Wednesday, July 17, 2019

🌷महास्कन्धक🌷

🌷महास्कन्धक🌷


1-बुद्धत्त्व लाभ और बुद्धकी प्रथम यात्रा

उरुवेला
🌹 (1) बोधि-कथा 
उस समय बुद्ध भगवान् उरुवेला में नेरंजरा नदी के तीर बोधि-वृक्ष के नीचे, प्रथम बुद्धपद (अभिसंबोधि)को प्राप्त हुए थे। भगवान् बोधिवृक्ष के नीचे सप्ताह भर एक आसन से मोक्ष का आनंद लेते हुए बैठे रहे । उन्होंने रात के प्रथम याम में प्रतीत्यसमुत्पादका अनुलोम (आदि से अन्त की ओर) और प्रतिलोम (अन्त से आदि की ओर) मनन किया।--“अविद्याके कारण संस्कार होता है, संस्कार के कारण विज्ञान होता है, विज्ञान के कारण नाम-रूप, नाम-रूप के कारण छ आयतन, छ आयतनों के कारण स्पर्श, स्पर्श के कारण वेदना, वेदना के कारण तृष्णा, तृष्णा के कारण उपादान, उपादान के कारण भव, भव के कारण जाति, जाति (जन्म)के कारण जरा (बुढ़ापा), मरण, शोक, रोना पीटना, दुःख, चित्त-विकार और चित्त-खेद उत्पन्न होते हैं । इस तरह इस (संसार)की–जो केवल दुःखों का पुंज है—उत्पत्ति होती है। अविद्या के बिल्कुल विराग से, (अविद्या का) नाश होने से, संस्कार का विनाश होता है। संस्कार-नाश से विज्ञान का नाश होता है। विज्ञान-नाश से नाम-रूप का नाश होता है। नाम-रूप के नाश से छ आयतनों का नाश होता है। छ आयतनों के नाश से स्पर्श का नाश होता है। स्पर्श-नाश से वेदना का नाश होता है। वेदना-नाश से तृष्णा का नाश होता है। तृष्णा-नाश से उपादान का नाश होता है। उपादान-नाश से भव का नाश होता है। भव-नाश से जाति का नाश होता है। जाति नाश से जरा, मरण, शोक, रोना-पीटना, दुःख, चित्त-विकार और चित्त-खेद नाश होते हैं। इस प्रकार इस केवल दुःख-पुञ्ज का नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर, उसी समय यह उदान कहा – 
जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्र (ब्राह्मण) को।
तब शांत हों कांक्षा सभी, 
देखे स-हेतू धर्म को ॥" 

फिर भगवान्ने रातके मध्यम-याम में प्र तीत्य - समुत्पाद को अनुलोम-प्रतिलोम से मनन किया।--“अविद्याके कारण संस्कार होता है० दुःख पुंजका नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा--
"जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्र को।
तब शांत हों कांक्षा सभी ही 
जान कर क्षय-कार्य को ।” 

फिर भगवान्ने रात के अन्तिम-याम में प्रतीत्यसमुत्पाद को अनुलोम-प्रतिलोम करके मनन किया।--"अविद्या केवल दुःख-पुंज का नाश होता है। भगवान्ने इस अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा--
“जब धर्म होते जग प्रकट, 
सोत्साह ध्यानी विप्रको। 
ठहरे कॅपाता मार-सेना, 
रवि प्रकाशै गगन ज्यों ॥

 🌹 (2) अजपाल कथा 
सप्ताह बीतने पर भगवान् उस समाधिसे उठकर, बोधि वृक्ष के नीचे से वहाँ गये, जहाँ अजपाल नामक बर्गद का वृक्ष था, वहाँ पहुँचकर अजपाल बर्गद के वृक्ष के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनंद लेते हुए, एक आसन से बैठे रहे। उस समय कोई अभिमानी ब्राह्मण, जहाँ भगवान् थे, वहाँ आया। पास आकर भगवान्के साथ.... (कुशल क्षेम पूछ)....एक ओर खडा होगया। एक ओर खडे हुए उस ब्राह्ममण ने भगबान्से यों कहा-“हे गौतम ! ब्राह्मण कैसे होता है ? ब्राह्मण बनाने वाले कौन से धर्म है ?  भगवान्ने इस अर्थ को जानकर, उसी समय यह उदान कहा—

“जो विप्र बाहित-पाप मल-अभिमान-बिनु संयत रहे । 
वेदांत-पारग; ब्रह्मचारी ब्रह्मवादी धर्म से। 
सम नहिं कोई जिससा जगत् (में) ।"

🌹(3) मुचलिन्द कथा 
फिर सप्ताह बीतने पर भगवान् उस समाधिसे उठ, अजपाल बर्गद के नीचे से वहाँ गये, जहाँ मुचलिंद ( वृक्ष ) था। वहाँ पहुँचकर मुचलिद के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनन्द लेते हुए एक आसन से बैठे रहे। उस समय सप्ताह भर अ-समय महामेघ, (और) ठंडी हवा-वाली बदली पडी । तब मुचलिन्द नाग-राज अपने घर से निकलकर भगवान्के शरीरको सात बार अपने देह से लपेटकर, शिरपर बळा फण तानकर खळा हो गया जिसमें कि भगवान्को शीत, उष्ण, डॅस, मच्छर, वात, धूप तथा रेंगनेवाले जन्तु न छूनें। सप्ताह बाद मुचलि न्द नागराज आकाश को मेघ-रहित देख, भगबान्के शरीरसे (अपने ) देह को हटाकर (और उसे) छिपाकर, बालक का रूप धारणकर भगवान्के सामने खडा हुआ। भगवान्ने इसी अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा—
सन्तुष्ट देखनहार श्रुतधर्मा, सुखी एकान्तमें। 
निर्द्वन्द्व सुख है लोकमें, संयम जो प्राणी मात्रमें ॥ 
सब कामनायें छोडना, वैराग्य है सुख लोक में । 
है परम सुख निश्चय वही, जो साधना अभिमानका ॥

🌹 (4) राजायतन कथा 
सप्ताह बीतनेपर भगवान् फिर उस समाधिसे उठ, मुचलिद के नीचे से वहाँ गये, जहाँ राजायतन (वृक्ष) था। वहाँ पहुँचकर राजायतन के नीचे सप्ताह भर मोक्ष का आनन्द लेते हुए एक आसन से वैठे रहे। उस समय तपस्सु और भल्लिक, (दो) बनजारे उकल देश से उस स्थान पर पहुँचे। उनकी जात-बिरादरी के देवताने तपस्सु, भल्लिक बनजारो से कहा-"मार्ष (मित्र) ! बुद्धपद को प्राप्त हो यह भगवान् राजायतन के नीचे विहार कर रहे हैं । जो उन भगवान्को मट्ठे (मन्थ) और लड्डू (मधुपिंड)से सम्मानित करो, यह् (दान) तुम्हारे लिये चिरकाल तक हित और सुखका देनेवाला होगा। तब तपस्सु और भल्लिक बनजारे मट्ठा और लड्डू ले जहा भगवान् थे वहाँ गये। पास जाकर भगवान को अभिवादन कर एक तरफ खड़े हो गये। एक तरफ खड़े हुए तपस्सु और भल्लिक बनजारों ने यह कहा—
“भन्ते ! भगवान् ! हमारे मट्ठे और लड्डुओं को स्वीकार कीजिये, जिससे कि चिरकाल तक हमारा हित और सुख हो।”

उस समय भगवान्ने सोचा-“तथागत (भिक्षा को) हाथ में नहीं ग्रहण किया करते; मैं मट्ठा और लड्डू किस (पात्र) में ग्रहण करूं।" तब चारों महाराजा भगवानु के मन की बात जान, चारों दिशाओं से चार पत्थर के (भिक्षा-) पात्र भगवान्के पास ले गये-"भन्ते ! भगवान् ! इसमें मट्ठा और लड्डू ग्रहण कीजिये ।” भगवान्ने उस अभिनव शिलामय पात्र में मट्ठा और लड्डू ग्रहणकर भोजन किया। उस समय तपस्सु, भल्लिक बनजारों ने भगवान्से कहा--'भन्ते ! हम दोनों भगवान् तथा धर्म की शरण जाते हैं। आजसे भगवान् हम दोनोंको अंजलिबद्ध शरणागत उपासक जानें ।” संसारमें वही दोनों (बुद्ध और धर्म) दो वचनों-से प्रथम उपासक हुए।

🌹 (5) ब्रह्मयाचन कथा 
सप्ताह बीतनेपर भगवान् फिर उस समाधि से उठ, राजायतन के नीचे से जहाँ अजपाल बर्गद था, वहाँ गये। वहाँ अजपाल बर्गद के नीचे भगवान् विहार करने लगे। तब एकान्त में ध्यानावस्थित भगवान्के चित्तमें  वितर्क पैदा हुआ--"मैने गंभीर, दुर्दर्शन, दुर्-ज्ञेय, शांत, उत्तम, तर्क से अप्राप्य, निपुण, पण्डितों द्वारा जानने योग्य, इस धर्म को पा लिया। यह जनता काम-तृष्णा (आलय में) रमण करने वाली काम-रत काम में प्रसन्न है। काम में रमण करनेवाली इस जनता के लिये, यह जो कार्य कारण रूपी प्रतीत्य - समुत्पाद है, वह दुर्दर्शनीय है; और यह भी दुर्दर्शनीय है, जो कि यह सभी संस्कारों का शमन, सभी मन्त्रों का परित्याग, तृष्णाका क्षय, विराग, निरोध (दुख-निरोध), और निर्वाण है। मैं यदि धर्मोपदेश भी करूं और दूसरे उसको न समझ पावें, तो मेरे लिये यह तरदुद्द, और पीड़ा (मात्र) होगी। उसी समय भगवान्को पहिले कभी न सुनी, यह अद्भुत गाथायें सुझ पड़ीं—

यह धर्म पाया कष्टसे, इसका न युक्त प्रकाशना । 
नहिं राग-द्वेष-प्रलिप्त को है सुकर इसका जानना। 
गंभीर उल्टी-धारयुत दुर्दृश्य सूक्ष्म प्रवीणका।
तम-पुंज-छादित रागरतद्वारा न संभव देखना ॥”

{ इस प्रकार (वैशाख पूर्णिमा के दूसरे दिन) प्रतिपद की रात को यह मन में कर (1) बोधि वृक्षके नीचे सप्ताह भर एक आसनसे बैठे।•••तब भगवान्ने आठवे दिन समाधि से उठ•••• (2) (वज्र-) आसन से थोड़ा पूर्वलिये उत्तर दिशा में खड़े हो.••• (वज्र -) आसन और बोधि वृक्षको, बिना पलक गिराये (अनिमेष) नेत्रों से देखते सप्ताह बिताया। वह स्थान अनिमेषं चैत्य नामवाला हुआ। फिर•••• (3) (वज्र-)आसन और खड़े होने (अनिमेष चैत्य) के स्थान के बीच, पूव से पश्चिम लम्बे रत्न-चंक्रम (रत्नमय टहलने के स्थान) पर टहलते सप्ताह बिताया, वह रत्न-चंक्रम चैत्य नामवाला हुआ।•••• (4) उसके पश्चिम दिशा में देवताओं ने रत्नघर बनाया। वहाँ आसन मार बेठ अभिधर्म-पिटक....पर विचार करते सप्ताह बिताया। वह स्थान रत्नघर-चैत्य नामवाला हुआ। इस प्रकार बोधि के पास चार सप्ताह बिता, पाँचवें सप्ताह बोधिवृक्ष से जहाँ•••• (5) अजपाल न्यग्रोध था, (भगवान्) वहाँ गये। उस न्यग्रोध (बर्गद) के नीचे बकरी चरानेवाले (अजपाल) जाकर बैठते थे, इसलिये उसका अजपाल न्यग्रोध नाम हुआ ।... बोधिसे पूर्वदिशा में यह वृक्ष था।•••• (6) मुचलन्द वृक्ष के पास वाली पुष्करिणी में उत्पन्न यह दिव्य शक्तिधारी नागराज था।... महाबोधि के पूर्वकोण मे स्थित (उस) मुचलिन्द वृक्ष से•••• (7) दक्षिण दिशा में स्थित राजायतन वृक्षके पास गए। (--अट्ठकथा) }}

 भगवान्के ऐसा समझने के कारण, (उनका) चित्त धर्मप्रचार की ओर न झुककर अल्प-उत्सुकता की ओर झुक गया। तब सहापति ब्रह्मा ने भगवान्के चित्त की बात को जानकर विचार किया-- लोक नाश हो जायगा रे ! जब तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का चित्त धर्म-प्रचार की ओर न झुक, अल्प उत्सुकता (उदासीनता) की ओर झुक जाये ।”

(ऐसा विचार कर) सहापति ब्रह्मा, जैसे बलवान् पुरुष (बिना परिश्रम) फैली बाँह को समेंट ले, समेटी बाँह को फैला दे, ऐसे ही ब्रह्मलोक से अन्तर्धान हो, भगवान्के सामने प्रकट हुए। फिर सहापति ब्रह्मा ने उपरना (चद्दर) एक कंधे पर करके, दाहिने जानु को पृथिवी पर रख, जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोड़, भगवान से कहा-“भन्ते ! भगवान् धर्मोपदेश करें,सुगत ! धर्मोपदेश करें। अल्पमल वाले प्राणी भी हैं, धर्म के न सुनने से वह नष्ट हो जायेंगे। (उपदेश करें) धर्म को सुनने वाले भी होवेंगे” 
सहापति ब्रह्माने यह कहा, और यह कहकर यह भी कहा—

