Monday, February 20, 2012

धम्म का वास्तविक अर्थ …

आचार्य बोधिधम्म ने नौ वर्षों तक के अपने प्रवास में चीन में मात्र पाँच शिष्य और एक शिष्या को दीक्षा दिया । भारत आते समय उन्होनें अपने सभी शिष्यों से एक ही प्रशन किया – “ तुमने धम्म का क्या अर्थ समझा? ”

प्रथम शिष्य ताओ फ़ू ने कहा , “ धम्म भाषा और शब्दों से परे है लेकिन वह भाषा और शब्द से पृथक नही है ।”

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म की त्वचा को स्पर्श कर लिया है । ”

शिष्या त्संग चीह ( सोजी ) ने कहा , “ अक्षोभ्य बुद्ध भूमि का दर्शन धम्म है , उनके दर्श्न की पुनरावृति नहीं होती । ”

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का ह्र्दय छू लिया । ”

तीसरे शिष्य ताओ यू ने कहा , “ मौलिक रुप से पाँच तत्व शून्य है और पाँचवे का अस्तित्व नही है । धम्म इन पाँचों तत्वों से परे है ।”

बोधिधम्म ने अनुमोदन किया , “ तुम धम्म की अस्थियों तक पहुँच गये हो “

हुई को दो कदम आगे बढा , बोधिधम्म के पाँव छुये फ़िर दो कदम पीछे हो कर चुपचाप खडा हो गया , कहा कुछ नहीं ।

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का मर्म पा लिया "। ”

शिष्य हुई को अपना उत्तराधिकार सौंप कर आचार्य बोधिधम्म वापस भारत आ गये और हिमालय मे कही विलीन हो गयॆ ।

यह भिन्न –२ प्रसंग बुद्ध धम्म के केन्द्रीय तत्व की ओर संकेत दे रहे हैं – चित्त का परिशोधन , अकुशल कर्मों से विरति और कुशल कर्मों का सम्पादन ।

Saturday, February 18, 2012

बचना

 

Escape-to-Meditation

एक जेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा .“ क्या जेन ध्यान का मकसद स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा है ? “

उसके गुरु ने कहा , “ नहीं “

“ तो क्या जीवन की परेशानियाँ और अंशाति से बचने का उपाय जेन ध्यान  मे है ? ”

गुरु ने कहा , “ बचना कैसा ? “ जेन वास्तविकता को उसी रुप में  स्वीकार करने की कला है । ”

John Weeren की  जेन कहानी  “ escape “ का हिन्दी अनुवाद

 

.

Wednesday, February 15, 2012

बौद्ध - विनय एवं आचरण- डां के. श्री. धम्मानन्द

Image1

डां के. श्री. धम्मानन्द जी की यह लघु पुस्तिका ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ उनकी अंगेजी मे लिखी ’ Moral & Ethical conduct of a Buddhist ‘ का हिन्दी  मे अनुवाद है । डां श्रीमती इन्दु अग्रवाल ने इस पुस्तिका का सुरुचिपूर्ण भाषा मे प्रवाहमेय अनुवाद किया है और हमेशा की तरह श्री राजेश चन्द्रा जी ने इस पुस्तिका का उत्कृष्ट रुप से संपादन किया है ।

गत सप्ताह  मेरे अभिग्न मित्र श्री  राजेश जी ने मुझे दो पुस्तिकायें भेटं स्वरुप दी । पिछ्ले  काफ़ी समय से हम नेट के माध्यम से जुडे रहे लेकिन अधिक व्यवस्सता  के कारण मिलना संभव न हो पाया । गत सप्ताह यह मिलन आकस्मिक और बहुत ही सुखद पूर्ण  रहा । पिछ्ले साल श्रावस्ती भ्रमण  के दौरान जिस तरह वह मेरे साथ फ़ोन के माध्यम से लगातार सुबह से रात तक जुडे रहे उससे मुझे कही नही लगा कि हम दोनों मे पूर्व  का  परिचय नही है ।

लेकिन बात पहले ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ की । डां के. श्री. धम्मानन्द जी इस पुस्तिका का केन्द्रीय विषय बौद्धों की आचरण नियमावली है । यह पुस्तिका न सिर्फ़ भिक्खुओं के लिये उपयोगी है बल्कि उपासकों के लिये भी लाभकारी है । जनमानस को भगवान बुद्ध का यही संदेश मिलता है “ सत्कर्म करो , शुद्ध विचार रखो और दुषकर्म से दूर रहो । ” बुद्ध के समय मे भी ये शब्द उतने ही सच थे जितने आज हैं और कल भी रहेगें ।

इस पुस्तिका की scanned image बहुत ही उत्कृष्ट quality की नही है लेकिन जैसे ही यह सिगांपुर से  श्री टी वाई ली की साइट पर उपलोड होगी तब उसका डाउनलोड लिंक यहाँ उपलब्ध करा दिया जायेगा ।

डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/lcp84ip2t6cg676j5rs9

बौद्ध नियम एवं आचरण

Saturday, January 28, 2012

सच्चा साधु

साधु

भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को दीक्षा देने के उपरांत उन्हें धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए अन्य नगरों और गावों में जाने की आज्ञा दी।बुद्ध ने सभी शिष्यों से पूछा – “तुम सभी जहाँ कहीं भी जाओगे वहांतुम्हें अच्छे और बुरे – दोनों प्रकार के लोग मिलेंगे। अच्छे लोगतुम्हारी बातों को सुनेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे। बुरे लोग तुम्हारीनिंदा करेंगे और गालियाँ देंगे। तुम्हें इससे कैसा लगेगा?”

हर शिष्य ने अपनी समझ से बुद्ध के प्रश्न का उत्तर दिया। एक गुणी शिष्य ने बुद्ध से कहा – “मैं किसी को बुरा नहीं समझता। यदि कोई मेरी निंदा करेगा या मुझे गालियाँ देगा तो मैं समझूंगा कि वह भला व्यक्ति है क्योंकि उसने मुझे सिर्फ़ गालियाँ ही दीं, मुझपर धूल तो नहीं फेंकी।”

बुद्ध ने कहा – “और यदि कोई तुमपर धूल फेंक दे तो?”

“मैं उन्हें भला ही कहूँगा क्योंकि उसने सिर्फ़ धूल ही तो फेंकी, मुझे थप्पड़ तो नहीं मारा।”

“और यदि कोई थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे?”

“मैं उन्हें बुरा नहीं कहूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे थप्पड़ ही तो मारा, डंडा तो नहीं मारा।”

“यदि कोई डंडा मार दे तो?”

“मैं उसे धन्यवाद दूँगा क्योंकि उसने मुझे केवल डंडे से ही मारा, हथियार से नहीं मारा।”

“लेकिन मार्ग में तुम्हें डाकू भी मिल सकते हैं जो तुमपर घातक हथियार से प्रहार कर सकते हैं।”

“तो क्या? मैं तो उन्हें दयालु ही समझूंगा, क्योंकि वे केवल मारते ही हैं, मार नहीं डालते।”

“और यदि वे तुम्हें मार ही डालें?”

शिष्य बोला – “इस जीवन और संसार में केवल दुःख ही है। जितना अधिक जीवित रहूँगा उतना अधिक दुःख देखना पड़ेगा। जीवन से मुक्ति के लिए आत्महत्या करना तो महापाप है। यदि कोई जीवन से ऐसे ही छुटकारा दिला दे तो उसका भी उपकार मानूंगा।”

शिष्य के यह वचन सुनकर बुद्ध को अपार संतोष हुआ। वे बोले – तुम धन्य हो। केवल तुम ही सच्चे साधु हो। सच्चा साधु किसी भी दशा में दूसरे को बुरा नहीं समझता। जो दूसरों में बुराई नहीं देखता वही सच्चा परिव्राजक होने के योग्य है। तुम सदैव धर्म के मार्ग पर चलोगे।”

साभार : हिंदीजेन

Thursday, January 26, 2012

खोज

world-religion

कहते हैं कि एक हजार वर्ष पूर्व लेबनान के ढाल पर दो दार्शनिक आ मिले . एक ने दूसरे से पूछा , “ कहाँ जा रहे हो तुम ?”

दूसरे ने उत्तर दिया , “ मै तो यौवन के निर्झर की तलाश मे जा रहा हूँ . मेरे ध्यान इन्हीं किसी पहाडियों के मध्य उसका सोता प्रस्फ़ुटिक होता है . पर तुम ? तुम क्या खोज रहे हो ? "

पहले आदमी ने उत्तर दिया , “ मैं तो मॄत्यु के रहस्य की तलाश कर रहा हूँ . "

तब दोनों दार्शिनिकों ने एक दूसरे के प्रति धारणा बना ली कि दूसरा उनकी महान विधा से अपरिचित है . वे आपस में लडने झगडने लगे और एक दूसरे कॆ अन्धविशवास की आलोचना करने लगे .

तभी उधर से एक अजनबी निकला, जो गाँव मे महामूर्ख समझा जाता था . वह उनके बीच की गर्मा गर्म बहस और तर्कों को सुनता रहा .

उसके बाद वह उनके निकट आ कर बोला , “ भलेमानुसो , ऐसा लगता है तुम दोनों एक ही सिद्दान्त के मानने वाले हो और तुम दोनो एक ही बात कह भी रह हो . अन्तर तो सिर्फ़ शब्दों का है . तुममे से एक यौवन के निर्झर की तलाश कर रहा है और दूसरा मृत्यु के रहस्य की खोज , पर हैं तो दोनों एक ही , और वह दोनों एकरुप होकर तुम दोनो मे बसते हैं . "

वह अपरिचित दोनों से विदाई लेता हुआ चल दिया और जाते-२ खूब हँसा .

दोनों दार्शनिकों ने चुपचाप कुछ क्षणॊं के लिये एक दूसरे को देखा और तब वए दोनों भी हँस पडॆ और उनमें से एक ने कहा , “ अच्छा तो हम दोनों मिलकर खोज करें  न ?"

खलील जिब्रान की यह लघु कथा मुझे कई अर्थॊं मे महत्वपूर्ण लगती है . इस संसार मे इतने सारे धर्म , उनके अनुनायी होते हुये भी कहीं समरसता  नजर नही आती . हर धर्म दूसरे धर्म को तो या तो नीची दृष्टि से देखता है या अपने ही धर्म को सर्वोच्च करने मे लगा रहता है . इतिहास गवाह है कि विभिन्न धर्मों मे यह लुका छिपी का खेल अनेक बार खूनी जंग मे तब्दील हो चुका है . जब सब के अंतिम मार्ग एक ही हैं तो यह खूनी जंग क्यूं ?

