Monday, June 4, 2012

काष्ठ खंड- सागर तक सीधी यात्रा

काष्ठ खंड

अलवी गांव से आगे बढते हुये बुद्ध गंगा के किनारे उत्तर पशिचम में कौशम्बी की ओर चल पडे । वह रास्ते मे थोडी देर तक रुककर धारा मे बहते हुये काष्ठ खंडॊ को देखने लगे । उन्होनें अन्य भिक्खुओं को बुला कर काष्ठ खंडॊं को दिखाते हुये कहा , “ भिक्खुओं यदि यह काष्ठ खंड कहीं किनारे पर रुक न जायें , कही रेत में धंस न जायें , या वे भीतर से  सड न जायें , यदि इन्हें बीच में से उठा न लिया जाये या वे किसी भंवर में न फ़ंसे तो ये बहते हुये सीधे समुद्र तक चले जायेगें । यही बात आपके लिये धर्म पथ पर भी लागू होती है । यदि तुम कही रेत में फ़ंसों , यदि उम उठा न लिये जाओ, यदि तुम डूबो नही , यदि तुम रेत मे न फ़ंसों , यदि तुम उठा न लिये जाओ , यदि तुम भंवर में न फ़ंसो , या तुम ही भीतर से सडने न लग जाओ तो तुम भी आत्म जागृति और मुक्ति के सागर तक पहुंच सकते हो ।

भिक्खुओ ने कहा , “ गुरुदेव , कृपया अपने कथन को पूर्णतया स्पष्ट करने का अनुग्रह करे । किनारे रुक जाने , डूब जाने , या रेत में धंस जाने से आपका तात्पर्य क्या है  ? ”

बुद्ध ने उत्त्तर देते हुये कहा , “ नदी के किनारे रुक जाने का अर्थ है – छ: इंद्रियों और उनके विषयों में फ़ंस जाना ।

डूब जाने का अर्थ इच्छा – आकांक्षाओं का दास हो जाना है जिससे आपकी साधना की क्षमता का क्षरण हो जाता है ।

रेत मे फ़ंस  जाने का अर्थ है स्वार्थी हो जाना , सदैव अपनी ही इच्छाओं , अपने ही लाभ  की और अपनी प्रतिष्ठा की बात सोचना और आत्म जागृति  के लक्ष्य को भूल जाना ।

जल से निकल लिये जाने का अर्थ  है – साधना अभ्यास के स्थान पर स्वंय को निरुदेशय बना लेना और घटिया लोगों की संगति में घूमते फ़िरते रहना ।

भंवर मे फ़ंसे रहने का अर्थ है – पांच प्रकार की इच्छाओं –सुस्वादु भोजन , विषय वासना , वित्तेषणा , यशेषणा , और निद्रा में फ़ंसे रहना ।

भीतर से सडने का अर्थ है – दिखावे के सदगुणॊं वाला जीवन जीना , संघ को धोखा देना और धर्म को अपनी इछ्छाओं और आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिये प्रयोग करना ।”

“ भिक्खुओं यदि आप लोग परिश्रमपूर्वक साधना करो तो इन छ: भ्रमजालों मे न फ़ंसो तो निशिचित ही संबोधि( निर्वाण शांतम ) का फ़ल प्राप्त कर सकते हो ; ठीक उसी प्रकार जिस तरह बहता काष्ठ खंड सभी बाधाओं से बचता हुआ समुद्र तक पंहुच जाता है । ”

स्त्रोत : संयुक्त निकाय –ति न्यात हन्ह द्वारा लिखित “जंह जंह चरन परे गौतम के ”

बुद्ध वाणी– 4-6-2012

बुद्ध वाणी

Sunday, June 3, 2012

बौद्ध परिपथ की राह दिखाएगा ‘द पाथ’

the path -buddhist circuit

बोधिवृक्ष

उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विभाग बौद्ध परिपथ के जरिए उड़ान भरने की तैयारी में है। थाइलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, जापान, चीन, बर्मा जैसे देशों में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों को प्रदेश में फैली बौद्ध विरासत की तरफ आकृष्ट करने के लिए विभाग ने इन देशों के दूतावासों से सीधे तार जोड़े हैं। इन देशों में मिली जबर्दस्त प्रतिक्रिया से पर्यटन विभाग के हौसले बुलंद हैं। माना जा रहा है कि पर्यटन विभाग की यह कोशिश प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। इस कोशिश में विभाग ने कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, संकीसा, कौशांबी व कुशीनगर में फैले बौद्ध स्थलों को द पाथ नामक खूबसूरत ब्रोशर में समेटा है। कहते हैं कि कपिलवस्तु, जहां गौतम बुद्ध का बचपन गुजरा। 40 वर्ष से अधिक समय बुद्ध ने गंगा के मैदानी इलाकों की यात्रा की। पर्यटन विभाग में ओएसडी भारती सिंह बताती हैं कि बुद्ध से जुड़े सभी स्थलों की जानकारी एक ही ब्रोशर में पर्यटकों को मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि थाइलैंड, कंबोडिया, जापान, चीन, बर्मा सभी देशों के दूतावासों ने इस प्रयास की सराहना की है। यही नहीं थाईलैंड दूतावास ने अपनी वेबसाइट में उत्तर प्रदेश पर्यटन का लिंक देने का वादा किया है, जिससे थाईलैंड की वेबसाइट एक्सेस करने वालों को बौद्ध परिपथ की जानकारी मिल सकेगी। पर्यटन विभाग वेबसाइट पर ई-ब्रोशर देगा।

साभार : ई जागरण

Thursday, May 24, 2012

बुद्ध वाणी – “दूसरों के दोषॊं को मत देखो”

दूसरों के दोषॊं को मत देखो -भगवान बुद्ध

सुदस्सं वज्जमञ्जेसं उत्तनो पन दुइसं।
परेसं हि सो वज्जानि ओपुनाति यथा भुसं।
अत्तनो पन छादेति कलि व कितवा सठी॥
भगवान बुद्ध कहते हैं कि दूसरे का दोष देखना आसान है, अपना दोष देखना कठिन। मनुष्य दूसरों के दोषों को भूस की तरह फैलाता है। और अपने दोषों को ऐसे छिपाता है जैसे जुआरी पासों को।
परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो।
आसवा तस्य वड्ढन्ति आरा सो असावक्खया॥
जो आदमी दूसरों के दोष देखता रहता है और नित्य दूसरों से खीजता रहता है, उसके चित्त के मल बढ़ जाते हैं। उसके मन का मैल मिटाना कठिन है।

Wednesday, May 23, 2012

वर्तामान और सचेतावस्था मे जीना

बच्चे सचेतावस्था मे भगवान बुद्ध के साथ

संबोधि प्राप्ति के पशचात गौतम बुद्ध ने उरुबेला गांव  के बच्चों से वन से जाने की आज्ञा माँगी । सुजाता, नंद बाला , सुभाष , स्वास्ति और रुपक उनके इस कथन से विस्मित से रह गये । सिदार्थ ने सुजाता और अन्य बच्चों से कहा कि आज वह तीसरे पहर बच्चों से वन मे मिलना चाहते हैं ताकि जो संबोधि का मार्ग उन्होने चुना है उसको वह उन्हें बाँट सकें ।

