! हे संग्रामजित् ! हे सार्थवाह ! उऋण-ऋण ! जग में विचरो, धर्मप्रचार करो, भगवान् ! जाननेवाले भी मिलेंगे।" । 

तब भगवान्ने ब्रह्मा के अभिप्राय को जानकर, और प्राणियों पर दया करके, बुद्ध-नेत्र से लोक का अवलोकन किया। बुद्ध-चक्षु से लोक को देखते हुए भगवान्ने जीवों को देखा, उनमें कितने ही अल्पमल, तीक्ष्ण-बुद्धि, सुन्दर-स्वभाव, समझाने में सुगम प्राणियों को भी देखा। उनमें कोई कोई परलोक और दोष से भय करते, विहर रहे थे। जैसे उत्पलिनी, पद्मिनी (पद्मसमुदाय) या पुंडरीकिनी में से कितने ही उत्पल, पद्म या पुंडरीक उदक में पैदा हुए उदक में बँधे उदक से बाहर न निकल (उदक के) भीतर ही डूबकर पोषित होते हैं। कोई कोई उत्पल (नीलकमल), पद्म (रक्तकमल), या पुंडरीक (श्वेतकमल) उदक में उत्पन्न, उदक में बँधे (भी) उदक के बराबर ही खड़े होते हैं। कोई कोई उत्पल, पद्म या पुंडरीक उदक में उत्पन्न, उदकसे  बँधे (भी), उदक से बहुत ऊपर निकलकर, उदक से अलिप्त (हो) खड़े होते हैं । इसी तरह भगवान्ने बुद्ध-चक्षु से लोक को देखा—अल्पमल, तीक्ष्णबुद्धि, सुस्वभाव, सुबोध्य प्राणियों को देखा जो परलोक तथा बुराईसे भय खाते विहर रहे थे। देखकर सहापति ब्रह्मा से गाथाद्वारा कहा—

‘उनके लिये अमृत का द्वार बंद होगया, जो कानवाले होने पर भी, श्रद्धाको छोड़ देते हैं। 'हे ब्रह्मा ! (वृथा) पीड़ा का विचार कर मैं मनुष्यों को निपुण, उत्तम, धर्म को नहीं कहता था।'

🌹 (6) धर्म चक्र प्रवर्तन 
तब ब्रह्मा सहापति--‘भगवान्ने धर्मोपदेश के लिये मेरी बात मानली' यह जान, भगवान को, अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर वहीं अन्तर्धान हो गये।
उस समय भगवान्के (मनमें) हुआ--"मैं पहिले किसे इस धर्मकी देशना (उपदेश) करू इस धर्मको शीघ्र कौन जानेगा ?" फिर भगवान्के (मनमें ) हुआ—“यह आलार-कालाम पण्डित, चतुर मेधावी चिरकाल से निर्मल-चित्त है, मैं पहिले क्यों न आलार-कालाम को ही धर्मोपदेश दें ? वह इस धर्मको शीघ्र ही जान लेगा।” तब (गुप्त) देवता ने भगवान्से कहा-“भन्ते ! आलार-कालाम को मरे एक सप्ताह हो गया। भगवान्को भी ज्ञान-दर्शन हुआ--"आलार-कालाम को मरे एक सप्ताह हो गया। तब भगवान्के (मनमें) हुआ--"आलार-कालाम महा-आजानीय था, यदि वह इस धर्म को सुनता, शीघ्र ही जान लेता।" 

फिर भगवान्के (मनमें) हुआ--"यह उद्दकरामपुत पण्डित, चतुर, मेधावी, चिरकाल से निर्मल चित्त है, क्यों न मैं पहिले उद्दक-रामपुत्त को ही धर्मोपदेश करू ? वह इस धर्म को शीघ्र ही जान लेगी।' तब (अन्तर्धान) देवता ने आकर कहा--"भन्ते ! रात ही उद्दकरामपुत्त मर गया। भगवान्को भी ज्ञान-दर्शन हुआ।.... उद्दकरामपुत्त महा-आजानीय था, यदि वह इस धर्म को सुनता, शीघ्र ही जान लेता।" 

फिर भगवान्के (मन में) हुआ--"पञ्च-वर्गीय भिक्षु मेरे बहुत काम करने वाले थे, उन्होंने साधना में लगे मेरी सेवा की थी। क्यों न मैं पहिले पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को ही धर्मोपदेश दूँ।" भगवान्ने सोचा--"इस समय पञ्चवर्गीय भिक्षु कहाँ विहर रहे हैं ?" भगवान्ने अ-मानुष विशुद्ध दिव्य नेत्रों से देखा--"पञ्चवर्गीय भिक्षु वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहारकर रहे हैं।"

