Wednesday, January 2, 2013

श्रावस्ती संस्मरण - भाग २

पिछ्ले अंक से आगे …….
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जेतवन और प्राचीन श्रावस्ती खण्डरों के मध्य कोई अधिक दूरी नही है । लगभग दो बजे तक जेतवन से हम निकल कर प्राचीन श्रावस्ती के खण्डरों  की तरफ़ चल पडे । यहाँ  सडक किनारे कई मोनेस्ट्री और जैन मन्दिर दिखाई पडे  । इसलिये पहले यही निर्णय  लिया गया लि इन मन्दिरों से ही शुरुआत की जाये ।
प्रतिहार टीला ( ओडाझार )
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मुख्य सडक के ठीक किनारे पर यह स्थान है । कहते हैं कि इस स्थान  भगवान्‌ बुद्ध ने विशाल जन समुदाय के मध्य श्रद्धी चमत्कार लिया था । हाँलाकि बुद्ध चमत्कारों  के बिल्कुल भी पक्ष मे नही थे लेकिन एक वर्ग द्वारा उन्हें चुनोती देने के कारण बुद्ध ने यह निर्णय लिया । यह भी कहा जाता है कि बुद्ध ने यहाँ महामाया को अभिधम्म की देशना देकर अहर्त लाभ करवाया था एवं वर्षावास यहीं पूरा किया था ।
श्रीलंका आरामय बुद्ध मन्दिर 
श्रीलंका की श्रद्धालु जनता के द्वारा निर्मित इस भव्य मन्दिर में भगवान बुद्ध की जीवन चर्या को भित्त चित्रों में बडे ही सजीव व कलात्मक शैली में अंकित किया गया है ।
कम्बोज बुद्ध मन्दिर
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इस मन्दिर में  बौद्ध शिल्प संस्कृति की अनूठी प्रस्तुति देखने को मिलती है । यह सहेठ महेठ तिराहे पर मुख्य सडक के दक्षिण मे स्थित है ।
जैन मन्दिर 
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जैन मत के अनुसार श्रावस्ती तीर्थकर भगवान्‌ सम्भवनाथ की जन्मस्थली है । घण्टा पार्क के पूर्व मध्य सडक के दक्षिण में शवेताम्बर व दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों के जैन मन्दिर बने हैं । शवेताम्बर मन्दिर सफ़ेद संगमरमर पत्थर का बना हुआ है । दोनों मन्दिर दर्शनीय हैं ।
जापानी घण्टा पार्क
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मुख्य सडक पर एक उधान में विशाल घण्टा लगा है ।
कोरिया बुद्ध मन्दिर
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कोरियन शिल्प का यह महायानी बुद्ध मन्दिर मुख्य सडक पर है ।
मायानामर मोनेस्ट्री
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इसके अतिरिक्त इसी सडक के दोनों ओर कई और भी मन्दिर हैं जैसे भारत के नव बौद्धों द्वारा निर्मित भारतीय बुद्ध मन्दिर , समय माता मन्दिर , महामंकोल बुद्ध मन्दिर आदि । ओडिझार पर हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ एक ‘शिव बाबा ’ का मन्दिर है जो वास्तव मे सम्राट अशोक द्वारा स्थापित पत्थर की शिला है जिसे स्थानीय जनता शिव लिंग मानकर पूजा अर्चना करती है । यहाँ तक पहुँचने के लिये ओडीझार के ठीक सामने की रोड से ‘ काब्धारी गाँव ’  के बगल से होकर इस स्थान तक वाहन या पैदल  पहुँचाजा सकता है । यहाँ पहुँचने पर हमारी मुलाकात भिक्षु श्री विमल तिस्स से हुयी ।  भिक्षु श्री विमल तिस्स धर्म प्रसाद पूर्वाराम महाविहार को काफ़ी समय से देख रहे हैं ।
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भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में प्राचीन श्रावस्ती खण्डर का क्षेत्रफ़ल लभग २५० एकड है । इस विस्तूत खण्डरी जंगल के चारों तरफ़ ऊँचे टीले यह सिद्ध करते हैं कि सम्पूर्ण नगर ऊँचे प्राकारों से घिरा था । इन खणडरों के गर्भ में अभी बहुत कुछ अज्ञात पडा है । बुद्ध वाडगमय त्रिपिटक में सम्पूर्ण श्रावस्ती की तत्कालीन कला संस्कृति व सुख समृद्धि की भव्यता का विराट वर्णन है । भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही खुदाई व संरक्षण मे कुछ स्थल प्रमाणित किये गये हैं ।
सम्भवनाथ मन्दिर
sambhav nath temple
सम्भवनाथ मन्दिर : साभार : shunya.net
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प्राचीन श्रावस्ती के खण्डर परिसर में प्रवेश करते ही यह देखा जा सकता है । इस स्थल पर जैनियों के तीसरे तीर्थांकर सम्भवनाथ का जन्म हुआ था। लाखोरी ईटॊं से बना हुआ यह गुम्बद युक्त मन्दिर ध्वंस मध्यकालीन युग का प्रतीत होता है ।
सुदत्त महल ( कच्ची कुटी )
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सुद्त्त यानी अनाथपिण्डक का यह निवास स्थल है । आज यह विध्वंस अतीत के विभिन्न काल खण्डों के मिश्रित वास्तु शिल्प का प्रतीक है । ये प्रतीक कुषाण काल से लेकर बारहवीं सदी तक के हैं । ऊपर पार्शव में  चित्र मे सुदत महल के आस पास विदेशी सैलानियों के अपार समूह को  देख सकते हैं । यह चित्र अगुंलिमाल गुफ़ा की छ्त से लिया गया है । कहते हैं कि काल प्रवाह में कोई संत जी कच्ची मिट्टी की कुटी बनाकर रहते थे इसी हेतु जनश्रुति में इस विध्वंस का नाम कच्ची कुटी पड गया ।
आंगुलिमाल गुफ़ा ( पक्की कुटी )
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आंगुलिमाल गुफ़ा नाम जनधारणा में अनजाने में ही कहा गया है । चीनी यात्री ह्वेनसांग व फ़ाह्यान के यात्रा दृष्टातों में इस विध्वंस का आंगुलिमाल के स्तूप के रुप मे वर्णन है , परन्तु पुरातत्वविद होई के अनुसार यह धर्म मंडप का विध्वंस चिन्ह है । इसकी वास्तु रचना से यह विध्वंस स्तूप ही सिद्ध होता है । चित्र को देखें तो नीचे एक सुरंग नजर आ रही है । होई ने विध्वंस की सुरक्षा के लिये वर्षा के जल की निकासी हेतु यह सुरंग खुदवाई  थी । एक मत के अनुसार यह  स्तूप उस दुखी महिला का है जो प्रसव पीडा से आक्रान्त थी और जिसे भिक्षु आंगुलिमाल ने अपने तपोपुण्य से पीडा मुक्त कर माता एंव शिशु दोनों को जीवन प्रदान किया था । कालांतर मे कोई संत जी पक्की कुटी बना के रहने लगे तभी से इसका नाम पक्की कुटी पड गया ।
राजा प्रसेनजित का महल
पुरातव की खुदाई मे भी यह स्थल चिन्हित नही किया जा सका है , परन्तु  यह सर्वविदित है कि श्रावस्ती बुद्ध काल में कोशल देश की एक मात्र राजधानी थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उस महल के विध्वंस को देखा था ।
शाम के ४.३० बज रहे थे । श्रावस्ती में  और भी बहुत कुछ देखने को था लेकिन समय अब नही था । कुछ कडवी यादें भी रही , स्थानीय श्रावस्ती के कुछ युवकों  को  थाई मन्दिर मे उत्पात मचाते देखा , थाई युवतियों और विदेशी सैलानियों को वे बिलावजह निशाना बना रहे थे , यह सब करतूतें अपने देश की गरिमा को कम करती है  । इस तथ्य को भी  याद रखना होगा कि श्रावस्ती भी किसी धर्म विशेष की आराध्य भूमि है , जैसा सम्मान  आप अपने धर्म को देते हैं उतना ही दूसरे धर्मों  को भी देना सीखें । दूसरा श्रावस्ती के अधिकतर खंडहर बहुत ही जीर्ण- शीर्ण  अवस्था मे है , अधिकतर लाखोरी ईटॆं जगह –२ से गायब मिली या रास्ते मे जगह –२ बिखरी मिली । पुरातत्व विभाग को इस विरासत को सँभालने का प्रयास करना होगा ।
शायद अब यह समय है देश मे फ़ैली तमाम बौद्ध विरासत को  बौद्ध मतावलम्बियों के हवाले कर दिया जाये , संभव है इससे  इन विरासतॊ की सम्मानपूर्वक रक्षा की जा सके  ।

