हरिपुर (पाकिस्तान)। पाकिस्तान में खुदाई के दौरान गौतम बुद्ध की सबसे बड़ी प्रतिमा मिली है। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित भामला में खुदाई के दौरान गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण को दिखाती उनकी सबसे बड़ी प्रतिमा मिली है। इसके साथ ही यहां एक ऐसी प्रतिमा भी मिली है, जिसमें भगवान बुद्ध के दो आभामंडल दर्शाए गए हैं। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के महानिदेशक डॉ अब्दुल समद ने पत्रकारों को बताया कि पुरातत्व वेत्ताओं को खुदाई के दौरान ये दो दुर्लभ मूर्तियां मिली हैं।
महापरिनिर्वाण को दर्शाती भगवान बुद्ध की प्रतिमा 14 मीटर लंबी है और यह 15 मीटर लंबे एक बड़े प्लेटफार्म पर स्थापित है। प्रतिमा का दायां पैर और बाएं पैर का कुछ हिस्सा, तलवे और कंधे हैं। पैर धोती से ढका हुआ है। उन्होंने बताया कि गांधार क्षेत्र में पहली बार ऐसी प्रतिमा मिली है। यह खोज यूनेस्को के भामला स्थित विश्व वरासत स्थल पर की गयी खुदाई के दौरान हुई है।
साभार : http://m.bhaskar.com/news/INT-PAK-statue-depicting-death-scene-of-buddha-discovered-in-pakistan-4932918-NOR.html
Friday, April 29, 2016
पाकिस्तान: महापरिनिर्वाण को दिखाती गौतम बुद्ध की सबसे बड़ी प्रतिमा मिली
Friday, March 18, 2016
रूकमिनी टीले की खुदाई में मिली भगवान बुद्ध की मूर्तियां
बिहारशरीफ/सिलाव : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्खनन शाखा द्वारा नालंदा के रूकमिनी स्थान में की जा रही खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध की दो मूर्तियां एवं अन्य सामग्री मिली हैं.
खुदाई से निकली भगवान बुद्ध की तीन-तीन फुट की दो मूर्तियां हैं. इसके अलावा कई चैत स्तूप, कमरे, मिट्टी के बरतन के टुकड़े भी मिले हैं. यह स्थल प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ माना जाता है।
खुदाई में भगवान बुद्ध की मूर्तियों के साथ ही दो चैत स्तूप, करीब एक दर्जन कमरे, गलियारा के अलावा मिट्टी के वर्तन के जले हुए टुकड़े आदि मिले हैं. रूकमिनी स्थान टीले का इतिहास 450 ई. पूर्व कुमार गुप्त, हर्ष वर्धन एवं पाल वंश के शासकों से जुड़ा हुआ माना जाता है. उसी समय प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ था.
रूकमिनी स्थान टीले की खुदाई दूसरी बार करायी जा रही है. खुदाई कार्य का सर्वेक्षण करने के लिए शनिवार को केंद्रीय पुरातत्व विभाग के निदेशक सुनंदा श्रीवास्तव रूकमिनी स्थान पहुंचे।
साभार : प्रभात खबर
Tuesday, February 16, 2016
सबसे बहुमूल्य भेंट
कई दिनों के विहार के बाद भगवान बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह से प्रस्थान करने वाले थे। लोगों को पता चला, तो वे उनके लिए भेंट आदि लेकर उनके दर्शन के लिए आने लगे। अपने शिष्यों के साथ बैठे बुद्ध लोगों की भेंट स्वीकार कर रहे थे।
सम्राट बिंबिसार ने उन्हें भूमि, खाद्य, वस्त्र, वाहन आदि दिए। नगर सेठों ने भी उन्हें प्रचुर धन-धान्य और सुवर्ण आभूषण भेंट किए। उस दान को स्वीकार करते हुए बुद्ध अपना दायां हाथ उठाकर इशारा कर देते थे।
भीड़ में एक वृद्धा भी थी। वह बुद्ध से बोली, भगवन, मैं बहुत निर्धन हूं। मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। आज मुझे पेड़ से गिरा यह आम मिला। मैं उसे खा रही थी कि तभी आपके प्रस्थान का समाचार सुना। तब तक मैंने आधा आम खा लिया था। मेरे पास इस आधे आम के सिवा कुछ भी नहीं है। क्या आप मेरी भेंट स्वीकार करेंगे?
वहां उपस्थित अपार जनसमुदाय और सेठों ने देखा कि भगवान बुद्ध अपने आसन से उठकर नीचे आए और उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर वृद्धा का आधा आम स्वीकार किया। सम्राट बिंबिसार ने चकित होकर बुद्ध से पूछा, भगवन, एक से बढ़कर एक अनुपम और बहुमूल्य उपहार तो आपने केवल हाथ हिलाकर ही स्वीकार कर लिए, लेकिन इस वृद्धा के जूठे आम को लेने के लिए आप आसन से नीचे उतरकर आ गए! इसमें ऐसी क्या विशेषता है?
बुद्ध मुस्कराए और बोले, इस वृद्धा के पास जो भी था, वह सब उसने दे दिया। आप लोगों ने जो कुछ भी दिया है, वह तो आपकी अकूत संपत्ति का ही अंश है। उसे देने पर दाता का अहंकार भी पाल लिया। इस वृद्धा ने तो प्रेम और श्रद्धा से सर्वस्व अर्पित कर दिया। फिर भी उसके मुख पर कितनी नम्रता और करुणा है।
Friday, February 12, 2016
निर्धन कौन ?
एक गरीब आदमी ने भगवान् बुद्ध से पूछा :- "मैं इतना गरीब क्यों हूँ.?",
बुद्ध ने कहा :- "तुम गरीब हो, क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा.!"
गरीब आदमी ने कहा :-
"परन्तु मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है.!"
बुद्ध ने कहा :- "तुम्हारा चेहरा, दूसरों को एक मुस्कान दे सकता है। तुम्हारा मुँह, किसी की प्रशंसा कर सकता है या दूसरों को सुकून पहुंचाने के लिए दो मीठे बोल बोल सकता है। तुम्हारे हाथ, किसी ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते हैं......
और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं.?"
"मन की गरीबी ही वास्तविक गरीबी है। पाने का हक उसी को है.......जो देना जानता है ......... !!"
Friday, February 5, 2016
बुद्ध का पड़ाव देख भावुक हुए विदेशी भिक्षु
सिवान। सिवान के प्राचीन इतिहास में दर्ज बातें बौद्ध ग्रंथ व चीनी तीर्थ यात्रियों द्वारा वर्णित लेख तथा पुरातात्विक साक्ष्य व अवशेषों के आधार पर सिवान बौद्ध स्थल का बहुत बड़ा हब रहा है। विगत वर्ष पपउर में पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन व तितर स्तूप के पास बौद्धकालीन मृदुभाण्ड व खंडित बुद्ध मूर्ति मिलना चर्चा का विषय बना हुआ है तथा अब विदेशी बौद्धों को भी आकर्षित कर रहा है। इसी क्रम में दो दिवसीय प्रवास पर आए विदेशी बौद्धों ने सोमवार की सुबह जीरादेई प्रखंड के तितरा गांव में स्थित तितर स्तूप व अन्य स्तूपों को दर्शन कर आस्था से ओतप्रोत होकर भावुक हो गए। वहां के मिट्टी भी अपने साथ ले गए। पपउर व विजयीपुर गांव में भारतीय संस्कृति के अनुसार विदेशी मेहमानों का भव्य स्वागत किया गया। तितर स्तूप व मुकुट बंधन मुईयागढ़ के पास प्रचुर मात्रा में बौद्धकालीन मृदभाण्ड व मिट्टी के बुद्ध मूर्ति को देखकर विदेशी बौद्ध काफी उत्सुक हुए तथा सिवान ही प्राचीन कुशीनारा विषय पर शोध कर रहे शोधार्थी कृष्ण कुमार सिंह से काफी चर्चा किए। शोधार्थी ने दर्जनों पुस्तकों पुरातत्ववेदाओं का लेख का रीफ्रेंस बौद्धकालीन पुरातात्विक अवशेष को दिखाकर विदेशी पर्यटकों को संतुष्ट किया। वियतनाम से आयी माता बोधी चिंता ने कहा कि वाकई यह शोध का विषय है। श्रीमती माता ने बताया कि बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन व यहां प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों से सिवान में प्राचीन कुशीनारा होने की प्रबल संभावना है। गया महाबोधी मंदिर के मुख्य भन्ते अशोक भन्ते ने कहा कि सिवान में पपउर (पावा), ककुत्या (दाहानदी), हिरण्यवती (सोना नदी), शालवन का प्रतीक तितरा बंगरा वागवान का अपभ्रंश बंगरा व अन्य गांव क्रमश: महुआबारी, गुलरबग्गा, मालक नगर (मालक-वन), सिसहानी, सेलरापुर, पिपरहियां आदि सब गांव शालवान (वन) का ही सूचक है। तितरा गांव स्थित तितरा स्तूप, हिरणस्तूप (हिरणौली टोला), व्रजपाणी स्तूप (वाणीगढ़), मुकुट बंधन (मुईयागढ़) आदिर दर्जनों साक्ष्य यहां तीन विशाल स्तूप जो आज भी 30 से 40 फीट ऊंचा तथा इसके गर्भ में बौद्धकालीन अवशेषों का भंडार होना निश्चित ही शोध का विषय है।
साभार : दैनिक जागरण 11 जनवरी 2016
Monday, January 25, 2016
स्थितप्रज्ञाता
।। स्थितप्रज्ञाता ।।
जीवन को हम किस दृष्टिकोण से देखते है यह "प्रज्ञा" पर निर्भर होता है।
क्या होती है "प्रज्ञा"? किसको कहते है "स्थितप्रज्ञ " होना?