"मगध में मलिन चित्तवालों से चिन्तित, पहिले अशुद्ध धर्म पैदा हुआ।
(अब संसार ) अमृत के द्वारको खोलने वाले विमल (पुरुष) से जाने गये इस धर्मको सुने । । 
“पथरीले पर्वतके शिखरपर खड़ा (पुरुष) जैसे चारों ओर जनता को देखे। 
उसी तरह हे सुमेध ! हे सर्वत्र नेत्रवाले ! धर्मरूपी महल पर चढ़ सब जनताको  देखो।
"हे शोक-रहित ! शोक-निमग्न जन्मजरा से पीडित जनता की ओर देखो। 
उठो वीर ! हे संग्रामजित् ! हे सार्थवाह ! उऋण-ऋण ! जग में विचरो, धर्मप्रचार करो, भगवान् ! जाननेवाले भी मिलेंगे।" । 

तब भगवान्ने ब्रह्मा के अभिप्राय को जानकर, और प्राणियों पर दया करके, बुद्ध-नेत्र से लोक का अवलोकन किया। बुद्ध-चक्षु से लोक को देखते हुए भगवान्ने जीवों को देखा, उनमें कितने ही अल्पमल, तीक्ष्ण-बुद्धि, सुन्दर-स्वभाव, समझाने में सुगम प्राणियों को भी देखा। उनमें कोई कोई परलोक और दोष से भय करते, विहर रहे थे। जैसे उत्पलिनी, पद्मिनी (पद्मसमुदाय) या पुंडरीकिनी में से कितने ही उत्पल, पद्म या पुंडरीक उदक में पैदा हुए उदक में बँधे उदक से बाहर न निकल (उदक के) भीतर ही डूबकर पोषित होते हैं। कोई कोई उत्पल (नीलकमल), पद्म (रक्तकमल), या पुंडरीक (श्वेतकमल) उदक में उत्पन्न, उदक में बँधे (भी) उदक के बराबर ही खड़े होते हैं। कोई कोई उत्पल, पद्म या पुंडरीक उदक में उत्पन्न, उदकसे  बँधे (भी), उदक से बहुत ऊपर निकलकर, उदक से अलिप्त (हो) खड़े होते हैं । इसी तरह भगवान्ने बुद्ध-चक्षु से लोक को देखा—अल्पमल, तीक्ष्णबुद्धि, सुस्वभाव, सुबोध्य प्राणियों को देखा जो परलोक तथा बुराईसे भय खाते विहर रहे थे। देखकर सहापति ब्रह्मा से गाथाद्वारा कहा—

‘उनके लिये अमृत का द्वार बंद होगया, जो कानवाले होने पर भी, श्रद्धाको छोड़ देते हैं। 'हे ब्रह्मा ! (वृथा) पीड़ा का विचार कर मैं मनुष्यों को निपुण, उत्तम, धर्म को नहीं कहता था।'

🌹 (6) धर्म चक्र प्रवर्तन 
तब ब्रह्मा सहापति--‘भगवान्ने धर्मोपदेश के लिये मेरी बात मानली' यह जान, भगवान को, अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर वहीं अन्तर्धान हो गये।
उस समय भगवान्के (मनमें) हुआ--"मैं पहिले किसे इस धर्मकी देशना (उपदेश) करू इस धर्मको शीघ्र कौन जानेगा ?" फिर भगवान्के (मनमें ) हुआ—“यह आलार-कालाम पण्डित, चतुर मेधावी चिरकाल से निर्मल-चित्त है, मैं पहिले क्यों न आलार-कालाम को ही धर्मोपदेश दें ? वह इस धर्मको शीघ्र ही जान लेगा।” तब (गुप्त) देवता ने भगवान्से कहा-“भन्ते ! आलार-कालाम को मरे एक सप्ताह हो गया। भगवान्को भी ज्ञान-दर्शन हुआ--"आलार-कालाम को मरे एक सप्ताह हो गया। तब भगवान्के (मनमें) हुआ--"आलार-कालाम महा-आजानीय था, यदि वह इस धर्म को सुनता, शीघ्र ही जान लेता।" 

फिर भगवान्के (मनमें) हुआ--"यह उद्दकरामपुत पण्डित, चतुर, मेधावी, चिरकाल से निर्मल चित्त है, क्यों न मैं पहिले उद्दक-रामपुत्त को ही धर्मोपदेश करू ? वह इस धर्म को शीघ्र ही जान लेगी।' तब (अन्तर्धान) देवता ने आकर कहा--"भन्ते ! रात ही उद्दकरामपुत्त मर गया। भगवान्को भी ज्ञान-दर्शन हुआ।.... उद्दकरामपुत्त महा-आजानीय था, यदि वह इस धर्म को सुनता, शीघ्र ही जान लेता।" 

फिर भगवान्के (मन में) हुआ--"पञ्च-वर्गीय भिक्षु मेरे बहुत काम करने वाले थे, उन्होंने साधना में लगे मेरी सेवा की थी। क्यों न मैं पहिले पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को ही धर्मोपदेश दूँ।" भगवान्ने सोचा--"इस समय पञ्चवर्गीय भिक्षु कहाँ विहर रहे हैं ?" भगवान्ने अ-मानुष विशुद्ध दिव्य नेत्रों से देखा--"पञ्चवर्गीय भिक्षु वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में विहारकर रहे हैं।"

तब भगवान् उरुबेला में इच्छानुसार विहारकर, जिधर वाराणसी है, उधर चारिका (रामत) के लिये निकल पड़े। उपक आजीवक 'ने भगवान् को बोधि (बोध गया) और गया के बीच में जाते देखा । देखकर भगवान्से बोला--"आयुष्मान् (आवुस) ! तेरी इन्द्रियाँ प्रसन्न हैं, तेरी कांति परिशुद्ध तथा उज्वल है। किसको (गुरु) मानकर, हे आबुस ! तू प्रब्रजित हुआ है ? तेरा गुरु कौन है ? तू किसके धर्म को मानता है ?"
यह कहने पर भगवान्ने उपक आजीवकसे गाथा में कहा—
मैं सबको पराजित करनेवाला, सबको जाननेवाला हूँ। 
सभी धर्मों में निलेप हूँ। सर्व-त्यागी (हूँ), तृष्णाके क्षय से मुक्त हूँ। 
मैं अपने ही जानकर उपदेश करूंगा।
मेरा आचार्य नहीं है मेरे सदृश (कोई) विद्यमान नहीं । 
देवताओं सहित (सारे) लोक में मेरे समान पुरुष नहीं । 
मैं संसार में अर्हत् हूँ, अपूर्व उपदेशक हूँ । 
मैं एक सम्यक् संबुद्ध, शान्ति तथा निर्वाण को प्राप्त हूँ । 
धर्म का चक्का घुमाने के लिये काशियों के नगर को जा रहा हूँ।
(वहाँ) अन्धे हुए लोक में अमृत-दुन्दुभी बजाऊँगा ।” 
आयुष्मान् ! तू जैसा दावा करता है उससे तो अनन्त जिन हो सकता है।" 
मेरे ऐसे ही आदमी जिन होते हैं, जिनके कि चित्तमल (आस्रव) नष्ट हो गये हैं। 
मैने बुराइयोंको जीत लिया है, इसलिये हे उपक ! मैं जिन हूँ ।” 
ऐसा कहने पर उपक आजीवक—“होवोगे आवुस !" कह, शिर हिला, बेरास्ते चला गया।

🌹-वाराणसी 
तब भगवान् क्रमशः यात्रा करते हुए, जहाँ वाराणसी में ऋषि-पतन मृगदाव था, जहाँ पञ्चवर्गीय भिक्षु थे, वहाँ पहुँचे। पञ्चवर्गीय भिक्षुओंने भगवान्को, दूर से आते हुए देखा। देखते ही आपस में पक्का किया
“आवुसो ! साधना-भ्रष्ट जोडू बटोरू श्रमण गौतम आ रहा है। इसे अभिवादन नहीं करना चाहिये और न प्रत्युत्थान (सत्कारार्थ खडा होना) करना चाहिये। न इसका पात्र-चीवर (आगे बढ़कर) लेना चाहिये । केवल आसन रख देना चाहिये, यदि इच्छा होगी तो बैठेगा।"

जैसे जैसे भगवान् पञ्चवर्गीय भिक्षुओं के समीप आते गये, वैसे ही वैसे वह.... अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रह सके। (अन्त में) भगवान्के पास जाने पर एकने भगवान्का पात्र-चीवर लिया, एकने आसन बिछाया; एकने पादोदक (पैर धोने का जल), पादपीठ (पैर का पीढ़ा) और पादकठलिका (पैर रगडनेकी लकडी) ला पास रक्खी। भगवान् बिछाये आसनपर बैठे। बैठकर भगवान्ने पैर धोये। उस समय वह लोग भगवान्के लिये ‘आवुस' शब्दको प्रयोग करते थे। ऐसा करने पर भगवान्ने कहा—
भिक्षुओ ! तथागत को नाम लेकर या ‘आवुस' कहकर मत पुकारो। भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध हैं। इधर कान दो, मैंने जिस अमृतको पाया है, उसका तुम्हें उपदेश करता हूँ । उपदेशानुसार आचरण करने पर, जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो सन्यासी होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में शीघ्र ही स्वयं जानकर, साक्षात्कारकर, लाभकर विचरोगे।" । 
“ऐसा कहने पर पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्से कहा--‘आवुस ! गौतम ! उस साधना में, उस धारणा में और उस दुष्कर तपस्या में भी तुम आर्यों के ज्ञानदर्शन की पराकाष्ठा की विशेषता, उत्तरमनुष्य-धर्म (दिव्य शक्ति) को नहीं पा सके; फिर अब साधनाभ्रष्ट, जोडू-बटोरू हो तुम आर्य-ज्ञान-दर्शन की पराकाष्ठा, उत्तर-मनुष्य-धर्म को क्या पाओगे।'' 

यह कहने पर भगवान्ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा--"भिक्षुओ ! तथागत जोडू-बटोरू नहीं हैं, और न साधना से भ्रष्ट हैं, । भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध हैं ०।०.... लाभकर विहार करोगे।
दूसरी बार भी पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्से कहा-“आवुस ! गौतम ०" दूसरी बार भी भगवान्ने फिर (वही) कहा० । 
तीसरी बार भी पञ्चवर्गीय भिक्षुओंने भगवान्से (वही) कहा ०। ऐसा कहने पर भगवान्ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा-“भिक्षुओ ! इससे पहले भी क्या मैंने कभी इस प्रकार बात की है ?"
भन्ते ! नहीं 
“भिक्षुओ ! तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध हैं,…  मैंने जिस अमृतको पाया है, उसका तुम्हें उपदेश करता हूँ । उपदेशानुसार आचरण करने पर, जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो सन्यासी होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में शीघ्र ही स्वयं जानकर, साक्षात्कारकर, लाभकर विचरोगे।"

तब भगवान् पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में समर्थ हुए; और पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान्के (उपदेश) सुनने की इच्छासे कान दिया, चित्त उधर किया।.....
“भिक्षुओ ! साधुको यह दो अतियां सेवन नहीं करनी चाहिये। कौनसी दो ? 
(1) जो यह हीन, ग्राम्य, अनाडी मनुष्यों के (योग्य), अनार्य (-सेवित), अनर्थो से युक्त, कामवासनाओं में लिप्त होना है; और 
(2) जो दुःख (-मय), अनार्य (-सेवित) अनर्थो से युक्त आत्म-पीडा में लगना है। भिक्षुओ ! इन दोनों ही अतियों में न जाकर, तथागत ने मध्यम-मार्ग खोज निकाला है, (जोकि) सब नाशवान् है, यह विरज, विमल धर्मचक्षु उत्पन्न हुआ। 

इस उपदेश के कहे जाने के समय आयुष्मान् कौण्डिन्य को--"जो कुछ उत्पन्न होनेवाला है वह सब नाशवान् है’--यह विरज, निर्मल धर्म का नेत्र उत्पन्न हुआ।
इस प्रकार भगवान्के धर्म के चक्के के घुमाने (धर्म-चक्र के प्रवर्तन करने) पर भूमि के देवताओंने शब्द किया-“भगवान्ने यह वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में उस अनुपम धर्म के चक्के को घुमाया जोकि किसी भी साधु, ब्राह्मण, देवता, मार, ब्रह्मा या संसार के किसी व्यक्ति से रोका नहीं जा सकता।' भूमि के देवताओं के शब्द को सुनकर चतुमहाराजिक देवताओं ने शब्द सुनाया..... चतुमहाराजिक देवताओं के शब्द को सुनकर त्रयस्त्रिंश देवताओं ने.... याम देवताओं ने.... तुषित देवताओं ने.... निमाणरति देवताओं ने.... वशवर्ती देवताओं ने....  ब्रह्म कायिक देवताओं ने.... । इस प्रकार उसी क्षणमें, उसी मुहूर्त में यह शब्द ब्रह्मलोक तक पहुँच गया और यह दस हजारों वाला ब्रह्मांड कंपित, सम्प्रकंपित, संवेपित हुआ । देवताओं के तेज से भी बढ़कर बहुत भारी, विशाल प्रकाश लोक में उत्पन्न हुआ।

तब भगवान्ने उदान कहा-“ओहो ! कौंडिन्य ने जान लिया (आञ्ञा) । ओहो ! कौंडिन्य ने जान लिया।" इसीलिये आयुष्मान् कौंडिन्य का आञ्ञा कौंडिन्य नाम पडा।

** उस समयके नंगे साधुओका एक सम्प्रदाय था। मक्खली
1 वर्तमान सारनाथ, बनारस। गोसाल इनका एक प्रधान आचार्य था।
2 आञ्ञा— ज्ञानी 

#विनयपिटक #Buddha #Dhamma #Sangha #Vipassana #Meditation #Tipitaka #Jataka

 साभार :

https://www.facebook.com/BuddhaVani/

Saturday, May 11, 2019

☀ *सम्मा दिट्ठी सुत्त* ☀

☀ *सम्मा दिट्ठी सुत्त* ☀

                 

       

🎯 Reference :-

 

     *मज्झिम निकाय* 

1. *मूल-पण्णासक*

1. *मूल-पलियाय-वग्ग*

9. *सम्मादिट्ठी सुत्तं*


 ऐसा मैने सुना—

एक समय *भगवान बुद्ध* सावत्थि के अनाथपिण्डक के आराम जेतवन में विहार करते थे।


वहाँ *आयुष्मान सारिपुत्त* ने भिक्खुओं को संबोधित किया— *आवुसो भिक्खुओं* !