Tuesday, January 1, 2013

श्रावस्ती संस्मरण - भाग १


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पूरे दिन का अवकाश मुझे कम ही मिलता है , एक होली वाले दिन और दूसरा दीपावली के अगले दिन , जब क्लीनिक  बन्द रहती है । श्रावस्ती जाने  का मन कई सालों से था , लेकिन संयोग बना गत वर्ष दीपावली के अगले दिन । सोच कर गये थे कि दो घंटे मे श्रावस्ती  का  अतीत देख लेगें लेकिन लगे पूरे छ घंटे । भगवान बुद्ध , अंगुलिमाल  और कई  जैन तीर्थाकरों की कहानियाँ कई जगह पढी थी लेकिन सजीव ही अतीत के उन अवशेषों  को देखने का मौका मिला ।  देर रात घर लौटते हुये लगा कि कुछ पल और  श्रावस्ती में रुक लेते ।   श्रावस्ती भ्रमण  की यह यादें मानो मन:पटल मे आज भी सजीव रुप से अंकित है । यह पोस्ट शायद पिछले वर्ष ही डाल देनी चाहिये थी लेकिन समयभाव के कारण संभव न हो पाया । पूरी यात्रा के दौरान मेरे प्रिय मित्र श्री राजेश चन्द्रा जी का साथ फ़ोन के माध्यम से बना रहा , देर रात घर लौटने तक वह मेरे  और मेरे परिवार के कुशलप्रेम  की बार –२ खबर लेते रहे । उनके  प्रेम रुपी व्यवहार की मधुर स्मृतियाँ मुझे  हमेशा उनकी याद दिलाती रहेगी । साथ ही में पूर्वाराम विहार के भिक्षु श्री विमल तिस्स जी का भी जिनके सहयोग के बगैर कई तथ्यों को जानना मेरे लिये संभव नही होता ।
श्रावस्ती से भगवान्‌ बुद्ध का गहरा रिशता   रहा है । यह तथ्य इसी से प्रकट होता है कि जीवन के उत्तरार्थ के २५ वर्षावास( चार्तुमास ) बुद्ध ने श्रावस्ती मे ही बिताये । बुद्ध वाणी संग्रह त्रिपिटक के अन्तर्गत ८७१ सूत्रों ( धर्म उपदेशॊ )  को भगवान्‌ बुद्ध ने श्रावस्ती प्रवास मे ही दिये थे , जिसमें ८४४ उपदेशों को जेतवन – अनाथपिंडक महाविहार में व २३ सूत्रों को  मिगार माता पूर्वाराम मे उपदेशित किया था । शेष ४ सूत्रों समीप के अन्य स्थानों मे दिये गये थे । भगवान बुद्ध के महान आध्यात्मिक  गौरव का केन्द्र बनी श्रावस्ती का सांस्कृतिक प्रवाह मे भयानक विध्वंसों के बाद वर्तमान मे भी यथावत है ।
इतिहास मे दृष्टि दौडायें तो कई रोचक तथ्य दिखते हैं । प्राचीन काल में यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी। भगवान राम के पुत्र लव ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनो का तीर्थ स्थान है।
माना गया है कि श्रावस्ति के स्थान पर आज आधुनिक सहेत महेत ग्राम है जो एक दूसरे से लगभग डेढ़ फर्लांग के अंतर पर स्थित हैं। यह बुद्धकालीन नगर था, जिसके भग्नावशेष उत्तर प्रदेश राज्य के, बहराइच एवं गोंडा जिले की सीमा पर, राप्ती नदी के दक्षिणी किनारे पर फैले हुए हैं।
इन भग्नावशेषों की जाँच सन्‌ 1862-63 में जनरल कनिंघम ने की और सन्‌ 1884-85 में इसकी पूर्ण खुदाई डा. डब्लू. हुई (Dr. W. Hoey) ने की। इन भग्नावशेषों में दो स्तूप हैं जिनमें से बड़ा महेत तथा छोटा सहेत नाम से विख्यात है। इन स्तूपों के अतिरिक्त अनेक मंदिरों और भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। खुदाई के दौरान अनेक उत्कीर्ण मूर्तियाँ और पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जो नमूने के रूप में प्रदेशीय संग्रहालय (लखनऊ) में रखी गई हैं। यहाँ संवत्‌ 1176 या 1276 (1119 या 1219 ई.) का शिलालेख मिला है, जिससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म इस काल में प्रचलित था। जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान्‌ महावीर ने भी श्रावस्ति में विहार किया था। चीनी यात्री फाहियान 5वीं सदी ई. में भारत आया था। उस समय श्रावस्ति में लगभग 200 परिवार रहते थे और 7वीं सदी में जब हुएन सियांग भारत आया, उस समय तक यह नगर नष्टभ्रष्ट हो चुका था। सहेत महेत पर अंकित लेख से यह निष्कर्ष निकाला गया कि 'बल' नामक भिक्षु ने इस मूर्ति को श्रावस्ति के विहार में स्थापित किया था। इस मूर्ति के लेख के आधार पर सहेत को जेतवन माना गया। कनिंघम का अनुमान था कि जिस स्थान से उपर्युक्त मूर्ति प्राप्त हुई वहाँ 'कोसंबकुटी विहार' था। इस कुटी के उत्तर में प्राप्त कुटी को कनिंघम ने 'गंधकुटी' माना, जिसमें भगवान्‌ बुद्ध वर्षावास करते थे। महेत की अनेक बार खुदाई की गई और वहाँ से महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई, जो उसे श्रावस्ति नगर सिद्ध करती है। श्रावस्ति नामांकित कई लेख सहेत महेत के भग्नावशेषों से मिले हैं।
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महामंकोल थाई मन्दिर
प्रात: दस बजे तक हम श्रावस्ती की सडकों पर थे । दूर से ही विशाल महामंकोल थाई मन्दिर और बुद्ध की प्रतिमा दिख रही  थी  । लेकिन मन्दिर मे पर्वेश करने पर ज्ञात हुआ कि स्थानीय लोगों के लिये मन्दिर के द्वार २ बजे के बाद खुलते है । मन्दिर की फ़ोटॊ लेने  की अनुमति नही है । हाँलाकि बाहर से फ़ोटॊ ले सकते हैं । दोपहर २.३० बजे हम इस विशाल फ़ैले हुये प्रांगण के अन्दर प्रवेश कर गये । मन्दिर का संचालन थाई युवतियों और उन्के स्टाफ़ द्वारा किया जाता है । थाई शैली पर बना यह मन्दिर बेहद दर्शीनीय  है ।
जेतवन अनाथपिण्क महाविहार ( सहेठ वन )
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भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस आश्रम ( विहार ) में अब केवल कुटियों की बुनियाद मात्र रह गयी है । कहते हैं  कि बुद्ध विहार के निर्माण  लिये राजकीय जेतवन का चयन सुद्त्त ने किया था । सुदत्‌ ने राजकुमार जेत से उधान के लिये किसी भी कीमत पर आग्रह किया । कुमार जेत  ने  भूखन्ड के बराबर सोने की मोहरों में सुदत ने लेन देन सुनिशचित किया । १८ करोड में विशाल भव्य सुविधाजनक विहार का निर्माण हुआ । राजकीय गौरव सम्मान के साथ यह अति रमणीय स्थान भगवान बुद्ध को दानार्पित किया गया । यही कारण है कि धर्म क्षेत्र मे सुदत – अनाथपिडंक का नाम चिरस्थाई हो गया । इसी तपोभूमि पर भगवान बुद्ध ने विशाल भिक्षु संघ के साथ उन्नीस चार्तुमास ( वर्षावास ) व्यतीत किये । सम्पूर्ण ८७१ उपदेशों में से ८४४ सूत्र इस  जेताराम मे ही भगवान्‌ बुद्ध ने दिया था ।
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                  मन्दिर सं. १ एवं मोनेस्ट्री
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               ध्यान लगाते हुये विदेशी तीर्थयात्री
ऐसा लगता है कि  इस तपस्थली पर नैसर्गिक शान्ति की   सदोऊर्जा सर्वत्र आज भी विधमान है । कुछ क्षण आँखों को बन्द कर के गन्ध कुटी के सामने खडा रहकर इस उर्जा का स्वानुभव किया जा सकता है । यह मेरा  दिव्यस्वपन था या कल्पनाशीलता , यह कहना मुशकिल है ।
जेतवन मे ही  आगे बढने पर वयोवृद्ध पीपल वृक्ष ‘ आनन्द बोध ’ के दर्शन होते हैं । इसे पारिबोधि चैत्य भी कहते हैं । भन्ते आनन्द व भन्ते महामौदगल्यायन के सद्‌ प्रयत्न से बोध गया के महायोगी वृक्ष की संतति तैयार की गयी , जिसे आनाथपिडंक ने यहाँ आरोपित किया था । कहते हैं कि भगवान्‌ बुद्ध ने इसके नीचे एक रात्रि की समाधि लगाई थी ।
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              आनन्द बोधि वृक्ष ( पारिबोधि चैत्य)
आनन्द बोधि वृक्ष के आस पास कई कुटियों की बुनियादें शेष हैं जो बुद्धकाल के स्वर्णिम युग की एक झलक दिखाती हैं । इनमें से प्रमुख हैं : कौशाम्बी कुटी ( मन्दिर सं० ३ ), चक्रमण स्थल , आनन्द कुटि , जल कूप , धर्म सभा मण्डप , करील कुटी( मन्दिर सं० १ ) , पुष्करिणी , शवदाह स्थल, सीवली कुटी (मन्दिर सं० ७ ), आंगुलिमाल कुटी , धातु स्तूप, जन्ताधर स्तूप, अष्ट स्तूप , राजिकाराम ( मन्दिर सं० १९ ) , पूतिगत तिस्स कुटी ( मन्दिर सं० १२ ) । शेष भग्नावशेष भी कुटियों के अथवा धातु स्तूपों के हैं ।
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                                  अष्ट स्तूप
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                 गन्ध कुटि ( मन्दिर सं० २ )
इन स्तूपों के अलावा जिस स्तूप का सर्वाधिक महत्व है,  वह है गन्ध कुटि ( मन्दिर सं० २ ) । भगवान्‌ बुद्ध का यह निवास स्थान था । चंदन की लकडी से निर्मित यह सात तल की सुंदर भव्य कुटी थी । इसे अनाथपिण्क ने बनवाया था । वर्तमान खण्डर के ऊपर का भाग बुद्धोतर काल का पुनर्निर्माण है । नीचे का भाग बुद्ध्कालीन है , इसमें भगवान्‌ बुद्ध की प्रतिमा बाद में स्थापित की गयी थी । चीनी यात्री फ़ाह्यान ने इस विध्वंस पर दो मंजिला ईंट का बना भव्य बुद्ध मन्दिर देखा था । ह्ववेनसांग के यात्रा काल मे वह मन्दिर नष्ट हो चुका था । ढांचें से स्पष्ट होता है कि दीवारों की आशारीय मोटाई छ: फ़ुट व प्रकारों की आठ फ़ुट है । सम्पूर्ण गन्धकुटी परिसर की माप ११५ * ८६ फ़ीट है ।
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                        धर्म सभा मण्डप
गन्ध कुटि से लगा हुआ  धर्म सभा मण्डप भगवान्‌ बुद्ध का धर्मोपदेश देने का स्थान था । यहाँ  भिक्षुओं और अन्य जनों को बैठाकर भगवान बुद्ध धर्मौपदेश करते थे । इनके द्वारा ८४४ धर्म उपदेश यही से दिये गये थे ।
कुछ अन्य स्तूपों के चित्र :
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                              मन्दिर सं. ११ एवं १२
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                 मन्दिर सं. १९ एवं मोनेस्ट्री
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                          स्तूप संख्या ५
जेतवन से हम चलते हैं महेठ वन की ओर ( लेकिन अगले अंक में )
…….. शेष अगले भाग में …..