उनके बताये समय के अनुसार बहुत से बच्चे आये और सब पीपल के वृक्ष के पास घेरा बना के बैठ गये । सुजाता अपने साथ नारियल और ताडगुड की बट्टियाँ  उपहार स्वरुप लायी थी और वहीं नंद बाला और सुभाष अपने साथ टॊकरी में मिठ्ठे ( संतरे जैसा फ़ल ) लाया था । सब बच्चॊ ने आदर भाव से सिद्धार्थ को नमन किया और फ़लस्वरुप सिद्धार्थ ने उनको बैठ जाने को कहा । सिद्धार्थ ने बच्चों से कहा , “ तुम सब बच्चे समझदार हो और मुझे विशवास है कि जो मै तुम्हें बताउगाँ उन पर तुम अमल करोगे । जो मार्ग मैने सदधर्म का चुना है वह बहुत गूढ और सूक्ष्म है लेकिन जो भी उस पर अपना ह्रदय और चित्त लगायेगा वह उसे समझ सकता है और उस पर चल सकता है । ”

बच्चों जब तुम संतरे को छीलकर खाते हो तो उसे सचेतावस्था के साथ भी खा सकते हो और बगौर जागरुक रह कर भी । जब तुम मिट्ठा खाओ तो तुम को भली भाँति ज्ञान हो कि तुम मिट्ठा खा रहे हो । तुम उसकी गंध और स्वाद को आत्मसात करो । जब तुम उसका छिल्का उतारो तब भी सजग रहो और जब उसकी फ़ाँक मुँह में रखो तब भी । जब तुम इस फ़ल की गंध और मिठास को अनुभव करो तो उस अनुभूति के प्रति भी सजग रहो ।  इस मिठ्ठे को देखकर चेतनावस्था का अभ्यास करने वाला सृष्टि की अदभुतताओं को समझ सकता है कि किस प्रकार समस्त वस्तुयें  एक दूसरे  के प्रति क्या क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं । सचेतावस्था का अभ्यास करने वाला व्यक्ति इस मिठ्ठे में वे चीजें देख सकता है जिसे अन्य लोग देखने मे असमर्थ रहते हैं । सचेत व्यक्ति  मिठ्ठे का पेड देख सकता है , वसन्त ऋतु  मे मिठ्ठे को फ़लता देख सकता है , उस धूप और वर्षा को देख सकता है जिससे मिठ्ठे के पॆड का पोषण होता है और गहराई से देखने पर वह उन बातों को जान लेता है जिनके स्व्बरुप मिठ्ठा पककर तौयार होता है ।

नंद ने जो मुझे मिठ्ठा दिया है उसमें नौ फ़ाँके हैं । जिस प्रकार मिठ्ठे की नौ फ़ांके हैं उसी प्रतिदिन के चौबीस घंटॆ होते हैं । एक घंटा  मिठ्ठे की एक फ़ांक के समान  है । दिन के चौबीस घंटॊं को जीना इस मिठ्ठे की सभी फ़ांको को खा लेने के समान है । मेरा मार्ग दिन के प्रत्येक घंटे को  सचेतावस्था के साथ जीना है जिसमे चित्त और शरीर हमेशा वर्तमान पर केन्द्रित हो । यदि हम अचेतावस्था में जी रह होते हैं तो हम जानते नही कि हम जी रह रहे हैं । हम जीवन का पूर्ण अनुभव इसी कारण नही कर पाते क्योंकि हमारा चित्त और शरीर वर्तमान को पूर्णता के साथ जीता ही नही है । “ बच्चों , सचेत होकर मिट्ठा खाने का अर्थ है कि तुम वास्तव में उसके संपर्क में हो । उस समय बीते हुये कल या आगामी कल के विचारों मे खोये हुये नही बल्कि पूरी तरह से इस क्षण को जी रहे हो । चेतन  जागरुकता का अर्थ है वर्तमान के इस क्षण को पूर्णता के साथ जीना जिसमें तुम्हारा चित्त्त और शरीर इस समय यहाँ हों ।”

इसी तरह  बच्चों सचेतावस्था में जीने वाला व्यक्ति जानता है कि वह क्या सोच रहा है , क्या कह रहा है और क्या कर रहा है । ऐसा व्यक्ति उन विचारों , शब्दों या कार्यों से बच सकता है  जिनसे उसे स्वयं  तथा दूसरे को कष्ट हो और इसी समझ और  ज्ञान से सहनशीलता और प्रेम का उदय होता है । फ़लस्वरुप संसार में अधिक कष्ट नही रह जाते ।

स्त्रोत : सतिपत्थन सुत्त्त , सचेतावस्था से जुडा विचार से लिया गया है ।  तिक न्यात हन्ह ( Thich Nhat Hanh ) की पुस्तक जहं जहं चरन पडे गौतम के ( Old paths white clouds )- प्रकाशक ‘हिन्द पाकेट बुक ’

Saturday, May 5, 2012

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनायें !!

