Wednesday, June 23, 2010

Illustrated Venerating Lord Buddha Charitha

Gemunu Rohana has added some of the beautiful illustrations of important events of Venerating Lord Buddha Charitha to his site . Click HERE to download the set of these illustrations .

भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को सुन्दर चित्रों के माध्यम से जेमू रोहाना ने अपने ब्लाग मे जोडा है । डाउनलोड करने के लिये यहाँ  जायें ।

Sunday, June 20, 2010

एक पिता का पत्र अपने तीन साल के पुत्र के लिये - पिता दिवस पर विशेष

 


 


कुछ माह पूर्व zenhabits.net पर एक पिता का भाव-पूर्ण पत्र अपने तीन सालाना पुत्र के लिये छपा था।  नीचे इस पत्र का हिन्दी  अनुवाद करने का प्रयास किया है।

कुछ माह पूर्व www.zenhabits.net पर एक पिता का भावपूर्ण पत्र अपने तीन साल के पुत्र के लिये छपा था । लियो बाबूटा ( Leo Babuta ) का आभारी रहूगाँ जिनकी अनुमति से इस पत्र का हिन्दी अनुवाद रखने का प्रयास किया  है ।


प्रिय सेठ,

अभी सिर्फ़ तुम तीन साल के ही हो और मै समझता हूँ कि जिदंगी के इस मुकाम पर जहाँ तुम पढ और समझ भी नही सकते हो , यह बातें तुम्हें अभी समझ मे नही आयेगीं । लेकिन मैने अपनी जीवन मे जो सीखा है उसे तुम्हें बताना और साझा करना जरुरी समझता हूँ । तुम्हारा जीवन आने वाले सालों मे  उतार चढाव के परीक्षण के लिये तैयार हो सके , ऐसी मेरी इच्छा है ।

जीवन के इस राह मे कई तरह के उतार चढाव आयेगें , दु:ख , दर्द , अकेलेपन का एहसास , जुदाई का गम , संघर्ष की विषम राह ; मै दिल से चाहूगाँ कि तुम इन उतार चढाव के लिये तैयार रहो । जीवन एक अदभुध मंच है इसलिये हर हाल मे  तुमको इस अमूल्य जीवन के लिये आभारी होना पडॆगा ।


जीवन बहुत क्रूर भी हो सकता है


ऐसे लोग भी जीवन मे मिलेगें जो तुम से चिढेगें , तुमसे नफ़रत करेगें और यहाँ तक चोट तक पहुँचा सकते हैं । ऐसे लोगॊ के साथ अधिक कुछ भी नही किया जा सकता बस इतना ही कि उनसे दूर रहने के उपाय तुमको स्वयं ही खोजने होगें और साथ ही मे ऐसे मित्रॊं का भी चुनाव भी  करना पडेगा जो तुमसे निस्वार्थ वास्ता रखें , और ऐसे मित्र जब तुम्हें मिल जायें तब उनको तुम उनसे गले लगाना और दिल से प्रेम करना ।

जीवन मे ऐसे भी पल आयेगें जहा सफ़लता की जगह निराशा हाथ लगेगी । जीवन हमेशा हमारे हिसाब से नही चलता , यह तुमको सीखना पडेगा । अपने सपनों को सच करने के लिये उन असफ़लताओं को स्वीकारना पडेगा और जीवन के उन नकारत्मक क्षण को सकरात्मक क्षणॊं मे बदलना पडेगा ।

यह भी हो सकता है कि तुम जिनसे प्यार करते हो वह तुम्हारा दिल तोडकर चले जाये , मै बिल्कुल नही चाहता कि ऐसा हो लेकिन अगर ऐसा होता है तो अपने को वक्त के हाल पर छोड कर निशिचित हो जाना । जीवन मे आने वाले हर दर्द जिदंगी को बेहतर बनाने की एक सीढी है , यह तुमको समझना ही पडेगा ।

लेकिन चाहे जो कुछ भी हो जितनी भी तकलीफ़ें रास्ते मे आयें अपने दृष्टिकोण जीवन के प्रति सहज रखना । कभी भी जीवन से भागना और मुँह मोडना नही बल्कि नये लोग और नये अनुभवों से अपने को जोडते चलना ।

यह हो सकता कि तुम्हारा दिल दस बार टूटे लेकिन संभव है कि ११ र्वें बार शायद मिलने वाली तुम्हारी मित्र  तुम्हारे जीवन को उजाला कर दे । अगर तुम प्यार को अपने जीवन से दूर रख दोगे तो शायद इस खुशगवार लम्हों को भी खो दोगे । 

ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हारे कई मित्र तुम्हें धोखा दें लेकिन कई चोटॊं के बाद यह संभव है कि तुम्हें वह सच्चा मित्र मिल जाये जो निस्वार्थ तुमसे संबध रखे ।

यह हमेशा याद रखना कि असफ़लता सफ़लता की प्रथम सीढी है । हो सकता कि तुम कई बार विफ़ल हो लेकिन अगर  उन विफ़लताओं पर तुम रुक गये तब तुम उन ऊँचाइयों को छूने से हमेशा वंचित रह जाओगे ।

जीवन प्रतियोगिता नहीं है

तुम्हारे जीवन मे हो सकता है कि ऐसे कई लोग मिलें जो तुमसे आगे निकलने की कोशिश करें , ऐसे लोग स्कूल , कालेज और काम करने के दौरान भी मिल सकते हैं ; उनके पास बढिया महँगी गाडियाँ होगी , बडे घर होगें और एक से एक महँगे सामान होगें । हाँ , उनके लिये जीवन एक प्रतियोगिता है । लेकिन इस रहस्य को हमेशा याद रखना कि जीवन प्रतियोगिता नहीं बल्कि एक यात्रा है । अगर यह यात्रा दूसरों को प्रभावित करने के लिये कर रहे हो तो समझ लो कि तु्म सिर्फ़ समय को बरबाद कर रहे हो । इसलिये इस यात्रा को खुशियों की यात्रा बनाओ और  लगातार सीखने का प्रयत्न करो । इससे कुछ भी अन्तर नही पडता कि तुम्हारे पास बडी –२ गाडियाँ और  बडॆ घर है या नही , शायद यह एक दिन आ भी जायें लेकिन यह तुम्हें असल खुशी नही दे सकते ; यह तुम्हें सिर्फ़ क्षणिक सन्तुष्टि दे सकते हैं । एक बात और याद रखना कि जिस काम या रोजगार को तुम बोझ सनझो उसको लेकर जीवन बरबाद न करो ।

सिर्फ़ प्यार ही प्रथामिकता हो 
एक शब्द के सहारे अगर तुम  पूरा जीवन  आंनदमय होकर निकाल सकते हो तो वह शब्द प्यार है । मै समझता हूँ कि यह तुम्हें अजीब सा लगेगा लेकिन मुझ पर विशवास रखो इससे बेहतर फ़लसफ़ा जिदंगी का कुछ और नही हो सकता । हाँ , कुछ लोग कामयाबी को ही जिदंगी का मत्र मानते हैं , शायद वह कामयाब रहते भी हों लेकिन पास जा कर देखो कि उनकी जिदंगी कितनी तनावपूर्ण और चिंताग्रस्त रहती है । कुछ ऐसे भी हैं जो हमेशा लालच मे रहते हैं -अपनी आवशयकताओं को दूसरे को देख कर बढाते रहते हैं ; ऐसे लोग अकेलेपन की जिंदगी जीते हैं और दु:खी रहते हैं ।

