थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के बौद्ध मंदिर मे देखा जा सकता है ।
साभार : दुनिया का एकमात्र टेंपल जहां बाघ और इंसान रहते हैं साथ-साथ
थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के बौद्ध मंदिर मे देखा जा सकता है ।
साभार : दुनिया का एकमात्र टेंपल जहां बाघ और इंसान रहते हैं साथ-साथ
बहुत से लोग बुद्ध धम्म को दुखवादी (pessimistic ) समझते हैं लेकिन अगर हम भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान किये गये पंचशील सिद्दांत को गौर से देखें तो यह जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं । यह पंचशील सिद्दांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमे सिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दु:ख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं ।
बुद्ध के पाँच उपदेश हैं :
प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना ।
चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से विरत रहना ।
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना ।
असत्य बोलने से विरत रहना ।
मादक पदार्थॊं से विरत रहना ।
बुद्ध के यह पाँच उपदेशों को हम व्यवाहार के “प्रशिक्षण के नियम” के रुप मे समझे न कि किसी आज्ञा के रुप मे । यह ऐसा अभ्यास है जिसका विकास करके ध्यान, ज्ञान, और दया को पा सकते हैं ।
हम इन पाँच उपदेशों को कैसे समझते है यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । जैसे कुछ लोग चीटीं को मार नही सकते लेकिन माँस खाते हैं या फ़िर कुछ सिर्फ़ शाकाहारी ही होते हैं । कुछ मदिरा को हाथ भी नही लगाते और कुछ दिन मे सिर्फ़ एक आध पैग लगाते हैं क्योकि इससे उनको लगता है कि इससे उनको सूकून मिलता है या कुछ हमेशा नशे मे धुत रहते हैं । यह पाँच उपदेश यह नही सिखाते कि क्या सही है बल्कि अगर हम ईमानदारी से तय करे कि हमारे लिये क्या मददगार है और क्या हानिकारक ।
इसी तरह अगर हमे दूसरों की आलोचना करने की गहरी आदत है तो हम चौथे उपदेश को अभ्यास के लिये चुन सकते हैं । और अगर हमे टी.वी. या इन्टर्नेट का नशा सा है तो हम पाँचवे नियम को भी चुन सकते हैं । बुद्ध ने जब यह पाँच उपदेश दिये थे तन उनका तात्पर्य मादक तत्वों से ही रहा होगा लेकिन वक्त के साथ मनोरंजन की गतिविधिया भी असंख्य हो गयी ।
हाँ , अगर हमसे कोई सिद्दांत टूट भी जते है तब इस बात का अवशय ख्याल रखें कि हम अपराध बोध से ग्रस्त न हों । अपरध बोध और पछतावे मे अन्तर हमें स्व दुख से बचाता है ।
इन उपदेशॊ का प्रयोजन हमे प्रसन्न रखना है और दुख से दूर रखना है । अगर हमारी वजह से किसी को चोट पहुची हो तो हमे दुख भी होता है और स्वाभाविक रूप से पश्चाताप भी । हम इस बात का ध्यान रखे और इससे सबक लें । पछ्तावे के यह क्षण बिना किसी अवशिष्ट भावनाओं को छोड़कर चले जाते हैं । लेकिन कभी –२ पछतावा और प्रायशिचित आत्म घृणा और दुख का कारण बनाता है । तब हम इस बात का ध्यान रखें और आत्म घृणा और अपराध बोध की बेकार की आदत से बचें क्योंकि यह भी आदत स्व दुख पहुँचाने की आदत सी है ।
DIFFERENT ATTITUDE OF THE HUMAN MIND
"Some persons are like letters carved on a rock, they easily give way to anger and retain their angry thoughts for a long time. Some are likeletters written in sand; they give way to anger also, but the angry thoughts quickly pass away. Some men are like letters written in the water; they do not retain their passing thoughts. But the perfect ones are like letters written in the wind, they let abuse and uncomfortable gossip pass by unnoticed. Their minds are always pure and undisturbed." Venerable Dr. K. Sri Dhammananda
चीन के हेबेई प्रांत में पुरातत्वविदों ने बुद्ध की 2,000 से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं खोजी हैं.