*आवुस !* (कह) उन भिक्खुओं ने आयुष्मान *सारिपुत्त* को उत्तर दिया।


  *आयुष्मान सारिपुत्त* ने यह कहा—


*आवुसो* ! 


 *सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)  कही जाती है*


 *आवुसो* ! 


कैसे *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)*

*सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)* होता है? 


उसकी *दिट्ठी सम्यक्* , वह *धम्म* में अत्यन्त *सद्धावान(faithful with Knowledge)* 

(और) इस संद्धर्भ को प्राप्त (होता है)?”


📍*आवुस* ! 

इस भाषण का अर्थ जानने के लिये हम दूर से भी *आयुष्मान सारिपुत्त* के पास आते हैं। अच्छा हो, *आयुष्मान सारिपुत्त* ही इस वचन का अर्थ कहें। *आयुष्मान सारिपुत्त* (के मुख) से सुनकर *भिक्खु* धारण करेंगे।”


📌“तो *आवुसो* ! सुनो, अच्छी तरह मन में करो कहता हूँ।”


📍*अच्छा आवुस* ! (कह) उन *भिक्खुओं* ने *आयुष्मान सारिपुत्त* को उत्तर दिया।


📌 *आयुष्मान् सारिपुत्त* ने यह कहा-


“जब,  *आवुसो* ! 

 *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)* 

*अकुसल( #Bad phenomena )* को जानता है, 

*अकुसल- मूल*  को जानता है; 

*कुसल( #Good phenomena )* को जानता है ; 

*कुसल मूल* को जानता है; 


इतने से *आवुसो* !

 अरिय सावक *सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)* होता है। 


उसकी दिट्ठी सम्यक् (होती है), वह *धम्म* में अत्यन्त *सद्धावान( #faithful with Knowledge)* (और) इस संद्धर्भ को प्राप्त होता है।


🔴 क्या है, *आवुसो* ! 


*अकुसल( #Bad phenomena )* ?


क्या है *अकुसल मूल* ?


 क्या है *कुसल( #Good phenomena )*


क्या है *कुसल-मूल* —? 


   ☸ *आवुसो* !

 (1) *प्राणातिपात* ( #हिंसा=unnecessarily killing ) अकुसल है;


(2) *अदत्तादान*  अदिन्नादान( #चोरी, डकैती ,लूट)  अकुसल है; 


(3) *कामेसुमिच्छाचार* (=Improper way of works by Body& Mind)* काम ( #स्त्री-संसर्ग) में मिथ्याचार ( #दुराचार) .....॰


(4) *मुसावादो* ( #बकवाद,झूँठ Improper speech) मृषावाद ( #झूठ बोलना) .....॰


(5) *पिशुनवचन* ( #चुगली) ॰;


 (6) *परूषवचन* ( #कठोर भाषण) ॰; 


(7) *संप्रलाप* ( #बकवाद) ॰;


 (8) *अभिध्या* ( #लालच) ॰; 


(9) *व्यापाद* ( #प्रतिहिंसा) ॰; 


(10) *मिथ्यादिट्ठी*  (  #False view ,improper view , उल्टी दृष्टि )


—यह *आवुसो* ! 


*अकुसल* ( #bad phenomena ) कहा जाता है।


🌀  क्या है आवुसो!


 *अकुशल-मूल* ?—


(1)  *लोभ* ( #लालच), *आसक्त* ( #attachment) अकुसल-मूल है, 


(2)  *दोस* ( #hatred will )   ....॰ 


(3) *मोह* ( #delusion) अकुसल-मूल है।—


यह *आवुसो* !


*अकुसल-मूल* कहा जाता है। 


क्या है *आवुसो* ! 

  

🌺 *कुसल* (#Good phenomena ) ?—


(1) *प्राणातिपात* ( #हिंसा=unnecessarily killing ) से विरति (= विरत होना) कुसल है; 


(2) *अदत्तादान*  *अदिन्नादान* ( #चोरी, डकैती ,लूट) से विरति ........ ॰


(3) *कामेसुमिच्छाचार* (#Improper way of works by Body& Mind) कामों में मिथ्याचार से विरति ........ ॰


 (4) *मुसावादो* (#बकवाद,झूँठ Improper speech) मृषावाद ( #झूठ बोलना) से विरति .........  ॰


 (5) *पिशुनचवन* से विरति ....... ॰


(6) *परूष-वचन* से विरति ......... ॰


(7) *संप्रलाप* से विरति .......... ॰ 


(8) *अन अभिध्या*  .......... ॰


(9) *अ-व्यापाद*  ॰;


 (10) *सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)* कुसल है।


—यह *आवुसो* ! 


*कुसल* (#Good phenomena ) कहा जाता है। 


🔴 क्या है *आवुसो* !  ---  *कुसलमूल* ?


(1)  *अ-लोभ कुसल-मूल है!*


(2)  *अ-दोस कुसल-मूल है!*


(3)  *अ-मोह कुसल-मूल है!*


—यह आवुसो ! 

*कुसल-मूल कहा जाता है।*  


📌जब *आवुसो* ! 

अरियसावक इस प्रकार *अकुसल* को जानता है, इस प्रकार *अकुसल-मूल* को जानता है। 


📌  इस प्रकार *कुसल* को जानता है। 

इस प्रकार  *कुसल मूल* को जानता है!


(तो) वह राग-अनुशय ( # ॰ मल) का परित्यागकर, 

प्रतिघ (  #प्रतिहिंसा) अनुशय को हटाकर, अस्मि (   #मैं हूँ) इस दृष्टि-मान (  #धारणा के अभिमान)-अनुशय को उन्मूलन कर, *अविज्जा meaning action reaction unknowingly* को नष्ट कर, विद्या को उत्पन्न कर, इसी जन्म मे दुःखो का अन्त करने वाला होता है। 


इतने से भी आवुसो! 

 *अरिय सावक* ( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)

 *सम्मादिट्ठी* ( #Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)  होता है॰। 


📍“ठीक *आवुस* !” (कह) उन भिक्खुओं ने *आयुष्मान सारिपुत्त* के *धम्मदेशना*

(#Dhamma teaching) का साधु‌ अनुमोदन कर, 


☀ आयुष्मान सारिपुत्त 

से आगे का प्रश्न पूछा—क्या *आवुस* ! 

और भी पर्याय ( #प्रकार) है, जिससे कि  *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)*

 *सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)*  होता है ..... ॰ ?”


*आवुसो ! जब आवुसो* ! 


*अरिय सावक आहार को जानता है*

आहार-समुदय ( #आहार की उत्पत्ति) को जानता है, आहार-निरोध ॰, आहार-निरोध-गामिनी प्रतिपद् ( #आहार के विनाश की ओर ले जाने वाले मार्ग) को जानता है। इतने से आवुसो! अरियसावक *सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)*  होता है ॰। 


   🔴 क्या है , *आवुसो* ! 


आहार, क्या है ... आहार-समुदय॰  .... आहार-निरोध...॰ आहार निरोध गामिनी प्रतिपद् °?


— *आवुसो* ! सत्त्वों की स्थिति (और) होने वालों की सहायता के लिये भूतों ( #प्रणियों) के यह चार आहार हैं। 


📌कौन से चार?—

(1) स्थूल या सूक्ष्म कवलिंकार ( #ग्रास करके खया जाने वाला) आहार, 

(2) *फस्स*  ( #स्पर्श )दूसरा,

(3) *मन की संचेतना* ( #ख्याल)  तीसरा, 

(4)  *विञ्ञान*  ( #विज्ञान) चौथा। 


📌 *तण्हा समुदय* ( #उत्पत्ति) (ही) आहार का समुदय है। 


📌 *तण्हा निरोध आहार का निरोध है।* 


यह *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो आहार-निरोध गामिनी प्रतिपद् है* !


  🌺 जैसे कि—

 *दुक्खं निवारणं मग्गो* 

The path of miseries treatment

*अरिय अट्ठंगिको मग्गो* 

*Eightfold factual path*

१- *सम्मा दिट्ठी* 

 #Equanimous View.

*सम्मादिट्ठी* ( #Perfect view)

२- *सम्मा सङ्गकप्पो* 

#Equanimous determination..

३- *सम्मा वाचा* 

 #Equanimous speech..

४- *सम्मा कम्मंतो* 

 #Equanimous acts .

५- *सम्मा आजीवो* 

 #Equanimous profession ..

६- *सम्मा वायमो* 

 #Equanimous effort..

७- *सम्मा सति* 

 #Equanimous attentiveness ..

८- *सम्मा समाधि* 

  #Equanimous unshaken concenrtation of mind 


जब *आवुसो* ! 

 *अरिय सावक* (#वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)

 इस प्रकार आहार को जानता है ॰, तो वह सर्वथा रागानुशय का परित्याग कर ॰ दुःखों का अन्त करने वाला होता है।

 इतने से आवुसो!📍“ठीक आवुस!” 

यह (कह) उन भिक्खुओं ने ॰1 आगे का प्रश्न पूछा—॰1।”


🔴  *आवुसो! जब आवुसो* ! 


 *अरिय सावक* (#वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)

*दुःख* को जानता है, 

*दुःख-समुदय* (= दुःख की उत्पत्ति, या कारण) को जानता है, 

*दुःख-निरोध* को जानता है, (और) 

*दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपद्*  को जानता है; 


तब आवुसो ! *अरियसावक* !


 **सम्मादिट्ठी* ( #Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)  होता है॰1।


🌀 क्या है *आवुसो*!

*दुःख* क्या है, 

*दुःख-समुदय* क्या है 

*दुःख-निरोध* क्या है 

*दुःख निरोध-गामिनी प्रतिपद्* ?

*जरा-मरणं-सोक-परिदेव-दुक्ख-दोमनस्स-उपायासा भी दुःख* है, 

किसी (चीज) की इच्छा करके उसे न पाना (यह) भी दुःख है; 


संक्षेप में *पाँचों उपादान* ( #विषय के तौर पर ग्रहण करने योग्य)  *खन्ध दुःख*  हैं।

 

इसे *आवुसो* ! 


*दुःख कहा जाता है।* 


*क्या है आवुसो ! दुःख-समुदय?*


   🌺  यह जो नन्दी उन उन (भोगों) का अभिनन्दन करने वाली, राग से संयुक्त, फिर फिर जन्म ने की तण्हा है; 


🌀 जैसे कि—


1) *कामभव*

( #sensual pleasure abode  ,छः इन्द्रियों का मजा अथवा दुख वाले निवास ) की तण्हा


2) *रूपभव* (  #fine metrial abode , अस्थूल शरीर काय ), की तण्हा


3) *अरूपभव* (#immaterial abode , शरीर-रहित अवस्था) की तण्हा


—यह *आवुसो* ! 


*दुःख-समुदय कहा जाता है।*


   🔴 क्या है *आवुसो* ! 


   ☸ *दुःख-निरोध* ?

—जो उस तण्हा का संपूर्ण तया विराग, निरोध, त्याग=प्रतिनिस्सर्ग, मुक्ति, अनालय (= उसमें लीन न होना)।


— *यह कहा जाता है आवुसो ! दुःखनिरोध।* 


 क्या है *आवुसो* ! 


___  *दुःखनिरोध-गामिनी प्रतिपद्* ?


___ यह *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰ है। (4) 


जैसे कि- 

(1) **सम्मादिट्ठी* (Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)  ...... 


(8) *सम्मा समाधि* ( #equanimous unshaken-mind , Equanimous=सम्मा meaning towards purity )


 जब आवुसो!  *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक factual follower)*

 इस प्रकार दुःख को जानता है ॰ ॰ 

इतने से आवुसो! ॰।📍“ठीक, आवुस! ॰1।”


☸ *आवुसो! जब आवुसो* ! 

*अरियसावक जरा-मरण को जानता है*....॰  *समुदय* .... ॰ ॰ 

*निरोध* ...॰॰ 

*निरोध गामिनी प्रतिपद् को जानता है*....°

जब *आवुसो* ! ... *अरियसावक*..... ॰1


क्या है *आवुसो* ! 

