Monday, June 15, 2015

चीन में हजार हाथों वाली बुद्ध प्रतिमा का जीर्णोद्धार

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बीजिंग। चीन के विशेषज्ञों ने बुद्ध की आठ सौ साल पुरानी प्रतिमा का जीर्णोद्धार कर दिया है। अपने हजार हाथों के लिए प्रसिद्ध यह प्रतिमा देश के दक्षिण-पश्चिम प्रांत में स्थित है। जीर्णोद्धार के काम में सात वर्ष का समय लगा।

शिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, अब पर्यटक हजार हाथों वाली प्रतिमा ‘कियानशू गुआनयिन’ को नए रूप में देख सकते हैं। इससे पहले भी चार बार इस प्रतिमा की मरम्मत हो चुकी है। कामगारों ने सोने के 10 लाख पत्तरों और 227 उपकरणों का इस्तेमाल कर 830 हाथों को फिर से बना दिया। प्रतिमा को पूरी तरह से साफ भी किया गया।

सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधानकर्ता और इस परियोजना के निदेशक झान चांगफा ने कहा कि अब ‘कियानशू गुआनयिन’ के अगले 50 वर्षो तक इसी तरह चमकते रहने की उम्मीद है। यह प्रतिमा 7.7 मीटर ऊंची और 12.5 मीटर चौड़ी है। इसका निर्माण सोंग राजवंश (1127 से 1279) के काल में हुआ था।

साभार : http://tinyurl.com/nj5yd5s

Friday, June 12, 2015

पात्र और सामाग्री ( The Container and the Content )

 

AFGHANISTAN-BUDDHAS/

ब्रिसबेन  में एक स्थानीय पत्रकार ने मुझसे बडा ही अटपटा सा प्रशन पूछा . “ अजह्न्ह , आप की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर कोई इन्सान बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक जैसे त्रिपटक को शौचालय मे बहा दे । “

एक क्षण रुके बगैर मैने उससे कहा , “ अगर कोई बुद्ध धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक को शौचालय मे बहा देगा तो मै सबसे पहले मै रुकी हुई पाइपलाइन को खुलवाने के लिये एक योग्य प्लम्बर को बुलाऊगाँ । “

संभवत: उसको मेरे उत्तर  की अपेक्षा नही थी । वह हँसा और मुझसे बोला कि क्या आप इस बात से उद्देलित नही होगे ।

मैने उससे कहा , “  हो सकता है कि बुद्ध धम्म के विरोधी बुद्ध की कई प्रतिमाओं को उडा दें , कई मंदिरों को नष्ट कर दें या बौद्ध भिक्खुओं और भिक्खुनियों की हत्या तक कर दें लेकिन फ़िर भी मैं उनको बौद्ध धर्म को नष्ट करने की अनुमति नही दे सकता । आप एक शौचालय में एक पवित्र पुस्तक को बहा सकते हैं लेकिन क्या आप बौद्ध धम्म के मूल आधार क्षमा , करुणा , शांति और मैत्री को शौचालय मे बहा सकते हैं । “

कोई  भी पुस्तक , मूर्ति , मन्दिर , विहार या उसको संचालित करने वाले पुजारी और महंत धर्म नही हो सकते । वे केवल “ पात्र “ हैं । पात्र वह जिसमे सामाग्री रखी जाती है । वह ह्मेशा पात्र ही रहेगें ।

लेकिन दूसरी तरफ़ यह पुस्तकें हमें क्या सिखाती हैं ? बुद्ध की मूर्ति हमॆ क्या दर्शाती है ? भिक्खुओं के गुण हमें किस बात की शिक्षा देते हैं ?  यह वह  “ सामाग्री  “ हैं जिसको हमें बचाना है ।

जब हम पात्र और सामाग्री के बीच के अंतर को समझ लेगें तब हम पात्र के नष्ट हो जाने के बाद भी सामाग्री की रक्षा कर सकते हैं ।

यह भी संभव है कि हम अधिक संख्या मे धम्म की पुस्तकें छ्पवायें , यह भी हो सकता है कि हम बहुत से भिक्खुओं और भिक्खुनियों को प्रशिक्षित कर लें लेकिन जिस दिन हम दूसरों के लिये हमारे प्यार और सम्मान को खो बैठते हैं और अपने आप को हिंसा मे लिप्त कर लेते हैं तो मेरे अनुसार पूरे के पूरे धर्म को ही शौचालय मे बहा बैठते हैं ।

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अजह्न्ह ब्रह्म्ह की पुस्तक “ GOOD ? BAD ? WHO KNOWS ” मे से ली गई कहानी “ The Container and the Content ” का हिन्दी अनुवाद ।

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The Container and the Content – Ajahn Brahm

A local journalist called and asked me “ What would you do, Ajahn Brahm, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet?”

Without hesitation I answered “Sir, if someone took a Buddhist Holy Book and flushed it down the toilet, the first thing I would do is call a plumber!”

When the journalist finished laughing, he confided in me that that was the most sensible answer he had heard.

Then I went further. I explained that someone may blow up many statues of the Buddha, burn down Buddhist temples or kill Buddhist monks and nuns; they may destroy all of this but I will never allow them to destroy Buddhism. You may flush a Holy Book down a toilet, but you will never flush forgiveness, peace and compassion down a toilet.

The book is not the religion, nor the statue, the building or the priest. These are only “containers.”

What does the book teach us? What does the statue represent? What qualities are the priests supposed to embody? This is the “content”.

When we recognize the difference between the container and the contents, then we will preserve the contents even when the container is being destroyed.

We can print more books, build more temples and statues and even train more monks and nuns, but when we lose our love and respect for others and ourselves and replace it with violence, then the whole religion has gone down the toilet.

Thursday, June 11, 2015

यूँनगैंग गुफा,चीन ( Yungang Caves , China )

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यूँनगैंग गुफाएं चीन के शांक्सी जिले में है। यहा की 252 गुफाएं और 51,000 मुर्तिया एक साथ, 5 और 6 वीं शताब्दी की चीन की बौद्ध गुफा कला की उत्कृष्टता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यहा की गुफाएं चीन के उत्तरी वेह राजवंश के समय बनाना शुरू हुई थी। 398 और 484 ईसवी के समय में और 60 साल बाद बन के तैयार हुई पर इन गुफाओं में बाद के कई राजवंशो ने भी काम कराया इस का काम 16 सदी में आखरी बार खत्म हुआ। आज यहा 252 गुफाएं और 51,000 मुर्तिया है।

साभार : http://buddhkathaiye.blogspot.in/2015/03/blog-post_55.html

Tuesday, May 26, 2015

मध्यम मार्ग महोत्सव 24 मई 2015 - भगवान्‌ बुद्ध के देशनाओं की मासिक पत्रिका ‘ मध्यम मार्ग ’ के तत्वाधान में