इन प्रतिमाओं की खोज से पता चलता है कि साम्यवादी देश में बौद्ध धर्म तब से ही लोकप्रिय है जब इसका भारत में प्रसार हुआ था.
लिनझांग काउंटी के येशेंग स्थित एक ऐतिहासिक स्थल पर मिलीं बुद्ध की ये 2,895 प्रतिमाएं और उनके अवशेष पूर्वी वेई और उत्तरी क्वी काल (534-577) के हैं.
‘इन्स्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी ऑफ द चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज’ और ‘हेबेई प्रॉवीन्शियल इन्स्टीट्यूट ऑफ कल्चरल हैरिटेज’ के पुरातत्वविदों के अनुसार, ये प्रतिमाएं सफेद संगमरमर और नीले पत्थरों से बनी हैं. कुछ प्रतिमाओं पर रंग किया गया है या कलई की गई है.
खबर के मुताबिक हेबेई प्रॉवीन्शियल ब्यूरो ऑफ कल्चरल हैरिटेज’के एक अधिकारी झांग वेनरूई ने बताया कि प्रतिमाओं की लंबाई 20 सेन्टीमीटर से लेकर एक वास्तविक व्यक्ति के आकार तक की है.
पुरातत्वविद संरक्षण और अनुसंधान के लिए इन प्रतिमाओं की मरम्मत कर रहे हैं. समझा जाता है कि करीब 2,000 साल पहले भारत से बौद्ध धर्म का चीन में प्रसार हुआ था.
साभार : समय लाइव
एक ज़ेन शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, "जीवन इतना अधिक समस्याग्रस्त क्यूं दिखाई देता है ?".
ज़ेन गुरु ने कहा " एक आदमी नाव के होते हुये भी पानी मे बैठता है तो उसको तुम क्या कहोगे ?"
शिष्य ने कहा , “ अगर उसके पास नाव है तो वह पानी में क्यूं बैठेगा ? ”
“ अगर तुम्हारे पास चेतना है तो समस्याग्रस्त जीवन मे क्यूं बैठते हो ” जेन गुरु ने उत्तर दिया ।
John Weeren की कहानी “ Story; a man, a boat ” का हिन्दी अनुवाद ।
जापान में टेटसुगेन नाम का एक जेन शिष्य था। एक दिन उसके मन में ख्याल आया कि धर्म सूत्र केवल चीनी भाषा में ही हैं, उन्हें अपनी भाषा में प्रकाशित करना चाहिए। सूत्र के सात हजार ग्रंथ प्रकाशित करने का अनुमान लगा।
ग्रंथ के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन देश में घूमकर धन इकट्ठा करने निकला। लोगों ने उदार हृदय से टेटसुगेन की मदद की। किसी-किसी ने तो उसे 100 सोने के सिक्के तक दिए। लोगों को टेटसुगेन ने बदले में धन्यवाद दिया। वह इस काम में दस साल तक लगा रहा और तब जागर टेटसुगेन के पास ग्रंथ प्रकाशन के लिए पर्याप्त धन इकट्ठा हो गया।
उसी समय देश में एक नदी में बाढ़ आई। बाढ़ अपने पीछे अकाल छोड़ गई। टेटसुगेनने जो धन ग्रंथ प्रकाशन के लिए इकट्ठा किया था वह लोगों की सहायता में खर्च कर दिया। इसके बाद जब परिस्थितियाँ सामान्य हुईं तो वह फिर से ग्रंथ के प्रकाशन के लिए धन संग्रह करने निकला।
टेटसुगेन को धन इकट्ठा करते हुए कुछ साल बीत गए। इधर फिर से देश में एक महामारी फैल गई। टेटसुगेन ने अभी तक जो भी धन इकट्ठा किया था वह फिर से लोगों की सेवा में खर्च कर दिया। इस तरह उसने कई लोगों को मरने से बचाया।
ग्रंथ के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन ने तीसरी बार धन इकट्ठा करने का निश्चय किया। बीस साल बाद जाकर उसकी ग्रंथ प्रकाशित करने की इच्छा पूरी हो पाई। उसने ग्रंथों के संकलन का पहला संस्करण निकाला और वह क्योटो की ओबाकू विहार में आज भी देखा जा सकता है। जापान में आज भी लोग टेटसुगेन को याद करते हुए कहते हैं कि उसने तीन बार सूत्रों के ग्रंथ प्रकाशित करवाए। तीसरा ग्रंथ हमें दिखता है, जबकि पहले दो ग्रंथ जो ज्यादा महत्वपूर्ण हैं हमें दिखलाई नहीं पड़ते।
साभार : हिन्दी वेब दुनिया
मैं लक्ष्य तक पहुँचने में और अधिक किस तरह प्रभावी हो सकता हूँ ?" एक ज़ेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा.