*जरा-मरण*... ॰ *समुदय*....॰ निरोध, ॰ *निरोध-गामिनी प्रतिपद्* .... ?—


जो उन उन प्राणियों की उन उन प्राणि-शरीरों में जरा ( #बुढापा) जीर्णता, खाण्डित्य ( #दाँत टूटना), पालित्य ( #बाल पकना), वलित्वक्ता ( #झुर्री पडना), आयु-क्षय, इन्द्रिय-परिपाक ( #विकार)।—यह कही जाती है आवुसो! जरा क्या है? 

आवुसो! मरण?—जो उन उन प्राणियों की उन उन प्राणि-शरीरों से च्युति=च्यवन होना, भेद ( #वियोग), अन्तर्धान, मृत्यु, मरण=कालक्रिया, स्कन्धों का विलग होना, कलेवर का निक्षेप ( #पतन)।


   🌺  *यह कहा जाता है आवुसो! मरण।* 


इस प्रकार यह जरा और यह मरण (दोनों मिलकर) *जरा-मरण* होते है। 

*जाति-समुदय*  ( #जन्म का होना) *जरा-मरण-समुदय है*

*जाति-निरोध* (होने से), 

*जरा-मरण-निरोध होता है* । 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*

जरा *मरण निरोध गामिनी प्रतिपद् है* ; जैसे कि ॰1। जब आवुसो! ॰1।”📍ठीक आवुस! ॰1”


📌“आवुसो! जब आवुसो! 

*अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)*

 *तण्हा(libido)* को जानता है...॰ 

*समुदय* .....॰॰        *निरोध*.... ॰॰

 *निरोधगामिनी प्रतिपद्* को जानता है;


 तब आवुसो! "अरियसावक* ॰1। क्या है, 


आवुसो!  *तण्हा(libido)*... ॰ 

*समुदय* ..... ॰ *निरोध* .... ॰

*निरोधगामिनी प्रतिपद्* ?


🔴 — आवुसो !  *तण्हा(libido)* के यह छः आकार (= काया, =समुदाय) हैं—


१) *रूप-तण्हा* ( #libido)

२) *शब्द-तण्हा* (libido)

३) *गन्ध-तण्हा* (libido)

४) *रस-तण्हा* (libido)

५) *फस्स तण्हा* स्पर्श (touch) ( libido)

स्प्रष्टव्य-(  #त्वक् का विषय)-तण्हा, 

६) *धम्म तण्हा(libido)*

 ( #मन के विषय की)-


*वेदना-समुदय* (ही) *तण्हा-समुदय*  है, 

*वेदना-निरोध* (ही) *तण्हा-निरोध* है। 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो* 

*तण्हा-निरोध गामिनी प्रतिपद् है* 

जैसे कि ॰1। जब आवुसो! ॰1।”📍“ठीक, आवुस! ॰1”


📌“आवुसो! 

॰ *वेदना* को जानता है° 

*समुदय* ....॰,.   *निरोध* .....॰

॰ *निरोध-गामिनी प्रतिपद्* को जानता है। 

तब आवुसो! अरियसावक ॰1। 

क्या है, आवुसो! *वेदना, ॰ समुदय, ॰ निरोध, ॰ निरोध गामिनी प्रतिपद्* ?—


   🌺 --- *आवुसो* !


*वेदना के यह छ आकार हैं* —


(1) *चक्खुसम्फस्सजा* - *चक्खु*  (#आंख) के संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली  संवेदना 


(2) *सोतसम्फस्सजा*  -   *सोत* (#श्रोत्र )के 

संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली संवेदना, 


(3) *घानसम्फस्सजा* -  घाण के

संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली संवेदना, 


(4) *जिह्वासम्फस्सजा* -  *जिह्वा* ( #जीभ )

संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली संवेदना, 


(5) *कायसम्फस्सजा*  - *काया* के संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली संवेदना


(6) *मनोसम्फस्सजा* - *मन* के संस्पर्श से उत्पन्न होने वाली संवेदना, । 


🌺१) *चक्खु +रूप (प्रकाश) चक्खुविञ्ञान*


🌺२) °°° *सोत्त +सब्द ---> सोत्तविञ्ञान* !


🌺 ३)  °°° *घाण +गन्ध घाणविञ्ञान*

 


🌺 (४)  °°° *जिह्वा+रस ---> जिह्वाविञ्ञान*


 🌺 ५) °°° *काया+फस्स ( #touch )      

                    --->कायविञ्ञान* 


 *फस्स* ( #touch स्पर्श इन्द्रिय और विषय का संयोग)-समुदय (से ही) वेदना-समुदय (होता है)


*फस्स-निरोध से वेदना-निरोध होता है।*

 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो* वेदना- निरोध गामिनी प्रतिपद् है, जैसे कि ॰1। जब आवुसो ॰1।📍“ठीक आवुस! ॰1।”


🔴 है, *आवुसो* ! 


॰  *फस्स* (स्पर्श teach #इन्द्रिय और विषय का संयोग) को जानता है, ॰ समुदय, ॰॰। 

तब आवुसो! अरियसावक ॰1। 


क्या है  *आवुसो* ! 

*फस्स (स्पर्श teach ) ,  *समुदय* ॰॰।?—


   🌺 *आवुसो* ! 

*फस्स* के यह प्रकार (या समुदाय) हैं

 (1) *चक्खुसम्फस्सो*   _   चक्षुः-संस्पर्श, 

(2)  *सोतसम्फस्सो*     _   श्रोत्र-संस्पर्श, 

(3)  *घाणसम्फस्सो*     _    घ्राण-संस्पर्श,

(4) *जिह्वासम्फस्सो*   _   जिह्वा सस्पर्श, 

(5) *कायसम्फस्सो*    _   काय-संस्पर्श, 

(6) *मनोसम्फस्सो*     _    मनः-संस्पर्श। 


 🌀  *षड्-आयतन* (= चक्खु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय या त्वचा और मन यह छः इन्द्रियाँ)-


*समुदय (ही) स्पर्श-समुदय है।* 


*षडायतन-निरोध से फस्स-निरोध (होता है)।* 


*यही अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*


*फस्स-निरोध-गामिनी प्रतिपद् है* , जैसे कि ॰1। जब आवुसो ॰1।📍“ठीक आवुस! ॰1”


 🌸  *आवुसो* ! 

॰ *षडायतन को जानता है, ॰ समुदय ॰। ॰ ॰ । 

तब आवुसो! अरियसावक*  ॰1। 


क्या है आवुसो ! *षडायतन* ॰ *निरोध* ॰॰?

—आवुसो! यह छ आयतन ( #इन्द्रिय) हैं—

(1) *चक्खु-आयतन* 

(2) *श्रोत्र-आयतन*

(3) *घ्राण-आयतन*

(4) *जिह्वा-आयतन*

(5) *काय-आयतन*

(6) *मन-आयतन*  


*नाम-रूप( #विञ्ञान और रूप वेदना सञ्ञा संखा़र )समुदय* 


*षडायतन-समुदय* है, 


*नाम-रूप-निरोध (ही) षडायतन-निरोध है* ।

 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰1।॰1।

📍“ठीक आवुस! ॰”

    


 “है, आवुसो! 

 *नाम-रूप* को जानता है* ? ॰ *समुदय* ॰॰॰ 


 तब *आवुसो! अरियसावक* ॰1। 


   🔴 क्या है *आवुसो*! 


*नाम-रूप, ॰ निरोध* , ॰ ॰?—

(1) *वेदना* (#संवेदना sensation )

(= विषय और इन्द्रिय के संयोग से उत्पन्न मन पर प्रथम प्रभाव), 


(2)  *सञ्ञा(Perception)* 

(#संज्ञा संवेदना के अनंतर की मन की अवस्था), 


(3) *चेतना* ( #संज्ञा के अनंतर की मन की अवस्था) 


(4) *फस्स*  ( #स्पर्श, teach )


 *नाम संखा़र( #stored /memorised work)* 

*मनसिकार* ( #picked up by mind अर्थात चित्त द्वारा सम्बद्ध इन्द्रिय अनुभव को जानना)


🎯 🎯    *विशेष टिप्पणी*  !  🎯 🎯   


  *वेदना सञ्ञा चेतना फस्स मनसिकारो*


इसे नाम कहा है ,  *अर्हंत अग्र धम्म सेनापती सारिपुत्त* जी ने ।


तो *चेतना फस्स दोनों मिलाकर संखार खन्ध ही के भाग* हैं ,उन्होंने ज्यादा खोलकर कहा है ।

 *मनसिकारो यह है विञ्ञान है !*


क्योंकि 

यहां *सारिपुत्त* के ये वचन हैं जो *भगवा बुद्ध* द्वारा *अनुमोदित* हैं ।


पर *भगवांबुद्ध* जगह जगह 


*नामरूप* को 

*नाम=वेदना सञ्ञा संखार विञ्ञान कहते हैं* 


  (यहां *भन्ते सारिपुत्त* ने 

*संखार के दो चेतसिकों , चेतना और फस्स (  #volition & contact/touch)*  को दिखाया है ।

और

*विञ्ञान* की जगह 

*मनसिकारो* ( #consciousness arises  known by mind) को दर्शाया है जो कि अभिधम्म अनुसार ज्यादा खोलकर समझाया हैं !


🔴 —यह *आवुसो* !

 नाम हैं। चार महाभूत और चार महाभूतों को लेकर (बने) रूप, आवुसो रूप कहा जाता है। 

इस प्रकार यह नाम, (और) यह रूप, (दोनों मिलकर) 


🌺आवुसो ! *नाम-रूप* कहा जाता है।

 *विञ्ञान* ( #Eternal Energy)

 *विञ्ञान-समुदय नाम-रूप-समुदय है।* 

 *विञ्ञान-निरोध, नाम-रूप-निरोध है।* 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰1। ॰1।

“ठीक आवुस! ॰1”


 🔴 है, आवुसो! ॰ 

विञ्ञान को जानता है, ॰ समुदय, ॰ ॰। 

तब आवुसो! अरियसावक ॰1। 


क्या है आवुसो! *विञ्ञान, ॰ समुदय* ॰ ॰? 


   ☸ — *आवुसो* ! 

*यह छ विञ्ञान के समुदाय (= काय) हैं* —

(1)  *चक्खु-विञ्ञान*

(2)  *श्रोत्र-विञ्ञान*

(3)  *घ्राण-विञ्ञान* 

(4)  *जिह्वा-विञ्ञान*

(5)  *काय-विञ्ञान* 

(6)  *मनो-विञ्ञान* 

*सखा़रं-समुदय विञ्ञान-समुदय है!* 

*सखा़रं-निरोध विञ्ञान-निरोध है।* 

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो* ॰1। ॰1।

📍“ठीक आवुस! ॰1”


📌 *आवुसो* ! ॰

 सखा़रं को जानता है। ॰ समुदय, ॰ ॰। 

तब आवुसो! *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक  factual follower)* ॰1। 


 🌸  क्या है आवुसो! 

सखा़रं, (= क्रिया, गति) ॰ समुदय, ॰ ॰?—

आवुसो! यह तीन सखा़रं है—

(1)  *कायसखा़रं*  - काय-संस्कार, 

(2)  *वाचासखा़रं*    - वचन-संस्कार, 

(3)  *चित्तसखा़रं*     - चित्त-संस्कार, 

*निरोध* है। यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰1। ॰1।📍“ठीक आवुस! ॰1”


📌 *आवुसो* ! 

॰ *अविज्जा meaning action reaction unknowingly* को जानता है, ॰ समुदय, ॰ ॰। 

तब आवुसो!  *अरिय सावक( #वास्तविक अनुगमक factual follower)* ॰1।


 क्या है आवुसो *अविज्जा* , ॰ समुदय, ॰ ॰?


  🔴  —आवुसो ! 

जो यह *दुःख के विषय में अविज्जा* , 

*दुःख समुदय के विषय में अविज्जा* , *दुःख-निरोध के विषय में अविज्जा* , *दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपद् के विषय में अविज्जा*


--- इसे *आवुसो* ! 

*अविज्जा meaning action reaction unknowingly* कहा जाता है। 


*आस्रव-समुदय अविज्जा-समुदय है।* 

*आस्रव-निरोध अविज्जा-निरोध है।*

यही *अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰1। ॰1।

📍“ठीक आवुस! ॰1”


🌺     है, *आवुसो* ! ॰

 *आस्रव ( #चित्तमल) को जातना है*....०

॰ समुदय ॰ ॰। 

तब आवुसो! अरियसावक ॰1। 


क्या है आवुसो! आस्रव, ॰ समुदय ॰ ॰?—


*आवुसो* ! यह तीन आस्रव हैं—

(1) *काम-आस्रव* , 

(2) *भव-आस्रव*  ( #पुनब्भव ) 

(3) *अविज्जा-आस्रव।* 


*अविज्जा-समुदय आस्रव-समुदय है*

*अविज्जा-निरोध आस्रव-निरोध है।* 

*यही अरिय अट्ठङ्गिको मग्गो*  ॰1।


📌  इतने से आवुसो !  