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यह एक अनूठा संगम था । यहाँ बुद्ध धम्म से जुडॆ उपासकों और उन लोगों का भी संगम था जो बुद्ध धम्म मे रुचि रखते हैं । भगवान्‌ बुद्ध की विचारधारा से जुडने वाले लोग चार स्त्रोतों से आते हैं । एक – जो पंरपरागत बौद्ध हैं , हाँलाकि भारत मे इनकी संख्या काफ़ी कम है , इनमें असम से बरुआ , ताई और चकमा  आदि हैं ।
दूसरे – वह जो ओशो को पढते हैं और उनको समझते हैं । विशेषकर ‘ एस धम्मो संनातनॊ ’ पर ओशॊ की  कमेन्ट्री के बाद बुद्ध को समझने मे लोगों की रुचि बढी है ।
तीसरे – वह जो अम्बेकरवादी हैं और बाबा साहब डां अम्बेड्कर के पद्‌ चिन्हों पर चलते हैं ।
और चौथे – वह जो गुरु सत्य नारायण गोयन्का जी के भारत और विदेशॊ में फ़ैले विपसन्ना के केन्द्रॊं के माध्यम से आते है ।
इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक वक्ता श्री मुकेश आंनद जी ने  उचित ही कहा जैसे छॊटी –२ नदियाँ अलग-२  चल कर सूख जाती है वैसे ही विभाजित धम्म की परिणित भी लगभग यही होती है । इसके विपरीत अलग-२ नदियाँ चलकर एक स्त्रोत पर आकर गिरती हैं तब वह विशाल सागर का हिस्सा बन जाती हैं । धम्म भी इसी तरह है , भले ही स्त्रोत अलग-२ हैं लेकिन लक्ष्य एक ही है और वह है भगवान्‌ बुद्ध की देशना ।
इस कार्यक्रम के संयोजक श्री राजेश चन्द्रा जॊ और डां पंकज त्यागी जी को साधुवाद जिनकी अथक मेहनत से एक अनूठा संगम देखने को मिला । इस कार्यक्रम के माध्यम से कई विभूतियों से मिलने का अवसर भी मिला जिनमे बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के डां राहुल राज , महारष्ट से आय़ॆ इनकम टैकस कमिशनर श्री सुवचन राम जी , अम्बॆड्कर मिशन से जुडॆ डां कदम और बाकी देश और विदेश से आये अतिथिगण ।
पूँ. भदन्त श्री राहुल बोधि की धम्म देशना मंत्रमुग्ध करने वाली थी । अपनी देशना को समाप्त करते हुये उन्होने सभागार मे बैठे श्रोतागणॊं को विपसन्ना के प्रथम  चरण ‘आना पान ’ का बोध करवाया । कुछ देर के लिये सभागार अपूर्व शांति मे समा गया ।
अब बात  'मध्यम मार्ग ' पत्रिका की
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लखनऊ से प्रकाशित हो रही यह मासिक पत्रिका बुद्ध धम्म के व्यवाहारिक और अनछुये पहलुओं को अपने पाठकों के सम्मुख रखती है । श्री राजेश चन्द्रा जी और श्री पंकज त्यागी जी का यह ड्रीम प्रोजेकट का यह  १३ वाँ अँक है । मात्र ४० / मूल्य की इस पत्रिका का प्रकाशन उच्च कोटि का है और साल भर के अन्दर इसके देश और विदेश मॆं  बढ रहे हिन्दी भाषी पाठकों की संख्या इसकॆ उत्कृष्टा को साबित करती है ।
‘ मध्यम मार्ग ‘ को सबस्क्राईब करने के लिये इनमें से किसी से भी  संपर्क कर सकते हैं :
श्री राजेश चन्द्रा : मो. नं.    09415565633
श्री पंकज त्यागी : मो. न.    09873428709
श्री एम.एल.आर्या : मो. नं.  09415136561



गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को संवारेगी मोदी सरकार

कोपिया
गौतम बुद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कोपिया को केंद्र सरकार संवारेगी। इसके लिए प्रस्तावित बौद्ध परिपथ योजना में कोपिया को भी शामिल किया जाएगा। यहां गौतमबुद्ध ने घर छोड़ने के बाद कौपीन (राजसी वस्त्र) त्यागे थे। समीप में स्थित बखिरा पक्षी विहार की भी दशा सुधार इसे राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का खाका बना है। केंद्र सरकार ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए थीम बेस्ड टूरिजम सर्किट को बढ़ावा देने के लिए स्वेदश योजना लॉन्च की है। इसमें नॉर्थ-ईस्ट इंडिया सर्किट, बुद्धिस्ट सर्किट, हिमालयन सर्किट, कोस्टल सर्किट और कृष्णा सर्किट शामिल हैं। बुद्धिस्ट सर्किट और कृष्णा सर्किट का ज्यादातर हिस्सा यूपी से जुड़ा हुआ है। बुद्ध सर्किट में बिहार के बोधगया, राजगीर, वैशाली से लेकर यूपी में सारनाथ, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर से लेकर नेपाल का लुंबिनी शामिल है। बुद्ध के जन्म से लेकर ज्ञान प्राप्ति, उपदेश, कर्मस्थली से लेकर महापरिनिर्वाण तक सर्किट में कवर होते हैं। इस सर्किट में आने वाले बुद्ध से जुड़े उन स्थलों को भी विकसित करने की योजना है, जो अहम होते हुए भी उपेक्षित हैं।
पर्यटन मंत्रालय ने योजना को प्रभावी बनाने और मॉनिटरिंग बेहतर करने के लिए सांसदों को भी इसका हिस्सा बनाया है। पूर्वांचल से जुड़े बुद्ध के स्थलों के सांसद कुशीनगर से राजेश पाण्डेय, श्रावस्ती से दद्दन मिश्र, संतकबीर नगर से शरद त्रिपाठी, गोरखपुर से महंत योगी आदित्यनाथ भी इस कमिटी में शामिल हैं। पिछले दिनों केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री महेश शर्मा की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में उन स्थलों के चयन और विकास पर सहमति बनी जो बौद्ध सर्किट में छूटे हुए हैं। इसमें कोपिया को भी शामिल किया गया है।
संतकबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी का कहना है कि बौद्ध सर्किट की लगभग 125 करोड़ रुपये की योजना पर्यटन और रोजगार के लिहाज से अहम है। संतकबीर नगर मुख्यालय से मेहदावल रोड पर स्थित कोपिया आगे कपिलवस्तु से जुड़ता है। बौद्धकालीन टीले के साथ प्राचीन शिव मंदिर यहां मौजूद है। टीले के सरंक्षण के साथ यहां गेस्ट हाउस और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव बना है। बौद्ध सर्किट से जुड़ने के बाद श्रीलंका, जापान, चीन के बौद्ध अनुयायियों का यहां आवागमन होगा। साथ ही यहां से पास में स्थित लगभग 30 किमी के बखिरा झील और पक्षी विहार को विकसित कराकर दोनों स्थलों को इंटरलिंक किया जाएगा।
साभार : नवभारत टाइम्स, लखनऊ , दिनांक २३-५-२०१५

Wednesday, May 20, 2015

बौद्ध विहार के लिए लेज़र तकनीक

अंग्रेज़ों ने 19वीं सदी में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास गंधार संस्कृति के एक पुराने बौद्ध विहार को ढूँढ निकाला था. तख़्त-ए-बाही नाम के इस विहार का बचा-खुचा भाग पेशावर के पास स्थित है.
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नई तकनीक से पुराने अवशेषों का उद्धार
गंधार पाकिस्तान के उत्तर पूर्वी इलाके में पड़ता है. गंधार सभ्यता का जन्म सिकंदर के आक्रमण के साथ, यानी 326 ईसापूर्व में हुआ था. ईसा पश्चात की पहली से छठीं सदी के बीच वह अपने उत्कर्ष पर थी. इसी वजह से गंधार में प्राचीन ग्रीक और बौद्ध संस्कृति का मेल दिखाई देता है. बर्लिन में हो रही गंधार कला प्रदर्शनी भी यही रेखांकित करती है. प्रदर्शनी के संचालक क्रिस्टियान लूत्सानिट्स के मुताबिक "इस प्रदर्शनी का उद्देश्य पूरब के गंधार में सिकंदर के प्रभाव से लेकर बामियान तक की मूर्तियों के बीच संबंध दिखाना था. प्रदर्शनी में ग्रीक शैली के सिक्के और मूर्तियां हैं. एक अद्भुत तीरंदाज़ भी है. साथ ही बहुत सारे पुराने स्तम्भ हैं, जिनका इस्तेमाल कब्रों को सजाने में किया जाता था. प्रदर्शनी में वैज्ञानिकों ने थ्री डी, यानी त्रिआयामी तकनीक के उपयोग से बामियान के बुद्ध की उस विरट मूर्तियों को बनाने की भी कोशिश की है, जिसे 2001 में तालिबान ने तोपें दाग कर नष्ट कर दिया था.
लेज़र प्रकाश वाली त्रिआयामी स्कैंनिंग तकनीक के ज़रिए आखन के वैज्ञानिक ने कई मूर्तियों की नकल बनायी है. एक ख़ास तरह के चश्मे से आप उन्हें उनके असली रूप में देख सकते हैं. लूत्सानिट्स बताते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कोशिश में है कि बामियान के बुद्ध का किसी तरह पुनर्निर्माण हो. हमने इसका इलेक्ट्रोनिक रूपांतर बनाया है. (लेकिन सोचने वाली बात यह है, कि सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए शांति की ज़रूरत होती है. जहां लड़ाई होती है, वहां की संस्कृति को भी खतरा होता है.)"
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स्वात घाटी में लड़ाई से सांस्कृतिक धरोहर का भी विनाश हो रहा है
तख्त-ए- बाही वाले पुराने विहार का निरीक्षण वैज्ञानिक एक लेज़र स्कौनर से करेंगे. इससे विहार की बनावट के बारे में उन्हें और जानकारी मिलेगी. पुरतत्वशास्त्री प्रो. मिशाएल यान्सन का कहना है कि "हम इस विहार को नए तरीके से नापेंगे. पारंपरिक तौर पर हम हाथ से नापते हैं. लेकिन हम चाहते हैं कि हमारी सूक्ष्मता सेंटिमीटर से भी ज़्यादा हो."
प्रश्न उठता है कि विश्व संसकृतिक धरोहर के ख़िताब वाली इस निधि की इससे पहले इतनी बारीक़ी से जांच-परख क्यों नहीं हुइ. प्रो. यान्सन के शब्दों में "विश्व धरोहर के साथ यही समस्या है. पैरिस में हमारा प्रलेखन केन्द्र है और वहां जाकर ही पता लगता है कि तकनीकी प्रगति की तुलना में इन पुरानी चीज़ों को कितनी कठिनाई से नापा जा सकता है. अगले कुछ दिनों में आख़न के कुछ वैज्ञानिक तख़्त-ए-बाही पहुंचेंगे और बौद्ध विहार की इमारत को स्कैन करेंगे".
तीन पैरों पर खड़ा होने वाला स्कैनर बहुत कुछ कैमरे जैसा दिखता है. कार्स्टेन ले स्केनर के बारे में बताते हैं कि "स्कैनर अपने आप काम करता है. वह इन पैरों पर घूमता है और पूरी इमारत में लेज़र किरणें भेजता है. इन किरणों के प्रतिबिम्ब से फिर ईमारत के ढांचे का पता लगता है. एक सेकंड में क़रीब 8000 ऐसे मापन बिंदुओं का पता चलता है."
अभी तो यह तकनीक बहुत नई है, लेकिन अगर यह वैज्ञानिक सफल हुए तो इस तरह की तकनीक से और पुरानी धरोहरें हमें एक तरह से वापस मिल सकती हैं.
अप्रैल महीने महीने के अंत में जर्मनी के आख़न विश्वविद्यालय के कुछ वैज्ञानिक गंधार संस्कृति के अवशेषों का उद्धार करने के लिए उनका निरीक्षण करेंगे.
रिपोर्ट- इंगो वागनर / मानसी गोपालकृष्णन
साभार :  http://dw.de/p/HZKe