ईशवर है या नही …यह एक कपोल कल्पित प्रशन है , वह किस रुप मे है , इसमे भी भिन्न-२  राय हो सकती है , लेकिन एक बात सच है कि दु:ख और पीडायें हर इंसान मे सामान्य रुप से हैं .

एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे  विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों  को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने  हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह  या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “

भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “

इसी तरह  भिक्षुओं ऐसी अनगिनत  चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को  नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और  न ही मन को शांत करती है ।

इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को  दूर करता हैं और मन को शांत करता है । संयुत्त निकाय 56.31

Tuesday, December 6, 2011

बुद्ध का भिक्षा पात्र वजन तीन सौ किलोग्राम

budha_bhikshapatra_250056467

साभार : विस्फ़ॊट.काम

अफगानिस्तान के काबुल संग्रहालय में रखे महात्मा बुद्ध के भिक्षा पात्र से जुडे कई अनुत्तरित सवालों के उत्तर तलाशने में भारत का विदेश मंत्रालय इन दिनों जुटा हुआ है। हरे ग्रेनाइट से बने करीब 300 किलोग्राम वजनी इस भिक्षा पात्र के बारे में माना जाता है कि वैशाली के लोगों ने बुद्ध को भेंट दिया था। इस बारे में विदेश मंत्रालय भी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है। इस भारी भरकम भिक्षा पात्र के उद्गम स्थान को लेकर तमाम सवाल बने हुए हैं। मंत्रालय ने इस विषय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जानकारी मांगी है।

वैशाली से राजद सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा ‘इस विषय को मैंने संसद में उठाया है । मैंने विदेश मंत्रालय से भी इसके बारे में जानकारी मांगी लेकिन अभी तक कुछ ठोस सामने नहीं आया है।’ विदेश मंत्रालय ने सिंह को यह जानकारी दी कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास ने इस मामले की पड़ताल की है और यह पता चला है कि जिस पात्र के महात्मा बुद्ध का भिक्षा पात्र होने का दावा किया गया है, वह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला के शासनकाल में कंधार में था जिसे बाद में काबुल लाया गया। लोकसभा में रघुवंश प्रसाद सिंह के प्रश्न के उत्तर में भी विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने बताया ‘महात्मा बुद्ध का भिक्षा पात्र इस समय काबुल संग्रहालय में है।’ इस भिक्षा पात्र के उद्गम के बारे में भी कई प्रश्न उठाये गए हैं कि 1.75 मीटर व्यास और करीब 300 किलोग्राम वजन वाला यह भिक्षा पात्र किस प्रकार से काबुल पहुंचा और इस पर फारसी और अरबी में उद्धरण किस प्रकार से अंकित किए गए। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व प्रो. शैलनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि इस विषय पर एलेक्जेंडर कनिंघन में काफी शोध किया है और उनकी व्याख्या ठोस बातों पर आधारित रही है। जहां तक पात्र के आकार का प्रश्न है, पूर्व में भी बड़े आकार के कई ऐतिहासिक चिन्हों को विभिन्न काल में शासक एक स्थान से दूसरे स्थान ले गए। उन्होंने कहा कि चूंकि इस भिक्षा पात्र के कई स्थानों से होकर गुजरने का उल्लेख मिलता है, इसलिए इस पर स्थानीय भाषाओं में कुछ उल्लेख मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हालांकि इस पर और शोध किए जाने की जरूरत है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस भिक्षा पात्र पर अरबी और फारसी में कुछ पंक्तियां अंकित हैं। भारतीय दूतावास को इस पात्र के चित्र प्राप्त हुए हैं।

इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी का कहना है कि इस विषय में जानकारी जुटाई जा रही है। बौद्ध धम्म मंडल सोसाइटी के श्रावस्ती धम्मिका ने बताया कि भिक्षा पात्र महात्मा बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति से जुड़ा हुआ है । इस पात्र के बारे में कहा जाता है कि कुशीनारा जाते समय वैशाली के लोगों ने महात्मा बुद्ध को भेंट स्वरूप दिया था, जिसे कुषाण शासक कनिष्क पुष्पपुर (वर्तमान पेशावर) ले गया। श्रावस्ती धम्मिका के अनुसार, कई चीनी यात्रियों ने इस भिक्षा पात्र को तीसरी से नौवीं शताब्दी के बीच पेशावर और बाद में कंधार में देखने का दावा किया। इस पात्र में गांधार कला की झलक भी मिलती है। मध्ययुग में इस भिक्षा पात्र के कंधार के बाहरी क्षेत्र में बाबा का मकबरा में देखे जाने का उल्लेख किया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज अधिकारी एलेक्जेंडर कनिंघम ने अपने आलेख ‘मिडिल ला, मिडिल वे’ में पृष्ठ संख्या 136 में इस भिक्षा पात्र का उल्लेख किया है । 1980 के अंत में अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्ला इस पात्र को काबुल ले आए और इसे काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा।  तालिबान के शासनकाल में उसके संस्कृति मंत्री ने बौद्ध धर्म से जुड़े सभी प्रतीक चिन्हों को तोड़ने का आदेश दिया था । लेकिन महात्मा बुद्ध के इस भिक्षा पात्र पर अरबी और फारसी में कुछ पंक्तियां लिखे होने के कारण इसे नहीं तोड़ा गया।

Monday, December 5, 2011

ब्यग्घपज्ज सुत्त ( दीघजानु सुत्त ) – गृहस्थ जीवन के कल्याण के लिये उपयोगी बुद्ध देशना -Dighajanu (Vyagghapajja) Sutta: Conditions of Welfare

309770_2378034804259_1052303309_2556615_281583210_n
बुद्ध ने मानवमात्र के बहुत से पक्षों और शाशवत सरोकारों को सम्बोधित किया है . इनमें से अधिकतर उनके द्वारा दी गई देशनाऒं से सम्बधित है जो उनके अनुयायियों , भिक्षुकों और जिज्ञासुओ को समय-२ पर दी गई हैं .  अन्य धर्मों  की हठीली प्रकृति के विपरीत बुद्ध धम्म व्यवहारिक सादगी पर प्रकाश डालता है .
व्यग्धपज्ज सुत्त मे बुद्ध समद्ध गृहस्थ को निर्देश देते हैं कि कैसे वे अपनी समृद्दि का संरक्षण और संवर्धन कर सकते हैं और कैसे धन के विनाश से बच सकते हैं . अकेला धन न तो सम्पूर्ण मानव का निर्माण करता है और न ही समरसता पूर्ण समाज का . धन का स्वामित्व मनुष्य की तूष्णा को बेलगाम बढा देता है और बदले मे छॊड जाती है असंतुष्ट इन्सान और उसका अविरुद्ध आध्यमित्क विकास . साधन विहीनों की नारजगी से और तृष्णा के असंयगत परिणामों समाज मे विसंगतियाँ जन्म देती हैं  .