अपना जीवन प्यार के सहारे जियो ; अपनी  पत्नी , बच्चों , मात -पिता और मित्रों से प्रेम करॊ । उनको वह सब प्यार  दो जिनकी उनको आवशयकता है । अपना ह्रदय उनके लिये खोल दो । प्रेम सिर्फ़ परिचितों से नही बल्कि अपरिचितों और अपने विद्रोहियों से भी करो । जिससे भी मिलो उसको एक मीठी मुस्कान , चन्द मीठे शब्दों से स्वागत करो । जो शख्स तुमसे सबसे अधिक बैर रखता हो उससे भी प्रेम से मिलो शायद सबसे अधिक इसी शख्स को तुम्हारी आवशयकता है ।

तुम्हारी इस अदबुध यात्रा मे मै हर समय तुम्हारे साथ हूँ ।

प्यार ,

तुम्हारा

पापा

सिमसा वृक्ष के पत्ते और बुद्ध का चितंन

Simsapa leaves

एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे  विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों  को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने  हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह  या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “

भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “

इसी तरह  भिक्षुओं ऐसी अनगिनत  चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को  नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और  न ही मन को शांत करती है ।

इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को  दूर करता हैं और मन को शांत करता है ।

संयुत्त निकाय 56.31

( हिन्दी मे ’ The Simsapa Leaves-Simsapa Sutta ’ से अनुवादित )

Saturday, May 29, 2010

बिलाल्पादक की कथा

किसी नगर में बिलाल्पादक नामक एक धनिक रहता था. वह बहुत स्वार्थी था और सदाचार के कार्यों से कोसों दूर रहता था. उसका एक पड़ोसी निर्धन परन्तु परोपकारी था. एक बार पड़ोसी ने भगवान् बुद्ध और उनके शिष्यों को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया. पड़ोसी ने यह भी विचार किया कि इस महान अवसर पर अधिकाधिक लोगों को भोजन के लिए बुलाना चाहिए. ऐसे संकल्प के साथ पड़ोसी ने बड़े भोज की तैयारी करने के लिए नगर के सभी व्यक्तियों से दान की अपेक्षा की एवं उन्हें भोज के लिए आमंत्रित किया. पड़ोसी ने बिलाल्पादक को भी न्यौता दिया.

भोज के एक-दो दिन पहले पड़ोसी ने चहुँओर घूमकर दान एकत्र किया. जिसकी जैसी सामर्थ्य थी उसने उतना दान दिया. जब बिलाल्पादक ने पड़ोसी को घर-घर जाकर दान की याचना करते देखा तो मन-ही-मन सोचा – “इस आदमी से खुद का पेट पालते तो बनता नहीं है फिर भी इसने इतने बड़े भिक्षु संघ और नागरिकों को भोजन के लिए आमंत्रित कर लिया! अब इसे घर-घर जाकर भिक्षा मांगनी पद रही है. यह मेरे घर भी याचना करने आता होगा.”

जब पड़ोसी बिलाल्पादक के द्वार पर दान मांगने के लिए आया तो बिलाल्पादक ने उसे थोड़ा सा नमक, शहद, और घी दे दिया. पड़ोसी ने प्रसन्नतापूर्वक बिलाल्पादक से दान ग्रहण किया परन्तु उसे अन्य व्यक्तियों के दान में नहीं मिलाया बल्कि अलग से रख दिया. बिलाल्पादक को यह देखकर बहुत अचरज हुआ कि उसका दान सभी के दान से अलग क्यों रख दिया गया. उसे यह लगा कि पड़ोसी ने सभी लोगों के सामने उसे लज्जित करने के लिए ऐसा किया ताकि सभी यह देखें कि इतने धनी व्यक्ति ने कितना तुच्छ दान दिया है.

बिलाल्पादक ने अपने नौकर को पड़ोसी के घर जाकर इस बात का पता लगाने के लिए कहा. नौकर ने लौटकर बिलाल्पादक को बताया कि पड़ोसी ने बिलाल्पादक की दान सामग्री को थोड़ा-थोड़ा सा लेकर चावल, सब्जी, और खीर आदि में मिला दिया. यह जानकार भी बिलाल्पादक के मन से जिज्ञासा नहीं गयी और उसे अभी भी पड़ोसी की नीयत पर संदेह था. भोज के दिन वह प्रातः अपने वस्त्रों के भीतर एक कटार छुपाकर ले गया ताकि पड़ोसी द्वारा लज्जित किये जाने पर वह उसे मार डाले.

वहां जानेपर उसने पड़ोसी को भगवान् बुद्ध से यह कहते हुए सुना – “भगवन, इस भोज के निमित्त जो भी द्रव्य संगृहीत किया गया है वह मैंने नगर के सभी निवासियों से दान में प्राप्त किया है. कम हो या अधिक, सभी ने पूर्ण श्रद्धा और उदारता से दान दिया अतः सभी के दान का मूल्य सामान है.”

पड़ोसी के यह शब्द सुनकर बिलाल्पादक को अपने विचारों की तुच्छता का बोध हुआ और उसने अपनी गलतियों के लिए सभी के समक्ष पड़ोसी से क्षमा माँगी.

बिलाल्पादक के पश्चाताप के शब्दों को सुनकर बुद्ध ने वहां उपस्थित समस्त व्यक्तियों से कहा – “तुम्हारे द्वारा किया गया शुभ कर्म भले ही कितना ही छोटा हो पर उसे तुच्छ मत जानो. छोटे-छोटे शुभ कर्म एकत्र होकर भविष्य में विशाल रूप धारण कर लेते हैं”.

“जब कभी तुम कोई शुभ कर्म करो तब यह मत सोचो कि ‘इतने छोटे कर्म से मुझे कुछ प्राप्त नहीं होगा’. जिस प्रकार बारिश का पानी बूँद-बूँद गिरकर पात्र को पूरा भर देता है उसी प्रकार सज्जन व्यक्तियों के छोटे-छोटे शुभकर्म भी धीरे-धीरे संचित होकर विशाल संग्रह का रूप ले लेते हैं”. – धम्मपद १२२

“जिस प्रकार धनी व्यक्ति निर्जन पथ से और लम्बा जीने की कामना करने वाले विष से दूर रहते हैं उसी प्रकार सभी को पाप एवं अशुभ से दूर रहना चाहिए”. – धम्मपद १२३

(A Buddhist story of Bilalpadaka – Merits of giving – ‘Dana’ – in Hindi)

साभार : Hindizen – निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग

Friday, May 28, 2010

...अस्तित्व का ज्ञान :बुद्धत्व ...........बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनायें

युद्ध नहीं अब बुद्ध चहिए ।
मानव का मन शुद्ध चाहिए ॥

सत्य, अहिंसा, विश्व बंधुता, करुणा, मैत्री का हो प्रसार।
पंचशील अष्टांग मार्ग का पुनः जग में हो विस्तार ॥
समता, ममता, और क्षमता, से, ऐसा वीर प्रबुद्ध चाहिए ।