Friday, November 30, 2012

River Flow–“old age and suffering“”

old age and suffering

There’s nothing wrong with the way the body grows old and
gets sick. It just follows its nature. So it’s not the body that
causes us suffering, but our own wrong thinking. When we see the right wrongly, there’s bound to be confusion.
It’s like the water of a river. It naturally flows downhill. It
never flows uphill. That’s its nature. If we were to go and stand on the bank of a river, and seeing the water flowing swiftly down its course, foolishly want it to flow back uphill, we would suffer. We would suffer because of our wrong view, our thinking “against the stream.” If we had right view, we would see that the water must flow downhill. Until we realize and accept this fact, we will always be agitated and never find peace of mind. The river that must flow downhill is like our body. It passes through youth, old age and finally dies. Don’t let us go wishing it were otherwise. It’s not something we have the power to remedy. Don’t go against the stream!
~A Tree in a Forest - A Collection of Ajahn Chah's Similes ~

Wednesday, November 28, 2012

बुद्धघोष

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बुद्धघोष, पालि साहित्य के एक महान् बौद्धाचार्य। बुद्धघोसुपत्ति सद्धम्मसंगह, गंधवंश और शासन वंश में बुद्धघोष का जीवनचरित्र विस्तार से मिलता है, किंतु ये रचनाएँ 14वीं से 19वीं शती तक की हैं। इनसे पूर्व का एकमात्र महावंश के चूलवंश नामक उत्तर भाग का 37वाँ परिच्छेद ऐसा है जिसकी 215 से 246 गाथाओं में बुद्धघोष का जीवनवृत्त पाया जाता है।

यद्यपि इसकी रचना धर्मकीर्ति नामक भिक्षु द्वारा १३वीं शती में की गई है, तथापि वह किसी अविच्छिन्न श्रुतिपरंपरा के आधार पर लिखा गया प्रतीत होता है। इसके अनुसार बुद्धघोष का जन्म बिहार प्रदेश के अंतर्गत गया में बोधिवृक्ष के समीप ही कहीं हुआ था। बालक प्रतिभाशाली था, और उसने अल्पावस्था में ही वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया, योग का भी अभ्यास किया फिर वह अपनी ज्ञानवृद्धि के लिए देश में परिभ्रमण व विद्वानों से वादविवाद करने लगा। एक बार वह रात्रिविश्राम के लिए किसी बौद्धविहार में पहुँच गया। वहाँ रेवत नामक स्थविर से बाद में पराजित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली। तत्पश्चात् उन्होंने त्रिपिटक का अध्ययन किया। उनकी असाधारण प्रतिभा एवं बौद्धधर्म में श्रद्धा से प्रभावित होकर बौद्ध संघ ने उन्हें बुद्धघोष की पदवी प्रदान की। उसी विहार में रहकर उन्होंने "ज्ञानोदय" नामक ग्रंथ भी रचा। यह ग्रंथ अभी तक मिला नहीं है। तत्पश्चात् उन्होंने अभिधम्मपिटक के प्रथम नाग धम्मसंगणि पर अठ्ठसालिनी नामक टीका लिखी। उन्होंने त्रिपिटक की अट्टकथा लिखना भी आरंभ किया। उनके गुरु रैवत ने उन्हें बतलाया कि भारत में केवल लंका से मूल पालि त्रिपिटक ही आ सकता है, उनकी महास्थविर महेंद्र द्वारा संकलित अट्टकथाएँ सिंहली भाषा में लंका द्वीप में विद्यमान हैं। अतएव तुम्हें वहीं जाकर उनको सुनना चाहिए और फिर उनका मागधी भाषा में अनुवाद करना चाहिए। तदनुसार बुद्धघोष लंका गए। उस समय वहाँ महानाम राजा का राज्य था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अनुराधपुर के महाविहार में संघपाल नामक स्थविर से सिंहली अट्टकथाओं और स्थविरवाद की परंपरा का श्रवण किया। बुद्धघोष को निश्चय हो गया कि धर्म के अधिनायक बुद्ध का वही अभिप्राय है। उन्होंने वहाँ के भिक्षुसंघ से अट्टकथाओं का मागधी रूपांतर करने का अपना अभिप्राय प्रकट किया। इसपर संघ ने उनकी योग्यता की परीक्षा करने के लिए "अंतो जटा, बाहि जटा" आदि दो प्राचीन गाथाएँ देकर उनकी व्याख्या करने को कहा। बुद्धघोष ने उनकी व्याख्या रूप विसुद्धिमग्ग की रचना की, जिसे देख संघ अति प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें भावी बुद्ध मैत्रेय का अवतार माना। तत्पश्चात् उन्होंने अनुराधपुर के ही ग्रंथकार विहार में बैठकर सिंहली अट्टकथाओं का मागधी रूपांतर पूरा किया, और तत्पश्चात् भारत लौट आए।

इस जीवनवृत्त में जो यह उल्लेख पाया जाता है कि बुद्धघोष राजा महानाम के शासनकाल में लंका पहुँचे थे, उससे उनके काल का निर्णय हो जाता है, क्योंकि महानाम का शासनकाल ई. की चौथी शती का प्रारंभिक भाग सुनिश्चित है। अतएव यही समय बुद्धघोष की रचनाओं का माना गया है। विसुद्धिमग्ग में अंत में उल्लेख है कि मोरंड खेटक निवासी बुद्धघोष ने बिसुद्धमग्ग की रचना की। उसी प्रकार मज्झिमनिकाय की अट्टकथा में उसके मयूर सुत्त पट्टण में रहते हुए बुद्धमित्र नामक स्थविर की प्रार्थना से लिखे जाने का उल्लेख मिलता है। अंगुत्तरनिकाय की अट्टकथाओं में उल्लेख है कि उन्होंने उसे स्थविर ज्योतिपालकी प्रार्थना से कांचीपुर आदि स्थानों में रहते हुए लिखा। इन उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी अट्टकथाएँ लंका में नहीं,बल्कि भारत में, संभवत: दक्षिण प्रदेश में, लिखी गई थीं। कंबोडिया में एक बुद्धघोष विहार नामक अति प्राचीन संस्थान है, तथा वहाँ के लागों का विश्वास है कि वहीं पर उनका निर्वाण हुआ था और उसी स्मृति में वह बिहार बना।

बुद्धघोष द्वारा रचित माने जानेवाले ग्रंथ निम्न प्रकार हैं :

1. बिसुद्धिमग्ग में संयुक्त निकाय की "अंतो जटा" आदि दो गाथाओं की व्याख्या दार्शनिक रूप से की गई है। इस ग्रंथ की बौद्ध संप्रदाय में बड़ी प्रतिष्ठा है।

2. सामंत पासादिका - विनयपिटक की अट्टकथा,

3. कंखावितरणी - विनयपिटक के एक खंड पातिमोक्ख की अट्टकथा,

4. सुमंगलविलासिनी - दीघनिकाय की अट्टकथा,

5. पपंचसूदनी - मज्झिमनिकाय की अट्टकथा,

6. सारत्थपकासिनी - संयुत्तनिकाय अट्ठकथा,

7. मनोरथजोतिका - अंगुत्तरनिकाय की अट्ठकथा,

8. परमत्थजोतिका - खुद्दकनिकाय के खुद्दकपाठ एवं सुत्तनिपात की अट्टकथा,

9. धम्मपद-अट्टकथा,

10. जातक-अट्ठवण्णना,

11. अट्ठशालिनी-अभिधम्मपिटक के धम्मसंगणि की अट्ठकथा,

12. संमोहविनोदनी-विभंग की अट्टकथा,

13. पंचप्पकरण अट्ठकथा - अभिधम्मपिटक के कथावत्थु, पुग्गल पण्णति, धातुकथा, यमक और पट्ठाण इन पाँच खंडों पर की टीका है।