व्यग्धपज्ज सुत्त मे बुद्ध समद्ध गृहस्थ को निर्देश देते हैं कि कैसे वे अपनी समृद्दि का संरक्षण और संवर्धन कर सकते हैं और कैसे धन के विनाश से बच सकते हैं .
लेकिन बुद्ध  भौतिक कल्याण के साथ चार आवशयक आध्यात्मिक कल्याणॊं के साधन संलग्न करते हैं : विशवास , शील , उदारता और प्रज्ञा जिनके पालन के साथ सामाजिक विसंगतियाँ भी कम होगीं और भौतिक और अध्यात्मिक निर्देशों का पालन से समाज में आर्दश नागरिक का निर्माण भी होगा .
                           व्यग्धपज्ज सुत
ऐसा सुना जाता है :
एक समय भगवान बुद्ध कोलिय प्रदेश के कर्करपत्र नामक कोलियाँ के एक निगम मे विहार करते थे . तब दीघजानु नामक कोलियपुत्र भगवान के किकट आया और नमन करके एक ओर बैठ गया और भगवान बुद्ध को सम्बोधित किया :
"भन्ते ! हम गृहस्थजन काम भोगों मे लिप्त रहने वाले , पुत्र पौत्रों की भीड मे अपनी जीवन यात्रा करते रहते हैं . माला , गन्ध-विच्छॆदन करना , काशी के चन्दन का लेप , और सोने चाँदी का संग्रह करना ही हमारा जीवन लक्षय बन गया है . हम जैसे लोगों के लिये भी भन्ते आप ऐसे धम्म की देशना करें जिस का आचरण करके हमारा यह जन्म और परलोक भी सुतकर और हितकर हो . ”
भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया :
“ एक गृहस्थ के जीवन मे मंगल और सुख के लिये चार साधन व्यग्धपज्ज साहायक होते हैं . यह चार साधन हैं :
“ सतत प्रयास की उपल्ब्धि ( उत्थानपाद – सम्पदा ), उपलब्ध की रक्षा ( आरक्ष-सम्पदा ) , अच्छी मित्रता ( कल्याण मित्रता ) तथा संतुलित जीविका ( समजीविता ) .”
 व्यग्धपज्ज : “ निरतंर  प्रयास की उपल्ब्धि ( उत्थानपाद – सम्पदा ) क्या है , भन्ते ! ”
“ इसमें व्यधपज्ज जिस किसी काम से गृहस्थ आजीविका अर्जित करता है चाहे खेती से , धनुर्विधा से , पशुपालन से , राजा की नौकरी से उसमें उसको पारंगत होना चाहिये और आलस्य न करना चाहिये . उसको अपने कार्य के उचित तौर तरीके जानने चाहिये और अपने कार्य मे निपुणता और दक्षता  उत्पन्न करनी चाहिये .यह  निरतंर  प्रयास की उपल्ब्धि ( उत्थानपाद – सम्पदा ) कहलाती है .’”
व्यग्धपज्ज : “ भन्ते ! आरक्ष-सम्पदा क्या है ? ”
“इसमें ,व्यधपज्ज , जो सम्मपति एक गृहस्थ द्वारा मेहनत , ईमानदारी और सही तरीकों से कमाई गई होती है , उसे वह ऐसा देखभाल करके ऐसा संचालन करता है , ताकि राजा उसको हडप न ले , चोर उसे चुरा न सके , आग उसे जला न सके , पानी उसे बहा न दे और न ही भटके हुये उत्तराधिकारी उसे ले उडॆं . यह आरक्ष-सम्पदा है .”
व्यग्धपज्ज : “भन्ते !! कल्याण मित्रता क्या है ? ”
“इसमें ,व्यधपज्ज , जिस किसी ग्राम या शहर मे गृहस्थ रहता है , वह जुडता है , बातचीत करता है , अन्य गृहस्थों या उनके पुत्रों के साथ बहस करता है ,चाहे चाहे वह वृद्ध या युवा  तथा सुसंस्कृत हों , श्रद्धा सम्पन्न , शील कुशलता से पूर्ण हों ,त्याग और बुद्धि से सम्पन्न हों . वह श्रद्धालुओं की श्रद्धा के अनुसार कार्य करता है , शीलवानों के शील के साथ , त्यागियों के त्याग के साथ , प्रज्ञावानों की प्रज्ञा के साथ . यह कल्याण मित्रता कहलाती है .”
 व्यग्धपज्ज: “भन्ते !! समजीविता क्या है ? ”
“ यहाँ पर व्यग्धपज्ज , एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय जानते हुये एक संतुलित जीवन यापन करता है , न फ़िजूलखर्ची न कंजूसी , यह जानते हुये कि उसका आय व्यय से बढकर रहेगी , न कि उसका व्यय आय से बढकर .
“ जैसे कि एक तुलाधर सुनार , या उसका शार्गिद तराजू पकडकर जानता है कि कितना झुक गया है , कितना उठ गया है ,उस प्रकार एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय को जान कर संतुलित जीवन जीता है , न वह बेहद खर्चीला न बेहद कंजूस , इस प्रकार समझते हुये कि उसकी आय  व्यय से बढकर रहेगी न कि उसका व्यय आय से अधिक होगा .”
“ व्यग्धपज्ज , यदि एक गृहस्थ कम आय वाला खर्चीला जीवन व्यतीत करेगा , तो लोग उसे कहेगें , ’ यह च्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ऐसे आनन्द ले रहा है जैसे कोई बेल फ़ल खाता है . ’ , यदि व्यग्धपज्ज , एक प्रचुर आय वाला गृहस्थ कंजूसी का जीवन व्यतीत करेगा तो लोग कहेगें कि ’ यह व्यक्ति भुक्खड की तरह मरेगा ’ .”
“ इस प्रकार संचित धन सम्म्पति , व्यग्धपज्ज , चार प्रकार से नाश होती है :
“ १- अधिक भोग विलास
२- मदिरापान की लत
३- जुआ
४- पापी लोगों से दोस्ती , संगति तथा सांठ- गांठ . “
“ जैसे कि एक बडे तालाब मे चार जल प्रवेश तथा चार जल निकास के रास्ते हों , यदि कोई व्यक्ति प्रवेश मार्ग बन्द कर दे तथा निकास मार्ग खोल दे तथा काफ़ी वर्षा न हो , तो तालाब में जल की कमी की उम्मीद रहेगी लेकिन वृद्दि की नही ; वैसे ही संचित सम्म्पति के विनाश के लिये चार रास्ते हैं - अधिक भोग विलास , मदिरापान की लत, जुआ और पापी लोगों से दोस्ती , संगति तथा सांठ- गांठ .
“ जमा पूंजी की समृद्दि के चार मार्ग हैं :
१.- काम भोगों मे संयम
२- मदिरापान मे संयम
३- जुये मे रत न होना
४- अच्छे लोगों से मित्रता , संगति तथा सांठ-गांठ .”
“ जैसे कि एक बडा तालाब हो, जिसमें चार प्रवेश तथा चार निकास हों . यदि कोई व्यक्ति प्रवेश खोल दे तथा निकास बद कर दे और बारिश भी खूब हो जाये , तो उस तालाब मे अवशय ही जल बढने की संभावना रहेगी तथा घटने की नहीं , इसी प्रकार ये चार बातें जमा पूँजी की वृद्दि के स्त्रोत हैं . ”
“ ये चार बातें व्यग्धपज्ज , एक गृहस्थ के इसी जीवन काल मे कल्याण तथा प्रसन्नता में सहायक हैं . ”
“ आध्यात्मिक विकास के साधन ”
“ इसके अतिरिक्त व्यग्धपज्ज एक गृहस्थ के कल्याण के लिये चार बातें आवाशय्क है :
१. श्रद्धा की उपल्ब्धि ( श्रद्धा सम्पदा )
२. शीलों की उपल्ब्धि ( शील सम्पदा )
३. त्याग की उपलब्धि ( त्याग सम्पदा )
४. प्रज्ञा की उपल्ब्धि ( प्रज्ञा सम्पदा )
व्यग्धपज्ज: “भन्ते !! श्रद्धा की उपल्ब्धि क्या है ?
“ इसमें एक गृहस्थ श्रद्धा सम्पन्न होता है , वह समयक सम्बुद्ध तथागत की बुद्धत्व उपल्ब्धि मे आशवस्त होता है ; यथातथ्य वे सम्युक बुद्ध है , पूर्णतया ज्ञान प्राप्त , विधा तथा आचरणॊं से सम्पन्न , सुगत , लोकों को जानने वाले , सिखाये जाने योग्य मनुष्यों के नायक , देव तथा मनुष्यों के गुरु , सर्वज्ञ तथा धन्य है . इसे कहते हैं श्रद्धा सम्पदा .”
व्यग्धपज्ज: “भन्ते !! शीलों की उपल्ब्धि क्या है ?
“ इसमे एक गृहस्थ प्राणी हत्या से , चोरी से , यौन मिथ्याचार से , झूठ बोलने से तथा नशीले पदार्थ से जो स्मऋतिनाश तथा प्रमाद उत्पन्न करते हैं – विरत रहता है . यह कहलाता है  शील सम्पदा
 व्यग्धपज्ज: “भन्ते !! त्याग की उपलब्धि क्या है ?
“इसमें एक गृहस्थ अपने को चित्तमलों तथा धन लोलोपता से मुक्त रख कर घर मे रहता है, त्याग मे संलग्न, मुक्त हस्त . उदारता मे आनन्दित, जरुरतमदॊं की सहायता करने वाला , दान दक्षिणा मे प्रसन्न . यह कहलाता है – त्याग सम्पदा .”
व्यग्धपज्ज: “भन्ते !!प्रज्ञा की उपल्ब्धि क्या है ?
“ इसमॆ एक गृहस्थ जो प्रज्ञावान है ; वह ऐसी प्रज्ञा से सम्पन्न है , पंच स्कन्धों की उत्पति तथा लय को समझता है ; वह आर्य विपस्सना से सम्पन्न है ; जो दु:ख विमुक्ति का लाभ देती है . इसे कहते हैं प्रज्ञा की उपलब्धि –प्रज्ञा सम्पदा .”
“ यह चार बातें ;व्यधपज्ज ,एक गृहस्थ के अगले जन्मों कल्याण और प्रसन्नता के लिये सहायक हैं .”
अपने कर्तव्यों को ध्यान तथा मेहनत से करने वाला,
बुद्धिमानी से धन संचय करने वाला,
वह संतुलित जीवन च्यतीत करता है ,
संचित का संरक्षण करते हुये ।
श्रद्धा तथा शील से भी सम्पन्न ,
उदार तथा धन्लोलुपताविहीन,
सदा पथ शोधन को प्रवृत,
जो परलोक मे कल्याण्कर है।
यूँ श्रद्धा से ओत-प्रोत गृहस्थ को,
उनके द्वारा , जिनका ’सम्यक सम्बुद्ध ’ समुचित नाम है,
यह आथ बाते बताई गई हैं ,
जो लोक और परलोक मे आनन्दकर है । “
अंगुतर निकाय VIII.54 ( Dighajanu (Vyagghapajja) Sutta: Conditions of Welfare , translated from the Pali by
Narada Thera का हिन्दी अनुवाद :  मंगलमय जीवन –शांति , प्रसन्नता एवं समृद्दि की कुजीं से लिया गया है । साभार : राजेश चन्द्रा जी । )

Tuesday, November 22, 2011

“इहि पस्सिको ”- आओ और देखो


इहि पस्सिको


बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो भि देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।
कहते हैं कि एक बार बुद्ध अपने कुछ अनुयायियों  के साथ यात्रा कर रहे  थे . जब वे एक झील के पास से गुजर रहे थे तब बुद्ध को प्यास की  अनूभूति हुई , तब बुद्ध ने अपने एक अनुयायी से कहा , " भिक्षुक मुझे प्यास लगी है  और  इस झील से पानी लेकर आओ’। ” जैसे ही शिष्य झील के समीप पहुँचा उसी समय    एक बैलगाड़ी झील से होती हुई गुजरी  ।  परिणाम स्वरुप झील का पानी बहुत गन्दा और मटमैला हो गया । तब  शिष्य ने सोचा, "मैं बुद्ध को  यह  गंदा पानी पीने के लिये कैसे दे सकता हूँ ?"   वह वापस आ गया और बुद्ध से कहा, " शास्ता पानी तो  वहाँ बहुत गंदा है और मुझे नहीं लगता कि यह पीने के लिए उपयुक्त  है."  लगभग आधे घंटे के बाद, बुद्ध ने दोबारा शिष्य से पानी लने के लिये कहा । वह वापस  झील के नजदीक गया और उसने पाया   कि पानी अभी भी मैला था.  वह लौट आया  और  बुद्धको सूचित किया.  कुछ समय बाद फिर से बुद्ध ने  शिष्य  को वापस जाने के लिए कहा . इस बार  शिष्य ने पाया कि पानी अपेक्षाकृत काफ़ी साफ़ है , मिट्टी नीचे बैठ चुकी है  ।  वह एक बर्तन में थोड़ा सा पानी एकत्र कर के बुद्ध के लिये ले गया । बुद्ध ने पानी में देखा, और अनुयायी को देखते हुये कहा , " आयुस तुम जानते हो कि तुमने पानी को साफ़ करने के लिये क्या किया , तुमने पानी को कुछ देर के लिये छॊड दिया और मिट्टी नीचे बैठ गयी । इसी तरह यह मन भी है , अगर वह परेशान है , व्याकुल है तो उसे थोडा समय दो , वह अपने आप शांत हो जायेगा । तुमको उसे शांत करने के लिये कोई विशेष प्रयास नही करना है , मन की शांति एक सरल प्रक्रिया है , इसके लिये विशेष प्रयास  नही करना पडता है ।”
( बुद्ध से संबधित इस गाथा के लिये साभार : रोहित पवार )

Wednesday, November 16, 2011

बीते हुये का शोक कैसा …… वर्तमान मे रहो …वर्तमान मे जियो !!

shraavastI

ऐसा  सुना जाता है कि एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती मे अनाथपिणिक के जेतवन आराम मे विहार कर रहे थे । तब कोई देवता रात बीतने पर अपनी चमक से सारे जेतवन को चमकाते हुये आया और भगवान बुद्ध का अभिवादन कर के एक और खडा हो गया ।

एक ओर खडा हो कर वह देवता भगवान से बोला ,

“ जंगल मे विहार करने वाले ब्रह्म्मचारी तथा एक  बार ही भोजन करने वालों का चेहरा कैसे खिला रहता है ? ”

शास्ता ने कहा ,

बीते हुये का वे शोक नही करते ,

आने वाले पर बडे मनसूबे नही  बाँधते ,

जो मौजूद है उसी से गुजारा करते हैं ;

इसी से उनका चेहरा खिला रहता है ॥

आने वाले पर बडे मनसूबे बाँध,

बीते हुये का शोक करते रह ,

मूर्ख लोग फ़ीके पडे रहते हैं ,

हरा नरकट ( ईख )जैसे कट जाने पर ॥                         

 

    संयुत्तनिकायो -१०. अरञ्‍ञसुत्तं                                                          

 

Saturday, July 23, 2011

Time is fleeting …Act Today

tme

Do not pursue the past.
Do not lose yourself in the future.
The past no longer is.
The future has not yet come.
Looking deeply at life as it is.
In the very here and now, the practitioner dwells in stability and freedom.
We must be diligent today.
To wait until tomorrow is too late.
Death comes unexpectedly.
How can we bargain with it?
The sage calls a person who knows how to dwell in mindfulness night and day,
'one who knows the better way to live alone.'
Bhaddekaratta Sutta

Tuesday, May 17, 2011

धम्म का फ़ल धम्म के मार्ग पर चलने से ही सम्भव !!