युध्द नहीं अब बुध्द चहिए ।
मानव का मन शुध्द चाहिए ॥

कपट, कुटिलता, काम वासना, घेर रगी है मानव को ।
कानाचार वा दुराचार ने, जन्म दिया है दानव को ॥
न्याय, नियम का पालन हो अब, सत्कर्मो की बुध्दि चाहिए ।

युध्द नहीं अब बुद्ध चहिए ।
मानव का मन शुद्ध चाहिए ॥

मंगलमय हो सब घर आँगन, सब द्वार  बजे शहनाई ।
शस्य श्यामता हो सब धरती, मानवता ले अंगड़ाई ॥
मिटे दीनता, हटे हीनता, सारा जग सम्रद्ध चहिए ।

युध्द नहीं अब बुद्ध चहिए ।
मानव का मन शुद्ध चाहिए ॥


साभार : श्रवण बिहार (आरकुट से )

Saturday, May 15, 2010

मृत्यु एक अटल सत्य ….

life and death

चाहता हूँ , पुष्प यह

गुलदान का मेरे

न मुर्झाये कभी ,

देता रहे

सौरभ सदा

अक्षुण्ण इसका

रुप हो!

पर यह कहाँ संभव ,

कि जो है आज,

वह कल को कहाँ ?

उत्पत्ति यदि,

अवसान निशिचत!

आदि है

तो अंत भी है !

यह विवशता !

जो हमारा हो ,

उसे हम रख न पायें !

सामने अवसान हो

प्रिय वस्तु का,

हम विवश दर्शक

रहे आयें!

नियम शाशवत

आदि के,

अवसान के ,

अपवाद निशचय ही

असंभव-

शूल सा यह ज्ञान

चुभता मर्म में,

मन विकल होता!

प्राप्तियां, उपलबिधयां क्या

दीन मानव की,

कि जो

अवसान क्रम से,

आदि -क्रम से

हार जाता

काल के

रथ को

न पल भर

रोक पाता !

क्या अहं मेरा

कि जिसकी तृष्टि

मैं ही न कर पाता !

कल जब निशांत जी के ब्लाग से गुजरा तो एक बौद्ध कथा , “ पटाचारा : बुद्ध की अद्वितीय साधिका “ पर जा कर नजर रुक गयी । पटाचारा नाम की एक युवती को अल्प आयु मे अपने पति और बच्चों के साथ से वंचित रहना पडा जिस कारण उस की दशा बिल्कुल पागलों जैसी हो  गई । एक दिन जब वह बुद्ध के शरण मे पहुँची तो बुद्ध उसको समझाकर अपने अपने संघ मे शरण दी  और ध्यान और समाधि के गुण बताये । 

एक दिन स्नान करते समय उसने देखा कि देह पर पहले डाला गया पानी कुछ दूर जाकर सूख गया, फिर दूसरी बार डाला गया पानी थोड़ी और दूर जाकर सूख गया, और तीसरी बार डाला गया पानी उससे भी आगे जाकर सूख गया.

इस अत्यंत साधारण घटना में पटाचारा को समाधि क सू्त्र मिल गया. “पहली बार उड़ेले गये पानी के समान कुछ जीव अल्पायु में ही मर जाते हैं, दूसरी बार उड़ेले गये पानी के समान कुछ जीव मध्यम वयता में चल बसते हैं, और तीसरी बार उड़ेले गये पानी के जैसे कुछ जीव अंतिम वयस में मरते हैं. सभी मरते हैं. सभी अनित्य हैं”.

पूरी कथा देखें यहाँ

ऊपर उद्ध्र्त की गई यह कविता ओशो के प्रवचन ’मरो हे  जोगी मरो ’  से ली है । जीवन की यथार्थता पर प्रकाश डालती हुई । कौन  चाहता कि उसका प्रिय , उसकी आ‘ंखॊं का तारा उससे कभी दूर हो जाये । लेकिन जाना तो सभी को है । जीवन मे इतनी दौड , इतनी उपलब्धियों का हिसाब किताब सब यही का यही धरा रह जाता है । लेकिन हम सच को सच के रुप मे स्वीकार नही कर पाते । क्यूं ?

प्राप्तियां, उपलबिधयां क्या

दीन मानव की,

कि जो

अवसान क्रम से,

आदि -क्रम से

हार जाता

काल के

रथ को

न पल भर

रोक पाता !

क्या अहं मेरा

कि जिसकी तृष्टि

मैं ही न कर पाता !

 

मृत्यु एक अवसर है , हमारी उस अकडता को दूर करने का जिसमे हम समझते हैं कि हम ही सब है । इस अवसर पर  जब कोई परिजन , कोई विशेष , कोई आँखों का तारा  काल ग्रस्त हो जाये उस क्षण को रो-२ कर भुलाने की चेष्टा व्यर्थ है । यह समय है जागने का जीवन को स्वीकार करने का ।

पर यह कहाँ संभव ,

कि जो है आज,

वह कल को कहाँ ?

उत्पत्ति यदि,

अवसान निशिचत!

आदि है

तो अंत भी है !

एक सुबह बुद्ध एक गाँव मे अय़ॆ । उस विधवा स्त्री का इकलौता बेटा मर गया था । पति तो पहले ही मर चुका था । उस स्त्री  की हालत बिल्कुल पागलॊ जैसी हो गई थी । किसी ने उससे कहा : पागल औरत अब रोने धोने से क्या लाभ , मृत्यु तो हो चुकी है , अब कोई चमत्कार ही बचा सकता है ।

उस स्त्री को जैसे डूबते को तिनके का सहार मिल  गया । उसने सुना कि गाँव मे गौतम बुद्ध आयें हुये है , वह परम सिद्ध है . चमत्कार भी कर सकते हैं ।  भागी स्त्री , जाकर लाश को  बुद्ध के चरणॊं मे रख दिया । बुद्ध ने कहा : ठीक तू चाहती है कि तेरा बेटा जीवित हो जाये । होगा , जरुर होगा , लेकिन कुछ शर्तें पूरी करनी होगी ।तू जा  गाँव मे और मेथी के थोडॆ से दाने माँग क्लर ले आ । लेकिन ध्यान रखना कि मेथी उस घर से लाना जिस घर मे कभी कोई मृत्यु न हुई हो ।

वह भागी स्त्री … पागलपन मे आदमी सब कुछ भरोसा कर लेता है । वह एक-२ दरवाजे   पर गई । लोगों ने कगा , जितनी मेथी चाहिये उतनी ले जा । मेथी का ही गाँव था , उसी की खेती होती थी । तेरे घर भी मेथी है , तू क्यूं मागंती फ़िरती है ।

उसने कहा : ऐसे घर की मेथी चाहिये जिस्घर मे कोई मरा न हो । साँझ होते-२ उसके मन मे यह बात साफ़ हो गई कि ऐसा कोई घर गाँव मे नही है जहाँ कोई मृउ न हुई हो ।

जब वह लौटी साँझ तो बुद्ध ने पूछा ले आई दाने तो वह हंसने लगी और बुद्ध के चरणॊं मे गिर पडी ।उसने कहा कि इसके पहले मेरी मौता आ जाये मुझे दीक्षा दो , मै भी जीवन का अर्थ जान लूं ।