buddha lights

आज से लगभग 2500 वर्ष पहले इसी पुण्य दिन धरती की गोद में महाराज शुद्धोधन के यहाँ राजकुमार सिद्धार्थ ने जन्म लिया था। इसके बाद एक-एक करके कई बैसाख पूर्णिमा आयी और चली गयीं। लेकिन फिर से एक महापुण्यवती बैसाख पूर्णिमा आयी, जब महातपस्वी सिद्धार्थ के अन्तर्चेतना में बुद्ध ने जन्म लिया। इस अनूठे जन्मोत्सव को मनुष्यों के साथ देवों ने भी अलौकिक रीति से मनाया। इस पुण्य घड़ी में सिद्धार्थ सम्यक् सम्बुद्ध बन गए और बैसाख पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा में रूपान्तरित हो गयी।
इस पूर्णिमा से जुड़ी दोनों ही कथाएँ बड़ी ही मीठी और प्यारी हैं। आज से 2500 साल पहले, जिस दिन सिद्धार्थ का जन्म हुआ, समूची कपिलवस्तु में उत्सव की धूम मच गयी। पूरा नगर सज गया। रात भर लोगों ने दिए जलाए, नाचे। उत्सव की घड़ी थी, चिर दिनों की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। इसलिए राजकुमार को सिद्धार्थ नाम दिया गया। सिद्धार्थ का मतलब होता है, जीवन का अर्थ सिद्ध हो जाना, अभिलाषा का पूरा हो जाना।
पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड बाजे बज रहे थे, शहनाइयाँ गूँज रही थी, फूल बरसाए जा रहे थे, महलों में, चारों तरफ प्रसाद बांटा जा रहा था। तभी हिमालय से भागते हुए एक वृद्ध तपस्वी महलों के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। उसका नाम असिता था। नगर वासियों के साथ स्वयं सम्राट उनका सम्मान करते थे। वह अब तक कभी राजधानी न आए थे। स्वयं सम्राट को भी उनसे मिलने के लिए जाना पड़ता था। आज उन्हें अचानक महलों की डयोढ़ी पर देखकर सभी चकित थे। सम्राट ने आकर खड़े अचकचाए स्वर में उनसे पूछा-हे महातपस्वी, क्या सेवा करूँ आपकी।
असिता ने उनकी दुविधा का निवारण करते हुए कहा, परेशान न हो शुद्धोधन। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ है, उसके दर्शन को आया हूँ। शुद्धोधन तो समझ ही न पाए। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा महान् वीतरागी उनके बेटे को देखने के लिए आया। वह भागे हुए अन्त:पुर में गए और नवजात शिशु को बाहर लेकर आए। असिता झुके और उन्होंने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने उनके पांव अपनी जटाओं में उलझा दिए। असिता पहले तो हंसे, फिर रोने लगे। शुद्धोधन तो हतप्रभ हो गए, वह पूछने लगे, महामुनि आप रोते क्यों हैं ?
असिता ने कहा, तुम्हारे घर में जो यह बेटा आया है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है, अरे यह तो सब तरह से अलौकिक है। कई सदियाँ बीत जाती है, तब कहीं यह आता है। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं, यह तो अनन्त-अनन्त लोगों के लिए समूची मनुष्यता के लिए सिद्धार्थ है। अनन्त जनों के जीवन का अर्थ इससे सिद्ध होगा। हंसता हूँ कि इसके दर्शन मिल गए। बहुत प्रसन्न हूँ कि इसने मुझ बूढ़े की जटाओं में अपने पांव उलझा दिए। मेरे लिए यह परम सौभाग्य का क्षण है। पर रुलाई इसलिए आ रही है कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दसों दिशाओं में इसकी महक उठेगी, तब मैं न रहूँगा। मेरे शरीर छूटने की घड़ी करीब आ गयी है।
महातपस्वी असिता की यह बात बड़ी अनूठी पर सच्ची है। बुद्धत्व का लुभावनापन ही कुछ ऐसा है। उनकी मोहकता है ही कुछ ऐसी। असिता जीवनमुक्त हो गए, पर उन्हें पछतावा होने लगा, कि काश एक जन्म अगर और मिलता तो इससे महाबुद्ध के चरणों में बैठने की, इनकी वाणी सुनने की, इनकी सुगन्ध पीने की, इनके बुद्धत्व में डूबने की सुविधा हो जाती। ऐसे अनूठे पल होते हैं, बुद्धत्व के विकसित होने के। महातपस्वी असिता में भी चाहत पैदा हो गयी कि मोक्ष दांव पर लगता हो लगे, कोई हर्जा नहीं। वह रोने लगे थे उनके पांवों पर सिर रखकर कि सदा ही चेष्टा कि कब छुटकारा हो इस शरीर से जीवन के आवागमन से, पर आज पछतावा हो रहा है।
काल प्रवाह के क्षण, दिवस, वर्ष बीते। और एक बैसाख पूर्णिमा को सत्य का, सम्बोधि का, बुद्धत्म का वहीं चाँद निकला, जिसकी चांदनी में जीने की चाहत कभी असिता ने की थी। यह पूर्णचन्द्र महातपस्वी शाक्यमुनि सिद्धार्थ के अन्तर्गगन में उदय हुआ। इस बीच अनेकों घटनाएँ काल सरिता में घटकर बह गयीं। शिशु सिद्धार्थ किशोर हुए, युवा हुए, यशोधरा उनकी राजरानी बनीं, राहुल के रूप में उन्हें पुत्र मिला। पर ये तो दृश्य घटनाएँ थी। अदृश्य में भी बहुत कुछ घटा। प्रचण्ड वैराग्य, अनूठा विवेक-जिसकी परिणति महाभिनिष्क्रमण के रूप में हुई। युवराज तपस्वी हो गए। तपस्या में दुर्बल, जर्जर सिद्धार्थ को सुजाता ने खीर खिलायी। और उनकी देह को ही नहीं जीवन चेतना को भी नव जीवन मिला। और वह गौतम बुद्ध हो गए।
गौतम बुद्ध के रूप में वे ऐसे है जैसे हिमाच्छादित हिमालय। जिससे करुणा की अनेकों जलधाराएँ निकलती हैं। जहाँ से महाकरुणा की गंगा बहती है। जो पतितपावनी, कलिमलहारिणी, सर्वपापनाशिनी है। पर्वत तो और भी है हिमाच्छादित पर्वत भी और है। पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे हैं। पूरी मनुष्य जाति में उनके जैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। उन्होंने जितने हृदयों की वीणा को बसाया है, उतना किसी और ने नहीं। उनके माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम भगवत्ता उपलब्ध की, उतनी किसी और के माध्मय से नहीं।
बुद्ध के बोल अत्यन्त मीठे हैं, उनके वचन बहुत अनूठे हैं। उनके द्वारा कही गयी धम्म गाथाओं में जीवन के बहुआयामी सच है। प्रत्येक धम्मगाथा एक कथा कहती है और जिन्दगी को राह दिखाती है। इस पुस्तक में इन अनूठी कथाओं को पिरोया गया है। एच.जी. वेल्स ने बुद्ध के संबंध में एक अद्भुत सच्चाई बयान की। उन्होंने कहा- कि समूची धरती पर उन जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और उनकी तरह ईश्वर शून्य व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है- सो गॉड लाइफ एण्ड सो गॉड लेस। अगर कोई ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकले तो बुद्ध से शून्य। ईश्वर शून्यता का अर्थ ईश्वर विरोधी होना नहीं है। जैसा कि कुछ समझदार समझे जाने वाले नासमझों ने समझ लिया है। इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि उन्होंने परम सत्य का उच्चार नहीं किया।
उपनिषद् कहते हैं कि ईश्वर के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना तो कह ही दिया। बुद्ध ने इतना भी नहीं कहा। वे परम उपनिषद् हैं। वह ईश्वर की चर्चा करने वाले केवल नाम मात्र के आस्तिक नहीं हैं। अगर परमात्मा के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं, तो फिर बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। बस चुप रहकर-इशारा किया। पशिचम में एक बहुत बड़ा दार्शनिक हुआ है- लुडविग पिट्गिंस्टाइन। उसने अपनी बड़ी अनूठी किताब ‘ट्रैफ्टेटस’ में लिखा है कि जिस संबंध में कुछ कहा न जा सके, उस संबंध में बिल्कुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट भी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही नहीं चाहिए।
अगर विट्गिंस्टाइन ने बुद्ध को देखा होता तो वे अपने कहे हुए सच की अनुभूति कर लेते। अगर विट्गिंस्टाइन की बातों को बुद्ध ने सुना होता तो अवश्य मुस्करा देते। बड़े ही प्यार से वे उसके कथन को अपनी स्वीकृति दे देते। परिश्रम के लोगों ने विट्गिंस्टाइन को समझने में भूल की। यही भूल पूरू के लोगों को हुई, बुद्ध को समझने में। बुद्ध दार्शनिक और विचारक नहीं, वह रुग्ण मनुश्यता के लिए बड़े ही करुणावान वैद्य थे। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है। पर इतना करुणापूर्ण होकर और इतने सटीक ढंग से नहीं। बड़े ढंग सेल लोगों की बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध के कहने का ढंग ही कुछ और है, जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसे उनके बुद्धत्व की थोड़ी सी झलक मिल गयी, उसका समूचा जीवन ही रूपान्तरित हो गया। ‘अप्प दीपो भव’ यही बुद्ध का अन्तिम वचन है। बुद्ध पूर्णिमा के शुभ क्षणों में इस भांति भी स्मरण किया जा सकता है-

महाबुद्ध ने मुझसे-तुमसे,
एक-एक से, हम सबसे
सुनो, यह सत्य कहा,
अपने दीपक आप बनो तुम
तिमिर का व्यूह भेद करना है,
कैसा यहाँ विराम
शिखा को झंझा में पलना है।

साभार : आचार्य श्रीराम शर्मा

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनायें !!