 
बहुम्पि चे संहित [सहितं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] भासमानो, न तक्‍करो होति नरो पमत्तो।
गोपोव
गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्‍ञस्स होति॥

धर्म्ग्रथॊ का कोई भी कितना पाठ करे , लेकिन प्रमाद के कारण मनुष्य यदि उन धर्म्ग्रथों के अनुसार आचरण नही करता तो दूसरों की गावों गिनने वाले ग्वालों की तरह श्रमत्व का भागी नही होता ।
धम्मपद १९

एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती में मिगारमाता के पुष्वाराम मे विहार कर रहे थे । धम्म सीखने और सुनने के लिये मोग्गालन नामक ब्राहमण लेखाकार भी अकसर आता रहता था । एक दिन वह जल्दी आ गया और भगवान को अकेले पाकर बोला कि उसके मन मे अकसर यह प्रशन उठता है कि भगवान के पास जो लोग आते हैं उनमे से कुछ परम ज्ञान को  उपलब्ध होते हैं लेकिन कुछ लोग जो नजदीक होते हुये भी इस सुख की प्राप्ति नही कर पाते हैं । तो भगवन , आप जैसा अदभुद शिक्षक और पथपदर्शक होते हुये भी कुछ को निर्वाण सुख प्राप्त होता है और कुछ को नही ? तो भगवन , आप करुणा से ही आप सबको निर्वाण सुख दे कर भवसागर से मुक्ति क्यों नही प्रदान कर देते ।
बुद्ध ने मोग्गालन से पूछा , " ब्राहमण , मै तुमको इस प्रशन का उत्तर दूगाँ , लेकिन पहले तुमको जैसा लगे इस प्रशन का उत्तर दो । ब्राहमण , "यह बताओ कि क्या तुम राजगृह आने - जाने का मार्ग अच्छी तरह से जानते हो ? "
मोग्गालन मे कहा , " गौतम ! मै निशचय ही राजगृह का आने - जाने का मार्ग अच्छी तरह से जानता हू‘ं । "
" जब कोई एक आदमी आता है और  राजगृह का मार्ग पूछता है  लेकिन  उसे छोड्कर वह अलग मार्ग पकड लेता है , वह पूर्व की बजाय पशिचम मे चल देता है । तब एक दूसरा आदमी आता है और वह भी  रास्ता पूछता है और तुम उसे उसे भी ठीक ठाक वैसे ही रास्ता बताते हो जैसा पहले क  बता था और वह भी तुम्हारे बताये रास्ते पर चलता है औए सकुशल राजगृह पहुँच जाता है "
ब्राहमण बोला , " तो मै क्या करुँ , मेरा काम रास्ता बता देना है । "
भगवान बुद्ध बोले , " तो ब्राहमण , मै भी क्या करुँ , तथागत का काम भी केवल मार्ग बताना होता है । "
इसलिए बुद्ध पूर्णिमा को सिर्फ़ प्रासांगिक न बनायें बल्कि उस मार्ग पर चलने की कोशिश करें जिसको भगवान बुद्ध ने देशना दी  है , याद रखें :
 

चार आर्य सत्य
१. दु:ख है।
२. दु:ख का कारण है ।
३. दु:ख का निदान है ।
४. वह मार्ग है , जिससे दु:ख का निदान होता है ।
अष्टागिंक मार्ग
१. सम्यक दृष्टि ( अन्धविशवास तथा भ्रम से रहित )  ।
२. सम्यक संकल्प (उच्च तथा बुद्दियुक्त )  ।
३. सम्यक वचन ( नम्र , उन्मुक्त , सत्यनिष्ठ )  ।
४. सम्यक कर्मान्त ( शानितपूर्ण , निष्ठापूर्ण ,पवित्र )  ।
५. सम्यक आजीव ( किसी भी प्राणी को आघात या हानि न पहुँचाना )  ।
६. सम्यक व्यायाम ( आत्म-प्रशिक्षण एवं आत्मनिग्रह हेतु )  ।
७. सम्यक स्मृति ( सक्रिय सचेत मन )  ।
८. सम्यक समाधि ( जीवन की यथार्थता पर गहन ध्यान ) ।

बुद्ध पूर्णिमा की सप्रेम शुभकामनायें !!

Saturday, February 19, 2011

‘यह भी गुज़र जाएगा|’ “This too shall pass '’

अनित्य

अनित्यता बौद्ध धर्म की एक महत्वपूर्ण ईकाई है . बुद्ध ने खोजा कि सब कुछ अनित्य है और प्रत्येक वस्तु कुछ और होने की प्रक्रिया मे है. नशवरता का यह बोध हमे अपनी अपने जीवन मे भी दिखता है . हम सब वय: परिवर्तन के दौर मे है . जो हम आज से बीस साल पहले थे वह आज नही है , यहाँ तक कि हमारे विचार हर पल बदलते रहते हैं . प्रकृति मे भी यह बदलाव आसानी से देखा जा सकता है , कली का फ़ूल बनना , फ़ूल का मुरझाना , और यहाँ तक तारे और आकाश गंगा भी परिवर्तन के दौर मे हैं . ज़ेन बौद्ध गुरु - - Thich Naht Hanh  के अनुसार हमें अपने आप को सागर की तंरगों के समान सोचना चहिये . लहरों की मुख्य विशेषता इसकी अस्थायी प्रवृति है , इसी तरह हम भी एक दिन नशवरता मे मिल जाते हैं जैसे कभी हुये ही न हों .

एक सूफ़ी कहानी कहती हूँ- फरीदुद्दीन अत्तार की लिखी हुई . आज सुबह जब मैने इसे पढा तो लगा कि यह  अनित्यता का बोध हमे जीवन मे करा सकती है.

अत्तार ने लिखा की एक दरवेश दिन रात बंदगी करता | जो कुछ उसने अपने गुरुओं से सीखा उसका अभ्यास करता रहा | फिर उसके जी में आया कि ‘अब मैं हज करूँ’ | जब हज के लिए वह निकला तो दूर मुश्किल यात्रा थी|महीनों लगने थे|चलते-चलते एक गाँव पहुँचा| थका हुआ था, भूख भी लगी हुई थी| अनजान रास्ता था| उसने एक राहगीर से कहा कि ‘मुझ दरवेश को ठहरने के लिए कहाँ जगह मिल सकती है?’ उसने जवाब दिया- ‘यहाँ शाक़िर नाम का इनसान रहता है, तू उसके घर चला जा|वह इस इलाके का सबसे अमीर आदमी है और बहुत दयावान और दिलदार आदमी है |वैसे तो इस इलाके का सबसे बड़ा सेठ हमदाद है लेकिन हमदाद की जगह तू शाक़िर के घर जा|

दरवेश शाक़िर के घर गया| शाक़िर का अर्थ होता है – जो शुक्राना करता रहता है| जब उसके पास पहुँचा तो जैसा उसके बारे में सुना था, बिल्कुल वैसा ही निकला| शाक़िर ने उसे अपने घर में पनाह दी | भोजन दिया, बिस्तर दिया| शाक़िर की बीवी, बच्चों ने उसकी बहुत ख़ातिर की |दो दिन वह ठहरा, तीसरे दिन जब वह चलने लगा तो उन्होंने उसको रास्ते के लिए खाना , पानी, खजूरें आदि सब दिया| चलते समय दरवेश ने कहा कि ‘शाक़िर! तू कितना अच्छा है| तू कितना अमीर है, तूने मुझे इतना कुछ दिया कि तुझे इस बारे में ज़रा भी सोचना नहीं पड़ा. जबकि तू मुझे जानता भी नहीं है|

शाक़िर ने अपने मकान की ओर नज़र दौड़ाई और कहा कि ‘गुज़र जाएगा|’ दरवेश पूरे रास्ते सोचता रहा क्योंकि उसके मुर्शदों ने कहा था कि जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लिया करो और जब किसी से बात सुनो तो उसकी गहराई में जाया करो| वह अपने दिल की धड़कनों को सुनते हुए, ज़िक्र करते हुए, मन के किनारे बैठा और मन के विचारों को देखता रहा, देखता रहा और सोचता रहा कि शाक़िर ने अपने धन, अपनी अमीरी, अपनी दौलत की ओर इशारा करते हुए ये क्यों कहा कि ‘गुज़र जाएगा’| कहीं कोई आने वाली घटना के बारे में कह रहा था या फिर ऐसे ही बोल गया | मक्‍के पहुँचा, हज किया, वहीं ठहर गया| फिर एक साल बाद लौटना हुआ| उसके चित्त में यह विचार था कि एक बार मैं शाक़िर को मिलूं| पर जब वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि शाक़िर का मकान है ही नहीं| लोगों ने बताया कि अब वह हमदाद के घर में नौकर है|उन्होंने बताया कि बाढ़ आई थी, उसमे उसका मकान बह गया, भेड़ – बकरियाँ बह गई, बहुत ग़रीब हो गया है |इसलिए उसको नौकरी करनी पड़ी, उसे वहीं जाकर मिल लो |