इस प्रकार बुद्धघोष ने पालि में सर्वप्रथम अट्ठकथाओं की रचना की है। पालि त्रिपिटक के जिस अंशों पर उन्होंने अट्ठकथाएँ नहीं लिखी थी, उनपर बुद्धदत्त और धर्मपाल ने तथा आनंद आदि अन्य भिक्षुओं ने अट्ठकथाएँ लिखकर पालि त्रिपिटक के विस्तृत व्याख्यान का कार्य पूरा किया।

सभार : विकीपीडिया

Monday, November 12, 2012

सबसे शक्तिशाली तत्व– “ हमारी इच्छाशक्ति ”

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एक बार आनंद ने भगवान्‌ बुद्ध से पूछा – “ जल , वायु, अग्नि इत्यादि तत्वों मे सबसे शक्तिशाली तत्व कौन सा है ? ”

भगवान्‌ बुद्ध ने कहा – “ आनंद ! पत्थर सबसे कठोर और शकितशाली दिखता है , लेकिन लौहे का हथोडा  पत्थर के टुकडे-२ कर देता है , इसलिये लोहा पत्थर से अधिक शक्तिशाली है । ”

“लेकिन लोहार आग की भट्टी मे लोहे को गलाकर उसे मनचाही शक्ल मे ढाल देता है , इसलिये लोहा पत्थर से अधिक शक्तिशाली है । ”

“ मगर आग कितनी भी विकराल क्यों न हो , जल उसे शांत कर देता है । इसलिये जल पत्थर, लोहे, और अह्नि से अधिक शक्तिशाली है । लेकिन जल से भरे बादलों को वायु कही से कही उडाकर ले जाती है , इसलिये वायु , जल से भी अधिक बल्शाली है ।”

“ लेकिन हे आनंद ! इच्छाश्क्ति वायु की दिशा को भी मोड सकती है । इसलिये सबसे अधिक शक्तिशाली तत्व है – व्यक्ति की इच्छाशक्ति । इच्छाश्क्ति से अधिक बलशाली तत्व कोई नही है ।

साभार स्त्रोत : “बुद्ध का चक्रवर्ती  साम्राज्य “, लेखक- “ श्री राजेश चन्द्रा ”

Thursday, November 8, 2012

जीवन की अद्‍भुततायें – यही तो जीवन है

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गत सप्ताह  कुछ अधिक  ही सूकून से बीता । क्लीनिक की चिकिचिक और मरीजों के शोर से हटकर  कौसानी की पहाडियाँ और  घाँटियाँ , ऊँचे-२ देवदार के वृक्ष , विशाल हिमालय पर्वत की ऊँची अट्ट्टलिकाओं   के पीछे से उदय होता सूर्य मानों मंत्र्मुग्ध सा कर देता है ।  मै अविरल प्रकृति की गहराईयों में डूब सा जाता हूँ । सुबह का छ:  बजने को है , होटल का स्टाफ़ हमें  ५ बजे से ही उठा देता है । “ जल्दी उठिये , हिमालय दर्शन जो करना है । " अपने कमरे मे से बाहर आता हूँ , होटल की छ्त से प्रकृति का अभूतपूर्व नजारा दिखता है ।  आँखो को बन्द करते हुये  साँसों को नियत्रित करता हूँ और फ़िर आंखों को खोलते हुये   प्रकृति के इस मोहक रुप को …. देखकर क्या यह नही लगता कि हम अपनी जिन्दगी मे व्यर्थ की दौड भाग किये जा रहे  हैं । प्रकृति हमेशा शांत रहती है , यह हमारी भावनायें  हैं जो अनजाने मे ही सही व्यर्थ की तकलीफ़े पहुँचाती  रहती है ।

लेकिन ऐसा नही है कि यह शांति  सिर्फ़ हमॆ बाहर जाने पर ही मिल सकती  है । यहाँ  घर पर भी प्रात:काल  का समय मुझे बहुत सूकून देने वाला लगता है । इस वर्ष जबकि मैने सुबह की सैर का स्थान बदल दिया है लेकिन गत वर्ष पुलिस प्रांगण मे सुबह –२ दौड लगाने के बाद जब शरीर शिथिल सा हो जाता था तो उस मिनी स्टॆडियम के प्रांगण के एक कोने मे जहाँ  अशोक के कई पेड लगे हुये हैं , वहाँ बैठ कर आँखों को बन्द कर के साँसों को नियत्रित करते हुये मै उन सब को साक्षी भाव  से देख सकता हूं जो मुझे अति आनन्दित करती है । यह समय पेड पर वास करने वाली असंख्य चिडियों का है जिनकी दिनचर्या सुबह –२  शुरु हो जाती है । उन का चहचहाना , हवा के चलने से  पत्तों की सरसराहट का स्वर सब अपना सा ही तो लगता है , क्या वह मिलने वाले अन्य आनन्दों से कमतर  है । बिल्कुल नही । सच तो यह है कि जीवन को वर्तमान के क्षण मे ही खोजा जा सकता है किन्तु हमारा चित्त शायद ही कभी वर्तमान क्षण को जी रहा होता है । वर्तमान के क्षण मे या तो हम अतीत को खंगालने लगते हैं अथवा अनागत भविष्य विषयक कामनायें किया करते हैं ।

बुद्ध के जीवन से एक प्रंसग है । बुद्ध का नित्य नियम था कि वह तडके उठ जाते और बैठकर ध्यान साधना करते । एक दिन वह ऋषिपतन के मृगदाय ध्यान में साधना मे व्यस्त थे तभी वहाँ  से एक २७-२८ वर्ष का युवक चट्ठान के पास से   गुजरा । उसे बुद्ध की उपस्थिति का कुछ भी ज्ञान नही था और बडबडा रहा था – “सब अरुचिपूर्ण , घृणास्पद” ।

बुद्ध बोल उठे , “कुछ भी अरुचिपूर्ण और  घृणास्पद नही होता ।”

बुद्ध ने उससे पूछा  “क्या अरुचिपूर्ण , घृणास्पद  है ?”

युवक ने अपना परिचय देते हुये कहा कि मेरा नाम यश है और मै वाराणसी के एक सबसे धनी और सम्मानित श्रेष्ठि का पुत्र हूँ । मेरे माता पिता ने मेरी सब मरजी पूरी की है और सभी मौज मस्ती के साधन जुटाये हैं । लेकिन मै अब इन आमोद प्रमोद  के जीवन से ऊब गया हूँ  और इन सबसे मुझे कोई संतुष्टि नही मिलती है ।

बुद्ध ने उसे समझाया कि “ यश , यह जीवन तो आधि व्याधियों से भरा है किन्तु इस जीवन  में  बहुत अद्‍भुतताएं  भी हैं । काम भॊग और इन्द्रियजन्य विषक वासना मे लिप्त होने से शरीर और चित्त दोनों ही अस्वस्थ हो जाते हैं । यदि कामनाओं  को त्यागकर तुम सादगी और पूर्णता के साथ जीवन व्यतीत करो तो तुम जीवन की अद्‍भुतताओं  का अनुभव कर सकते हो । यश , तुम अपने ओर दृष्टि  फ़ैलाओ । सामने प्रभाती  सुहासे से खडे वृक्ष तुम देख रहे हो ? क्या वे सुंदर नही हैं ? चंद्रमा , तारकगण , सरितायें , पर्वत , सूर्य का प्रकाश , चिडियों का गान , झरने के गिरने की मधुर ध्वनि  - यह सब सृष्टि  का ऐसा प्रसार है जो हमे अनंत आनंद  प्रदान कर सकता है ।

इन सबसे हमे जो आनंद प्राप्त होता है उससे हमारा चित्त और शरिर दोनों पुष्ट होते हैं । अपनी आँखे बन्द करॊ और गहरी साँस  लेकर  शवास को बाहर निकालो । यह शवसन क्रिया कुछ देर करॊ । अब आँखे खोलो । अब क्या दिखाई पडता है ? वृक्ष , कुहासा , आकाश और सूर्य की किरणॆं । तुम्हारे अपने ही नेत्र अद्‍भुतत हैं । तुम इन समस्त अद्‍भुतताओं  के सान्धिय मे नही रहे इसलिये अपने चित्त और शरीर  से घणा करने लगे हो । कुछ लोग तो अपने चित्त और शरीर से इतनी घृणा  करते है कि आत्महत्या तक करना चाहते है । उन्हे जीबन मे कष्ट  ही कष्ट दिखता है । किन्तु सष्टि की सम्यक प्रकृति कष्टदायी  नही है । कष्ट  तो हमारी जीबन पद्द्ति और जीबन विषयक भ्रांत धारणाओं का परिणाम होते  हैं । ”

बुद्ध के शब्दों से यश को ऐसा लगा जैसा उसके तपते ह्रदय पर शीतल ओस की  बूद आ गिरी हो । प्रसन्नता से अभिभूत  होकर वह बुद्ध के चरणो पर गिर पडा ।