*अरिय सावक* ( #वास्तविक अनुगमक 

 factual follower)

 **सम्मादिट्ठी(Equanimous View / Perfect view ; ठीक सिद्धांत वाला)  होता है, उसकी दिट्ठी सम्यक् (होती है), वह धम्म मे अत्यन्त *सद्धावान( #faithful with Knowledge)* , (और) इस संद्धर्भ को प्राप्त होता है।”


🌺 *आयुष्मान् सारिपुत्त* ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन *भिक्खुओं* ने आयुष्मान सारिपुत्त के *धम्मदेशना* का *साधु अनुमोदन* किया।


 *साधु साधु साधु*  ! 🙏🙏🙏


📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌


     *परिशिष्ट (Appendix)*


     

  🔴 १-*अविज्जा* (=५२चेतसिक विञ्ञान में से एक ,जो कि चित्त-विञ्ञान के सहगत रहता है और जिसका काम है ढंकना अथवा तथ्य को छुपाना)

के *पच्चया(=assimilation)* अर्थात कारण से 

*सङ्खारा/संखारा* (=impressions into consciousness) उत्पन्न होते हैं ।


🔴 २-*सङ्खारो/संखारो* ( #संस्कारों) के  *पच्चया(  #assimilation)* से *विञ्ञान(  #नया चैतन्य तत्व ,new conscious waves)*,  

  

🔴 ३- *विञ्ञान* ( #conscious waves ) के *पच्चया( #assimilation)* से *नाम-रूप* 


🔴 ४- *नाम-रूप( #body & mind)* के *पच्चया( #assimilation)* से *सळायतन* ( #षडायतन,six organ system of body) 


🔴 ५- *सळायतन के पच्चया* (#assimilation) से *फस्स* (#स्पर्श)  

                     

🔴 ६- *फस्स के पच्चया* (  #assimilation) से *वेदना* (=sensations of pleasure ,pain & neutral)                         


🔴 ७- *वेदना के पच्चया*

( #assimilation) से *तण्हा* (=libido,तृष्णा)                          


🔴 ८- *तण्हा* (libido) के *पच्चया(=assimilation)*  *उपादान* (=आसक्ति,addiction),         


🔴 ९- *उपादान के पच्चया* (=assimilation) से *भव(=happening, changing to new)*                         


🔴 १०- *भव(=changing to new) के पच्चया(=assimilation) से *जाति* (=new form, new stage of body&mind )*                             


🔴११- *जाति के पच्चया*(=assimilation) से *जरा मरणं, सोक, परिदेव, दुक्ख दोमनस्सुपायासा* (बुढा़पा, मृत्यु, शोक, परिदेव, दु:ख-दौर्मनस्य एवं उपायास) उत्पन्न होते हैं। 


इस प्रकार इस समस्त *दुक्ख-खन्ध(रूपनाम ,body&life) का समुदय ( #पुराने का नया उत्पाद) होता है।*  


 🌺पटिच्चसमुप्पाद भव चक्क🌺


          अविज्जा 

    🔄               🔄

संखा़र              जरा-मच्चु 

🔃                      🔃

विञ्ञान               जाति

🔃                      🔃

नामरूप                भव

🔃                      🔃  

षडायतन            उपादान

🔃                     🔃

फस्स                   तण्हा ((libido)

     🔄            🔄

            वेदना  

      (Sensations)


📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌📌


🌺 *साधु साधु साधु*  ! 🙏🙏🙏


 ☸ *धम्म चक्क गतिमान* ! ☸


  ⚜ *जय मङ्गल धम्म* ! ⚜


  ☸ *नमो बुद्धाय* ! 🙏🙏🙏

Monday, October 15, 2018

लखनऊ में पहली बार अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन



7-8 नवम्बर'2018 को लखनऊ में पहली बार आयोजित होने जा रहे अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन की तैयारियाँ अन्तिम चरण में। पूरे प्रदेश में धम्मसेवक, धम्मसेविकाएं जनसम्पर्क अभियान पर रवाना। प्रवेश के लिए पंजीकरण अनिवार्य। प्रवेश सिर्फ और सिर्फ सफेद व शालीन वस्त्रों में।
विस्तृत जानकारी के लिए सम्पर्क करें:
श्री राकेश कुमार(8687198572)
श्री एम पी गौतम(9532674422)
श्री अवधेश कुमार(8707770810)
श्रीमती समृद्धि(9795140505)
सुश्री ज्योति भारती(6386955501)
श्रीमती नीलू(9450622071)



श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Saturday, October 13, 2018

।।स्वर्ग-नरक।। -श्री राजेश चन्द्रा-

।।स्वर्ग-नरक।।
-राजेश चन्द्रा-
जापान के सुप्रसिद्ध ज़ेन गुरु हुए हैं हकुईन। जापानी ज़ेन परम्परा में हकुईन सर्वाधिक पूजनीय गुरुओं में से एक हैं।
एक दिन एक विख्यात सामुराई, तलवारबाज, नोबूशिगे गुरु हकुईन के दर्शन करने आया। उसने गुरु के सम्मुख सिर झुका कर अभिवादन किया। अभिवादन के उपरान्त उसने अपने मन की एक जिज्ञासा व्यक्त की- क्या सच में स्वर्ग और नरक होते हैं?
यह सुन कर गुरु हकुईन ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है?
'नोबूशिगे'
'करते क्या हो?'
'जी, मैं सामुराई हूँ, तलरवारबाज'
'सामुराई!', हकुईन ने विस्मय से पूछा,' तुम्हें सामुराई किसने बना दिया? तुम्हारा चेहरा तो भिखारियों जैसा है!' यह सुनते ही नोबूशिगे का चेहरा तमतमा गया और उसका हाथ अपनी तलवार की मूठ पर गया।
हकुईन ने कहा- अच्छा, तो तुम्हारे पास तलवार भी है! लेकिन दुनिया की कोई तलवार हकुईन की गर्दन नहीं काट सकती।
नोबूशिगे ने तलवार म्यान के बाहर निकाल ली।
हकुईन मुस्कराए, कहा- देखो, नरक का द्वार खुल गया।
सामुराई को अहसास हो गया कि यह गुरु का अपना तरीका है उसके सवाल का जवाब देने का। उसने शर्मिन्दा होकर तलवार अपनी म्यान में सरका ली और सिर झुकाया जैसे कि क्षमा मांग रहा हो।
हकुईन फिर मुस्कराए, कहा- देखो, स्वर्ग का द्वार खुल गया।
नोबूशिगे अपने प्रश्न का उत्तर पा चुका था।

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Thursday, October 4, 2018

सत्कर्मो से सद्गति

"सत्कर्मो से सद्गति"


किसी गांव के एक मुखिया ने भगवान बुद्ध से पूछा कि लोग सुगति प्राप्त करने के लिए बहुत से कर्मकांड करते हैं, अनेक प्रकार की वेश-भूषा, माला-गंध-विलेपन धारण करते हैं, अनेक प्रकार से अग्निपरिचय व अन्य कर्मकांड करके समझते हैं कि हमने सब कुछ कर लिया। कुछ ऐसे भी हैं जो निम्न कोटि की तांत्रिक साधना करके किसी प्रेत-प्राणी से बात करते हैं और उसके द्वारा लोगों को स्वर्ग ले जाने का दावा करते हैं। भगवान आप तो सर्वज्ञ हैं। आप भी कुछ ऐसा करें जिससे कि संसार के समस्त प्राणी मरणोपरांत सुगतिमय लोक में ही जा सकें।

भगवान ने उससे ही प्रश्न पूछ कर समझाने का प्रयत्न किया। तुम क्या समझते हो कि कोई व्यक्ति जीव-हिंसक हो, चोरी करता हो, विभिचारी हो, असत्यभाषी हो, चुगलखोर हो, कर्कशभाषी (रूखा) हो, गप्पी हो, लोभी हो, नीचवृत्ति का हो, मिथ्यादृष्टियुक्त हो, तो क्या वह सुगतिमय लोक में जाने लायक है? अथवा उसके मर जाने पर बहुत से लोग वहां एकत्र होकर प्रार्थना करें, हाथ जोड़कर वंदना करें कि आप सुगतिगामी हों, सुगतिमय लोक में उत्पन्न हों तो क्या ऐसा करने पर वह सुगतिमय लोक में उत्पन्न हो सकता है? नहीं, मरणोंपरांत किया जाने वाला कोई भी कर्मकांड किसी को मुक्ति नहीं दे सकता। यह असंभव है।

एक उदाहरण से समझो। किसी बड़े जलाशय में कोई बड़ी पत्थर की शिला छोड़ दे और वह अपने भार से पानी में डूब जाय। तो क्या समझते हो कि किसी विशाल जनसमूह के प्रार्थना करने, मनौती मनाने और पूजा-पाठ या कोई अन्य कर्मकांड करने से क्या वह भारी शिला पानी पर तैरने लगेगी ?
ऐसे ही कोई व्यक्ति घी-तैल से भरे हुए घड़े को पानी में लाकर फोड़ दे और उसका घी, तैल पानी पर तैरने लगे और किसी दूसरे घड़े में कंकड़-पत्थर भर कर उसे भी फोड़े और वे अपने भार से पानी में डूब जायें। तब कोई प्रार्थना करके, पूजा-पाठ करके, कर्मकांड करके कहे कि ऐ घी तुम नीचे चले जाओ, नीचे चले जाओ! ऐ कंकर-पत्थर तुम ऊपर आ जाओ, ऊपर आ जाओ! यदि ऐसा होता हो तो करके देखो।

हे ग्रामणी! इसी प्रकार कोई व्यक्ति यदि प्राणीहिंसा से, चोरी से, व्यभिचार, असत्यभाषण आदि दुष्कर्मों से विरत रहता है और सत्यधर्म का जीवन जीता है तो मरणोपरांत वह ऊपर ही जायगा। उसकी ऊध्र्वगति ही होगी। किसी का श्राप उसे नरक के कष्टमय जीवन में नहीं भेज सकता। उसका सत्कर्म ही उसे ऊपर ले जायगा। उसे ऊपर की ओर जाने से कोई नहीं रोक सकता। यह प्रकृति का अटूट नियम है।

ऐसे ही किसी अन्य प्रसंग पर भगवान से पूछा गया कि भगवान क्या आप सब पर समान रूप से करुणाभाव रखते हैं, दयाभाव रखते हैं? यदि हां, तो किसी को बहुत लाभ होता है, किसी को मध्यम लाभ होता है और कोई-कोई धर्मलाभ से वंचित ही रह जाता है, ऐसा क्यों? आपकी मंगलमय करुणा का प्रभाव सब पर एक जैसा क्यों नहीं होता?

भगवान ने उसे एक किसान का उदाहरण देकर समझाया कि उसके पास तीन प्रकार की जमीन है- १) बहुत उपजाऊ, २) मध्यम उपजाऊ, ३) बिल्कुल ऊसर-बंजर। ऐसे में वह सबसे पहले उपजाऊ जमीन में बीज डालता है, उसके बाद मध्यम में और सबसे अंत में ऊसर-बंजर जमीन में। बीज वही होता है और उतनी ही मेहनत व लगन से डाला जाता है। लेकिन फसल एक सी नहीं होती। इसी प्रकार मेरे पास भी तीन प्रकार के लोग धर्म सीखने आते हैं। एक तो बहुत गंभीर साधक-साधिकाएं, जो उपजाऊ जमीन के समान हैं। उनमें जो बीज पड़ेगा, तुरंत फलदायक होगा। क्योंकि वे पूरी श्रद्धा और लगन के साथ काम में लग जाते हैं। दूसरे सामान्य गृहस्थ उपासक-उपासिकाएं, जो अपने दैनिक सांसारिक कार्यों में लगे रहते हुए भी धर्म सीखते हैं। वे मध्यम खेत के समान हैं। उनमें श्रद्धा और लगन तो है परंतु जीवन-जगत की अनेक बाधाएं भी हैं। फिर भी वे धर्ममार्ग पर चल कर अपना मंगल साधते ही हैं। तीसरे कुछ ऐसे लोग जो ऊसर-बंजर जमीन जैसे हैं। उपदेश तो उन्हें भी मैं वैसे ही देता हूं, परंतु अपने कर्मकांडों और अन्य जंजालों में उलझे होने के कारण वे धर्म को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाते। वे जितना सीख ले, समझ लें और जितना अभ्यास कर लें, उन्हें केवल उतना ही लाभ होता है। कोई-कोई केवल सुन कर चला जाता है, जरा भी अभ्यास नहीं करता तो वह धर्म से सर्वथा वंचित रह जाता है। परंतु मेरी करुणा उन सब के प्रति सदैव उतनी ही रहती है।

भगवान ने एक और उदाहरण देकर समझाया कि किसी के पास तीन घड़े हों। एक बिल्कुल छिद्ररहित, दूसरा सूक्ष्म छिद्रों वाला और तीसरा बड़े छिद्र वाला। वह सबसे पहले बिना छिद्र वाले घड़े में पानी भरता है, जो दिन भर उसके काम आता है। फिर दूसरे में भरता है कि भले दिन भर न चले, पर कुछ समय तक तो उससे जल मिलता ही है। तीसरा घड़ा वह इसलिए भरता है कि जितना भी पानी एकत्र हो जाय वह नहाने अथवा कपड़ा-बर्तन धोने के काम आ जाय।
बहुत गंभीर साधक-साधिकाएं पहले घड़े के समान हैं। दूसरे घड़े के समान वे सामान्य उपासक-उपासिकाएं हैं जो कठिनाई होते हुए भी धर्म को धारण करते हैं। अन्यान्य कर्मकांडों में उलझे हुए लोग वैसे ही हैं जैसे तीसरे घड़े में भरा हुआ पानी। वे जितना ग्रहण कर लें, अभ्यास कर लें, उन्हें बस उतना ही लाभ होगा। यद्यपि मेरी दया और करुणा तो सब के प्रति समान ही रहती है।

भगवान द्वारा उपदेशित इन उदाहरणों से सबक लेकर साधको! आओ, हम भी धर्ममार्ग पर उपजाऊ क्षेत्र बन कर, श्रद्धा और लगन के साथ पांचों शीलों का कड़ाई से पालन करते हुए, सम्यक समाधि को पुष्ट करें और अनित्यबोधिनी प्रज्ञा का गहराई से अभ्यास करते हुए अपने सदाचरण के बल पर अपनी सुगति निश्चित करें। इसी में हमारा मंगल है, कल्याण है!