दरवेश बहुत हैरान हुआ कि इतना नेक आदमी इतने दुख में! फिर वह हमदाद के घर गया और जब शाक़िर को मिला तो उसके बदन पर फटे हुए कपड़े, उसकी बीवी और बेटियाँ भी उसके साथ में थीं| दरवेश ने कहा कि ‘ बड़ा दुख हुआ तेरे जैसे नेक आदमी के साथ इतनी त्रासदी?’ शाक़िर ने गम्भीर स्वर में कहा-‘ यह भी गुज़र जाएगा|’ |

हमदाद भी नेक आदमी था, उसने भी दरवेश को पनाह दी | कुछ समय वह यहीं रहा|फिर जब दरवेश जाने लगा तो शाक़िर ने उतना तो नहीं पर फिर भी उसको कुछ रूखा-सूखा खाने को साथ में दिया | दो-चार साल गुज़र गए पर दरवेश हमेशा शाक़िर को याद करता| फिर एक दिन मक्का जाने का मन हो गया| फिर उसी रास्ते से गुज़रा, फिर हमदाद के घर गया| जब वहाँ पहुँचा तो मालूम हुआ कि हमदाद की तो मौत हो गई है और उसने अपना सब कुछ शाक़िर को दे दिया क्योंकि उसकी अपनी कोई औलाद नहीं थी|

शाक़िर फिर से अमीर हो गया|उसके बदन पर फिर रेशमी वस्त्र, उसकी बीवी फिर सुंदर कपड़ों में है|उसकी बेटियों की शादियाँ अमीरों के घर हो चुकी हैं| दरवेश अंदर गया और कहता कि ‘अरे वाह शाक़िर! इतना अच्छा........ खुदा ने खूब रहमत की तेरे ऊपर|’ शाक़िर ने फिर गंभीर स्वर में कहा- ‘यह भी गुज़र जाएगा|’

कुछ दिन दरवेश उसके घर ठहरा फिर मक्‍के गया|इस बार वह मक्‍के करीब दो साल रहा| जब वापिस लौटा तो मन में चाह उठी कि अपने उस दोस्त को मिलूं| जब पहुँचा तो मालूम हुआ कि शाक़िर तो मर चुका है| फकीर ने लोगों से पूछा- ‘उसकी कब्र कहाँ है? मैं उसकी कब्र पर जाकर नमाज़ पढ़ूंगा| दुआ करूँगा अपने उस दोस्त के लिए|' लोगों ने शाक़िर की कब्र का पता दिया| जब कब्र के पास दरवेश पहुँचा तो उस कब्र पर एक तख़्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था- ‘यह भी गुज़र जाएगा|’ पढ़कर दरवेश बहुत रोया, कहता-‘ यह भी गुज़र जाएगा’, अब इसका गहरा अर्थ और क्या हो सकता है? दरवेश ने बहुत दुआएँ की|

फिर अपने डेरे को निकला तो उसके बाद कई साल गुज़र गए| फिर कई सालो बाद एक काफिला मक्‍के की ओर जा रहा था तो उसे लगा की जिंदगी की एक हज और कर सकता हूँ| चल तो नहीं सकता पर ऊँट की सवारी मिल गई तो उस पर बैठकर चल दिया| रास्ते में शाक़िर का गाँव आना था, उससे रहा न गया और सोचा कि एक बार तो शाक़िर की कब्र पर फूल चढ़ाऊं और दुआ करूँ| और जब वह वहाँ पहुँचा तो जिस जगह शाक़िर की कब्र थी, अब वहाँ कब्र ही नहीं है|लोगों से पूछा कि कब्र कहाँ गई तो कहते कि तूफान आया था, कहीं ज़मीन धँस गई, टूट-फूट हुई, सब तहस-नहस हो गया| और वह कब्र कहाँ गई, पता नहीं|दरवेश आया भी लम्बे समय बाद था|सब बदल चुका था, जहाँ उसकी कब्र थी, अब वहाँ आबादी हो गई थी और ढूँढने पर भी न मिली|

आज दरवेश को शाक़िर का यह वचन पूरी तरह समझ आ गया कि ‘यह भी गुज़र जाएगा’ उसकी तो कब्र भी गुज़र गई, पता ही नहीं कि कहाँ है

Sunday, September 26, 2010

Dhamma Lists: Insight Meditation Center

Dhamma Lists


courtesy : Dhamma Lists: Insight Meditation Center

The Four Noble Truths

  1. Dukkha exists – unsatisfactoriness, suffering, discontent, stress (to be Investigated)
  2. The cause or origin of dukkha is craving (tanha-lit. thirst) or clinging (to be Abandoned)
  3. Dukkha ceases with the relinquishment of that craving (to be Realized)
  4. The path leading to the cessation of dukkha is the Noble Eightfold Path (to be Developed)

The Eightfold Path (ariya-magga)

    Wisdom/Discernment (pañña)
  1. Wise or Right View/Understanding (samma-ditthi) – Knowledge of the Four Noble Truths
  2. Wise or Right Intention/Resolve (sammá-sankappa) – Renunciation, Loving-kindness, Harmlessness
  3. Virtue (sila)

  4. Wise or Right Speech (sammá-vácá) – abstaining from lying, malicious or divisive speech, abusive or harsh speech, and idle chatter
  5. Wise or Right Action (sammá-kammanta) – abstaining from killing, stealing and sexual misconduct
  6. Wise or Right Livelihood (sammá-ájíva) – abstaining from dishonest and harmful means of livelihood
  7. Concentration/Meditation (samadhi)

  8. Wise or Right Effort (samma-vayama) – the effort of avoiding and overcoming unskillful qualities, and of developing and maintaining skillful qualities
  9. Wise or Right Mindfulness (samma-sati) – The Four Foundations of Mindfulness
  10. Wise or Right Concentration (samma-samadhi) – The Four Form Jhanas

Three Characteristics of Existence (of Conditioned Phenomena)

  1. Impermanence (anicca)
  2. Unsatisfactoriness (dukkha)
  3. Not-self (anatta) – empty of inherent existence; not “me”, “myself”, nor “what I am”

Three Pillars of Dhamma (dharma) or Grounds for Making Merit

  1. Generosity (dana)
  2. Moral restraint (sila)
  3. Meditation (bhavana) – consists of Concentration (samadhi) and Mindfulness (sati)

Three Poisons/Defilements (Kilesas – lit. torments of the mind)

  1. Greed (lobha) – mindfulness transforms this into Faith
  2. Aversion/hatred (dosa) – mindfulness transforms this into discriminating Wisdom
  3. Delusion (moha) – mindfulness transforms this into Equanimity

Three Refuges (Triple Gem, Three Jewels)

  1. Buddha – both the historical Buddha and one’s own innate potential for Awakening
  2. Dhamma – the Buddha’s teaching of liberation and the ultimate Truth towards which it points
  3. Sangha – the monastic community, those who have achieved at least some degree of Awakening, and more recently the community of followers of the Buddhist path (traditionally called the Parisa)

Three Types of Dukkha

  1. Dukkha as pain (dukkha-dukkhata) – body or mental pain
  2. Dukkha that is inherent in formation (sankhara-dukkhata) – maintenance of body and things, oppressive nature of continuous upkeep
  3. Dukkha of change (viparinama-dukkhata) – pleasant and happy conditions in life are not permanent

Four Bases of Power or Success (Iddhipada)

  1. Desire (chanda)
  2. Persistence/Energy/Effort (viriya)
  3. Intention, Mind, Thoughtfulness (citta)
  4. Investigation/Discrimination (vimamsa or panna)

Four Brahma-viharas (Highest Attitudes/Emotions)

Heavenly or sublime abodes (best home). Near enemy is a quality that can masquerade as the original, but is not the original. Far enemy is the opposite quality.

  1. Lovingkindness, good-will (metta): Near enemy – attachment; far enemy – hatred
  2. Compassion (karuna): Near enemy – pity; far enemy – cruelty
  3. Sympathetic joy, Appreciation (mudita), joy at the good fortune of others: Near enemy – comparison,hypocrisy, insincerity, joy for others but tinged with identification (my team, my child); far enemy – envy
  4. Equanimity (upekkha): Near enemy – indifference; far enemy – anxiety, greed

Four Foundations of Mindfulness

(from the Satipatthana Sutta)

  1. Mindfulness of the body (kaya)
  2. Mindfulness of feeling (vedana)-pleasant, unpleasant, neutral; initial reactions to sensory input
  3. Mindfulness of mind/consciousness (citta), of the mind-states, moods (greed, aversion, delusion and their opposites)
  4. Mindfulness of mind objects-mental events (dharmas); Five categories of dhammas: Five hindrances, Five aggregates, 6 sense bases, Seven factors of enlightenment, Four Noble Truths

Four Form Jhanas (rupa jhanas) or Meditative Absorptions

  1. First Jhana, characterized by intense pleasure, has five jhanic factors: applied thought (vittaka), sustained thought(vicara), joy (piti), happiness (sukha), one-pointednesss (ekkagata)
  2. Second Jhana, characterized by joy, has 3 factors: joy (piti), happiness (sukha) , and one-pointedness (ekkagata)
  3. Third Jhana, characterized by contentment, has 2 factors: contentment and one-pointedness (ekkagata)
  4. Fourth Jhana, characterized by equanimity and stillness, has 1 factor: one-pointedness (ekkagata)

Four Right Efforts (sammappadhana)

  1. Not to let an unwholesome-unskillful thought arise, which has not yet arisen-Guarding
  2. Not to let an unwholesome-unskillful thought continue, which has already arisen-Abandon
  3. To make a wholesome-skillful thought arise, which has not yet arisen-Develop
  4. To make a wholesome-skillful thought continue, which has already arisen-Sustain

Four Taints, effluents, intoxicants, fermentations, cankers,
defilements (asavas)

Obstructions to Enlightenment (most suttas don’t include the 4th taint)

  1. attachment to sensuality
  2. attachment to existence/to becoming
  3. ignorance of the dhamma (of the way things are)
  4. attachment to opinions/views (most Suttas do not include this one-Abhidhamma does)

Five Aggregates (khandhas or skandas or heaps)

Physical and mental components of the personality (ego) and of sensory experience in general

  1. Form/physical phenomena, body (rupa )
  2. Feeling (vedana ) pleasant, unpleasant, neutral. Feelings arise when there is contact between the 6 internal organs and the 6 external objects: (eye, ear, nose, tongue, body, mind & corresponding: sight, sound, odor, taste touch, mental object)
  3. Perception (sañña) – recognition
  4. Mental Formations (sankhara) – includes mental states, emotions, volition (fabrications)
  5. Consciousness (viññana) – grasps the characteristics of the 6 external objects

Five Faculties (indriya) and Five Strengths or Powers

Faith & Wisdom balance each other, as do Energy & Concentration.
The Five Faculties are ‘controlling’ faculties because they control or master their opposites.
The faculties and powers are two aspects of the same thing.