Wednesday, April 25, 2012

धम्मं शरणं गच्छामि

थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के मंदिर मे देखा जा सकता है

थाइलैंड में बाधों के बीच एक बौद्ध भिक्षु । इंसान और पशु के बीच सहअस्तित्व का ऐसा अनोखा मेल यहां के बौद्ध मंदिर मे देखा जा सकता है ।

साभार : दुनिया का एकमात्र टेंपल जहां बाघ और इंसान रहते हैं साथ-साथ

Friday, April 20, 2012

बुद्ध द्वारा प्रदान पंचशील सिद्धांत , सदाचार और नैतिक गुण

बुद्ध धम्म और सदाचार

बहुत से लोग बुद्ध धम्म को दुखवादी (pessimistic ) समझते हैं लेकिन अगर हम भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान किये गये पंचशील सिद्दांत को गौर से देखें तो यह जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं । यह पंचशील सिद्दांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमे सिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दु:ख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं ।

बुद्ध के पाँच उपदेश हैं :

प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना ।
चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने से विरत रहना ।
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना ।
असत्य बोलने से विरत रहना ।
मादक पदार्थॊं से विरत रहना ।

बुद्ध के यह पाँच उपदेशों को हम व्यवाहार के “प्रशिक्षण के नियम” के रुप मे समझे न कि किसी आज्ञा के रुप मे । यह ऐसा अभ्यास है जिसका विकास करके ध्यान, ज्ञान, और दया को पा सकते हैं ।
हम इन पाँच उपदेशों को कैसे समझते है यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । जैसे कुछ लोग चीटीं को मार नही सकते लेकिन माँस खाते हैं या फ़िर कुछ सिर्फ़ शाकाहारी ही होते हैं । कुछ मदिरा को हाथ भी नही लगाते और कुछ दिन मे सिर्फ़ एक आध पैग लगाते हैं क्योकि इससे उनको लगता है कि इससे उनको सूकून मिलता है या कुछ हमेशा नशे मे धुत रहते हैं । यह पाँच उपदेश यह नही सिखाते कि क्या सही है बल्कि अगर हम ईमानदारी से तय करे कि हमारे लिये क्या मददगार है और क्या हानिकारक ।
इसी तरह अगर हमे दूसरों की आलोचना करने की गहरी आदत है तो हम चौथे उपदेश को अभ्यास के लिये चुन सकते हैं । और अगर हमे टी.वी. या इन्टर्नेट का नशा सा है तो हम पाँचवे नियम को भी चुन सकते हैं । बुद्ध ने जब यह पाँच उपदेश दिये थे तन उनका तात्पर्य मादक तत्वों से ही रहा होगा लेकिन वक्त के साथ मनोरंजन की गतिविधिया भी असंख्य हो गयी ।

हाँ , अगर हमसे कोई सिद्दांत टूट भी जते है तब इस बात का अवशय ख्याल रखें कि हम अपराध बोध से ग्रस्त न हों  । अपरध बोध और पछतावे मे अन्तर हमें स्व दुख से बचाता है ।

इन उपदेशॊ का प्रयोजन हमे प्रसन्न रखना है और दुख से दूर रखना है । अगर हमारी वजह से किसी को चोट पहुची हो तो हमे दुख भी होता है और स्वाभाविक रूप से पश्चाताप भी । हम इस बात का ध्यान रखे और इससे सबक लें । पछ्तावे के यह क्षण बिना किसी अवशिष्ट भावनाओं को छोड़कर चले जाते हैं । लेकिन कभी –२ पछतावा और प्रायशिचित आत्म घृणा और दुख का कारण बनाता है । तब हम इस बात का ध्यान रखें और आत्म घृणा और अपराध बोध की बेकार की आदत से बचें क्योंकि यह भी आदत स्व दुख पहुँचाने की आदत सी है ।

Wednesday, April 18, 2012

DIFFERENT ATTITUDE OF THE HUMAN MIND

fire water

DIFFERENT ATTITUDE OF THE HUMAN MIND

"Some persons are like letters carved on a rock, they easily give way to anger and retain their angry thoughts for a long time. Some are likeletters written in sand; they give way to anger also, but the angry thoughts quickly pass away. Some men are like letters written in the water; they do not retain their passing thoughts. But the perfect ones are like letters written in the wind, they let abuse and uncomfortable gossip pass by unnoticed. Their minds are always pure and undisturbed." Venerable Dr. K. Sri Dhammananda

Thursday, April 5, 2012

मिलिन्द -प्रशन





सम्राट मीनान्डर और नागसेन का यह प्रसिद्ध संवाद सागलपुर ( वर्तमान स्यालकोट ) मे हुआ था जो उस समय सम्राट मीनान्डर की राजधानी थी । इस ग्रंथ मे राजा मिनान्डर ने भिक्खु नागसेन से अनेक ऐसे प्रशन पूछॆ है जो सीधे मनुष्य के मनोविज्ञान से संबध रखते हैं'मिलिन्द प्रशन ’ में भिक्षु नागसेन ने बुद्ध धम्म के एक गूढ तत्व ‘अनात्म ’ को समझाने का प्रयत्त्न किया है । ‘ मिलिन्द प्रशन ’ के दूसरे परिच्छॆद के ‘लक्षण प्रशन’ अध्याय का यह संवाद अंश वास्तव मे जटिल विषय को सहजता से प्रस्तुत करता है ।

गत सप्ताह सारनाथ भ्रमण के दौरान मूलगन्ध कुटी  मन्दिर के स्टाल से  “ मिलिन्दपंह” नामक ग्रंथ की यह पुस्तक विक्रय की जो सम्यक प्रकाशन केन्द्र से प्रकाशित की गई थी । हकीकत मे इस पुस्तक को पढने की ललक मुझे अपने मित्र श्री राजेश चन्द्रा जी द्वारा उपहार में दी गई श्री धम्मानन्द जी की पुस्तक के आरम्भिक संपादिकीय पन्नों से हुई जिसमें मिलिन्द प्रशन के कुछ पन्नों का समावेश किया गया था ।
बौद्ध साहित्य में ‘ मिलिन्दपंह ’ नामक ग्रंथ का अपना महत्वपूर्ण स्थान है । हाँलाकि इस ग्रंथ की गिनती त्रिपिट्क के ग्रंथों में नही आती , लेकिन त्रिपिटिक के बाद लिखे जाने वाले अनुत्रिपिटक ग्रंथॊं मे इसका स्थान सबसे ऊपर  है । ’ मिलिन्द प्रशन’ का महत्व बौद्ध जगत मे ठीक उसी प्रकार से है जैसे हिन्दू धर्म में श्री भगवद गीता का । जिस प्रकार श्री भगवद गीता मे भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन की शंकाओं को दूर करने के लिये उप्देशात्मक उत्त्र दिये गये हैं वैसे ही ‘मिलिन्द प्रशन’  मे सम्राट मिलिन्द के द्वारा उठाई गई शंकाओं का समाधान भिक्खु नागसेन द्वारा किया गया है ।
भारत मे आर्यों के आकर बसने के बाद विदेशियों के आक्रमण होते रहे । इसमे पहला आक्रमण लगभग आठ सो ईसा पूर्व असीरिया की सम्राज्ञी सेमिरामिस का था । दूसरा ईरान के प्रसुद्ध विजेता कुरु का था । इसके उपरांत ईसा से ३२० वर्ष पूर्व यूनान के जगत प्रसिद्ध विजेता सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया लेकिन उसकी सेना को मगध राज्य की विशाल सेना के भय से बीच मे ही लौट के जाना पडा । सिकंदर के कुछ साथी पशिचम एशिया में बस गये और इस प्रकार भारत मे यूनानियों का आकर बस जाना जारी रहा । उत्तर भारत में शासन करने वाले ग्रीक राजाओं मे मिनाणडर के  साम्राज्य का  विस्तार का संकेत कशमीर तक मिलता है । मथुरा में खुदाई मे मिले महत्वपूर्ण बाईस सिक्कों से  यह कहा जा सकता है कि उसका राज्य मथुरा तक फ़ैला हुआ था । प्रसिद्ध इतिहासकार प्लूटॊ के अनुसार उतर भारत मे शासन करने वाले ग्रीक राजाऒ मे मिनान्डर अत्यन्त न्यायी , विद्धान और लोकप्रिय राजा था । मिनाणर के भारत में आने के दो प्रमुख कारण थे , पहला अपने राज्य का विस्तार करना और दूसरा कि यहाँ के संतों , श्रमणॊं और दार्शिनिकों  से वाद विवाद एंव शास्त्रार्थ करके अपनी ज्ञान पिपासा और दार्शिनिक शंकाओं को दूर करना था ।
MenanderChakraMenanderCoin 
सम्राट मीनान्डर और नागसेन का यह प्रसिद्ध संवाद सागलपुर ( वर्तमान स्यालकोट ) मे हुआ था जो उस समय सम्राट मीनान्डर की राजधानी थी । इस ग्रंथ मे राजा मिनान्डर ने भिक्खु नागसेन से अनेक ऐसे प्रशन पूछॆ है जो सीधे मनुष्य के मनोविज्ञान से संबध रखते हैं । इस ग्रंथ का दूसरा और तीसरा वर्ग मनोविज्ञान से भरा हुआ है जिनमें सात विवेक और ज्ञान विषयक प्रशन एंव उत्तर के अतिरिक्त शील, श्रद्धा , वीर्य, स्मृति, समाधि एंव ज्ञान की पहचान पर चर्चा है । तृतीय वर्ग के अंतर्गत अविधा , संस्कार, अनात्मा आदि का वैज्ञानिक विशलेषण किया गया है । इस उपभाग में ही स्पर्श , वेदना , संज्ञा, चेतना , विज्ञान , वितर्क और विचार की पहचान विशुद्ध मनोवैज्ञानिक विषय है जिसकी विस्तृत जानकारी इस ग्रंथ से मिलती है ।
मिलिन्द प्रशन के उपभाग लक्षण प्रशन के अंतर्गत ’ पुदगल प्रशन मीमांसा ’ मेरी समझ से सबसे अधिक लोकप्रिय और बुद्ध धम्म के सबसे अधिक गूढ तत्व अनात्म को समझने मे सहायक है ।