- कल्याणमित्र, सत्यनारायण गोयन्का

Friday, August 10, 2018

।।ओकास।।- श्री राजेश चन्द्रा-

।।ओकास।।
-राजेश चन्द्रा-
बौद्धों में एक बड़ी प्यारी परिपाटी है कि जब श्रद्धालु उपासक-उपासिकाएं धम्म कार्य के लिए एकत्रित होते हैं तो पूजा-वन्दना-परित्त की शुरूआत 'ओकास' से करते हैं। 
यह विनय का पारम्परिक अंग है कि यदि ऐसे अवसर पर कोई पूज्य भिक्खु या भिक्खुगण अथवा कोई बौद्ध आचार्य उपस्थित हैं तो उपासकगण सर्वप्रथम हाथ जोड़कर, भिक्खु अथवा आचार्य के सामने हो कर कहते हैं:

'ओकास!'

पारम्परिक रूप से पूरी गाथा कुछ इस तरह होती है:

ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

दुतियम्पि ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

ततियम्पि ओकास! अहं भन्ते,

तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि। 
अनुग्गहं कत्वा सीलं देथ मे भन्ते।।

इन गाथाओं में पहला शब्द है 'ओकास!', इसके बाद की पंक्ति में याचना है:

त्रिशरण और पंचशील सहित धम्म की याचना करता हूँ, अनुगृह कीजिए, भन्ते जी, शील प्रदान कीजिये।

दूसरी बार भी 'ओकास!',

फिर वही याचना और अनुगृह प्रार्थना।

और तीसरी बार भी 'ओकास!',

फिर उपरोक्तानुसार वही याचना और अनुगृह प्रार्थना।

यह याचना-प्रार्थना अनिवार्य रूप से सिर्फ भन्ते के लिए ही नहीं है बल्कि यदि कोई आचार्य हैं तब 'भन्ते' के स्थान पर 'आचरियो' शब्द का प्रयोग करेंगे, भिक्खुनी है तो 'अय्या' सम्बोधन प्रयोग करेंगे । यदि कोई भी नहीं है तब भगवान की प्रतिमा के सम्मुख यही याचना की जाती है। भारत के पारम्परिक बौद्ध समाजों में ये परम्पराएं जीवित हैं जैसे असम, अरुणाचल, मणिपुर, बंगाल, लद्दाख इत्यादि के बौद्ध समाजों में।अस्तु।
याचना की प्रक्रिया में सबसे प्यारा शब्द है- ओकास।
यह पालि भाषा का शब्द है जिसका सहज-सा अर्थ है- अवकाश।
पालि शब्दकोश में इसके और भी समानार्थी अर्थ दिये हैं- अनुज्ञा, अनुमति, स्थान, इजाज़त इत्यादि लेकिन मौलिक रूप से यह 'अवकाश' शब्द का पालि संस्करण है।
धम्म के जानकार से अवकाश मांगना अर्थात उससे समय मांगना। यदि इसे अंग्रेजी में कहें तो यह लगभग ऐसा होगा- Venerable Bhanteji, please give me time- पूज्य भन्ते जी, कृपया मुझे समय दीजिए।
समय ले कर बात करना, मुलाकात करना, इस परिपाटी की शुरूआत भगवान बुद्ध के द्वारा की गयी जो कि बौद्धों के समस्त धार्मिक विधानों का एक विनय है, अनिवार्य अंग है।
जैसे राह चलते किसी व्यक्ति से हमें कोई पता पूछना हो तो हम बड़ी विनम्रतापूर्वक पूछते हैं। सर्वप्रथम तो हम उस व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं- भाई साहब या बहन जी, सर या मैडम कह कर उन्हें उन्हें अपनी ओर मुखातिब करते हैं...
यह जो अपनी ओर मुखातिब करना है, विनम्रतापूर्वक ध्यानाकर्षित करना है यही अवकाश मांगना है, यही ओकास है...
ओकास अथवा अवकाश का ठीक-ठीक अर्थ मात्र समय मांगना भी नहीं है क्योंकि 'समय' शब्द भी पहले से ही पालि भाषा में मौजूद है। यदि आशय मात्र समय मांगना भर होता तो 'समय! अहं भन्ते' ऐसा उद्बोधन होता न कि 'ओकास! अहं भन्ते'।
ओकास अथवा अवकाश की याचना का अर्थ मात्र समय मांगना भर भी नहीं है बल्कि सम्पूर्ण चेतना में अवकाश मांगना है, अपनी जिज्ञासा समाधान, अपनी स्वीकृति के लिए अवकाश मांगना है, अंग्रेजी में कहें तो स्पेस मांगना है। स्पेस में टाइम अन्तर्निहित है।
कोई व्यक्ति अपने विचारों में मग्न है, जाने क्या चिन्तनधारा चल रही है, हम उसे टोकते हैं, रोकते हैं- भाई साहब, कृपया मुझे...
इतना बोलते ही हम उसकी चिन्तनधारा में अवरोध पैदा करते हैं, लेकिन ऐसा हमारा इरादा नहीं होता, अवरोध पैदा करना मकसद नहीं होता, बल्कि अपना लक्ष्य पाना हमारी जरूरत और व्याकुलता होती है क्योंकि हम किसी पते के लिए भटक रहे हैं। इसीलिए हमारे सम्बोधन में विनम्रता होती है और हमारी देह भाषा- बाडी लैंग्वेज- में भी याचना होती है, क्योंकि हम पता भर नहीं पूछ रहे हैं बल्कि उसकी चिन्तनधारा में, उसकी चेतना में भी थोड़ा-सा अवकाश मांग रहे हैं। दरअसल पता पूछने से पहले अप्रत्यक्ष रूप से बिना कहे ही हम एक निवेदन और कर रहे हैं- भाई साहब, आप जिन विचारों या भावनाओं में संलग्न हैं कृपया उसे थोड़ी देर के लिए विराम दे कर मेरी तरफ ध्यान दीजिए। वास्तव में हम ऐसा कहते नहीं हैं लेकिन हमारा अप्रत्यक्ष आशय यह भी होता है। बस में, ट्रेन में सफर करते समय हमें बैठने की जगह चाहिए होती  है तब वह भी ओकास है, अवकाश मांगना है, जगह मांगना, बैठने का स्थान मांगना। तब भी हमारी भाषा, देह भाषा विनम्रतापूर्ण होती है।
यह तो एक लौकिक उदाहरण मात्र हैं। जब हम धम्म के मार्ग पर चलने को प्रतिबद्ध होते हैं, धम्म मार्ग का पता जानना चाहते हैं, धम्म के क्षेत्र में मार्गदर्शन चाहते हैं तब तो हमारी विनम्रता व याचना पराकाष्ठा की होनी चाहिए।
मात्र इतना ही नहीं बल्कि आगे की पंक्तियाँ और भी गहरा विनय प्रदर्शन करती हैं- अनुग्गहं कत्वा- मुझ पर अनुगृह कीजिए। मात्र एक बार नहीं, दो बार नहीं बल्कि ऐसी विनम्र याचना तीन बार करने की परिपाटी है। तीन बार इसलिए कि हम शरीर से, वाणी से और मन से 'तिसरनेन सह पंचसीलं धम्मं याचामि' अर्थात त्रिशरण सहित पंचशील और धम्म की याचना करता हूँ या करती हूँ...
आगे हम पुनः कहते हैं- अनुग्गहं कत्वा- अनुगृह कीजिए- सीलं देथ मे भन्ते- भन्ते जी, मुझे शील प्रदान कीजिये।
बुद्ध का धम्म दुनिया का अनूठा धर्म है जो धम्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रथम स्थान शील को देता है, इस लिए बौद्ध पूजा पद्धति में कोई मंत्र नहीं मांगता, कोई आरती-भजन नहीं मांगता, कोई पंचामृत-चरणामृत नहीं मांगता, बल्कि पहला कदम है- पंचसीलं धम्मं याचामि- पंचशील व धम्म की याचना करता हूँ...
याचना करने से भी पहले हम अवकाश मांगते हैं, स्पेस चाहते हैं, ओकास...
किसी की जिन्दगी में स्पेस मिले बिना, अवकाश मिले बिना उससे हमारा कोई रिश्ता क़ायम नहीं हो सकता। धम्म के लिए अवकाश मांगना एक आध्यात्मिक रिश्ता क़ायम करता है।
हम जिससे याचना कर रहे हैं, और याचना भी पैसे-कौड़ी, धन-सम्पदा जैसी लौकिक चीज़ों के लिए नहीं है, बल्कि सर्वोत्तम रत्न धम्म की याचना कर रहे हैं, तो प्रदाता की चेतना में हमारे लिए अवकाश भी होना चाहिए, उनके दिल में हमारे लिए जगह भी होनी चाहिए, इसलिए सर्वप्रथम हम 'ओकास' कहते हैं, कि हमें अवकाश दीजिए, अपनी चेतना में, अपने मन में, अपने ह्रदय में जगह दीजिए... एकबार ह्रदय में जगह मिल जाए तो फिर सबकुछ मिल जाता है...
अंजलीबद्ध मेरे हाथ जब भगवान की प्रतिमा के सामने उठते हैं तो विकल स्वर में कह उठता हूँ- ओकास... भगवान, इस अकिंचन को अपने दिल में जगह दे दीजिए... आंखों में आंसू छलक आते हैं, तो जैसे प्रतिमा बोल पड़ती है- अप्पमादेन सम्पादेथ- अप्रमादपूर्वक धम्म का सम्पादन करो...
भगवान! ओकास...

शास्ता! ओकास
बिना आपके और
न कोई आस

रहे विश्वास
आपके चरणों का
मैं हूँ दास

करिये नाश
संसार बन्धनों के
काटिये पाश

जन्मों की प्यास
रूखा है कण्ठ मेरा
मन उदास

सारे प्रयास
आ जाऊँ भगवान
तुम्हारे पास

शास्ता! ओकास...

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

।।104 साल बाद।।-राजेश चन्द्रा-

।।104 साल बाद।।
-राजेश चन्द्रा-



भगवान बुद्ध द्वारा प्रदत्त कम्मट्ठान अर्थात ध्यान-साधना के आलम्बन का निष्ठापूर्वक अभ्यास करते हुए लकुण्टक भद्दिय अरहत हो गये। वह भगवान का दर्शन करने आए। भगवान की वन्दना की। जब वह धम्मसभा से उठ कर जा रहे थे, बड़े मद्धम पगों से चलते हुए, तब भगवान ने उन्हें संकेतित करते हुए भिक्खुओं को सम्बोधित कर कहा: "पस्सथ भिक्खवे, अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", वह देखो भिक्खुओं, यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।"

"माता-पिता की हत्या करके यह भिक्खु दुःख मुक्त हो गया है", भगवान का यह कथन सुनकर सारे भिक्खु एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।
वे इस गूढ़ कथन का अर्थ समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि भगवान ने गाथाओं का संगायन करके और हैरान कर दिया:

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये।
रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो।।

- माता-पिता और दो क्षत्रिय राजाओं की हत्या कर तथा राष्ट्र को विनष्ट कर एवं अनुचर की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये।
वेय्यग्घपञ्चमं हन्त्वा अनीघो याति ब्रामणो।।

-माता-पिता और दो श्रोत्रिय राजाओं की हत्या कर तथा पांच बाघों की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

इन गाथाओं को ठीक-ठीक शाब्दिक अर्थों में लिया जाय तो ये बड़ी भ्रमित करने वाली हैं। न केवल भ्रमित करने वाली बल्कि अर्थ का अनर्थ करने वाली भी। लेकिन भगवान का कथन प्रतीकात्मक है।
सम्पूर्ण त्रिपिटक में अनेकानेक प्रसंग ऐसे हैं जब भगवान प्रतीकों की भाषा में उपदेश करते हैं। दीघनिकाय का सीगाल सुत्त प्रतीकवाद का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक लोकप्रिय उदाहरण है जिसमें भगवान युवक सीगाल को छः दिशाओं के अर्थ समझाते हैं- पूर्व दिशा अर्थात माता-पिता, पश्चिम दिशा भार्या व बच्चे, उत्तर दिशा यानी मित्र एवं परिजन, दक्षिण दिशा अर्थात गुरू व आचार्य, नीचे की दिशा यानी अनुचर-परिचर-आश्रित तथा ऊपर की दिशा अर्थात अरहत-श्रमण। यह वह युवक है जो अपने दिवंगत पिता के कथनानुसार भोर में छः दिशाओं की वन्दना कर रहा था। भगवान ने उसे छः दिशाओं के प्रतीक अर्थ बताए और उनके सेवन की विस्तृत विधि बतायी। दीघनिकाय अर्थात दीर्घ यानी लम्बे प्रवचनों का संग्रह। यह सीगाल सुत्त दीघनिकाय में है। प्रतीकवाद की पराकाष्ठा देखना हो तो मज्झिम निकाय का वम्मीक सुत्त देखिये। उन प्रतीकों के अर्थ जान कर कुमार काश्यप अरहत हो गये।