Friday, May 15, 2015

सागर कवि

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वसन्त ऋतु आते ही बुद्ध और उनका भिक्खु समूह पूर्वी छेत्र मे लौट आये । वह वैशाली और चम्पा मे रुके । नदी किनारे चलते-२ हुये  बुद्ध समुद्र  तट पर आ गये । मछुआरों से अनायास ही भिक्खु संघ का वार्तालाप शुरु हुआ । मान्य आनंद ने उत्सुकतावश मछुआरों से समुद्र के विषय मे अनेक विचार जानने चाहे ।

एक लम्बे और सुन्दर मछुआरे ने आनंद से कहा , “ मुझे समुद्र की कई बाते अच्छी लगती हैं । पहला , इसका बालू का किनारा पानी तक ढलान युक्त होता है जिससे नावें खींच लाने और जाल फ़ेंकने मे सुविधा होती है ।

दूसरे , समुद्र सदैव अपने स्थान पर रहता है जिससे हम जानते हैं कि वह कहाँ मिलेगा ।

तीसरे , समुद्र किसी शव को अपने मे डुवाता नही , उसे तट पर फ़ेंक देता है ।

चौथे , सभी नदियाँ – गंगा , यमुना , अचिरावती , सरयु और माही समुद्र मे आ मिलती है जिसके बाद उनका नाम नही रहता । समुद्र उनको अपने गर्भ मे समा लेता है ।

पांचवे , यधपि नदियाँ दिन रात जल ला कर समुद्र मे पहुंचाती हैं , किन्तु उसका जल स्तर अपनी मर्यादा मे रहता है ।

छ्ठे , समुद्र का जल सदैव हमेशा खारा होता है ।

सातवें , समुद्र मे सुन्दर घॊंघा , सीप , शंख , मोती और मूल्यवान पत्थर होते हैं ।

आठवें  , समुद्र हजारों प्रकार के प्राणियों को अपने मे समाये रखता है जिनमे लम्बे प्राणि से लेकर सूक्ष्मतम  प्राणि तक होते हैं ।

अत: आप समझ ही गये होगें कि हम समुद्र को कितना प्रेम करते हैं । ”

आनंद ने सराहानापूर्ण दृष्टि से मछुआरे को देखा जो मछुआरा होकर भी कवि की भाषा बोल रहा था । आंनद ने बुद्ध से कहा , “  यह व्यक्ति समुद्र को उसी प्रकार प्रेम करता है जैसे कि मै संबोधि के मार्ग को । क्या आप इस संबध मे कुछ शिक्षा देगे ? ”

बुद्ध मुस्कराये और चट्टान पर बैठकर सद्‌धर्म मार्ग की कुछ विशेतायें बताने लगे । वह मछुआरा भी उनके साथ बैठ गया ।

बुद्ध ने कहा , “ हमारे मछुआरे बधुं ने समुद्र की आठ विशेतायें बताई और अब मै अब आपको सच्चे धर्म की आठ विशॆताये बताउगां ।

पहला , धर्म समुद्र के समान नीचे की ओर ढलवां नही होता । सद्‌धर्म मार्ग पर व्यक्ति तभी प्रगति कर सकता है , जब वह सभी प्रकार की मानसिकताओं को समाहित कर सके । युवा या वृद्ध , शिक्षित या अशिक्षित सभी कोई धर्म मार्ग पर चल सकता है । हर व्यक्ति अपनी आवशकताओं के अनुसार साधाना – पद्‌तियों को अपना  सकता है ।

दूसरे , समुद्र की भांति धर्म भी अपने स्थान पर रहता है । धर्म शिक्षाओं के सिद्धांत कभी नही बदलते । शीलों को स्पष्ट रुप से समझा और सम्झाया जा सकता है । कोई भी व्यक्ति कही भी धर्म के सिद्धांतों का अध्यन्न और शीलों का पालन करके कही भी साधना कर सकता है । धर्म न कही जाता है और न कभी गुम हो सकता है ।

तीसरे , समुद्र जैसे शव को अपने गर्भ में नही रखता , उसी प्रकार धर्म अज्ञान , आलस्य या शीलाचार को भंग करना सहन नही करता । साधना न करने वाला व्यक्ति अन्तत: स्वयं को समुदाय से बाहर निकाल पाता है ।

चौथे , समुद्र सभी नदियों को समान रुप से आत्मसात्‌ कर लेता है , इसी प्रकार सद्‌धर्म सभी जातियों को समान रुप से अपनाता है । समुद्र में मिलने के बाद नदी का नाम समाप्त हो जाता है , इसी प्रकार सद्‌धर्म पर चलने वाला व्यक्ति अपनी जाति , वंश और पूर्व पद सभी त्याग कर मात्र भिक्खु रह जाता है ।

पांचवे , जैसे समुद्र का जल सदैव एक समान रहता है , समुद्र अपनी मर्यादा मे रहता है , सद्‌धर्म भी एक ही स्तर पर रहता है , चाहे उसके अनुयायी की संख्या कम हो अथवा अधिक । धर्म को शिष्यों की संख्या से नही नापा जा सकता ।

छ्ठे , समुद्र का जल हमेशा खारा होता है । अनगिनत मार्गों और अनगिनत साधन – पद्‌तियों के होने के बावजूद धर्म का एक ही स्वाद होता है और वह स्वाद है – मुक्ति का आनंद । यदि धर्म शिक्षाओं से मुक्ति न मिले तो वह सच्ची शिक्षा नही है ।

सांतवे , समुद्र में शंख , मोती और मूल्यवान रत्न होते हैं तो धर्म में भी ऊद्र्गामी और मूल्यवान  शिक्षायें यथा चार आर्य सत्य , चार विशुद्ध साधनायें , पांच गुण , पांच शक्तियाँ . आत्म जागृति के सात चरण और श्रेष्ठ मार्ग होते हैं ।

आठवें , समुद्र हजारों जीवित प्राणियों को शरण देता है तो धर्म भी सभी को अपनी शरण मे ले लेता है , फ़िर वे अशिक्षित बच्चे हों या बोधिसत्व हों । धर्म के असंख्य अनुयायी हैं जिन्होनें जन्म मृत्यु की धारा मे प्रवेश  , प्रथम प्रत्यागत , प्रत्यागथीन अवस्था और  अर्हत  पदों के पुण्य फ़ल पाये हैं ।