  1. Faith (saddha) – controls doubt
  2. Energy/Effort/Persistence (viriya) – controls laziness
  3. Mindfulness (sati); – controls heedlessness
  4. Concentration (samadhi) – controls distraction
  5. Wisdom (panna)/Discernment – controls ignorance

Five Hindrances (nivarana)

  1. Sensual Desire (kámacchanda)
  2. Aversion or Ill-will (vyápáda)
  3. Sleepiness – sloth (thina), torpor (middha), sluggishness
  4. Restlessness – worry about the future, regret of the past, anxiety (uddhacca-kukkucca)
  5. Doubt (skeptical doubt)(vicikicchá)

Five Precepts

  1. To refrain from killing
  2. To refrain from stealing (taking that which is not offered)
  3. To refrain from sexual misconduct
  4. To refrain from lying, harsh speech, idle speech, and slander
  5. To refrain from taking intoxicants that cloud the mind and cause heedlessness

Five Things that lead to Awakening

  1. Admirable friends
  2. Sila (morality, virtue)
  3. Hearing the dharma
  4. Exertion. Effort in abandoning unskillful qualities and cultivating skillful ones
  5. Awareness of impermanence (anicca) - Insight into impermanence

Six Senses

  1. Seeing
  2. Hearing
  3. Smelling
  4. Tasting
  5. Touching
  6. Thinking

Seven Factors of Enlightenment (bojjhanga)

Three arousing, Three calming, mindfulness is neutral

    Neutral

  1. Mindfulness (sati)

    Arousing

  2. Investigation of Phenomena (dhamma vicaya)-Wisdom Factor: seeing anicca, anatta, dukkha; how mind body operates
  3. Energy/Effort (viriya)
  4. Rapture, Joy-intense interest in object (piti)

    Calming

  5. Calm/tranquility (passaddhi)
  6. Concentration (samadhi)
  7. Equanimity (upekkha)

Eight Worldly Dhammas (Conditions, Concerns)

These conditions are inconstant & impermanent.

  • Gain and Loss
  • Pleasure and Pain
  • Praise and Blame
  • Fame and Disrepute (status/disgrace)

Ten Perfections (Paramis/Paramitas)

Ten qualities leading to Buddhahood

  1. Generosity (dana)
  2. Morality (sila)-virtue, integrity
  3. Renunciation (nekkhamma)
  4. Wisdom (pañña)
  5. Energy/Strength (viriya)- effort
  6. Patience (khanti)
  7. Truthfulness (sacca)
  8. Resolution – determination (adhitthana)
  9. Lovingkindness (metta)
  10. Equanimity (upekkha)

Ten Fetters (samyojana)

  1. Self-identity beliefs
  2. Doubt
  3. Clinging to rites and rituals
  4. Sensual craving
  5. Ill will
  6. Attachment to the form
  7. Attachment to formless phenomena
  8. Conceit (mána, literally measuring-as measuring oneself and comparing to others)- (a subtle sense of self)
  9. Restlessness
  10. Ignorance (with regard to the Four Noble Truths)

    Four Stages of Enlightenment

    1. The Stream-enterer (sotapanna)-has eradicated the first three fetters; will be enlightened in Seven lives or less (cognitive, understanding)
    2. The Once-returner (sakadagami) has eradicated the first three & weakened the fourth and fifth (affective, emotional)
    3. The Non-returner (anagami) has eradicated the first five fetters
    4. The Arahat has eradicated all ten fetters. (transcendent-has eliminated attachment to altered states)

    Note: The first 3 fetters are cognitive (understanding), the next 2 are affective (emotional), the last 5 are Transcendent

Twelve Links of Dependent Origination-
Dependent Co-arising (Paticca-Samuppada)

The doctrine of the conditionality of all physical & mental phenomena; how ignorance conditions old age,disease and death

  • From ignorance (avijja) come karma formations/fabrications/volitional formations (sankhara)
  • From karma formations comes consciousness (viññana)
  • From consciousness comes mind and matter (nama-rupa)
  • From mind and matter come the six senses (salayatana)
  • From the six senses comes contact (phassa)
  • From contact comes feeling (vedana)
  • From feeling comes craving (tanha)
  • From craving comes clinging (upadana)
  • From clinging comes becoming/existence (bhava)
  • From becoming/existence comes birth (jati)
  • From birth, then aging & death

Twelve Links of Transcendental Dependent Arising

This continues from the 12 “mundane” links of dependent origination, the last one being dukkha (or suffering) instead of “birth, aging and death”.

  • Suffering (dukkha)
  • Faith (saddha)
  • Joy (pamojja)
  • Rapture (piti)
  • Tranquility (passaddhi)
  • Happiness (sukha)
  • Concentration (samadhi)
  • Knowledge and vision of things as they are (yathabhutañanadassana)
  • Disenchantment (nibbida)
  • Dispassion (viraga)
  • Emancipation (vimutti)
  • Knowledge of destruction of the cankers (asavakkhaye ñana)

37 Factors of Enlightenment or Wings of Awakening
(bodhipakkhiya-dhammá)

The set of teachings that the Buddha himself said formed the heart of his message.

  • Four Foundations of Mindfulness (satipatthana)
  • Four Right Efforts (sammappadhana)
  • Four Bases of Power (iddhipada)
  • Five Faculties (indriya)
  • Five Strengths (bala)
  • Seven Factors of Enlightenment (bojjhanga)
  • Eight Fold Path (ariya-magga)

Pali Terms

anapanasati: mindfulness of breathing
anatta: not-self
anicca: impermanence; inconstancy
Arahat: Liberated one
bhavana: meditation
bhikku: monk
bhikkuni: nun
bodhi: awakening; enlightenment
bodhicitta: awakened heart-mind
Bodhisatta (Sanskrit-Bodhisattva) A future Buddha
Buddha: an Enlightened being
citta: mind, consciousness
Dhamma (Skt. dharma)-liberating law discovered by the Buddha, summed up in the Four Noble Truths, the Truth, Reality, natural law, all physical and mental phenomena
dosa: aversion
dukkha- unsatisfactoriness, suffering, pain, distress, discontent, stress,
jhana: (Skt. dhyana) meditative absorption, a state of strong concentration.
kalyana mitta- spiritual friend
kamma (Skt. karma): (lit.-action) The law of cause and effect; intentional acts
karuna: compassion
khanda (skandha):Five aggregates which form the raw material for one’s sense of self: form/body, feeling, perception, mental formations, consciousness
kilesa (defilements)- greed, aversion, delusion
lobha: greed
magga: path
metta: Lovingkindness, good will
mindfulness (sati) the quality of noticing, of being aware of what’s happening in the moment, not allowing the mind to be forgetful
moha: (lit.-to be stupified) delusion
nibbana (Skt. nirvana): the cessation of suffering, enlightenment, liberation
pañña: wisdom
papañca: Complication, proliferation; tendency of the mind to proliferate issues from the sense of “self.”
parami: perfections, virtues necessary for the realization of Awakening
sacca: truth
saddha: faith, confidence (Lit.-to place one’s heart on)
samadhi: concentration; meditative absorption
sampajañña: alertness
samsára: (lit.-perpetual wandering) ocean of worldly suffering; round of rebirth; pursuit of renewed existence
samvega- spiritual urgency
sangha: the community of Buddhist monks & nuns; recently: “the community of followers on the Buddhist path.”
sati: mindfulness, awareness
sila: moral conduct; precept; virtue; moral restraint
sukha: happiness; pleasure; ease; bliss
sutta: (lit. thread; Skt. sutra) discourse of the Buddha or one of his leading disciples
tanha: (lit. thirst) craving
Tathagata: (Lit. thus gone) an Enlightened person
Theravada: (Doctrine of the elders)- school of Buddhism that draws its inspiration from the Pali Canon, or Tipitaka, the oldest surviving record of the Buddha’s teachings. Has been the predominant religion of southeast Asia (Thailand, Sri Lanka, Burma)
Tipitaka (Literally Three baskets)- The Pali Canon- has Three divisions:

1. Sutta Pitaka- discourses of the Buddha, (Five collections-nikayas- 10,000 suttas)
2. Abhidhamma Pitaka- treatises offering systematic treatment of topics in the suttas
3. Vinaya Pitaka- rules for ordained monks and nuns

upekkha: equanimity
Vipassana: literally, “to see clearly”; insight; insight into the truth of anicca (impermanence), anatta (not-self), & dukkha (unstatisfactoriness), to see things as they really are
viriya: effort; persistence; energy

Tipitika: The Pali Canon

The Tipitaka (Pali ti, “three,” + pitaka, “baskets”), or Pali Canon, is the collection of primary Pali language texts which form the doctrinal foundation of Theravada Buddhism.
Theravada (Pali: thera “elders” + vada “word, doctrine”), the “Doctrine of the Elders”

The 3 divisions of the Tipitaka are:

  1. Vinaya Pitaka : Rules and origin of rules for monks (bhikkhus) and nuns (bhikkhunis). There are 227 rules for the bhikkhus, 311 for the bhikkhunis.
  2. Sutta Pitaka: The collection of discourses, attributed to the Buddha and a few of his closest disciples, containing all the central teachings of Theravada Buddhism
  3. Abhidhamma Pitaka: The Buddhist analysis of mind and mental processes; a wide-ranging systemization of the Buddha’s teaching that combines philosophy, psychology, and ethics into a unique and remarkable synthesis. Consists of 7 books.

SUTTA PITAKA

The Sutta Pitaka, the second division of the Tipitaka, consists of over 10,000 suttas, or discourses, delivered by the Buddha and his close disciples during the Buddha’s forty-five year teaching career, as well as verses by other members of the Sangha.

Grouped into 5 NIKAYAS or collections:

  1. Digha Nikaya - The “Long” Discourses
    Consists of 34 suttas, including the Maha-satipatthana Sutta (The Greater Discourse on the Foundations of Mindfulness-DN22), the Samaññaphala Sutta (The Fruits of the Contemplative Life-DN2), the Maha-parinibbana Sutta (The Buddha’s Last Days-DN16)
  2. Majjhima Nikaya – The “Middle-length” Discourses
    Consists of 152 suttas, including the Sabbasava Sutta (All the Taints/Fermentations-MN 2), Cula-kammavibhanga Sutta (Shorter Exposition of Kamma-MN 135), the Anapanasati Sutta (Mindfulness of Breathing-MN118), Kayagatasati Sutta (Mindfulness of the Body-MN119), Satipatthana Sutta (Foundations of Mindfulness-MN10), the Angulimala Sutta (MN86)
  3. Samyutta Nikaya – The “Connected or Grouped” Discourses
    Consists of 2,889 shorter suttas grouped together by theme into 56 samyuttas.
  4. Anguttara Nikaya - The Numerical or “Further-factored” Discourses
    Consists of 8,777 short suttas, grouped together into eleven nipatas according to the number of items of Dhamma covered in each sutta. (Book of ones to Book of elevens)
  5. Khuddaka Nikaya – The “Division of Short Books”
    Consists of 15 “books” (17 in the Thai edition; 18 in the Burmese), including the Dhammapada (Path of Dhamma,) Therigatha (Verses of the Elder Nuns), Theragatha (Verses of the Elder Monks), Sutta Nipata, Udana, Itivuttaka, Jataka stories, etc.