अपने भीतर की क्षण-प्रतिक्षण की सच्चाई "अनित्य-बोध" हर अवस्था में जानते हुए "ज्ञान" में स्थित रहना ही "स्थितप्रज्ञता" कहलाती है।
गीता श्लोक : " उत्क्रमन्तं स्थितंवापि भुंजङ्ग वा गुणान्विता, गुणान्विता, विमूढा नानु पश्यंती, पश्यंती ज्ञानचक्षुस।
(गीता में यह जो, पश्यन्ती, पश्यति, विपश्यति, विचक्षति आदि शब्द है वह विपश्यना से देखने के बारें में है, केवल बौद्धिक पाठ-पठन से ज्ञान नही होता)
केवल पाठ करने से, चिंतन-मनन करने से कोई स्थितप्रज्ञ नही होता। मन-मानस के और शारीर के परस्पर संपर्क से होनेवाले प्रपंच को"द्रष्टाभाव " से "साक्षीभाव" से देखने को, उसके गुणोंको जानने से व्यक्ति "प्रज्ञावान" होता है। ज्ञानचक्षु से यह देखने से, विपश्यना ठीक से होती है। और यह अनुभूति हर अवस्था में कायम रहे, इसे " स्थितप्रज्ञ" कहते है।
इसके लिए काम करना होता है। मेहनत करने से, पुरुषार्थ करने से होता है। जो प्रज्ञा में स्थित है वह स्थितप्रज्ञ है।
अपने भीतर की " सच्चाई" को एक वैज्ञानिक की तरह अनुभूति के स्तर पर निरंतर जानते रहना ही
"स्थितप्रज्ञता" है।
जो भीतर सच्चाई है वही बाहर सच्चाई है। भीतर का जो प्रपंच है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। शरीर के सारे हिस्से में प्रतिक्रियाविहीन, द्रष्टाभाव से निरीक्षण करते हुये, "राग-द्वेष" की प्रतिक्रिया न करते हुए स्थितप्रज्ञ रहने का काम होगा तो कल्याण ही कल्याण है।
मन के विकारों से नितांत मुक्त होना ही सही मुक्ति है।
मन-मानस की जड़ों तक जाकर के उसकी शुद्धि करना ही उत्तम मंगल है।जड़ों से स्वाभाव को पलटते रहे। अपने भीतर सच्चाई के अनेक पट होते है। वह पट, अवगुंठन एक एक करके समाप्त होते है।विकारों से मुक्ति पाने के लिए परिश्रम, पुरुषार्थ करना होता है। कोई देवी-देवता आशीर्वाद देके, कृपा करके हमें मुक्त नही कर सकते। स्वयं प्रयास करने से होता है।
अज्ञान के, अविज्ञा के अंधकार से ,भीतर की प्रज्ञा जगाते हुए, प्रकाश की और जाना ही सही दीपावली पर्व मनाना कहलाता है। बाकी बातें प्रतीकात्मक ही है।
कहे कबीर, हरी ऐसा रे, जब जैसा तब तैसा रे....
घुंगट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे....
इस क्षण की जो भी सच्चाई है, जैसी भी सच्चाई है, हम अनुभव करते रहते है उसे उसी प्रकारसे जानते रहना है, ऐसे करते करते तो हमें अवश्य अंतिम सच्चाई के दर्शन से, अंतिम सत्य प्राप्त होता है। जीसे की संत कबीर "हरी" के नाम से पुकारते है।
अपने पुरुषार्थ से असीम पराक्रम से सिद्धार्थ-गौतम जब बोधि प्राप्त होकर "सम्यक-सम्बुद्ध" बने तो
बुद्ध के पहले उदान वाक्य थे,
" पुब्बे अनंसुत्तेसु धम्मेसु, चक्खूं उत्पादि, ज्ञानं उत्पादि, पञ्ञ उत्पादि, विज्ञा उत्पादि,आलोको उत्पादि".....
अर्थात, (मेरे इस पुरुषार्थ से) पहले कभी सुना नहीं, देखा नही ऐसा धर्म (धम्म)( "सत्य"), उतप्न हुआ। ज्ञानचक्षु खुल गये, ज्ञान की उत्पत्ति हुई, प्रज्ञा प्राप्त हुई, विज्ञा प्राप्त हुई, आलोक उत्प्नन हुआ माने भीतर ज्ञान का प्रकाश उत्प्नन हुआ।
अपने उपास्य देवी-देवताओं के गुणों का अनुसरण करना ही सही धर्म है। दान-धर्म का अनुसरण करना ही लक्ष्मी देवी की सही पूजा है। (धन का संग्रह करना नही)। हमें जो भी मिलता है, उसका एक हिस्सा समविभाग करके दान देना चाहिए। जिस समाज से आता है उसे वापस करना चाहिए। यही सही लक्ष्मीपूजन कहलाता है।
विद्याभ्यास के साथ साथ पूण्य पारमिता अर्जित करना आवश्यक है। बोधि के अंग विकसित हो इसलिए पारमिता की पूर्ति होना आवश्यक होता है। यही (आर्य अष्टांगिक मार्ग) सद्धर्म है।
(प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था दान-धर्म की परंपरा से समृद्ध होती थी न की Tax कर प्रणाली से। इससे समाज में गरीबी नही रहती। समाज सशक्त रहता है।
दान-धर्म बलवान हो।)
भवतु सब्ब मङ्गलं !