पुदगल प्रशन मीमांसा


 
राजा मिलिन्द भिक्षु नागसेन से मिलने गये , उनको नमस्कार और अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये । नागसेन ने भी जिज्ञासु एंव विद्धान राजा का अभिनन्दन किया ।
तब राजा मिलिन्द ने प्रशन किया – भन्ते , आप किस नाम से जाने जाते हैं , आपका शुभ नाम क्या है ?
महाराज मैं ‘नागसेन’ नाम से जाना जाता हूँ और मेरे सहब्रह्मचारी मुझे इसी नाम से पुकारते  हैं । यद्दपि माँ-बाप नागसेन , सूरसेन , वीरसेन या सिंहसेन ऐसा कुछ भी नाम दे देते हैं , किन्तु यह व्यवहार के लिये संज्ञायें भर हैं , क्योंकि व्यवहार में ऐसा कोई पुरुष ( आत्मा ) नही है ।
भिक्षु नागसेन के इस असामान्य उत्तर से चकित सम्राट मिलिन्द ने उपस्थित समुदाय को सम्बोधित करते हुये कहा – मेरे पाँच सौ यवन और अस्सी हजार भिक्षुओं , आप लोग सुनें , भन्ते नागसेन का कहना है कि ‘ यथार्थ मे कोई आत्मा नही है ’ उनके इस कथन को क्या समझना चाहिये ?
फ़िर भन्ते को सम्बोधित करते हुये कहा – यदि कोई आत्मा नही है तो कौन आपको चीवर , भिक्षापात्र , शयनासन , और ग्लानप्रत्यय ( औषधि) देता है ? कौन उसका भोग  करता है ? कौन शील की रक्षा करता है ? कौन ध्यान साधाना का अभ्यास करता है ? कौन आर्यमार्ग के फ़ल निर्वाण का साक्षात्कार करता है ? कौन प्राणातिपात ( प्राणि हिंसा ) करता है ? कौन अदत्तादान ( चॊरी ) करता  है ? कौन मिथ्या भोगों मे अनुरक्त  होता है ? कौन मिथ्या भाषण करता है ? कौन मद्ध पीता है ? कौन अन्तराय कारक कर्मों को करता है ? यदि ऐसी कोई बात है तो न पाप है और न पुण्य , न पाप और पुण्य कर्मों के कोई फ़ल होते हैं । भन्ते , नागसेन ! यदि कोई आपकी ह्त्या कर दे तो किसी की हत्या नही हुई । भन्ते , तब तो आपका कोई आचार्य भी नही हुआ , कोई उपाध्याय भी नही और आपकी उपसम्पदा भी नही हुई ।
आप कहते हैं कि आपके सह ब्रहमचारी आपको नागसेन नाम से पुकारते हैं , तो यह ‘नागसेन’ है क्या , क्या ये केश ‘नागसेन’ हैं ?
‘नहीं महाराज !’
‘ये रोयें नागसेन हैं ?’
‘नहीं महाराज!’
‘ये नक, दाँत , चमडा, मांस, स्नायु, हडडी , मज्जा , वृक्क, ह्रदय , क्लोमक, तिल्ली, फ़ुफ़्फ़ुस, आंत, पसती, पेट, मल, पित्त, पीब, रक्त, पसीना, मेद, आँसू, लार, नेटा, लसिका, दिमाग नागसेन हैं ?’
‘नहीं महाराज!’
‘तब क्या आपका रुप नागसेन है ?’
‘नहीं महाराज!’
‘तो क्या ये सब मिल कर पंच स्कन्ध नागसेन हैं?’
‘नहीं महाराज!’
‘तो इन रुपादि से भिन्न कोई नागसेन है ?’
‘नहीं महाराज!’
‘भन्ते , मैं आपसे प्रशन पूछ्ते-२ थक गया हूँ, किन्तु नागसेन क्या है इसका पता नहीं लगा । तब क्या नागसेन केवल शब्द मात्र है ?  आखिर नागसेन है कौन ? भन्ते आप झूठ बोलते हैं कि नागसेन कोई नही है ।’
अस्तु प्रशन कर-२ थके राजा मिलिन्द से भिक्षु नागसेन ने पूर्ववत सौम्य स्वर मे कहा – महाराज , आप सुकुमार युवक हैं , इस तपती दोपहर में गर्म बालू तथा कंकडॊं से भरी भूमि पर पैदल चल कर आने से आप के पैर दुखते होगें , शरीर थक गया होगा , मन असहज होगा और शरीर में पीडा हो रही होगी । क्या आप पैदल चल कर यहाँ आये हैं या किसी सवारी पर ?
‘भन्ते मैं पैदल नही बल्कि रथ पर आया हूँ ।’
‘महाराज ! यदि आप रथ पर आये हैं तो मुझे बतायें कि आपका रथ कहाँ है?’
‘राजा मिलिन्द ने रथ की ओर अंगुली निर्देश किया तब भन्ते नागसेन ने पूछा – राजन ! क्या ईषा( दण्ड ) रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या अक्ष रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या चक्के रथ हैं ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘राजन ! क्या रथ का पंजर रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या रथ की रस्सियाँ रथ हैं ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या लगाम रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या चाबुक रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘राजन ! क्या ईषादि सभी एक साथ रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘क्या ईषादि से परे कही रथ है ?’
‘नहीं भन्ते!’
‘महाराज ! मै आपसे पूछते-२ थक गया हूँ किन्तु यह पता नही लगा कि रथ कहाँ है । क्या रथ केवल शब्द मात्र है ? अन्तत: यह रथ है क्या ? महाराज आप झूठ बोलते हैं कि रथ नही है । महाराज , सारे जम्बुद्दीप मॆं आप सबसे बडॆ राजा हैं , भला किसके डर से आप झूठ बोलते हैं ?’
‘पांच सौ यवनों और मेरे अस्सी हजार भिक्षुओं ! आप लोग सुनें , राजा मिलिन्द ने कहा , ‘मैं रथ पर यहाँ आया ‘ किन्तु मेरे पूछने पर कि रथ कहाँ है , वे मुझे नहीं बता पाये । क्या उनकी बातें मानी जा सकती हैं ?
इस पर उन पाँच सौ यवनों ने आयुष्मान नागसेन को साधुवाद दे कर राजा मिलिन्द से कहा – महाराज , यदि हो सके तो आप इसका उत्तर दें ।
तब राजा मिलिन्द ने कहा – भन्ते ! मैं झूठ नही बोल रहा हूँ । ईषादि रथ के अवयवों के आधार पर केवल व्यवहार के लिये ‘रथ’ ऐसा नाम कहा गया है ।
‘महाराज बहुत ठीक , आपने जान लिया कि रथ क्या है । इसी प्रकार मेरे केश इत्यादि के आधार पर केवल व्यवहार के लिये “नागसेन” ऐसा एक नाम कहा जाता है लेकिन परमार्थ मे नागसेन नामक कोई आत्मा नही है । भिक्षुणी वज्रा ने भगवान बुद्ध के सामने कहा था – जैसे अवययों के आधार पर “ रथ” संज्ञा होती है उसी प्रकार स्कन्धों के होने से “सत्व” समझा जाता है ।
‘भन्ते !! आशचर्य है , अदभुत है । इस जटिल प्रशन को आपने बडी खूबी से सुलझा लिया , विस्मयहर्षित राजा मिलिन्द ने कहा , यदि इस समय भगवान बुद्ध भी यहाँ होते तो वे भी आपको साधुव्बाद देते । भन्ते नागसेन ! आप को साधुवाद !!