Wednesday, September 1, 2010

जीवन जीने के लिए कुछ संक्षिप्त नियम

 

इस आपाधापी की जिदंगी मे क्या जिंदगी जीना वाकई मे कष्ट्दायक है … अधिकतर लोगॊं का मानना यही है लेकिन लियो बाबूटा ऐसा नही मानते । जीवन जटिल भी हो सकता है अगर ह्मारी  सोच ऐसी बन चुकी हैं लेकिन Thich Nhat Hanh के शब्दों मे सरल जीवन जीने की कला मात्र  छ्ह शब्दों पर केन्द्रित है , ’ मुस्कराओ , साँस लो और धीरे-२ चलो ’

अगर जीवन जीने के लिये इन छह शब्दों का पालन करेगें तो जीवन आसान हो सकता है लेकिन इसके अलावा  इस आधुनिक युग मे कुछ और दिशानिर्देशों की आवशयकता है जैसे :

  • कम टी.वी. देखें और अधिक पढें ।
  • कम खरीददारी करे और अधिक बाहर निकले ।
  • कम अव्यवस्था फ़ैलाये और व्यवस्थित जीवन जियें ।
  • कम जल्दवाजी मचायें और काम को आराम से करें ।
  • कम खपत करें और अधिक बनायें ।
  • कम जंक फ़ूड खायें और अधिक असली  खाने पर जायें ।
  • कम बिजी रहे लेकिन प्रभावी रुप से रहें ।
  • कम ड्राइविंग करें लेकिन अधिक टहलें ।
  • कम शोर लेकिन अधिक एकांत ढूँढें।
  • भविष्य पर कम ध्यान दें लेकिन वर्तमान पर अधिक देखें ।
  • कम काम करें और अधिक खेले ।
  • कम चिंता करें और चेहरे पर  अधिक मुस्कान लायें ।

क्यॊ भाई कैसी रही …

( लाओ बाबूटा की अनुमति से लेख “ a brief guide to life’ का हिन्दी मे अनुवाद )

Friday, August 27, 2010

Buddhism vs. Bhagavad-Gita

BUDDHA-Buddhism-Light    

bhaga

In this paper I will attempt to compare and contrast the two works, “What the Buddha Taught”, which is based on the Pali texts of Tipitaka, and the “Bhagavad-Gita-The Song of God” by beginning with Buddhism for the first and every other paragraph thereafter, then continuing with Bhagavad-Gita for the second and every other paragraph thereafter. I am hoping this will help maintain a clear understanding of the comparisons I am making to each work throughout the paper.


There are still many similarities between the two works. They both try to teach us not to become so attached to the material world around us. They say the more you let go of the material world around you, the happier you will live your life on earth. If we give in to our desires, whether that be sex or greed, we only allow ourselves to suffer more and will never truly know completehappiness.

Buddhism is unique to every other religious belief because Buddha was a man who did not claim to be a God, nor a son of God. His teachings only claim is that man and only man can liberate himself through the impermanence of Dukkha and find ultimate happiness in his life. His own life on earth was said to be as a Buddha living a life of “par excellence.” He was referred to as a Supreme Being. It is through his life experience and wisdom that he promises to show us the path to Nirvana. The writings were originally done in Sanskrit, but they are what the Buddha taught and how the Buddha lived and why millions of people practice Buddhism today and millions more will tomorrow.

Bhagavad-Gita is also translated from Sanskrit, but is a religious doctrine of prose and song. It speaks of God being in all things as Brahman and inside each of us as Atman. Arjuna is the student and Krishna is God in a form Arjuna can see and hear. Bhagavad-Gita is a spiritual guide that is meant to show the impossibilities of judging thy neighbor because each of us can be faced with choices that are very hard to make and would not be able to explain to someone else. Still, it tries to show that as long as the choices you make are not based on greed, or evil and is a battle meant to be won for the good of mankind, then in the eyes of God, it is a battle worth fighting for. The Gita is an astonishing work that appeals to all religions and all cultures which is something that no other book can claim to be able to do. Many great men have used it as their spiritual guide, like Gandhi, and say that the there are passages within it to help man when he is struggling with difficulties in his life. The Gita teaches us about the Supreme Reality and tries to teach us how to break the chains of desire which bind us to our actions.

Buddhism teaches us about the five aggregates, the first aggregate of matter, the second of sensations, the third of perceptions, the fourth of mental formations and the fifth of consciousness. The first aggregate is the most important because it also contains the four great elements which are solidity, fluidity, heat and motion. It also contains the derivatives of the four great elements which are the five material sense organs which are the eye, ear, nose, tongue and body and their corresponding opposites in the external world which are visible formations, sounds, odors, tastes and tangible things. Thoughts and ideas of mind objects are also included here. The reason all of these are so important is because all aggregates of matter play a role in each of the remaining aggregates. Aggregates of sensation, perception, mental formation and consciousness all respond to the aggregates of matter that make up each of our realities. It is when we learn about the aggregate of consciousness that we begin to see the shift from religion to Buddhism. Buddhism says there is no Atman or soul as religious doctrine preaches. There is no permanent self. There is only a stored consciousness that feeds our ego of self-importance. Buddhism tries to teach us to let go of the aggregates of matter and see everything as impermanence. You find this awareness through repetitious meditations that bring you closer with each session. Learning to focus on each day as it comes and using self-control you learn to live your life with complete happiness.

The Gita uses the Vedas to teach us about the three Gunnas which are Satwas, Rajas, and Tomas. Satwa is light or clarity, Rajas is Energy or movement and Tomas is inertia or heaviness. They are considered as strings that vibrate and they make up our material existence. All of us are made of these of three Gunnas and the elements that remain the same from birth to death is what makes up our identity. The Gita says we must be free from the pairs of opposites and poise our mind in tranquility. It tries to teach us how to do our duties always without attachment.

Buddhism teaches us about the four-Nobel Truths which are Dukkha, the arising of Dukkha, the cessation of Dukkha and the way of leading to the cessation of Dukkha. The way of leading to cessation of Dukkha is to follow the Nobel 8-fold or Middle Path in the search for happiness. That is to know you have the right understanding, right thought, right speech, right action, right livelihood, right effort, right mindfulness and right concentration. By using 4-stages of meditation that begin with the body, then feelings and sensation, the mind and then moral and intelligent subjects you will find Nirvana.

Although the Bhagavad-Gita is a story about war, it is trying to say that every warrior that has died on a battlefield has considered that as a death of honor. Krishna teaches Arjuna that even though he is about to go commit evil acts against the enemy, if he doesn't the people that know him will think he was a coward and did not live up to his sense of duty. He says that the enemy he is fighting has brought him to this crossroad and has not left him with a better choice. He says no one will live forever, but if you die now, God will accept you in his Kingdom and if you conquer you will live the rest of your mortal life as a King here. It is because he is not fighting only because he wants to be a King and is instead fighting because of the way this King is treating his people that he deserves the throne. He has renounced attachment from the fruits. Mainly, Krishna argues he cannot gain freedom from activity by abstaining from action on the battlefield. Here we learn that we can find peace in Atman. The Gita says we must learn to be established in the consciousness of Atman, always.

Of all the differences I have listed there are still many similarities between the two works. They both try to teach us not to become so attached to the material world around us. They say the more you let go of the material world around you, the happier you will live your life on earth. If we give in to our desires, whether that be sex or greed, we only allow ourselves to suffer more and will never truly know complete happiness.

Courtesy :  Laura McCallum

Tuesday, August 10, 2010

भिक्षुणी अम्बपाली (आम्रपाली) के अद्भुत उद्गार

 

buddhaभगवान बुद्ध के प्रभाव में आकर वैशाली की पिंगला-गणिका अम्बपाली (आम्रपाली) एक दिन भिक्षुणी हो गई. उसने समाधि की उच्चतम अवस्था का स्पर्श किया और पूर्णता प्राप्त भिक्षुणियों में वह एक हुई. अपने निरंतर जर्जरित होते हुए शरीर में बुद्ध-वचनों की सत्यता को प्रतिफलित होते देख अम्बपाली हमारे लिए कुछ उद्गार छोड़ गयी है जो अनित्यता की भावना से भरे हुए हैं. वह कहती है:-

काले, भौंरे के रंग के सामान, जिनके अग्र भाग घुंघराले हैं, ऐसे एक समय मेरे बाल थे.
वही आज जरावस्था में जीर्ण सन के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पुष्पाभरणों से गुंथा हुआ मेरा केशपाश कभी हजारा चमेली के पुष्प की सी गंध वहन करता था.
उसी में से आज जरावस्था में खरहे के रोओं की सी दुर्गन्ध आती है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कंघी और चिमटियों से सजा हुआ मेरा सुविन्यस्त केशपाश कभी सुन्दर रोपे हुए सघन उपवन के सदृश शोभा पाता था.
वही आज जराग्रस्त होकर जहाँ-तहाँ से बाल टूटने के कारण विरल हो गया है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सोने के गहनों से सुसज्जित, महकती हुई सुगंधियों से सुशोभित, चोटियों से गुंथा हुआ कभी मेरा सिर रहा करता था.
वही आज जरावस्था में भग्न और नीचे लटका हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

चित्रकार के हांथों से कुशलतापूर्वक अंकित की हुई जैसे मेरी दो भौंहें थीं.
वही आज जरा के कारण झुर्रियां पड़ कर नीचे लटकी हुई हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

गहरे नीले रंग की दो उज्जवल, सुन्दर, मणियों के समान मेरे दो विस्तृत नेत्र थे.
वही आज बुढ़ापे से अभिहत हुए भद्दे और आभाहीन हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

उठते हुए यौवन की सुन्दर शिखर के समान वह मेरी कोमल, सुदीर्घ नासिका थी.
वही आज जरावस्था में दबकर पिचकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