Friday, April 23, 2010

परदे के पीछे : महात्मा बुद्ध पर फिल्म की योजना

 

buddha

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इतिहास आधारित फिल्म ‘जोधा अकबर’ के फिल्मकार आशुतोष गोवारीकर निर्माता डॉ. भूपिंदर मोदी के लिए महात्मा बुद्ध के जीवन पर भव्य फिल्म बनाने जा रहे हैं। केंद्रीय भूमिका के लिए खोज प्रारंभ हो गई है, क्योंकि किसी लोकप्रिय सितारे को यह भूमिका गोवारीकर नहीं देना चाहते। तीन वर्ष पूर्व लाइट ऑफ एशिया फाउंडेशन, कोलकाता और बियांड ड्रीम्स नामक कंपनी के सहयोग से श्याम बेनेगल महात्मा बुद्ध पर फिल्म बनाना चाहते थे। कोलंबो में इसके लिए विशाल भूखंड दिए जाने का प्रस्ताव भी था। आज के बाजारू हिंसामय युग में महात्मा बुद्ध के जीवन पर बनी फिल्म बहुत प्रेरक सिद्ध हो सकती है और परिवर्तन प्रस्तुत कर सकती है। मनोरंजन जगत में भी व्याप्त फूहड़ता को ऐसी फिल्म कुछ समय के लिए मिटा सकती है। यह एक बड़ी चुनौती है और ‘लगान’ तथा ‘जोधा अकबर’ के फिल्मकार आशुतोष गोवारीकर इसे साध सकते हैं।

विस्तृत खबर के लिये यहाँ देखें ।

Thursday, April 8, 2010

दो भेडियों के बीच की लडाई

story-of-two-wolves 

यह बहुत पुरानी कहानी है । एक शाम एक बुजुर्ग ने अपने पौत्र को इन्सान के अन्दर चल रही दो भेडियों की लडाई के बारे मे सुनाई । " मेरे बेटे हर इन्सान के अन्दर दो भेडियों के बीच लडाई चलती रहती है ।  " एक  बुराई है जिसमे क्रोध , ईर्ष्या , दुख, पछतावा, लालच , अभिमान , अपराधबोध, हीनता , झूठ, मिथ्या और अहंकार है " और " दूसरी अच्छाई है जिसमे खुशी , शांति, प्रेम, आशा, विनम्रता दया , परोपकार , सहानूभूति , उदारता , सच , करुणा और विशवास है । "

नन्हें से बालक ने एक पल के लिये सोचा और अपने दादा से पूछा : " दादाजी , इनमे कौन सा भेडिया जीतता है ? " उस बुजुर्ग ने कहा , " वही भेडिया जिसे तुम खाना खिलाते हो । "

 

One evening an old Cherokee Indian told his grandson about a battle
that goes on inside people. He said,
"My son, the battle is between two wolves inside us all".
"One is Evil -  It is anger, envy, jealousy, sorrow, regret, greed, arrogance,
self-pity, guilt, resentment, inferiority, lies, false pride, superiority, and ego".
"The other is Good -  It is joy, peace, love, hope, serenity, humility, kindness,
benevolence, empathy, generosity, truth, compassion and faith".
The grandson thought about it for a minute and then asked his grandfather:
"Which wolf wins?
The old Cherokee simply replied, "The one you feed"!

Friday, March 26, 2010

धम्मपद - बुद्धवग्गो

Commentary With Dhammapada's Buddha Vagga from chintan on Vimeo.

आदर्शवादी पथ से होते हुये बुद्ध हमे उसे जागृत अवस्था मे ले जाते हैं जहाँ मन  सांसारिक तत्वों से ऊपर उठ कर अलौकिक लौ से प्रकाशित होता है । धम्मपद का यही सार है ..बुद्धवग्गा मे यही कहा गया है कि हमारे जीवन की रुप रेखा हमारा मन करता हैअर्थात जैसे विचार वैसा कर्म …जैसा कर्म वैसा योग । जीवन को सुखद बनाने  प्रति बुद्धवग्गा की यह नीतियाँ  मन मे  आशा और आस्था का बोध कराती हैं ।

१७९.

यस्स जितं नावजीयति, जितं यस्स [जितमस्स (सी॰ स्या॰ पी॰), जितं मस्स (क॰)] नो याति कोचि लोके।

तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ॥

वह विजेता है , उस पर कभी विजय प्राप्त नही की जा सकती ..उसके प्रभाव क्षेत्र मे कोई दखल नही दे सकता । उसके पास पहुँचने का मर्ग है …बुद्ध ..जो जागृत स्वरुप है ।

१८०.

यस्स जालिनी विसत्तिका, तण्हा नत्थि कुहिञ्‍चि नेतवे।

तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ॥

बस बुद्ध के समीप होने के लिये इच्छाओं के जाल तथा माया मोह के भंवर से निकलना होगा ।

१८१.

ये झानपसुता धीरा, नेक्खम्मूपसमे रता।

देवापि तेसं पिहयन्ति, सम्बुद्धानं सतीमतं॥

ईशवर भी जागृतों से प्रतिस्पर्था कर उन पर कृपा करते हैं ..जगृत होकर ध्यानवस्था मे ही पूर्ण स्वतंत्रता और शांति की प्राप्ति संभव है ।

१८२.

किच्छो मनुस्सपटिलाभो, किच्छं मच्‍चान जीवितं।

किच्छं सद्धम्मस्सवनं, किच्छो बुद्धानमुप्पादो॥

मनुष्य योनि मे जन्म लेना कठिन है .. फ़िर मनुष्य बन कर रहना उससे  भी कठिन ..धर्म को समझना और भी कढिन …तथा निर्वाण की प्राप्ति सर्वाधिक कठिन ।

१८३.

सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा [कुसलस्सूपसम्पदा (स्या॰)]।

सचित्तपरियोदपनं [सचित्तपरियोदापनं (?)], एतं बुद्धान सासनं॥

सब बुराइयों से दूर रहो ..अच्छाइयाँ पैदा करने की कोशिश करते रहो …मन मस्तिष्क की शुद्ध्ता रखॊ ।

१८४.

खन्ती परमं तपो तितिक्खा, निब्बानं [निब्बाणं (क॰ सी॰ पी॰)] परमं वदन्ति बुद्धा।

न हि पब्बजितो परूपघाती, न [अयं नकारो सी॰ स्या॰ पी॰ पात्थकेसु न दिस्सति] समणो होति परं विहेठयन्तो॥

धैर्य रखकर सहनशक्ति के साथ जीवन के मूल उद्देशय यानि निर्वाण प्राप्ति की कोशिश करते रहो …किसी के कष्ट का करण न बनो और न हीऒ किसी को कष्ट दो ।

१८५.

अनूपवादो अनूपघातो [अनुपवादो अनुपघातो (स्या॰ क॰)], पातिमोक्खे च संवरो।

मत्तञ्‍ञुता च भत्तस्मिं, पन्तञ्‍च सयनासनं।

अधिचित्ते च आयोगो, एतं बुद्धान सासनं॥

धम्मसंहिता पर आचरण करते हुये किसी के दोषों को न देखॊ ..दूसरों को तकलीफ़ न दो .. काने और सोने मे संयमित रहो और द्यान लगाने की पूरी चेष्टा करो ।

१८६.

कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्‍जति।

अप्पस्सादा दुखा कामा, इति विञ्‍ञाय पण्डितो॥

स्वर्ण भंडार भी तृष्णा नही मिटा सकते …मन की प्यास नही बुझा सकते …वे समझदार है जो जानते हैं कि तूष्णा ..अन्त मे दु:ख का कारण है ।

१८७.

अपि दिब्बेसु कामेसु, रतिं सो नाधिगच्छति।

तण्हक्खयरतो होति, सम्मासम्बुद्धसावको॥

स्वर्ण समान बुअतिक आनन्द से तूप्ति असंभव है …बुद्ध के सच्चे अनुयायी वही हैं जो इच्छाओं को मार कर अनमोल आनंद की प्राप्ति करते हैं ।

१८८.

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च।

आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्‍जिता॥

१८९. नेतं खो सरणं खेमं, नेतं सरणमुत्तमं।

नेतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्‍चति॥

भयग्रस्त होकर वनों पहाडॊं मे इपना , धार्मिक स्थलों की शरण लेना व्यर्थ है क्योकि इनमे से कोई भी मन को भय मुक्त नही कर सकता …

१९०.

यो च बुद्धञ्‍च धम्मञ्‍च, सङ्घञ्‍च सरणं गतो।

चत्तारि अरियसच्‍चानि, सम्मप्पञ्‍ञाय पस्सति॥

आयें बुद्ध की शरण मे आयें …धर्मानुसार जीवन जियें और संघ के अनूकूल व्यवहार करें ।

१९१.

दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्‍कमं।

अरियं चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं॥

..आप चार अभिजात सत्यों को ऐसे जानों ..दु:ख, दु:ख का कारण , दु:ख का निवारण और आर्दश अष्टागिंक मार्ग …

१९२.

एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं।

एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्‍चति॥

अष्टांगिक मार्ग द्वारा आप दु:ख – वेदना से मुक्ति पा सकते हैं ..उसकी शरण मे जाना ही उत्तम उपाय है …क्योंकि फ़िर दु:ख वेदना मिट जाते हैं ।

१९३.

दुल्‍लभो पुरिसाजञ्‍ञो, न सो सब्बत्थ जायति।

यत्थ सो जायति धीरो, तं कुलं सुखमेधति॥

बुद्ध के जैसा दूसरा कोई नही है । ऐसे महापुरुष बार-२ जन्म नही लेते । जहाँ ऐसे विवेकी जन्म लेते हैं वह समाज उन्नति करता है ।

१९४.

सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना।

सुखा सङ्घस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो॥

बुद्ध का जन्म , धर्म की शिक्षा तथा संघ के अनूकूल आचरण आशीर्वाद के समान है ..

१९५.

पूजारहे पूजयतो, बुद्धे यदि व सावके।

पपञ्‍चसमतिक्‍कन्ते, तिण्णसोकपरिद्दवे॥

इसे तो ईशवर की अनुकंपा समझनी चाहिये ।

१९६.

ते तादिसे पूजयतो, निब्बुते अकुतोभये।

न सक्‍का पुञ्‍ञं सङ्खातुं, इमेत्तमपि केनचि॥

वे श्रेष्ठ हैं जो बुराइयों को त्याग कर , कष्टॊं को पार कर , भय को जीत कर , सम्मानीय को सम्मान देते हैं । बुद्ध एवं उनके अनुनायियों के प्रति आस्था और श्रद्धा रखते हैं ।

Monday, February 8, 2010

बुद्ध के पंचशील सिद्धांत , सदाचार और नैतिक सदगुण ….

हम अपना जीवन कैसे निर्वाह करते  हैं यह हमारे जीवन के प्रति होश रखने पर निर्भर करता है । अगर हमारी इच्छायें हमारे दैनिक कार्यों के बीच मे आती है और व्याधान उत्पन्न करती हैं तो जाहिर है इसका फ़ल हमारे जीबन के ऊपर भी पडता है और हमे पूर्ण रुप से व्यवस्थित नही हो पाते हैं ।
बुद्ध द्वारा प्रदान  किये गये पंचशील सिद्दांत जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं और फ़िर इससे क्या फ़र्क पडता है कि हम किस मार्ग या धर्म के अनुयायी है । यह पंचशील सिद्दांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमेसिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दु:ख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं ।
बुद्ध के पाँच उपदेश हैं :
  • प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना ।
  • चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से  विरत रहना ।
  • लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना ।
  • असत्य बोलने से विरत रहना ।
  • मादक पदार्थॊं  से विरत रहना ।

बुद्ध के यह पाँच उपदेशों को हम व्यवाहार  के "प्रशिक्षण के नियम" के रुप मे समझे न कि किसी आज्ञा के रुप मे । यह ऐसा अभ्यास है जिसका विकास करके ध्यान, ज्ञान, और दया को पा सकते हैं ।
हम इन पाँच उपदेशों को कैसे समझते है यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । जैसे कुछ लोग चीटीं को मार नही सकते लेकिन माँस खाते हैं  या फ़िर कुछ सिर्फ़ शाकाहारी ही होते हैं । कुछ मदिरा को हाथ भी नही लगाते और कुछ दिन मे सिर्फ़ एक आध पैग लगाते हैं क्योकि इससे उनको लगता है कि इससे उनको आराम मिलता है या कुछ हमेशा नशे मे धुत  रहते हैं । यह पाँच उपदेश यह नही सिखाते कि क्या सही है बल्कि अगर हम ईमानदारी से तय करे कि हमारे लिये क्या मददगार है और क्या हानिकारक ।
इसी तरह अगर हमे दूसरों की आलोचना करने की गहरी आदत है तो हम चौथे उपदेश को अभ्यास के लिये चुन सकते हैं । और अगर हमे टी.वी. या इन्टर्नेट का नशा सा है तो हम पाँचवे नियम को भी चुन सकते हैं । बुद्ध ने जब यह पाँच उपदेश दिये थे तन उनका तात्पर्य मादक तत्वों से ही रहा होगा लेकिन वक्त के साथ मनोरंजन की गतिविधिया भी असंख्य हो गयी ।
अगर हमसे कोइ सिद्दांत टूट भी जते है तब इस बात का अवशय ख्याल रखें कि हम अपराध बोध और पछतावे मे अन्तर अवशय रखें ।
इन उपदेशॊ का प्रयोजन हमे प्रसन्न रखना है और दुख से दूर रखना है । अगर हमारी वजह से किसी को चोट पहुची हो तो हमे दुख भी होता है और स्वाभाविक रूप से पश्चाताप   भी । हम इस बात का ध्यान रखे और इससे सबक लें । पछ्तावे के यह क्षण बिना किसी अवशिष्ट भावनाओं को छोड़कर चले जाते हैं । लेकिन कभी –२ पछतावा और प्रायशिचित आत्म घृणा और दुख का कारण बनाता है । तब हम इस बात का ध्यान रखें और  आत्म घृणा और अपराध बोध की बेकार की आदत से बचें क्योंकि यह भी आदत स्व दुख पहुँचाने की आदत सी है ।

Friday, January 1, 2010

नव वर्ष मंगलमय हो - Happy New Year 2010

A blessing of love and compassion

May you be free from hostility
May you be free from free from affliction
May you be free from free from distress
May you have ease of well-being.
May you be free from suffering.