Tuesday, October 16, 2012

भगवान बुद्ध – अवतारवाद का अधूरा सत्य

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( बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति – हिन्दू मन्दिरों मे भगवान बुद्ध की मूर्ति पाये जाने का एक दुर्लभ चित्र )
यह अजीब सा विरोधाभास है  कि एक तरफ़  तो हिन्दू धर्म मे भगवान बुद्ध को विष्णु  का नंवा अवतार माना जाता  हैं और दूसरी  तरफ़ हिन्दू मन्दिरों में बुद्ध की मूर्ति को ढूँढ पाना एक दुर्लभ कार्य है । पिछ्ले साल हरिद्वार और देहारदून से लौटते समय मेरे मन मे यही विचार उमडते रहे । उन दिनों हरिद्वार मे कोई बौद्ध  सम्मेलन चल रहा था । लौटते समय मेरी मुलाकात ट्रेन में जिन महिला से हुयी , वह भी उसी सम्मेलन का हिस्सा थी । बनारस की रहने वाली श्रीमती मालती तिवारी सारनाथ में  केन्द्रीय तिब्बती अध्यन्न विशवविधालय ( Central University of Tibetan Studies (CUTS) ,  Sarnath ) में  अध्यापन कार्य करती हैं  । बुद्ध धम्म मे उनकी गहन रुचि थी और बातों –२ मे ज्ञात हुआ कि उनका शोध  कार्य डां अम्बेड्कर और बौद्ध धर्म  पर केन्द्रित था । लेकिन मेरे इस प्रशन  पर वह चुप रही ।
गत वर्ष ही दीपावली के अगले दिन श्रावस्ती जाने का अचानक प्रोग्राम बन गया । श्रावस्ती से लौटते समय बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति को देखकर मै अचरज मे पड गया । ऊपर का यह चित्र उसी मन्दिर से ही है ।
अवतार वाद की यह  फ़िलोसफ़ी मेरे मन मे कभी भी मूर्त  रुप न ले पाई । अगर ईमानदारी से भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया होता तो हर मंदिर में आज उनकी मूर्ति होती ।
लेकिन ऐसा क्यूं  है कि  भगवान बुद्ध को हिन्दू धर्म में पूर्ण रुप से स्वीकार नही किया गया ।  हिन्दू पुराणॊं मे इसे इस तरीके से पेश किया गया है जिसे ज़्यादातर बौद्ध अस्वीकार्य और बेहद अप्रिय मानते हैं। कुछ पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार इसलिये लिया था जिससे कि वो "झूठे उपदेश" फैलाकर "असुरों" को सच्चे वैदिक धर्म से दूर कर सकें, जिससे देवता उनपर जीत हासिल कर सकें। इसका मतलब है कि बुद्ध तो "देवता" हैं, लेकिन उनके उपदेश झूठे और ढोंग हैं। ये बौद्धों के विश्वास से एकदम उल्टा है: बौद्ध  गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते, लेकिन उनके उपदेशों को सत्य मानते हैं। कुछ हिन्दू लेखकों (जैसे जयदेव) ने बाद में यह भी कहा है कि बुद्ध विष्णु के अवतार तो हैं, लेकिन विष्णु ने ये अवतार झूठ का प्रचार करने के लिये नहीं बल्कि अन्धाधुन्ध कर्मकाण्ड और वैदिक पशुबलि रोकने के लिये किया था।
 बुद्ध और कल्कि अवतार (अग्नि पुराण 16 वा अध्याय )
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 Vishnu as Buddha making gesture of dharmacakrapravartana flanked by two disciples ( साभार : विकीपीडिया )

अग्निदेव कहते हैं :- अब में बुद्ध अवतार का वर्णन करूंगा ,जो पड़ने और सुनाने वाले के मनोरथ को सिद्ध करने वाला है । पूर्वकाल मे देवता और असुरो मे घोर संग्राम हुआ । उसमे देत्यों ने देवताओ को परास्त कर दिया । तब देवता त्राहि-त्राहि पुकारते हुये भगवान की शरण मे गए । भगवान माया-मोह रूप मे आकार राजा शुद्धोधन के पुत्र हुये । उन्होने देत्यों को मोहित किया और उनसे वेदिक धर्म का परित्याग करा दिया । वे बुद्ध के अनुयाई देत्य " बोद्ध " कहलाए । फिर उन्होने दूसरे लोगों से वेद-धर्म का परित्याग करा दिया ।इसके बाद माया-मोह ही ' आर्हत ' रूप से प्रगत हुआ । उसने दूसरों को भी ' आर्हत ' बनाया । इस प्रकार उनके अनुयायी वेद-धर्म से वंचित  होकर पाखंडी बन गए । उन्होने नर्क मे ले जाने वाले कर्म करना आरंभ कर दिया । वे सब-के-सब कलियुग के अंत मे वर्ण संकर होंगे और नीच पुरुषों से दान लेंगे । इतना ही नही , वे लोग डाकू और दुराचारी भी होंगे । वाजसनेय ( वृहदारण्यक ) -मात्र ही वेद कहलाएगा । वेद की दस पाँच शाखे ही प्रमाणभूत मानी जाएंगी । धर्म का चोला पहने हुये सब लोग अधर्म मे ही रुची रखने वाले होंगे । राजारूपधारी मलेच्छ ( मुसालेबीमान और इसाया )  मनुष्यो का ही भक्षण करेंगे ।
तदन्तर भगवान कल्कि प्रगट होंगे । वे श्री विष्णुयशा के पुत्र रूप मे अवतीर्ण हों याज्ञवलक्य को अपना पुरोहित बनाएँगे । उन्हे अस्त्र-शस्त्र विदध्या का पूर्ण ज्ञान होगा । वे हाथ मे अस्त्र लेकर मलेच्च्योन का संहार  ( मुसालेबीमान और इसाया ) कर देंगे । तथा चरो वर्णो और समस्त आश्रमो मे शास्त्रीय मर्यादा साथपित करेंगे । समस्त प्रजा को धर्म के उत्तम मार्ग मे लगाएंगे । इसके बाद श्री हरी कल्कि तूप का परित्याग करके अपने धाम चले जाएंगे । फिर तो पूर्ववत सतयुग का साम्राज्य होगा । साधुश्रेष्ठ ! सभी वर्ण और आश्रम के लोग अपने-अपने धर्म मे दृद्तापूर्वक लग जाएंगे । इस प्रकार सम्पूर्ण कल्पो और मन्वंतरों मे श्री हरी के अवतार होते हैं । उनमे स ए कुछ हो चुके हैं और कुछ आगे होने वाले हैं । उन सबकी कोई नियत संख्या नही है ।
जो मनुष्य श्री विष्णु के अंशावतार तथा पूर्ण अवतार सहित दस अवतारों के चरित्र का पाठ अथवा श्रवण करता है , वह सम्पूर्ण कामनाओ को प्राप्त कर लेता है । तथा निर्मल हृदय होकर परिवार सहित स्वर्ग को जाता है । इस प्रकार अवतार लेकर श्री हरी धर्म की व्यवस्था का निराकरण करते हैं । वे ही जगे की श्रष्टी आदी के कारण हैं । ।। ८
इस प्रकार आदी आग्नेय महापुराण मे ' बुद्ध तथा कल्कि -इन दो अवतारो का वर्णन नामक सोलहवा अध्याय समाप्त  हुआ ।। १६ । ।