साभार : श्री शान्ति स्वरुप बौद्ध ,सम्यक प्रकाशन केन्द्र ,श्री राजेश चन्द्रा , और श्री टी.वाई.ली.

Wednesday, March 14, 2012

चीन में मिली बुद्ध की 2000 से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं

U45P5029T2D446549F24DT20120307141146U45P5029T2D446549F26DT20120307141146 (1)U45P5029T2D446549F28DT20120307141146 (1)U45P5029T2D446549F31DT20120307141146 (1)

चीन के हेबेई प्रांत में पुरातत्वविदों ने बुद्ध की 2,000 से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं खोजी हैं.

इन प्रतिमाओं की खोज से पता चलता है कि साम्यवादी देश में बौद्ध धर्म तब से ही लोकप्रिय है जब इसका भारत में प्रसार हुआ था.
लिनझांग काउंटी के येशेंग स्थित एक ऐतिहासिक स्थल पर मिलीं बुद्ध की ये 2,895 प्रतिमाएं और उनके अवशेष पूर्वी वेई और उत्तरी क्वी काल (534-577) के हैं.
‘इन्स्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी ऑफ द चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज’ और ‘हेबेई प्रॉवीन्शियल इन्स्टीट्यूट ऑफ कल्चरल हैरिटेज’ के पुरातत्वविदों के अनुसार, ये प्रतिमाएं सफेद संगमरमर और नीले पत्थरों से बनी हैं. कुछ प्रतिमाओं पर रंग किया गया है या कलई की गई है.
खबर के मुताबिक हेबेई प्रॉवीन्शियल ब्यूरो ऑफ कल्चरल हैरिटेज’के एक अधिकारी झांग वेनरूई ने बताया कि प्रतिमाओं की लंबाई 20 सेन्टीमीटर से लेकर एक वास्तविक व्यक्ति के आकार तक की है.
पुरातत्वविद संरक्षण और अनुसंधान के लिए इन प्रतिमाओं की मरम्मत कर रहे हैं. समझा जाता है कि करीब 2,000 साल पहले भारत से बौद्ध धर्म का चीन में प्रसार हुआ था.

साभार : समय लाइव

Friday, March 9, 2012

समस्याग्रस्त जीवन और चेतना

2-3-How_to_lower_tension_and_anxiety

एक ज़ेन शिष्य  ने अपने गुरु से  पूछा, "जीवन इतना अधिक समस्याग्रस्त क्यूं दिखाई देता है ?".
ज़ेन गुरु ने कहा   " एक आदमी नाव के होते हुये भी पानी मे बैठता है तो उसको तुम क्या कहोगे ?"
शिष्य ने कहा , “ अगर उसके पास नाव है तो वह पानी में क्यूं बैठेगा ? ”

“ अगर तुम्हारे पास चेतना है तो समस्याग्रस्त जीवन मे क्यूं बैठते हो ” जेन गुरु ने उत्तर दिया ।

John Weeren की कहानी “ Story; a man, a boat ” का हिन्दी अनुवाद ।

Tuesday, February 28, 2012

जेन कथा : ग्रंथ का प्रकाशन

जापान में टेटसुगेन नाम का एक जेन शिष्य था। एक दिन उसके मन में ख्‍याल आया कि धर्म सूत्र केवल चीनी भाषा में ही हैं, उन्हें अपनी भाषा में प्रकाशित करना चाहिए। सूत्र के सात हजार ग्रंथ प्रकाशित करने का अनुमान लगा।
ग्रंथ के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन देश में घूमकर धन इकट्‍ठा करने निकला। लोगों ने उदार हृदय से टेटसुगेन की मदद की। किसी-किसी ने तो उसे 100 सोने के सिक्के तक दिए। लोगों को टेटसुगेन ने बदले में धन्यवाद दिया। वह इस काम में दस साल तक लगा रहा और तब जागर टेटसुगेन के पास ग्रंथ प्रकाशन के लिए पर्याप्त धन इकट्‍ठा हो गया।
उसी समय देश में एक नदी में बाढ़ आई। बाढ़ अपने पीछे अकाल छोड़ गई। टेटसुगेनने जो धन ग्रंथ प्रकाशन के लिए इकट्‍ठा किया था वह लोगों की सहायता में खर्च कर दिया। इसके बाद जब ‍परिस्थितियाँ सामान्य हुईं तो वह फिर से ग्रंथ के प्रकाशन के लिए धन संग्रह करने निकला।
टेटसुगेन को धन इकट्ठा करते हुए कुछ साल बीत गए। इधर फिर से देश में एक महामारी फैल गई। टेटसुगेन ने अभी तक जो भी धन इकट्‍ठा किया था वह फिर से लोगों की सेवा में खर्च कर दिया। इस तरह उसने कई लोगों को मरने से बचाया।
ग्रंथ के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन ने तीसरी बार धन इकट्‍ठा करने का निश्चय किया। बीस साल बाद जाकर उसकी ग्रंथ प्रकाशित करने की इच्छा पूरी हो पाई। उसने ग्रंथों के संकलन का पहला संस्करण निकाला और वह क्योटो की ओबाकू विहार में आज भी देखा जा सकता है। जापान में आज भी लोग टेटसुगेन को याद करते हुए कहते हैं कि उसने तीन बार सूत्रों के ग्रंथ प्रकाशित करवाए। तीसरा ग्रंथ हमें दिखता है, जबकि पहले दो ग्रंथ जो ज्यादा महत्वपूर्ण हैं हमें दिखलाई नहीं पड़ते।

साभार : हिन्दी वेब दुनिया

Sunday, February 26, 2012

सेब का वृक्ष

apple_tree_1b

 

मैं लक्ष्य तक पहुँचने में और अधिक किस तरह प्रभावी हो सकता हूँ ?" एक ज़ेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा.
" क्या तुमने  कभी सेब के वृक्ष को सेब के फ़ल के अतिरिक्त किसी और फ़ल का उत्पादन करते हुये देखा है ? ” जेन गुरु ने कहा ।

"नहीं," छात्र ने कहा. "लेकिन इसका मेरे प्रशन के साथ क्या संबध है ? "
” फ़िर तुम किस तरह के वृक्ष हो ? ” जेन गुरु ने एक भेदी मुस्कान के साथ पूछा !!