साभार
Friday, January 1, 2016
चेतनाकरणीयसुत
--------|| चेतनाकरणीयसुत ||-----------------
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भिक्षुओ, जो शील-सम्पन्न हैं, सदाचारी है उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे पश्चाताप न हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जो शील-सम्पन्न है, जो सदाचारी है उसे पश्चाताप न हो l
भिक्षुओ जिसे पश्चाताप नहीं होता, उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे प्रमुद्ता हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जिसे पश्चाताप न हो उसे प्रमुद्ता हो l
भिक्षुओ, जिसे प्रमुद्ता हो उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे प्रीति उत्पन्न हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जिसे प्रमुद्ता हो उसे प्रीति उत्पन्न हो l
भिक्षुओ, जिसे प्रीति उत्पन्न हो उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे प्रश्रब्धि उत्पन्न हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जिसे प्रीति प्राप्त हो उसे प्रश्रब्धि उत्पन्न हो l
भिक्षुओ, जिसे प्रश्रब्धि प्राप्त हो उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे सुख प्राप्त हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जिसे प्रश्रब्धि प्राप्त हो उसे सुख उत्पन्न हो l
भिक्षुओ, जिसे सुख प्राप्त हो उसे यह इच्छा करने के आवश्यकता नहीं होती कि मुझे समाधी प्राप्त हो l भिक्षुओ यह स्वाभाविक धर्म है कि जिसे सुख प्राप्त हो उसे समाधी प्राप्त हो l
साभार :
Thursday, October 29, 2015
कोकालिये सुत्त - Kokalika Sutta
***~~~~~*** कोकालिये सुत्त ***~~~~~***

[ सारिपुत्र तथा मोग्ग्लान के प्रति चित दूषित करने के कारण कोकालिये भिक्षु दुर्गति को प्राप्त होता हैं| इसलिए सन्तो की निन्दा करना महापाप होता हैं | निन्दनीय की प्रशंसा करना और प्रशंसनीय की निन्दा करना दोनों एक प्रकार के दोष है | ]
ऐसा मैंने सुना :-
एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडक के बनाये जेतवनराम में विहार करते थे | तब कोकालिये भिक्षु भगवान के पास गया, जाकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया | एक और बैठे हुए कोकालिये भिक्षु ने भगवान से यह कहा “भन्ते ! सारिपुत्र और मोग्ग्लान पापेच्हुक हैं, पापी इच्छाओं के वशीभूत है |” ऐसा कहने पर भगवान कोकालिये भिक्षु से यह बोले “कोकालिये ! ऐसा न कहो, कोकालिये ! ऐसा न कहो | कोकालिये ! सारिपुत्र और मोग्ग्लान प्रियेशील हैं |”
दूसरी बार भी कोकालिये भिक्षु ने भगवान से यह कहा “भन्ते ! यद्दपि मैं भगवान में श्रद्धा रखता हूँ और प्रसन्न हूँ ; फिर भी सारिपुत्र और मोग्ग्लान पापेच्हुक हैं, पापी इच्छाओं के वशीभूत है |” दूसरी बार भी भगवान कोकालिये भिक्षु से यह बोले “कोकालिये ! ऐसा न कहो, कोकालिये ! ऐसा न कहो | कोकालिये ! सारिपुत्र और मोग्ग्लान के प्रति श्रद्धा रखो, सारिपुत्र और मोग्ग्लान प्रियेशील हैं |”
तीसरी बार भी कोकालिये भिक्षु ने भगवान से यह कहा “भन्ते ! यद्दपि मैं भगवान में श्रद्धा रखता हूँ और प्रसन्न हूँ ; फिर भी सारिपुत्र और मोग्ग्लान पापेच्हुक हैं, पापी इच्छाओं के वशीभूत है |” तीसरी बार भी भगवान कोकालिये भिक्षु से यह बोले “कोकालिये ! ऐसा न कहो, कोकालिये ! ऐसा न कहो | कोकालिये ! सारिपुत्र और मोग्ग्लान के प्रति श्रद्धा रखो, सारिपुत्र और मोग्ग्लान प्रियेशील हैं |”
तब कोकालिये भिक्षु आसन से उठकर भगवान को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चला गया | वहा से चले जाने के कुछ ही समय बाद कोकालिये भिक्षु का सारा शरीर सरसों जैसी फुंसियो से भर गया, सरसों जैसी फुंसियो से मूंग जैसी हुई, मूंग से चने जितनी हुई, चने से बेर के बिये जितनी हुई, बेर के बिये से बेर फल जितनी हुई, बेर के फल से आंवले जितनी हुई, आंवले से छोटे बेल जितनी हुई, और फिर बड़े बेल जितनी हो कर फूट गई और पीब तथा लहू बहने लगे | तब कोकालिये भिक्षु उसी रोग से चल बसा | सारिपुत्र और मोग्ग्लान के प्रति चित दूषित कर कोकालिये भिक्षु पदुम नरक में उत्पन्न हुआ |
तब सहम्म्पति ब्रह्मा उस रात्रि के बीतने पर अपनी कान्ति से सारे जेतवन को आलोकित कर भगवान के पास गया, पास जा भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया, एक ओर खड़े हो सहम्म्पति ब्रह्मा ने भगवान से यह कहा “भन्ते ! कोकालिये भिक्षु का देहान्त हो गया हैं; सारिपुत्र और मोग्ग्लान के प्रति चित दूषित कर कोकालिये भिक्षु पदुम नरक में उत्पन्न हुआ हैं |” सहम्म्पति ब्रह्मा ने यह कहा | यह कह कर सहम्म्पति ब्रह्मा भगवान को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर वही अन्तध्यार्न हो गया |
उस रात्रि के बीतने पर भगवान ने भिक्षुओ को सम्बोधित किया “ भिक्षुओ ! ब्रह्मा सहम्म्पति ......ने .....यह कहकर मुझे अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर वही अन्तध्यार्न हो गया |”
ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान से पूछा “ भन्ते ! पदुम नरक की आयु कितनी लम्बी है ?”
“ भिक्षु ! पदुम नरक की आयु बड़ी लम्बी है | वह इतने वर्ष है, इतने सहस्त्र वर्ष है, इतने लाख वर्ष है करके गिनना आसन नहीं है |”
“ भन्ते ! क्या कोई उपमा दे सकते हैं ?”
“ हाँ भिक्षु ! उपमा दी जा सकती है | भिक्षु ! मान लो कि बीस खारी (उस समय का एक माप ) तिल अटनेवाली कौशल की जो गाड़ी है, एक पुरष एक हज़ार वर्ष के बीतने पर उसमे से एक तिल निकाल दे, इस क्रम से कालान्तर में बीस खारी तिल भरी वह गाड़ी खाली हो जाएगी, समाप्त हो जाएगी ; लेकिन अब्बुद नरक के एक जीवन काल की आयु नहीं | भिक्षु ! अब्बुद नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं निरब्बुद नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! निरब्बुद नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं अबब नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! अबब नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं अहह नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! अहह नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं अटट नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! अटट नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं कुमुद नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! कुमुद नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं सोगन्धिक नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! सौगन्धिक नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं उप्पल का एक जीवनकाल | भिक्षु ! उप्पल नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं पुण्डरीक नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! पुण्डरीक नरक के बीस जीवनों की आयु के बराबर हैं पदुम नरक का एक जीवनकाल | भिक्षु ! सारिपुत्र और मोग्ग्लान के विषय में चित दूषित कर कोकालिये भिक्षु पदुम नरक में उत्पन्न हुआ है |” ऐसा कह भगवान ने आगे यह कहा :-
“(इस संसार में ) जन्मनेवाले पुरुष के मुख में कुठारी उत्पन्न होती है | कटु भाषणभाषी मुर्ख उससे अपने को नाश कर देता है ||1||
जो निन्दनीय की प्रशंसा करता है और प्रशंसनीय की निन्दा करता है वह मुख से पाप करता है, और उस पाप के कारण सुख को प्राप्त नहीं होता ||2||
जुए में अपने को और अपने सर्वस्व को जो खोना हैं, वह थोड़ी हानि हैं | इसकी अपेक्षा सन्तो के प्रति जो मन को दूषित करना हैं, वह बहुत बड़ी हानि हैं ||3||
आर्ये (सन्त) पुरुष की निन्दा करने वाला अपने मन और वचन को पाप में लगा कर उस नरक में उत्पन्न होता है जहाँ की आयु एक लाख निरब्बुद और इकतालीस अब्बुद है ||4||
“ असत्येवादी नरक को जाता है, और जो कोई काम कर के कहता हैं की मैंने ऐसा नहीं किया वह भी , हीन कर्म करनेवाले वे दोनों मनुष्य परलोक में समान होते है ” ||5||