पूरी कारीगरी के साथ बनाये हुए, सुन्दर, सुगठित कंकण के समान, कभी मेरे कानों के सिरे थे.
वही आज जरावस्था में झुर्री पड़कर नीचे लटके हुए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

कदली-पुष्प की कली के समान रंगवाले कभी मेरे सुन्दर दांत थे.
वही आज जरावस्था में खंडित होकर जौ के समान पीले रंगवाले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

वनचारिणी कोकिला की मधुर कूक के समान एक समय मेरी प्यारी मीठी बोली थी.
वही आज जरा के कारण स्खलित और भर्राई हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

अच्छी तरह खराद पर रखे हुए, चिकने शंख के समान, एक समय मेरी सुन्दर ग्रीवा थी.
वही आज जरावस्था में टूटकर नीचे लटकी हुई है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुगोल गदा के समान एक समय मेरी दोनों सुन्दर बांहें थीं.
वही आज जरावस्था में पाडर वृक्ष की दुर्बल शाखाओं के समान हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर मुंदरी और स्वर्णालंकारों से विभूषित कभी मेरे हाथ रहते थे.
वही आज जरा के कारण गाँठ-गठीले हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

स्थूल, सुगोल, उन्नत, कभी मेरे स्तन सुशोभित होते थे.
वही आज जरावस्था में पानी से रीती लटकी हुई चमड़े की थैली के सदृश हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, विशुद्ध, स्वर्ण-फलक के समान कभी मेरा शरीर चमकता था.
वही आज जरावस्था में झुर्रियों से भरा हुआ है.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

हाथी की सूंड के समान कभी मेरे सुन्दर उरु-प्रदेश थे.
वही आज पोले बांस की नली के समान हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर नूपुर और स्वर्णालंकारों से सजी हुई कभी मेरी जंघाएँ रहती थीं.
वही आज जरावस्था में तिल के सूखे डंठल के समान हो गईं हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

सुन्दर, सुकोमल, रुई के फाहे के समान कभी मेरे दोनों पैर थे.
वही आज जरावस्था में झुर्रियां पड़कर सूखे काठ से हो गए हैं.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

एक समय यह शरीर ऐसा था. इस समय वह जर्जर और बहुत दुखों का घर है.
जीर्ण घर जैसे बिना लिपाई-पुताई के गिर जाता है, उसी प्रकार यह जरा का घर, यह शरीर बिना थोड़ी सी रखवाली किये गिर जायेगा.
सत्यवादी (तथागत) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते.

(श्री भरतसिंह उपाध्याय की पुस्तक ‘बुद्ध और बौद्ध साधक’ से लिया गया अंश, आभार सहित)

(A Buddhist anecdote about Amrapali / Ambapali – in HIndi)

साभार : HINDIZEN-निशांत का ब्लाग

Sunday, August 8, 2010

लोक-अपवाद को जीतना

image कुरु देश में मागंदिय नाम का अग्निपूजक ब्राह्मण रहता था। मागंदिया उसकी एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। मागंदिय ने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, परन्तु योग्य वर न मिला। बड़े-बड़े कुलों से कन्या की मँगनी आयी, लेकिन मागंदिया को वर पसन्द न आया।
एक दिन बुद्ध भगवान् प्रातःकाल अपना पात्र और चीवर लेकर नगर के बाहर ब्राह्मण के अग्नि-स्थान के पास खड़े हुए।
बुद्ध को देख ब्राह्मण ने सोचा- इसके समान किसी अन्य पुरुष का मिलना दुर्लभ है। मैं क्यों न इसके साथ अपनी कन्या की शादी कर दूँ ?
ब्राह्मण ने भगवान् से निवेदन किया-‘‘हे श्रमण ! मैंने अपनी कन्या के लिए वर की बहुत खोज की, मगर कोई वर न मिला। बड़े भाग्य से आप मिले हैं। मागंदिया बहुत रूपवती है। वह सचमुच आपके चरणों की दासी बनने योग्य है।’’
इतना कह ब्राह्मण अपनी कन्या को लाने के लिए चल दिया। बुद्ध को वह वहीं ठहरने के लिए कहता गया।
जल्दी-जल्दी घर पहुँच ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला-‘‘भद्रे ! कन्या के लिए वर मिल गया है। जल्दी करो, वस्त्राभूषणों से सज्जित कर मागंदिया को ले चलो।’’
नगर के लोगों को जब मालूम हुआ कि मागंदिया को अपनी कन्या के लिए वर मिल गया है तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भी ब्राह्मण के साथ-साथ वर देखने चले।
बुद्ध उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र गमन कर गये थे। अतः ब्राह्मणी को जब वहाँ कोई न दिखायी दिया तो उसने ब्राह्मण से जिज्ञासा व्यक्त की। ब्राह्मण बोला-‘‘मैं तो उससे यहीं रुकने को कह गया था, किन्तु वह न जाने कहाँ चला गया !’’
इधर-उधर ढूँढ़ने के बाद ब्राह्मण को बुद्ध के पद-चिह्न दिखाई दिये। ब्राह्मणी लक्षणशास्त्र की पण्डित और तीनों वेदों में पारंगत थी। उसने लक्षण विचारकर कहा कि ये पद-चिह्न किसी विषयभोगी के नहीं, किसी तपस्वी के जान पड़ते हैं।
ब्राह्मण को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने अपनी पत्नी से कहा-‘‘ब्राह्मणी ! तुम्हें हमेशा पानी में मगर और घर में चोर दिखाई देते हैं। तुम्हें कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत नहीं।’’
ब्राह्मणी ने उत्तर दिया-‘‘आप चाहे जो कहें, ये पैर किसी विषयभोगी के नहीं हो सकते।’’
ब्राह्मण ने बुद्ध को दूर से देख ब्राह्मणी से कहा-‘‘देखो, देखो, वह है मागंदिया का वर !’’ और तीर की तरह बुद्ध के पास जाकर बोला-‘‘हे भिक्षु ! मैं आपकी सेवा में अपनी कन्या समर्पित करता हूँ।’’
बुद्ध ने कोई उत्तर न देकर ब्राह्मण से कहा-‘‘देखो ब्राह्मण ! अपने महाभिनिष्क्रमण के समय से लगाकर अजापालनिग्रोध वृक्ष के नीचे बोधि प्राप्त करने तक कामदेव ने मुझे कितने कष्ट दिये ! कितना सताया ! जब वह मेरा कुछ न बिगाड़ सका तो एक दिन वह उदास होकर बैठा था कि इतने में उसकी कन्याएँ वहाँ आयीं और उसे सान्त्वना देकर कहने लगीं-‘‘पिताजी, आप क्यों चिन्ता करते हैं। आज्ञा हो तो हम बुद्ध का ध्यान भंग करें।’ लेकिन हे ब्राह्मण ! विषय-भोगों के प्रति मेरी तनिक भी कामना नहीं। यह शरीर मल-मूत्र का भण्डार है। मैं इसका स्पर्श तक करना नहीं चाहता।’’
बुद्ध की बातें सुनकर ब्राह्मण-कन्या मागंदिया को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा-यदि इस भिक्षु को मेरी आवश्यकता नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन यह मेरा अपमान क्यों करता है ? मैं अच्छे कुल में पैदा हुई हूँ, भोग-विलास की मुझे कमी नहीं, सौन्दर्य मेरे चरणों में लोटता है, निस्सन्देह मैं योग्य पति पाऊँगी। फिर यह भिक्षु मुझे इस तरह के वचन क्यों कहता है ? मैं बदला लिये बिना न रहूँगी।
दिन जाते देर नहीं लगती। कुछ समय के बाद मागंदिया के माता-पिता ने अपने भाई चुल्ल मागंदिय को अपनी कन्या सौंपकर प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
चुल्ल मागंदिय ने सोचा मागंदिया को किसी राजा की रानी बनना चाहिए। वस्त्राभूषणों से सजाकर वह उसे कौशाम्बी ले गया और राजा उदयन के साथ विवाह कर दिया।
राजा उदयन मागंदिया को बहुत चाहता था। उसने उसे पटरानी के पद पर अभिषिक्त कर दिया। पाँच सौ दासियाँ उसकी सेवा में रहने लगीं।
एक बार रानी मागंदिया अपने महल से उतरकर घूम रही थीं। पता लगा कि श्रमण गौतम कौशाम्बी आ रहा है। उसने नगर वासियों को प्रलोभन देकर आदेश दिया कि जब श्रमण गौतम नगरी में प्रवेश करें तो वे अपने नौकर-चाकर के साथ मिलकर उसे अपशब्द कह नगर से निकाल दें।
बुद्ध ने नगर में प्रवेश किया तो लोग उन्हें चोर, मूर्ख, ऊँट, बैल, गधा, नारकी, पशु आदि शब्दों से सम्बोधित कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहने लगे-‘‘याद रख श्रमण, तुझे अच्छी गति मिलनेवाली नहीं। तू मरकर दुर्गति को प्राप्त होगा !’’
नगरवासियों के ये वचन सुनकर भगवान् के प्रिय शिष्य आनन्द ने बुद्ध से कहा-‘‘भन्ते ! ये नागरिक हमें अपशब्द कहते हैं। चलिए कहीं अन्यत्र चलकर रहें।’’
बुद्ध-आनन्द, कहाँ जाना चाहते हो ?
आनन्द-किसी दूसरे नगर में ! बुद्ध-यदि वहाँ भी लोगों ने अपशब्द कहे तो कहाँ जाओगे ? आनन्द-अन्यत्र कहीं ! बुद्ध-अगर वहाँ के लोगों ने भी ऐसा बर्ताव किया ? आनन्द-भन्ते, वहाँ से अन्यत्र चले जाएँगे ! बुद्ध-आनन्द, यह ठीक नहीं ! देखो, जहाँ लोकापवाद होता हो, वह जब तक शान्त न हो जाये, तब तक, उस नगर को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहिए। तथा आनन्द, जानते हो अपवाद करने वाले लोग कौन हैं ? आनन्द-भन्ते, नौकर-चाकर तक हमें अपशब्द कहते हैं ! बुद्ध-देखो आनन्द, मैं संग्राम में आगे बढ़े हुए हाथी के समान निश्चल हूँ ! यदि चारों दिशाओं से हाथी को तीर आकर लगें तो वीरतापूर्वक डटे खड़े रहना चाहिए। इसी प्रकार अनेक दुष्ट पुरुषों के अपवाद को सहन करना मेरा कर्तव्य है। याद रखो आनन्द, वश में किये हुए खच्चर, सिन्धु देश के घो़ड़े तथा जंगली हाथी उत्तम समझे जाते हैं, लेकिन इन सबसे उत्तम वह है जो अपने आपको वश में रखता है !