यहाँ लकुण्टक भद्दिय के सन्दर्भ में इन गाथाओं को सुन कर भी धम्मसभा में बैठे भिक्खुओं में कोई स्रोतापन्न हो गया, कोई सकृतगामी, कोई अनागामी तो कोई अरहत। खुद्दकनिकाय के धम्मपद अट्ठकथा पकिण्णकवग्गो में की इन गाथाओं के सन्दर्भ में ऐसा ही उल्लेख है।

आचार्य अश्वघोष ने अट्ठकथाओं की टीकाओं में इन गाथाओं की बड़ी प्यारी और सटीक प्रतीक व्याख्या की है।
लकुण्टक भद्दिय को संकेतित करते हुए भिक्खुओं को सम्बोधित कर भगवान कहते हैं: "पस्सथ भिक्खवे, अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", वह देखो भिक्खुओं, यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।"

शब्दावली ध्यान देने योग्य है-"निद्दुक्खो हुत्वा" कि वह दुःख मुक्त हो गया है। और हुआ कैसे? माता-पिता की हत्या करके। माता-पिता कौन होते हैं? वे जन्मदाता होते हैं। आध्यात्मिक अर्थों में दुःख की जननी कौन है? दुःख की जननी तृष्णा है। दुःख का जनक कौन है? अस्मिमान अर्थात 'मैंपन' अथवा अस्मिता यानी अहंकार। तो दुःख के माता-पिता कौन हुए? माँ तृष्णा और पिता अहंकार।
अब इन प्रतीक अर्थों को सामने रख कर भगवान के कथन को देखिये:"अयं भिक्खु मातापितरो हन्त्वा निद्दुक्खो हुत्वा याति", यह भिक्खु माता-पिता की हत्या करके दुःख मुक्त हो गया है।" अर्थात तृष्णा और अहंकार की हत्या करके यह भिक्खु दुःख मुक्त हो गया है।
भगवान के द्वारा संगायित गाथाओं में माता-पिता, क्षत्रिय राजा, श्रोत्रिय राजा, राष्ट्र, अनुचर, बाघ, ब्राह्मण इन शब्दों का लौकिक अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सारे आध्यात्मिक प्रतीक हैं।

माता= तृष्णा
पिता=अहंकार
दो क्षत्रिय राजा अथवा दो श्रोत्रिय राजा = शाश्वतवादी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि
राष्ट्र= पांच उपादान स्कन्ध
अनुचर=राग
पांच व्याघ्र= ज्ञान के पांच आवरण
ब्राह्मण= मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्खा इन चार ब्रम्ह विहारों में सुप्रतिष्ठित व्यक्ति

संसार का सारा प्रपंच, जन्म-जरा-मरण, रोग-शोक-दुःख के ये सारे कारक हैं। इन प्रतीकों को मन के सामने रख कर भगवान के द्वारा उपदेशित गाथाओं का अर्थ कीजिए:

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये।
रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो।।

- माता-पिता अर्थात तृष्णा व अहंकार और दो क्षत्रिय राजाओं यानी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि की हत्या कर तथा राष्ट्र अर्थात पांच उपादान स्कन्ध को विनष्ट कर एवं अनुचर अर्थात राग की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये।
वेय्यग्घपञ्चमं हन्त्वा अनीघो याति ब्रामणो।।

-माता-पिता अर्थात तृष्णा व अहंकार और दो क्षत्रिय राजाओं यानी मिथ्या दृष्टि, उच्छेदवादी मिथ्यादृष्टि की हत्या कर तथा पांच बाघों यानी ज्ञान के पांच आवरणों की हत्या करके ब्राह्मण निष्पाप होता है।

बौद्धिक रूप से अभी और विस्तृत व्याख्या की गुंजाइश है लेकिन भगवान के वचनों-कथनों के सटीक अर्थ ध्यानाभ्यास से समझ में आते हैं। यदि उस तल पर जा कर नहीं समझा तो अर्थ का अनर्थ कर देने या कर लेने का खतरा हमेशा विद्यमान रहता है। और तो और, बुद्ध वचनों की निन्दा-आलोचना का पापदोष का खतरा भी मंडराता है। यद्यपि भगवान बड़ी विनम्रता से कहते हैं- जैसे सोनार सोने को आग में तपा कर जांचता-परखता है ऐसे तुम मेरे वचनों यूँ ही मत मान लो, जांचों-परखो तब मानों। भगवान तो न्योता देते हैं- एहि पस्सिको- आओ और देखो।
भगवान के इस कथन का भी बौद्धिक लोग कभी-कभी अर्थ का अनर्थ लगाते हुए तर्क या विवेचना के बजाय कुतर्क करने लगते हैं। भगवान के इस कथन को भी गौर से देखिये- जैसे सोनार सोने को आग में तपाता है...
आग में तपाना यानी ध्यान की आग में तपाना, विपस्सना में तपना। 
ज्यादातर बौद्धिक लोग, इंटेलेक्चुअल लोग, ध्यान तो कभी करते नहीं और बुद्ध वचनों की विवेचना-विश्लेषण करने लगते हैं। नतीजा क्या होता है? अर्थ का अनर्थ होता है और बुद्ध वचनों के साथ खिलवाड़ का पापदोष लगता है, वह अलग। भगवान ने जांचने-परखने की खुली छूट दी है लेकिन सोनार की तरह, आग में तपा कर यानी ध्यान-साधना की आग में तपा कर परखिये। तब यदि दोष दिखे तो त्याज्य को त्याग दीजिए और ग्राह्य को गृहण कर लीजिये।
संयुक्त निकाय में दो बड़े प्यारे सुत्त हैं जो इस बार की अमावस्या और पूर्णिमा पर बड़े सामयिक हो गये हैं। सामयिक इन अर्थों में कि अभी 13 जुलाई'2018 को, अमावस्या के दिन, सूर्य ग्रहण पड़ा है तथा 27 जुलाई'2018 को, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन, जिसे प्रचलित परम्परा में गुरू पूर्णिमा कहा जाने लगा है, 104 साल के बाद सदी का सबसे लम्बा चन्द्र ग्रहण पड़ेगा। एक पखवारे के अन्दर सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की यह दुर्लभ खगोलीय घटना है जो सदियों में कभी-कभी होती है। इस अवसर पर बौद्ध देशों के श्रद्धालु उपोसथ धारण करने के साथ सूर्य ग्रहण पर सुरिय परित्त तथा चन्द्र ग्रहण पर चन्द परित्त का पाठ करते हैं। ये दोनों सुत्त सदियों से महापरित्राण पाठ का अनिवार्य अंग हैं।
अब यदि इन सुत्तों को भी ठीक-ठीक इनके शाब्दिक अर्थों में लिया जाए तो बौद्धिक लोगों के विवेचना-आलोचना का अच्छा विषय है। लेकिन यदि इनके प्रतीक अर्थों को देखा जाय तो सच में परित्त है अर्थात रक्षा है।
पहले इन सुत्तों को बिना प्रतीक अर्थों के यथारूप में देखते हैं। पहले चन्दपरित्तं( पालि):

एवं मे सुतं, एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन, चन्दिमा देवपुत्तो राहुना असुरिन्देन गहितो होति। अथ खो चन्दिमा देवपुत्तो भगवन्तं अनुस्सरमानो, तायं वेलायं इमं गाथं अभासि:

1. नमो मे बुद्धवीरत्थु विप्पमुत्तोसि सब्बधि। 
सम्बाधपटिपन्नोस्मिं तस्स मे सरणं भवाति।।

अथ खो भगव चन्दिमं देवपुत्तं आरब्भ राहुं असुरिन्दं गाथाय अज्झभासि:

2. तथागतं अरहन्तं चन्दिमा सरणं गतो।
राहुं चन्दं पमुञ्चस्सु बुद्धा लोकानुकम्पकाति।।

अथ खो राहु असुरिन्दो चन्दिमं देवपुत्तं मुञ्चित्वा तरमानरूपो येन वेपचित्ति असुरिन्दो तेनुपसंकमि, उपसंकमित्वा संविग्गो लोमहट्टजातो एकमन्तं अट्ठासि; एकमन्तं ठितं खो राहुं असुरिन्दं वेपचित्ति असुरिन्दो गाथाय अज्झभासि:

3. किन्नुसन्तरमानोव राहु चन्दं पमुञ्चसि।
संविग्गरूपो आगम्म किन्नुभीतोव तिट्ठति'ति।।

4. सत्तधा मे फले मुद्धा जीवन्तो न सुखं लभे। 
बुद्धगाथाभिगीतोम्हि नो चे मुञ्चेय चन्दिमन्ति।।

चन्द्र परित्राण(हिन्दी अनुवाद):

ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन आराम में विहार करते थे। उस समय देवपुत्र चन्द्रमा को असुरेन्द्र राहु ने पकड़ लिया था। तब देवपुत्र चन्द्रमा ने भगवान को स्मरण करते हुए यह गाथा कहा:

1. हे बुद्धवीर! आपको मेरा नमस्कार है, आप सर्वप्रकार से विमुक्त हैं, मैं भारी विपत्ति में पड़ा हूँ, अतः आप मुझे अपनी शरण दीजिये। 

तब भगवान ने देवपुत्र चन्द्रमा के लिए असुरेन्द्र राहु को गाथा में यह कहा:

2. हे असुरेन्द्र राहु! देवपुत्र चन्द्रमा अरहत तथागत के शरणागत हुए हैं। बुद्ध लोकानुकम्पी हैं। आप देवपुत्र चन्द्रमा को मुक्त कर दीजिये।

तब असुरेन्द्र राहु ने देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़कर घबराए हुए मन से जहाँ असुरेन्द्र वेपचित्री थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर संविग्न और रोमांचित हो कर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए असुरेन्द्र राहु को असुरेन्द्र वेपचित्री ने गाथाओं में कहा:

3. हे असुरेन्द्र राहु! घबराए हुए मन से तुमने देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़ क्यों दिया? संविग्न और भयभीत होकर यहाँ आकर क्यों खड़े हुए हो?

4. देवपुत्र चन्द्रमा को छोड़ देने का आदेश बुद्ध ने गाथाओं में दिया है। यदि देवपुत्र चन्द्रमा को न छोड़ते तो मेरे सिर के सात टुकड़े हो जाते और सुख से जीना मुश्किल हो जाता।

और अब सुरियपरित्तं(पालि):

एवं मे सुतं, एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन, सुरियो देवपुत्तो राहुना असुरिन्देन गहितो होति। अथ खो सुरियो देवपुत्तो भगवन्तं अनुस्सरमानो, तायं वेलायं इमं गाथं अभासि:

1. नमो मे बुद्धवीरत्थु विप्पमुत्तोसि सब्बधि। 
सम्बाधपटिपन्नोस्मिं तस्स मे सरणं भवाति।।

अथ खो भगव सुरियं देवपुत्तं आरब्भ राहुं असुरिन्दं गाथाय अज्झभासि:

2. तथागतं अरहन्तं सुरियो सरणं गतो।
राहुं सुरियं पमुञ्चस्सु बुद्धा लोकानुकम्पकाति।।

3. यो अन्धकारे तमसी पभंकरो 
वेरोचनो मण्डली उग्गतेजो ।
मा राहु गिली चरं अन्तलिक्खे
पजं मम राहु पमुञ्च सूरियन्ति।।

अथ खो राहु असुरिन्दो सुरियं देवपुत्तं मुञ्चित्वा तरमानरूपो येन वेपचित्ति असुरिन्दो तेनुपसंकमि, उपसंकमित्वा संविग्गो लोमहट्टजातो एकमन्तं अट्ठासि; एकमन्तं ठितं खो राहुं असुरिन्दं वेपचित्ति असुरिन्दो गाथाय अज्झभासि:

3. किन्नुसन्तरमानोव राहु सुरियं पमुञ्चसि।
संविग्गरूपो आगम्म किन्नुभीतोव तिट्ठति'ति।।

4. सत्तधा मे फले मुद्धा जीवन्तो न सुखं लभे। 
बुद्धगाथाभिगीतोम्हि नो चे मुञ्चेय सूरितन्ति।।

सूर्य परित्राण(हिन्दी अनुवाद) :

ऐसा मैंने सुना। एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन आराम में विहार करते थे। उस समय देवपुत्र सूर्य को असुरेन्द्र राहु ने पकड़ लिया था। तब देवपुत्र सूर्य ने भगवान को स्मरण करते हुए यह गाथा कहा:

1. हे बुद्धवीर! आपको मेरा नमस्कार है, आप सर्वप्रकार से विमुक्त हैं, मैं भारी विपत्ति में पड़ा हूँ, अतः आप मुझे अपनी शरण दीजिये। 

तब भगवान ने देवपुत्र सूर्य के लिए असुरेन्द्र राहु को गाथा में यह कहा:

2. हे असुरेन्द्र राहु! देवपुत्र सूर्य अरहत तथागत के शरणागत हुए हैं। बुद्ध लोकानुकम्पी हैं। आप देवपुत्र सूर्य को मुक्त कर दीजिये।

3. जो काले अन्धकार में प्रकाशित होता है, वैरोचन आभा वलय के साथ उग्रतेज हो अन्तरिक्ष में विचरण करता है। हे राहु! ऐसे सूर्य को ग्रसित न करो। राहु! मेरे शरणागत हुए मेरे पुत्र सूर्य को छोड़ दो।

तब असुरेन्द्र राहु ने देवपुत्र सूर्य को छोड़कर घबराए हुए मन से जहाँ असुरेन्द्र वेपचित्री थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर संविग्न और रोमांचित हो कर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए असुरेन्द्र राहु को असुरेन्द्र वेपचित्री ने गाथाओं में कहा:

3. हे असुरेन्द्र राहु! घबराए हुए मन से तुमने देवपुत्र सूर्य को छोड़ क्यों दिया? संविग्न और भयभीत होकर यहाँ आकर क्यों खड़े हुए हो?