John Weeren की जेन कहानी “ apple tree ” का हिन्दी मे अनुवाद ।

Wednesday, February 22, 2012

धम्म जीवन कैसे जियें– डां के.श्री धम्मानन्द

dhamm jeevan kaise jiyen

डां के.श्री धम्मानन्द जी की “ धम्म जीवन कैसे जियें ” मूलत: ‘How to practice Buddhism ‘ का हिन्दी अनुवाद है । जैसा कि पुस्तक के नाम से स्पष्ट है कि यह पुस्तक बुद्ध धम्म को प्रतिदिन के व्यवहार में प्रयुक्त करने हेतु दिशानिर्देश प्रस्तुत करती है । बौद्ध आध्यात्मिक साहित्य मे बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन दिशा निर्देशों के अभाव मे सब कुछ स्पष्ट नही है । श्री प्रेम गोपाल दुग्गल जी द्वारा अनुवादित और श्री राजेश चन्द्रा जी द्वारा संपादित डां के.श्री धम्मानन्द जी की यह पुस्तक बुद्ध धम्म के कई अनछुये पहुलऒं को छूती है जिनमें सामाजिक , बौद्धिक , और स्थानीय परम्परायें भी शामिल है ।

डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/een214d0g74bamzasjgv

Dhaam Jeevan Kaise Jiyen

Monday, February 20, 2012

धम्म का वास्तविक अर्थ …

आचार्य बोधिधम्म ने नौ वर्षों तक के अपने प्रवास में चीन में मात्र पाँच शिष्य और एक शिष्या को दीक्षा दिया । भारत आते समय उन्होनें अपने सभी शिष्यों से एक ही प्रशन किया – “ तुमने धम्म का क्या अर्थ समझा? ”

प्रथम शिष्य ताओ फ़ू ने कहा , “ धम्म भाषा और शब्दों से परे है लेकिन वह भाषा और शब्द से पृथक नही है ।”

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म की त्वचा को स्पर्श कर लिया है । ”

शिष्या त्संग चीह ( सोजी ) ने कहा , “ अक्षोभ्य बुद्ध भूमि का दर्शन धम्म है , उनके दर्श्न की पुनरावृति नहीं होती । ”

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का ह्र्दय छू लिया । ”

तीसरे शिष्य ताओ यू ने कहा , “ मौलिक रुप से पाँच तत्व शून्य है और पाँचवे का अस्तित्व नही है । धम्म इन पाँचों तत्वों से परे है ।”

बोधिधम्म ने अनुमोदन किया , “ तुम धम्म की अस्थियों तक पहुँच गये हो “

हुई को दो कदम आगे बढा , बोधिधम्म के पाँव छुये फ़िर दो कदम पीछे हो कर चुपचाप खडा हो गया , कहा कुछ नहीं ।

बोधिधम्म ने कहा , “ तुमने धम्म का मर्म पा लिया "। ”

शिष्य हुई को अपना उत्तराधिकार सौंप कर आचार्य बोधिधम्म वापस भारत आ गये और हिमालय मे कही विलीन हो गयॆ ।

यह भिन्न –२ प्रसंग बुद्ध धम्म के केन्द्रीय तत्व की ओर संकेत दे रहे हैं – चित्त का परिशोधन , अकुशल कर्मों से विरति और कुशल कर्मों का सम्पादन ।

Saturday, February 18, 2012

बचना

 

Escape-to-Meditation

एक जेन छात्र ने अपने गुरु से पूछा .“ क्या जेन ध्यान का मकसद स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा है ? “

उसके गुरु ने कहा , “ नहीं “

“ तो क्या जीवन की परेशानियाँ और अंशाति से बचने का उपाय जेन ध्यान  मे है ? ”

गुरु ने कहा , “ बचना कैसा ? “ जेन वास्तविकता को उसी रुप में  स्वीकार करने की कला है । ”

John Weeren की  जेन कहानी  “ escape “ का हिन्दी अनुवाद

 

.

Wednesday, February 15, 2012

बौद्ध - विनय एवं आचरण- डां के. श्री. धम्मानन्द

Image1

डां के. श्री. धम्मानन्द जी की यह लघु पुस्तिका ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ उनकी अंगेजी मे लिखी ’ Moral & Ethical conduct of a Buddhist ‘ का हिन्दी  मे अनुवाद है । डां श्रीमती इन्दु अग्रवाल ने इस पुस्तिका का सुरुचिपूर्ण भाषा मे प्रवाहमेय अनुवाद किया है और हमेशा की तरह श्री राजेश चन्द्रा जी ने इस पुस्तिका का उत्कृष्ट रुप से संपादन किया है ।

गत सप्ताह  मेरे अभिग्न मित्र श्री  राजेश जी ने मुझे दो पुस्तिकायें भेटं स्वरुप दी । पिछ्ले  काफ़ी समय से हम नेट के माध्यम से जुडे रहे लेकिन अधिक व्यवस्सता  के कारण मिलना संभव न हो पाया । गत सप्ताह यह मिलन आकस्मिक और बहुत ही सुखद पूर्ण  रहा । पिछ्ले साल श्रावस्ती भ्रमण  के दौरान जिस तरह वह मेरे साथ फ़ोन के माध्यम से लगातार सुबह से रात तक जुडे रहे उससे मुझे कही नही लगा कि हम दोनों मे पूर्व  का  परिचय नही है ।

लेकिन बात पहले ’ बौद्ध विनय एवं आचरण ’ की । डां के. श्री. धम्मानन्द जी इस पुस्तिका का केन्द्रीय विषय बौद्धों की आचरण नियमावली है । यह पुस्तिका न सिर्फ़ भिक्खुओं के लिये उपयोगी है बल्कि उपासकों के लिये भी लाभकारी है । जनमानस को भगवान बुद्ध का यही संदेश मिलता है “ सत्कर्म करो , शुद्ध विचार रखो और दुषकर्म से दूर रहो । ” बुद्ध के समय मे भी ये शब्द उतने ही सच थे जितने आज हैं और कल भी रहेगें ।

इस पुस्तिका की scanned image बहुत ही उत्कृष्ट quality की नही है लेकिन जैसे ही यह सिगांपुर से  श्री टी वाई ली की साइट पर उपलोड होगी तब उसका डाउनलोड लिंक यहाँ उपलब्ध करा दिया जायेगा ।

डाउनलोड लिंक : http://www.box.com/s/lcp84ip2t6cg676j5rs9

बौद्ध नियम एवं आचरण

Saturday, January 28, 2012

सच्चा साधु

साधु

भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को दीक्षा देने के उपरांत उन्हें धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए अन्य नगरों और गावों में जाने की आज्ञा दी।बुद्ध ने सभी शिष्यों से पूछा – “तुम सभी जहाँ कहीं भी जाओगे वहांतुम्हें अच्छे और बुरे – दोनों प्रकार के लोग मिलेंगे। अच्छे लोगतुम्हारी बातों को सुनेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे। बुरे लोग तुम्हारीनिंदा करेंगे और गालियाँ देंगे। तुम्हें इससे कैसा लगेगा?”