" क्या तुमने कभी सेब के वृक्ष को सेब के फ़ल के अतिरिक्त किसी और फ़ल का उत्पादन करते हुये देखा है ? ” जेन गुरु ने कहा ।
"नहीं," छात्र ने कहा. "लेकिन इसका मेरे प्रशन के साथ क्या संबध है ? "
” फ़िर तुम किस तरह के वृक्ष हो ? ” जेन गुरु ने एक भेदी मुस्कान के साथ पूछा !!
John Weeren की जेन कहानी “ apple tree ” का हिन्दी मे अनुवाद ।
डां के.श्री धम्मानन्द जी की “ धम्म जीवन कैसे जियें ” मूलत: ‘How to practice Buddhism ‘ का हिन्दी अनुवाद है । जैसा कि पुस्तक के नाम से स्पष्ट है कि यह पुस्तक बुद्ध धम्म को प्रतिदिन के व्यवहार में प्रयुक्त करने हेतु दिशानिर्देश प्रस्तुत करती है । बौद्ध आध्यात्मिक साहित्य मे बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन दिशा निर्देशों के अभाव मे सब कुछ स्पष्ट नही है । श्री प्रेम गोपाल दुग्गल जी द्वारा अनुवादित और श्री राजेश चन्द्रा जी द्वारा संपादित डां के.श्री धम्मानन्द जी की यह पुस्तक बुद्ध धम्म के कई अनछुये पहुलऒं को छूती है जिनमें सामाजिक , बौद्धिक , और स्थानीय परम्परायें भी शामिल है ।
डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/een214d0g74bamzasjgv
Dhaam Jeevan Kaise Jiyenआचार्य बोधिधम्म ने नौ वर्षों तक के अपने प्रवास में चीन में मात्र पाँच शिष्य और एक शिष्या को दीक्षा दिया । भारत आते समय उन्होनें अपने सभी शिष्यों से एक ही प्रशन किया – “ तुमने धम्म का क्या अर्थ समझा? ”
प्रथम शिष्य ताओ फ़ू ने कहा , “ धम्म भाषा और शब्दों से परे है लेकिन वह भाषा और शब्द से पृथक नही है ।”
बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म की त्वचा को स्पर्श कर लिया है । ”
शिष्या त्संग चीह ( सोजी ) ने कहा , “ अक्षोभ्य बुद्ध भूमि का दर्शन धम्म है , उनके दर्श्न की पुनरावृति नहीं होती । ”
बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का ह्र्दय छू लिया । ”
तीसरे शिष्य ताओ यू ने कहा , “ मौलिक रुप से पाँच तत्व शून्य है और पाँचवे का अस्तित्व नही है । धम्म इन पाँचों तत्वों से परे है ।”
बोधिधम्म ने अनुमोदन किया , “ तुम धम्म की अस्थियों तक पहुँच गये हो “
हुई को दो कदम आगे बढा , बोधिधम्म के पाँव छुये फ़िर दो कदम पीछे हो कर चुपचाप खडा हो गया , कहा कुछ नहीं ।
बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का मर्म पा लिया "। ”
शिष्य हुई को अपना उत्तराधिकार सौंप कर आचार्य बोधिधम्म वापस भारत आ गये और हिमालय मे कही विलीन हो गयॆ ।
यह भिन्न –२ प्रसंग बुद्ध धम्म के केन्द्रीय तत्व की ओर संकेत दे रहे हैं – चित्त का परिशोधन , अकुशल कर्मों से विरति और कुशल कर्मों का सम्पादन ।
एक जेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा .“ क्या जेन ध्यान का मकसद स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा है ? “
उसके गुरु ने कहा , “ नहीं “
“ तो क्या जीवन की परेशानियाँ और अंशाति से बचने का उपाय जेन ध्यान मे है ? ”
गुरु ने कहा , “ बचना कैसा ? “ जेन वास्तविकता को उसी रुप में स्वीकार करने की कला है । ”
John Weeren की जेन कहानी “ escape “ का हिन्दी अनुवाद
.