“ जो दोष रहित, निर्मल, शुद्ध पुरुष को दोष लगाता है, उसका पाप उलटी हवा में फैकी सूक्ष्म धूल की तरह उसी मुर्ख पर पड़ता है ||6||
“ जो श्रद्धा रहित है, दुसरो को दान देना सह नहीं सकता, जो किसी की बात नहीं सुनता, कंजूस है, चुगलखोरी में लगा है और लोभ में पड़ा है, वह वचन से दुसरो को निन्दा करता है ||7||
“ दुर्वच, झूठे, अनार्य, मनहूस, पापी, बुरे कर्मवाले, दोषी, अधम और नीच (तुम) बहुत मत बोलो, तुम नरकगामी हो ||8||
“ पापकारी (तुम) सन्तो की निन्दा करके अपने अहित का कर्म करते हो | अनेक बुराइया करके बहुत समय के लिए गड्ढे में गिरोगे ||9||
“ किसी का कर्म नष्ट नहीं होता | कर्ता उसे प्राप्त करता ही है | पापकारी मुर्ख अपने को परलोक में दुःख में पड़ा पाता है ||10||
“ वह लोहे के काँटों और तीक्ष्ण धारवाली लोहे की बर्छियो से सताये जाने वाले नरक में गिरता है | वहाँ तपे लोहे के गोले के समान उसके अनुरूप भोजन है ||11||
“ नरकपाल उनसे मीठी बाते नहीं करते | वे प्रसन्न मुख से रक्षार्थ उनके पास नहीं आते | वे बिछे हुऐ अंगार पर सोते है, भभकती हुई आग में प्रवेश करते है ||12||
“ नरकपाल जाल से बंद करके लोहे के हथोड़ो से उनको कूटते है | वे घोर अन्धकार में पड़ते है जो विस्तृत पृथ्वी की तरह फैला है ||13||
“ तब वे आग के समान लोहे की कड़ाही में गिरते है, और आग के समान उसमे चिरकाल तक उपर-नीचे आते-जाते पचते रहते है ||14||
“ तब पीब और लहू से से लथपथ हो पापकारी किस प्रकार पचता है | जहाँ-जहाँ लेटता है, वहाँ-वहाँ उनसे लथपथ हो मलिन हो जाता है ||15||
“ पापकारी कीड़ो से भरे पानी में किस प्रकार पचता है | वह कही तीर को नहीं पा सकता, क्योकि चारो और कड़ाह है ||16||
“ घायल शरीर हो वे तीक्ष्ण असिपत्र वन में प्रवेश करते है | नरकपाल उनकी जीभ को काँटों से पकड़ कर उनका वध करते है ||17||
“ तब वे छुरे की धार के समान तीक्ष्ण धारावाली दुस्तरं वैतरणी नदी में गिरते है | मुर्ख पापकारी पाप कर उसी में गिरते है ||18||
“ वहाँ काले और चितकबरे बड़े कौवे उनको खा जाते है | कुत्ते, सियार, गिद्ध, चील्ह और कौवे चाव के साथ उन्हें नोचते है ||19||
“ पापकारी मनुष्य नरक में जिस जीवन का अनुभव करता है, वह दुःखमय है | इसलिए मनुष्य को चाहिए कि अपने शेष जीवन में अच्छे कर्म करे और प्रमाद न करे ||20||
“ पदुम निरय में जो उत्पन्न होते है उनकी आयु पण्डितो की गिनती के अनुसार तिल के भार (एक एक कर) गिने जाने की तरह लम्बी है, जो पांच नहुत कोटि और बारह सौ कोटि के बराबर है ||21||
“ यहाँ जितने भी नरक दुःख बताये गये है उसे इन सबको चिरकाल तक भोगना पड़ता है | इसलिए पवित्र, प्रियेशील साधुओ के प्रति अपना मन और वचन सयंत रखे ” ||22||
कोकालिये सुत्त समाप्त , सुतनिपात
साभार :
Wednesday, October 28, 2015
चक्क्र्मं सुत्त
चक्क्र्मं सुत्त
एक समय भगवान राजगह में गिज्झ्कूट पर्वत पर विहार करते थे | उस समय आयुष्मान सारिपुत्र कुछ भिक्षुओ के साथ भगवान से कुछ ही दूरी पर चंक्रमण कर रहे थे | आयुष्मान महामोग्गालान, आयुष्मान महाकाश्यप, आयुष्मान अनुरुद्ध, आयुष्मान पुन्ण मन्तानिपुत्त, आयुष्मान उपालि, आयुष्मान आनन्द, और देवदत्त भी कुछ भिक्षुओ के साथ कुछ दूरी पर चंक्रमण कर रहे थे |
तब भगवान ने भिक्षुओ को आमंत्रित किया :--
“ भिक्षुओ ! तुम सारिपुत्र को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु बड़े प्रज्ञा वाले हैं |”
“ भिक्षुओ ! तुम मोग्गालान को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु बड़े ऋद्धि वाले हैं |”
“ भिक्षुओ ! तुम काश्यप को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु ध्रुतंग धारण करने वाले हैं |
“ भिक्षुओ ! तुम अनुरुद्ध को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु दिव्य चक्षु वाले हैं |
“ भिक्षुओ ! तुम पुन्ण मन्तानिपुत्त को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु बड़े धर्मकथिक हैं |”
“ भिक्षुओ ! तुम उपालि को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु बड़े विनयधर हैं |”
“ भिक्षुओ ! तुम आनन्द को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु बहुश्रुत हैं |”
“ भिक्षुओ ! तुम देवदत्त को कुछ भिक्षुओ के साथ चंक्रमण करते देख रहे हो न ?”
“ हाँ भन्ते !”
“ भिक्षुओ ! वे सभी भिक्षु पापेच्छ हैं |”
“ भिक्षुओ ! सभी प्राणी धातुओ के अनुसार परस्पर मेलजोल करते है | हीन प्रवृति वाले हीन प्रवृति वालो के साथ, उत्तम प्रवृति वाले उत्तम प्रवृति वालो के साथ ही सिलसिले में चलते और मिलते है |
“ भिक्षुओ ! अतीत में भी ऐसा ही होता था, अनागत (भविष्य) में भी ऐसा ही होगा और इस समय भी ऐसा ही हो रहा हैं |
चक्क्र्मं सुत्त , संयुक्त निकाय
साभार :
Tuesday, October 27, 2015
उपोसथ सुत्त -Uposatha Sutta
***** उपोसथ सुत्त ****
ऐसा मैंने सुना
एक समय भगवान श्रावस्ती में मिगार माता के पूर्वाराम प्रसाद में विहार कर रहे थे | उस समय विसाखा मिगार-माता उपोसथ के दिन भगवान के पास गयी | जाकर अभिवादन कर एक और बैठ गयी | एक और बैठी मिगार-माता विसाखा को भगवान ने यह कहा— “ विसाखे ! आज तू दिन चढ़ते कैसे आयी ?”
“ भंते ! आज मैंने उपोसथ रखा है |”
“ विसाखे ! उपोसथ तीन प्रकार का होता है | कौन से तीन प्रकार का ? गोपाल-उपोसथ, निर्ग्रंथ-उपोसथ तथा आर्ये उपोसथ |
“ विसाखे ! गोपाल-उपोसथ कैसा होता है ?
विसाखे ! जैसे कोई गवाला शाम को मालिको को उनकी गौवे सौंप कर यह सोचे कि आज इन गौवों ने अमुक-अमुक जगह चराई की, अमुक-अमुक जगह पानी पिया | कल ये गौवे अमुक-अमुक जगह चरेगी, अमुक-अमुक जगह पानी पियेगी | इस प्रकार विसाखे ! यहाँ कोई उपोसथ करने वाला ऐसा सोचता हैं—आज मैंने यह-यह खाया तथा यह-यह भोजन किया | कल मै यह-यह खाऊंगा तथा यह-यह भोजन करूँगा | वह उस लोभयुक्त चित से दिन गुजार देता हैं | विसाखे ! इस प्रकार गोपाल उपोसथ होता है | विसाखे ! इस प्रकार के गोपाल-उपोसथ का न महान फल होता है, न महान लाभ होता है, न तो यह महान प्रकाश वाला होता है और न बहुत दूर तक व्याप्त होने वाला होता है |
“ हे विसाखे ! निर्ग्रंथ-उपोसथ कैसा होता है ?”
“ हे विसाखे ! निर्ग्रंथ नामक श्रमणों की एक जाति है, वे अपने मतानुयायीओ को इस प्रकार उपदेश देते है – “ हे पुरुष ! तू आ | पूर्व दिशा में सौ योजन से अधिक योजन तक ( सौ योजन से परे ) जितने प्राणी है तू उन्हें दण्ड से मुक्त कर, पश्चिम दिशा में सौ योजन से अधिक योजन तक जितने प्राणी है तू उन्हें दण्ड से मुक्त कर, उत्तर दिशा में सौ योजन से अधिक योजन तक जितने प्राणी है तू उन्हें दण्ड से मुक्त कर तथा दक्षिण दिशा में सौ योजन से अधिक योजन तक जितने प्राणी है तू उन्हें दण्ड से मुक्त कर | इस प्रकार कुछ प्राणियों के प्रति दया उपदेशित करते है, कुछ के प्रति दया उपदेशित नहीं करते | वे उपोसथ-दिन पर श्रावक को इस प्रकार उपदेश करते है --“ हे पुरुष ! तू आ | सभी वस्त्रो लो त्याग कर इस प्रकार कह –“ न मैं कही, किसी का कुछ हूँ, और न मेरा कही, कोई कुछ हैं |” किंतु उसके माता पिता जानते है की यह मेरा पुत्र है और पुत्र भी जानता है कि ये मेरे माता पिता है | उसके पुत्र और स्त्री उसे पिता और पति के रूप में जानते है , और वह भी यह जानता है की ये मेरे पुत्र और स्त्री है | उसके दास और नौकर-चाकर भी यह जानते है की यह हमारा मालिक है और वह भी यह जानता है की ये मेरे दास-नौकर-चाकर है | इस प्रकार जिस समय सत्य उपदेश देना चाहिए उस समय झूठा उपदेश देते है, इसको मै उनका झूठ बोलना कहता हूँ | उस रात्रि के बीतने पर वह उन (त्यक्त) वस्तुओ को बिना किसी को दिए ही उपयोग में लाते है | इसको मै उनका चोरी करना कहता हूँ | इस प्रकार हे विसाखे ! यह निर्ग्रंथ-उपोसथ होता है | विसाखे ! इस प्रकार के उपोसथ का न महान फल होता है, न महान लाभ होता है, न तो यह महान प्रकाश वाला होता है तथा न बहुत दूर तक व्याप्त होने वाला होता है |
“ हे विसाखे ! आर्ये-उपोसथ कैसा होता है ?”