हर शिष्य ने अपनी समझ से बुद्ध के प्रश्न का उत्तर दिया। एक गुणी शिष्य ने बुद्ध से कहा – “मैं किसी को बुरा नहीं समझता। यदि कोई मेरी निंदा करेगा या मुझे गालियाँ देगा तो मैं समझूंगा कि वह भला व्यक्ति है क्योंकि उसने मुझे सिर्फ़ गालियाँ ही दीं, मुझपर धूल तो नहीं फेंकी।”

बुद्ध ने कहा – “और यदि कोई तुमपर धूल फेंक दे तो?”

“मैं उन्हें भला ही कहूँगा क्योंकि उसने सिर्फ़ धूल ही तो फेंकी, मुझे थप्पड़ तो नहीं मारा।”

“और यदि कोई थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे?”

“मैं उन्हें बुरा नहीं कहूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे थप्पड़ ही तो मारा, डंडा तो नहीं मारा।”

“यदि कोई डंडा मार दे तो?”

“मैं उसे धन्यवाद दूँगा क्योंकि उसने मुझे केवल डंडे से ही मारा, हथियार से नहीं मारा।”

“लेकिन मार्ग में तुम्हें डाकू भी मिल सकते हैं जो तुमपर घातक हथियार से प्रहार कर सकते हैं।”

“तो क्या? मैं तो उन्हें दयालु ही समझूंगा, क्योंकि वे केवल मारते ही हैं, मार नहीं डालते।”

“और यदि वे तुम्हें मार ही डालें?”

शिष्य बोला – “इस जीवन और संसार में केवल दुःख ही है। जितना अधिक जीवित रहूँगा उतना अधिक दुःख देखना पड़ेगा। जीवन से मुक्ति के लिए आत्महत्या करना तो महापाप है। यदि कोई जीवन से ऐसे ही छुटकारा दिला दे तो उसका भी उपकार मानूंगा।”

शिष्य के यह वचन सुनकर बुद्ध को अपार संतोष हुआ। वे बोले – तुम धन्य हो। केवल तुम ही सच्चे साधु हो। सच्चा साधु किसी भी दशा में दूसरे को बुरा नहीं समझता। जो दूसरों में बुराई नहीं देखता वही सच्चा परिव्राजक होने के योग्य है। तुम सदैव धर्म के मार्ग पर चलोगे।”

साभार : हिंदीजेन

Thursday, January 26, 2012

खोज

world-religion

कहते हैं कि एक हजार वर्ष पूर्व लेबनान के ढाल पर दो दार्शनिक आ मिले . एक ने दूसरे से पूछा , “ कहाँ जा रहे हो तुम ?”

दूसरे ने उत्तर दिया , “ मै तो यौवन के निर्झर की तलाश मे जा रहा हूँ . मेरे ध्यान इन्हीं किसी पहाडियों के मध्य उसका सोता प्रस्फ़ुटिक होता है . पर तुम ? तुम क्या खोज रहे हो ? "

पहले आदमी ने उत्तर दिया , “ मैं तो मॄत्यु के रहस्य की तलाश कर रहा हूँ . "

तब दोनों दार्शिनिकों ने एक दूसरे के प्रति धारणा बना ली कि दूसरा उनकी महान विधा से अपरिचित है . वे आपस में लडने झगडने लगे और एक दूसरे कॆ अन्धविशवास की आलोचना करने लगे .

तभी उधर से एक अजनबी निकला, जो गाँव मे महामूर्ख समझा जाता था . वह उनके बीच की गर्मा गर्म बहस और तर्कों को सुनता रहा .

उसके बाद वह उनके निकट आ कर बोला , “ भलेमानुसो , ऐसा लगता है तुम दोनों एक ही सिद्दान्त के मानने वाले हो और तुम दोनो एक ही बात कह भी रह हो . अन्तर तो सिर्फ़ शब्दों का है . तुममे से एक यौवन के निर्झर की तलाश कर रहा है और दूसरा मृत्यु के रहस्य की खोज , पर हैं तो दोनों एक ही , और वह दोनों एकरुप होकर तुम दोनो मे बसते हैं . "

वह अपरिचित दोनों से विदाई लेता हुआ चल दिया और जाते-२ खूब हँसा .

दोनों दार्शनिकों ने चुपचाप कुछ क्षणॊं के लिये एक दूसरे को देखा और तब वए दोनों भी हँस पडॆ और उनमें से एक ने कहा , “ अच्छा तो हम दोनों मिलकर खोज करें  न ?"

खलील जिब्रान की यह लघु कथा मुझे कई अर्थॊं मे महत्वपूर्ण लगती है . इस संसार मे इतने सारे धर्म , उनके अनुनायी होते हुये भी कहीं समरसता  नजर नही आती . हर धर्म दूसरे धर्म को तो या तो नीची दृष्टि से देखता है या अपने ही धर्म को सर्वोच्च करने मे लगा रहता है . इतिहास गवाह है कि विभिन्न धर्मों मे यह लुका छिपी का खेल अनेक बार खूनी जंग मे तब्दील हो चुका है . जब सब के अंतिम मार्ग एक ही हैं तो यह खूनी जंग क्यूं ?

ईशवर है या नही …यह एक कपोल कल्पित प्रशन है , वह किस रुप मे है , इसमे भी भिन्न-२  राय हो सकती है , लेकिन एक बात सच है कि दु:ख और पीडायें हर इंसान मे सामान्य रुप से हैं .

एक बार गौतम बुद्ध कौशम्बी मे सिमसा जगंल मे  विहार कर रहे थे । एक दिन उन्होने जंगल मे पेडॊं के कुछ पत्तों  को अपने हाथ मे लेकर भिक्षुओं से पूछा , “ क्या लगता है भिक्षुओं , मैने  हाथ मे जो पत्ते लिये हैं वह  या जंगल मे पेडॊं पर लगे पत्ते संख्या मे अधिक हैं । “

भिक्षुओं ने कहा , “ जाहिर हैं जो पत्ते जंगल मे पेडॊं पर लगे हैं वही संख्या मे आपके हाथ मे रखे पत्तों से अधिक हैं “

इसी तरह  भिक्षुओं ऐसी अनगिनत  चीजे हैं जिन्का प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ संबध हैं लेकिन उनको मै तुम लोगों को  नही सिखाता क्योंकि उनका संबध लक्ष्य के साथ नही जुडा है , न ही वह चितंन का नेतूत्व करती हैं , न ही विराग को दूर करती है, न आत्मजागरुकता उत्पन्न करती है और  न ही मन को शांत करती है ।

इसलिये भिक्षुओं तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारे चिंतन मे है ..उस दु:ख की उत्पत्ति …दु:ख की समाप्ति और उस अभ्यास मे है जो इस जीवन मे तनाव या दु:ख को दूर कर सकती है । और यह अभ्यास इस जीवन के लक्ष्य से जुडा है , निराशा और विराग को  दूर करता हैं और मन को शांत करता है । संयुत्त निकाय 56.31