डां के. श्री. धम्मानन्द जी की यह लघु पुस्तिका ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ उनकी अंगेजी मे लिखी ’ Moral & Ethical conduct of a Buddhist ‘ का हिन्दी मे अनुवाद है । डां श्रीमती इन्दु अग्रवाल ने इस पुस्तिका का सुरुचिपूर्ण भाषा मे प्रवाहमेय अनुवाद किया है और हमेशा की तरह श्री राजेश चन्द्रा जी ने इस पुस्तिका का उत्कृष्ट रुप से संपादन किया है ।
गत सप्ताह मेरे अभिग्न मित्र श्री राजेश जी ने मुझे दो पुस्तिकायें भेटं स्वरुप दी । पिछ्ले काफ़ी समय से हम नेट के माध्यम से जुडे रहे लेकिन अधिक व्यवस्सता के कारण मिलना संभव न हो पाया । गत सप्ताह यह मिलन आकस्मिक और बहुत ही सुखद पूर्ण रहा । पिछ्ले साल श्रावस्ती भ्रमण के दौरान जिस तरह वह मेरे साथ फ़ोन के माध्यम से लगातार सुबह से रात तक जुडे रहे उससे मुझे कही नही लगा कि हम दोनों मे पूर्व का परिचय नही है ।
लेकिन बात पहले ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ की । डां के. श्री. धम्मानन्द जी इस पुस्तिका का केन्द्रीय विषय बौद्धों की आचरण नियमावली है । यह पुस्तिका न सिर्फ़ भिक्खुओं के लिये उपयोगी है बल्कि उपासकों के लिये भी लाभकारी है । जनमानस को भगवान बुद्ध का यही संदेश मिलता है “ सत्कर्म करो , शुद्ध विचार रखो और दुषकर्म से दूर रहो । ” बुद्ध के समय मे भी ये शब्द उतने ही सच थे जितने आज हैं और कल भी रहेगें ।
इस पुस्तिका की scanned image बहुत ही उत्कृष्ट quality की नही है लेकिन जैसे ही यह सिगांपुर से श्री टी वाई ली की साइट पर उपलोड होगी तब उसका डाउनलोड लिंक यहाँ उपलब्ध करा दिया जायेगा ।
डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/lcp84ip2t6cg676j5rs9
बौद्ध नियम एवं आचरणभगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को दीक्षा देने के उपरांत उन्हें धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए अन्य नगरों और गावों में जाने की आज्ञा दी।बुद्ध ने सभी शिष्यों से पूछा – “तुम सभी जहाँ कहीं भी जाओगे वहांतुम्हें अच्छे और बुरे – दोनों प्रकार के लोग मिलेंगे। अच्छे लोगतुम्हारी बातों को सुनेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे। बुरे लोग तुम्हारीनिंदा करेंगे और गालियाँ देंगे। तुम्हें इससे कैसा लगेगा?”