“ इस प्रकार समुद्र के समान सद्‌धर्म भी प्रेरणा का और अपरिमित संपदा प्राप्त करने का स्त्रोत है । ”

मान्य आनंद ने हाथ जोडकर बुद्ध की ओर देखा और कहा  , “ प्रभु , आप महान अध्यात्मिक गुरु तो हैं ही और साथ भी एक अच्छे कवि भी हैं । ”

संकलन : जहं जहं चरन परे गौतम के ‘ तिक न्यात हन्ह ’ प्रकाशन - हिन्द पाकेट बुक्स

Wednesday, April 29, 2015

चीन : दान से बना है दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध रिहायशी स्कूल

 
 
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बीजिंग. चीन के चेंगदू से करीब 600 किमी दूर यह स्कूल 1980 में एक इमारत में शुरू हुआ था। अब फैलकर कस्बे में बदल गया है। कस्बे का निर्माण सिर्फ दान से हुआ है।
नाम है लारुंग गार बुद्धिस्ट एकेडमी। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिहायशी बौद्ध स्कूल है। यहां पर तिब्बत के पारंपरिक बौद्ध शिक्षा का अध्ययन करने के लिए कई देशों से बच्चे आते हैं। यहां सभी घरों के रंग लाल और भूरे हैं। लड़के-लड़कियों के रहने वाले इलाकों को सड़कों से बांटा गया है।
बुद्धिस्ट एकेडमी के कुछ तथ्य :
40,000 छात्र रहते हैं यहां पर
12,500 फीट ऊंचाई पर बसा है
टीवी देखना यहां पर बैन है, लेकिन स्मार्टफोन की अनुमति है
ज्यादातर बच्चों के पास सेकंड हैंड आईफोन जरूर मिल जाएगा
साभार : http://infomerciallist.com/detail.html?query=Largest-Buddhist-academy-Larung-Gar-which-made-up-of-monks-help-of-Donation







Tuesday, April 28, 2015

बुद्ध की एक मूर्ति के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी ।

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नीदरलैंड में ड्रेंथे के ऐतिहासिक संग्रहालय के कर्मचारियों ने एक चौंकाने वाला आविष्कार किया है।

बैठे हुए बुद्ध की एक चीनी प्रतिमा के अंदर भिक्षु की ममी पायी गयी। इस का पता तब चल गया जब मूर्ति की बहाली करते वक्त उसको एक सीटी स्कैनर में रखा गया। अब यह प्रतिमा बुडापेस्ट के एक संग्रहालय में प्रदर्शित की जा रही है जहां वह 2015 के मई तक प्रदर्शित रहेगी।
शोधकर्ताओं ने टोमोग्राफी के समय प्राप्त छवियों में एक ममी को देखा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ममी चीनी भिक्षु  लूत्सुआन की है जिसकी मौत 1100 ईस्वी के आसपास चीन में हुई थी। प्रतिमा की जांच करते वक्त इस बात का पता लगाया गया कि ममीकरण के समय शरीर के आंतरिक अंग हटाये गये थे जिसके बाद उसको कागज़ के छोटे छोटे टुकड़ों से भर गया, जिन पर प्राचीन चीनी अक्षर लिखे हुए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि भिक्षु की ममी ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी में बनायी गयी थी। यानी वह लगभग एक हजार साल पुरानी है।

साभार  : http://hindi.sputniknews.com/vishv/20150302/1013625844.html#ixzz3YZB33HmI

Sunday, April 26, 2015

टाइगर नेस्ट बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री ,भूटान

टाइगर नेस्ट बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री ,भूटान 
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टाइगर'स नेस्ट बुद्धिस्ट भूटान में पारो वैली में एक सीधे पहाड़ की चोटी पर स्थित है। और यह मोनेस्ट्री समुद्र तल से 3,000 मीटर ऊपर है ,यह मोनेस्ट्री को पहली बार 1692 में बनाया गया था,कहा ऐसा जाता है यह वह स्थान पर बनी है जहा बौद्ध गुरु पद्मसंभव ने 8 वीं सदी में तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन तक ध्यान किया था और वही स्थान पर यह मोनेस्ट्री है। भूटान में यह मान्यता है की हर भूटानी व्यक्ति को कम से कम एक बार इस स्थान पर आना ही चाहिए ,बौद्ध गुरु पद्मसंभव को ही भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार का श्रेय जाता है
साभार : http://buddhkathaiye.blogspot.in/



Saturday, April 25, 2015

दो पल शांति के ….

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यह देखने की बात है कि कहानियों के मूल तत्व को कौन किस रुप मे लेता है। मेरी पिछ्ली कहानी , “ जो हो चुका , सो हो चुका “ को ही लें । पर्थ मे मैने यह कहानी एक सभागार में श्रोतागणॊ को सुनाई । उसके अगले ही दिन एक कम उभ्र के लडके के माता – पिता बहुत ही क्रोध मे भरे हुये मेरे पास आये और बोले कि यह आप कैसी कहानियाँ सुनाकर लोगो को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । कल शाम को जब  मेरा लडका  अपने मित्रों के साथ घूमने  को जाने के लिये निकला तब मैने उससे पूछा कि क्या तुमने अपना होम वर्क पूरा कर लिया है । वह कहने लगा , “  डैड , कल आपने विहार में अजह्न्ह ब्रह्म को सुना होगा , उन्होने ही कहा था ‘ जो हो चुका है वह समाप्त हो गया । ’
मै एक और कहानी से पिछ्ली कहानी को समझाने की कोशिश करता हूँ ।
आस्ट्रेलिया मे अधिकतर लोग घरों में बगीचे का प्रावाधान अवशय  रखते हैं । लेकिन कुछ ही लोग हैं जो उस बगीचे में अपने लिये दो पल सूकून का निकाल पाते होगें । अधिकतर लोगों के लिये बगीचा सिर्फ़ कार्य करने की जगह मात्र हैं । मै अधिकतर लोगों को सलाह देता हूँ वह अपने बगीचे की सुन्दरता  के लिये उसका पालन  पोषण अवशय  करे लेकिन उसके साथ ही अपने दिल के पालन पोषण के लिये अपने बाग मे कुछ देर शांति से बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता का आनन्द अबशय लें ।
अब देखे कि चार गृहस्थ  मालियों ने इस वक्तत्व को  कैसे  समझा ।
पहले माली ने सोचा कि पहले बचे हुये सारे कामों को  निपटा लें उसके पश्चात शांति से दो पल बगीचे में बैठेगे । आखिरकार बाग की कटाई करनी थी , पौधो मे पानी देना था और पत्तियों और झाडियों की छ्टाई भी करनी थी । उसके बाद जो समय बचेगा उसमें शांति के दो पल ढूंढ लेगें । लेकिन उसका काम अन्त तक समाप्त नही हुआ इसलिये उसके  शांति और सूकून के दो पल नही मिल पाये । वैसे आपने भी अपनी संस्कृति मे देखा  होगा कि जो लोग शांति की तलाश करते रहते है उनकी तलाश कब्र मे ही जाकर पूरी होती है ।
दूसरा माली पहले माली से अधिक चतुर निकला । उसने कताई और छ्टाई के औजारों को किनारे किया , पानी के  डिब्बों को एक तरफ़ रखा और आराम से एक कुर्सी में बौठकर  अपनी मन पसंन्द पत्रिका को पढने लगा । लेकिन यह तो पत्रिका को पढने का आनंद लेना था , सूकून उससे कोसों दूर था ।
तीसरे माली ने बागवानी के सारे औजार , पत्रिकायें , समाचार पत्र को किनारे रखा और  दो सेकन्ड के लिये बाग में शांन्ति से बैठ गया । कुछ ही देर बाद उसने सोचना शुरु किया , “ अब मुझे इस मैदान कि लवाई शुरु कर देनी चाहिए , झाँडियां की भी कँटाई – छ्टाई करनी है और अगर मै इन पौधॊ को पानी नही दूँगा तो यह फ़ूल तो मुर्झाने की कगार पर खडे हो जायेगें । ” उसके शांति और सूकून के पल विचारों और योजना बनाने मे ही निकल गये । लेकिन हाँ , शांन्ति नही मिली ।
चौथा माली ने विचार किया , “ चलो काफ़ी काम हो गया है , कुछ देर सूकून से बैठते हैं। हाँलाकि , झाडियों और पेडो की कटाई – छ्टाई करनी है , लेकिन यह सब तो बाद मे भी हो जायेगा लेकिन अभी यह सब काम बिल्कुल नही …। ”
मेरी नजर मे चौथा माली ही समझदार निकला , हाँलाकि वह यह जानता था कि उसका बाग अभी परिपूर्ण नही है लेकिन इसके बावजूद वह आगे की न सोचकर , जो हो चुका है उसमे संतोष कर पाया ।
जीवन के परिपेक्ष मे इसको देखें , जो काम आगे का रह गया है , इसकी व्यर्थ मे चिंता न कर के जो हो चुका है उसमे संतोष और आनन्द ले तब ही जीवन मे वास्तविक शांन्ति पा सकते हैं । अगर हम अपनी और दूसरों की कमियों को देखते रहेगे और अगर हम जीवन को हमेशा व्यवस्थित करने मे अपनी उर्जा लगायेगे तो हमे सूकून के उन पलो का हमेशा अभाव रहेगा ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ the idiot’s guide to peace of mind ” का हिन्दी अनुवाद ।
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Friday, April 24, 2015

सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना

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एक पहाडी गाँव के अशिक्षित वृद्ध को पहली बार शहर आने का मौका मिला । उसकी पूरी जिन्दगी दूरदराज के पहाडी गाँव मे बीती । बचपन उसका तकलीफ़ों मे बीता , अपने बच्चॊं को पाल पोस के बडा किया और जब उसके बच्चे शहर मे बस गये तो उनके अनुरोध पर वह पहली बार उनके नये घर को और उनकी रहन सहन को देखने शहर की ओर चल पडा ।
एक दिन उस नये शहर मे घूमते हुये उसने दूर से आती हुई बहुत ही कर्कश आवाज सुनी । उसने ऐसी कर्कश आवाज अपने शांत पहाडी गाँव मे पहले कभी नही सुनी थी । उसका मन   उस आवाज के स्त्रोत को जानने का हुआ । आवाज का पीछा करते-२ वह एक कमरे कॆ पीछे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक बच्चे को वाइलन बजाते देखा । “ हाँ, फ़टी सी यह बेसुरी आवाज इसी यंत्र से आ रही है । ”   उसने सोचा ।
उसके पुत्र ने उसको बताया कि यह यंत्र “ वाइलन “ है तब उस वृद्ध ने यह निर्णय किया कि वह इस भयंकर से यंत्र को कहीं भी सुनना नही चाहेगा ।
अगले ही दिन उसको शहर के दूसरे हिस्से मे जाना पडा । एक बार फ़िर से उसे एक दूर सॆ आती हुई आवाज सुनने को मिली । उसको लगा कि  उसके वृद्ध कानॊ को कोई पुचकार और दुलार रहा है । ऐसी मीठी और सुरीली आवाज उसने अपने पहाडी घाटियों मे भी नही सुनी थी । आवाज के उद्‍गम को जानने के लिये वह एक घर के आगे के हिस्से मे पहुँचा जहाँ उसने एक वृद्ध महिला को वही यंत्र वाइलन को बजाते देखा ।
तत्काल ही उस वृद्ध को अपनी गलती का एहसास हो गया । एक दिन पहले जो उसने कर्कश आवाज सुनी थी , उसमे न तो वाइलन और  न ही उस बच्चे  का  दोष था । दोष  सिर्फ़ इतना ही था कि उस बच्चे को अभी वाइलन बजाना सीखना था ।
वह वृद्ध सोच मे पड गया । उसको लगा कि  साधारण से दिखने वाला यही  दोष तो सभी धर्मालम्बियों  के साथ  है । जब कुछ अति धार्मिक उत्साही अपनी –२ आस्था को कलह का कारण बनाते हैं तो क्या धर्म को दोष देना उचित है ? यह सिर्फ़ इतना ही है कि यह नौसीखिये अपने धर्म को ठीक से जान और समझ ही नही  पाये ।  दूसरि तरफ़ जब हम ऐसे संत और महापुरुषों से मिलते हैं जो अपने धर्म के सही जानकार हैं तब भले ही हमारी आस्थायें अलग-२ हों लेकिन उन धर्मॊ की छाप हमारे मन: पटल पर हमेशा बनी रहती है ।
… लेकिन इस  वृद्ध मनुष्य और वाइलन की कहानी का अंत अभी नही हुआ था ।
तीसरे दिन शहर के दूसरे हिस्से मे उस वृद्ध को ऐसी आवाज सुनने को मिली जो अपने मे अनोखी थी , उसकी मिठास वाइलन से भी बढकर थी । क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वझ आवाज किसकी थी ?
इस आवाज की मधुरता  बसंत ऋतु मे पहाडॊ से बहने वाले झरने से भी बढकर थी , उसकी कोमलता का एहसास शरद ऋतु मे जंगलो मे पेडो के माध्यम से बहनॆ वाली हवा से भी अधिक था , पहाडॊ मे भारी बारिश के बाद चिडियों के चहचहाने की आवाज भी उस आवाज के आगे शून्य थी और यहाँ तक सर्द जाडॊं की रातों मे पहाडॊं की नीरवता और शांति भी उस आवाज के आगे कुछ भी नही थी । आखिर वह कौन सी आवाज थी जिसने उस इन्सान के दिल को छू लिया ?
वह एक विशाल आर्केस्ट्रा कॆ सुरों का संगम था जहाँ वाइलन भी था और अलग –२ सुर यंत्र भी । लेकिन अलग –२ सुर यंत्रॊं के होते हुये भी वह एक लय मे थे । उस आर्केस्ट्रा  का हर सदस्य अपने मे निपुण और पारखी था । लेकिन इसके बावजूद उन्होने यह सीखा था कि मिल कर कैसे सुर दे सकते हैं ।
“ क्या सारे धर्मों के मतालम्बी  साथ रहकर यह नही कर सकते ? ” उस वृद्ध ने एक बार सोचा । “ वह अपने –२ धर्मों को सही और परिपूर्ण रुप से जानें और उसके बाद मनन करें कि उनके धर्म का निचोड ‘ मैत्रीभावना और प्यार ’ से बढकर अधिक कुछ भी नही है । एक बार अपने धर्म को समझने के बाद आगे बढे और आर्केस्ट्रा के सदस्यों की तरह अलग-२ धर्मॊ के मतालम्बियों के साथ रहने की कला को सीखें । ”
शायद तभी सार्थक और सबसे सुंदर ध्वनि की संरचना की जा सकती है ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ The most beautiful sound” का हिन्दी अनुवाद ।

Tuesday, April 21, 2015

मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी धरोहरें

Buddha in mathura

देश-दुनिया में कृष्ण की जन्मभूमि के तौर पर पहचाने जाने वाले मथुरा में भगवान बुद्ध से जुड़ी कई धरोहरें मौजूद हैं। बताया जाता है कि टीलों पर बसे मथुरा में ही बुद्ध की पहली मूर्ति बनी थी। लाल बलुआ पत्थर से बनीं शैव, बौद्ध व जैन धर्मों से जुड़ी कई मूर्तियां यहां के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यहां कुषाण और गुप्तकालील मथुरा शैली की कलाकृतियों के साथ ही सिक्के, लघुचित्र, धातुमूर्ति, काष्ठ और स्थानीय कला के ढेरों दुर्लभ रत्न सहेज कर रखे गए हैं।

राजकीय संग्रहालय मथुरा के  सहायक निदेशक डॉ. एसपी सिंह, के अनुसार कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी। इसके बाद दूसरी जगहों पर भी बुद्ध की मूर्तियां बनने लगीं।

संग्रहालय के पूर्व विथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा के अनुसार शुरुआत में मूर्तिकला की सिर्फ दो ही शैलियां प्रचलित थीं, मथुरा मूर्ति कला और गांधार मूर्तिकला। बुद्ध से जुड़ी मूर्तियां भी सबसे पहले इन्हीं शैलियों में बनीं। ढाई फीट ऊंची और डेढ़ फीट चौड़ी बुद्ध की पहली मूर्ति 1860 में कटरा केशव देव मंदिर खुदाई के दौरान मिली।