Happy New Year 2010

Thursday, December 17, 2009

एस धम्मो सनंतनॊ – ओशो की दिव्य दृष्टि से

 

यह कुछ अजीब सा इत्त्फ़ाक ही है कि बुद्ध तक पहुँचने तक मेरा मार्ग ओशो की दिव्य वाणी और व्याख्या से निकला । करीब १० वर्ष पूर्व जब पहली बार ओशो द्वारा प्रवचित एस धम्मो सनंतनॊ को पढने और समझने का मौका मिला तो मेरे पथ स्वयं ही बुद्ध की ओर मुड गये । सच मे ओशो ने बुद्ध को बहुत गहराई से समझा है । ’ एस धम्मो सनंतनॊ  ’  मे केवल व्याख्या ही नही है , ओशो की दिव्य मनीषा , गहन बोध , और सहजानुभूति का उन्मेष भी है । सावत्थी मे पंचसत भिक्खु को दिये गय उपदेश ही निहित इस प्रशन – ’ को धमपदं  सुदेसितं कुसलॊ पुप्फ़मिव पचेस्सति ’ – का उत्तर ओशो की  ’ एस धम्मो सनंतनॊ  ’ शीर्षक वार्ता माला के रुप मे हमारे सामने उपसिथत हो गया है  ।

स्वामी प्रेम विस्तार जी का आभारी हूँ जिनकी अथक मेहनत से ओशो की ’’एस धम्मो सनंतनॊ ’  पर यह व्याख्या माला आडियो के रुप मे हमारे सामने है । १२ खंडों मे निहित ’एस धम्मो सनंतनॊ ’ पर ओशो की व्याख्या को डाऊनलोड करने के लिये निम्म लिंक पर चटका लगायें ।

Es Dhammo Sanantano Vol. 01

Es Dhammo Sanantano Vol. 02

Es Dhammo Sanantano Vol. 03

Es Dhammo Sanantano Vol. 04

Es Dhammo Sanantano Vol. 05

Es Dhammo Sanantano Vol. 06

Es Dhammo Sanantano Vol. 07

Es Dhammo Sanantano Vol. 08

Es Dhammo Sanantano Vol. 09

Es Dhammo Sanantano Vol. 10

Es Dhammo Sanantano Vol. 11

Es Dhammo Sanantano Vol. 12

Tuesday, December 8, 2009

Shingon Teaching

 

Shingon is a form of Japanese Esoteric Buddhism, it is also called Shingon Mikkyo. This school was founded in 804 AD by Kukai (Kobo Daishi) in Japan. The teachings of Shingon are based on the Mahavairocana Sutra and the Vajrasekhara Sutra, the fundamental sutras of Shingon. Through the cultivation of three secrets, the actions of body, speech and mind, we are able to attain enlightenment in this very body. When we can sustain this state of mind, we can become one with the life force of the Universe, known as Mahavairocana Buddha. The symbolic activities are present anywhere in the universe. Natural phenomena such as mountains and oceans and even humans express the truth described in the sutras.
The universe itself embodies and can not be separated from the teaching. In the Shingon tradition, the practitioner uses the same techniques that were used over 1,200 years ago by Kukai, and have been transmitted orally generation after generation to the present. As Shingon Buddhists, there are three vows to observe in our lives:
May we realize Buddhahood in this very life.
May we dedicate ourselves to the well-being of people.
May we establish the World of Buddha on this earth.
Becoming a Buddha in This Very Life (Sokushin Jobutsu) The unique feature of this Shingon Teaching is that one does not become a Buddha only in his mind, nor does one become a Buddha after one has died. It means one is able to attain perfection of all of the qualities of a Buddha while one is yet living in his present physical body. An essay on the Bodhicitta (Bodaishin-ron) says: "One speedily attained great Awakening in the very body born of mother and father." According to the Shingon tradition, all things in this universe -- both physical matter, mind and mental states -- are made up of some six primary elements. These six primary elements are: earth (the principle of solidity), water (moisture), fire (energy), wind (movement), space (the state of being unobstructed) and consciousness (the six ways of knowing objects). Buddha as well as ordinary human beings are made up of these six elements, and in this sense both Buddha and human beings are basically and in essence identical. When we realize this truth, then our actions, our words, and our thoughts will undergo and experience of faith which will cause them to be correct and purify their surroundings. This living, physical body will be able to achieve Buddhahood.
Salvation and Enlightenment. Shingon Buddhism grants salvation and enlightenment to human beings who would otherwise be caught in the cycle of birth and death. Once a person is able to enter the gate of this faith, he/she will be able to receive that salvation and guidance of many Buddhas and Bodhisattvas. It is a religion in which that person will be fortunate enough to be able to recite the mantras that are the Buddha's own words. Kobo Daishi explained two points as its special characteristics:
1. Attainment of enlightenment in this very body.
2. The present moment that clearly teaches the content of enlightenment.
He explained these two aspects throughout his writings like, "The Meaning of Becoming a Buddha in This Body," "The Ten Stages in the Development of the Mind," "The Meaning of the Secret Samaya Precepts of the Buddha." It is a blessings of Shingon Buddhism to make it possible to come into direct contact with the practices leading to salvation. Shingon discipline The Shingon Teachings are broad and profound, and require strict discipline to put into practice. If we do not personally practice them in our daily lives of faith, then this treasure will become a useless possession. In actuality, we must manifest the teachings and practice of becoming a Buddha in this body in concrete form. The form of this faith is the developing one's mind into higher stage and engaging in discipline. There are various meditation techniques in Shingon traditions including the practice for gaining secular benefits for others by using mantra chanting and mudra hand signs as well as seeking enlightenment in this very body for oneself.
Shingon Discipline
The followings are some of the major forms practiced by many practitioners: Susokukan (Basic meditation to find one's own breathing pace) Gachirinkan (Moon Disc meditation) Ajikan (A syllable meditation) These practices are gateways into understanding the nature of Reality. Through these gateways we can experience many states of consciousness and as our skill develops we begin to have real insight into the nature of the unproduced state. Through these meditations we can experience the flow of energy from this state into this physical plane of existence. However, this state cannot be experienced without correct understanding of its doctrine and the guide by an authentic teacher.
Seicho Asahi
Northern California Koyasan Temple
http://www.koyasan.org/nckoyasan/intr...

source : www.youtube.com

Heart of the Buddhist Prajna-Paramita Sutra-प्रज्ञापारमिताहृदय मन्त्र (Prajna Paramita Mantra)

“गते गते पारगते पारसंगाते बोधि स्वाहा”

gate gate pāragate pārasaṃgate bodhi svāhā

जागृत  हो , वह चला गया है , हमेशा के लिये परे चला गया है !!

gone gone, gone beyond, gone altogether beyond, O what an awakening, all hail!