लेकिन फ़िर सच क्या है ? क्या यह ब्राहम्ण्वादी  मानसिकता का बौद्ध दर्शन को सोखने की एक चाल थी ? संभवत: यह ही सच है !! मगर कैसे ? श्री आलोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक , “ प्राचीन भारत ” जो मैने अभी हाल ही मे फ़िल्पकार्ड से मँगाई थी , इस विषय पर काफ़ी प्रकाश डालती है । आलोक जी जो सन २००२ बैच के IAS  हैं , उन्होने निष्पक्ष रुप से इसकी विवेचना की है । आप  लिखते हैं ,
prahin bharat
लगभग छ्ठी ई.पू. में गंगा घाटी में रहने वालों के धार्मिक जीवन मे अनेकों परिवर्तन देखने को मिले । तत्कालीन परम्परावादी ब्राहम्ण धार्मिक व्यवस्था के विरोध मे लोग उठ खडे हुये तथा आन्दोलन का स्वरुप इतना तीव्र हो उठा कि ईशवर की सत्ता तक को अस्वीकार करने वाले सम्प्रदाय एवं मत अस्तित्व में  आये । तत्कालीन ग्रंथों में लगभग ६२ मुख्य और अनेक छोटे –२ धार्मिक सम्प्रदायों का परिचय मिलता है जो इस बात का परिचायक  है कि धर्म की जडता के विषय मे कितना असंतोष था । ……. प्रशन उठता है कि वह कौन से कारण थे जिनके चलते इस प्रकार का धार्मिक आन्दोलन उठ खडा हुआ । इन्हें निम्म रुप से समझा जा सकता है :
१. आर्थिक २. धार्मिक ३. सामाजिक ४. राजनैतिक
सम्भवत: नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक ही थे । यह शती लोहे के उपकरणों के कृषि मे प्रयोग होने की शती थी । हाँलाकि इसके पूर्व लोहे का ज्ञान हो चुका था किन्तु ज्यादतर वे शास्त्रास्त्रॊं  में प्रयुक्त होते थे । ……लौह उपकरणो के ज्ञान से विस्तूत मैदानों  की प्राप्ति हुई । इस विस्तूत मैदान पर अब गहन कृषि प्रारम्भ  हुई जिससे एक वर्ग को खाध सामग्री की चिन्ता से मुक्ति मिली और वे व्यापार , वाणिज्य और शिल्प कलाओं मे लग गये । …खेती  के लिये पशुओं की आवशयकता पडी । विशेष रुप से उन पशुओं की जो कृषि के काम आते थे जबकि  ब्राहम्ण धर्म की कर्मकाण्डीय यज्ञ परम्परा मे बलि दी जाती थी । इससे एक धार्मिक द्धंदं खडा हुआ । कृषक वर्ग और शिल्प या वाणिज्य से जुडे हुये लोगों ने ब्राहम्णीय परम्परा का विरोध किया ।
राम शरण शर्मा के अनुसार , “ वैदिक प्रथानुसार पशु अंधाधुंध माए जा रहे थे , यह खेती की प्रगति मे बाधक हुआ । यदि नई कृषि मूलक अर्थव्यवस्था को बचाना था तो पशुधन को संचित करना आवाशयक था । ” इस समय जितने भी नास्तिक संप्रदाओं ने पनपना प्रारम्भ किया सबने ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । इन सबमें बौद्ध और जैन धर्मों का स्वर सर्वाधिक तीव्र था । इन संप्रदाओं ने पशुओं को सुखदा और अन्नदा कहा और उनके वध का विरोध किया ।
यह समय व्यापार , वाणिज्य एवं नगरीय क्रांति का समय था । ६००-३२३ ई.पू. में लगभग ६२ नगरों का अस्तित्व था । व्यापार वाणीज्य से प्राप्त धन को एकत्र कर के वैशय वर्ग ने अपने निवास नगरों मे बनाये ।….. व्यापारियों ने निरंतर ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । एक अन्य कारण वैशव वर्ग का इन सम्प्रदाओं की ओर आकर्षित होना था क्योंकि व्यापार से इस वर्ग ने अकूत धन प्राप्त कर लिया था जब्कि हर तरफ़ महत्ता ब्राहम्णॊ की थी वह इस समृद्ध वर्ग को स्वीकार नही हुआ । अनाथपिण्डक , घोषित जैसे विभिन्न श्रेषठियों ने इसी कारण बौद्ध/जैन सम्प्रदाओं को मुक्त हस्त दान दिया । ऋण का कार्य ब्राहम्णीय परम्पराओं मे दूषित कार्य कहा गया था जबकि यह वैशवों तथा व्यपारियों का मुख्य कार्य था ।…. इन सबके अतिरिक्त नास्तिक सम्प्रदाओं का उदय चूँकि ब्राहम्णीय परम्परा के विरुद्ध हुआ था इसी कारण उनकी सहानुभूति हर उस वर्ग के प्रति थी जो आर्थिक रुप से कमजोर था और इसी  कारण इन समस्त वर्गॊ ने तन , मन और धन से इन सम्प्रदाओं के वर्धन हेतु कार्य किया । इन सम्प्रदाओं का ऐसा दृष्टिकोण बुद्ध के उस कथन से मिलता है जिसमे उहोने कहा कि , “ कृषकों को बीज , श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक और व्यवसासियों को धन देना चाहिये । “
धार्मिक कारणॊं के चलते हुये भी जैन/ बौद्ध सम्प्रदाऒ के उदय को बल मिला । ब्राहम्णीय व्यवस्था , देवों की कृपा को मानवों के शुभ के लिये आवशयक मानती थी । देवों को प्रसन्न करने के लिये विभिन्न उपाय किये जा रहे थे जो अब कर्मकाण्डॊं में बदल गये थे और जटिल से जटिलतर होते जा रहे थे । वैदिक ऋचाओं का स्थान मंत्रों ने ले लिया था तथा मंत्रों के माध्यम से देवों को वश मे करने की बात कही जा रही थी जो मंत्रों का ज्ञान नही रखते थे , वे अब जादू टोने तथा तंत्र  मंत्रों का सहारा लेने लगे थे । समाज का निम्म वर्ग इनके चक्कर मे फ़ँस कर भट्काव की स्थिति मे था । यह एक असंतोष का कारण बना ।पशु बलि और यज्ञीय कर्म कांडं  वे दूसरे तत्व थे जो सामान्य जनता को कष्ट ही देते थे । अनेक श्रोत यज्ञ कई –२ वर्षॊं तक चलते थे जिसमें यज्ञ कराने वाले को अनेकों दास – सासियाँ उपहार स्वरुप प्रदान की जाती थी । जहाँ  पहले ६ ऋषियों द्वारा यज्ञ कराया जाता था , उत्तर वैदिक काल मे आगे चलकर इनकी सँख्या १६ हो गयी थी | दूसरी ओर नास्तिक सम्प्रदाऒ   ने सदैव इसका विरोध किया । बुद्ध ने कहा , “ ब्राहम्ण , लकडी नही अपितु आन्तरिक ज्योति जला ।
सामाजिक कारणॊं का भी नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे महती योगदान था । तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णॊं की स्थापना पूर्णरुपेण  हो चुकी थी तथा ब्राहम्ण एंव छत्रिय , दो सामाजिक उच्च वर्णॊ में सम्मलित थे जबकि वैशय एवं शूद्र को महत्व प्राप्त नही था । इस प्रकार समाज दो वर्गों मे विभाजित हो चुका था :
१. गैर उत्पादक वर्ग : ब्राहम्ण , छत्रिय
२. उत्पादक वर्ग : वैशय , शूद्र
समाज के उत्पादक वर्ग होते हुये भी उचित सम्मान न हो पाने के कारण वैशय एंव शूद्र वर्गों मे असंतोष व्याप्त था । इतना ही नही समाज का वर वर्ग जो उत्पादन मे कही शामित ही नही था सर्वाधित उपभोग करता था तथा इसे इसके पशचात अनेकों विशेषधिकार मिले हुये थे । तत्कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि गौतम , आपस्तंब आदि ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था  बनाई थी कि ब्राहम्ण वर्ग को सर्वाधिक घोर अपराध करने पर भी सबसे कम द्ण्ड मिलता था । वैशव वर्ग व्यपार – वाणिजय के फ़लस्वरुप  अत्याधिक संपदा एकत्रित कर चुका था किन्तु उसे भी उचित आदर प्राप्त नही होता था । “  महाजनी , ऋण आदि जैसे कार्यों को ब्राहम्णीय व्यवस्था मे अपमान की दृष्टि से देखा जाता था राम शरण शर्मा
शूद्रों की दशा तो अत्यन्त खराब थी । शूद्र वध जैसे अपराध के लिये भी अपराधी को वही दण्ड दिया जाता था जो कौवे , उलूक आदि की हत्या के लिये दिया जाता था । मातंग जातक एवं चित्तसंभूत जातकों मे दी हुई कथायें शूद्रॊं पर होने वाले अत्याचारों का वर्ण करती है । नास्तिक सम्प्रदाय ने इन सबका प्रबल विरोध किया । जहाँ एक ओर वैशवों के ऋण , महाजनी एवं दास सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता दी , वही बौद्ध धर्म ने सभी वर्णॊ के लिये अपने दरवाजे  खोल दिये । सामाजिक संदर्भ में भी बुद्ध ने जातिवाद का घोर विरोध किया , वस्तुत:  तपस्सु एवं भाल्लुक जैसे शूद्रॊ को बुद्ध ने संघ मे प्रथम प्रवेश दिया । विभिन्न धार्मिक पाखंडो एवं यज्ञीय कर्मकांडो का उन्होने विरोध किया तथा सरल और आडम्बररहित  मार्ग का प्रतिपादन किया । बुद्ध ने अपने सिद्धांत पालि भाषा मे दिये जो जनसामान्य एवं लोकोन्मुखी स्वरुप को दर्शाता है ।  बुद्ध ने कर्मकांडो का विरोध करने के पीछे मुख्य तर्क यह दिया कि समाज मे जन्म के अनुसार कोई उच्च या निम्म नही होता है । उच्चता का निर्धारण कर्म से होता है ।  इसी प्रकार ब्राहम्ण एवं छत्रियों ने भी नास्तिक सम्प्रदाओं जैसे बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाओं का सहयोग किया ।
आशर्चजनक तथ्य यह कि बुद्ध जिन उच्च जातियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे संघ मे सम्मिलित होने का उनका प्रतिशत सर्वाधिक था यथा -
जाति आवृति प्रतिशत
छत्रिय 706 51.5%
ब्राहम्ण 400 29.1%
वैशव 155 11.02%
शूद्र 110 8.3%
भिक्षुओं का जातीय आधार ( विनय एवं सुत्त पिटक के आधार पर ) साभार : श्री आलोक पान्डॆ
राजनैतिक कारणो का नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे दो प्रकार से सकरात्मक उपयोग रहा ।
१. ब्राहम्ण –राजन्य द्धंद
२. गणराज्यों का स्वतंत्र वातावरण
ब्राहम्ण एवं क्षत्रिय राजन्य वर्ग के मध्य उत्तरवैदिक काल से द्धंद आरम्भ हो चुका था । प्रवाहण्जाबालि , अशवपति तथा मिथिला के विदेह जैसे विद्धान ने कई ब्राहम्णॊ को ज्ञान के स्तर पर पिछाडा था । परिस्थितियाँ ऐसी थी कि ब्राहम्ण हर ओर से लेने वाले थे जबकि क्षत्रियों को देना भी पडता था ऐसी स्थिति में द्धंद सामने जब आया तो वास्तविक शक्ति क्षत्रियों को देकर ब्राहम्ण ने आदरसूचक प्रथम स्थान ले लिया । ऐसी स्थिति में नास्तिक संप्रदाओं ने राजन्य वर्ग का पक्ष लिया और इसी कारण इस वर्ग का समर्थन हासिल किया । अजातशत्रु , बिम्बसार , प्रसेनजित और आगे चलकर अशोक आदि का समर्थन बौद्ध एंव जैन धर्मॊ को न मिला होता तो इन धर्मॊ का वास्तविक रुप कुछ और ही होता ।
हाल ही में रिलीज हुई “ OH MY GOD “ जिन्होने देखी हो वह आसानी से समझ सकते हैं कि अवतार कैसे और क्यूं बनाये जाते हैं । फ़िल्म में परेश रावल ( कांजीलाल  की भूमिका में ) जब ईशवर के होने या न होने पर प्रशन खडा करता है , धर्म के नाम पर धन्धा कर रहे धंधेवाजों की जब पोल खोलने लगता है तो अंत मे वही दुकान चलाने वाले उसको ही अवतार घोषित कर देते हैं ।  