1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खोदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थिज जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में संग्रहालय की स्थापना की। 1933 में संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया।

Wednesday, April 15, 2015

अब विपशयना दिल्ली के स्कूलों मे …

11078092_761363700645599_2930296267140671168_nदिल्ली सरकार के गवर्नमेंट स्कूलों के टीचर्स को अब एक नई ट्रेनिंग से गुजरना होगा। सरकार ने फैसला किया है कि गवर्नमेंट स्कूलों के टीचर्स को विपश्यना (मेडिटेशन) ट्रेनिंग करनी होगी और दस दिन के कोर्स को पूरा करने के बाद टीचर्स अपने स्टूडेंट्स को टेंशन फ्री रहने और सामाजिक बुराइयों से दूर रहने के गुर सिखाएंगे। शिक्षा निदेशालय ने मंडे शाम को विपश्यना ट्रेनिंग को लेकर सर्कुलर जारी कर दिया है। टीचर्स को इस ट्रेनिंग के लिए कोई खर्च नहीं करना होगा। दस दिन की ट्रेनिंग के दौरान टीचर्स को ऑन ड्यूटी माना जाएगा, साथ ही विपश्यना साधना संस्थान से सर्टिफिकेट हासिल करने वाले टीचर्स को टीए-डीए भी मिलेगा।
डिप्टी सीएम और एजुकेशन मिनिस्टर मनीष सिसौदिया ने बताया कि विपश्यना ट्रेनिंग का मकसद एजुकेशन में सुधार लाना है। यह साइंटिफिक मेडिटेशन टेक्निक है और इससे स्कूल टीचिंग को और बेहतर बनाया जा सकेगा। स्कूलों का माहौल भी बदलेगा। डिप्टी सीएम का कहना है कि सरकार का यह दायित्व है कि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अच्छे नागरिक बनें और इसके लिए जरूरी है कि पॉजिटिव माहौल बनाया जाए और टीचर्स भी क्लासरूम टीचिंग में नए-नए एक्सपेरिमेंट करें। विपश्यना स्वयं का निरीक्षण करने की पद्धति है और निश्चित तौर पर इस ट्रेनिंग को करने के बाद स्कूलों का माहौल बदलेगा। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा टीचर्स इस ट्रेनिंग को करें और ट्रेनिंग का पूरा खर्चा दिल्ली सरकार उठाएगी। पढ़ाने के तौर-तरीकों में बदलाव आएगा। डिप्टी सीएम का कहना है कि अभी तो सरकारी स्कूलों के टीचर्स के लिए यह ट्रेनिंग शुरू की गई है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों को भी इस बारे में एडवाइजरी जारी की जाएगी, ताकि उन स्कूलों के टीचर्स भी इस ट्रेनिंग को करने के लिए आगे आ सकें।
देश के कई शहरों में टीचर्स को इस तरह की ट्रेनिंग करवाई जा रही है ताकि वे अपने स्टूडेंट्स को शांत रहने के तरीके सिखा सकें। बढ़ता तनाव स्टूडेंट्स पर भी भारी पड़ रहा है और विपश्यना ट्रेनिंग करने के बाद टीचर्स क्लासरूम टीचिंग में नए एक्सपेरिमेंट कर सकेंगे और स्कूल में स्टूडेंट्स के ओवरऑल डिवेलपमेंट के मकसद को हासिल किया जा सकता है। शिक्षा निदेशालय के सर्कुलर में कहा गया है कि एजुकेशन का मतलब केवल क्लासरूम में कोर्स की पढ़ाई करवाना ही नहीं है, बल्कि स्टूडेंट्स को एक अच्छा नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी स्कूल पर होती है। ऐसा देखा जा रहा है कि आजकल की गला-काट प्रतियोगिता के इस दौर में स्टूडेंट्स तनाव का शिकार हो रहे हैं। इसके लिए विपश्यना जैसी ट्रेनिंग भी जरूरी है। यह कोई तंत्र-मंत्र पर आधारित टेक्निक नहीं है। इस टेक्निक के बारे में डॉ. रमेश कुमार ने बताया कि यह साधना पद्धति है और स्वयं को जानने की कोशिश होती है।

Friday, April 10, 2015

जो हो चुका सो हो चुका

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थाइलैंड मे मानसून का समयकाल जुलाई से अक्टूबर तक चलता है । मानसून के समय के दौरान अकसर भिक्खु यात्रायें करना बन्द कर देते हैं , अपने सारे कार्यों को एक तरफ़ रखकर  अपना अधिकतर समय अध्यन्न और ध्यान को समर्पित करते हैं । मानसून का  इस समयकाल को वर्षा वास  भी कहा जाता है ।
कुछ वर्ष पहले थाइलैंड के दक्षिण भाग मे एक प्रसिद्ध बौद्ध मठाधीश जंगल के एक मठ में एक सभागार ( हाल ) का निर्माण करवा रहे  थे । वर्षा वास के आते ही उन्होने सारे  कार्यों को रुकवा दिया और निर्माणकर्त्ता और श्रमिकों को अपने - २ घर जाने के लिये कहा ।  वर्षा वास का यह समय बौद्ध विहार के लिये अद्‍भुत शांति का समय था ।
कुछ दिन बाद एक आंगुतक का आगमन मठ मे हुआ । जब उस आंगुतक की नजर मठ के अधूरे निर्माण की तरफ़ पडी तो उसने  उतसुकतावश मठाधीश से पूछा कि सभागार का यह  निर्माण कार्य कब समाप्त होगा । एक क्षण रुके बगैर उस वृद्ध भिक्खु ने कहा  , “ सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है । ”
“ आप कहना क्या चाहते हैं , सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है ? ” आंगुतक ने उत्तर दिया । “ न तो इस सभागार मे छ्त है , न दरवाजे और न ही खिडकियाँ । और तो और इस सभागार मे चारों तरफ़ लकडी और सीमॆट के बोरे बिखरे पडे है । क्या आप इनको यही छोड देगें ? मुझे लगता है कि महाशय आप का मानसिक संतुलन ठीक नही है । इसके बावजूद भी आप कहते हैं कि ‘ सभागार का कार्य समाप्त हो चुका है ’ ? ”
उस विहार के वृद्ध मठाधीश ने मुस्कारा कर और मृदुता से कहा , “  जो हो चुका है , वह समाप्त हो चुका है ।” और यह कहते ही  वह ध्यान कक्ष मे चले गये ।
विराम करने का मेरी नजर मे सिर्फ़ यही एक तरीका है , नही तो इस व्यस्त जिंदगी में कोई भी कार्य कभी भी समाप्त नही होता ।
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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे से ली गई कहानी “ What’s done is finished ” का हिन्दी अनुवाद ।

Thursday, February 26, 2015

‘पचमढ़ी’ में पांडव गुफ़ाये या बौद्ध स्तूप ?

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DSCN3034अब स्तूप हो , ध्यान करने की उचित जगह तो ध्यान मुद्रा में बैठने का कैसे लोभ छोड दे Smile भले ही वह फ़ोटॊ सेशन के लिये ही हो Smileऊपर मै स्वयं और नीचे मेरा पुत्र ‘आयुष’
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गत अक्टबूर में पंचमढी में कुछ दिन बिताये । पचमढ़ी में आपके घूमने की शुरुआत पांडवों की गुफा से होती है। यहाँ कहते हैं कि महाभारत काल की मानी जाने वाली पाँच गुफाएँ है जिनको पांडव गुफ़ायें के नाम से भी जाना जाता है । लेकिन पुरातत्वविद मानते हैं कि ये गुफाएँ गुप्तकाल की हैं जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने बनवाया था। ( ऊपर देखें पुरातत्वविभाग का साइन बोर्ड ) ।  गुफ़ा क्रमांक तीन मॆ एक उत्कीर्ण अभिलेख है जिसमॆ लिखा है ‘ उत्कीर्ण भगवकेण ‘ अर्थात यह गुफ़ा भगवक नाम के व्यक्ति ने बनाई थी जो संभवत: बौद्ध भिक्षु था । इसके आधार पर इसका निर्माण गुप्त काल ( चौथी या पाँचवी शताब्दी ई. ) में हुआ होगा । इसके अलावा गुफ़ा क्रमांक नं. २ के सामने वाले भाग में साधारण चैत्य देखा जा सकता है । इसी के आधार पर संभवत: यह बौद्ध धर्म से संबधित हो सकती है ।
बहराल जो भी सच हो लेकिन यह एक बेहद दर्शनीय स्थल है जिसको मध्य प्रदेश टूरिज्म ने संर्क्षित किया है ।