4. देवपुत्र सूर्य को छोड़ देने का आदेश बुद्ध ने गाथाओं में दिया है। यदि देवपुत्र सूर्य को न छोड़ते तो मेरे सिर के सात टुकड़े हो जाते और सुख से जीना मुश्किल हो जाता।

प्रथमदृष्ट्या लगता है कि हम कोई पौराणिक मिथकीय आख्यान पढ़ या सुन रहे हैं। असुरेन्द्र राहु से ग्रसित चन्द्रमा और सूर्य भगवान बुद्ध की शरण में आए हैं, हाथ जोड़ कर मुक्त किये जाने की प्रार्थना कर रहे हैं और भगवान असुरेन्द्र राहु को चन्द्र एवं सूर्य को मुक्त कर देने के लिए आदेशित करते हैं, फिर असुरेन्द्र राहु घबरा कर उन्हें मुक्त भी कर देते हैं। पूरा प्रसंग मिथकीय कथानक जैसा लग रहा है।
दरअसल ये दो खगोलीय घटनाएं हैं- चन्द्र ग्रहण की और सूर्य ग्रहण की जिनको पृष्ठभूमि में रख कर इन दो प्रतीक सुत्तों की रचना हुई है। काव्य शास्त्र के अनुसार इसमें मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है जिसे अंग्रेजी में परसोनीफिकेशन(personification) कहते हैं। यहाँ सूर्य-चन्द्र, राहु, वेपिचित्र का मानवीकरण कर दिया गया है और इसके बहाने बड़ा गहरा संदेश दिया गया है। वह संदेश पकड़ पाये तो समझिये इन सुत्तों का पाठ अथवा श्रवण सार्थक हुआ अन्यथा यह भी अंधश्रद्धा का कारक है।

प्रसंग श्रावस्ती का है। भगवान ने श्रावस्ती में अपने जीवन के सर्वाधिक वर्षावास श्रावस्ती में किये- पच्चीस वर्षावास। वर्षावास जिसे अब चौमासा कहा जाता है, चार महीने का प्रवास होता है। चार महीने में कम से कम चार पूर्णिमा पड़ती हैं, चार अमावस्या पड़ती हैं, कृष्णपक्ष की चार अष्टमियां और शुक्लपक्ष की चार अष्टमियां। चार को पच्चीस से गुणा करें तो सौ होता है। सिर्फ श्रावस्ती के वर्षावासों की गणना करें तो भगवान के वर्षावास काल में सौ पूर्णिमाएं और सौ अमावस्याएं पड़ीं श्रावस्ती प्रवास के दौरान पड़ीं। सूर्य ग्रहण अथवा चन्द्र ग्रहण जब भी पड़ता है तो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को ही पड़ता है। इन सौ पूर्णिमाओं एवं सौ अमावस्याओं की अवधि में कई-कई बार चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण पड़े होंगे। खगोलविज्ञानियों के लिए यह शोथ का रोचक विषय भी है कि भगवान के पूरे जीवनकाल में कितनी बार सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण पड़ा।
निश्चित ही ये ऐसे ही किसी अवसर का है जब सूर्य ग्रहण पड़ा और चन्द्र ग्रहण पड़ा।
भगवान अरहत हैं, सम्यक सम्बुद्ध हैं। वह बड़े उपायकौशल से सांसारिक संवाद को भी आध्यात्मिक अर्थ दे देते हैं। एकबार भिक्खुगण आपस में एक उबड़-खाबड़ भूमि की चर्चा कर रहे थे कि अमुक भूमि रमणीय है अथवा नहीं है तो भगवान ने सारी वार्ता सुनकर कहा- जहाँ श्रमण रमण करते हैं वही भूमि रमणीय है। एकबार भिक्खुगण एक झोपड़ी की चर्चा कर रहे थे कि वहाँ बारिश में पानी टपकता है जहाँ वे साधनारत थे तब उस अवसर पर भी भगवान ने कहा:

यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति।
एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति।।

-यदि घर की छत में छेद हों, तो जैसे उसमें बारिश का पानी आ जाता है, ऐसे ही संयमरहित चित्त में राग प्रविष्ट हो जाता है।

यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविज्झति।
एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति।।

-यदि घर की छत में छेदरहित हो, तो जैसे उसमें बारिश का पानी नहीं आ पाता, उसी प्रकार संयमित चित्त में राग प्रविष्ट नहीं होता।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान हर अवसर को अन्तर्मुखी अर्थ दे देते हैं। पच्चीस वर्षावासों की लम्बी अवधि में किसी अवसर पर घटित चन्द्र ग्रहण एवं सूर्य ग्रहण पर प्रस्तुत भगवान ने चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के बहाने एक गहरा आध्यात्मिक संदेश दिया है।
एक बात और ध्यान देने की है कि जब भगवान उपासकों से सांकेतिक, प्रतीकात्मक संवाद करते हैं तो संकेतों का अर्थ भी विस्तार से बताते हैं जैसे युवक सीगाल के प्रसंग में, लेकिन जब वे साधना में परिपक्व भिक्खुओं से वार्ता करते हैं तब संकेतों व प्रतीकों को प्रायः अव्याख्यायित ही छोड़ देते हैं। वे साधना में परिपक्व लोग थे जो संक्षेप व संकेत में कही बात का भी अर्थ जान लेते थे। ये चंदपरित्त एवं सुरियंपरित्त का संवाद भिक्खुओं के सम्मुख है इस लिए इसका अर्थविस्तार नहीं है।
आध्यात्मिक अर्थों में चन्द्र हमारे मन का प्रतीक है और सूर्य हमारी चेतना का तथा राहु समस्त अकुशल वृत्तियों का प्रतीक है। आज खगोलविज्ञानी भी इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि चन्द्रमा की कलाओं के साथ हमारे मन की हलचलों का गहरा सम्बन्ध है। पूर्णिमा के दिन पागलपन के दौरे ज्यादा पड़ते हैं। उस दिन तनाव-अवसाद-उन्माद, आत्महत्या-हत्या की घटनाएं अधिक होती हैं। पूर्णिमा के दिन समन्दर में ज्वारभाटा ज्यादा आता है। इसी प्रकार सूर्य के साथ हमारी चेतना के उतार-चढ़ाव का गहन सम्बन्ध है। सूर्य के धब्बों की संख्या बढ़ने पर धरती पर उथल-पुथल बढ़ जाती है, युद्ध, आँधी-तूफ़ान, बाढ़ इत्यादि की घटनाएं अधिक होती हैं। दोनो महायुद्धों के समय सूर्य धब्बों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हुई थी।
हमारे आध्यात्मिक जीवन में भी ऐसा होता है कि कभी-कभी हमारा चन्द्रमा रूपी मन मोह ग्रसित हो जाता है, समस्त नकारात्मक तरंगें घेर लेती हैं अर्थात हमारे मन को चन्द्र ग्रहण लग जाता है। कभी-कभी हमारी चेतना समस्त अंधकार से भर जाती है, अपना ही हित-अहित नहीं सूझता है। यानी कि हमारी चेतना को सूर्य ग्रहण लग गया, हमें अकुशल वृत्तियों के राहु ने ग्रसित कर लिया। हमारी चेतना मोह ग्रसित, लोभ ग्रसित, काम ग्रसित हो जाती है। ऐसे अवसर पर अपने अंतर के बुद्धत्व की शरण में जाना ही अंतिम उपाय है। यही है बुद्धं सरणं गच्छामि। बुद्ध के शरणागत होने पर ही हमारी चेतना, हमारा मन नकारात्मक वृत्तियों के राहु से मुक्त होता है। यही है ग्रहण से मुक्ति।
इस सुत्त में करुमामय भगवान कहते हैं"पजं मम राहु पमुञ्च सूरियन्ति- राहु! सूर्य मेरा पुत्र है, उसे छोड़ दो।"

जैसे रोते हुए बच्चे को जब मां अपने सीने से लगा लेती है तो वह चुप हो जाता है, अपने को सुरक्षित पाता है, राहत महसूस करता है ऐसे ही सूर्य को यानी हमारी चेतना, हमारे मन को भगवान अपना पुत्र कह रहे हैं। जब हम बच्चे की तरह उनके शरणागत होते हैं यानी अपने अंतर के बुद्धत्व की शरण जाते हैं तो हमारा परित्राण होता है। परित्राण अर्थात रक्षा, इसी को पालि भाषा में परित्त कहते हैं। क्योंकि हमारी चेतना, हमारा मन परमचैतन्य हमारे बुद्धत्व का ही अंश है इन अर्थों में वे बुद्धपुत्त हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन भगवान ने पंच भिक्खुओं को दीक्षा दी थी- कौण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, अस्सजी, महानाम को। भारत के आध्यात्मिक इतिहास में उस दिन पहली बार गुरु-शिष्य परम्परा का शुभारम्भ हुआ। भगवान बुद्ध को लोकगुरू कहा गया है इस कारण आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं। इस पूर्णिमा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज हर धार्मिक पंथ में यह पूर्णिमा 'गुरू पूर्णिमा' के रूप में स्थापित हो गयी है।
104 साल के बाद यह अद्भुत संयोग बना है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन पूर्ण चन्द्र ग्रहण पड़ रहा है- 235 मिनट का अर्थात लगभग 3 घण्टा 54 मिनट का यानी लगभग चार घण्टा। बौद्ध उपासक-उपासिकाएं इस दिन उपोसथ धारण करें, ध्यान-साधना करें, दान-पुण्य करें और आध्यात्मिक अर्थों को धारण करते हुए चंदपरित्त का पाठ करें। बौद्ध जगत में ऐसी आस्था है कि ऐसे दुर्लभ अवसर पर इस परित्त का पाठ करने से लम्बित कार्य अविलम्ब हो जाते हैं, कारागार से मुक्ति मिलती है, लम्बी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। आस्थाएं अपनी जगह हैं लेकिन सही अर्थों को धारण करने से अज्ञान से मुक्ति तो मिलती ही है। यही तो वास्तविक परित्राण है। 

आलवक यक्ष ने भगवान से प्रश्न किया:"किसूधं वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं- मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धन क्या है?"
भगवान ने उत्तर दिया:"सद्धीध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं- श्रद्धा ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धन है।"
अर्थ को समझ कर धम्म धारण किया जाए तो ही श्रद्धा फलीभूत होती है अन्यथा यही श्रद्धा अंधश्रद्धा बन जाती है। श्रद्धा से धम्म को धारण करें इसी में परित्राण है।

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय


शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।

Sunday, August 5, 2018

।।दर्पण।। - श्री राजेश चन्द्रा-

।।दर्पण।।
-राजेश चन्द्रा-
बौद्ध विनय के मुताबिक सौन्दर्य प्रसाधन के सामान साथ में रखना भिक्खुओं के लिए निषिद्ध है लेकिन एक युवा भिक्खु अपने झोले में हमेशा एक दर्पण रखता था। उसके साथी गुरुभाई ने गुरूजी से शिकायत कर दी कि अमुक भिक्खु अपने झोले में दर्पण रखता है। गुरूजी ने युवक को बुलाया, पूछा- सुना है तुम अपने पास दर्पण रखते हो?
युवक ने पूरे आत्मविश्वास से झट से दर्पण झोले से निकाल कर दिखाते हुए कहा- जी गुरूजी, रखता हूँ।
गुरूजी ने कहा- क्या तुम्हें नहीं मालूम कि सौन्दर्य प्रसाधन के सामान भिक्खुओं के लिए निषिद्ध हैं?
भिक्खु ने कहा- जी, मालूम है।
गुरूजी ने पूछा- फिर क्यों रखते हो?
युवक ने बड़ी मासूमियत से कहा- गुरूजी, इसका प्रयोग मैं मुसीबत के समय करता हूँ।
गुरूजी ने हैरानी से पूछा- मुसीबत के समय? वह कैसे?
युवक ने उत्तर दिया- जब मैं किसी मुसीबत, परेशानी में होता हूँ, तब इस इस दर्पण में देखता हूँ। इसमें मुझे अपनी मुसीबत-परेशानी का कारण दिखायी दे जाता है।
गुरूजी आशीष की मुद्रा में मुस्करा रहे थे कि युवक ने अपनी बात पूरी की- और गुरूजी, अपनी मुसीबत-परेशानी के निवारण का उपाय भी दिख जाता है...

श्री राजेश चन्द्रा - एक परिचय

शैक्षिक और व्यवसायिक पृष्ठ्भूमि से मूलत: कम्प्यूटर इंजीनियर , मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म मे डिप्लोमा धारक और उतर प्रदेश मे प्रथम श्रेणी अधिकारी पद पर कार्यरत राजेश चन्द्रा हिन्दी साहित्य के युवा हस्ताक्षर हैं । उनकी अब तक प्रकाशित कृतियां है , ’ पूजा का दिया ’ , साक्षी चेतना - अमृता प्रीतम , बुद्ध का चक्र्वर्ती साम्राज्य ’आदि ।
आप एक सक्रिय समाज सेवी , धम्म प्रचारक व ध्यान प्रशिक्षक भी हैं ।