बुद्ध को अवतार साबित करना महज एक दिखावा और ढोंग है , सच तो यह है कि बुद्ध धम्म और  हिंदू धर्म में कही दूर दूर तक कोई समानता नही है ,  हाँ समानता है कि हिन्दू  , जैन , सिक्ख और चार्वाक दर्शन की तरह बुद्ध धम्म का दर्शन भी भारत की गौरवशाली पंरपरा से ही उत्पन्न हुआ है . यह विदेशी संस्कृतियों की तरह किसी को जबरन या लालचवश  धर्मातरण पर मजबूर नही करता , किसी के ऊपर बिलावजह अत्याचार करने की अनुमति नही देता , हाँ कुछ सोचने को मजबूर अवशय करता है  । यह आप पर निर्भर करता है कि अपने द्धीप आप स्वंय बनना चाहते हैं या दूसरे के सहारे अपनी नैया पार करना चाहते हैं ।



Thursday, September 20, 2012

संतुलन ध्यान

ध्यान

लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक सूत्र है लाओत्से की ध्यान की पद्धति का। वह सूत्र यह है।
लाओत्से कहता है कि पालथी मार कर बैठ जाएं और भीतर ऐसा अनुभव करें कि एक तराजू है, बैलेंस, एक तराजू। उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच, तीसरी आंख जहां समझी जाती है, वहां उसका कांटा है। तराजू की डंडी आपके मस्तिष्क में है। दोनों उसके पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं। और लाओत्से कहता है, चौबीस घंटे ध्यान रखें कि वे दोनों पलड़े बराबर रहें और कांटा सीधा रहे।

लाओत्से कहता है कि अगर भीतर उस तराजू को साध लिया, तो सब सध जाएगा। लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे! जरा इसका प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा। जरा सी श्वास भी ली नहीं कि एक पलड़ा नीचा हो जाएगा, एक पलड़ा ऊपर हो जाएगा। अकेले बैठे हैं, और एक आदमी बाहर से निकल गया दरवाजे से। उसको देख कर ही, अभी उसने कुछ किया भी नहीं, एक पलड़ा नीचा, एक ऊपर हो जाएगा।
लाओत्से ने कहा है कि भीतर चेतना को एक संतुलन! दोनों विपरीत द्वंद्व एक से हो जाएं और कांटा बीच में बना रहे।
जीवन में सुख हो या दुख, सम्मान या अपमान, अंधेरा या उजाला, भीतर के तराजू को साधते चला जाए कोई, तो एक दिन उस परम संतुलन पर आ जाता है, जहां जीवन तो नहीं होता, अस्तित्व होता है; जहां लहर नहीं होती, सागर होता है; जहां मैं नहीं होता, सब होता है।

साभार : ओशो हिंदी

Saturday, September 8, 2012

जीवन जीने की कला – विपश्यना साधना

ध्यान प्रक्रियायों मे विपशयना ध्यान पद्द्ति भगवान बुद्ध द्वारा अन्वेषित प्रक्रिया सबसे अलग और तर्क और वैज्ञानिक सम्पत है । 

बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’ - आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । विपशयना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बदले बिना ..शवास के प्रति साक्षीभाव । जहाँ प्राणायाम मे शवास को बदलने की चेष्टा की जाती है वही विपशयना मे शवास जैसी है वैसे ही देखने की आंकाक्षा है ।

बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो  भी  देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।

हिन्दी मे ध्यान पर बहुत ही कम वीडियो उपलब्ध हैं । Meditation Techniques in Hindi  यू ट्यूब पर उपलब्ध है , मूलत:Spiritual Reality –journey withinका हिन्दी अनुवाद है । न सिर्फ़ यह विपशयना के बारे मे आपको बतायेगा बल्कि और भी ध्यान पद्द्तियों से भी रुबरु करायेगा । य टूयूब पर सीधे देखने के लिये http://youtu.be/L4thsq2m0ic पर क्लिक करें ।

Thursday, August 23, 2012

धर्म तभी सद्धर्म हो सकता है , जब यह शिक्षा दे कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवशयकता है ….

बुद्ध ने ‘ करुणा ’  को ही धर्म की ‘इति’ नही कहा । ‘करुणा’ का अर्थ दुखी मनुष्यों के प्रति दया किया  जाना है । बुद्ध ने और आगे बढ  कर ‘ मैत्री’  की शिक्षा दी । ‘मैत्री’ का अर्थ है प्राणि मात्र के प्रति दया । जिस समय  भगवान बुद्ध श्रावस्ती मे विराजमान थे , उस समय अपने एक प्रवचन मे यह बात उन्होने अच्छी  तरह से स्पष्ट कर दी ।

मैत्री के बाए  मे बोलते हुये बुद्ध ने भिक्षुऒं से कहा -

“मान लो एक आदमी  पृथ्वी खोदने के लिये आता है , तो क्या पृथ्वी उसका विरोध करती है ?”

भिक्षुओं ने उत्तर दिया –  “ भगवान ! नही !”

“मान लो एक आदमी लाख और दूसरे रंग लेकर आकाश मे चित्र बनाना  चाहता है तो क्या वह बना सकेगा ?”

“नही”

“क्यों ? “  भिक्षु बोले – “क्योंकि आकाश का  रंग काला नही है ।”

“इसी प्रकार तुम्हारे मन मे कुछ कालिख नहीं  होनी चाहिये , जो कि तुम्हारे  राग द्धेष का परिणाम है ।”

“मान लो एक आदमी जलती हुई मशाल लेकर गंगा नदी मे आग लगाने आता है तो क्या वह  आग लगा सकेगा ?”

“ भगवान ! नही | ”

“क्यों ? “   भिक्षु बोले – “क्योंकि गंगा जल मे जलने का गुण नही है ।”

अपना प्रवचन सामाप्त करते हुये तथागत ने कहा – “भिक्षुओं ! जैसे पृथ्वी  आघात अनुभव नही करती और विरोध नही करती , जिस प्रकार हवा मे किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नही होती , जिस प्रकार गंगा नदी का जल अग्नि से अप्रभवित रहकर बहता रहता है ; उसी प्रकार भिक्षुओं ! यदि तुम्हारा कोई अपमान भी कर दे , यदि तुम्हारे साथ कोई अन्याय भी करे तो भी तुम अपने विरोधियों के प्रति मैत्री भाव को अपनाये रखो ।”

“  भिक्षुओं ! मैत्री की धारा को हमेशा प्रवाहित रहना चाहिये । तुम्हारा मन पृथवी की तरह  दृढ  , वायु की तरह स्वच्छ हो और गंगा नदी की तरह गम्भीर हो । यदि तुम मैत्री का अभ्यास रखोगे तो कोई भी तुम्हारे साथ कैसा भी अप्रतिकर व्यवहार करे , तुमाहारा चित्त विचिलित नही  होगा और तुमहारे विरोधी  लोग थक जायेगें ।”

“तुम्हारी मैत्री विशव की तरह  व्यापक होनी चाहिये और तुम्हारी भावनायें असीम होनी चाहिये जिनमें द्धेष का लेश भर भी जगह न हो ।”

“ मेरे धर्म के अनुसार करुणा ही पर्याप्त नही है , आदमी मे मैत्री होनी चाहिये ।”

“भिक्षुओं ! कोई भी पुण्य कर्म मैत्री भावना के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नही है । मैत्री जो कि चित्त की विमुक्ति है , उन सबकॊ अपने अन्तर्गत ले लेती है – वह प्रकाशमान होती है , वह प्रदीप्त होती है वह प्रज्जवलित होती है ।”

“इसी प्रकार हे भिक्षुओं ! जैसे सभी तारों का प्रकाश मिलकर भी अकेले चद्रमा को सोलवहें हिस्से के बराबर नही , चन्द्रमा  का प्रकाश प्रकाशमान होता है , प्रदीप्त होता है , प्रज्जव्लित होता है । इसी प्रकार भिक्षुओं ! कोई भी पुण्य कर्म मैत्री भावना के सोलवहें हिसे के भी बराबर नही है ।  मैत्री जो कि चित्त की विमुक्ति है , उन सबकॊ अपने अन्तर्गत ले लेती है – वह प्रकाशमान होती है , वह प्रदीप्त होती है वह प्रज्जवलित होती है ।”