तब भगवान् उरुबेला में इच्छानुसार विहारकर, जिधर वाराणसी है, उधर चारिका (रामत) के लिये निकल पड़े। उपक आजीवक 'ने भगवान् को बोधि (बोध गया) और गया के बीच में जाते देखा । देखकर भगवान्से बोला--"आयुष्मान् (आवुस) ! तेरी इन्द्रियाँ प्रसन्न हैं, तेरी कांति परिशुद्ध तथा उज्वल है। किसको (गुरु) मानकर, हे आबुस ! तू प्रब्रजित हुआ है ? तेरा गुरु कौन है ? तू किसके धर्म को मानता है ?"
यह कहने पर भगवान्ने उपक आजीवकसे गाथा में कहा—
मैं सबको पराजित करनेवाला, सबको जाननेवाला हूँ। 
सभी धर्मों में निलेप हूँ। सर्व-त्यागी (हूँ), तृष्णाके क्षय से मुक्त हूँ। 
मैं अपने ही जानकर उपदेश करूंगा।
मेरा आचार्य नहीं है मेरे सदृश (कोई) विद्यमान नहीं । 
देवताओं सहित (सारे) लोक में मेरे समान पुरुष नहीं । 
मैं संसार में अर्हत् हूँ, अपूर्व उपदेशक हूँ । 
मैं एक सम्यक् संबुद्ध, शान्ति तथा निर्वाण को प्राप्त हूँ । 
धर्म का चक्का घुमाने के लिये काशियों के नगर को जा रहा हूँ।
(वहाँ) अन्धे हुए लोक में अमृत-दुन्दुभी बजाऊँगा ।” 
आयुष्मान् ! तू जैसा दावा करता है उससे तो अनन्त जिन हो सकता है।" 
मेरे ऐसे ही आदमी जिन होते हैं, जिनके कि चित्तमल (आस्रव) नष्ट हो गये हैं। 
मैने बुराइयोंको जीत लिया है, इसलिये हे उपक ! मैं जिन हूँ ।” 
ऐसा कहने पर उपक आजीवक—“होवोगे आवुस !" कह, शिर हिला, बेरास्ते चला गया।

🌹-वाराणसी 
तब भगवान् क्रमशः यात्रा करते हुए, जहाँ वाराणसी में ऋषि-पतन मृगदाव था, जहाँ पञ्चवर्गीय भिक्षु थे, वहाँ पहुँचे। पञ्चवर्गीय भिक्षुओंने भगवान्को, दूर से आते हुए देखा। देखते ही आपस में पक्का किया
“आवुसो ! साधना-भ्रष्ट जोडू बटोरू श्रमण गौतम आ रहा है। इसे अभिवादन नहीं करना चाहिये और न प्रत्युत्थान (सत्कारार्थ खडा होना) करना चाहिये। न इसका पात्र-चीवर (आगे बढ़कर) लेना चाहिये । केवल आसन रख देना चाहिये, यदि इच्छा होगी तो बैठेगा।"

जैसे जैसे भगवान् पञ्चवर्गीय भिक्षुओं के समीप आते गये, वैसे ही वैसे वह.... अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रह सके। (अन्त में) भगवान्के पास जाने पर एकने भगवान्का पात्र-चीवर लिया, एकने आसन बिछाया; एकने पादोदक (पैर धोने का जल), पादपीठ (पैर का पीढ़ा) और पादकठलिका (पैर रगडनेकी लकडी) ला पास रक्खी। भगवान् बिछाये आसनपर बैठे। बैठकर भगवान्ने पैर धोये। उस समय वह लोग भगवान्के लिये ‘आवुस' शब्दको प्रयोग करते थे। ऐसा करने पर भगवान्ने कहा—
भिक्षुओ ! तथागत को नाम लेकर या ‘आवुस' कहकर मत पुकारो। भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध हैं। इधर कान दो, मैंने जिस अमृतको पाया है, उसका तुम्हें उपदेश करता हूँ । उपदेशानुसार आचरण करने पर, जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो सन्यासी होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में शीघ्र ही स्वयं जानकर, साक्षात्कारकर, लाभकर विचरोगे।" । 
“ऐसा कहने पर पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्से कहा--‘आवुस ! गौतम ! उस साधना में, उस धारणा में और उस दुष्कर तपस्या में भी तुम आर्यों के ज्ञानदर्शन की पराकाष्ठा की विशेषता, उत्तरमनुष्य-धर्म (दिव्य शक्ति) को नहीं पा सके; फिर अब साधनाभ्रष्ट, जोडू-बटोरू हो तुम आर्य-ज्ञान-दर्शन की पराकाष्ठा, उत्तर-मनुष्य-धर्म को क्या पाओगे।'' 