Heart of the Buddhist Prajna-Paramita Sutra which is also known as Heart Sutra, is the shortest and most popular sutra in Buddhism. Heart Sutra is taken as the essence of Gautam Buddha Teachings.
In the English Translation the word 'Emptiness' is very often used. 'Emptiness' is the usual translation for the Buddhist term Sunyata which means Nothingness.
English Translation of heart Sutra is follows:

Body is nothing more than emptiness,
emptiness is nothing more than body.
The body is exactly empty,
and emptiness is exactly body.

The other four aspects of human existence --
feeling, thought, will, and consciousness --
are likewise nothing more than emptiness,
and emptiness nothing more than they.

All things are empty:
Nothing is born, nothing dies,
nothing is pure, nothing is stained,
nothing increases and nothing decreases.

So, in emptiness, there is no body,
no feeling, no thought,
no will, no consciousness.
There are no eyes, no ears,
no nose, no tongue,
no body, no mind.
There is no seeing, no hearing,
no smelling, no tasting,
no touching, no imagining.
There is nothing seen, nor heard,
nor smelled, nor tasted,
nor touched, nor imagined.

There is no ignorance,
and no end to ignorance.
There is no old age and death,
and no end to old age and death.
There is no suffering, no cause of suffering,
no end to suffering, no path to follow.
There is no attainment of wisdom,
and no wisdom to attain.

The Bodhisattvas rely on the Perfection of Wisdom,
and so with no delusions,
they feel no fear,
and have Nirvana here and now.

All the Buddhas,
past, present, and future,
rely on the Perfection of Wisdom,
and live in full enlightenment.

The Perfection of Wisdom is the greatest mantra.
It is the clearest mantra,
the highest mantra,
the mantra that removes all suffering.

This is truth that cannot be doubted.
Say it so:

Gaté,
gaté,
paragaté,
parasamgaté.
Bodhi!
Svaha!

 

         Which means...

        Gone,
        gone,
        gone over,
        gone fully over.
        Awakened!
        So be it!

जागृत  हो , वह चला गया है , हमेशा के लिये परे चला गया है !!

courtesy : http://www.messagefrommasters.com/Life_of_Masters/Buddha/heartsutra.htm

Monday, December 7, 2009

Promise me

Promise me,
promise me this day,
promise me now,
while the sun is overhead
exactly at the zenith,
promise me:
Even as they strike you down
with a mountain of hatred and violence;
even as they step on you and crush you
like a worm,
even as they dismember and disembowel you,
remember, brother, remember:
man is not your enemy.
The only thing worthy of you is
compassion --invincible, limitless, unconditional.
Hatred will never let you face the
beast in man.
One day, when you face this beast alone,
with your courage intact, your eyes kind, untroubled(even as no one sees them),
out of your smile will bloom a flower.
And those who love you will behold you
across ten thousands worlds of birth
and dying.
Alone again,
I will go on with bent head,
knowing that love has become eternal.
On the long, rough road,
the sun and the moon
will continue to shine.
~Thich Nhat Hanh

Tuesday, November 24, 2009

विषम परिस्थितियों में भी राहें हैं ….. (When there’s no way out there’s still a way through…)

जब जीवन बोझ और तनाव से ग्रसित दिखे तो क्या करे , जब परिस्थितयाँ अपने अनूकूल न हो उन क्षणॊं मे कहाँ जायें । देव कैरोल ( Dave Carroll) का यह वीडियो , “Now” इन क्षणॊं को गंभीरता से तलाशता सा प्रतीत होता है । “Now” देव की एलबम "Perfect Blue" से है जिसकी प्रेरणा उन्हें इकहर्ट टौले (Eckhart Tolle) की पुस्तक "The Power of Now" से प्राप्त हुयी । शब्दों का बहुत ही खूबसूरत मंजर को देव ने  अपने संगीत और कंठ से निखारा है ।

NOW

- Dave Carroll (Socan)

When there’s no way out there’s still a way through
So don’t give up whatever you do
Surrender to moments and things as they are
From the gaps in your catch-22’s
When there’s no way out there’s still a way through

Chorus:
Cause Now’s all there is
So peaceful and still
In Now you don’t worry ‘bout what’s happened or what will
Cause Now never ends
And Now’s never been
And all of your answers are waiting for you here Now

When your world stands tough and weighin’ you down
And you’ve had enough of this merry-go-round
End your resistance to walls you won’t move
And runnin’ through old déjà vu’s
When there’s no way out there’s still a way through

Chorus

Bridge:
And when you don’t understand
How things got so far away from all you planned
And your life it feels so hard
In your fragile house of cards
Turn to your cornerstone when you’re tired and feel alone
To find your way through

Chorus

Holy Buddhist Tipitaka: Itivuttaka The Group of Threes

Saturday, November 14, 2009

Daily Life

 

IMG_0916

Try to be mindful, and let things take their natural course.
Then your mind will become still in any surroundings,
        like a clear forest pool.
All kinds of wonderful, rare animals will come to drink at the pool,
        and you will clearly see the nature of all things.
You will see many strange and wonderful things come and go,
        but you will be still.
This is the happiness of the Buddha.
                                    ~  Ajahn Chah, from "A Still Forest
Pool"_

Saturday, September 12, 2009

पौराणिक एनिमेशन फिल्म - बुद्ध (हिंदी) -Mythological Animation Film - Buddha (Hindi)

राजश्री प्रोड्क्शन ने गत वर्ष गौतम बुद्ध पर एक पौराणिक एनीमेशन फ़िल्म का निर्माण किया था । ३० मिनट की यह ऐनीमेशन फ़िल्म हिन्दी मे है और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और जीवनी पर आधारित यू ट्यूब पर उपलब्ध है ।

Wednesday, July 22, 2009

नालन्दा विशवविधालय – एक इतिहास जो संभवत: पुनर्जीवित हो …

इतिहास हमेशा कडवा ही क्यूं होता है । क्यूं एक धर्म के मतावल्म्बी दूसरे धर्म से इतनी नफ़रत रखते हैं । धम्मपद की गाथा मे  बुद्ध कहते हैं 

न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
इस लोक मे कभी भी वैर से वैर शांत नहीं होता , बल्कि अवैर से शांत होता है । यही सनातन धर्म है ।  धम्मपद : यमकवग्गो- गाथा ५

परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥
अनाडी लोग नही जानते कि हम इस संसार से जाने वाले हैं । जो इसे जान लेते हैं उनके झगडॆ शांत हो जाते हैं । धम्मपद: यमकवग्गो- गाथा ६
काश इस तथ्य को सभी धर्मालम्बी समझें  और परस्पर प्रेम से  रहें । लेकिन क्या यह संभव है ,  इतिहास इतना अधिक क्रूर और भयावह है कि इसकी परिकल्पना भी नही की जा सकती । अपने देश मे अनेक मन्दिर और बौद्ध शिक्षा केन्द्र इसलामी विचारों की भेंट चढे यह एक इतिहास की अजीब सी विडंबना है कि हिन्दू और बौद्ध विचारों को मुस्लिम सोच ने नष्ट किया और बाद में बुद्ध धर्म की फ़ैलती शाखाओं को हिन्दू धर्म से आदि शंकारकाचार्य ने नष्ट किया । यही नही यह सोच अब तक जारी है ,  वर्तमान मे पाकिस्तान मे स्वात में तालिबान की बौद्ध धर्मस्थलॊ को नष्ट करने की धमकी या कुछ वर्ष पूर्व अफ़गानिस्तान मे बामियान मे बुद्ध प्रतिमा को नष्ट करना भी इसी सोच का नतीजा है ।
नालन्दा विशवविधालय की वर्तमान स्थिति भी इसी कटरवादी सोच का नतीजा थी  । संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है ज्ञान देने वाला (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना)। बुद्ध अपने जीवनकाल में कई बार नालंदा आए और लंबे समय तक ठहरे। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण भी नालंदा में ही पावापुरी नामक स्थान पर हुआ। कहते हैं कि खिलजी जब नालंदा पहुंचा, तब उसने पूछा कि यहां पवित्र कुरान है क्या? उत्तर नहीं में मिलने पर उसने यहां आग लगवा दी, सब कुछ तहस-नहस कर दिया। इरानी विद्वान मिन्हाज के अनुसार कई विद्वान शिक्षकों को ज़िन्दा जला दिया गया और कईयों के सर काट लिये गए। इस घटना को कई विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म के पतन के एक कारण के रूप में देखा जाता है। कई विद्वान यह भी कहते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों के नष्ट हो जाने से भारत आने वाले समय में विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और गणित जैसे क्षेत्रों मे पिछड़ गया ।
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के अतुल्य भारत अभियान के साथ मिल कर एनडीटीवी द्वारा आयोजित एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के तहत कोणार्क सूर्य मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, खजुराहो, लाल किला, दिल्ली, जैसलमेर दुर्ग, नालंदा विश्वविद्यालय और धौलावीर जैसे स्थलों को भारत के सात आश्चर्य के रूप में चुना गया है। वीडियो के लिये साभार : यू ट्यूब
नालंदा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य में पटना से ९० कि.मी. दूर नालंदा शहर में स्थित एक प्राचीन विश्वविद्यालय था। देश विदेश से यहाँ विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। आज इसके केवल खंडहर देखे जा सकते हैं। नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेषों की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। माना जाता है कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना ४५०-४७० ई. में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी।  इस विश्वविद्यालय को इसके बाद आने वाले सभी शासक वंशों का सहयोग मिला। महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इसे केवल यहां के स्थासनीय शासक वंशों से ही नहीं वरन विदेशी शासकों से भी दान मिला था। इस विश्वविद्यालय का अस्तित्व १२वीं शताब्दी तक बना रहा। इसके ऊपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल द्वारा किया गया, व ११९९ में में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसको जला कर पूरी तरह समाप्त कर दिया।
इस विश्वविद्यालय के बारे में माना जाता है कि यह विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। इसमें करीब १०,००० छात्र एक साथ विद्या ग्रहण करते थे। यहां २००० शिक्षक छात्रों को पढ़ाते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अदभूत नमूना था। यह पूरा परिसर इस विश्वविद्यालय के बारे में माना जाता है कि यह विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। इसमें करीब १०,००० छात्र एक साथ विद्या ग्रहण करते थे। यहां २००० शिक्षक छात्रों को पढ़ाते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अदभूत नमूना था। यह पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था तथा इसमें प्रवेश के लिए केवल एक ही मुख्य द्वार था। इस परिसर में आठ विशाल भवन, दस मंदिर, कई प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष थे। इसके अलावा यहां सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी। यहां विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। यहां उनके रहने के लिए ३०० कक्ष बने थे, जिनमें अकेले या एक से अधिक छात्रों के रहने की व्यवस्था थीं। यहां के नौ तल के पुस्तकालय में ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था।[२] इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। ये पुस्तकें खिलजी के आक्रमण के बाद छः महीनों तक जलती रहीं। इस विश्वविद्यालय में केवल भारत से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। यहां विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शनशास्त्र, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। यहां खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था। यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे:
    * रत्नसागर पुस्तकालय
    * विद्यासागर पुस्तकालय
    * ग्रंथागार पुस्तकालय
इस विश्वविद्यालय के अवशेष चौदह हेक्टेयर क्षेत्र में मिले हैं। खुदाई में मिली सभी इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया था। यह परिसर दक्षिण से उत्तर की ओर बना हुआ है। मठ या विहार इस परिसर के पूर्व दिशा में व चैत्य (मंदिर) पश्चिम दिशा में बने थे। इस परिसर की सबसे मुख्य इमारत विहार-१ थी। आज में भी यहां दो मंजिला इमारत शेष है। यह इमारत परिसर के मुख्य आंगन के समीप बना हुई है। संभवत: यहां ही शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित किया करते थे। इस विहार में एक छोटा सा प्रार्थनालय भी अभी सुरक्षित अवस्था में बचा हुआ है। इस प्रार्थनालय में भगवान बुद्ध की भग्न प्रतिमा बनी है। यहां स्थित मंदिर नं ३ इस परिसर का सबसे बड़ा मंदिर है। इस मंदिर से समूचे क्षेत्र का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यह मंदिर कई छोटे-बड़े स्तूपों से घिरा हुआ है। इन सभी स्तूपों में भगवान बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां बनी हुई है।
नालन्दा पुरातात्विक संग्रहालय
विश्वविद्यालय परिसर के विपरीत दिशा में एक छोटा सा पुरातात्विक संग्रहालय बना हुआ है। इस संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है। इसमें भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। इनके साथ ही बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियां और प्रथम शताब्दी के दो मर्तबान भी इस संग्रहालय में रखा हुआ है। इसके अलावा इस संग्रहालय में तांबे की प्लेट, पत्थर पर खुदे अभिलेख, सिक्के, बर्त्तन तथा १२वीं सदी के चावल के जले हुए दाने रखे हुए हैं।
नव नालन्दा महाविहार
यह एक शिक्षण संस्थान है। इसमें पाली साहित्य तथा बौद्ध धर्म की पढ़ाई तथा शोध होती है। यह एक नया स्थापित संस्थान है। इसमें दूसरे देशों के छात्र भी पढ़ाई के लिए यहां आताे हैं।
ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल
यह एक नवर्निमित भवन है। यह भवन चीन के महान तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग की स्मृति में बनवाया गया है। इसमें ह्वेनसांग से संबंधित वस्तुएं तथा उनकी मूर्ति देखी जा सकती है।
नालन्दा विशविधालय – पुनर्जीवन का प्रयास :

नालंदा विश्वविद्यालय के नाम पर एक नए विश्वविद्यालय की स्थापना  भारत सरकार द्वारा इसके पुनर्जीवन का प्रयास है । प्रसिद्ध नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अमर्त्य सेन के अनुसार वर्ष २०१० तक शैक्षणिक सत्र भी आरंभ हो जाएगा। इसके पुनर्जीवन प्रयास में सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग देने का वादा किया है। इसके ऊपर संसद में विधेयक पारित होने पर इसके भवन का निर्माण भी शुरु हो जाएगा। इसमें ईस्ट एशिया सम्मेलन के १६ देश आर्थिक सहयोग देंगे।
साभारविकीपीडिया