Sunday, February 8, 2015

बातूनी कछुआ ( the talkative tortoise )

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जीवन मे कम और मतलब की बात बोलना हमे अपने आंरभिक दिनो से ही  सीख लेना चाहिये ताकि आने वाले समय मे हम उससे उठने वाली तमाम विपत्तियों से बच सके । मोनेस्ट्री मे आने वाले बच्चॊ  को मै अकसर यह कहानी सुनाता हूँ । कहानी के माध्यम से मै उनको यह सीख देना चाहता हूँ कि बेमतलब और फ़िजूल का बोलना अकसर कितना अधिक अनर्थकारी हो जाता है ।

बहुत समय पहले की बात है कि एक पहाडी झील मे एक बहुत बातूनी कछुआ रहता था । वह इतना अधिक बातूनी था कि झील मे रहने वाले उसके  साथी सहचर जीव  उसको देखते ही कन्नी काट लेते । उसकी बात करने की हद इतनी अधिक थी कि सुनने वाला  थक जाता , बोर हो जाता और यहाँ तक चिढ भी जाता । सहचर जीवो को अचरज होता कि उसका यह साथी बिना रुके कैसे बात कर लेता है । कभी-२  उनको लगता कि यह कछुआ शायद अपने कान का प्रयोग सुनने की बजाय बोलने के लिये ही करता है । उसके बातूनी पन की हद इतनी अधिक थी कि खरगोश उसको देखते ही बिल मे छुप जाते , चिडयाये पेडॊं की शाखाओं से उड जाती  और यहाँ तक मछलियाँ चट्टानों के पीछे छुप जाती ।

जाहिर है यह बातूनी कछुआ अपनी आदतों के कारण अकेले ही रह्ता था ।

हर साल की तरह गर्मियों मे सफ़ेद हंसों का जोडा अपना अवकाश बिताने उस पहाडी झील पर आता था । वह दयालु प्रवृति के थे क्योंकि वह बातूनी कछुये को बोलने की पूरी अनुमति देते थे या उनको यह भी लगता कि उनका प्रवास  कुछ माह के लिये ही है ; इसलिये मेजबान को नाराज करना अच्छी बात नही है । बातूनी कछुये को तो उनका साथ बहुत ही अच्छा लगता । वह उनके साथ तब तक बाते करता जब तक तारे ओझल न हो पाते और रात बीत न जाती ।

गर्मियाँ सामाप्त होने लगी और दिन सर्द होने लगे । हंसो के जोडे ने भी तय किया कि वह अब अपने घर को लौट चलेगें । यह सुनते ही बातूनी कछुये की आँखों मे पानी भर आया । उसको सर्दियों से चिढ भी थी और अपने मित्रों का जाने का गम भी था ।

“ काश मै भी तुम्हारे साथ जा पाता “ बातूनी कछुये ने गहरी साँसे भरते हुये कहा । “ कभी-२ जब ढलानॊ और पानी पर बर्फ़ जम जाती है तब मुझे बहुत ही ठंड लगती है और मै अपने आप को बहूत ही अकेला महसूस करता हूँ । हम कछुये उड नही सकते और धीमा चलने के कारण इधर उधर दूर नही जा सकते । “

दयालु हंस कछुये की दुख भरी बातों को सुनकर द्रवित हो गये और उन्होने कछुये से कहा “ हम तुहारे लिये एक प्रस्ताव रखते हैं । हम तुमको अपने साथ ले जाने के लिये तैयार हैं लेकिन तुमको भी एक वचन देना होगा । “

“ हाँ ! हाँ !  मै वचन देता हूँ ! “ कछुये ने उत्साह मे कहा , हाँलाकि वह यह नही जानता था कि प्रस्ताव क्या है । “ हम कछुये वचनॊ के बहुत पक्के होते हैं । मुझे याद है कि कुछ दिन पहले मैने खरगोश को वचन दिया था कि मै कछुओं कॆ अलग –२ प्रकार के खोलों के बारे मे जानकारी दूँगा और जब उन खरगोशॊ ने  ………..”

एक घंटा बीत गया , जब बातूनी कछुये ने बोलना बंद किया और हंसों को बोलने का मौका मिला , तब उन्होने कछुये से कहा , “ तुमको यह वचन देना होगा कि तुम अपना मुँह बन्द रखोगे । “

“ बहुत आसान है !!” बातूनी कछुये ने कहा । “ वास्तव मे कछुये ही अपना मुँह बन्द रखने के लिये जाने जाते हैं । हम बहुत कम ही बोलते हैं । यही बात कुछ दिन पहले मै एक मछ्ली को समझा रहा था ………”

एक घंटा और बीत गया , जब कछुआ साँसे लेने के लिये रुका , तब हंस ने कछुये से कहा कि अगर वह अपने दांतो से  लकड़ी की डंडॆ को बीच से पकड़ ले, तो डंडॆ के दोनों किनारों को हंस अपने मुंह में दबा कर उड़ जाएंगे। लेकिन शर्त यह है कि कछुआ अपना मुँह बन्द रखेगा ।

तब एक हंस ने लकडी  के डंडॆ को  एक किनारे औए दूसरे ने दूसरे किनारे से पकडा । लेकिन अपने पंखों को जोर से फ़डफ़डाने का परिणाम कुछ भी न निकला। बातूनी कछुआ बहुत ही वजनी जो था । अकसर जो लोग अधिक बोलते हैं वह खाते भी खूब हैं । और यह कछुआ तो इतना वजनी था कि वह अपने खोल को भी बहुत कठिनाई से संकुचित कर पाता था ।

अब की बार हंसो ने हल्के वजन की डंडी ली । एक बार फ़िर से उसी प्रक्रिया को दोहराया । लकडी के डंडॆ के दोनों सिरों को अपनी चोंच से  और डंडॆ के बीच के हिस्से को कछुये ने अपने दांतों से दबाया । इस बार हंसों का अपने परों को जोर से फ़डफ़डाना काम आ गया ।

इतिहास मे पहली बार कोई कछुआ आसमान मे उड रहा था ।

और इस तरह उनकी यात्रा शुरु  हुई। वे बहुत ऊँचा  उड़ते हुए पहाड़, खेत, मैदान के ऊपर से जा रहे थे।  बातूनी कछुये की पहाडी झील , ऊँचे पर्वतों की श्रंखलाये अब बहुत छॊटी सी नजर आ रही थी । बातूनी कछुआ आसमान मे वह नजारे देख रहा था जिसकी कल्पना आज तक किसी भी अन्य कछुये ने नही की थी । वह यह सब अपनी यादों मे सुरुक्षित रखना चाहता था ताकि वह घर पहूँचने पर अपने साथियों को भी बता सके ।

पर्वतों की श्रंखलाये अब दिखना बन्द हो चुकी थी । मैदानी इलाके नजर आने लगे थे । सब कुछ सही चल रहा था , दोपहर के तीन बज रहे थे और उनकी यह यात्रा का दौर अब एक स्कूल के ऊपर से गुजर रहा था । स्कूली बच्चॊ के झुंड मे से एक बच्चे की नजर आसमान मे उडने वाले जीवों पर पडी । वह चिल्लाया , “ देखो देखो !!..जल्दी  आओ !  ऊपर देखो इस बेवकूफ़ कछुये को …ऊडने वाला बेवकूफ़ कछुआ “

यह सुनते ही  कछुये को तो बहुत गुस्सा आने लगा । वह अपने आप को रोक न पाया और चिल्लाया “ किसने मुझे कहा … बे… वकू..फ़..! “

धडाम की आवाज आई और बेचारा कछुआ अपनी मूर्खता और बेसब्री से जमीन पर गिरते ही मर गया ।

बातूनी कछुआ का अंत इसलिये हुआ क्योंकि वह अपना मुँह उस समय बन्द नही कर पाया जब उस की वाकई मे जरुरत थी । जीवन के परिपेक्ष मे इसको इसी प्रकार देखे । उतना ही बोलें जितनी समयनुसार जरुरत हो , बिलावजह  बोलना आपको वैसे ही मुसीबत मे डाल सकता है जैसे उस बेचारे कछुये को डाल गया ।

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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the talkative tortoise ” का हिन्दी अनुवाद ।