“ विसाखे ! वह आर्ये-श्रावक यह विचार करता हैं –“ अर्हन्त जीवनभर प्राणी-हिंसा छोड़, प्राणी-हिंसा से विरत होकर, दण्ड-त्यागी, शस्त्र-त्यागी, पाप-भीरु, दयावान, सभी प्राणियों का हित और उन पर अनुकंपा करते विचरते है | मै भी आज की रात और यह दिन प्राणी-हिंसा छोड़, प्राणी-हिंसा से विरत होकर, दण्ड-त्यागी, शस्त्र-त्यागी, पाप-भीरु, दयावान, सभी प्राणियों का हित और उन पर अनुकंपा करते हुए विहार करूँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला हो जाऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर चोरी करना छोड़, चोरी करने से विरत रह, केवल दिया ही लेने वाले, दिए की ही आकंक्षा करने वाले, चोरी न कर पवित्र जीवन बिताते है | मैं भी आज की रात और यह दिन चोरी करना छोड़, चोरी से विरत रह , केवल दिया ही लेने वाले, दिए की ही आकंक्षा करने वाले, चोरी न कर, पवित्र जीवन बिताऊ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर अब्रहमचर्य छोड़, ब्रहमचारी, अनाचार-रहित, मैथुन ग्रम्ये-धर्म से विरत रहते है | मैं भी आज की रात और यह दिन अब्रहमचर्य छोड़, ब्रहमचारी, अनाचार-रहित, मैथुन ग्रम्ये-धर्म से विरत रहकर बिताऊँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर मृषावाद छोड़, मृषावाद से विरत होकर, कभी झूठ न बोलने वाले दृढ़, विश्वसनीय तथा लोक को धोखा न देने वाले होकर रहते है | मैं भी आज की रात और यह दिन मृषावाद छोड़, मृषावाद से विरत होकर, कभी झूठ न बोलने वाले दृढ़, विश्वसनीय तथा लोक को धोखा न देने वाले होकर रहूँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर सुरा-मेरय-मद्ध आदि प्रमादकारक वस्तुओ को छोड़, सुरा-मेरय-मद्ध आदि प्रमादकारक वस्तुओ से विरत होकर रहते है | मैं भी आज की रात और यह दिन सुरा-मेरय-मद्ध आदि प्रमादकारक वस्तुओ को छोड़, सुरा-मेरय-मद्ध आदि प्रमादकारक वस्तुओ से विरत होकर रहूँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर एकाहारी, रात्रि-भोजन-त्यक्त, विकाल-भोजन से विरत होकर रहते है | | मैं भी आज की रात और यह दिन एकाहारी, रात्रि-भोजन-त्यक्त, विकाल-भोजन से विरत होकर बिताऊँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर नाचने, गाने, बजाने, तमाशे देखने, माला-गंध-विलेपन धारण-मंडन आदि जो विभूषित करने के सामान है उनसे विरत रहते है | मैं भी आज की रात और यह दिन नाचने, गाने, बजाने, तमाशे देखने, माला-गंध-विलेपन धारण-मंडन आदि जो विभूषित करने के सामान है उनसे विरत रहकर बिताऊँ | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ अर्हन्त जीवनभर उच्च-शय्या, महा-शय्या को छोड़, उच्च-शय्या, महा-शय्या से विरत होकर, नीचा शयनासन – चारपाई या चटाई को ही काम में लाते हैं | मैं भी आज की रात और यह दिन उच्च-शय्या, महा-शय्या को छोड़, उच्च-शय्या, महा-शय्या से विरत होकर, नीचा शयनासन – चारपाई या चटाई को ही काम में लाऊं | इस अंश में भी मैं अर्हंतो का अनुकरण करने वाला होऊंगा तथा मेरा उपोसथ पूरा होगा |
“ विसाखे ! इस प्रकार आर्ये-उपोसथ होता है | विसाखे ! इस प्रकार रखा गया आर्ये-उपोसथ महान फल वाला होता है, महान लाभ वाला होता है, यह महान प्रकाश वाला होता है तथा बहुत दूर तक व्याप्त होने वाला होता है |
“ कितने महान फल वाला होता है, कितने महान लाभ वाला होता है, यह कितने महान प्रकाश वाला होता है तथा कितनी बहुत दूर तक व्याप्त होने वाला होता है ? ”
“ विसाखे ! जैसे कोई इन सोलह महान सप्त-रत्न महाजनपदो का एश्वर्यधिप्तय राज्य करे – जैसे अंगों का, मगधो का, काशियो का, कोशलो का, वज्जियो का, मल्लो का, चेदियो का, वंगो का, कुरुओ का, पंचालो का, मत्स्यो का, शोरसेनो का, अश्मको का, अवंतियो का, गांधारो का तथा कंबोजो का – वह अष्टांग उपोसथ के सोलहवी कला के भी बराबर नहीं होता | यह किसलिए विसाखे ! दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का पचास वर्ष होता है, वह चतुम्म्हाराजिक देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से पांच सौ वर्ष चतुम्म्हाराजिक देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद चतुम्म्हाराजिक देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का सौ वर्ष होता है, वह तावतिंस देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से एक हजार दिव्य वर्ष तावतिंस देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद तावतिंस देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का दो सौ वर्ष होता है, वह याम देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से दो हजार दिव्य वर्ष याम देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद याम देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का चार सौ वर्ष होता है, वह तुषित देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से चार हजार दिव्य वर्ष तुषित देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद तुषित देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का आठ सौ वर्ष होता है, वह निम्मान-रति देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से आठ हजार दिव्य वर्ष निम्मान-रति देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद निम्मान-रति देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ विसाखे ! जितना समय मनुष्यों का सोलह सौ वर्ष होता है, वह परनिम्मितवसवत्ती देवताओ का एक रात-दिन होता है | उस रात से तीस रातो का महीना | उस महीने से बारह महीनो का वर्ष | उस वर्ष से सोलह हजार दिव्य वर्ष परनिम्मितवसवत्ती देवताओ की आयु सीमा | विसाखे ! संभव हैं कि अष्टांगिक उपोसथ करने वाली स्त्री या पुरुष शरीर छुटने पर मरने के बाद परनिम्मितवसवत्ती देवताओ का सहवासी हो जाये | विसाखे ! इस लिए यह कहा गया हैं की दिव्य-सुख की तुलना में मानुषी-राज्य बिचारे का कुछ मूल्य नहीं |
“ प्राणी-हिंसा न करे, चोरी न करे, झूठ न बोले, मद्धप न होवे | अब्रहमचर्य, मैथुन से विरत रहे | रात्रि का विकाल भोजन न करे | माला न पहने | सुगंधि न धारण करे | मंच या बिछी-भूमि पर सोये | बुद्ध ने दुःख का अंत करने वाले इस अष्टांग-उपोसथ को प्रकाशित किया है | चन्द्रमा तथा सूर्य दोनों सुदर्शन है | वे जहा तक संभव है वहा तक प्रकाश फैलाते है | वे अन्तरिक्षगामी हैं | अंधकार के विध्वंसक हैं | वे आकाश की सभी दिशाओ को आलोकित करते है | और यहा इस बीच में जो कुछ भी मुक्ता, मणि तथा बिल्लौर धन, स्फटिक है, शुद्ध कंचन, स्वर्ण, जो जातरूप व् हाटक भी कहलाता हैं, वह तथा चन्द्रमा का प्रकाश और सभी तारागण अष्टांग-उपोसथ पालन करने वाले के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहीं होते | इसलिए जो सदाचारी नारी और नर हैं वे अष्टांग-उपोसथ का पालन कर तथा सुखदायक पुण्य-कर्म कर, अनिंदित रह, स्वर्ग-स्थान को प्राप्त होते है |”
साभार :
Friday, October 23, 2015
अंतराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान,गोमती नगर , लखनऊ-पालि भाषा और बौद्ध साहित्य के संरक्षण की सराहनीय पहल
किसी भी धर्म के साथ उसकी उत्भव भाषा के महत्व को नकारा नही जा सकता । लेकिन बहुत ही कम धर्म अनुयायी है जिन्होने अपनी भाषा को न केवल बचाया बल्कि उसके पुनर्थान मे भी कोई कसर नही छॊडी। भारत मे उर्दू और अरबी के विकास और संरक्षण मे अपने मुस्लिम धर्म के अनुयायियों को साधुवाद जिनके प्रयास से यह भाषाये भारत मे जीवित ही नही बल्कि फ़ल फ़ूल भी रही है ।
पालि भाषा को बौद्ध त्रिपटक की भाषा के रुप मे भी जाना जाता है । पालि भाषा का इतिहास बुद्ध काल से शुरु होता है । भगावन् बुद्ध अपनी शिक्षाओं के माध्यम के लिए विद्वानों की भाषा संस्कृत के विरुद्ध थे और अपने अनुयायियों को स्थानीय बोलियों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करते थे, इसलिए बौद्ध धर्म शास्त्रीय भाषा के रूप में पालि भाषा का उपयोग शुरू हुआ। धीरे-धीरे उनके मौखिक उपदेश भारत से श्रीलंका तक लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. पहुंचे, जहां उन्हें पालि भाषा में लिखा गया, जो देशी मिश्रित मूल की साहित्यिक भाषा थी। अंतत: पालि एक समादृत, मानक और अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई।
पालि साहित्य की विकासयात्रा
पालि की उत्पत्ति के स्थान के बारे में भिन्न मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारत में हुई। यह भी दावा किया जाता है कि यह विंध्य पर्वत के मध्य से पश्चिम में पैदा हुई, जो इस अनुमान पर आधारित है कि उस काल में उज्जैन नगर संस्कृति का केंद्र था। जहां कुछ विद्वान पालि को मागधी भाषा का साहित्यिक स्वरूप मानते हैं वहीं कुछ अन्य मगध का पक्ष लेते हैं। पालि के विद्वान 'राइस डेविड' कोसल को पालि की उत्पत्ति का स्थान मानते हैं। पहली बार इस शब्द का उपयोग पांचवीं शताब्दी के महान टीकाकार बुद्धघोष ने पाठ शब्द के समानार्थी के रूप में किया था। बुद्धघोष ने अपनी अट्ठकथाओं में पालि शब्द का प्रयोग किया है, किंतु यह भाषा के अर्थ में नहीं, बुद्धवचन अथवा मूलत्रिपिटक के पाठ के अर्थ में किया है। कुछ विद्वान इस शब्द को पंक्ति, पर्याय, पाल धातु, पाटलिपुत्र नगर ( वर्तमान घटना) और पल्ली (गांव) से भी उत्पन्न हुआ मानते हैं। यह कई लिपियों में लिखी जाती थी लेकिन मुख्य रूप से इसे लिखने के लिए ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता था। जैसे जैसे थेरवाद बौद्ध धर्म दक्षिण पूर्वी एशिया में फैला तो इसे लिखने के लिए स्थानीय लिपियों का प्रयोग होने लगा। बुद्ध, पूर्वी भारत में बोली जाने वाली मगधी भाषा बोलते थे। प्राचीन बौद्धों का मानना है कि पाली या तो पुरानी मगधी भाषा है या उसके जैसी भाषा है। आज यह प्रचलन में नहीं है लेकिन बौद्ध धर्मग्रन्थों को समझने के लिए इसका अध्ययन किया जाता है।अंतराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान , गोमती नगर , लखनऊ– पालि भाषा और बौद्ध साहित्य के संरक्षण की सराहनीय पहल
अंतराष्ट्रीय बौद्ध विधा शोध संस्थान की स्थापना संस्कृति मामलों के विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित की गई है । लगभग ५ साल पहले उत्तर प्रदेश की भूतपूर्व मुख्य मंत्री सुश्री मायावती जी ने इस संस्थान का लोकार्पण किया था । इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के मुख्य घटक जैसे धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति, वास्तुकला और साहित्य का अध्ययन और संरक्षण है ।
इस संस्थान के प्रबन्ध निदेशक डा. योगेन्द्र सिहं जी , अध्यक्ष भिक्खु चन्दीमा , बौद्ध धर्म के विभिन्न क्षेत्र में तीन सदस्यों के प्रख्यात विद्वान और भिक्खु संघ के आठ नामित सदस्य हैं ।
संस्थान के लक्ष्य और उद्देश्य
१. भारतीय और अन्य विदेशी भाषाओं में बौद्ध साहित्य की पांडुलिपियों और प्रकाशित संबद्ध शोध पत्र, शोध पत्रिकाओं का अध्ययन और अनुवाद ।
२. बौद्ध साहित्य और अन्य संबद्ध जानकारी के मूल संग्रह को व्यवस्थित करके प्रस्तुत करना । जिसमे डिजीटल लाइब्रेरेरी के माध्यम से इस सुविधा को आसान बनाया गया है ।
३. पाली, संस्कृत और तिब्बती भाषाओं के अध्यनन से विद्धानों और छात्रों को बौद्ध साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन कराना ।
४. बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र के लिए समर्पित अनुसंधान के लिये विद्वानों और छात्रॊ के लिए पुरस्कार और मान्यता प्रदान करने के लिए सरकार और विश्वविद्यालयों के साथ मंत्रणा कर के नियमों की स्थापना करना ।
५. बौद्ध साहित्य और उनसे संबधित पांडुलिपियों के लिए पुस्तकालयों की स्थापना करना ।
६. भारत मे और अन्य देशों मे जहाँ बौद्ध पुरातात्विक उत्खनन स्थल है , शिक्षाविद्धों और अनुसंधानकर्त्ताओं के लिए संस्कृति टूर का आयोजन करना ।
अंतराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान , गोमती नगर , लखनऊ – एक नजर
आम सरकारी विभागों से से अलग इस संस्थान की झलक इस संस्थान मे प्रवेश करने पर ही प्रतीत होती है । आकर्षक भवन , साफ़ सुथरे वातानुकूलित कक्षायें , भारतीय कला, संस्कृति, इतिहास, दर्शन, पुरातत्व और संबधित बौद्ध अध्ययन पर सुव्यवस्थित पुस्तकालय , अच्छी तरह से सुसज्जित व्याख्यान कक्ष और सम्मेलन सभागार , अतिथि वक्ताओं, शोधकर्ताओं और कोर्स प्रतिभागियों के लिए छात्रावास , नियमित पत्रिकाओं के अप-टू-डेट संस्करण , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और पुस्तकालय के माध्यम से संबधित विषयों में जानकारी और सबसे मुख्य बात कि स्टाफ़ का मृदुल व्यवाहार ।
व्याख्यान कक्ष (ऊपर ) और भिक्खु उपानंन्द जी बौद्ध दर्शन और पाली क्लास लेते हुये
.संस्थान मे प्रवेश करते ही भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति के दर्शन होते हैं । तीन मंजिला इस भवन मे कई कोर्स संचालित किये जा रहे हैं । इनमे मुख्य हैं :
१. महिलाओं के लिये बौद्ध साहित्य और पाली भाषा में तीन वर्षीय B.A. का निशुल्क कोर्स जो लखनऊ विशवविधालय से संबधित है ।
२. बौद्ध धर्म और पाली भाषा में रुचि रखने वालों के लिये ६ माह का निशुल्क सर्टिफ़ेकट कोर्स जिसका समय उनकी सुविधानुसार रखा गया है । प्रात: ८-९ यह कक्षायें रोज लगती हैं । आयु का कोई बन्धन नही और हर वर्ग के इच्छुक लोग इसका लाभ उठा सकते हैं । यह सारे कोर्स पूर्णतया निशुल्क हैं । न्यून्तम योग्यता : इन्टरमीडिय़ट । इच्छुक प्रार्थी संस्थान की वेबसाइट http://buddha2550.org.in/ से जानकारी ले सकते हैं । आवेदन पत्र को डाऊनलोड अरने के लिए http://buddha2550.org.in/form.jpg पर जायें या संस्थान के दूरभाष नं. +91-0522-2300504 पर संपर्क करे ।
संस्थान का पता है :
INTERNATIONAL RESEARCH INSTITUTE OF BUDDHIST STUDIES Near Fun Hall , Opp. Reserve Bank of India
Vipin Khand, Gomti Nagar, Lucknow (U.P.) INDIA.