यह कहने पर भगवान्ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा--"भिक्षुओ ! तथागत जोडू-बटोरू नहीं हैं, और न साधना से भ्रष्ट हैं, । भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध हैं ०।०.... लाभकर विहार करोगे।
दूसरी बार भी पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्से कहा-“आवुस ! गौतम ०" दूसरी बार भी भगवान्ने फिर (वही) कहा० । 
तीसरी बार भी पञ्चवर्गीय भिक्षुओंने भगवान्से (वही) कहा ०। ऐसा कहने पर भगवान्ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा-“भिक्षुओ ! इससे पहले भी क्या मैंने कभी इस प्रकार बात की है ?"
भन्ते ! नहीं 
“भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध हैं,…  मैंने जिस अमृतको पाया है, उसका तुम्हें उपदेश करता हूँ । उपदेशानुसार आचरण करने पर, जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो सन्यासी होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में शीघ्र ही स्वयं जानकर, साक्षात्कारकर, लाभकर विचरोगे।"

तब भगवान् पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में समर्थ हुए; और पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्के (उपदेश) सुनने की इच्छासे कान दिया, चित्त उधर किया।.....
“भिक्षुओ ! साधुको यह दो अतियां सेवन नहीं करनी चाहिये। कौनसी दो ? 
(1) जो यह हीन, ग्राम्य, अनाडी मनुष्यों के (योग्य), अनार्य (-सेवित), अनर्थो से युक्त, कामवासनाओं में लिप्त होना है; और 
(2) जो दुःख (-मय), अनार्य (-सेवित) अनर्थो से युक्त आत्म-पीडा में लगना है। भिक्षुओ ! इन दोनों ही अतियों में न जाकर, तथागत ने मध्यम-मार्ग खोज निकाला है, (जोकि) सब नाशवान् है, यह विरज, विमल धर्मचक्षु उत्पन्न हुआ। 

इस उपदेश के कहे जाने के समय आयुष्मान् कौण्डिन्य को--"जो कुछ उत्पन्न होनेवाला है वह सब नाशवान् है’--यह विरज, निर्मल धर्म का नेत्र उत्पन्न हुआ।
इस प्रकार भगवान्के धर्म के चक्के के घुमाने (धर्म-चक्र के प्रवर्तन करने) पर भूमि के देवताओंने शब्द किया-“भगवान्ने यह वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में उस अनुपम धर्म के चक्के को घुमाया जोकि किसी भी साधु, ब्राह्मण, देवता, मार, ब्रह्मा या संसार के किसी व्यक्ति से रोका नहीं जा सकता।' भूमि के देवताओं के शब्द को सुनकर चतुमहाराजिक देवताओं ने शब्द सुनाया..... चतुमहाराजिक देवताओं के शब्द को सुनकर त्रयस्त्रिंश देवताओं ने.... याम देवताओं ने.... तुषित देवताओं ने.... निमाणरति देवताओं ने.... वशवर्ती देवताओं ने....  ब्रह्म कायिक देवताओं ने.... । इस प्रकार उसी क्षणमें, उसी मुहूर्त में यह शब्द ब्रह्मलोक तक पहुँच गया और यह दस हजारों वाला ब्रह्मांड कंपित, सम्प्रकंपित, संवेपित हुआ । देवताओं के तेज से भी बढ़कर बहुत भारी, विशाल प्रकाश लोक में उत्पन्न हुआ।

तब भगवान्ने उदान कहा-“ओहो ! कौंडिन्य ने जान लिया (आञ्ञा) । ओहो ! कौंडिन्य ने जान लिया।" इसीलिये आयुष्मान् कौंडिन्य का आञ्ञा कौंडिन्य नाम पडा।

** उस समयके नंगे साधुओका एक सम्प्रदाय था। मक्खली
1 वर्तमान सारनाथ, बनारस। गोसाल इनका एक प्रधान आचार्य था।
2 आञ्ञा— ज्ञानी 

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