हर शिष्य ने अपनी समझ से बुद्ध के प्रश्न का उत्तर दिया। एक गुणी शिष्य ने बुद्ध से कहा – “मैं किसी को बुरा नहीं समझता। यदि कोई मेरी निंदा करेगा या मुझे गालियाँ देगा तो मैं समझूंगा कि वह भला व्यक्ति है क्योंकि उसने मुझे सिर्फ़ गालियाँ ही दीं, मुझपर धूल तो नहीं फेंकी।”
बुद्ध ने कहा – “और यदि कोई तुमपर धूल फेंक दे तो?”
“मैं उन्हें भला ही कहूँगा क्योंकि उसने सिर्फ़ धूल ही तो फेंकी, मुझे थप्पड़ तो नहीं मारा।”
“और यदि कोई थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे?”
“मैं उन्हें बुरा नहीं कहूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे थप्पड़ ही तो मारा, डंडा तो नहीं मारा।”
“यदि कोई डंडा मार दे तो?”
“मैं उसे धन्यवाद दूँगा क्योंकि उसने मुझे केवल डंडे से ही मारा, हथियार से नहीं मारा।”
“लेकिन मार्ग में तुम्हें डाकू भी मिल सकते हैं जो तुमपर घातक हथियार से प्रहार कर सकते हैं।”
“तो क्या? मैं तो उन्हें दयालु ही समझूंगा, क्योंकि वे केवल मारते ही हैं, मार नहीं डालते।”
“और यदि वे तुम्हें मार ही डालें?”
शिष्य बोला – “इस जीवन और संसार में केवल दुःख ही है। जितना अधिक जीवित रहूँगा उतना अधिक दुःख देखना पड़ेगा। जीवन से मुक्ति के लिए आत्महत्या करना तो महापाप है। यदि कोई जीवन से ऐसे ही छुटकारा दिला दे तो उसका भी उपकार मानूंगा।”
शिष्य के यह वचन सुनकर बुद्ध को अपार संतोष हुआ। वे बोले – तुम धन्य हो। केवल तुम ही सच्चे साधु हो। सच्चा साधु किसी भी दशा में दूसरे को बुरा नहीं समझता। जो दूसरों में बुराई नहीं देखता वही सच्चा परिव्राजक होने के योग्य है। तुम सदैव धर्म के मार्ग पर चलोगे।”
साभार : हिंदीजेन
कहते हैं कि एक हजार वर्ष पूर्व लेबनान के ढाल पर दो दार्शनिक आ मिले . एक ने दूसरे से पूछा , “ कहाँ जा रहे हो तुम ?”
दूसरे ने उत्तर दिया , “ मै तो यौवन के निर्झर की तलाश मे जा रहा हूँ . मेरे ध्यान इन्हीं किसी पहाडियों के मध्य उसका सोता प्रस्फ़ुटिक होता है . पर तुम ? तुम क्या खोज रहे हो ? "
पहले आदमी ने उत्तर दिया , “ मैं तो मॄत्यु के रहस्य की तलाश कर रहा हूँ . "
तब दोनों दार्शिनिकों ने एक दूसरे के प्रति धारणा बना ली कि दूसरा उनकी महान विधा से अपरिचित है . वे आपस में लडने झगडने लगे और एक दूसरे कॆ अन्धविशवास की आलोचना करने लगे .
तभी उधर से एक अजनबी निकला, जो गाँव मे महामूर्ख समझा जाता था . वह उनके बीच की गर्मा गर्म बहस और तर्कों को सुनता रहा .
उसके बाद वह उनके निकट आ कर बोला , “ भलेमानुसो , ऐसा लगता है तुम दोनों एक ही सिद्दान्त के मानने वाले हो और तुम दोनो एक ही बात कह भी रह हो . अन्तर तो सिर्फ़ शब्दों का है . तुममे से एक यौवन के निर्झर की तलाश कर रहा है और दूसरा मृत्यु के रहस्य की खोज , पर हैं तो दोनों एक ही , और वह दोनों एकरुप होकर तुम दोनो मे बसते हैं . "
वह अपरिचित दोनों से विदाई लेता हुआ चल दिया और जाते-२ खूब हँसा .