Contact Number :+91-0522-2300504
Fax Number :+91-0522-2300504
३. संस्थान की भविष्य की योजनाओं मे बौद्ध दर्शन और पालि भाषा में डिप्लोमा और डिग्री कोर्स भी शामिल हैं । इसके अलावा भगवान् बुद्ध द्वारा प्रदान की गई महत्वपूर्ण ध्यान पद्ध्ति ‘ विपसन्ना ‘ के भी कोर्स चलाने की योजना है ।
किसी भी संस्थान का भवन और इन्फ्रस्ट्रक्चर ही मुख्य नही होता , बल्कि आवशयक है उस से संबधित लोगों लोगों का झुकाव । भारत में बौद्ध दर्शन से जुडॆ लोग संभवत: तीन स्त्रोतों से आते हैं , एक जो परंपरागत बौद्ध है , दूसरे जो अंबेडकरवादी हैं और तीसरे जो गुरु गोयन्का और ओशो की देशना से प्रभावित होकर आये हैं । पाली भाषा के रोजगारोन्मुखी न होते हुये भी हम को यह सोचना होगा कि हम समाज और धर्म को क्या दे सकते हैं ।
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Wednesday, October 7, 2015
वसलसुत्तं–कौन है जातिच्युत ( Vasala Sutta: Discourse on Outcasts )
वसल सुत्त ( हिन्दी ) - कौन है जातिच्युत
ऐसा मैने सुना । एक समय भगवान् श्रावस्ती मे अनाथपिण्डक के जेतवाराम में विहार करते थे । तब भगवान् पूर्वान्ह समय पात्र और चीवर पहनकर श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिये प्रविष्ट हुये । उस समय अग्निकभारद्धाज ब्राह्म्न्ण के घर मे अग्नि प्रज्विल्लित हो रही थी , जिसमे आहुति की सामाग्री डाली गई थी । अग्निकभारद्धाज ब्राहम्ण ने भगवान् को दूर से ही आते देखा । देखकर भगवान् से यह कहा – “ वही मुण्डक ! वही श्रमणक ! वही वृषलक ! ठहरो । ” ऐसा कहने पर भगवान् ने अग्निकभारद्धाज से ऐसा कहा – “ ब्राहम्ण क्या तुम वृषल ( नीच ) या वृषल बनाने वाली बातों को जानते हो । ? ”
‘ हे गौतम मै वृषल या वृषल बानाने वाली बातों को नही मानता हूँ । अच्छा हो कि हे गौतम ! आप मुझे वैसा धर्मोपदेश दें ताकि मै वृषल या वृषल बानाने वाली बातों को मान और जान सकूँ । ’
तो ब्राहम्ण भली भाँति सुनो और मन में, धारण करॊ ।
बहुत अच्छा , कहकर अग्निकभारद्धाज ने भगवान को उत्तर दिया । तब भगवान् ने यह कहा -
१. जो नर क्रोधी , बँधे पैर वाला , बहुत ईर्ष्यालु , मिथ्यादृष्टि वाला और मा्यावी है , उसे वृषक जानें ।
२. जो योनिज या अण्डज किसी भी प्राणी की हिंसा करता है , जिसे प्राणियों के प्रति दया नही है , उसे वृषल जानें ।
३. जो ग्रामों और कस्बों को नष्ट करता और घेरता है , जो अत्याचारी के रुप मे प्रसिद्ध है , उसे वृषल जानें ।
४. जो ग्राम या अरण्य मे जो दूसरॊ की अपनी सम्पति है , उसे चोरी से ले जाता है , उसे वृषल जानें ।
५. जो ऋण लेकर माँगने पर “ तेरा ऋण नही है ” कहकर भागता है , उसे वृषल जानें ।
६. जो किसी चीज की इच्छा से मार्ग में, चलते हुये व्यक्ति को मारकर कुछ ले लेता है , उसे वृषल जानें ।
७. जो नर अपने या दूसरे के धन के लिये झूठी गवाही देता है , उसे वृषल जानें ।
८. जो जबरद्स्ती या प्रेम से भाई – बन्धुओं या मित्रों की स्त्रियों के साथ दिखाई देता है ,उसे वृषल जानें ।
९. जो समर्थ होते हुये भी अपने माता पिता , बूढे –पुरनियाँ का भरण पोषण नही करता है , उसे वृषल जानें ।
१०. जो माता –पिता , भाई , बहिन या सासु को मारता या कडे वचन से क्रोध करता है , उसे वृषल जानें ।.
११. जो भलाई की बात पूछने पर बुराई का रास्ता दिखाता है , उसे वृषल जानें ।
१२. जो पाप कर्म कर के “ लोग मुझे न जानें “ – ऐसा चाहता है , जो छिपे कर्म करने वाला है , उसे वृषल जानें ।
१३. जो दूसरे के घर जाकर स्वादिष्ट भोजन करता है और उसके आने पर स्वागत सत्कार नही करता , उसे वृषल जानें ।
१४. जो ब्राहम्ण , श्रमण , या भिखारी को झूठ बोलकर धोखा देता है , उसे वृषल जानें ।
१५. जो भोजन के समय आये श्रमण या ब्राहम्ण से क्रोध से बोलता है और उसे कुछ नही देता है , उसे वृषल जानें ।
१६. जो मोह से मोहित होकर किसी चीज को चाहता और झूठ बोलता है , उसे वृषल जानें ।
१७. जो अपनी बडाई करता है और दूसरे की निन्दा करता है , और अपने उस अभिमान से गिर गया हो , उसे वृषल जानें ।
१८. जो क्रोधी , कंजूस और बुरी इच्छा वाला , कृपण , शठ , निर्लज्ज और असंकोची है , उसे वृषल जानें ।
१९. जो बुद्ध और उनके प्रवजित अथवा गृहस्थ शिष्यों को गाली देता है , उसे वृषल जानें ।
२०. जो अर्हत न होते हुये भी अपने को अर्हत बताता है , वह ब्रह्म सहित सारे लोक मे चोर है और वह अधम वृषल है । मैने इतने वृषलों को तुमको बतलाया है ।
२१. कोई जाति से वृषल नही होता और न जाति से ब्राहम्ण होता है । कर्म से कोई वृषल होता है और कर्म से ब्राहम्ण भी होता है ।
२२. इस उदाहरण से भी जानॊ कि चण्डाल पुत्र सोपाक जो मातंग नाम से प्रसिद्ध था ।
२३. उस मांतग ने जिस महान यश को प्राप्त किया , वह दूसरों के लिये बहुत ही दुर्लभ था । उसकी सेवा मे बहुत ही छ्त्रिय और ब्राहम्ण आया करते थे ।
२४. वह कामराग को त्याग कर दिव्य रथ मे सवार होकर , शुद्ध महापथ से ब्र्ह्मलोक चला गया । उसके ब्रह्म लोक मे उत्पन्न होने मे कोई जाति उसको रोक न पायी ।
२५. जो वेद पाठियों के घर में वेद मंत्रो के जानकार ब्राहम्ण हैं , वे भी नित्य पाप कर्मॊ में संलग्न दिखाई देते हैं ।
२६. इस जन्म मे ही उनकी निन्दा होती है और परलोक मे दुर्गति को प्राप्त होते हैं । उन्हें दुर्गति और निन्दा से जाति बचा नही पाती ।
२७. जाति से कोई न वृषल ( नीच ) होता है और न जाति से कोई ब्राह्म्ण होता है । कर्म से ही कोई वृषल होता है और कर्म से ही ब्राहम्ण होता है ।
ऐसा कहने पर अग्निकभारद्धाज ब्राह्म्न्ण ने भगवान् से ऐसा कहा – “ आशचर्य है , हे गौतम , जैसे कि हे गौतम ! उल्टे हुये बर्तन को सीधा कर दे , ढँके हुये को उधाड दे , रास्ता भूले को रास्ता दिखा दे अथवा अन्धकार में तेल के प्रदीप को धारण करे , जिससे कि आँख वाले लोग चीजॊ को देख सके , ऐसे ही आप गौतम द्वारा अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है । यह मै आप गौतम की शरण मे जाता हूँ , धर्म और भिक्षुसंघ की भी । मुझे आप गौतम आज से ही जीवन पर्यन्त शरणागत उपासक धारण करें ।
वसल सुत्त ( पालि )
एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि। तेन खो पन समयेन अग्गिकभारद्वाजस्स ब्राह्मणस्स निवेसने अग्गि पज्जलितो होति आहुति पग्गहिता। अथ खो भगवा सावत्थियं सपदानं पिण्डाय चरमानो येन अग्गिकभारद्वाजस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमि।
अद्दसा खो अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवन्तं दूरतोव आगच्छन्तं। दिस्वान भगवन्तं एतदवोच – ‘‘तत्रेव [अत्रेव (स्या॰ क॰)], मुण्डक; तत्रेव, समणक; तत्रेव, वसलक तिट्ठाही’’ति।
एवं वुत्ते, भगवा अग्गिकभारद्वाजं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘जानासि पन त्वं, ब्राह्मण, वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे’’ति? ‘‘न ख्वाहं, भो गोतम, जानामि वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे; साधु मे भवं गोतमो तथा धम्मं देसेतु, यथाहं जानेय्यं वसलं वा वसलकरणे वा धम्मे’’ति। ‘‘तेन हि, ब्राह्मण, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भो’’ति खो अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवतो पच्चस्सोसि। भगवा एतदवोच –
१.. ‘‘कोधनो उपनाही च, पापमक्खी च यो नरो।
विपन्नदिट्ठि मायावी, तं जञ्ञा वसलो इति॥
२. ‘‘एकजं वा द्विजं [दिजं (पी॰)] वापि, योध पाणं विहिंसति।
यस्स पाणे दया नत्थि, तं जञ्ञा वसलो इति॥
३.‘‘यो हन्ति परिरुन्धति [उपरुन्धेति (स्या॰), उपरुन्धति (क॰)], गामानि निगमानि च।
निग्गाहको [निग्घातको (?)] समञ्ञातो, तं जञ्ञा वसलो इति॥
४.‘‘गामे वा यदि वा रञ्ञे, यं परेसं ममायितं।
थेय्या अदिन्नमादेति [अदिन्नं आदियति (सी॰ पी॰)], तं जञ्ञा वसलो इति॥
५.‘‘यो हवे इणमादाय, चुज्जमानो [भुञ्जमानो (?)] पलायति।
न हि ते इणमत्थीति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
६.‘‘यो वे किञ्चिक्खकम्यता, पन्थस्मिं वजन्तं जनं।
हन्त्वा किञ्चिक्खमादेति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
७.‘‘अत्तहेतु परहेतु, धनहेतु च [धनहेतु व (क॰)] यो नरो।