Sunday, January 18, 2015

कार्य–कारण का सिद्धांत ( The Law Of Karma )

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पशचिम मे बहुत से लोग कार्य-कारण के सिद्धांत को गलत ढंग से समझते हैं । अधिकतर लोग उसको भाग्यवाद से जोडते हैं जहाँ एक व्यक्ति या उसके  परिवार को उसका दंड उसकी पिछ्ली जिन्दगी मे किये अज्ञात गलत कर्मो के कारण  भोगना पडता है । जब कि ऐसा बिल्कुल भी नही है जैसे इस कहानी से स्पष्ट है ।

मैने सुना है कि दो औरतों मे केक बनाने की एक प्रतियोगिता हुयी ।

उनमे से पहली औरत के पास जो केक बनाने की सामग्री थी उसको देखकर यह बिल्कुल भी नही लग रहा था कि वह इस प्रतियोगिता के लायक है । पुराना सा दिखने वाला मैदा , कोलेस्ट्रॉल युक्त बासी मक्खन ,  गाँठ युक्त चीनी (   गीला चमच्च डाल देने के कारण ) , फ़लो के नाम पर थोडॆ बहुत सख्त किशिमिश। और   उसकी रसोई के तो कहने ही क्या , हर चीज अस्त – व्यस्त बिल्कुल विशव युद्ध की याद दिलाती हुई ।

दूसरी औरत  पहले औरत से बिलकुल विपरीत स्वभाव कीथी ।  सब कुछ व्यवस्थित , उच्च क्वालिटी की  सामाग्री ,  उच्च स्तर का मैदा , कोलेस्ट्रॉल रहित मक्खन , कच्ची चीनी और यहाँ तक कि रसीले दार फ़ल जो उसने अपनी बगिया मे उगाये थे । उसकी रसोई एक मिसाल थी , सारे मार्ड्न गैजडस उसकी रसोई मे मौजूद थे ।

बता सकते हैं कि किस औरत ने सबसे अच्छी केक बनाई ?

यह आवशयक नही कि जिस व्यक्ति के पास  उच्च स्तर की सामग्री हो वह ही बेहतर केक बना सकता है । केक बनाने के लिये सामग्री से अधिक कला , समर्पण और प्रयास की जरुरत पडती है । इसलिये  निम्म क्वालिटी की सामग्री होने के बावजूद वह औरत अधिक बेहतर केक बना पायी जिसके पास यह तीन बहूमूल्य वस्तुयें  थी ।

मेरे कुछ मित्र है जिनकी जिन्दगी मे सब कुछ अस्त व्यस्त था । वह गरीबी मे पैदा हुये , बचपन उनका बहुत ही कठिन बीता , लोगॊ से ताने सहे और यहाँ तक गालियाँ भी खाई , उनकी तालीम या तो हुई नही और कुछ तो पढने मे साधारण से रह गये , और इनमें  से कुछ तो बेचारे विकलांग भी थे जिनके लिये खेल कूद बहुत दूर की चीज थी । लेकिन इसके बावजूद भी उनमे ऐसे गुण थे जिसकी वजह से वह अपनी जिन्दगी बना पाये । क्या आप ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर सकते है ?

मेरे कुछ   ऐसे मित्र भी हैं जिनके पास सब कुछ था , धनाढय परिवारों मे पैदा हुये , ऐशवर्य सी जिन्दगी पाई , पढाई मे बहुत ही काबिल रहे , बढिया खिलाडी भी  थे और स्मार्ट भी  लेकिन उन्होने अपनी जिन्दगी नशा ,  शराब और जुये जैसे व्यसनो मे बरबाद कर दी । क्या आप ऐसे लोगो की पहचान कर सकते हैं ?

कर्म का आधा हिस्सा वह सामाग्री है जिनके जरिये हमे कार्य करना है और आधा हिस्सा , जो जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है कि  उसके जरिये हम क्या करना चाहते हैं ।

कर्म को बीज के रुप मे भी देख सकते हैं । चयन आपके हाथॊ मे है  कि जीवन मे आप कौन से बीज बोयेगें ।

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अजह्न्ह ब्रह्म की पुस्तक , “ Who ordered this truckload of Dung ? “ मे  से ली गई कहानी   “ the Law of Karma ” का हिन्दी अनुवाद ।

Thursday, January 8, 2015

सारनाथ: प्राचीन धमेख स्तूप में दरार

 
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सारनाथ की पुरातात्विक धरोहरों में से एक महाकाय धमेख स्तूप की दीवार पर उभरी दरार ने स्तूप के अस्तित्व को लेकर शंकाएं पैदा कर दी हैं। इसके अलावा अशोक  स्तंभ पर जो राष्ट्रीय चिह्न विराजमान था, उस स्तंभ में पड़ी दरारें बढ़ती जा रही हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय पुरातत्व विभाग के आला अधिकारी राष्ट्र की धरोहरों के प्रति कितने सचेत हैं।
दिल्ली व पटना अंचल के अधिकारियों के सारनाथ दौरे तो होते हैं लेकिन इन्हें बचाने के लिए अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया। जब यह हाल है तो सारनाथ स्थित धरोहरों को विश्व धरोहर की सूची में कैसे स्थान मिलेगा। इनकी खास्ता हालत पर चिंतन मनन के लिए जिम्मेदार अफसरों के पास समय नहीं है लेकिन पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग बुधवार को एक बार फिर विश्व धरोहर दिवस मनाकर औपचारिकता पूरी कर लेगा। लोगों के अनुसार खानापूर्ति के बजाय सुधार के कारगर उपाय किए जाएं तो संभवत: सारनाथ विश्व धरोहर सूची में शामिल हो सकेगा। अशोक स्तंभ: सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के नीचे के भाग में दरारें बढ़ती जा रही हैं। इसके बारे में बताया जाता है कि यह सम्राट अशोक द्वारा 272-233 ईसा पूर्व में बनवाया गया था। इसकी ऊंचाई 15.25 मीटर थी। इस एकाश्म स्तंभ के शिखर पर चार सिंहों वाला प्रसिद्ध शीर्ष सुशोभित था। यह मौर्यकाल को एक उत्कृष्ट नमूना है जो भारत का राष्ट्रीय चिहृन भी है। दो दशक पूर्व मामूली रूप से पड़ी दरारें अब काफी लंबी व चौड़ी हो चुकी है। प्रदूषण की मार झेल रहे इस स्तंभ को बचाने को कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
धमेख स्तूपत्र भगवान बुद्ध के प्रथम धर्मो उपदेश की याद में बना गुप्तकाल का उत्कृष्ट नमूना है। इसका व्यास 28.5 मीटर, ऊंचाई 33.35 और भूमिगत भाग सहित कुल ऊंचाई 42.60 मीटर है। आधार से 6 मीटर की ऊंचाई पर आठ दिशाओं में आठ आले (ताखा) हैं। इसी के साथ ही चारों ओर पत्थर पर ज्यामितीय स्वास्तिक पत्र वल्लरी, पुष्प लता, मानव व पक्षी बडे़ ही सुंदर रूप से अलंकृत हैं। इसकी दुर्दशा के लिए भी पुरातत्व विभाग ही जिम्मेदार है। लगभग आठ वर्ष पूर्व रासायनिक परिरक्षण में रसायन का मिश्रण सही न होने के कारण तीन माह बाद ही कलाकृतियां काली पड़ने के साथ ही उनका क्षरण शुरू हो गया, जो अब तक बरकरार है।
मूलगंध कुटी अवशेष- भगवान बुद्ध की ध्यान साधना स्थल पर निर्मित एक विशाल मंदिर का यह भग्नावशेष है। इतिहासकार ह्वेन सांग के अनुसार इसकी ऊंचाई 61 मीटर थी। इसमें लगे अलंकृत ईटों और बनावट को देखने के बाद इतिहासकार इसे गुप्तकाल का मानते हैं। कलाकृति युक्त ईटें नोना लगने के कारण नष्ट हो रही हैं। इसी काल में बनी पंचायतन मंदिर की भी यही स्थिति है।
यही नहीं प्राचीन अवशेष की दीवारों के जीर्णोद्धार में सींमेट-बालू का प्रयोग किए जाने से इतिहासकार व इतिहास के विद्यार्थी काल का निर्धारण करने में भ्रमित हो जा रहे हैं।
साभार स्त्रोत:  दैनिक जागरण