दोनों दार्शनिकों ने चुपचाप कुछ क्षणॊं के लिये एक दूसरे को देखा और तब वए दोनों भी हँस पडॆ और उनमें से एक ने कहा , “ अच्छा तो हम दोनों मिलकर खोज करें न ?"
खलील जिब्रान की यह लघु कथा मुझे कई अर्थॊं मे महत्वपूर्ण लगती है . इस संसार मे इतने सारे धर्म , उनके अनुनायी होते हुये भी कहीं समरसता नजर नही आती . हर धर्म दूसरे धर्म को तो या तो नीची दृष्टि से देखता है या अपने ही धर्म को सर्वोच्च करने मे लगा रहता है . इतिहास गवाह है कि विभिन्न धर्मों मे यह लुका छिपी का खेल अनेक बार खूनी जंग मे तब्दील हो चुका है . जब सब के अंतिम मार्ग एक ही हैं तो यह खूनी जंग क्यूं ?
ईशवर है या नही …यह एक कपोल कल्पित प्रशन है , वह किस रुप मे है , इसमे भी भिन्न-२ राय हो सकती है , लेकिन एक बात सच है कि दु:ख और पीडायें हर इंसान मे सामान्य रुप से हैं .
एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “
भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “
इसी तरह भिक्षुओं ऐसी अनगिनत चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और न ही मन को शांत करती है ।
इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को दूर करता हैं और मन को शांत करता है । संयुत्त निकाय 56.31
साभार : विस्फ़ॊट.काम
अफगानिस्तान के काबुल संग्रहालय में रखे महात्मा बुद्ध के भिक्षा पात्र से जुडे कई अनुत्तरित सवालों के उत्तर तलाशने में भारत का विदेश मंत्रालय इन दिनों जुटा हुआ है। हरे ग्रेनाइट से बने करीब 300 किलोग्राम वजनी इस भिक्षा पात्र के बारे में माना जाता है कि वैशाली के लोगों ने बुद्ध को भेंट दिया था। इस बारे में विदेश मंत्रालय भी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है। इस भारी भरकम भिक्षा पात्र के उद्गम स्थान को लेकर तमाम सवाल बने हुए हैं। मंत्रालय ने इस विषय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जानकारी मांगी है।
वैशाली से राजद सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा ‘इस विषय को मैंने संसद में उठाया है । मैंने विदेश मंत्रालय से भी इसके बारे में जानकारी मांगी लेकिन अभी तक कुछ ठोस सामने नहीं आया है।’ विदेश मंत्रालय ने सिंह को यह जानकारी दी कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास ने इस मामले की पड़ताल की है और यह पता चला है कि जिस पात्र के महात्मा बुद्ध का भिक्षा पात्र होने का दावा किया गया है, वह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला के शासनकाल में कंधार में था जिसे बाद में काबुल लाया गया। लोकसभा में रघुवंश प्रसाद सिंह के प्रश्न के उत्तर में भी विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने बताया ‘महात्मा बुद्ध का भिक्षा पात्र इस समय काबुल संग्रहालय में है।’ इस भिक्षा पात्र के उद्गम के बारे में भी कई प्रश्न उठाये गए हैं कि 1.75 मीटर व्यास और करीब 300 किलोग्राम वजन वाला यह भिक्षा पात्र किस प्रकार से काबुल पहुंचा और इस पर फारसी और अरबी में उद्धरण किस प्रकार से अंकित किए गए। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व प्रो. शैलनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि इस विषय पर एलेक्जेंडर कनिंघन में काफी शोध किया है और उनकी व्याख्या ठोस बातों पर आधारित रही है। जहां तक पात्र के आकार का प्रश्न है, पूर्व में भी बड़े आकार के कई ऐतिहासिक चिन्हों को विभिन्न काल में शासक एक स्थान से दूसरे स्थान ले गए। उन्होंने कहा कि चूंकि इस भिक्षा पात्र के कई स्थानों से होकर गुजरने का उल्लेख मिलता है, इसलिए इस पर स्थानीय भाषाओं में कुछ उल्लेख मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हालांकि इस पर और शोध किए जाने की जरूरत है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस भिक्षा पात्र पर अरबी और फारसी में कुछ पंक्तियां अंकित हैं। भारतीय दूतावास को इस पात्र के चित्र प्राप्त हुए हैं।
इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी का कहना है कि इस विषय में जानकारी जुटाई जा रही है। बौद्ध धम्म मंडल सोसाइटी के श्रावस्ती धम्मिका ने बताया कि भिक्षा पात्र महात्मा बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति से जुड़ा हुआ है । इस पात्र के बारे में कहा जाता है कि कुशीनारा जाते समय वैशाली के लोगों ने महात्मा बुद्ध को भेंट स्वरूप दिया था, जिसे कुषाण शासक कनिष्क पुष्पपुर (वर्तमान पेशावर) ले गया। श्रावस्ती धम्मिका के अनुसार, कई चीनी यात्रियों ने इस भिक्षा पात्र को तीसरी से नौवीं शताब्दी के बीच पेशावर और बाद में कंधार में देखने का दावा किया। इस पात्र में गांधार कला की झलक भी मिलती है। मध्ययुग में इस भिक्षा पात्र के कंधार के बाहरी क्षेत्र में बाबा का मकबरा में देखे जाने का उल्लेख किया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज अधिकारी एलेक्जेंडर कनिंघम ने अपने आलेख ‘मिडिल ला, मिडिल वे’ में पृष्ठ संख्या 136 में इस भिक्षा पात्र का उल्लेख किया है । 1980 के अंत में अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्ला इस पात्र को काबुल ले आए और इसे काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा। तालिबान के शासनकाल में उसके संस्कृति मंत्री ने बौद्ध धर्म से जुड़े सभी प्रतीक चिन्हों को तोड़ने का आदेश दिया था । लेकिन महात्मा बुद्ध के इस भिक्षा पात्र पर अरबी और फारसी में कुछ पंक्तियां लिखे होने के कारण इसे नहीं तोड़ा गया।
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| इहि पस्सिको |
ऐसा सुना जाता है कि एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती मे अनाथपिणिक के जेतवन आराम मे विहार कर रहे थे । तब कोई देवता रात बीतने पर अपनी चमक से सारे जेतवन को चमकाते हुये आया और भगवान बुद्ध का अभिवादन कर के एक और खडा हो गया ।
एक ओर खडा हो कर वह देवता भगवान से बोला ,
“ जंगल मे विहार करने वाले ब्रह्म्मचारी तथा एक बार ही भोजन करने वालों का चेहरा कैसे खिला रहता है ? ”
शास्ता ने कहा ,
बीते हुये का वे शोक नही करते ,
आने वाले पर बडे मनसूबे नही बाँधते ,
जो मौजूद है उसी से गुजारा करते हैं ;
इसी से उनका चेहरा खिला रहता है ॥
आने वाले पर बडे मनसूबे बाँध,
बीते हुये का शोक करते रह ,
मूर्ख लोग फ़ीके पडे रहते हैं ,
हरा नरकट ( ईख )जैसे कट जाने पर ॥
संयुत्तनिकायो -१०. अरञ्ञसुत्तं
Do not pursue the past.
Do not lose yourself in the future.
The past no longer is.
The future has not yet come.
Looking deeply at life as it is.
In the very here and now, the practitioner dwells in stability and freedom.
We must be diligent today.
To wait until tomorrow is too late.
Death comes unexpectedly.
How can we bargain with it?
The sage calls a person who knows how to dwell in mindfulness night and day,
'one who knows the better way to live alone.'
Bhaddekaratta Sutta

बहुम्पि चे संहित [सहितं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।
गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञस्स होति॥
धर्म्ग्रथॊ का कोई भी कितना पाठ करे , लेकिन प्रमाद के कारण मनुष्य यदि उन धर्म्ग्रथों के अनुसार आचरण नही करता तो दूसरों की गावों गिनने वाले ग्वालों की तरह श्रमत्व का भागी नही होता ।
धम्मपद १९