“और भिक्षुओं ! जैसे वर्षा ऋतु की समाप्ति पर स्वच्छ , अन्ध्र आकाश मे उगने वाला सूर्य , तमाम अन्धकार को विकीर्ण कर देता है ,  वह प्रकाशमान होता है , प्रदीप्त होता है , प्रज्जव्लित होता है ; और जैसे रात्रि की समाप्ति पर भोर का तारा  प्रज्जवलित होता है ; ठीक उसी प्रकार कॊई भी पुण्य कर्म मैत्री भावना के सोलवहें हिस्से के बराबर नही हो सकता । मैत्री जो कि चित्त की विमुक्ति है , उन सबकॊ अपने अन्तर्गत ले लेती है – वह प्रकाशमान होती है , वह प्रदीप्त होती है वह प्रज्जवलित होती है ।”

साभार स्त्रोत : भगवान बुद्ध और उनका धर्म – लेखक : बोधिसत्व डां भीमराव रामजी अम्बेडकर

Thursday, August 2, 2012

वर्तमान मे जीना–Dwelling in the present moment

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"अतीत का पीछा न करो ।
भविष्य के भ्रम जाल मे न फ़ंसो।
अतीत व्यतीत हो गया ।
भविष्य अभी अनागत है ।
यहाँ अभी इस क्षण जीवन जैसा है , उसी को धारण करो
साधनाभ्यासी ,स्थिरता और मुक्त भाव मे जीता है ।
कल की प्रतीक्षा की ,  तो विलम्ब होगा।
मृत्यु अचानक  धर दबोचती है
उससे हम क्या समझोता कर सकते हैं ?
भिक्खुजन उसी का आह्वान करते हैं
जो दिन और रात
सचेतानावस्था मे जागृत रहता है
जो जानता है कि
एकान्तवास का उत्तमतर मार्ग क्या है । ”

स्त्रोत : मॆट्टा सुत्त(M. 131);  भदिद्कारता सुत्त, आंनद भद्दकारता  सुत्त

“Do not pursue the past.
Do not lose yourself in the future.
The past no longer is.
The future has not yet come.
Looking deeply at life as it is
in the very here and now,
the practitioner dwells
in stability and freedom.
We must be diligent today.
To wait until tomorrow is too late.
Death comes unexpectedly.
How can we bargain with it?
The sage calls a person who knows
how to dwell in mindfulness
night and day
‘one who knows
the better way to live alone.’”

Source : Bhaddekaratta Sutta (M. 131); Ananda Bhaddekaratta Sutta (M. 132); Mahakaccana Bhaddekaratta Sutta (M. 133);

Friday, July 13, 2012

ध्यानपूर्ण मन….

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ध्यानपूर्ण मन शांत होता है। यह मौन विचार की कल्पना और समझ से परे है। यह मौन किसी निस्तब्ध संध्या की नीरवता भी नहीं है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिमाओं सहित पूर्णत: विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है। यह ध्यानपूर्ण मन ही धार्मिक मन है-धर्म, जिसे कोई मंदिर, गिरजाघर या भजन-कीर्तन छू भी नहीं पाता।
धार्मिक मन प्रेम का विस्फोटक है। यह प्रेम किसी भी अलगाव को नहीं जानता। इसके लिए दूर निकट है। यह न एक है न अनेक, अपितु यह प्रेम की अवस्था है जिसमें सारा विभाजन समाप्त हो चुका होता है। सौंदर्य की तरह उसे भी शब्दों के द्वारा नहीं मापा जा सकता। इस मौन से ही एक ध्यानपूर्ण मन का सारा क्रियाकलाप जन्म लेता है।
ध्यान जीवन की महानतम कलाओं में से एक है- बल्कि शायद यही महानतम् कला है। यह कला संभवत: दूसरे से नहीं सीखी जा सकती-और यही इसका सौन्दर्य है। ध्यान की कोई तकनीक और तरकीब नहीं होती, इसलिए इसका कोई अधिकारी और दावेदार भी नहीं होता। जब आप स्वयं का निरीक्षण करते हुए अपने बारे में सीखते हैं, अर्थात् किस तरह आप खाते-पीते हैं, किस ढंग से आप चलते-फिरते हैं, क्या बातचीत और गपशप करते हैं, आपका ईर्ष्या करना, नफरत करना-जब आप अपने भीतर और बाहर इन सारी चीज़ों के प्रति सचेत होते हैं, बिना किसी कांट-छांट के, तो यह ध्यान का ही अंग है।
और यह ध्यान हर जगह हर समय हो सकता है: जब आप किसी बस में बैठे हों या जब आप धूप और छाया से परिपूर्ण किसी वनस्थली में टहल रहे हों या जब आप पक्षियों के कलरव-गान को सुन रहे हों या जब आप अपनी पत्नी या अपने बच्चे के चेहरे को देख रहे हों।
ध्यान का सहसा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हो जाना कितना अद्भुत और विचित्र है ! ध्यान-जिसका न आदि है न अन्त। यह वर्षा की एक बूँद के समान है। इसी बूंद में छिपी हैं सारी की सारी नदियां और जलधाराएं, इसी में समाये हैं बड़े से बड़े समुद्र और जल-प्रपात। जल की यह बूँद पृथ्वी को भी पोषण देती है और मानव को भी। इसके बिना तो यह धरती रेगिस्तान बन जाती ! ध्यान के बिना हमारा हृदय भी ऊसर-बंजर मरुस्थल हो जाता है।
ध्यान का अर्थ यह पता लगाना है कि अपनी सारी गतिविधियों और अपने सारे अनुभवों समेत मस्तिष्क क्या पूर्णत: शान्त हो सकता है। बाध्य होकर नहीं, क्योंकि जिस क्षण आप इसे बाध्य करते हैं, फिर से द्वैत आ खड़ा होता है, और वह सत्ता भी, जो कहती है, ‘‘अद्भुत अनुभूतियों के जगत में प्रवेश के लिए मुझे अपने मस्तिष्क को नियंत्रित कर शान्त कर लेना चाहिए’’-ऐसा कभी संभव नहीं होगा।
लेकिन अगर आप विचार की सारी खोजों और गतिविधियों को, इसके भय, सुखों और संस्कारों को देखने, सुनने और समझने लग जायें, अगर आप अपने मस्तिष्क का निरीक्षण करने लग जायें कि यह किस तरह कार्य करता है, तो आप देखेंगे कि मस्तिष्क असाधारण रूप से शान्त, मौन हो जाता है। यह शांति निद्रा नहीं है बल्कि यह प्रचंड रूप से सक्रिय है और इसलिए शांत है। विद्युत उत्पन्न करने वाला एक बड़ा यंत्र जब अच्छी तरह कार्य करता है तो इससे शायद ही कोई ध्वनि निकलती हो। ध्वनि और शोर-गुल तभी पैदा होता है जब कहीं घर्षण होता है।
मौन और विस्तार का आपसी मेल है। मौन की अनंतता वह अनंतता है जिसके भीतर का केन्द्र मिट चुका है।
जे. कृष्णमूर्ति

ध्यान

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ध्यान, निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर इस तरह उतरता है जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा। यह इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है जैसे रात। वहां किसी तरह का प्रयास या केन्द्रीकरण या विक्षेप विकर्षण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता। वहां पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती। ना किसी तरह का नकार होता है ना स्वीकार। ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है। मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है पर बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत रहता है, बिना किसी दखलंदाजी के, वह जागता तो है पर प्रतिक्रियाहीन होता है।
वहां नितांत शांति स्तब्धता होती है पर शब्द विचारों के साथ धंुधले पड़ जाते हैं। वहां अनूठी और निराली ऊर्जा होती है, उसे कोई भी नाम दें, वह जो भी हो उसका महत्व नहीं है, वह गहनतापूर्वक सक्रिय होती है बिना किसी लक्ष्य और उद्देश्य के। वह सृजित होता है बिना कैनवास और संगमरमर के... बिना कुछ तराशे या तोड़े। वह मानव मस्तिष्क की चीज नहीं होती, ना अभिव्यक्ति की.. कि अभिव्यक्त हो और उसका क्षरण हो जाये। उस तक नहीं पहुंचा जा सकता, उसका वर्गीकरण या विश्लेषण नहीं किया जा सकता। विचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नहीं हो सकते। वह किसी भी चीज से पूर्णतया असम्बद्ध है और अपने ही असीम विस्तार और अनन्तता में अकेली ही रहती है। उस अंधेरे मार्ग पर चलना, वहां पर असंभवता का आनंद होता है ना कि उपलब्धि का। वहां पहुंच, सफलता और ऐसी ही अन्यान्य बचकानी मांगों और प्रतिक्रियाओं का अभाव होता है। होता है तो बस असंभव असंभवता असंभाव्य का अकेलापन। जो भी संभव है वह यांत्रिक है और असंभव की परिकल्पना की जा सके तो कोशिश करने पर उसे उपलब्ध किये जा सकने के कारण वह भी यांत्रिक हो जायेगा। उस आनन्द का कोई कारण या कारक नहीं होता। वह बस सहजतः होती है, किसी अनुभव की तरह नहीं बस अपितु किसी तथ्य की तरह। किसी के स्वीकारने या नकारने के लिए नहीं, उस पर वार्तालाप या वादविवाद या चीरफाड़-विश्लेषण किये जायें इसके लिए भी नहीं। वह कोई चीज नहीं कि उसे खोजा जाये, उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं। सब कुछ उस एक के लिए मरता है; वहां मृत्यु और संहार प्रेम है। क्या आपने भी कभी देखा है - कहीं बाहर, गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदूर किसान को जो सांझ ढले... अपनी मरियल हड्डियों का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है।
जे कृष्णमूर्ति