सक्खिपुट्ठो मुसा ब्रूति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
८.‘‘यो ञातीनं सखीनं वा, दारेसु पटिदिस्सति।
साहसा [सहसा (सी॰ स्या॰)] सम्पियेन वा, तं जञ्ञा वसलो इति॥
९.‘‘यो मातरं पितरं वा, जिण्णकं गतयोब्बनं।
पहु सन्तो न भरति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१०.‘‘यो मातरं पितरं वा, भातरं भगिनिं ससुं।
हन्ति रोसेति वाचाय, तं जञ्ञा वसलो इति॥
११.‘‘यो अत्थं पुच्छितो सन्तो, अनत्थमनुसासति।
पटिच्छन्नेन मन्तेति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१२.‘‘यो कत्वा पापकं कम्मं, मा मं जञ्ञाति इच्छति [विभ॰ ८९४ पस्सितब्बं]।
यो पटिच्छन्नकम्मन्तो, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१३.‘‘यो वे परकुलं गन्त्वा, भुत्वान [सुत्वा च (स्या॰ क॰)] सुचिभोजनं।
आगतं नप्पटिपूजेति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१४.‘‘यो ब्राह्मणं समणं वा, अञ्ञं वापि वनिब्बकं।
मुसावादेन वञ्चेति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१५.‘‘यो ब्राह्मणं समणं वा, भत्तकाले उपट्ठिते।
रोसेति वाचा न च देति, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१६.‘‘असतं योध पब्रूति, मोहेन पलिगुण्ठितो।
किञ्चिक्खं निजिगीसानो [निजिगिंसानो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)], तं जञ्ञा वसलो इति॥
१७.‘‘यो चत्तानं समुक्कंसे, परे च मवजानाति [मवजानति (सी॰ स्या॰ पी॰)]।
निहीनो सेन मानेन, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१८.‘‘रोसको कदरियो च, पापिच्छो मच्छरी सठो।
अहिरिको अनोत्तप्पी, तं जञ्ञा वसलो इति॥
१९.‘‘यो बुद्धं परिभासति, अथ वा तस्स सावकं।
परिब्बाजं [परिब्बजं (क॰), परिब्बाजकं (स्या॰ कं॰)] गहट्ठं वा, तं जञ्ञा वसलो इति॥
२०.‘‘यो वे अनरहं [अनरहा (सी॰ पी॰)] सन्तो, अरहं पटिजानाति [पटिजानति (सी॰ स्या॰ पी॰)]।
चोरो सब्रह्मके लोके, एसो खो वसलाधमो॥
२१.‘‘एते खो वसला वुत्ता, मया येते पकासिता।
न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो।
कम्मुना [कम्मना (सी॰ पी॰)] वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो॥
२२.‘‘तदमिनापि जानाथ, यथामेदं [यथापेदं (क॰)] निदस्सनं।
चण्डालपुत्तो सोपाको [सपाको (?)], मातङ्गो इति विस्सुतो॥
२३.‘‘सो यसं परमं पत्तो [सो यसप्परमप्पत्तो (स्या॰ क॰)], मातङ्गो यं सुदुल्लभं।
आगच्छुं तस्सुपट्ठानं, खत्तिया ब्राह्मणा बहू॥
२४.‘‘देवयानं अभिरुय्ह, विरजं सो महापथं।
कामरागं विराजेत्वा, ब्रह्मलोकूपगो अहु।
न नं जाति निवारेसि, ब्रह्मलोकूपपत्तिया॥
२५.‘‘अज्झायककुले जाता, ब्राह्मणा मन्तबन्धवा।
ते च पापेसु कम्मेसु, अभिण्हमुपदिस्सरे॥
२६.‘‘दिट्ठेव धम्मे गारय्हा, सम्पराये च दुग्गति।
न ने जाति निवारेति, दुग्गत्या [दुग्गच्चा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] गरहाय वा॥
२७.‘‘न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो।
कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो’’ति॥
एवं वुत्ते, अग्गिकभारद्वाजो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम…पे॰… उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति।
वसलसुत्तं सत्तमं निट्ठितं।
Vasala Sutta: Discourse on Outcasts
Thus have I heard:
On one occasion the Blessed One was living near Savatthi at Jetavana at Anathapindika's monastery. Then in the forenoon the Blessed One having dressed himself, took bowl and (double) robe, and entered the city of Savatthi for alms. Now at that time a fire was burning, and an offering was being prepared in the house of the brahman Aggikabharadvaja. Then the Blessed One, while on his alms round, came to the brahman's residence. The brahman seeing the Blessed One some way off, said this: "Stay there, you shaveling, stay there you wretched monk, stay there you outcast." When he spoke thus the Blessed One said to the brahman: "Do you know, brahman, who an outcast is and what the conditions are that make an outcast?" "No, indeed, Venerable Gotama, I do not know who an outcast is nor the conditions that make an outcast. It is good if Venerable Gotama were to explain the Dhamma to me so that I may know who an outcast is and what the conditions are that make an outcast."
"Listen then, brahman, and pay attention, I will speak."
"Yes, Venerable Sir," replied the brahman.
1. "Whosoever is angry, harbors hatred, and is reluctant to speak well of others (discredits the good of others), perverted in views, deceitful — know him as an outcast.
2. "Whosoever in this world kills living beings, once born or twice born, in whom there is no sympathy for living beings — know him as an outcast.
3. "Whosoever destroys and besieges villages and hamlets and becomes notorious as an oppressor — know him as an outcast.
4. "Be it in the village, or in the forest, whosoever steals what belongs to others, what is not given to him — know him as an outcast.
5. "Whosoever having actually incurred a debt runs away when he is pressed to pay, saying, 'I owe no debt to you' — know him as an outcast.
6. "Whosoever coveting anything, kills a person going along the road, and grabs whatever that person has — know him as an outcast.
7. "He who for his own sake or for the sake of others or for the sake of wealth, utters lies when questioned as a witness — know him as an outcast.
8. "Whosoever by force or with consent associates with the wives of relatives or friends — know him as an outcast.
9. "Whosoever being wealthy supports not his mother and father who have grown old — know him as an outcast.
10. "Whosoever strikes and annoys by (harsh) speech, mother, father, brother, sister or mother-in-law or father-in-law — know him as an outcast.
11. "Whosoever when questioned about what is good, says what is detrimental, and talks in an evasive manner- know him as an outcast.
12. "Whosoever having committed an evil deed, wishes that it may not be known to others, and commits evil in secret — know him as an outcast.
13. "Whosoever having gone to another's house, and partaken of choice food, does not honor that host by offering food when he repays the visit — know him as an outcast.
14. "Whosoever deceives by uttering lies, a brahman or an ascetic, or any other mendicant — know him as an outcast.
15. "Whosoever when a brahman or ascetic appears during mealtime angers him by harsh speech, and does not offer him (any alms) — know him as an outcast.
16. "Whosoever in this world, shrouded in ignorance, speaks harsh words (asatam) or falsehood expecting to gain something — know him as an outcast.
17. "Whosoever debased by his pride, exalts himself and belittles other — know him as an outcast.
18. "Whosoever is given to anger, is miserly, has base desires, and is selfish, deceitful, shameless and fearless (in doing evil) — know him as an outcast.
19. "Whosoever reviles the Enlightened One (the Buddha), or a disciple of the Buddha, recluse or a householder — know him as an outcast.
20. "Whosoever not being an arahant, a Consummate One, pretends to be so, is a thief in the whole universe — he is the lowest of outcasts.
21. "Not by birth is one an outcast; not by birth is one a brahman. By deed one becomes an outcast, by deed one becomes a brahman.